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Alankar (Figure of speech)

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अलंकार (Figure of speech) की परिभाषा

अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना  है – अलम + कार। यहाँ पर अलम का अर्थ  है ‘आभूषण’ और कार का अर्थ है सुसज्जित करने वाला

अलंकार का शाब्दिक अर्थ है आभूषण”|

जिस तरह से एक नारी अपनी सुन्दरता को बढ़ाने के लिए आभूषणों को प्रयोग में लाती हैं उसी प्रकार भाषा को सुन्दर बनाने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात जो शब्द काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं उसे अलंकार कहते हैं।

“काव्य की शोभा में वृद्धि करने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं।

अलंकार से काव्य में रोचकता, चमत्कार और सुन्दरता उत्पन्न होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अलंकार को काव्य की आत्मा ठहराया है।

आचार्य दण्डी ने कहा भी है– “काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलङ्कारान् प्रचक्षते।” अर्थात् काव्य के शोभाकार धर्म, अलंकार होते हैं। अलंकारों के बिना कवितारूपी नारी विधवा–सी लगती है।

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अलंकार का महत्त्व

काव्य में अलंकार की महत्ता सिद्ध करने वालों में आचार्य भामह, उद्भट, दंडी और रुद्रट के नाम विशेष प्रख्यात हैं। इन आचार्यों ने काव्य में रस को प्रधानता न दे कर अलंकार की मान्यता दी है। अलंकार की परिपाटी बहुत पुरानी है। काव्य-शास्त्र के प्रारम्भिक काल में अलंकारों पर ही विशेष बल दिया गया था। हिन्दी के आचार्यों ने भी काव्य में अलंकारों को विशेष स्थान दिया है।

अलंकार कवि को सामान्य व्यक्ति से अलग करता है। जो कलाकार होगा वह जाने या अनजाने में अलंकारों का प्रयोग करेगा ही। इनका प्रयोग केवल कविता तक सीमित नहीं वरन् इनका विस्तार गद्य में भी देखा जा सकता है।

अलंकार के भेद

अलंकार के तीन भेद होते है:-

  1. शब्दालंकार – Shabd Alankar
  2. अर्थालंकार – Arthalankar
  3. उभयालंकार – Ubhaya Alankar

इन दोनों भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है;

1) शब्दालंकार:-

शब्दालंकार दो शब्द से मिलकर बना है- शब्द + अलंकार

शब्द के दो रूप है- ध्वनि और अर्थ। “जब कुछ विशेष शब्दों के कारण काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है तो वह ‘शब्दालंकार’ कहलाता है।”

शब्दालंकार के भेद:-

परिभाषा- वर्णों की आवृत्ति को ‘अनुप्रास’ कहते हैं; अर्थात् “जहाँ समान वर्णों की बार–बार आवृत्ति होती है वहाँ ‘अनुप्रास’ अलंकार होता है।” .
उदाहरण–
(क) तरनितनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
(
ख) रघुपति राघव राजा राम।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरणों के अन्तर्गत प्रथम में ‘त’ तथा द्वितीय में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास के भेद–अनुप्रास के पाँच प्रकार हैं–

  1. छेकानुप्रास,
  2. वृत्यनुप्रास,
  3. श्रुत्यनुप्रास,
  4. लाटानुप्रास,

परिभाषा: ’यमक’ का अर्थ है– ‘युग्म’ या ‘जोड़ा’। इस प्रकार “जहाँ एक शब्द अथवा शब्द–समूह का एक से अधिक बार प्रयोग हो, किन्तु उसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो, वहाँ ‘यमक’ अलंकार होता है।”

उदाहरण:-
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी,
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में ‘ऊँचे घोर मंदर’ के दो भिन्न–भिन्न अर्थ हैं– ‘महल’ और ‘पर्वत कन्दराएँ’; अतः यहाँ ‘यमक’ अलंकार है।

अन्य उदाहरण:-

काली घटा का घमण्ड घटा।

यहाँ ‘घटा’ शब्द की आवृत्ति भिन्न-भिन्न अर्थ में हुई है। पहले ‘घटा’ शब्द ‘वर्षाकाल’ में उड़ने वाली ‘मेघमाला’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है और दूसरी बार ‘घटा’ का अर्थ है ‘कम हुआ’। अतः यहाँ यमक अलंकार है।


 2) अर्थालंकार–

“जहाँ काव्य में अर्थगत चमत्कार होता है, वहाँ ‘अर्थालंकार’ माना जाता है।”

 दूसरे शब्दों में, जब किसी वाक्य या छंद को अर्थों के आधार पर सजाया जाये तो ऐसे अलंकार को अर्थालंकार कहते हैं।

अर्थालंकारों के भेदों पर विद्वानों के अलग अलग मत रहे हैं किसी विद्वान ने इसके भेद 23 बताये हैं तो किसी ने 125 तक बताये हैं।   इस अलंकार पर आधारित शब्दों के स्थान पर उनका कोई पर्यायवाची रख देने से भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

उदाहरणार्थ–
चरणकमल बन्दौं हरिराई।

यहाँ पर ‘कमल’ के स्थान पर ‘जलज’ रखने पर भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।

परिभाषा– ‘उपमा’ का अर्थ है–सादृश्य, समानता तथा तुल्यता। “जहाँ पर उपमेय की उपमान से किसी समान धर्म के आधार पर समानता या तुलना की जाए, वहाँ ‘उपमा’ अलंकार होता है।”
उपमा अलंकार के अंग–उपमा अलंकार के चार अंग हैं-
(क) उपमेय–जिसकी उपमा दी जाए।
(ख) उपमान–जिससे उपमा दी जाए।
(ग) समान (साधारण) धर्म–उपमेय और उपमान दोनों से समानता रखनेवाले धर्म।
(घ) वाचक शब्द–उपमेय और उपमान की समानता प्रदर्शित करनेवाला सादृश्यवाचक शब्द।

उदाहरण–
मुख मयंक सम मंजु मनोहर।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में ‘मुख’ उपमेय, ‘मयंक’ उपमान, ‘मंजु और मनोहर’ साधारण धर्म तथा ‘सम’ वाचक शब्द है; अत: यहाँ ‘उपमा’ अलंकार का पूर्ण परिपाक हुआ है।

अन्य उदाहरण:-

मुख चन्द्रमा-सा सुन्दर है।  

स्पष्टीकरण:- ऊपर दिए गए उदाहरण में चेहरे की तुलना चाँद से की गयी है। इस वाक्य में ‘मुख’ – उपमेय है, ‘चन्द्रमा’ – उपमान है, ‘सुन्दर’ – साधारण धर्म  है एवं ‘सा’ – वाचक शब्द है।

उपमा अलंकार के भेद

उपमा अलंकार के प्राय: चार भेद किए जाते हैं–
(क) पूर्णोपमा,
(ख) लुप्तोपमा,
(ग) रसनोपमा,
(घ) मालोपमा।

जब गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय को ही उपमान बता दिया जाए यानी उपमेय ओर उपमान में अभिन्नता दर्शायी जाए तब वह रूपक अलंकार कहलाता है।

दूसरे शब्दों में रूपक अलंकार में उपमान और उपमेय में कोई अंतर नहीं दिखायी पड़ता है।

उदाहरण –

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। 

स्पष्टीकरण ऊपर दिए गए उदाहरण में राम रतन को ही धन बता दिया गया है। ‘राम रतन’ – उपमेय पर ‘धन’ – उपमान का आरोप है एवं दोनों में अभिन्नता है।यहां आप देख सकते हैं की उपमान एवं उपमेय में अभिन्नता दर्शायी जा रही है। हम जानते हैं की जब अभिन्नता दर्शायी जाती ही तब वहां रूपक अलंकार होता है।

अतः यह उदाहरण रूपक अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अन्य उदाहरण
            ओ चिंता की पहली रेखा,
            अरे विश्ववन की व्याली।
           ज्वालामुखी स्फोट के भीषण,
          प्रथम कम्पसी मतवाली।

स्पष्टीकरण:–उपर्युक्त उदाहरण में चिन्ता उपमेय में विश्व–वन की व्याली आदि उपमानों का आरोप किया गया है, अत: यहाँ ‘रूपक’ अलंकार है।

रूपक के भेद:–आचार्यों ने रूपक के अनगिनत भेद–उपभेद किए हैं; किन्तु इसके तीन प्रधान भेद इस प्रकार हैं:–
(क) सांगरूपक,
(ख) निरंग रूपक,
(ग) परम्परित रूपक।

परिभाषा:-  जब किसी वस्तु, व्यक्ति आदि का वर्णन बहुत बाधा चढ़ा कर किया जाए तब वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है। इस अलंकार में नामुमकिन तथ्य बोले जाते हैं।

उदाहरण :

हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग,

लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग। 

स्पष्टीकरण ऊपर दिए गए उदाहरण में कहा गया है कि अभी हनुमान की पूंछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जलकर राख हो गयी और सारे राक्षस भाग खड़े हुए।

यह बात बिलकुल असंभव है एवं लोक सीमा से बढ़ाकर वर्णन किया गया है। अतः यह उदाहरण अतिशयोक्ति अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अन्य उदाहरण:-

आगे नदियां पड़ी अपार घोडा कैसे उतरे पार।

राणा ने सोचा इस पार तब तक चेतक था उस पार।।

स्पष्टीकरण:- ऊपर दी गयी पंक्तियों में बताया गया है कि महाराणा प्रताप के सोचने की क्रिया ख़त्म होने से पहले ही चेतक ने नदियाँ पार कर दी।

यह महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की अतिशयोक्ति है एवं इस तथ्य को लोक सीमा से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है।

 परिभाषा:- जब प्राकृतिक वस्तुओं कैसे पेड़,पौधे बादल आदि में मानवीय भावनाओं का वर्णन हो यानी निर्जीव चीज़ों में सजीव होना दर्शाया जाए तब वहां मानवीकरण अलंकार आता है।

उदाहरण

फूल हँसे कलियाँ मुसकाई।

स्पष्टीकरण:- जैसा कि ऊपर दिए गए उदाहरण में दिया गया है की फूल हंस रहे हैं एवं कलियाँ मुस्कुरा रही हैं। जैसा की हम जानते हैं की हंसने एवं  मुस्कुराने की क्रियाएं केवल मनुष्य ही कर सकते हैं प्राकृतिक चीज़ें नहीं। ये असलियत में संभव नहीं है  एवं हम यह भी जानते हैं की जब सजीव भावनाओं का वर्णन चीज़ों में किया जाता है तब यह मानवीकरण अलंकार होता है।

अतः यह उदाहरण मानवीकरण अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अन्य उदाहरण:-

मेघ आये बड़े बन-ठन के संवर के। 

स्पष्टीकरण:- ऊपर के उदाहरण में दिया गया है कि बादल बड़े सज कर आये लेकिन ये सब क्रियाएं तो मनुष्य कि होती हैं न कि बादलों की। अतएव यह उदाहरण मानवीकरण अलंकार के अंतर्गत आएगा। ये असलियत में संभव नहीं है  एवं हम यह भी जानते हैं की जब सजीव भावनाओं का वर्णन चीज़ों में किया जाता है तब यह मानवीकरण अलंकार होता है।

अतः यह उदाहरण मानवीकरण अलंकार के अंतर्गत आएगा।

Practice – अभ्यास

निम्नलिखित पद्यांशों में प्रयुक्त अलंकारों की पहचान कर उनके नाम लिखिए –

(1) को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर

उत्तर- श्लेष अलंकार

(2) एक सुंदर सीप का मुँह था खुला।

उत्तर- अनुप्रास अलंकार

(3 ) कितनी करुणा कितने संदो।

उत्तर -अनुप्रास अलंकार

(4 ) धारा पर पारा पारावार यों हलत है।

उत्तर -यमक अलंकार

(5 ) पाहून ज्यों  आए हों गाँव में नगर में।

उत्तर – श्लेष अलंकार

(6 ) तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।

उत्तर -यमक अलंकार

(7)  तुम तुंग हिमालय भ्रंग  |

उत्तर – अनुप्रास अलंकार

(8) भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं |

उत्तर – अनुप्रास अलंकार

(9) तीन बेर खातीं ते वे तीन बेर खाती हैं |

उत्तर – यमक अलंकार

(10) सुबरन को ढूँढ़त फिरै कवि , कामी अरु चोर |

उत्तर – श्लेष अलंकार 


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