Category: 10th Hindi Kritika

Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Class 10 Summary

Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Class 10 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग-2 का पाठ 4 पढ़ेंगे

एही ठैयॉं झुलनी होरानी हो रामा!’

Ehi Thaiya Jhulni Herani He Rama Chapter 4 Hindi Kritika Part 2

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पाठ के लेखक शिवप्रसाद ‘रुद्र’ हैं।

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

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लेखक परिचयः शिवप्रसाद मिश्ररुद्र

जीवन परिचयः लेखक का जन्म सन् 1911 में काशी में हुआ। उनकी शिक्षा काशी के हरिश्चंद्र कॉलेज, क्वींस कॉलेज एवं काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में हुई। रुद्र जी ने कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया। बहुभाषविद रूद्र जी एक साथ ही उपन्यासकार, नाटककार, गीतकार, व्यंग्यकार, पत्रकार और चित्रकार थे।

उनकी प्रमुख रचनायं हैः बहती गंगा, सुचिताच (उपन्यास), ताल तलैया, गजलिका, परीक्षा-पचीसी (गीत एवं व्यंग्य गीत संग्रह) उनकी अनेक संपादित रचनाएँ काशी नगरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हुई है। वे सभा के प्रधानमंत्री पद पर भी रहें। सन् 1970 में उनका देहांत हो गया।

रूद्र जी अपनी जन्म भूमि काशी के प्रति आजीवन निष्ठावान रहे और उनकी यही निष्ठा उनके साहित्य में व्यक्त हुई है, विशेषकर उनकी अंतिम कृति बहती गंगा में। बहती गंगा को कुछ विद्वान उपन्यास मानते है तो कुछ उसे कहानी-संग्रह भी मानते है।

Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Summary               

पाठ का सार: एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! 

‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ पाठ के लेखक शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ हैं। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने गाने-बजाने वाले समाज के देश के प्रति असीम प्रेम, विदेशी शासन के प्रति क्षोभ और पराधीनता की जंजीरों को उतार फेंकने की तीव्र लालसा का वर्णन किया है।

एक गाँव में दुलारी नाम की नाच-गाने का पेशा करने वाली स्त्री रहती थी। दुलारी का शरीर पहलवानों की तरह कसरती था। वह मराठी महिलाओं की तरह धोती लपेटकर कसरत करने के बाद प्याज और हरी मिर्च के साथ चने खाती थी। वह दुक्कड़ नामक बाजे पर गीत गाने के लिए प्रसिद्ध थी। उसके कजली गायन का सब लोग सम्मान करते थे। गाने में ही सवाल-जवाब करने में वह बहुत कुशल थी।

एक बार खोजवाँ दल की तरफ से गीतों में सवाल-जवाब करते हुए दुलारी की मुलाकात टुन्नू नाम के एक ब्राह्मण लड़के से हुई। बजरडीहा वालों की तरफ से मधुर कंठ में टुन्नू ने उसके साथ पहली बार सवाल-जवाब किए। मुकाबले में टुन्नू के मुँह से दुलारी की तारीफ सुनकर सुंदर के मालिक फेंकू सरदार ने टुन्नू पर लाठी से वार किया। दुलारी ने टुन्नू को उस मार से बचाया था। दुलारी ने तब अपने प्रति उसके प्रेम को अनुभव किया था।

दुलारी के घर आकर भी टुन्नू चुप रहता। कभी प्रेम को प्रकट नहीं करता था। होली के एक दिन पहले टुन्नू दुलारी के घर आया। उसने खादी आश्रम की बुनी साड़ी दुलारी को दी। दुलारी ने उसे बहुत डाँटा और साड़ी फेंक दी। टुन्नू अपमानित होकर रोने लगा। उसके आँसू दुलारी के द्वारा फेंकी साड़ी पर टपकने लगे। उसने अपना प्रेम पहली बार प्रकट किया और कहा कि उसका मन रूप और उम्र की सीमा में नहीं बँधा है।

टुन्नू के जाने के बाद दुलारी ने साड़ी पर पड़े आँसुओं के धब्बों को चूम लिया। दुलारी छह महीने पहले टुन्नू से मिली थी। उसने अपनी ढलती उम्र में प्रेम को पहली बार इतने करीब से महसूस किया था। टुन्नू की लाई साड़ी को उसने अपने कपड़ों में सबसे नीचे रख लिया। टुन्नू और अपने प्रेम को आत्मा का प्रेम समझते हुए भी दुलारी चिंतित थी।

उसी समय फेंकू सरदार धोतियों का बंडल लेकर दुलारी की कोठरी में आया। फेंकू सरदार ने उसे तीज पर बनारसी साड़ी दिलवाने का वायदा किया। जब दुलारी और फेंकू सरदार बातचीत कर रहे थे, उसी समय उसकी गली में से विदेशी वस्त्रों की होली जलाने वाली टोली निकली। चार लोगों ने एक चादर पकड़ रखी थी जिसमें लोग धोती, कमीज, कुरता, टोपी आदि डाल रहे थे।

दुलारी ने भी फेंकू सरदार का दिया मँचेस्टर तथा लंका-शायर की मिलों की बनी बारीक सूत की मखमली किनारेवाली धोतियों का बंडल फैली चादर में डाल दिया। अधिकतर लोग जलाने के लिए पुराने कपड़े फेंक रहे थे। दुलारी की खिड़की से नया बंडल फेंकने पर सबकी नजर उस तरफ उठ गई। जुलूस के पीछे चल रही खुफिया पुलिस के रिपोर्टर अली सगीर ने भी दुलारी को देख लिया था। दुलारी ने फेंकू सरदार को उसकी किसी बात पर झाड़ू से पीटकर घर से बाहर निकाल दिया। जैसे ही फेंकू दुलारी के घर से निकला, उसे पुलिस रिपोर्टर मिल गया जिसे देखकर वह झेंप गया। दुलारी के आँगन में रहने वाली सभी स्त्रियाँ इकट्ठी हो जाती हैं। सभी मिलकर दुलारी को शांत करती हैं। सब इस बात से हैरान थीं कि फेंकू सरदार ने दुलारी पर अपना सबकुछ न्योछावर कर रखा था, फिर आज उसने उसे क्यों मारा। दुलारी कहती है कि यदि फेंक ने उसे रानी बनाकर रखा था, तो उसने भी अपनी इज्जत, अपना सम्मान उसके नाम कर दिया था। एक नारी के सम्मान की कीमत कुछ नहीं है।

सभी स्त्रियाँ बैठी बातें कर रही थीं कि झींगुर ने आकर बताया कि टुनू महाराज को गोरे सिपाहियों ने मार दिया और वे लोग लाशें उठाकर भी ले गए। टुन्नू के मारे जाने का समाचार सुनकर दुलारी की आँखों से अविरल आँसुओं की धारा बह निकली। उसकी पड़ोसिनें भी दुलारी का हाल देखकर हैरान थीं। उसने टुन्न की दी साधारण खद्दर की धोती पहन ली। वह झींगुर से टुन्नू के शहीदी स्थल का पता पूछकर वहाँ जाने के लिए घर से बाहर निकली। घर से बाहर निकलते ही थाने के मुंशी और फेंकू सरदार ने उसे थाने चलकर अमन सभा के समारोह में गाने के लिए कहा।

प्रधान संवाददाता ने शर्मा जी की लाई हुई रिपोर्ट को मेज पर पटकते हुए डाँटा और अखबार की रिपोर्टरी छोड़कर चाय की दुकान खोलने के लिए कहा। उनके द्वारा लाई रिपोर्ट को उसने अलिफ लैला की कहानी कहते हैं, जिसे प्रकाशित करना वह उचित नहीं समझते। इस पर संपादक ने शर्मा जी रिपोर्ट पढ़ने के लिए कहा।

शर्मा जी ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक ‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा’ रखा था। उनकी रिपोर्ट के अनुसार कल छह अप्रैल को नेताओं की अपील पर नगर में पूर्ण हड़ताल रही। खोमचेवाले भी हड़ताल पर थे। सुबह से ही विदेशी वस्त्रों का संग्रह करके उनकी होली जलाने वालों के जुलूस निकलते रहे। उनके साथ प्रसिद्ध कजली गायक टुन्नू भी था। जुलूस टाउन हाॅल पहुँचकर समाप्त हो गया। सब जाने लगे तो पुलिस के जमादार अली सगीर ने टुन्नू को गालियाँ दी। टुन्नू के प्रतिवाद करने पर उसे जमादार ने बूट से ठोकर मारी। इससे उसकी पसली में चोट लगी। वह गिर पड़ा और उसके मुँह से खून निकल पड़ा। गोरे सैनिकों ने उसे उठाकर गाड़ी में डालकर अस्पताल ले जाने के स्थान पर वरुणा में प्रवाहित कर दिया, जिसे संवाददाता ने भी देखा था। इस टुन्न का दुलारी नाम की गौनहारिन से संबंध था।

कल शाम अमन सभा द्वारा टाउन हॉल में आयोजित समारोह में, जहाँ जनता का एक भी प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था, दुलारी को नचाया-गवाया गया था। टुन्नू की मृत्यु से दुलारी बहुत उदास थी। उसने खद्दर की साधारण धोती पहन रखी थी। वह उस स्थान पर गाना नहीं चाहती थी, जहाँ आठ घंटे पहले उसके प्रेमी की हत्या कर दी गई थी। फिर भी कुख्यात जमादार अली सगीर के कहने पर उसने दर्दभरे स्वर में श्एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा, कासों मैं पूछूश् गाया और जिस स्थान पर टुन्नू गिरा था, उधर ही नजर जमाए हुए गाती रही। गाते-गाते उसकी आँखों से आँसू बह निकले मानो टुन्नू की लाश को वरुणा में फेंकने से पानी की जो बूंदें छिटकी थीं, वे अब दुलारी की आँखों से बह निकली हैं।श् संपादक महोदय को रिपोर्ट तो सत्य लगी, परंतु वे इसे छापने में असमर्थ थे।

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Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Question Answers

पाठ्यपुस्तक से प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. हमारी आजादी की लड़ाई में समाज के उपेक्षित माने जाने वाले वर्ग का योगदान भी कम नहीं रहा है। इस कहानीमें ऐसे लोगों के योगदान को लेखक ने किस प्रकार उभारा है?

उत्तरः हमारे देश की आजादी की लड़ाई में सभी वर्गों व सभी धर्मों का योगदान रहा है, साथ ही समाज में उपेक्षित समझे जाने वाले वर्ग का भी योगदान कम नहीं रहा। इस पाठ के पात्र टुन्नू और दुलारी दोनों ही कजली गायक हैं जो समाज में कजली के दंगल में गाना गाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। दोनों ने आजादी के समय आन्दोलन में अपनी सामर्थ्य के अनुसार भरपूर योगदान दिया है।

टुन्नूः इस पाठ में टुन्नू सोलह-सत्रह वर्ष का संगीत प्रेमी बालक है और वह दुलारी से अपमानित होकर उन दीवानों की टोली में शामिल हो जाता है जो विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के लिए वस्त्रों को एकत्रित कर रहे थे। खुफिया-पुलिस का रिपोर्टर अली सगीर ने टुन्नू को बूट से इस तरह ठोकर मारी कि वह अपनी जान से हाथ धो बैठा। इस तरह उसने अपना बलिदान दे दिया।

दुलारीः दुलारी भी टुन्नू की तरह कजली गायिका थी। विदेशी वस्त्रों का संग्रह करने वाली टोली को कोरी धोतियों का बंडल दे देती है। वह टुन्नू द्वारा दी गई गांधी आश्रम की धोती को गर्व से पहनती है।

लेखक ने इस तरह समाज से उपेक्षित दोनों के योगदान को स्वतन्त्रता के आन्दोलन में महत्वपूर्ण माना है।

प्रश्न 2. कठोर हृदयी समझी जाने वाली दुलारी टुन्नू की मृत्यु पर क्यों विचलित हो उठी?

उत्तरः दुलारी अपने कर्कश स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थी। बात-बात पर तीर कमान की तरह ऐंठने वाली दुलारी के मन में अब टुन्नु के लिए कोमल भाव, करुणा और आत्मीयता उत्पन्न हो चुकी थी जो अव्यक्त थी और वह अनुभव कर रही कि टुन्नू के प्रति जो उसने उपेक्षा दिखाई थी वह कृत्रिम थी और उसके मन के कोने में टुन्नू का आसन स्थापित हो गया था और वह अनुभव कर रही थी कि उसके शरीर के प्रति टुन्नू के मन में कोई लोभ नहीं है। उसका सम्बन्ध शरीर से न होकर आत्मा से था। इसी कारण नए-नए वस्त्रों के प्रति मोह रखने वाली दुलारी विदेशी वस्त्रों का संग्रह करने वाली टोली में टुन्नू को देखकर नए वस्त्रों के बंडल को दे देती है। उसके अन्दर पनप रहा आत्मीय भाव टुन्नू की मृत्यु पर छटपटा उठा और उसकी दी गई खादी की धोती को पहन कर टुन्नू के प्रति आत्मीय सम्बन्ध को प्रकट कर विचलित हो उठी।

प्रश्न 3. कजली दंगल जैसी गतिविधियों का आयोजन क्यों हुआ करता होगा? कुछ और परम्परागत लोक आयोजनों का उल्लेखकीजिए?

उत्तर: कजली दंगल भी दूसरे मनोरंजन आयोजनों की तरह होता है। इसमें दो दल इकट्ठे होकर गाने की प्रतियोगिता करते हैं और दोनों दल अपने अलग-अलग भावों में व्यंग्य शैली अपनाते हुए सवाल करते हैं, इसके जवाब में दूसरा दल भी व्यंग्य-शैली में उत्तर देता है और प्रश्न कर देता है। वाह-वाह करने के लिए दोनों दलों के साथ संगीतकार होते हैं। कभी-कभी इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से विशेष कार्यों के प्रति लोगों में उत्साह भरा जाता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले लोगों में देश-प्रेम की भावना को उत्पन्न करना, लोगों को उत्साहित करना, प्रचार करना इन दंगलों के मुख्य कार्य थे।

कजली दंगल की तरह समाज में कई अन्य प्रकार के दंगल किए जाते हैं। जैसे-

  1. रसिया-दंगल ब्रज-क्षेत्र में अधिक प्रचलित है।
  2. रागिनी-दंगल पश्चिमी उत्तर-प्रदेश और हरियाणा में अधिक प्रचलित है।
  3. संकीर्तन-दंगल जहाँ-तहाँ सम्पूर्ण भारत में इसकी परम्परा है।
  4. पहलवानों का कुश्ती-दंगल दंगल भी सम्पूर्ण भारत में होता है।

बच्चों!

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Main Kyon Likhta Hun Class 10th Summary

Main Kyon Likhta Hun Class 10th Summary, Explanation and Question Answers

हैला बच्चों!

आल हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 2 का पाठ पढ़ेंगे

‘मैं क्यों लिखता हूं?’

पाठ के लेखक अज्ञेय हैं।

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बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखक का जीवन परिचय जानते हैं।

लेखक परिचय: अज्ञेय

जीवन परिचय: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का जन्म सन् 1911 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसिया (कुशीनगर) इलाके में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा जम्मू-कश्मीर में हुई और बी. एस. सी. लाहोर से की। क्रन्तिकारी आंदोलन में भाग लेने के कारण अज्ञेय को जेल भी जाना पड़ा।

साहित्य एवं पत्रकारिता की पूर्णत: समर्पित अज्ञेय ने देश-विदेश की अनेक यात्राएं की| उन्होंने कई नौकरियों कीं और छोड़ी| आज़ादी के बाद भी हिंदी कविता पर अज्ञेय का व्यापक प्रभाव है| कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृतांत, निबंध, आलोचना आदि अनेक विधाओं में भी लेखन-किया है।                    

प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय ने इस निबंध में यह स्पष्ट किया है कि रचनाकार की भीतरी विवशता ही उसे लेखन के लिए मजबूर करती है और लिखकर ही रचनाकार उससे मुक्त हो पाता है। अज्ञेय का यह मानना है कि प्रत्यक्ष अनुभव जब अनुभूति का रूप धारण करता है, तभी रचना पैदा होती है। अनुभव के बिना अनुभूति नहीं होती, परंतु यह आवश्यक नहीं कि हर अनुभव अनुभूति बने। अनुभव जब भाव जगत् और संवेदना का हिस्सा बनता है, तभी वह कलात्मक अनुभूति में रूपांतरित होता है।

पाठ का सार: मैं क्यों लिखता हूं?

1. लिखने का प्रश्न: अत्यंत कठिन

‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ लेखक के अनुसार यह प्रश्न बड़ा सरल प्रतीत होता है, पर यह बड़ा कठिन भी है। इसका सच्चा तथा वास्तविक उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन से संबंध रखता है। उन सबको संक्षेप में कुछ वाक्यों में बाँध देना आसान नहीं है।

2. लिखने का असली कारण

लेखक को ‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ प्रश्न का एक उत्तर तो यह लगता है कि वह स्वयं जानना चाहता है कि वह किसलिए लिखता है। उसे बिना लिखे हुए इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता। लिखकर ही वह उस आंतरिक प्रेरणा को विवशता को पहचानता है, जिसके कारण उसने लिखा। उसे लगता है कि वह उस आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए, तटस्थ (अलग) होकर उसे देखने और पहचान लेने के लिए लिखता है।

3. सभी लेखक कृतिकार नहीं

लेखक को ऐसा लगता है कि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते तथा उनके सभी लेखन कृति भी नहीं होते। यह तथ्य भी सही है कि कुछ लेखक ख्याति मिल जाने के बाद बाहरी विवशता से भी लिखते हैं। बाहरी विवशता संपादकों का आग्रह प्रकाशक का तकाजा, आर्थिक आवश्यकता आदि के रूप में हो सकती है।

4. लेखक का स्वभाव और अनुशासन

लेखन में कृतिकार के स्वभाव और आत्मानुशासन का बहुत महत्त्व है। कुछ लेखक इतने आलसी होते हैं कि बिना बाहरी दबाव के लिख ही नहीं पाते; जैसे प्रातःकाल नींद खुल जाने पर भी कोई बिछौने (बिस्तर) पर तब तक पड़ा रहता है, जब तक घड़ी का अलार्म न बज जाए।

5. लेखक की भीतरी विवशता

लेखक की भीतरी विवशता का वर्णन करना बड़ा कठिन है। लेखक विज्ञान का विद्यार्थी रहा है और उसकी नियमित शिक्षा भी विज्ञान विषय में ही हुई है। अणु का सैद्धांतिक ज्ञान लेखक को पहले से ही था, परंतु जब हिरोशिमा में अणु बम गिरा, तब लेखक ने उससे संबंधित खबरें पढ़ीं, साथ ही उसके परवर्ती प्रभावों का विवरण भी पढ़ा। विज्ञान के इस दुरुपयोग के प्रति बुद्धि का विद्रोह स्वाभाविक था। लेखक ने इसके बारे में लेख आदि में कुछ लिखा भी, पर अनुभूति के स्तर पर जो विवशता होती है, वह बौद्धिक पकड़ से आगे की बात है।

6. हिरोशिमा के प्रभावितों से साक्षात्कार

एक बार लेखक को जापान जाने का अवसर मिला। वहाँ जाकर उसने हिरोशिमा और उस अस्पताल को भी देखा , जहाँ रेडियम पदार्थ से आहत लोग वर्षों से कष्ट पा रहे थे। इस प्रकार उसे प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उसे लगा कि कृतिकार के लिए अनुभव से अनुभूति गहरी चीज़ है। यही कारण है कि हिरोशिमा में सब देखकर भी उसने तत्काल कुछ नहीं लिखा। फिर एक दिन उसने वहीं सड़क पर घूमते हुए देखा कि एक जले हुए पत्थर पर एक लंबी उजली छाया है। उसकी समझ में आया कि विस्फोट के समय कोई व्यक्ति वहाँ खड़ा रहा होगा और विस्फोट से बिखरे हुए रेडियोधर्मी पदार्थ की किरणें उसमें रुद्ध हो गई होंगी और उन किरणों ने उसे भाप बनाकर उड़ा दिया होगा। इसी कारण पत्थर का वह छाया वाला अंश झुलसने से बन गया होगा। यह देखकर उसे लगा कि समूची ट्रेजडी (दुःखद घटना) जैसे पत्थर पर लिखी गई है।

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7. लेखक का आश्चर्य

उस छाया को देखकर लेखक को जैसे एक थप्पड़-सा लगा। उसी क्षण अणु विस्फोट जैसे उसकी अनुभूति में आ गया और वह स्वयं हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया। अचानक एक दिन उसने भारत आकर हिरोशिमा पर एक कविता लिखी। यह कविता अच्छी हैं या बुरी, इससे लेखक को मतलब नहीं है। उसके लिए तो वह अनुभूतिजन्य सत्य है, जिससे वह यह जान गया कि कोई रचनाकार रचना क्यों करता है|

Main Kyun Likhta Hu Chapter 5 Question answers

मैं क्यों लिखता हूं पाठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?

उत्तर: लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव वह होता है, जिसे हम घटित होते हुए देखते हैं। इसके माध्यम से हम अनुभूति, संवेदना और कल्पना को सरलता से आत्मसात् कर लेते हैं। यह वास्तव में रचनाकार के साथ घटित नहीं होता है। वह आँखों के आगे नहीं आया होता। अनुभव की तुलना में अनुभूति (महसूस करने की क्षमता) लेखक के हृदय के सारे भावों को बाहर निकालने में उसकी सहायता करती है। जब तक हृदय में अनुभूति न जागे लेखन का कार्य करना संभव नहीं है। क्योंकि यही हृदय में संवेदना जागृत करती है और लेखन के लिए मजबूर करती है। यही कारण है कि लेखक लेखन के लिए अनुभूति को अधिक महत्व देता है।

प्रश्न 2. लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया?

उत्तर: लेखक ने अपनी जापान यात्रा के दौरान हिरोशिमा का दौरा किया था। वह उस अस्पताल में भी गया जहाँ आज भी उस भयानक विस्फोट से पीड़ित लोगों का ईलाज हो रहा था। इस अनुभव द्वारा लेखक को, उसका भोक्ता बनना स्वीकारा नहीं था ।कुछ दिन पश्चात् जब उसने उसी स्थान पर एक बड़े से जले पत्थर पर एक व्यक्ति की उजली छाया देखी, विस्फोट के समीप कोई व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा रहा होगा। विस्फोट से विसर्जित रेडियोधर्मी पदार्थ ने उस व्यक्ति को भाप बना दिया और पत्थर को झुलसा दिया। इस प्रत्यक्ष अनुभूति ने लेखक के हृदय को झकझोर दिया। उसे प्रतीत हुआ मानो किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो और उसके भीतर उस विस्फोट का भयानक दृश्य प्रज्वलित हो गया। उसे जान पड़ा मानो वह स्वयं हिरोशिमा बम का उपभोक्ता बन गया हो।

प्रश्न 3. मैं क्यों लिखता हूँ? के आधार पर बताइए कि –

(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?

(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?

उत्तर:

(क) लेखक अपनी आंतरिक विवशता के कारण लिखने के लिए प्रेरित होता है। उसकी अनुभूति उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है व स्वयं को जानने के लिए भी वह लिखने के लिए प्रेरित होता है।

(ख) किसी रचनाकार को उसकी आंतरिक विवशता रचना करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु कई बार उसे संपादकों के दवाब व आग्रह के कारण रचना लिखने के लिए उत्साहित होना पड़ता है। कई बार प्रकाशक का तकाज़ा व उसकी आर्थिक विवशता भी उसे रचना, रचने के लिए उत्साहित करती है।

प्रश्न 4. कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं?

उत्तर: कोई आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव, उसे हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। फिर चाहे कुछ भी हो परन्तु इनके साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होते हैं। ये दबाव संपादकों का आग्रह हो सकता है या फिर प्रकाशक का तकाज़ा या उसकी स्वयं की आर्थिक स्थिति जो उसे रचना करने के लिए दबाव डालती है।

प्रश्न 5. क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?

उत्तर: बिल्कुल! ये दवाब किसी भी क्षेत्र के कलाकार हो, सबको समान रुप से प्रभावित करते हैं। कलाकार अपनी अनुभूति या अपनी खुशी के लिए अवश्य अपनी कला का प्रदर्शन करता हो, परन्तु उसके क्षेत्र की विवशता एक रंचनाकार से अलग नहीं है। जैसे एक अभिनेता, मंच कलाकार या नृत्यकार हो सबको उनके निर्माता या निर्देशकों के दबाव पर प्रदर्शन करना पड़ता है। जनता के सम्मुख अपनी कला का श्रेष्ठ प्रदर्शन करें, इसलिए जनता का दबाव भी उन्हें प्रभावित करता है। उनकी आर्थिक स्थिति तो प्रभावित करती ही है क्योंकि यदि आर्थिक दृष्टि से वह सबल नहीं है तो वह अपनी ज़रुरतों का निर्वाह करने में असमर्थ महसूस करेगा। यह सब दबाव हर क्षेत्र के कलाकार को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 6. हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंत: व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?

उत्तर: यद्यपि जब लेखक जापान घूमने गया था तो हिरोशिमा में उस विस्फोट से पीड़ित लोगों को देखकर उसे थोड़ी पीड़ा हुई परन्तु उसका मन लिखने के लिए उसे प्रेरित नहीं कर पा रहा था। पर जले पत्थर पर किसी व्यक्ति की उजली छाया को देखकर उसको हिरोशिमा में विस्फोट से प्रभावित लोगों के दर्द की अनुभूति कराई।

हिरोशिमा के पीड़ितों को देखकर लेखक को पहले ही अनुभव हो चुका था परन्तु इस ज्वलंत उदाहरण ने उसके हृदय में वो अनुभूति जगाई कि लेखक को लिखने के लिए प्रेरित किया। ये अनुभव उसका बाह्य दबाव था और अनुभूति उसका आंतरिक दबाव जो उसके प्रेरणा सूत्र बने और उस प्रेरणा ने एक कविता लिखने के लिए लेखक को प्रेरित किया।

प्रश्न 7. हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और किस तरह से हो रहा है।

उत्तर: हिरोशिमा तो विज्ञान के दुरुपयोग का ज्वलंत उदाहरण है ही पर हम मनुष्यों द्वारा विज्ञान का और भी दुरुपयोग किया जा रहा है। आज हर देश परमाणु अस्त्रों को बनाने में लगा हुआ है जो आने वाले भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस विज्ञान की देन के द्वारा आज हम अंगप्रत्यारोपण कर सकते हैं। एक व्यक्ति के खराब अंग के स्थान पर दूसरे व्यक्ति के द्वारा दान में दिए गए अंगों का प्रत्यारोपण किया जाता है। परन्तु आज इस देन का दुरुपयोग कर हम मानव अंगो का व्यापार करने लगे हैं। विज्ञान ने कंप्यूटर का आविष्कार किया उसके पश्चात् उसने इंटरनेट का आविष्कार किया ये उसने मानव के कार्यों के बोझ को कम करने के लिए किया। हम मनुष्यों ने इन दोनों का दुरुपयोग कर वायरस व साइबर क्राइम को जन्म दिया है। विज्ञान ने यात्रा को सुगम बनाने के लिए हवाई जहाज़, गाड़ियों आदि का निर्माण किया परन्तु हमने इनसे अपने ही वातावरण को प्रदूषित कर दिया है। ऐसे कितने ही अनगिनत उदाहरण हैं जिससे हम विज्ञान का दुरुपयोग कर महाविनाश की ओर बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 8. एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?

उत्तर: हमारी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये कहना कि विज्ञान का दुरुपयोग हो रहा है – सही है! परन्तु हर व्यक्ति इसका दुरुपयोग कर रहा है। यह कहना सर्वथा गलत होगा। क्योंकि कुछ लोग इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कार्य करते रहते हैं।

(1) आज हमारे अथक प्रयासों के द्वारा ही परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। क्योंकि हथियार लगभग सभी देशों के पास है परन्तु परमाणु संधियों द्वारा इनके प्रयोगों में रोक लगा दी गई है। हमें चाहिए हम इनका समर्थन करें।

(2) प्रदूषण के प्रति जनता में जागरुकता लाने के लिए अनेकों कार्यक्रमों व सभा का आयोजन किया जा रहा है। जिससे प्रदूषण के प्रति रोकथाम की जा सके। इन समारोहों में जाकर व लोगों को बताकर हम अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं।

(3) अंग प्रत्यारोपण पर मीडिया के अथक प्रयास से ही अंकुश लगना संभव हो पाया है। हमें चाहिए कि उसके इस प्रयास में उसका साथ दे व जहाँ पर भी ऐसी कोई गतिविधि चल रही हो उससे मीडिया व कानून को जानकारी देकर उनका सहयोग करें।

प्रश्न 9. लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?

उत्तर: लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव वह होता है, जिसे हम घटित होते हुए देखते हैं। इसके माध्यम से हम अनुभूति, संवेदना और कल्पना को सरलता से आत्मसात् कर लेते हैं। यह वास्तव में रचनाकार के साथ घटित नहीं होता है। वह आँखों के आगे नहीं आया होता। अनुभव की तुलना में अनुभूति (महसूस करने की क्षमता) लेखक के हृदय के सारे भावों को बाहर निकालने में उसकी सहायता करती है। जब तक हृदय में अनुभूति न जागे लेखन का कार्य करना संभव नहीं है। क्योंकि यही हृदय में संवेदना जागृत करती है और लेखन के लिए मजबूर करती है। यही कारण है कि लेखक लेखन के लिए अनुभूति को अधिक महत्व देता है।

प्रश्न 10. लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया?

उत्तर: लेखक ने अपनी जापान यात्रा के दौरान हिरोशिमा का दौरा किया था। वह उस अस्पताल में भी गया जहाँ आज भी उस भयानक विस्फोट से पीड़ित लोगों का ईलाज हो रहा था। इस अनुभव द्वारा लेखक को, उसका भोक्ता बनना स्वीकारा नहीं था ।कुछ दिन पश्चात् जब उसने उसी स्थान पर एक बड़े से जले पत्थर पर एक व्यक्ति की उजली छाया देखी, विस्फोट के समीप कोई व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा रहा होगा। विस्फोट से विसर्जित रेडियोधर्मी पदार्थ ने उस व्यक्ति को भाप बना दिया और पत्थर को झुलसा दिया। इस प्रत्यक्ष अनुभूति ने लेखक के हृदय को झकझोर दिया। उसे प्रतीत हुआ मानो किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो और उसके भीतर उस विस्फोट का भयानक दृश्य प्रज्वलित हो गया। उसे जान पड़ा मानो वह स्वयं हिरोशिमा बम का उपभोक्ता बन गया हो।

प्रश्न 11. मैं क्यों लिखता हूँ? के आधार पर बताइए कि –

(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?

(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?

उत्तर:

(क) लेखक अपनी आंतरिक विवशता के कारण लिखने के लिए प्रेरित होता है। उसकी अनुभूति उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है व स्वयं को जानने के लिए भी वह लिखने के लिए प्रेरित होता है।

(ख) किसी रचनाकार को उसकी आंतरिक विवशता रचना करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु कई बार उसे संपादकों के दवाब व आग्रह के कारण रचना लिखने के लिए उत्साहित होना पड़ता है। कई बार प्रकाशक का तकाज़ा व उसकी आर्थिक विवशता भी उसे रचना, रचने के लिए उत्साहित करती है।

प्रश्न 12. कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं?

उत्तर: कोई आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव, उसे हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। फिर चाहे कुछ भी हो परन्तु इनके साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होते हैं। ये दबाव संपादकों का आग्रह हो सकता है या फिर प्रकाशक का तकाज़ा या उसकी स्वयं की आर्थिक स्थिति जो उसे रचना करने के लिए दबाव डालती है।

प्रश्न 13. क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?

उत्तर: बिल्कुल! ये दवाब किसी भी क्षेत्र के कलाकार हो, सबको समान रुप से प्रभावित करते हैं। कलाकार अपनी अनुभूति या अपनी खुशी के लिए अवश्य अपनी कला का प्रदर्शन करता हो, परन्तु उसके क्षेत्र की विवशता एक रंचनाकार से अलग नहीं है। जैसे एक अभिनेता, मंच कलाकार या नृत्यकार हो सबको उनके निर्माता या निर्देशकों के दबाव पर प्रदर्शन करना पड़ता है। जनता के सम्मुख अपनी कला का श्रेष्ठ प्रदर्शन करें, इसलिए जनता का दबाव भी उन्हें प्रभावित करता है। उनकी आर्थिक स्थिति तो प्रभावित करती ही है क्योंकि यदि आर्थिक दृष्टि से वह सबल नहीं है तो वह अपनी ज़रुरतों का निर्वाह करने में असमर्थ महसूस करेगा। यह सब दबाव हर क्षेत्र के कलाकार को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 14. हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंत: व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?

उत्तर: यद्यपि जब लेखक जापान घूमने गया था तो हिरोशिमा में उस विस्फोट से पीड़ित लोगों को देखकर उसे थोड़ी पीड़ा हुई परन्तु उसका मन लिखने के लिए उसे प्रेरित नहीं कर पा रहा था। पर जले पत्थर पर किसी व्यक्ति की उजली छाया को देखकर उसको हिरोशिमा में विस्फोट से प्रभावित लोगों के दर्द की अनुभूति कराई।

हिरोशिमा के पीड़ितों को देखकर लेखक को पहले ही अनुभव हो चुका था परन्तु इस ज्वलंत उदाहरण ने उसके हृदय में वो अनुभूति जगाई कि लेखक को लिखने के लिए प्रेरित किया। ये अनुभव उसका बाह्य दबाव था और अनुभूति उसका आंतरिक दबाव जो उसके प्रेरणा सूत्र बने और उस प्रेरणा ने एक कविता लिखने के लिए लेखक को प्रेरित किया।

प्रश्न 15. हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और किस तरह से हो रहा है।

उत्तर: हिरोशिमा तो विज्ञान के दुरुपयोग का ज्वलंत उदाहरण है ही पर हम मनुष्यों द्वारा विज्ञान का और भी दुरुपयोग किया जा रहा है। आज हर देश परमाणु अस्त्रों को बनाने में लगा हुआ है जो आने वाले भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस विज्ञान की देन के द्वारा आज हम अंगप्रत्यारोपण कर सकते हैं। एक व्यक्ति के खराब अंग के स्थान पर दूसरे व्यक्ति के द्वारा दान में दिए गए अंगों का प्रत्यारोपण किया जाता है। परन्तु आज इस देन का दुरुपयोग कर हम मानव अंगो का व्यापार करने लगे हैं। विज्ञान ने कंप्यूटर का आविष्कार किया उसके पश्चात् उसने इंटरनेट का आविष्कार किया ये उसने मानव के कार्यों के बोझ को कम करने के लिए किया। हम मनुष्यों ने इन दोनों का दुरुपयोग कर वायरस व साइबर क्राइम को जन्म दिया है। विज्ञान ने यात्रा को सुगम बनाने के लिए हवाई जहाज़, गाड़ियों आदि का निर्माण किया परन्तु हमने इनसे अपने ही वातावरण को प्रदूषित कर दिया है। ऐसे कितने ही अनगिनत उदाहरण हैं जिससे हम विज्ञान का दुरुपयोग कर महाविनाश की ओर बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 16. एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?

उत्तर: हमारी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये कहना कि विज्ञान का दुरुपयोग हो रहा है – सही है! परन्तु हर व्यक्ति इसका दुरुपयोग कर रहा है। यह कहना सर्वथा गलत होगा। क्योंकि कुछ लोग इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कार्य करते रहते हैं।

(1) आज हमारे अथक प्रयासों के द्वारा ही परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। क्योंकि हथियार लगभग सभी देशों के पास है परन्तु परमाणु संधियों द्वारा इनके प्रयोगों में रोक लगा दी गई है। हमें चाहिए हम इनका समर्थन करें।

(2) प्रदूषण के प्रति जनता में जागरुकता लाने के लिए अनेकों कार्यक्रमों व सभा का आयोजन किया जा रहा है। जिससे प्रदूषण के प्रति रोकथाम की जा सके। इन समारोहों में जाकर व लोगों को बताकर हम अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं।

(3) अंग प्रत्यारोपण पर मीडिया के अथक प्रयास से ही अंकुश लगना संभव हो पाया है। हमें चाहिए कि उसके इस प्रयास में उसका साथ दे व जहाँ पर भी ऐसी कोई गतिविधि चल रही हो उससे मीडिया व कानून को जानकारी देकर उनका सहयोग करें।

बच्चों!

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