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Naubatkhane Mein Ibadat Class 10 Summary

Naubatkhane Mein Ibadat Class 10th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग-2 की कविता पढ़ेंगे

नौबतखाने में इबादत’

पाठ के लेखक यतीन्द्र मिश्र हैं।

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बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचयः यतीन्द्र मिश्र

Yatindra Mishr

जीवन परिचयः साहित्य और कलाओं के संवर्धन में विशेष सहयोग प्रदान करने वाले यतीन्द्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या शहर में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ से एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। सन 1999 में साहित्य और कलाओं के संवर्ध्दन और अनुशलीन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन भी कर रहे हैं। उनको भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। आजकल स्वतंत्र लेखन के साथदृसाथ ‘सहित’ नामक अर्धवार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं।

प्रमुख रचनाएँः अब तक यतींद्र मिश्र के तीन काव्य दृ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताये, ड्योढ़ी पर अलापद्य 

भाषा शैलीः यतींद्र मिश्र की भाषा सरल, सहज, प्रवाहमय, प्रसंगानुकूल है। उनकी रचनाओं में संवेदना एवं भावुकता का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है।

Naubatkhane Mein Ibadat Chapter 16 Summary

पाठ का सारः नौबतखाने में इबादत

अम्मीरुद्दीन उर्फ बिस्मिल्लाह खाँ का जन्म बिहार में डुमराँव के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ। इनके बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था जो उम्र में उनसे तीन वर्ष बड़े थे। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम पैगम्बरबख़्ष खाँ तथा माँ मिट्ठन थीं। पांच-छह वर्ष होने पर वे डुमराँव छोड़कर अपने ननिहाल काशी आ गए। वहां उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबक्श तथा नाना रहते थे जो की जाने माने शहनाईवादक थे। वे लोग बाला जी के मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाकर अपनी दिनचर्या का आरम्भ करते थे। वे विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने का काम करते थे।

ननिहाल में 14 साल की उम्र से ही बिस्मिल्लाह खाँ ने बाला जी के मंदिर में रियाज करना शुरू कर दिया। उन्होंने वहां जाने का ऐसा रास्ता चुना जहाँ उन्हें रसूलन और बतूलन बाई की गीत सुनाई देती जिससे उन्हें खुशी मिलती। अपने साक्षात्कारों में भी इन्होनें स्वीकार किया की बचपन में इनलोगों ने इनका संगीत के प्रति प्रेम पैदा करने में भूमिका निभायी। भले ही वैदिक इतिहास में शहनाई का जिक्र ना मिलता हो परन्तु मंगल कार्यों में इसका उपयोग प्रतिष्ठित करता है अर्थात यह मंगल ध्वनि का सम्पूरक है। बिस्मिल्लाह खाँ ने अस्सी वर्ष के हो जाने के वाबजूद हमेशा पाँचो वक्त वाली नमाज में शहनाई के सच्चे सुर को पाने की प्रार्थना में बिताया। मुहर्रम के दसों दिन बिस्मिल्लाह खाँ अपने पूरे खानदान के साथ ना तो शहनाई बजाते थे और ना ही किसी कार्यक्रम में भाग लेते। 8वीं तारीख को वे शहनाई बजाते और दालमंडी से फातमान की आठ किलोमीटर की दुरी तक भींगी आँखों से नोहा बजाकर निकलते हुए सबकी आँखों को भिंगो देते।

फुरसत के समय वे उस्ताद और अब्बाजान को काम याद कर अपनी पसंद की सुलोचना गीताबाली जैसी अभिनेत्रियों की देखी फिल्मों को याद करते थे। वे अपनी बचपन की घटनाओं को याद करते की कैसे वे छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनाता तथा बाद में उनकी ‘मीठी शहनाई’ को ढूंढने के लिए एक-एक कर शहनाई को फेंकते और कभी मामा की शहनाई पर पत्थर पटककर दाद देते। बचपन के समय वे फिल्मों के बड़े शौकीन थे, उस समय थर्ड क्लास का टिकट छः पैसे का मिलता था जिसे पूरा करने के लिए वो दो पैसे मामा से, दो पैसे मौसी से और दो पैसे नाना से लेते थे फिर बाद में घंटों लाइन में लगकर टिकट खरीदते थे। बाद में वे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री सुलोचना की फिल्मों को देखने के लिए वे बालाजी मंदिर पर शहनाई बजाकर कमाई करते। वे सुलोचना की कोई फिल्म ना छोड़ते तथा कुलसुम की देसी घी वाली दूकान पर कचैड़ी खाना ना भूलते।

बिस्मिल्लाह खाँ

काशी के संगीत आयोजन में वे अवश्य भाग लेते। यह आयोजन कई वर्षों से संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर हो रहा था जिसमे शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन-वादन की सभा होती है। बिस्मिल्लाह खाँ जब काशी के बाहर भी रहते तब भी वो विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की तरफ मुँह करके बैठते और अपनी शहनाई भी उस तरफ घुमा दिया करते। गंगा, काशी और शहनाई उनका जीवन थे। काशी का स्थान सदा से ही विशिष्ट रहा है, यह संस्कृति की पाठशाला है। बिस्मिल्लाह खाँ के शहनाई के धुनों की दुनिया दीवानी हो जाती थी।

सन 2000 के बाद पक्का महाल से मलाई-बर्फ वालों के जाने से, देसी घी तथा कचैड़ी-जलेबी में पहले जैसा स्वाद ना होने के कारण उन्हें इनकी कमी खलती। वे नए गायकों और वादकों में घटती आस्था और रियाजों का महत्व के प्रति चिंतित थे। बिस्मिल्लाह खाँ हमेशा से दो कौमों की एकता और भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देते रहे। नब्बे वर्ष की उम्र में 21 अगस्त 2006 को उन्हने दुनिया से विदा ली। वे भारतरत्न, अनेकों विश्वविद्यालय की मानद उपाधियाँ व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा पद्मविभूषण जैसे पुरस्कारों से जाने नहीं जाएँगे बल्कि अपने अजेय संगीतयात्रा के नायक के रुप में पहचाने जाएँगे।

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Naubatkhane Mein Ibadat Class 10 Question Answers

नौबतखाने में इबादत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?

उत्तरः मशहूर शहनाई वादक “बिस्मिल्ला खाँ” का जन्म डुमराँव गाँव में ही हुआ था। इसके अलावा शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से पोली होती है, जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। रीड, नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारे पाई जाती है। इसी कारण शहनाई की दुनिया में डुमराँव का महत्त्व है।

प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?

उत्तरः शहनाई ऐसा वाद्य है जिसे मांगलिक अवसरों पर ही बजाया जाता है। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ शहनाई वादन के क्षेत्र में अद्वितीय स्थान रखते हैं। इन्हीं कारणों के वजह से बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है।

प्रश्न 3. सुषिर-वाद्यों से क्या अभिप्राय है? शहनाई को ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि क्यों दी गई होगी?

उत्तरः सुषिर-वाद्यों से अभिप्राय है फूँककर बजाये जाने वाले वाद्य।

शहनाई एक अत्यंत मधुर स्वर उत्पन्न करने वाला वाद्ध है। फूँककर बजाए जाने वाले वाद्यों में कोई भी वाद्य ऐसा नहीं है जिसके स्वर में इतनी मधुरता हो। शहनाई में समस्त राग-रागिनियों को आकर्षक सुरों में बाँधा जा सकता है। इसलिए शहनाई की तुलना में अन्य कोई सुषिर-वाद्य नहीं टिकता और शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों के शाह’ की उपाधि दी गयी होगी।

प्रश्न 4.  आशय स्पष्ट कीजिए –

  • ‘फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।’
  • ‘मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’

उत्तरः () यहाँ बिस्मिल्ला खाँ ने सुर तथा कपड़े (धन-दौलत) से तुलना करते हुए सुर को अधिक मूल्यवान बताया है। क्योंकि कपड़ा यदि एक बार फट जाए तो दुबारा सिल देने से ठीक हो सकता है। परन्तु किसी का फटा हुआ सुर कभी ठीक नहीं हो सकता है। और उनकी पहचान सुरों से ही थी इसलिए वह यह प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें अच्छा कपड़ा अर्थात् धन-दौलत दें या न दें लेकिन अच्छा सुर अवश्य दें।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ पाँचों वक्त नमाज के बाद खुदा से सच्चा सुर पाने की प्रार्थना करते थे। वे खुदा से कहते थे कि उन्हें इतना प्रभावशाली सच्चा सुर दें और उनके सुरों में दिल को छूने वाली ताकत बख्शे उनके शहनाई के स्वर आत्मा तक प्रवेश करें और उसे सुनने वालों की आँखों से सच्चे मोती की तरह आँसू निकल जाए। यही उनके सुर की कामयाबी होगी।

प्रश्न 5. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?

उत्तरः काशी से बहुत सी परंपराएँ लुप्त हो गई है। संगीत, साहित्य और अदब की परंपर में धीरे-धीरे कमी आ गई है। अब काशी से धर्म की प्रतिष्ठा भी लुप्त होती जा रही है। वहाँ हिंदु और मुसलमानों में पहले जैसा भाईचारा नहीं है। पहले काशी खानपान की चीजों के लिए विख्यात हुआ करता था। परन्तु अब उनमें परिवर्तन हुए हैं। काशी की इन सभी लुप्त होती परंपराओं के कारण बिस्मिल्ला खाँ दुःखी थे।

प्रश्न 6. पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि –

(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।

(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इनसान थे।

उत्तरः प्रसंगों के आधार-

(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली जुली संस्कृति के प्रतीक थे। उनका धर्म मुस्लिम था। मुस्लिम धर्म के प्रति उनकी सच्ची आस्था थी परन्तु वे हिंदु धर्म का भी सम्मान करते थे। मुहर्रम के महीने में आठवी तारीख के दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे व दालमंडी मे फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते थे।

इसी तरह इनकी श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है। वे जब भी काशी से बाहर रहते थे। तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे और उसी ओर शहनाई बजाते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि काशी छोड़कर कहाँ जाए, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ। मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ एक सच्चे इंसान थे। वे धर्मों से अधिक मानवता को महत्व देते थे, हिंदु तथा मुस्लिम धर्म दोनों का ही सम्मान करते थे, भारत रत्न से सम्मानित होने पर भी उनमें घमंड नहीं था, दौलत से अधिक सुर उनके लिए जरुरी था।

प्रश्न 7. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया?

उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में कुछ ऐसे व्यक्ति और कुछ ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने उनकी संगीत साधना को प्रेरित किया।

  1. बालाजी मंदिर तक जाने का रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता था। इस रास्ते से कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा की आवाजें आती थी। इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर उनके मन में संगीत की ललक जागी।
  2. बिस्मिल्ला खाँ जब सिर्फ चार साल के थे तब छुपकर अपने नाना को शहनाई बजाते हुए सुनते थे। रियाज के बाद जब उनके नाना उठकर चले जाते थे तब अपनी नाना वाली शहनाई ढूँढते थे और उन्हीं की तरह शहनाई बजाना चाहते थे।
  3. मामूजान अलीबख्श जब शहनाई बजाते-बजाते सम पर आ जाते तो बिस्मिल्ला खाँ धड़ से एक पत्थर जमीन में मारा करते थे। इस प्रकार उन्होंने संगीत में दाद देना सीखा।
  4. बिस्मिल्ला खाँ कुलसुम की कचैड़ी तलने की कला में भी संगीत का आरोह-अवरोह देखा करते थे।
  5. बचपन में वे बालाजी मंदिर पर रोज शहनाई बजाते थे। इससे शहनाई बजाने की उनकी कला दिन-प्रतिदिन निखरने लगी।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 1. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?

उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की निम्नलिखित बातें हमें प्रभावित करती हैं –

  1.  ईश्वर के प्रति उनके मन में अगाध भक्ति थी।
  2. मुस्लिम होने के बाद भी उन्होंने हिंदु धर्म का सम्मान किया तथा हिंदु-मुस्लिम एकता को कायम रखा।
  3. भारत रत्न की उपाधि मिलने के बाद भी उनमें घमंड कभी नहीं आया।
  4. वे एक सीधे-सादे तथा सच्चे इंसान थे।
  5. उनमें संगीत के प्रति सच्ची लगन तथा सच्चा प्रेम था।
  6. वे अपनी मातृभूमि से सच्चा प्रेम करते थे।

प्रश्न 2. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः मुहर्रम पर्व के साथ बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई का सम्बन्ध बहुत गहरा है। मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान शोक मनाते थे। इसलिए पूरे दस दिनों तक उनके खानदान का कोई व्यक्ति न तो मुहर्रम के दिनों में शहनाई बजाता था और न ही संगीत के किसी कार्यक्रम में भाग लेते थे। आठवीं तारीख खाँ साहब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होती थी। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंड़ी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते हुए जाते थे। इन दिनों कोई राग-रागिनी नहीं बजाई जाती थी। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती थीं।

प्रश्न 3. बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ भारत के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक थे। वे अपनी कला के प्रति पूर्णतया समर्पित थे। उन्होंने जीवनभर संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की इच्छा को अपने अंदर जिंदा रखा। वे अपने सुरों को कभी भी पूर्ण नहीं समझते थे इसलिए खुदा के सामने वे गिड़गिड़ाकर कहते द- “मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ ।” खाँ साहब ने कभी भी धन-दौलत को पाने की इच्छा नहीं की बल्कि उन्होंने संगीत को ही सर्वश्रेष्ठ माना। वे कहते थे- “मालिक से यही दुआ है- फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी ।”

इससे यह पता चलता है कि बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे।

बच्चों!

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हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक

क्षितिज भाग-2 का पाठ पढ़ेंगे

‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarkon Ka Khandan Chapter 15

पाठ के लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं।

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  1. लेखक का जीवन परिचय
  2. पाठ प्रवेश
  3. पाठ का सार
  4. प्रश्नोत्तर
  5. परीक्षा उपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचयः महावीर प्रसाद द्विवेदी

जीवन परिचयः हिंदी के योग निर्माता, भाषा के संस्कारकर्ता एवं उत्कृष्ट निबंधकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1864 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर नामक गांव में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण शिक्षाक्रम सुचारु रुप से नहीं चल सका। अपने स्वध्याय से ही उन्होंने संस्कृत, हिंदी, बंगाली, मराठी, फारसी, गुजराती, अंग्रेजी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वे तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएं भेजने लगे।

उन्होंने रेलवे के तार-विभाग में नौकरी की। बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह साहित्य सेवा में जुट गए। सरस्वती पत्रिका के संपादक का कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा से हिंदी साहित्य को नियंत्रित करके निखारा और उसकी अभूतपूर्व श्री वृधि की। सन् 1931 में काशी नगरी प्रचारिणी सभा ने इनको आचार्य की तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन ने ‘वाचस्पति’ की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1938 में हिंदी का यह है यशस्वी आचार्य परलोक वासी हो गया।

पाठ प्रवेशः

प्रस्तुत लेख विचारात्मक लेख है। इस लेख के माध्यम से लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ऐसी सभी पुरानी रुढ़ियों एवं परंपराओं का विरोध किया है जो स्त्रीदृ शिक्षा को व्यर्थ अथवा समाज के विघटन का कारण मानती है। यह लेख पहली बार सितंबर 1914 की सरस्वती में ‘पढ़ेदृलिखो का पांडित्य’ नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। बाद में ‘महिला मोद’ नामक पुस्तक में शामिल करते समय द्विवेदी जी ने इसका शीर्षक बदल कर ‘स्त्रीदृशिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ रख दिया। प्रस्तुत लेख में द्विवेदी जी ने सड़ीदृगली परंपराओं को ज्यों के त्यों न अपनाकर अपने विवेकपूर्ण दृष्टि से फैसला लेकर ग्रहण करने के योग्य बातों को ही अपनाने के लिए कहा है। समाज में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अनेक स्त्रीदृपुरुषों ने लंबा संघर्ष किया। लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से आगे निकल गई है। वर्तमान नवजागरण काल में स्त्रीदृशिक्षा के विकास के साथ-साथ जनतांत्रिक एवं वैज्ञानिक चेतना के संपूर्ण विकास के लिए अलख जगाया।

पाठ का सारः

इस पाठ में लेखक ने स्त्री शिक्षा के महत्व को प्रसारित करते हुए उन विचारों का खंडन किया है। लेखक को इस बात का दुःख है आज भी ऐसे पढ़े-लिखे लोग समाज में हैं जो स्त्रियों का पढ़ना गृह-सुख के नाश का कारण समझते हैं। विद्वानों द्वारा दिए गए तर्क इस तरह के होते हैं, संस्कृत के नाटकों में पढ़ी-लिखी या कुलीन स्त्रियों को गँवारों की भाषा का प्रयोग करते दिखाया गया है। शकुंतला का उदहारण एक गँवार के रूप में दिया गया है जिसने दुष्यंत को कठोर शब्द कहे। जिस भाषा में शकुंतला ने श्लोक वो गँवारों की भाषा थी। इन सब बातों का खंडन करते हुए लेखक कहते हैं की क्या कोई सुशिक्षित नारी प्राकृत भाषा नही बोल सकती। बुद्ध से लेकर महावीर तक ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में ही दिए हैं तो क्या वो गँवार थे। लेखक कहते हैं की हिंदी, बांग्ला भाषाएँ आजकल की प्राकृत हैं। जिस तरह हम इस जमाने में हिंदी, बांग्ला भाषाएँ पढ़कर शिक्षित हो सकते हैं उसी तरह उस जमाने में यह अधिकार प्राकृत को हासिल था। फिर भी प्राकृत बोलना अनपढ़ होने का सबूत है यह बात नही मानी जा सकती।

जिस समय नाट्य-शास्त्रियों ने नाट्य सम्बन्धी नियम बनाए थे उस समय सर्वसाधारण की भाषा संस्कृत नही थी। इसलिए उन्होंने उनकी भाषा संस्कृत और अन्य लोगों और स्त्रियों की भाषा प्राकृत कर दिया। लेखक तर्क देते हुए कहते हैं कि शास्त्रों में बड़े-बड़े विद्वानों की चर्चा मिलती है किन्तु उनके सिखने सम्बन्धी पुस्तक या पांडुलिपि नही मिलतीं उसी प्रकार प्राचीन समय में नारी विद्यालय की जानकारी नही मिलती तो इसका अर्थ यह तो नही लगा सकते की सारी स्त्रियाँ गँवार थीं। लेखक प्राचीन काल की अनेकानेक शिक्षित स्त्रियाँ जैसे शीला, विज्जा के उदारहण देते हुए उनके शिक्षित होने की बात को प्रामणित करते हैं। वे कहते हैं की जब प्राचीन काल में स्त्रियों को नाच-गान, फूल चुनने, हार बनाने की आजादी थी तब यह मत कैसे दिया जा सकता है की उन्हें शिक्षा नही दी जाती थी। लेखक कहते हैं मान लीजिये प्राचीन समय में एक भी स्त्री शिक्षित नही थीं, सब अनपढ़ थीं उन्हें पढ़ाने की आवश्यकता ना समझी गयी होगी परन्तु वर्तमान समय को देखते हुए उन्हें अवश्य शिक्षित करना चाहिए।

लेखक पिछड़े विचारधारावाले विद्वानों से कहते हैं की अब उन्हें अपने पुरानी मान्यताओं में बदलाव लाना चाहिए। जो लोग स्त्रियों को शिक्षित करने के लिए पुराणों के हवाले माँगते हैं उन्हें श्रीमद्भागवत, दशमस्कंध के उत्तरार्ध का तिरेपनवां अध्याय पढ़ना चाहिए जिसमे रुक्मिणी हरण की कथा है। उसमे रुक्मिणी ने एक लम्बा-चैड़ा पत्र लिखकर श्रीकृष्ण को भेजा था जो प्राकृत में नहीं था। वे सीता, शकुंतला आदि के प्रसंगो का उदहारण देते हैं जो उन्होंने अपने पतियों से कहे थे। लेखक कहते हैं अनर्थ कभी नही पढ़ना चाहिए। शिक्षा बहुत व्यापक शब्द है, पढ़ना उसी के अंतर्गत आता है। आज की माँग है की हम इन पिछड़े मानसिकता की बातों से निकलकर सबको शिक्षित करने का प्रयास करें। प्राचीन मान्यताओं को आधार बनाकर स्त्रियों को शिक्षा से वंचित करना अनर्थ है।

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarko Ka Khandan Chapter 15 Q/A

प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1. स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री शिक्षा का समर्थन किया?

उत्तरः द्विवेदी जी ने पुराने जमाने के ऐसे कितने उदाहरण दिए हैं जिनमें पढ़ी लिखी स्त्रियों का उल्लेख हुआ है। इन उदाहरणों की मदद से वे इस कुतर्क को झुठलाना चाहते हैं कि पुराने जमाने में स्त्रियों को पढ़ाने की परंपरा नहीं थी। वे ये भी बताते हैं कि शायद पुराने जमाने में स्त्रियों को विधिवत शिक्षा देने की जरूरत नहीं पड़ी होगी। लेकिन जब हम जरूरत के हिसाब से हर पद्धति को बदल सकते हैं तो स्त्री शिक्षा के बारे में भी हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है।

प्रश्न-2. ‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’ – कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः द्विवेदी जी नए बताया है कि पुरुषों ने स्त्रियों की तुलना में कहीं ज्यादा अनर्थ किए हैं। पुरुषों ने युद्ध में मार काट मचाई है, चोरी की है, डाका डाला है और अन्य कई अपराध किए हैं। इसलिए शिक्षा को अनर्थ के लिए दोष देना उचित नहीं है।

प्रश्न-3. द्विवेदी जी ने स्त्री शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है – जैसे ‘यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं।’ आप ऐसे अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिखिए।

उत्तरः ‘सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने का ही नतीजा है।’ – इस व्यंग्य में उन्होंने उस मानसिकता पर प्रहार किया है जो हर गलत घटना के लिए स्त्रियों की शिक्षा को जिम्मेदार ठहराता है। ‘स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट।‘ – इस पंक्ति के द्वारा द्विवेदी जी स्त्री शिक्षा के विरोधियों की दोहरी मानसिकता के बारे में बता रहे हैं।

प्रश्न-4. पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है- पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः पुराने जमाने में कई ग्रंथ प्राकृत में लिखे गये थे। उदाहरण के लिए बुद्ध के उपदेशों को प्राकृत में लिखा गया था। शाक्यमुनि अपने उपदेश प्राकृत में ही देते थे। इससे यह पता चलता है कि प्राकृत भाषा उस समय अत्यधिक लोगों द्वारा बोली जाती थी। इसके अलावा हमें एक खास भाषा पर महारत को शिक्षा के मुद्दे से अलग करके देखना होगा। आधुनिक भारत में अंग्रेजी बोलने में पारंगत लोगों को अधिक संभ्रांत समझा जाता है। इसका ये मतलब नहीं है कि जो व्यक्ति अंग्रेजी बोलना नहीं जानता उसे हम अशिक्षित करार दे दें।

प्रश्न-5. परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री पुरुष समानता को बढ़ाते हों दृ तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तरः परंपराएँ कभी-कभी रूढि़ बन जाती हैं। जब ऐसी स्थिति हो जाए तो किसी खास परंपरा को तोड़ना ही सबके हित में होता है। समय बदलने के साथ पुरानी परंपराएँ टूटती हैं और नई परंपराओं का निर्माण होता है। इसलिए परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार करना चाहिए जो स्त्री पुरुष समानता को बढ़ाते हैं।

प्रश्न-6. तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।

उत्तर: अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत में शिक्षा की कोई नियमबद्ध प्रणाली नहीं थी। वेदों और पुराणों के जमाने में ऋषि मुनि गुरुकुलों में शिक्षा दिया करते थे। ऐसे गुरुकुलों में छात्रों को गृहस्थ जीवन के लिए हर जरूरी क्रियाकलाप में दक्षता हासिल करनी होती थी। इसके अलावा उन्हें एक अच्छे योद्धा बनने का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। आज की शिक्षा प्रणाली अधिक परिष्कृत और नियमबद्ध है। आज नाना प्रकार के विषयों के ज्ञान दिए जाते हैं। पहले स्त्रियों की शिक्षा के लिए कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं थी लेकिन अब ऐसी बात नहीं है।

प्रश्न-7. महावीर प्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?

उत्तरः महावीर प्रसाद द्विवेदी जिस जमाने के हैं उससे यह साफ पता चलता है कि उनकी सोच कितनी आधुनिक थी। उस जमाने में अधिकाँश लोग स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ थे। ऐसे में कोई स्त्री-पुरुष समानता की बात करे तो इसे दुस्साहस ही कहेंगे। महावीर प्रसाद का खुलापन इसी बात में झलता है।

प्रश्न-8. द्विवेदी जी की भाषा शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तरः महावीर? प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने भाषा को और शुद्ध तथा परिष्कृत किया। लेकिन उनकी भाषा पाठकों के लिए दुरूह न हो जाए इसका भी ध्यान दिया। उन्होंने अपनी भाषा में सरलता भी लाने की कोशिश की थी। इसके अलावा व्यंग्य का उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया है। व्यंग्य के इस्तेमाल से दो फायदे होते हैं। लेखक इससे पाठक को बाँधने में कामयाब हो जाता है। व्यंग्य के माध्यम से गंभीर से गंभीर बात भी आसानी से कही जा सकती है।

Hindi Aroh Part 2 Chapter 15 Important Question Answers

परीक्षा उपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तरः

प्रश्न-1. स्त्री शिक्षा के विरोधी लोगों के क्या तर्क हैं? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तरः प्रस्तुत पाठ में स्त्री शिक्षा विरोधी लोगों ने स्त्री शिक्षा के विरोध में निम्नलिखित तर्क दिए हैं-

  1. स्त्री शिक्षा की आवश्यकता प्राचीन काल में नहीं थी, इसलिए प्राचीन काल के पुराणों व इतिहास में स्त्री शिक्षा की किसी भी प्रणाली के प्रमाण नहीं मिलते। इसलिए स्त्री शिक्षा की आज भी आवश्यकता नहीं है।
  2. स्त्री शिक्षा के विरोधियों का यह भी तर्क है कि स्त्री शिक्षा से अनर्थ होते हैं। शकुंतला ने दुष्यंत को जो कुवाक्य कहे वह स्त्री शिक्षा के अनर्थ का परिणाम है।
  3. संस्कृत के नाटकों में स्त्री पात्रों के मुख से प्राकृत भाषा बुलाई गई है। उस समय को प्राकृत को गंवार भाषा समझा जाता था। इससे पता चलता है कि उन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं था। वे गंवार और अनपढ़ थी। उनकी दृष्टि में तो गंवार भाषा के ज्ञान से भी अनर्थ हुआ।

प्रश्न-2. पुरातन पंथी लोगों ने शकुंतला पर जो आरोप लगाए क्या आप उनसे सहमत हैं?

उत्तरः पुरातन पंथी लोगों ने शकुंतला पर आरोप लगाया है कि उसने अशिक्षा के कारण ही राजा दुष्यंत को कुवाक्य कहे। यदि वह शिक्षित होती तो ऐसा अनर्थ ना करती। हम पुरातन पंथियों के इस आरोप से सहमत नहीं हैं। यहां प्रश्न शिक्षा का नहीं है। यह प्रश्न है कि दुष्यंत ने शकुंतला से गंधर्व विवाह किया और जब वह उनसे मिलने आई तो उसने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया। ऐसी स्थिति में तो कोई भी कुवाक्य ही कहेगा। यहां शकुंतला की शिक्षा को दोष देना उचित नहीं है।

प्रश्न-3. संस्कृत और प्राकृत के संबंध पर प्रकाश डालिए?

उत्तरः संस्कृत प्राचीन एवं शुद्ध साहित्यिक भाषा है। इस भाषा को जानने वाले बहुत कम लोग थे। उस समय संस्कृत के साथ-साथ कुछ प्राकृत भाषाएं भी प्रचलित थी। यह सभी भाषाएं संस्कृत से ही निकली हुई जन भाषाएं थी। मागधी, महाराष्ट्री, पाली, शौरसेनी आदि अपने समय की लोक भाषा ही थी। इन्हें प्राकृत भाषायें भी कहा जाता है। बौद्ध और जैन साहित्य इन्हीं भाषाओं में रचित साहित्य है। अतः प्राकृत भाषा गंवार या अनपढ़ों की भाषा नहीं है।

प्रश्न-4. संस्कृत में स्त्री पात्रों द्वारा संस्कृत न बोलना उनकी अनपढ़ता का प्रमाण है। पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तरः संस्कृत के नाटकों में नारी पात्र संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत बोलने का कारण यह है कि उस समय प्राकृत लोक भाषा या जन भाषा थी। किंतु लेखक इन पुरातन पंथियों के स्त्री शिक्षा विरोधी तर्कों को उचित नहीं समझता। उनके अनुसार प्राकृत बोलना अनपढ़ता का सबूत नहीं है। उस समय आम बोलचाल में प्राकृत भाषा का ही प्रयोग किया जाता था। संस्कृत भाषा का प्रचलन तो कुछ ही लोगों तक सीमित था। अतः यही कारण रहा होगा कि नाट्य शास्त्रियों ने नाट्य शास्त्र संबंधी नियम बनाते समय इस बात का ध्यान रखा होगा। क्योंकि संस्कृत को कुछ ही लोग बोल सकते थे इसलिए कुछ पात्रों को छोड़कर अन्य पात्रों से प्राकृत बुलवाने का नियम बनाया जाए। इस प्रकार स्त्री पात्रों द्वारा संस्कृत में बोलने के कारण उन्हें अनपढ़ नहीं समझना चाहिए। फिर प्राकृत में भी तो महान साहित्य रचना का निर्माण हुआ है।

प्रश्न-5. प्राचीन काल में प्राकृत भाषा का चलन था। पाठ के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।

उत्तरः स्त्री शिक्षा विरोधियों ने प्राकृत भाषा को अनपढ़ एवं गवार लोगों की भाषा बताया है। किंतु लेखक ने प्राकृत भाषा को जनसाधारण की भाषा बताया है। उस समय की पढ़ाई लिखाई भी प्राकृत भाषा में होती थी। प्राकृत भाषा के प्रचलन का प्रमाण बौद्ध और जैन ग्रंथों में मिलता है। दोनों धर्मों के हजारों प्राकृत भाषा में रचित हैं। महात्मा बुध के अपने संदेश भी प्राकृत भाषा में दिए गए हैं। बौद्ध धर्म का महान ग्रंथ श्त्रिपिटकश् प्राकृत भाषा में है। ऐसे महान ग्रंथों का प्राकृत मे लिखे जाने का कारण यही था कि उस समय जन भाषा प्राकृत ही थी। अतः प्राकृत अनपढ़ों की भाषा नहीं थी।

प्रश्न-6. लेखक के अनुसार आज के युग में स्त्रियों के शिक्षित होने की आवश्यकता प्राचीन काल की अपेक्षा अधिक क्यों है? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।

उत्तर: यदि स्त्री शिक्षा विरोधियों की बात मान भी ली जाए कि प्राचीन काल में स्त्रियों को प्रशिक्षित करने का प्रचलन नहीं था, तो उस समय स्त्रियों को शिक्षा की अधिक आवश्यकता नहीं होगी। किंतु आज के युग में नारी शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व दोनों ही अधिक है। आज का युग भौतिकवादी और प्रतियोगिता का युग है। इस युग में अनपढ़ता देश और समाज के विकास में बाधा ही नहीं अपितु देश व समाज के लिए कलंक भी है। नारी का शिक्षित होना तो इसलिए अति आवश्यक है कि जिस परिवार में नारी शिक्षित होगी उस परिवार के बच्चों की शिक्षा व्यवस्था अच्छी हो सकेगी। शिक्षित नारी ही बच्चों का अच्छे बुरे की पहचान करने का ज्ञान देकर उन्हें अच्छे नागरिक बना सकेगी। शिक्षित नारी नौकरी करके या अन्य कार्य करके धन कमाकर परिवार के आर्थिक विकास में सहायता कर सकती है। इसलिए लेखक ने प्राचीन काल की अपेक्षा आधुनिक युग में स्त्री शिक्षा की अधिक आवश्यकता बताई है।

प्रश्न-7. प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों के लिए किस-किस शिक्षा का विधान किया गया था?

उत्तरः प्राचीन ग्रंथों में कुछ ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं जिससे पता चलता है कि कुंवारियों के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा का प्रबंध था, जैसे चित्र बनाना, नाचने, गाने, बजाने, फूल चुनने और हार गूंथने आदि । लेखक का मानना है कि उन्हें पढ़ने लिखने की शिक्षा भी निश्चित रूप से दी जाती होगी।

प्रश्न-8. ‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ नामक पाठ का उद्देश्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः इस पाठ का मुख्य उद्देश्य स्त्री शिक्षा के विरोधी लोगों के कुतर्कों का जोरदार शब्दों में खंडन करना है। लेखक ने अनेक प्रमाण प्रस्तुत करके सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है कि प्राचीन काल में भी स्त्री शिक्षा की व्यवस्था थी और अनेक शिक्षित स्त्रियों के नाम उल्लेख भी किए गए हैं। जैसे गार्गी, अत्री-पत्नी, विश्ववरा, मंडन मिश्र की पत्नी आदि अनेक स्त्रियाँ हुई है। आज के युग में स्त्री शिक्षा नितांत आवश्यक है। शिक्षा कभी किसी का अनर्थ नहीं करती। यदि स्त्री शिक्षा में कुछ संशोधनों की आवश्यकता पड़े तो कर लेनी चाहिए। किंतु स्त्री-शिक्षा का विरोध करना कदाचित उचित नहीं है।

बच्चों!

टेक्स्ट और वीडियो के माध्यम से पढ़ाया गया पाठ ‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ आपको कैसा लगा?

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Utsaah & Att Nahi Rahi Class 10 Summary

Utsaah & Att Nahi Rahi Class10th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 की कविता पढ़ेंगे

‘उत्साह’ और ‘अट नहीं रही’

Utsaah & Att Nahi Rahi Class 10 Chapter 5

कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

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बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

जीवन परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला

जीवन परिचय: दुखों व संघर्षों से भरा जीवन जीने वाले विस्तृत सरोकारों के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन काल सन 1899-1961 तक रहा। उनकी रचनओं में क्रांति, विद्रोह और प्रेम की उपस्थिति देखने को मिलती है। उनका जन्मस्थान कवियों की जन्मभूमि यानि बंगाल में हुआ।

साहित्य के क्षेत्र में उनका नाम अनामिका, परिमल, गीतिका आदि कविताओं और निराला रचनावली के नाम से प्रकाशित उनके संपूर्ण साहित्य से हुआ, जिसके आठ खंड हैं। स्वामी परमहंस एवं विवेकानंद जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेने वाले और उनके बताए पथ पर चलने वाले निराला जी ने भी स्वंत्रता-संघर्ष में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उत्साह कविता का भावार्थ

1.

बादल, गरजो! –

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

ललित ललित, काले घुंघराले,

बाल कल्पना के-से पाले,

विधुत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले!

वज्र छिपा, नूतन कविता

फिर भर दो–

बादल गरजो!

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बारिश होने से पहले आकाश में दिखने वाले काले बादलों के गरज़ने और आकाश में बिजली चमकने का अद्भुत वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि बादल धरती के सभी प्राणियों को नया जीवन प्रदान करते हैं और यह हमारे अंदर के सोये हुए साहस को भी जगाते हैं।

आगे कवि बादल से कह रहे हैं कि “हे काले रंग के सुंदर-घुंघराले बादल! तुम पूरे आकाश में फैलकर उसे घेर लो और खूब गरजो। कवि ने यहाँ बादल का मानवीयकरण करते हुए उसकी तुलना एक बच्चे से की है, जो गोल-मटोल होता है और जिसके सिर पर घुंघराले एवं काले बाल होते हैं, जो कवि को बहुत प्यारे और सुन्दर लगते हैं।

आगे कवि बादल की गर्जन में क्रान्ति का संदेश सुनाते हुए कहते हैं कि हे बादल! तुम अपनी चमकती बिजली के प्रकाश से हमारे अंदर पुरुषार्थ भर दो और इस तरह हमारे भीतर एक नये जीवन का संचार करो! बादल में वर्षा की सहायता से धरती पर नया जीवन उत्पन्न करने की शक्ति होती है, इसलिए, कवि बादल को एक कवि की संज्ञा देते हुए उसे एक नई कविता की रचना करने को कहते हैं।

2.

विकल विकल, उन्मन थे उन्मन

विश्व के निदाघ के सकल जन,

आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!

तप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो–

बादल, गरजो!

भावार्थ: कवि बादलों को क्रांति का प्रतीक मानते हुए यह कल्पना कर रहे हैं कि वह हमारे सोये हुए पुरुषार्थ को फिर से जगाकर, हमें एक नया जीवन प्रदान करेगा, हमें जीने की नई आशा देगा। कवि इन पंक्तियों में कहते हैं कि भीषण गर्मी के कारण दुनिया में सभी लोग तड़प रहे थे और तपती गर्मी से राहत पाने के लिए छाँव व ठंडक की तलाश कर रहे थे। किसी अज्ञात दिशा से घने काले बादल आकर पूरे आकाश को ढक लेते हैं, जिससे तपती धूप धरती तक नहीं पहुँच पाती। फिर बादल घनघोर वर्षा करके गर्मी से तड़पती धरती की प्यास बुझाकर, उसे शीतल एवं शांत कर देते हैं। धरती के शीतल हो जाने पर सारे लोग भीषण गर्मी के प्रकोप से बच जाते हैं और उनका मन उत्साह से भर जाता है।

इन पंक्तियों में कवि ये संदेश देना चाहते हैं कि जिस तरह धरती के सूख जाने के बाद भी बादलों के आने पर नये पौधे उगने लगते हैं। ठीक उसी तरह अगर आप जीवन की कठिनाइयों के आगे हार ना मानें और अपने पुरुषार्थ पर भरोसा रखकर कड़ी मेहनत करते रहें, तो आपके जीवन का बगीचा भी दोबारा फल-फूल उठेगा। इसलिए हमें अपने जीने की इच्छा को कभी मरने नहीं देना चाहिए और पूरे उत्साह से जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए।

कविता का भावार्थ: अट नहीं रही है

1.

अट नहीं रही है

आभा फागुन की तन

सट नहीं रही है।

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने फागुन के महीने की सुंदरता का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। होली के वक्त जो मौसम होता है, उसे फागुन कहते हैं। उस समय प्रकृति अपने चरम सौंदर्य पर होती है और मस्ती से इठलाती है। फागुन के समय पेड़ हरियाली से भर जाते हैं और उन पर रंग-बिरंगे सुगन्धित फूल उग जाते हैं। इसी कारण जब हवा चलती है, तो फूलों की नशीली ख़ुशबू उसमें घुल जाती है। इस हवा में सारे लोगों पर भी मस्ती छा जाती है, वो काबू में नहीं कर पाते और मस्ती में झूमने लगते हैं।

2.

कहीं साँस लेते हो,

घर-घर भर देते हो,

उड़ने को नभ में तुम

पर-पर कर देते हो,

आँख हटाता हूँ तो

हट नहीं रही है।

भावार्थ: इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि घर-घर में उगे हुए पेड़ों पर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। उन फूलों की ख़ुशबू हवा में यूँ बह रही है, मानो फागुन ख़ुद सांस ले रहा हो। इस तरह फागुन का महीना पूरे वातावरण को आनंद से भर देता है। इसी आनंद में झूमते हुए पक्षी आकाश में अपने पंख फैला कर उड़ने लगते हैं। यह मनोरम दृश्य और मस्ती से भरी हवाएं हमारे अंदर भी हलचल पैदा कर देती हैं। यह दृश्य हमें इतना अच्छा लगता है कि हम अपनी आँख इससे हटा ही नहीं पाते। इस तरह फागुन के मस्त महीने में हमें भी मस्ती से गाने एवं पर्व मनाने का मन होने लगता है।

3.

पत्तों से लदी डाल

कहीं हरी, कहीं लाल,

कहीं पड़ी है उर में

मंद गंध पुष्प माल,

पाट-पाट शोभा श्री

पट नहीं रही है।

भावार्थ: कवि के अनुसार फागुन मास में प्रकृति इतनी सुन्दर नजर आती है कि उस पर से नजर हटाने को मन ही नहीं करता। चारों तरफ पेड़ों पर हरे एवं लाल पत्ते दिखाई दे रहे हैं और उनके बीच रंग-बिरंगे फूल ऐसे लग रहे हैं, मानो पेड़ों ने कोई सुंदर, रंगबिरंगी माला पहन रखी हो। इस सुगन्धित पुष्प माला की ख़ुशबू कवि को बहुत ही मादक लग रही है। कवि के अनुसार, फागुन के महीने में यहाँ प्रकृति में होने वाले बदलावों से सभी प्राणी बेहद ख़ुश हो जाते हैं। कविता में कवि स्वयं भी बहुत ही खुश लग रहे हैं।

Watch Video: Utsaah aur Att Nahi Rahi Class 10th Summary in Easy Language

UTSAAH & ATT NAHI RAHI QUESTION ANSWERS

‘उत्साह’ और ‘अट नहीं रही’ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर ‘गरजने के लिए कहता है, क्यों?

उत्तर: बच्चे की दंतुरित मुसकान को देखकर कवि का मन प्रसन्न हो उठता है। उसके उदास-गंभीर मन में जान आ जाती है। उसे ऐसे लगता है मानो उसकी झोंपड़ी में कमल के फूल खिल उठे हों। मानो पत्थर जैसे दिल में प्यार की धारा उमड़ पड़ी हो या बबूल के पेड़ से शेफालिका के फूल झरने लगे हों।।

क्यों बच्चे की निश्छलता और पिता की ममता के कारण ही कवि-मन इस तरह प्रभावित होता है। ”

प्रश्न 2. कविता का शीर्षक उत्साह क्यों रखा गया है?

उत्तर: कवि ने कविता का शीर्षक उत्साह इसलिए रखा है, क्योंकि कवि बादलों के माध्यम से क्रांति और बदलाव लाना चाहता है। वह बादलों से गरजने के लिए कहता है। एक ओर बादलों के गर्जन में उत्साह समाया है तो दूसरी ओर लोगों में उत्साह का संचार करके क्रांति के लिए तैयार करना है।

प्रश्न 3. कविता में बादल किन-किन अर्थों की ओर संकेत करता है?

उत्तर: कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को निम्नलिखित बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है

1. बच्चे की मुसकान से मृतक में भी जान आ जाती है।

2. यों लगता है मानो झोंपड़ी में कमल के फूल खिल उठे हों।

3. यों लगता है मानो चट्टानें पिघलकर जलधारा बन गई हों।

4. यों लगता है मानो बबूल से शेफालिका के फूल झरने लगे हों।

प्रश्न 4. शब्दों का ऐसा प्रयोग जिससे कविता के किसी खास भाव या दृश्य में ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा हो, नाद-सौंदर्य कहलाता है। उत्साह कविता में ऐसे कौन-से शब्द हैं जिनमें नाद-सौंदर्य मौजूद हैं, छाँटकर लिखें।

उत्तर: ‘उत्साह’ कविता में नाद सौंदर्य वाले शब्द निम्नलिखित हैं

बादल गरजो!

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

प्रश्न 5. जैसे बादल उमड़-घुमड़कर बारिश करते हैं वैसे ही कवि के अंतर्मन में भी भावों के बादल उमड़-घुमड़कर कविता के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। ऐसे ही किसी प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अपने उमड़ते भावों को कविता में उतारिए।

उत्तर:

ऊपर देखो आसमान में,

किसने रंग बिखेरा काला।

सूरज जाने कहाँ छिप गया,

खो गया उसका कहीं उजाला ॥

देख गगन का काला चेहरा

बिजली कुछ मुसकाई ।

लगा बहाने गगन बनाने,

ज्यों बिजली ने आँख दिखाई ॥

कुछ वसुधा में आन समाया॥

वह लाई एक थाल में पानी,

उसका मुँह धुलवाया।

थोड़ा पानी आसमान में

बाकी सब धरती पर आया ।।

कुछ टपका फूलों पर जाकर

कुछ ने चातक की प्यास बुझाया।

कुछ तालों कुछ फसलों तक

अन्य पाठेतर हल प्रश्न

प्रश्न 1. कवि ने क्रांति लाने के लिए किसका आह्वान किया है और क्यों ?

उत्तर: कवि ने क्रांति लाने के लिए बादलों का आह्वान किया है। कवि का मानना है कि बादल क्रांतिदूत हैं। उनके अंदर घोर गर्जना की शक्ति है जो लोगों को जागरूक करने में सक्षम है। इसके अलावा बादलों के हृदय में बिजली छिपी है।

प्रश्न 2. कवि युवा कवियों से क्या आवान करता है?

उत्तर: कवि युवा कवियों से आह्वान करता है कि वे प्रेम और सौंदर्य की कविताओं की रचना न करके लोगों में जोश और उमंग भरने वाली कविताओं की रचना करें, जो लोगों पर बज्र-सा असर करे और लोग क्रांति के लिए तैयार हो सकें।

प्रश्न 3. कवि ने ‘नवजीवन’ का प्रयोग बादलों के लिए भी किया है। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कवि बादलों को कल्याणकारी मानता है। बादल विविध रूपों में जनकल्याण करते हैं। वे अपनी वर्षा से लोगों की बेचैनी दूर करते हैं और तपती धरती का ताप शीतल करके मुरझाई-सी धरती में नया जीवन फेंक देते हैं। वे धरती को फ़सल उगाने योग्य बनाकर लोगों में नवजीवन का संचार करते हैं।

प्रश्न 4. बादल आने से पूर्व प्राणियों की मनोदशा का चित्रण कीजिए।

उत्तर: जब तक आसमान में बादलों का आगमन नहीं हुआ था, गरमी अपने चरम सीमा पर थी। इससे लोग बेचैन, परेशान और उदास थे। उन्हें कहीं भी चैन नहीं था। गरमी ने उनका जीना दूभर कर दिया था। उनका मन कहीं भी नहीं लग रहा था।

प्रश्न 5. कवि निराला बादलों में क्या-क्या संभावनाएँ देखते हैं?

उत्तर: कवि निराला बादलों में निम्नलिखित संभावनाएँ देखते हैं –

  • बादल लोगों को क्रांति लाने योग्य बनाने में समर्थ हैं।
  • बादल धरती और धरती के प्राणियों दोनों को नवजीवन प्रदान करते हैं।
  • बादल धरती और लोगों का ताप हरकर शीतलता प्रदान करते हैं।

प्रश्न 6. कवि ने बादलों के किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कवि ने बादलों को ‘आज्ञात दिशा के घन’ और ‘नवजीवन वाले’  जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है। कवि उन्हें अज्ञात दिशा के घन इसलिए कहा है क्योंकि बादल किस दिशा से आकर आकाश में छा गए, पता नहीं। इसके अलावा वे धरती और प्राणियों को नवजीवन देते हैं।

प्रश्न 7. ‘कहीं साँस लेते हो’ ऐसा कवि ने किसके लिए कहा है और क्यों?

अथवा

कवि ने फागुन का मानवीकरण कैसे किया है? ।

उत्तर: फागुन महीने में तेज हवाएँ चलती हैं जिनसे पत्तियों की सरसराहट के बीच साँय-साँय की आवाज़ आती है। इसे सुनकर ऐसा लगता है, मानो फागुन साँस ले रहा है। कवि इन हवाओं में फागुन के साँस लेने की कल्पना कर रहा है। इस तरह कवि ने फागुन का मानवीकरण किया है।

प्रश्न 8. ‘उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो’  के आलोक में बताइए कि फागुन लोगों के मन को किस तरह प्रभावित करता है?

उत्तर: ‘उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो’ से ज्ञात होता है कि फागुन में चारों ओर इस तरह सौंदर्य फैल जाता है कि वातावरण मनोरम बन जाता है। रंग-बिरंगे फूलों के खुशबू से हवा में मादकता घुल जाती है। ऐसे में लोगों का मन कल्पनाओं में खोकर उड़ान भरने लगता है।

प्रश्न 9. ‘अट नहीं रही है’ कविता के आधार पर फागुन में उमड़े प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर: फागुन का सौंदर्य अन्य ऋतुओं और महीनों से बढ़कर होता है। इस समय चारों ओर हरियाली छा जाती है। खेतों में कुछ फसलें पकने को तैयार होती हैं। सरसों के पीले फूलों की चादर बिछ जाती है। लताएँ और डालियाँ रंग-बिरंगे फूलों से सज जाती हैं। प्राणियों का मन उल्लासमय हुआ जाता है। ऐसा लगता है कि इस महीने में प्राकृतिक सौंदर्य छलक उठा है।

प्रश्न 10. ‘अट नहीं रही है’ कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: ‘अट नहीं रही है’ कविता में फागुन महीने के सौंदर्य का वर्णन है। इस महीने में प्राकृतिक सौंदर्य कहीं भी नहीं समा रहा है और धरती पर बाहर बिखर गया है। इस महीने सुगंधित हवाएँ वातावरण को महका रही हैं। पेड़ों पर आए लाल-हरे पत्ते और फूलों से यह सौंदर्य और भी बढ़ गया है। इससे मन में उमंगें उड़ान भरने लगी हैं।

तो बच्चो!

Text और Video के माध्यम से पढ़ाई गई कविता “कन्यादान” आपको कैसी लगी?

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धन्यवाद!

Kanyadan Class 10 Summary

Kanyadan Class 10th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग- 2 की कविता पढ़ेंगे

‘Kanyadan’ Class 10th Chapter 8 Hindi Kshitij Part 2

कविता के रचयिता ऋतुराज हैं।

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बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

जीवन परिचय: कवि ऋतुराज

जीवन परिचय: कवि ऋतुराज का जन्म सन 1940 में भरतपुर में हुआ। उन्होंने जयपुर (राजस्थान विश्वविद्यालय) से अंग्रेजी विषय में एम.ए. (M.A.) किया।

फिर 40 वर्षों तक अंग्रेजी साहित्य में अध्यापन का कार्य किया। फ़िलहाल कविराज जयपुर में रहते हैं। कवि ऋतुराज की कविताओं में दैनिक जीवन के अनुभवों का यथार्थ है। वो अपने आसपास रोजमर्रा घटित होने वाली घटनाओं, सामाजिक शोषण व विडंबनाओं पर ज्यादा लिखते थे।

कविता संग्रह: उनके अब तक आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें एक मरणधर्मा और अन्य, पुल पर पानी, सुरता निरत, लीला मुखारविंद प्रमुख हैं।

पुरस्कार: मीरा पुरस्कार, बिहारी पुरस्कार। 

सम्मान: परिमल सम्मान, पहल सम्मान, सोमदत्त

कविता का सार: कन्यादान

कवि ऋतुराज ने कन्यादान कविता के माध्यम से शादी के बाद स्त्री जीवन में आने वाली विकट परिस्थितियों के बारे में एक संदेश देने की कोशिश की हैं। कविता में विवाह के पश्चात बेटी की विदाई के वक्त एक मां अपने जीवन के सभी अच्छे व बुरे अनुभवों को निचोड़ कर एक सही व तर्कसंगत सीख देने की कोशिश करती है। ताकि उसकी बेटी ससुराल में सुख व सम्मान पूर्वक जी सके।हिंसा, अत्याचार व शोषण के खिलाफ आवाज उठा सके। कविता में माँ परंपरागत मान्यताओं से बिल्कुल भिन्न हैं। जो अपनी बेटी को “परंपरागत आदर्शों” से हट कर सीख दे रही हैं।

कन्यादान करते समय माँ को ऐसा लग रहा है जैसे वह अपने जीवन की सारी जमा पूँजी दान कर रही हो । लेकिन अंदर ही अंदर वह अपनी बेटी के लिए चिंतित भी थी क्योंकि वह जानती थी कि उसकी बेटी अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह अपने नये जीवन व ससुराल में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को समझ कर उनका सामना कर सके।

मां को लगता है कि उसकी बेटी भोली और नादान है। उसने अपने जीवन में अभी तक सिर्फ सुख ही सुख देखा है। उसे दुख व परेशानी को बांटना या उनसे निकलना नहीं आता है। ससुराल में बेटी को किसी तरह की कोई परेशानी ना हो। इसीलिए माँ अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से सीखी हुई अपनी प्रमाणिक सीख को अपनी बेटी को देने की कोशिश करती है। मां अपनी बेटी को चार बड़ी-बड़ी सीख देती हैं।

पहली सीख में मां बेटी से कहती है कि कभी भी अपने रूप सौंदर्य पर अभिमान मत करना क्योंकि यह स्थाई नहीं होता है।

दूसरा सीख में माँ कहती है कि आग का प्रयोग हमेशा खाना बनाने के लिए करना। लेकिन अगर किसी के द्वारा इसका प्रयोग जलाने के लिए किया जाए तो, उसका पुरजोर विरोध करना। क्योंकि आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती हैं जलने या जलाने के लिए नहीं।

यहां पर कवि उन लोगों पर अपने शब्दों से तीक्ष्ण प्रहार कर रहे हैं जो लोग दहेज के लालच में आकर अपनी बहूओं को आग के हवाले करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं।

Watch Video: Kanyadan Chapter 8 Hindi Kshitij Part 1

तीसरी सीख में माँ कहती है कि महिलाओं का वस्त्र और आभूषण के प्रति विशेष मोह होता है। लेकिन तुम इन सबका मोह कभी मत करना क्योंकि ये ही जीवन के सबसे बड़े बंधन बन जाते हैं या महिलाओं के पैरों की जंजीर बन जाते हैं। 

और अंतिम सीख देते हुए वह कहती हैं कि “लड़की होना पर, लड़की जैसे मत दिखाई देना” अर्थात मर्यादा , लज्जा, शिष्टता, विनम्रता, ये सब स्त्री सुलभ गुण हैं। इनको तुम बरकरार रखना लेकिन इन्हें कभी अपनी कमजोरी मत बनने देना। अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना, उसके खिलाफ अपनी आवाज जरूर उठाना।

कन्यादान कविता का भावार्थ

काव्यांश 1.

कितना प्रामाणिक था उसका दुख

लड़की को दान में देते वक्त

जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने कन्यादान करते वक्त एक माता के दुःख का बड़े ही सुंदर तरीके से वर्णन किया हैं। कवि कहते हैं कि कन्यादान करते वक्त या बेटी की विदाई करते वक्त माँ का दुःख बड़ा ही स्वाभाविक व प्रामाणिक होता हैं।

दरअसल बेटी ही माँ के सबसे निकट व उसके जीवन के सुख-दुःख में उसकी सच्ची सहेली होती हैं । अब जब वही उससे दूर जा रही है। तो माँ को कन्यादान करते वक्त ऐसा लग रहा है मानो वह अपने जीवन की सबसे अनमोल “आख़िरी पूँजी” को दान करने जा रही है।

काव्यांश 2.

लड़की अभी सयानी नहीं थी

अभी इतनी भोली सरल थी

कि उसे सुख का आभास तो होता था

लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था

पाठिका थी वह धुँधले प्रकाश की

कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में कवि ऋतुराज कहते हैं कि लड़की अभी इतनी सयानी या परिपक्व नहीं हुई हैं कि वह दुनियादारी की बातों को समझ सकें । वह अभी भी एकदम भोली भाली व मासूम ही है।उसने अपने मायके में सिर्फ सुखों और खुशियों को ही देखा है। इसीलिए उसे जीवन में आने वाले दुख और परेशानियों के बारे में अभी कुछ पता नही है और ना ही उसे अपने दुःखों व परेशानियों को किसी के साथ बाँटना या हल करना आता हैं। 

कवि ऋतुराज आगे कहते हैं कि जिस प्रकार धुंधले प्रकाश में हमें किताबों में लिखे अक्षर स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। या हम उन अक्षरों को स्पष्ट नहीं पढ़ पाते हैं। सिर्फ अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं।

ठीक उसी प्रकार, उस लड़की के सामने भी अभी काल्पनिक सुखों की एक धुंधली सी तस्वीर है। उसे व्यावहारिकता का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है। ससुराल में आने वाली जिम्मेदारियां , कठिन परिस्थितियों व संघर्षों के बारे में उसको अभी कुछ भी अंदाजा नहीं है। यानि उसके पास जो भी जानकारी हैं वह आधी अधूरी व अस्पष्ट हैं।

काव्यांश 3.

माँ ने कहा पानी में झाँककर

अपने चेहरे पर मत रीझना

आग रोटियाँ सेंकने के लिए है

जलने के लिए नहीं

वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह

बंधन हैं स्त्री जीवन के

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में, माँ अपनी बेटी की विदाई के वक्त जीवन जीने की सबसे बड़ी सीख उपहार स्वरूप दे रही है।जो जीवन भर उसके काम आयेगा। माँ कहती है कि शीशे या पानी में अपनी सुंदरता का प्रतिबिम्ब देखकर ज्यादा खुश मत होना क्योंकि यह सब अस्थाई हैं।

फिर माँ अपनी बेटी को कहती है कि आग का प्रयोग सिर्फ खाना बनाने या रोटियाँ सेंकने के लिए ही करना। लेकिन अगर आग का प्रयोग जलने या जलाने के लिए करते हुए देखो तो तुरंत उसका विरोध करना। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से उन लोगों पर कटाक्ष करना चाहते हैं जो दहेज के लालच में आकर अपनी बहुओं को आग के हवाले करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं।

कवि ऋतुराज आगे कहते हैं कि वस्त्र और आभूषण महिलाओं को बहुत आकर्षित करते हैं। लेकिन माँ , वस्त्र और आभूषणों को सौंदर्य बढ़ाने वाली वस्तु न मानकर , इनको महिलाओं के लिए एक बंधन मानती है। इसीलिए वो अपनी बेटी से कहती है कि वस्त्र और आभूषणों के लालच में कभी मत पड़ना क्योंकि ये सब महिलाओं के लिए किसी बंधन से कम नहीं हैं। 

माँ ने कहा लड़की होना

पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में माँ अपनी बेटी को अबला व कमजोर नारी की जगह एक सशक्त व मजबूत इंसान बनने को कहती हैं । ताकि वह अपनी सुरक्षा व अधिकारों के प्रति जागरूक रह कर, हर विपरीत परिस्थिति का पूरी दृढ़ता के साथ सामना कर सके। क्योंकि लोग महिलाओं को कमजोर समझ कर उनका शोषण व अत्याचार करते हैं।

इसीलिए माँ कहती हैं कि अपने स्त्रीत्व के स्वाभाविक गुणों को हमेशा बरकरार रखना। उनको कभी मत छोड़ना लेकिन कभी भी कमजोर व असहाय मत बनना। अपने खिलाफ होने वाले हर अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना, उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना।

Kanyadan Chapter 8 Question Answers

कन्यादान प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. आपके विचार से माँ ने ऐसा क्यों कहा कि लड़की होना पर लड़की जैसा मत दिखाई देना?

उत्तर: मेरे विचार से लड़की की माँ ने ऐसा इसलिए कहा होगा कि लड़की होना पर लड़की जैसी मत दिखाई देना ताकि लड़की अपने नारी सुलभ गुणों सरलता, निश्छलता, विनम्रता आदि गुणों को तो बनाए रखे परंतु वह इतनी कमजोर भी न होने पाए। कि लड़की समझकर ससुराल के लोग उसका शोषण न करने लगे। इसके अलावा वह भावी जीवन की कठिनाइयों का साहसपूर्वक मुकाबला कर सके।

प्रश्न 2. ‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए है।

जलने के लिए नहीं।‘

(क) इन पंक्तियों में समाज में स्त्री की किस स्थिति की ओर संकेत किया गया है?

(ख) माँ ने बेटी को सचेत करना क्यों जरूरी समझा?

उत्तर:

(क) इन पंक्तियों में समाज में स्त्रियों की कमज़ोर स्थिति और ससुराल में परिजनों द्वारा शोषण करने की ओर संकेत किया गया है। कभी-कभी बहुएँ इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को आग के हवाले करके अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेती है।

(ख) माँ ने बेटी को इसलिए सचेत करना उचित समझा क्योंकि उसकी बेटी अभी भोली और नासमझ थी जिसे दुनियादारी और छल-कपट का पता न था। वह लोगों की शोषण प्रवृत्ति से अनजान थी। इसके अलावा वह शादी-विवाह को सुखमय एवं मोहक कल्पना का साधन समझती थी। वह ससुराल के दूसरे पक्ष से अनभिज्ञ थी।

प्रश्न 3. ‘पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की

कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की’

इन पंक्तियों को पढ़कर लड़की की जो छवि आपके सामने उभरकर आ रही है उसे शब्दबद्ध कीजिए।

उत्तर: उपर्युक्त काव्य पंक्तियों को पढ़कर हमारे मन में लड़की की जो छवि उभरती है वह कुछ इस प्रकार है-

  • लड़की अभी सयानी नहीं है।
  • लड़की को दुनिया के उजले पक्ष की जानकारी तो है पर दूसरे पक्ष छल-कपट, शोषण आदि की जानकारी नहीं है।
  • लड़की विवाह की सुखद कल्पना में खोई है।
  • उसे केवल सुखों का अहसास है, दुखों का नहीं।
  • उसे ससुराल की प्रतिकूल परिस्थितियों का ज्ञान नहीं है।

प्रश्न 4. माँ को अपर्च, बेटी ‘अंतिम पूँजी’ क्यों लग रही थी?

उत्तर: माँ को अपनी बेटी अंतिम पूँजी इसलिए लग रही थी क्योंकि कन्यादान के बाद माँ एकदम अकेली रह जाएगी। उसकी बेटी ही उसके दुख-सुख की साथिन थी, जिसके साथ वह अपनी निजी बातें बाँट लिया करती थी। इसके अलावा बेटी माँ के लिए सबसे प्रिय वस्तु (पूँजी) की तरह थी जिसे अब वह दूसरे के हाथ में सौंपने जा रही थी। इसके बाद वह नितांत अकेली रह जाएगी।

प्रश्न 5. माँ ने बेटी को क्या-क्या सीख दी?

उत्तर: माँ ने कन्यादान के बाद अपनी बेटी को विदा करते समय निम्नलिखित सीख दी: –

  • वह ससुराल में दूसरों द्वारा की गई प्रशंसा से अपने रूप-सौंदर्य पर आत्ममुग्ध न हो जाए।
  • आग का उपयोग रोटियाँ पकाने के लिए करना। उसका दुरुपयोग अपने जलने के लिए मत करना।
  • वस्त्र-आभूषणों के मोह में फँसकर इनके बंधन में न बँध जाना।
  • नारी सुलभ गुण बनाए रखना पर कमजोर मत पड़ना।

प्रश्न 6. आपकी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना कहाँ तक उचित है?

उत्तर: मेरी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना उचित नहीं है। दान तो किसी वस्तु का किया जाता है। कन्या कोई वस्तु तो है नहीं। उसका अपना एक अलग व्यक्तित्व, रुचि, पसंद, इच्छा अनिच्छा आदि है। वह किसी वस्तु की भाँति निर्जीव नहीं है। दान देने के बाद दानदाता का वस्तु से कोई संबंध नहीं रह जाता है, परंतु कन्या का संबंध आजीवन माता-पिता से बना रहता है। कन्या एक वस्तु जैसी कभी भी नहीं हो सकती है, इसलिए कन्या को दान देने जैसी बात करना पूर्णतया अनुचित है।

अन्य पाठेतर हल प्रश्न

प्रश्न 1. वैवाहिक संस्कार में कन्यादान खुशी का अवसर माना जाता है, पर यहाँ माँ दुखी क्यों थी?

उत्तर: वैवाहिक संस्कार की रस्मों में कन्यादान पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण रस्म है। यह खुशी का अवसर होता है परंतु ‘कन्यादान’ कविता में माँ इसलिए दुखी थी क्योंकि विवाह के उपरांत वह बिलकुल अकेली पड़े जाएगी। वह अपने सुख दुख की बातें अब किससे करेगी। इसके अलावा वह बेटी को पूँजी समझती थी जो आज उससे दूर हो रही है।

प्रश्न 2. लड़की की माँ की चिंता के क्या कारण थे?

उत्तर: लड़की की माँ की चिंता के निम्नलिखित कारण थे: –

  • लड़की अभी समझदार नहीं थी।
  • लड़की को ससुराल के सुखों की ही समझ थी दुखों की नहीं।
  • लड़की दुनिया की छल-कपट एवं शोषण की मनोवृत्ति से अनभिज्ञ थी।
  • लड़की को ससुराल एवं जीवन पथ पर आनेवाली कठिनाइयों का ज्ञान न था।

प्रश्न 3. कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों के आधार पर कन्या की मनोदशा स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कन्यादान कविता में विवाह योग्य कन्या को विवाह एवं ससुराल के सुखों का ही आभास था। वह जानती थी कि ससुराल में सभी उसके रूप सौंदर्य की प्रशंसा करेंगे, उसे वस्त्राभूषणों से लाद दिया जाएगा जिससे उसका रूप और भी निखर उठेगा। इससे ससुराल के सभी लोग उसे प्यार करेंगे। इसके अलावा विवाह को वह ऐसा कार्यक्रम मानती है जो हँसी-खुशी के गीत गायन से पूरा हो जाता है।

प्रश्न 4. ‘कन्यादान’ कविता में ऐसा क्यों कहा गया है कि लड़की को दुख बाँचना नहीं आता?

उत्तर: कन्यादान कविता में ऐसा इसलिए कहा गया है कि लड़की को दुख बाँचना नहीं आता क्योंकि लड़की अभी सयानी नहीं हुई है। उसे दुनियादारी का अनुभव नहीं है। उसे जीवन के एक ही पक्ष का ज्ञान है। वह दुखों से अनभिज्ञ है क्योंकि माँ के घर पर दुखों से उसका कभी सामना नहीं हुआ था। अब तक वह सुखमय परिस्थितियों में ही जीती आई थी।

प्रश्न 5. ‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए है जलने के लिए नहीं’ कहकर कवयित्री ने समाज पर क्या व्यंग्य किया है?

उत्तर: माँ द्वारा अपनी बेटी को सीख देते हुए यह कहना ‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती है, जलने के लिए नहीं’ के माध्यम से कन्या को सीख तो दिया ही है पर समाज पर कठोर व्यंग्य किया है। समाज में कुछ लोग बहुओं को इतना प्रताड़ित करते हैं कि उस प्रताड़ना से मुक्ति पाने के लिए या तो लड़की स्वयं को आग के हवाले कर देती है या ससुराल के लोग उसे जला देते हैं।

तो बच्चो!

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