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Ek Phool Ki Chah Class 9 Summary

Ek Phool Ki Chah Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग की कविता पढ़ेंगे

‘एक फूल की चाह’

कविता सियारामशरण गुप्त द्वारा रचित है।

This Post Includes

बच्चों! कविता का भावार्थ समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि परिचय: सियारामशरण गुप्त

(1895-1963)

जीवन परिचय: सियारामशरण गुप्त का जन्म झाँसी के निकट चिरगांव में सन् 1895 में हुआ था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इनके बड़े भाई थे| गुप्त जी के पिता भी कविताये लिखते थे। सियारामशरण गुप्त की मृत्यु 1963 को हुई थी। 

पाठ-प्रवेश

‘एक फूल की चाह’ गुप्त जी की एक लंबी और प्रसिद्ध कविता है। प्रस्तुत पाठ उसी कविता का एक छोटा सा भाग है। यह पूरी कविता छुआछूत की समस्या पर केंद्रित है। मरने के नज़दीक पहुँची एक ‘अछूत’ कन्या के मन में यह इच्छा जाग उठी कि काश! देवी के चरणों में अर्पित किया हुआ एक फूल लाकर कोई उसे दे देता। उस कन्या के पिता ने बेटी की इस इच्छा को पूरा करने का बीड़ा उठाया। वह देवी के मंदिर में जा पहुँचा। देवी की आराधना भी की, पर उसके बाद वह देवी के भक्तों की नज़र में खटकने लगा। मानव-मात्र को एकसमान मानने की नसीहत देने वाली देवी के सवर्ण भक्तों ने उस विवश, लाचार, आकांक्षी मगर ‘अछूत’ पिता के साथ कैसा सलूक किया, क्या वह अपनी बेटी को फूल लाकर दे सका? यह हम इस कविता के माध्यम से जानेंगे।

एक फूल की चाह

उद्वेलित कर अश्रु राशियाँ,

हृदय-चिताएँ धधकाकर,

महा महामारी प्रचंड हो

फैल रही थी इधर-उधर।

क्षीण कंठ मृतवत्साओं का

करुण रुदन दुर्दांत नितांत,

भरे हुए था निज कृश रव में

हाहाकार अपार अशांत।

शब्दार्थ:

उद्वेलित – भाव-विह्नल

अश्रु-राशियाँ – आँसुओं की झड़ी

महामारी – बडे़ स्तर पर फैलने वाली बीमारी

प्रचंड – तीव्र

क्षीण – दबी आवाज़, कमज़ोर

मृतवत्सा – जिस माँ की संतान मर गई हो

रुदन – रोना

दुर्दांत – जिसे दबाना या वश में करना कठिन हो

नितांत – बिलकुल, अलग, अत्यंत

कृश – पतला, कमज़ोर।

सन्दर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श भाग-1 के काव्य खंड की कविता एक फूल की चाह से ली गयी है| जो कवि सियारामशरण गुप्त जी द्वारा लिखी गयी है|

व्याख्या: कवि कहता है कि एक बडे़ स्तर पर फैलने वाली बीमारी बहुत भयानक रूप से फैली हुई थी, जिसने लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाते हुए आँखों से आँसुओं की नदियाँ बहा दी थी। कहने का तात्पर्य यह है कि उस महामारी ने लोगों के मन में भयानक डर बैठा दिया था। कवि कहता है कि उस महामारी के कारण जिन औरतों ने अपनी संतानों को खो दिया था, उनके कमजोर पड़ते गले से लगातार दिल को दहला देने वाला ऐसा दर्द निकल रहा था जिसे दबाना बहुत कठिन था। उस कमजोर पड़ चुके दर्द भरे रोने में भी अत्यधिक अशांति फैलाने वाला हाहाकार छिपा हुआ था।

बहुत रोकता था सुखिया को,

‘न जा खेलने को बाहर’,

नहीं खेलना रुकता उसका

नहीं ठहरती वह पल-भर।

मेरा हृदय काँप उठता था,

बाहर गई निहार उसे;

यही मनाता था कि बचा लूँ

किसी भाँति इस बार उसे।

शब्दार्थ:

निहार – देखना।

व्याख्या: कवि कहता है कि इस कविता का मुख्य पात्र अपनी बेटी जिसका नाम सुखिया था, उसको बार-बार बाहर जाने से रोकता था। लेकिन सुखिया उसकी एक न मानती थी और खेलने के लिए बाहर चली जाती थी। वह कहता है कि सुखिया का न तो खेलना रुकता था और न ही वह घर के अंदर टिकती थी। जब भी वह अपनी बेटी को बाहर जाते हुए देखता था तो उसका हृदय डर के मारे काँप उठता था। वह यही सोचता रहता था कि किसी तरह उसकी बेटी उस महामारी के प्रकोप से बच जाए। वह किसी तरह इस महामारी की चपेट

में न आए।

भीतर जो डर रहा छिपाए,

हाय! वही बाहर आया।

एक दिवस सुखिया के तनु को

ताप-तप्त मैंने पाया।

ज्वर में विह्वल हो बोली वह,

क्या जानूँ किस डर से डर,

मुझको देवी के प्रसाद का

एक फूल ही दो लाकर।

शब्दार्थ:

तनु – शरीर

ताप-तप्त – ज्वर से पीड़ित।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता को जिस बात का डर था वही हुआ। एक दिन सुखिया के पिता ने पाया कि सुखिया का शरीर बुखार से तप रहा था। कवि कहता है कि उस बच्ची ने बुखार के दर्द में भी अपने पिता से कहा कि उसे किसी का डर नहीं है। उसने अपने पिता से कहा कि वह तो बस देवी माँ के प्रसाद का एक फूल चाहती है ताकि वह ठीक हो जाए।

क्रमश: कंठ क्षीण हो आया,

शिथिल हुए अवयव सारे,

बैठा था नव नव उपाय की

चिंता में मैं मनमारे।

जान सका न प्रभात सजग से

हुई अलस कब दोपहरी,

स्वर्ण घनों में कब रवि डूबा,

कब आई संध्या गहरी।

शब्दार्थ:

शिथिल – कमजोर, ढीला

अवयव – अंग

स्वर्ण घन – सुनहरे बादल।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया का गला इतना कमजोर हो गया था कि उसमें से आवाज़ भी नहीं आ रही थी। उसके शरीर का अंग-अंग कमजोर हो चूका था। उसका पिता किसी चमत्कार की आशा में नए-नए तरीके अपना रहा था परन्तु उसका मन हमेशा चिंता में ही डूबा रहता था। चिंता में डूबे सुखिया के पिता को न तो यह पता चलता था कि कब सुबह हो गई और कब आलस से भरी दोपहर ढल गई। कब सुनहरे बादलों में सूरज डूबा और कब शाम हो गई। कहने का तात्पर्य यह है कि सुखिया का पिता सुखिया की चिंता में इतना डूबा रहता था कि उसे किसी बात का होश ही नहीं रहता था।

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सभी ओर दिखलाई दी बस,

अंधकार की ही छाया,

छोटी-सी बच्ची को ग्रसने

कितना बड़ा तिमिर आया!

ऊपर विस्तृत महाकाश में

जलते से अंगारों से,

झुलसी जाती थी आँखें

जगमग जगते तारों से।

शब्दार्थ:

ग्रसना – निगलना

तिमिर – अंधकार।

व्याख्या: कवि कहता है कि चारों ओर बस अंधकार ही अंधकार दिखाई दे रहा था जिसे देखकर ऐसा लगता था जैसे कि इतना बड़ा अंधकार उस मासूम बच्ची को निगलने चला आ रहा था। कवि कहता है कि बच्ची के पिता को ऊपर विशाल आकाश में चमकते तारे ऐसे लग रहे थे जैसे जलते हुए अंगारे हों। उनकी चमक से उसकी आँखें झुलस जाती थीं। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि बच्ची का पिता उसकी चिंता में सोना भी भूल गया था जिस कारण उसकी आँखे दर्द से झुलस रही थी।

देख रहा था जो सुस्थिर हो

नहीं बैठती थी क्षण-भर,

हाय! वही चुपचाप पड़ी थी

अटल शांति-सी धारण कर।

सुनना वही चाहता था मैं

उसे स्वयं ही उकसाकर-

मुझको देवी के प्रसाद का

एक फूल ही दो लाकर!

शब्दार्थ:

सुस्थिर – जो कभी न रुकता हो

अटल – जिसे हिलाया न जा सके।

व्याख्या: कवि कहता है कि जो बच्ची कभी भी एक जगह शांति से नहीं बैठती थी, वही आज इस तरह न टूटने वाली शांति धारण किए चुपचाप पड़ी हुई थी। कवि कहता है कि उसका पिता उसे झकझोरकर खुद ही पूछना चाहता था कि उसे देवी माँ के प्रसाद का फूल चाहिए और वह उसे उस फूल को ला कर दे।

ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर

मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;

स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे

पाकर समुदित रवि-कर-जाल।

दीप-धूप से आमोदित था

मंदिर का आँगन सारा;

गूँज रही थी भीतर-बाहर

मुखरित उत्सव की धारा।

शब्दार्थ:

विस्तीर्ण – फैला हुआ

सरसिज – कमल

रविकर जाल – सूर्य-किरणों का समूह

आमोदित – आनंदपूर्ण।

व्याख्या: कवि मंदिर का वर्णन करता हुआ कहता है कि पहाड़ की चोटी के ऊपर एक विशाल मंदिर था। उसके विशाल आँगन में कमल के फूल सूर्य की किरणों में इस तरह शोभा दे रहे थे जिस तरह सूर्य की किरणों में सोने के घड़े चमकते हैं। मंदिर का पूरा आँगन धूप और दीपकों की खुशबू से महक रहा था। मंदिर के अंदर और बाहर माहौल ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ कोई उत्सव हो।

भक्त-वृंद मृदु-मधुर कंठ से

गाते थे सभक्ति मुद-मय, –

‘पतित-तारिणी पाप-हारिणी,

माता, तेरी जय-जय-जय!’

‘पतित तारिणी, तेरी जय जय’

मेरे मुख से भी निकला,

बिना बढ़े ही मैं आगे को

जाने किस बल से ढ़िकला!

शब्दार्थ:

सभक्ति – भक्ति के साथ

ढिकला – धकेला गया।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब सुखिया का पिता मंदिर गया तो वहाँ मंदिर में भक्तों के झुंड मधुर आवाज में एक सुर में भक्ति के साथ देवी माँ की आराधना कर रहे थे। वे एक सुर में गा रहे थे ‘पतित तारिणी पाप हारिणी, माता तेरी जय जय जय। ‘सुखिया के पिता के मुँह से भी देवी माँ की स्तुति निकल गई, ‘पतित तारिणी, तेरी जय जय’। फिर उसे ऐसा लगा कि किसी अनजान शक्ति ने उसे मंदिर के अंदर धकेल दिया।

मेरे दीप-फूल लेकर वे

अंबा को अर्पित करके

दिया पुजारी ने प्रसाद जब

आगे को अंजलि भरके,

भूल गया उसका लेना झट,

परम लाभ-सा पाकर मैं।

सोचा, – बेटी को माँ के ये

पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं।

शब्दार्थ:

अंजलि – दोनों हाथों से।

व्याख्या: कवि कहता है कि पुजारी ने सुखिया के पिता के हाथों से दीप और फूल लिए और देवी की प्रतिमा को अर्पित कर दिया। फिर जब पुजारी ने उसे दोनों हाथों से प्रसाद भरकर दिया तो एक पल को वह ठिठक-सा गया। क्योंकि सुखिया का पिता छोटी जाति का था और छोटी जाति के लोगों को मंदिर में आने नहीं दिया जाता था। सुखिया का पिता अपनी कल्पना में ही अपनी बेटी को देवी माँ का प्रसाद दे रहा था।

सिंह पौर तक भी आँगन से

नहीं पहुँचने मैं पाया,

सहसा यह सुन पड़ा कि – “कैसे

यह अछूत भीतर आया?

पकड़ो देखो भाग न जावे,

बना धूर्त यह है कैसा;

साफ-स्वच्छ परिधान किए है,

भले मानुषों के जैसा!

शब्दार्थ:

सिंह पौर – मंदिर का मुख्य द्वार

परिधान – वस्त्र।

व्याख्या: कवि कहता है कि अभी सुखिया का पिता प्रसाद ले कर मंदिर के द्वार तक भी नहीं पहुँच पाया था कि अचानक किसी ने पीछे से आवाज लगाई, “अरे, यह अछूत मंदिर के भीतर कैसे आ गया? इसे पकड़ो कही यह भाग न जाए।” किसी ने कहा कि इस चालाक नीच को तो देखो, कैसे साफ़ कपड़े पहने है, ताकि कोई इसे पहचान न सके। कवि यहाँ यह दर्शाना चाहता है कि निम्न जाति वालों का मंदिर में जाना अच्छा नहीं माना जाता था।

पापी ने मंदिर में घुसकर

किया अनर्थ बड़ा भारी;

कलुषित कर दी है मंदिर की

चिरकालिक शुचिता सारी।”

ऐं, क्या मेरा कलुष बड़ा है

देवी की गरिमा से भी;

किसी बात में हूँ मैं आगे

माता की महिमा के भी?

शब्दार्थ:

कलुषित – अशुद्ध

चिरकालिक – लम्बे समय से

शुचिता – पवित्रता।

व्याख्या: कवि कहता है कि किसी ने कहा कि मंदिर में आए हुए सभी भक्त सुखिया के पिता को पापी कह रहे थे। वे कह रहे थे कि सुखिया के पिता ने मंदिर में घुसकर बड़ा भारी अनर्थ कर दिया है और लम्बे समय से बनी मंदिर की पवित्रता को अशुद्ध कर दिया है। इस पर सुखिया के पिता ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता था कि माता की महिमा के आगे उसकी अशुद्धता अधिक भारी हो। सुखिया के पिता के कहने का तात्पर्य यह था कि जब माता ने ही सभी मनुष्यों को बनाया है तो उसके मंदिर में आने से मंदिर अशुद्ध कैसे हो सकता है।

माँ के भक्त हुए तुम कैसे,

करके यह विचार खोटा?

माँ के सम्मुख ही माँ का तुम

गौरव करते हो छोटा!

कुछ न सुना भक्तों ने, झट से

मुझे घेरकर पकड़ लिया;

मार-मारकर मुक्के-घूँसे

धम्म-से नीचे गिरा दिया!

शब्दार्थ:

खोटा – बुरा, घटिया

सम्मुख – सामने।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता ने भक्तों से कहा कि उसके मंदिर में आने से मंदिर अशुद्ध हो गया है इस तरह का घटिया विचार यदि तुम सब के मन में है तो तुम माता के भक्त कैसे हो सकते हो। यदि वे लोग उसकी अशुद्धता को माता की महिमा से भी ऊँचा मानते हैं तो वे माता के ही सामने माता को नीचा दिखा रहे हैं। लेकिन उसकी बातों का किसी पर कोई असर नहीं हुआ। लोगों ने उसे घेर लिया और उसपर घूँसों और लातों की बरसात करके उसे नीचे गिरा दिया।

मेरे हाथों से प्रसाद भी

बिखर गया हा! सबका सब,

हाय! अभागी बेटी तुझ तक

कैसे पहुँच सके यह अब।

न्यायालय ले गए मुझे वे,

सात दिवस का दंड-विधान

मुझको हुआ; हुआ था मुझसे

देवी का महान अपमान!

शब्दार्थ:

अभागी – जिसका बुरा भाग्य हो

न्यायालय – न्याय करने का स्थान।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब भक्तों ने सुखिया के पिता की पिटाई की तो उसके हाथों से सारे का सारा प्रसाद बिखर गया। वह दुखी हो गया और सोचने लगा कि उसकी बेटी का भाग्य कितना बुरा है क्योंकि अब उसकी बेटी तक प्रसाद नहीं पहुँचने वाला था। लोग उसे न्यायलय ले गये। वहाँ उसे सात दिन जेल की सजा सुनाई गई। अब सुखिया के पिता को लगने लगा कि अवश्य ही उससे देवी का अपमान हो गया है। तभी उसे सजा मिली है।

मैंने स्वीकृत किया दंड वह

शीश झुकाकर चुप ही रह;

उस असीम अभियोग, दोष का

क्या उत्तर देता, क्या कह?

सात रोज ही रहा जेल में

या कि वहाँ सदियाँ बीतीं,

अविश्रांत बरसा के भी

आँखें तनिक नहीं रीतीं।

शब्दार्थ:

स्वीकृत – स्वीकार कर

अविश्रांत – बिना विश्राम के।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता ने सिर झुकाकर चुपचाप उस दंड को स्वीकार कर लिया। उसके पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था। इसलिए वह नहीं जानता था कि क्या कहना चाहिए। जेल के वे सात दिन सुखिया के पिता को ऐसे लगे थे जैसे कई सदियाँ बीत गईं हों। उसकी आँखें बिना रुके  बरसने के बाद भी बिलकुल नहीं सूखी थीं।

दंड भोगकर जब मैं छूटा,

पैर न उठते थे घर को;

पीछे ठेल रहा था कोई

भय जर्जर तनु पंजर को।

पहले की-सी लेने मुझको

नहीं दौड़कर आई वह;

उलझी हुई खेल में ही हा!

अबकी दी न दिखाई वह।

शब्दार्थ:

ठेल – धकेलना

जर्जर – थका।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब सुखिया का पिता जेल से छूटा तो उसके पैर उसके घर की ओर नहीं उठ रहे थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे डर से भरे हुए उसके शरीर को कोई धकेल कर उसके घर की ओर ले जा रहा था। जब वह घर पहुँचा तो हमेशा की तरह उसकी बेटी दौड़कर उससे मिलने नहीं आई। न ही वह उसे कहीं खेल में उलझी हुई दिखाई दी।

उसे देखने मरघट को ही

गया दौड़ता हुआ वहाँ,

मेरे परिचित बंधु प्रथम ही

फूँक चुके थे उसे जहाँ।

बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर

छाती धधक उठी मेरी,

हाय! फूल सी कोमल बच्ची

हुई राख की थी ढ़ेरी।

शब्दार्थ:

मरघट – शमशान

बंधु – रिश्तेदार।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता को घर पहुँचने पर जब सुखिया कहीं नहीं मिली तब उसे सुखिया की मौत का पता चला। वह अपनी बच्ची को देखने के लिए सीधा दौड़ता हुआ शमशान पहुँचा जहाँ उसके रिश्तेदारों ने पहले ही उसकी बच्ची का अंतिम संस्कार कर दिया था। अपनी बेटी की बुझी हुई चिता देखकर उसका कलेजा जल उठा। उसकी सुंदर फूल सी कोमल बच्ची अब राख के ढ़ेर में बदल चुकी थी।

अंतिम बार गोद में बेटी,

तुझको ले न सका मैं हा!

एक फूल माँ का प्रसाद भी

तुझको दे न सका मैं हा।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया का पिता सुखिया के लिए दुःख मनाता हुआ रोने लगा। उसे अफसोस हो रहा था कि वह अपनी बेटी को अंतिम बार गोदी में न ले सका। उसे इस बात का भी बहुत दुःख हो रहा था कि उसकी बेटी ने उससे केवल माता के मंदिर का एक फूल लाने को कहा था वह अपनी बेटी को वह देवी का प्रसाद भी न दे सका।

Ek Phool Ki Chah Class 9th Question and Answers

एक फूल की चाह प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

कविता की उन पंक्तियों को लिखिए, जिनसे निम्नलिखित अर्थ का बोध होता है –

प्रश्न 1. सुखिया के बाहर जाने पर पिता का हृदय काँप उठता था।

उत्तर: मेरा हृदय काँप उठता था,

बाहर गई निहार उसे;

यही मनाता था कि बचा लूँ

किसी भाँति इस बार उसे।

प्रश्न 2. पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर की अनुपम शोभा।

उत्तर: ऊँचे शैल शिखर के ऊपर

मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;

स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे

पाकर समुदित रवि कर जाल।

प्रश्न 3. पुजारी से प्रसाद/पूफल पाने पर सुखिया के पिता की मनःस्थिति।

उत्तर: भूल गया उसका लेना झट,

परम लाभ सा पाकर मैं।

सोचा, बेटी को माँ के ये,

पुण्य पुष्प दूँ जाकर मैं।

प्रश्न 4. पिता की वेदना और उसका पश्चाताप।

उत्तर: अंतिम बार गोद में बेटी,

तुझको ले न सका मैं हा!

एक फूल माँ का प्रसाद भी

तुझको दे न सका मैं हा।

प्रश्न 5. बीमार बच्ची ने क्या इच्छा प्रकट की?

उत्तर: बीमार बच्ची ने अपने पिता के सामने इच्छा प्रकट की कि उसे देवी माँ के प्रसाद का फूल चाहिए।

प्रश्न 6. सुखिया के पिता पर कौन सा आरोप लगाकर उसे दंडित किया गया?

उत्तर: सुखिया के पिता पर मंदिर को अशुद्ध करने का आरोप लगाया गया। वह अछूत जाति का था इसलिए उसे मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था। दंड स्वरूप सुखिया के पिता को सात दिन जेल में रहने की सजा दी गई।

प्रश्न 7. जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता ने बच्ची को किस रूप में पाया?

उत्तर: जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता को उसकी बच्ची कहीं नहीं दिखी तो उसके रिश्तेदारों से उसे पता चला कि उसकी बच्ची मर चुकी है और उसका अंतिम संस्कार किया जा चूका है। परन्तु जब वह शमशान पहुँचा तो उसे उसकी बच्ची राख के ढ़ेर के रूप में मिली।

प्रश्न 8. इस कविता का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: इस कविता में छुआछूत की प्रथा के बारे में बताया गया है। इस कविता का मुख्य पात्र एक अछूत है। उसकी बेटी एक महामारी की चपेट में आ जाती है। बेटी को ठीक करने के लिए वह मंदिर जाता है ताकि देवी माँ के प्रसाद का फूल ले आये। मंदिर में भक्त लोग उसकी जमकर धुनाई करते हैं। क्योंकि वह अछूत हो कर भी मंदिर में आया थस। फिर उसे दंड के रूप में सात दिन की जेल हो जाती है क्योंकि एक अछूत होने के नाते वह मंदिर को अशुद्ध करने का दोषी पाया जाता है। जब वह जेल से छूटता है तो पाता है कि उसकी बेटी स्वर्ग सिधार चुकी है और उसका अंतिम संस्कार भी हो चुका है। एक सामाजिक कुरीति के कारण एक व्यक्ति को इतना भी अधिकार नहीं मिलता है कि वह अपनी बीमार बच्ची की एक छोटी सी इच्छा पूरी कर सके। बदले में उसे जो मिलता है वह है प्रताड़ना और घोर दुख।

निम्नलिखित पंक्तियों का आश्य स्पष्ट करते हुए उनका अर्थ सौंदर्य बताइए

प्रश्न 1. अविश्रांत बरसा करके भी आँखें तनिक नहीं रीतीं

उत्तर: उसकी आँखों से लगातार आँसू बरसने के बावजूद अभी भी आँखे सूखी हो गई थीं। यह पंक्ति शोक की चरम सीमा को दर्शाती है। कहा जाता है कि कोई कभी कभी इतना रो लेता है कि उसकी अश्रुधारा तक सूख जाती है।

प्रश्न 2. बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर छाती धधक उठी मेरी

उत्तर: उधर चिता बुझ चुकी थी, इधर सुखिया के पिता की छाती जल रही थी। यहाँ एक पिता का दुःख दर्शाया गया है जो अंतिम बार भी अपनी बेटी को न देख सका।

प्रश्न 3. हाय! वही चुपचाप पड़ी थी अटल शांति सी धारण कर

उत्तर: जो बच्ची कभी भी एक जगह स्थिर नहीं बैठती थी, आज वही चुपचाप पत्थर की भाँति पड़ी हुई थी। यहाँ बच्चीको महामारी से ग्रस्त दर्शाया गया है।

प्रश्न 4. पापी ने मंदिर में घुसकर किया अनर्थ बड़ा भारी

उत्तर: सुखिया के पिता को मंदिर में देखकर एक भक्त कहता है कि इस पापी ने मंदिर में प्रवेश करके बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया, मंदिर को अपवित्र कर दिया। क्योंकि वह अछूत था और अछूत को मंदिर में आने का कोई अधिकार नहीं दिया गया था।

पाठ से जुड़े दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.

आपके विचार से मंदिर की पवित्रता और देवी की गरिमा को कौन ठेस पहुँचा रहा था और कैसे?

उत्तर:

मेरे विचार से तथाकथित उच्च जाति के भक्तगण मंदिर की पवित्रता और देवी की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे थे, सुखिया का पिता नहीं, क्योंकि वे जातीय आधार पर सुखिया के पिता को अपमानित करते हुए देवी के सामने ही मार-पीट रहे थे। वे जिस देवी की गरिमा नष्ट होने की बात कर रहे थे, वह तो स्वयं पतित पाविनी हैं तो एक पतित के आने से न तो देवी की गरिमा नष्ट हो रही थी और न मंदिर की पवित्रता। ऐसा सोचना उन तथाकथित उच्च जाति के भक्तों की संकीर्ण सोच और अमानवीयता थी।

प्रश्न 2.

‘एक फूल की चाह’ कविता में देवी के भक्तों की दोहरी मानसिकता उजागर होती हैं। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

‘एक फूल की चाह’ कविता में देवी के उच्च जाति के भक्तगण जोर-ज़ोर से गला फाड़कर चिल्ला रहे थे, “पतित-तारिणी पाप-हारिणी माता तेरी जय-जय-जय!” वे माता को भक्तों का उद्धार करने वाली, पापों को नष्ट करने वाली, पापियों का नाश करने वाली मानकर जय-जयकार कर रहे थे। उसी बीच एक अछूत भक्त के मंदिर में आ जाने से वे उस पर मंदिर की पवित्रता और देवी की गरिमा नष्ट होने का आरोप लगा रहे थे। जब देवी पापियों का नाश करने वाली हैं तो एक पापी या अछूत उनकी गरिमा कैसे कम कर रहा था। भक्तों की ऐसी सोच से उनकी दोहरी मानसिकता उजागर होती है।

प्रश्न 3.

महामारी से सुखिया पर क्या प्रभाव पड़ा? इससे उसके पिता की दशा कैसी हो गई?

उत्तर:

महामारी की चपेट में आने से सुखिया को बुखार हो आया। उसका शरीर तेज़ बुखार से तपने लगा। तेज बुखार के कारण वह बहुत बेचैन हो रही थी। इस बेचैनी में उसका उछलना-कूदना न जाने कहाँ खो गया। वह भयभीत हो गई और देवी के प्रसाद का एक फूल पाने में अपना कल्याण समझने लगी। उसके बोलने की शक्ति कम होती जा रही थी। धीरे-धीरे उसके अंग शक्तिहीन हो गए। उसकी यह दशा देखकर सुखिया का पिता चिंतित हो उठा। उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। सुखिया के पास चिंतातुर बैठे हुए उसे यह भी पता नहीं चल सका कि कब सूर्य उगा, कब दोपहर बीतकर शाम हो गई।

प्रश्न 4.

सुखिया को बाहर खेलते जाता देख उसके पिता की क्या दशा होती थी और क्यों?

उत्तर:

सुखिया को बाहर खेलते जाता देखकर सुखिया के पिता का हृदय काँप उठता था। उसके मन को एक अनहोनी-सी आशंका भयभीत कर रही थी, क्योंकि उसकी बस्ती के आसपास महामारी फैल रही थी। उसे बार-बार डर सता रहा था कि कहीं उसकी पुत्री सुखिया भी महामारी की चपेट में न आ जाए। वह इस महामारी से अपनी पुत्री को बचाए रखना चाहता था। उसे महामारी का परिणाम पता था, इसलिए अपनी पुत्री की रक्षा के प्रति चिंतित और आशंकित हो रहा था।

प्रश्न 5.

(क) सुखिया के पिता को मंदिर में देखकर भक्तों ने क्या-क्या कहना शुरू कर दिया?

(ख) सुखिया के पिता के अनुसार, भक्तगण देवी की गरिमा को किस तरह चोट पहुँचा रहे थे?

(ग) “मनुष्य होने की गरिमा’ किस तरह नष्ट की जा रहीं थी?

उत्तर:

(क) अपनी बेटी की इच्छा को पूरी करने के लिए देवी को प्रसाद स्वरूप फूल लेने सुखिया के पिता को मंदिर में देखकर भक्तों ने कहा कि इस अछूत ने मंदिर में घुसकर भारी पाप कर दिया है। उसने मंदिर की चिरकालिक पवित्रता को नष्ट कर दिया है।

(ख) सुखिया के पिता का कहना था कि देवी तो पापियों का उद्धार करने वाली हैं। यह बात भक्त जन भी मानते हैं। फिर एक पापी के मंदिर में आने से देवी की गरिमा और पवित्रता किस तरह खंडित हो सकती है।

(ग) भक्तगण मनुष्य होकर भी एक मनुष्य सुखिया के पिता को जाति के आधार पर पापी मान रहे थे, उसे अछूत मान रहे थे। इस तरह वे मनुष्य होने की गरिमा नष्ट कर रहे थे।

Kar Chale Hum Fida Class 10 Summary

Kar Chale Hum Fida Class 10 Summary, Explanation and question answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 2 की कविता पढ़ेंगे

कर चले हम फिदा’

कविता के रचयिता कैफ़ी आज़मी हैं।

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बच्चों कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

Kaifi Azmi

कवि परिचय: कैफ़ी आज़मी

जीवन परिचय: अहतर हुसैन रिज़वी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में 19 जनवरी 1919 हुआ था। कैफ़ी आज़मी के परिवार में उनकी पत्नी शौकत आज़मी, इनकी दो संतान शबाना आज़मी (फ़िल्मजगत की मशहूर अभिनेत्री और जावेद अख़्तर की पत्नी) और बाबा आज़मी है। कैफ़ी की कविताओं में एक ओर सामाजिक और राजनैतिक जागरूकता का समावेश है तो दूसरी और ह्रदय की कोमलता भी है। अपनी युवावस्था में वाह-वाही पाने वाले कैफ़ी आज़मी ने फिल्मो के लिए सैंकड़ों बेहतरीन गीत भी लिखे है।  10 मई 2002 को इस दुनिया से रुखसत हुए।

कविता का सार

जिंदगी सभी प्राणियों को प्रिय होती है। इसे कोई ऐसे ही बेमतलब गवाना नहीं चाहेगा। लेकिन सैनिक का जीवन बिलकुल इसके विपरीत होता है। क्योंकि सैनिक उस समय सीना तान कर खड़ा हो जाता है जब उसके जीवन पर नहीं बल्कि दूसरों के जीवन और आज़ादी पर संकट आता है। जबकि ऐसी स्थिति में उसे पता होता है कि दूसरों की आज़ादी और जिंदगी भले ही बची रह सकती है परन्तु उसकी जान जाने की सम्भावना सबसे अधिक होती है।

प्रस्तुत पाठ जो युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘हकीकत’ के लिए लिखा गया था, ऐसे ही सैनिकों के दिल की बात बयान करता है जिन्हें अपने किये पर नाज है। इसी के साथ उन्हें देशवासियों से कुछ आशाएँ भी हैं। जिनसे उन्हें आशाएँ हैं वो देशवासी हम और आप हैं तो इसलिए इस पाठ के जरिये हम जानेगे की हम किस हद तक उनकी आशयों पर खरे उतरे हैं।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

सन्दर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य-पुस्तक ‘स्पर्श भाग- 2’ के काव्य खंड की कविता कर चले हम फिदा से ली गई हैं। इसके कवि कैफ़ी आज़मी हैं।

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि एक वीर सैनिक का अपने देशवासियों को दिए आखिरी सन्देश का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सैनिक अपने आखिरी सन्देश में कह रहें है कि वो अपने प्राणों को देश हित के लिए न्योछावर कर रहें है, अब यह देश हम जाते-जाते आप देशवासियों को सौंप रहें हैं। सैनिक उस दृश्य का वर्णन कर रहें है जब दुश्मनों ने देश पर हमला किया था। सैनिक कहते है कि जब हमारी साँसे हमारा साथ नहीं दे रही थी और हमारी नाड़ियों में खून जमता जा रहा, फिर भी हमने अपने बढ़ते क़दमों को जारी रखा अर्थात दुश्मनों को पीछे धकेलते गए। सैनिक गर्व से कहते है कि हमें अपने सर भी कटवाने पड़े तो हम ख़ुशी-ख़ुशी कटवा देंगे पर हमारे गौरव के प्रतिक हिमालय को नहीं झुकने देंगे अर्थात हिमालय पर दुश्मनों के कदम नहीं पड़ने देंगे। हम मरते दम तक वीरता के साथ दुश्मनों का मुकाबला करते रहे अब इस देश की रक्षा का भार आप देशवासियों को सौंप रहे हैं।

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जान देने की रुत रोज आती नहीं

हुस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे

वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि सैनिक के बलिदान का भावनात्मक रूप से वर्णन कर रहा।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हमारे पूरे जीवन में हमें जिन्दा रहने के कई अवसर मिलते हैं लेकिन देश के लिए प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी कभी-कभी किसी-किसी को ही मिल पाती है अर्थात सैनिक देश पर मर मिटने का एक भी मौका नई खोना चाहते। सैनिक देश के नौजवानों को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि सुंदरता और प्रेम का त्याग करना सीखो क्योंकि वो सुंदरता और प्रेम ही क्या? जवानी ही क्या? जो देश के लिए अपना खून न बहा सके। सैनिक देश की धरती को दुल्हन की तरह मानते है और कहते है कि जिस तरह दुल्हन को स्वयंवर में हासिल करने के लिए राजा किसी भी मुश्किल को पार कर जाते थे उसी तरह तुम भी अपनी इस दुल्हन को दुश्मनों से बचा कर रखना। क्योंकि अब हम देश की रक्षा का दायित्व आप देशवासियों पर छोड़ कर जा रहे हैं।

राह कुर्बानियों की न वीरान हो

तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले

 फतह का जश्न इस जश्न के बाद है

जिंदगी मौत से मिल रही है गले

बाँध लो अपने सर से कफन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में सैनिक देशवासियों को देश के लिए बलिदान करने के लिए तैयार रहने को कहते हैं।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हम तो देश के लिए बलिदान दे रहे हैं परन्तु हमारे बाद भी ये सिलसिला चलते रहना चाहिए। जब भी जरुरत हो तो इसी तरह देश की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना चाहिए। जीत की ख़ुशी तो देश पर प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी के बाद दोगुनी  हो जाती है। उस स्थिति में ऐसा लगता है मनो जिंदगी मौत से गले मिल रही हो। अब ये देश आप देशवासियों को सौंप रहे हैं अब आप अपने सर पर मौत की चुनरी बांध लो अर्थात अब आप देश की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ।

खींच दो अपने खूँ से जमीं पर लकीर

इस तरफ आने पाए न रावन कोई

तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में सैनिक देशवासियों को प्रेरित कर रहे हैं।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि अपने खून से लक्ष्मण रेखा के समान एक रेखा तुम भी खींच लो और ये तय कर लो कि उस रेखा को पार करके कोई रावण रूपी दुश्मन इस पार ना आ पाय। सैनिक अपने देश की धरती को सीता के आँचल की तरह मानते हैं और कहते हैं कि अगर कोई हाथ आँचल को छूने के लिए आगे बड़े तो उसे तोड़ दो। अपने वतन की रक्षा के लिए तुम ही राम हो और तुम ही लक्ष्मण हो।अब इस देश की रक्षा का दायित्व तुम पर है।

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Kar Chale Hum Fida Class 10 question answer

कर चले हम फिदा पाठ के प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1.

क्या इस गीत की कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है?

उत्तर: हाँ, इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। सन् 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण किया। युद्ध में अनेक सिपाही लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर ‘हकीकत’ फ़िल्म बनी थी। इस फ़िल्म में भारत और चीन युद्ध की वास्तविकता को दर्शाया गया था। यह गीत इसी फ़िल्म के लिए लिखा गया था।

प्रश्न 2.

‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’, इस पंक्ति में हिमालय किस बात का प्रतीक है?

उत्तर: ‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’ इस पंक्ति में हिमालय भारत के मान-सम्मान का प्रतीक है। 1962 में भारत चीन की लड़ाई हिमालय की घाटियों में लड़ी गई थी। हमारे अनेक सैनिक इस युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। हिमालय की बर्फीली चोटियों पर भारतीय जवानों ने बहादुरी एवं बलिदान की अनोखी मिसाल कायम की थी। भारतीय सेना के वीर जाँबाजों ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भारत के सम्मान की रक्षा की थी।

प्रश्न 3.

इस गीत में धरती को दुलहन क्यों कहा गया है?

उत्तर: गीत में धरती को दुल्हन इसलिए कहा गया है, क्योंकि सन् 1962 के युद्ध में भारतीय सैनिकों के बलिदानों से, उनके रक्त से धरती लाल हो गई थी, मानो धरती ने किसी दुलहन की भाँति लाल पोशाक पहन ली हो अर्थात भारतीय सैनिकों के रक्त से पूरी युद्धभूमि लाल हो गई थी।

प्रश्न 4.

गीत में ऐसी क्या खास बात होती है कि वे जीवन भर याद रह जाते हैं?

उत्तर: जीवन भर याद रह जाने वाले गीतों में हृदय का स्पर्श करने वाली भाषा और संगीत का अद्भुत तालमेल होता है। जो व्यक्ति के अंतर्मन में स्वतः ही प्रवेश कर जाता है। इस तरह गीतों के बोल सरल भाषा व प्रभावोत्पादक शैली में होने चाहिए ताकि वह व्यक्ति की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। इन गीतों का विषय जीवन के मर्मस्पर्शी पहलुओं से जुड़ा होना चाहिए। ऐसे गीत हृदय की गहराइयों में समा जाते हैं और इन गीतों के सुर, लहरियाँ संपूर्ण मन मस्तिष्क को सकारात्मकता से ओत-प्रोत कर देती है और गीत जीवनभर याद रह जाते हैं।

प्रश्न 5.

कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग किसके लिए किया है?

उत्तर: कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग देशवासियों के लिए किया है, जो देश की एकता को दर्शा रहा है। देशवासियों का संगठन ही देश को प्रगतिशील, विकासशील तथा समृद्धशाली बनाता है। देशवासियों का परस्पर साथ ही देश की ‘अनेकता में एकता’ जैसी विशिष्टता को मजबूत बनाता है।

प्रश्न 6.

कवि ने इस कविता में किस काफ़िले को आगे बढ़ाते रहने की बात कही है?

उत्तर: ‘काफिले’ शब्द का अर्थ है-यात्रियों का समूह। कवि ने इस कविता में देश के लिए न्योछावर होने वाले अर्थात् देश के मान-सम्मान व रक्षा की खातिर अपने सुखों को त्याग कर, मर मिटने वाले बलिदानियों के काफिले को आगे बढ़ते रहने की बात कही है। कवि का मानना है कि बलिदान का यह क्रम निरंतर चलते रहना चाहिए क्योंकि हमारा देश तभी सुरक्षित रह सकता है, जब बलिदानियों के काफिले शत्रुओं को परास्त कर तथा विजयश्री को हासिल कर आगे बढ़ते रहेंगे।

प्रश्न 7.

इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ किस ओर संकेत करता है?

उत्तर: इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ देश के लिए अपना सर्वस्व अर्थात् संपूर्ण समर्पण की ओर संकेत करता है। सिर पर कफन बाँधकर चलने वाला व्यक्ति अपने प्राणों से मोह नहीं करता, बल्कि अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए सदैव तैयार रहता है इसलिए हर सैनिक सदा मौत को गले लगाने के लिए तत्पर रहता है।

प्रश्न 8.

इस कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत कविता उर्दू के प्रसिद्ध कवि कैफ़ी आज़मी द्वारा रचित है। यह गीत युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म हकीकत के लिए लिखा गया है। इस कविता में कवि ने उन सैनिकों के हृदय की आवाज़ को व्यक्त किया है, जिन्हें अपने देश के प्रति किए गए हर कार्य, हर कदम, हर बलिदान पर गर्व है। इसलिए इन्हें प्रत्येक देशवासी से कुछ अपेक्षाएँ हैं कि उनके इस संसार से विदा होने के पश्चात वे देश की आन, बान व शान पर आँच नहीं आने देंगे, बल्कि समय आने पर अपना बलिदान देकर देश की रक्षा करेंगे।

प्रश्न 9.

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

उत्तर: भाव-इन पंक्तियों का भाव यह है कि हमारे वीर सैनिक देश रक्षा के लिए दिए गए अपने वचन का पालन अपने जीवन के अंतिम क्षण तक करते रहे युद्ध में घायल इन सैनिकों को अपने प्राणों की जरा भी परवाह नहीं की। उनकी साँसें भले ही रुकने लगीं तथा भयंकर सर्दी के कारण उनकी नब्ज़ चाहे जमती चली गई किंतु किसी भी परिस्थिति में उनके इरादे डगमगाए नहीं। भारत माँ की रक्षा के लिए उनके बढ़ते कदम न तो पीछे हटे और न ही रुके। वे अपनी अंतिम साँस तक शत्रुओं का मुकाबला करते रहे।

प्रश्न 10.

खींच दो अपने खू से जमीं पर लकीर

इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई

उत्तर: इन अंशों का भाव है कि सैनिकों ने अंतिम साँस तक देश की रक्षा की। युद्ध में घायल हो जाने पर जब सैनिकों की साँसें रुकने लगती हैं अर्थात् अंतिम समय आने पर तथा नब्ज़ के रुक-रुककर चलने पर, कमज़ोर पड़ जाने पर भी उनके कदम नहीं रुकते, क्योंकि वे भारतमाता की रक्षा हेतु आगे बढ़ते रहते हैं और हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर देते हैं।

प्रश्न 11.

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

उत्तर: भाव-इन पंक्तियों का भाव यह है कि भारत की भूमि सीता माता की तरह पवित्र है। इसके दामन को छूने का दुस्साहस किसी को नहीं होना चाहिए। यह धरती राम और लक्ष्मण जैसे अलौकिक वीरों की धरती है जिनके रहते सीमा पर से कोई शत्रु रूपी रावण देश में प्रवेश कर देश की अस्मिता को लूट नहीं सकता। अतः हम सभी देशवासियों को मिलकर देश की गरिमा को बनाए रखना है अर्थात् देश के मान-सम्मान व उसकी पवित्रता की रक्षा करना है।

बच्चों!

टेक्स्ट और वीडियो के माध्यम से पढ़ाई गई कविता ‘Kar Chale Hum Fida’ आपको कैसी लगी?

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Patjhad Mein Tuti Pattiyan Class 10 Summary

Patjhad Mein Tuti Pattiyan Class 10 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 2 का पाठ पढ़ेंगे

पतझड़ में टूटी पत्तियॉं:

पाठ के लेखक रविंद्र केलेकर हैं।

बच्चों! पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

This Post Includes

लेखक परिचय: रविंद्र केलेकर

जन्म: 7 मार्च 1925 (कोंकण)

Ravindra Kelekar

जीवन परिचय: रविंद्र केलेकर छात्र जीवन से ही गोवा मुक्ति आंदोलन में शामिल हो गए थे| गांधीवादी चिंतक के रूप में विख्यात केलेकर ने अपने लेखन में जन-जीवन के विविध पक्षों, मान्यताओं और व्यक्तिगत विचारों को देश और समाज के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है| इनकी अनुभवजन्य टिप्पणियां में अपने चिंतन की मौलिकता के साथ ही मानवीय सत्य तक पहुंचने की सहज चेष्टा रहती है|

गोवा कला अकादमी के साहित्य पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित केलेकर की प्रमुख कृतियां है- कोंकणी में उजवाढांचे सूर, समिधा, सांगली,ओथांबे; मराठी में कोंकणीचें राजकरण, जापान जसा दिसला और हिंदी में पतझर में टूटी पत्तियां।

पाठ प्रवेश: पतझर की टूटी पत्तियाँ

ऐसा माना जाता है कि कम शब्दों में अधिक बात कहना एक कविता का सबसे महत्वपूर्ण गुण होता है। जब कभी इस गुण का प्रयोग कवियों के साथ-साथ लेखक भी करे अर्थात जब कभी कविताओं के साथ-साथ गद्य में भी इस गुण (कम शब्दों में अधिक बात कहने) का प्रयोग हो, तो उस गद्य को पढ़ने वाले को यह मुहावरा याद आ ही जाता है –

‘सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय’

अर्थात सही और सार्थक (जिनका कोई अर्थ हो) शब्दों का प्रयोग करके और निरर्थक (जिनका कहीं कोई अर्थ न हो) शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

आसान शब्दों का प्रयोग करना और कम शब्दों में अधिक शब्दों का अर्थ निकलने वाले वाक्यों का प्रयोग करना बहुत कठिन काम है। फिर भी लेखक इस काम को करते आए हैं। सूक्ति कथाएँ, आगम कथाएँ, जातक कथाएँ, पंचतंत्र की कहानियाँ इसी तरह से लिखी गई कथाएँ और कहानियाँ हैं। यही काम प्रस्तुत पाठ के लेखक रविंद्र केलेकर ने भी किया है।

लेखक ने प्रस्तुत पाठ में जो प्रसंग प्रस्तुत किए गए हैं उनमें भी लेखक पढ़ने वालों से उम्मीद कर रहे हैं कि वे उनके द्वारा कहे गए कम शब्दों में अधिक अर्थों को निकाले। ये प्रसंग केवल पढ़ने के ही लिए नहीं हैं, बल्कि एक जागरूक और सक्रीय नागरिक बनने की प्रेरणा भी देते हैं।

पहले प्रसंग (गिन्नी का सोना) जीवन में अपने लिए सुख-साधन जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगो से परिचित करवाता है जो इस संसार को सब के लिए जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं।

दूसरा प्रसंग (झेन की देन) बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिन भर के कामों के बीच भी कुछ चैन भरे या सुकून के पल हासिल कर ही लेते हैं।

Ginni Ka Sona Summary

गिन्नी का सोना

लेखक ने प्रस्तुत पाठ में जो प्रसंग प्रस्तुत किए हैं, उनमें पहले प्रसंग (गिन्नी का सोना) जीवन में अपने लिए सुख-साधन जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगो से परिचित करवाता है जो इस संसार को सब के लिए जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं। लेखक कहते हैं कि शुद्ध सोने में और सोने के सिक्के में बहुत अधिक फर्क होता है, सोने के सिक्के में थोड़ा-सा ताँबा मिलाया जाता है, जिस कारण अधिक चमक आ जाती है और यह अधिक मज़बूत भी होता है। औरतें अकसर उन्हीं सोने के सिक्कों के गहनें बनवाती हैं। लेखक कहते हैं कि किसी व्यक्ति का जो उच्च चरित्र होता है वह भी शुद्ध सोने की तरह होता है उसमें कोई मिलावट नहीं होती। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने चरित्र में ताँबा अर्थात मिलावटी व्यवहार मिला देते हैं, उन्ही लोगों को सभी लोग व्यावहारिक आदर्शवादी कह कर उनका गुणगान करते हैं। लेखक हम सभी को ये बताना चाहते हैं कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्णन कभी भी आदर्शों का नहीं होता, बल्कि आपके व्यवहार का होता है। कुछ लोग कहते हैं कि गाँधी जी भी व्यावहारिक आदर्शवादियों में से एक थे। यदि गाँधी जी अपने आदर्शो को महत्त्व नहीं देते तो पूरा देश उनके साथ हर समय कंधे-से-कन्धा मिला कर खड़ा न होता। जो लोग केवल अपने व्यवहार पर ही ध्यान देते हैं, केवल वैज्ञानिक ढंग से ही सोचते हैं, वे व्यवहारवादी लोग कहे जाते हैं और ये लोग हमेशा चौकन्ने रहते हैं कि कहीं इनसे कोई ऐसा काम न हो जाए जिसके कारण इनको हानि उठानी पड़े। सबसे महत्पूर्ण बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं।

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Jhen Ki Den Summary

झेन की देन

दूसरा प्रसंग (झेन की देन) बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिन भर के कामों के बीच भी कुछ चैन भरे या सुकून के पल हासिल कर ही लेते हैं।

लेखक ने जब अपने जापानी मित्र से वहाँ की सबसे खतरनाक बीमारी के बारे में पूछा तो उसने कहा कि जापान के लोगों को सबसे अधिक मानसिक बीमारी का शिकार होना पड़ता है। लेखक के इस मानसिक बिमारी की वजह पूछने पर लेखक के मित्र ने उत्तर दिया कि उनके जीवन की तेजी औरों से अधिक है। जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं। कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी फैल गई है।

लेखक कहते हैं कि एक शाम को उनका जापानी दोस्त उन्हें चा-नो-यू अर्थात जापान के चाय पीने के एक विशेष आयोजन में ले गया। लेखक और उनका मित्र चाय पिने के आयोजन के लिए जहाँ गए थे वह एक छः मंजिल की इमारत थी। उसकी छत पर एक सरकने वाली दीवार थी जिस पर चित्रकारी की गई थी और पत्तों की एक कुटिया बनी हुई थी जिसमें जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। उसके बाहर बैडोल-सा मिट्टी का एक पानी भरा हुआ बरतन था। लेखक और उनके मित्र ने उस पानी से हाथ-पाँव धोकर अंदर गए। अंदर चाय देने वाला एक व्यक्ति था जिसे चानीज कहा जाता है। उन्हें देखकर वह खड़ा हो गया। कमर झुका कर उसने उन्हें प्रणाम किया और बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए।

ये सारा काम उस व्यक्ति ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।

लेखक कहते हैं कि चाय बनाने वाले ने चाय तैयार की और फिर उन प्यालों को लेखक और उनके मित्रों के सामने रख दिया। जापान में इस चाय समारोह की सबसे खास बात शांति होती है। इसलिए वहाँ तीन से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं बैठाया जाता। वे करीब डेढ़ घंटे तक प्यालों से चाय को धीरे-धीरे पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तो लेखक को बहुत परेशानी हुई। लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है।

लेखक हमें बताना चाहते हैं कि हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। जो समय अभी चल रहा है वही सच है। और यह समय कभी न ख़त्म होने वाला और बहुत अधिक फैला हुआ है। लेखक कहते हैं कि जीना किसे कहते यह उनको चाय समारोह वाले दिन मालूम हुआ। जापानियों को ध्यान लगाने की यह परंपरा विरासत में देन में मिली है।

Patjhad Mein Tuti Pattiyaan Question Answers

पाठ से जुड़े प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए–

प्रश्न 1: शुद्ध आदर्श की तुलना सोने से और व्यावहारिकता की तुलना ताँबे से क्यों की गई है?

उत्तर: शुद्ध सोने में चमक होती है और आदर्श भी शुद्ध सोने की तरह चमकदार और महत्वपूर्ण मूल्यों से भरा होता है। ताँबे से सोना मजबूत तो होता है परन्तु उसकी शुद्धता समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार व्यवहारिकता के कारण आदर्श समाप्त हो जाते हैं परन्तु यदि सही ढंग से व्यवहारिकता और आदर्शों को मिलाया जाये तो जीवन में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।

प्रश्न 2: चानीज ने कौन-सी क्रियाएँ गरिमापूर्ण ढंग से पूरी की?

उत्तर: लेखक और उनके मित्र को देखकर चानीज खड़ा हो गया। कमर झुका कर उसने उन्हें प्रणाम किया और बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए। ये सारा काम चानीज ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो।

प्रश्न 3: ‘टी-सेरेमनी’ में कितने आदमियों को प्रवेश दिया जाता था और क्यों?

उत्तर: जापान में ‘टी-सेरेमनी’ समारोह की सबसे खास बात शांति होती है। इसलिए वहाँ तीन से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं माना जाता।

प्रश्न 4: चाय पिने के बाद लेखक ने स्वयं में क्या परिवर्तन महसूस किया?

उत्तर: लेखक कहते हैं कि वे करीब डेढ़ घंटे तक प्यालों से चाय को धीरे-धीरे पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तो लेखक को बहुत परेशानी हुई। लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है। लेखक को लगा जैसे वह कभी न ख़त्म होने वाले समय में जी रहा है। यहाँ तक की लेखक का मन इतना शांत हो गया था की बाहर की शांति भी शोर लग रही थी।

प्रश्न 5: लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए? आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के कारण बताते हुए कहा कि वहाँ जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं। कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। यहाँ तक की जब जापान के लोग कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं तो वे किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही बातें करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। ऐसा करने के कारण जब दिमाग थक जाता है और टेंशन में आ कर पूरा इंजन टूट जाता है। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी बहुत अधिक फैल गई है। हम इन कारणों से पूरी तरह सहमत हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50- 60 शब्दों में) लिखिए –

प्रश्न 1: गांधीजी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी; उदहारण सहित इस बात की पुष्टि कीजिए।

उत्तर: गांधीजी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी। गाँधी जी भी व्यावहारिक आदर्शवादियों में से एक थे। वे अपनी व्यावहारिकता को जानते थे और उसकी कीमत को भी पहचानते थे। इन्हीं कारणों की वजह से वे अपने अनेक लक्षणों वाले आदर्श चला सके। यदि गाँधी जी अपने आदर्शो को महत्त्व नहीं देते तो पूरा देश उनके साथ हर समय कंधे-से-कन्धा मिला कर खड़ा न होता। यह बात उनके अहिंसात्मक आंदोलन उसे स्पष्ट हो जाती है। वह अकेले चलते थे और लाखों में उनके पीछे हो जाते थे। नमक का कानून तोड़ने के लिए जब उन्होंने जनता का आह्वान किया तो उनके नेतृत्व में हजारों लोग उनके साथ पैदल ही दांडी यात्रा पर निकल पड़े थे । इसी प्रकार से असहयोग आंदोलन के समय भी उनकी एक आवाज़ पर देश के हजारों नौजवान अपनी पढ़ाई छोड़कर उनके नेतृत्व में आंदोलन के रास्ते पर चल पड़े थे।

प्रश्न 2: आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:  हमारे विचार से – सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम, भाईचारा, त्याग, परोपकार, मीठी वाणी, मानवीयता इत्यादि ये मूल्य शाश्वत हैं। वर्तमान समाज में इन मूल्यों की प्रासंगिकता अर्थात महत्व बहुत अधिक है। जहाँ- जहाँ और जब-जब इन मूल्यों का पालन नहीं किया गया है वहाँ तब-तब समाज का नैतिक पतन हुआ है। सबसे महत्पूर्ण बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है।

प्रश्न 3: ‘शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’, गांधीजी के आदर्श और व्यवहार के सन्दर्भ में यह बात किस तरह झलकती है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: गांधीजी ने जीवन भर सत्य और अहिंसा का पालन किया। वे आदर्शों को ऊंचाई तक ले कर जाते थे अर्थात वे सोने में ताँबा मिलकर उसकी कीमत कम नहीं करते थे, बल्कि ताँबे में सोना मिलकर उसकी कीमत बड़ा देते थे। वे अपनी व्यावहारिकता को जानते थे और उसकी कीमत को भी पहचानते थे। इन्हीं कारणों की वजह से वे अपने अनेक लक्षणों वाले आदर्श चला सके। गाँधी जी कभी भी अपने आदर्शों को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने देते थे। बल्कि वे अपने व्यवहार में ही अपने आदर्शों को रखने की कोशिश करते थे। वे किसी भी तरह के आदर्शों में कोई भी व्यावहारिक मिलावट नहीं करते थे बल्कि व्यव्हार में आदर्शों को मिलते थे जिससे आदर्श ही सबको दिखे और सब आदर्शों का ही पालन करे और आदर्शों की कीमत बड़े।

प्रश्न 4: ‘गिरगिट’ कहानी में अपने समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल-पल में बदल डालने की एक बानगी देखी। इस पाठ के अंश ‘गिन्नी का सोना’ के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए कि ‘आदर्शवादिता’ और ‘व्यावहारिकता’ इनमे से जीवन में किसका महत्त्व है?

उत्तर: ‘गिरगिट’ कहानी में स्वार्थी इंस्पेक्टर समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल-पल बदलता है। वह अवसर के साथ-साथ जहाँ उसका लाभ हो रहा हो वहाँ उसी के अनुसार अपना व्यवहार बदलता है। ‘गिन्नी का सोना’ कहानी में इस बात पर बल दिया गया है कि आदर्श शुद्ध सोने के समान हैं। उनमे व्यवहारिकता का गुण मिलाकर उन्हें और भी अधिक मजबूत किया जा सकता है। समाज में देखा गया है कि व्यवहारवादी लोग आदर्शवादी लोगो से बहुत आगे तो बढ़ जाते हैं परन्तु वे अपने जीवन के नैतिक मूल्यों को पीछे छोड़ देते हैं और स्वार्थी हो जाते हैं। सबसे महत्पूर्ण बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं। व्यवहारवादी लोग तो केवल अपने आप को आगे लाने में लगे रहते हैं उनको कोई फर्क नहीं पड़ता अगर समाज को नुक्सान हो रहा हो।

प्रश्न 5: लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। वो इसलिए क्योंकि एक बीत चूका होता है और दूसरा अभी आया भी नहीं होता। तो बात आती है कि सच क्या है तो इस बात पर लेखक कहते हैं कि जो समय अभी चल रहा है वही सच है।

प्रश्न 6: लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए? आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के कारण बताते हुए कहा कि वहाँ जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं।  कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। यहाँ तक की जब जापान के लोग कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं तो वे किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही बातें करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। ऐसा करने के कारण जब दिमाग थक जाता है और टेंशन में आ कर पूरा इंजन टूट जाता है। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी बहुत अधिक फैल गई है। हम इन कारणों से पूरी तरह सहमत हैं।

प्रश्न 7: लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा?  स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। वो इसलिए क्योंकि एक बीत चूका होता है और दूसरा अभी आया भी नहीं होता। तो बात आती है कि सच क्या है तो इस बात पर लेखक कहते हैं कि जो समय अभी चल रहा है वही सच है।

प्रश्न 7: निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए –

  1. समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।
  2. जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब ‘प्रेक्टिकल आइडियालिस्टों’ के जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यवहारिक सूझबूझ ही आने लगती है।
  3. जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं, बल्कि दौड़ता है। कोई बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं।
  4. सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों।

उत्तर: (1) हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं। खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। व्यवहारवादी लोग तो केवल अपने आप को आगे लाने में लगे रहते हैं उनको कोई फर्क नहीं पड़ता अगर समाज को नुक्सान हो रहा हो।

उत्तर: (2) जब किसी के व्यवहार का वर्णन होना शुरू होता है तो जिन्हें व्यावहारिक आदर्शवादी लोग समझते हैं उन व्यावहारिक आदर्शवादी लोगों के जीवन से आदर्श व्यावहारिक वर्णन के कारण कम होने लगते हैं क्योंकि वर्णन कभी भी आदर्शों का नहीं होता, बल्कि आपके व्यवहार का होता है। और आदर्शों के कम होते ही सोचने की शक्ति बढ़ने लगती है।

उत्तर: (3) जापान के लोगों के जीवन की तेजी औरों से अधिक है। जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं। जापान में कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। यहाँ तक की जब जापान के लोग कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं तो वे किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही बातें करते हैं।

उत्तर: (4) जापान में चाय बनाने वाले को चानीज कहते हैं और उसने लेखक और उनके मित्रों के स्वागत से ले कर चाय परोसने तक का सारा काम इतने ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।

Extra Questions (Important)

पाठ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ पाठ के दूसरे प्रसंग (झेन की देन) में लेखक ने किस पद्धति का वर्णन किया है?

उत्तर: बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिन भर के कामों के बीच भी कुछ चैन भरे या सुकून के पल हासिल कर ही लेते हैं।

प्रश्न 2: लेखक के मित्र के अनुसार जापानी किस रोग से पीड़ित हैं और क्यों?

उत्तर: लेखक के मित्र के अनुसार जापानी मानसिक रोग से पीड़ित हैं। इसका कारण उनकी असीमित आकांक्षाएँ, उनको पूरा करने के लिए किया गया भागम-भाग भरा प्रयास, महीने का काम एक दिन में करने की चेष्टा, अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र से प्रतिस्पर्धा आदि है।

प्रश्न 3: ‘टी-सेरेमनी’ की चाय का लेखक पर क्या असर हुआ?

उत्तर: ‘टी-सेरेमनी’ में चाय पीते समय लेखक पहले दस-पंद्रह मिनट परेशान हो गया। फिर उसके दिमाग की रफ्तार धीमी होने लगी। जो कुछ देर में बंद-सी हो गई। अब उसे सन्नाटा भी सुनाई दे रहा था। उसे लगने लगा कि वह अनंतकाल में जी रहा है।

प्रश्न 4: ‘जीना किसे कहते है’ लेखक को किस स्थिति में एहसास हुआ?

उत्तर: ‘जीना किसे कहते है’ लेखक ने ऐसा उस स्थिति में महसूस किया जब वह भूतकाल और भविष्य दोनों को मिथ्या मानकर उन्हें भूल बैठा। उसके सामने जो वर्तमान था उसी को उसने सच मान लिया था। टी-सेरेमनी में चाय पीते-पीते उसके दिमाग से दोनों काल उड़ गए थे। वह अनंतकाल जितने विस्तृत वर्तमान में जी रहा था।

प्रश्न 5: जापान में चाय समारोह की सबसे खास बात क्या होती है और लेखक को वहाँ कैसा महसूस हुआ?

उत्तर: लेखक कहते हैं कि चाय समारोह में चाय बनाने वाले ने चाय तैयार की और फिर उन प्यालों को लेखक और उनके मित्रों के सामने रख दिया। जापान में इस चाय समारोह की सबसे खास बात शांति होती है। इसलिए वहाँ तीन से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं माना जाता।

वे करीब डेढ़ घंटे तक प्यालों से चाय को धीरे-धीरे पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तो लेखक को बहुत परेशानी हुई। लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है।

प्रश्न 6: लेखक हमें वर्त्तमान समय के बारे में क्या बताना चाहते हैं ?

उत्तर: लेखक हमें बताना चाहते हैं कि हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। क्योंकि बीते हुए समय को हम फिर से जी नहीं सकते और आने वाले समय का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि वह कैसा होगा। जो समय अभी चल रहा है अर्थात वर्त्तमान, वही सच है। और यह समय कभी न ख़त्म होने वाला और बहुत अधिक फैला हुआ है। क्योंकि हम हमेशा वर्त्तमान में ही रहते हैं।

प्रश्न 7: जापान की तरह ही भारत में भी लोगों की जिंदगी की गतिशीलता में खूब वृद्धि हुई है। ‘झेन की देन’ पाठ के आधार पर वर्णन कीजिए।

उत्तर: अपने जीवन में अत्यधिक सुख-सुविधाएँ को पाने की इच्छा, भौतिकवादी सोच और विकसित बनने की चाहत ने भारतीयों की जिंदगी की गतिशीलता में वृधि की है। भारत भी अन्य विकासशील देशों की भाँती विकास के पथ पर अग्रसर है। गाँव हो या महानगर, सभी प्रगति के लिए भागते दिख रहे हैं। विकसित देशों की भाँति जीवन शैली अपनाने के लिए लोगों की जिंदगी में भागमभाग मची हुई है। अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त होने के कारण अब लोगों के पास अपनों के लिए भी समय नहीं बचा है। भारत के लोगों की स्थिति भी जापानियों जैसी हो रही है जो चलने की जगह दौड़ रहे हैं, बोलने की जगह बक रहे हैं और इससे भी दो कदम आगे बढ़कर मानसिक रोगी होने लगे हैं।

प्रश्न 8: ‘झेन की देन’ पाठ से आपको क्या संदेश मिलता है?

उत्तर: ‘झेन की देन’ पाठ हमें अत्यधिक व्यस्त जीवनशैली और उसके दुष्परिणामों से अवगत करवाता है। पाठ में जापानियों की व्यस्त दिनचर्या से उत्पन्न मानसिक रोग की चर्चा की गई है, वहाँ की ‘टी-सेरेमनी’ के माध्यम से जापान के लोग अपने मानसिक तनाव से मुक्त होते हैं। ‘टी-सेरेमनी’ के माध्यम से लेखक ने हमें यह संदेश दिया है कि अधिक तनाव मनुष्य को पागल बना देता है। इससे बचने का उपाय है मन को शांत रखना। हमें बीते दिनों और भविष्य की कल्पनाओं को भूलकर वर्तमान की वास्तविकता में जीना चाहिए और वर्तमान का भरपूर आनंद लेना चाहिए। क्योंकि बीते हुए दिनों को हम चाह कर भी वापिस नहीं ला सकते और भविष्य में क्या होना है इसका अंदाजा भी हम नहीं लगा सकते। मानसिक तनाव से मुक्त होने के लिए मन से चिंता, तनाव और अधिक काम की बोझिलता हटाना आवश्यक है ताकि शांति एवं चैन से जीवन कटे।

प्रश्न 9: लेखक ने जब अपने जापानी मित्र से वहाँ की सबसे खतरनाक बीमारी के बारे में पूछा तो उसने क्या कहा और उसका क्या कारण बताया?

उत्तर: लेखक ने जब अपने जापानी मित्र से वहाँ की सबसे खतरनाक बीमारी के बारे में पूछा तो उसने कहा कि जापान के लोगों को सबसे अधिक मानसिक बीमारी का शिकार होना पड़ता है। लेखक के इस मानसिक बिमारी की वजह पूछने पर लेखक के मित्र ने उत्तर दिया कि उनके जीवन की तेजी औरों से अधिक है।

जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं। कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी फैल गई है।

प्रश्न 10: लेखक का दोस्त लेखक को चा-नो-यू के लिए कहाँ ले गया और वहाँ का माहौल कैसा था ?

उत्तर: एक शाम को लेखक का जापानी दोस्त उन्हें चा-नो-यू अर्थात जापान के चाय पीने के एक विशेष आयोजन में ले गया। लेखक और उनका मित्र चाय पिने के आयोजन के लिए जहाँ गए थे वह एक छः मंजिल की इमारत थी। उसकी छत पर एक सरकने वाली दीवार थी जिस पर चित्रकारी की गई थी और पत्तों की एक कुटिया बनी हुई थी जिसमें जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। उसके बाहर बैडोल-सा मिट्टी का एक पानी भरा हुआ बरतन था।

लेखक और उनके मित्र उस पानी से हाथ-पाँव धोकर अंदर गए। अंदर चाय देने वाला एक व्यक्ति था जिसे चानीज कहा जाता है। उन्हें देखकर वह खड़ा हो गया। कमर झुका कर उसने उन्हें प्रणाम किया और बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए। ये सारा काम उस व्यक्ति ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।

बच्चों!

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