Category: 12th Hindi Aroh

Badal Raag Class 12 Summary

हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक
आरोह भाग-2 की कविता पढ़ेंगे
‘बादल राग’
कविता के रचयिता सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।
…………………………
बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि परिचयः सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

जीवन परिचयः महाप्राण कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन 1899 में बंगाल राज्य के महिषादल नामक रियासत के मेदिनीपुर जिले में हुआ था। इनके पिता रामसहाय त्रिपाठी मूलतः उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोला नामक गाँव के निवासी थे। जब निराला तीन वर्ष के थे, तब इनकी माता का देहांत हो गया। इन्होंने स्कूली शिक्षा अधिक नहीं प्राप्त की, परंतु स्वाध्याय द्वारा इन्होंने अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। पिता की मृत्यु के बाद ये रियासत की पुलिस में भर्ती हो गए। 14 वर्ष की आयु में इनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ। इन्हें एक पुत्री व एक पुत्र प्राप्त हुआ। 1918 में पत्नी के देहांत का इन पर गहरा प्रभाव पड़ा। आर्थिक संकटों, संघर्षों व जीवन की यथार्थ अनुभूतियों ने निराला जी के जीवन की दिशा ही मोड़ दी। ये रामकृष्ण मिशन, अद्वैत आश्रम, बैलूर मठ चले गए। वहाँ इन्होंने दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया तथा आश्रम के पत्र ‘समन्वय’ का संपादन किया।
सन 1935 में इनकी पुत्री सरोज का निधन हो गया। इसके बाद ये टूट गए तथा इनका शरीर बीमारियों से ग्रस्त हो गया। 15 अक्तूबर, 1961 ई० को इस महान साहित्यकार ने प्रयाग में सदा के लिए आँखें मूंद लीं।
साहित्यिक रचनाएँः सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ प्रतिभा-संपन्न व प्रखर साहित्यकार थे। इन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं पर लेखनी चलाई।
इनकी रचनाएँ हैं-
काव्य-संग्रहः परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना आदि।
उपन्यासः अलका, अप्सरा, प्रभावती, निरुपमा, काले कारनामे आदि।
कहानीः संग्रह-लिली, सखी, अपने घर।
निबंधः प्रबंध-पद्य, प्रबंध प्रतिभा, चाबुक आदि।
नाटकः समाज, शंकुतला, उषादृअनिरुद्ध।
रेखाचित्रः कुल्लीभाट, बिल्लेसुर बकरिहा।
संपादनः ‘समन्वय’ पत्र तथा ‘मतवाला’ पत्रिका का संपादन।

काव्यगत विशेषताएँः निराला जी छायावाद के आधार स्तंभ थे। इनके काव्य में छायावाद, प्रगतिवाद तथा प्रयोगवादी काव्य की विशेषताएँ मिलती हैं। ये एक ओर कबीर की परंपरा से जुड़े हैं तो दूसरी ओर समकालीन कवियों की प्रेरणा के स्रोत भी हैं। इनकी भाषा में उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के शब्द इस तरह प्रयुक्त हुए हैं मानो हिंदी के ही हों।
कविता का प्रतिपादय एवं सार
प्रतिपादयः ‘बादल राग’ कविता ‘अनामिका’ काव्य से ली गई है। निराला को वर्षा ऋतु अधिक आकृष्ट करती है, क्योंकि बादल के भीतर सृजन और ध्वंस की ताकत एक साथ समाहित है। बादल किसान के लिए उल्लास और निर्माण का अग्रदूत है तो मजदूर के संदर्भ में क्रांति और बदलाव। ‘बादल राग’ निराला जी की प्रसिद्ध कविता है। वे बादलों को क्रांतिदूत मानते हैं। बादल शोषित वर्ग के हितैषी हैं, जिन्हें देखकर पूँजीपति वर्ग भयभीत होता है। बादलों की क्रांति का लाभ दबे-कुचले लोगों को मिलता है, इसलिए किसान और उसके खेतों में बड़े-छोटे पौधे बादलों को हाथ हिला-हिलाकर बुलाते हैं। वास्तव में समाज में क्रांति की आवश्यकता है, जिससे आर्थिक विषमता मिटे। कवि ने बादलों को क्रांति का प्रतीक माना है।
सारः कवि बादलों को देखकर कल्पना करता है कि बादल हवारूपी समुद्र में तैरते हुए क्षणिक सुखों पर दुख की छाया हैं जो संसार या धरती की जलती हुई छाती पर मानी छाया करके उसे शांति प्रदान करने के लिए आए हैं। बाढ़ की विनाश-लीला रूपी युद्ध-भूमि में वे नौका के समान लगते हैं। बादल की गर्जना को सुनकर धरती के अंदर सोए हुए बीज या अंकुर नए जीवन की आशा से अपना सिर ऊँचा उठाकर देखने लगते हैं। उनमें भी धरती से बाहर आने की आशा जागती है। बादलों की भयंकर गर्जना से संसार हृदय थाम लेता है। आकाश में तैरते बादल ऐसे लगते हैं मानो वज्रपात से सैकड़ों वीर धराशायी हो गए हों और उनके शरीर क्षत-विक्षत हैं।
कवि कहता है कि छोटे व हलके पौधे हिल-डुलकर हाथ हिलाते हुए बादलों को बुलाते प्रतीत होते हैं। कवि बादलों को क्रांति-दूत की संज्ञा देता है। बादलों का गर्जन किसानों व मजदूरों को नवनिर्माण की प्रेरणा देता है। क्रांति से सदा आम आदमी को ही फायदा होता है। बादल आतंक के भवन जैसे हैं जो कीचड़ पर कहर बरसाते हैं। बुराईरूपी कीचड़ के सफाए के लिए बादल प्रलयकारी होते हैं। छोटे-से तालाब में उगने वाले कमल सदैव उसके पानी को स्वच्छ व निर्मल बनाते हैं। आम व्यक्ति हर स्थिति में प्रसन्न व सुखी रहते हैं। अमीर अत्यधिक संपत्ति इकट्ठी करके भी असंतुष्ट रहते हैं और अपनी प्रियतमाओं से लिपटने के बावजूद क्रांति की आशंका से काँपते हैं। कवि कहता है कि कमजोर शरीर वाले कृषक बादलों को अधीर होकर बुलाते हैं क्योंकि पूँजीपति वर्ग ने उनका अत्यधिक शोषण किया है। वे सिर्फ जिदा हैं। बादल ही क्रांति करके शोषण को समाप्त कर सकता है।
व्याख्या
1.
तिरती हैं समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
धन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल!
शब्दार्थः तिरती-तैरती। समीर-सागर-वायुरूपी समुद्र। अस्थिर- क्षणिक, चंचल। दग्ध-जला हुआ। निर्दय- बेदर्द। विप्लव- विनाश। प्लावित- बाढ़ से ग्रस्त। रण-तरी- युद्ध की नौका। माया- खेल। आकांक्षा-कामना। भेरी- नगाड़ा। सजग- जागरूक। सुप्त- सोया हुआ। अंकुर- बीज से निकला नन्हा पौधा। उर- हृदय। ताकना- अपेक्षा से एकटक देखना।
सन्दर्भः प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।
प्रसंगः इसमें कवि ने बादल को विप्लव व क्रांति का प्रतीक मानकर उसका आहवान किया है।
व्याख्याः कवि बादल को संबोधित करते हुए कहता है कि हे क्रांतिदूत रूपी बादल! तुम आकाश में ऐसे मैंडराते रहते हो जैसे पवन रूपी सागर पर कोई नौका तैर रही हो। यह उसी प्रकार है जैसे अस्थिर सुख पर दुख की छाया मैंडराती रहती है। सुख हवा के समान चंचल है तथा अस्थायी है। बादल संसार के जले हुए हृदय पर निर्दयी प्रलयरूपी माया के रूप में हमेशा स्थित रहते हैं। बादलों की युद्धरूपी नौका में आम आदमी की इच्छाएँ भरी हुई रहती हैं। कवि कहता है कि हे बादल! तेरी भारी-भरकम गर्जना से धरती के गर्भ में सोए हुए अंकुर सजग हो जाते हैं अर्थात कमजोर व निष्क्रिय व्यक्ति भी संघर्ष के लिए तैयार हो जाते हैं। हे विप्लव के बादल! ये अंकुर नए जीवन की आशा में सिर उठाकर तुझे ताक रहे हैं अर्थात शोषितों के मन में भी अपने उद्धार की आशाएँ फूट पड़ती हैं।
विशेषः
(1) बादल को क्रांतिदूत के रूप में चित्रित किया गया है।
(2) प्रगतिवादी विचारधारा का प्रभाव है।
(3) तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।
(4) काव्य की रचना मुक्त छंद में है।
(5) ‘समीर-सागर’, ‘दुख की छाया’ आदि में रूपक, ‘सजग सुप्त’ में अनुप्रास तथा काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है।
(6) वीर रस का प्रयोग है।

प्रश्न
(क) कवि किसका आहवान करता हैं? क्यों?
उत्तरः कवि बादल का आहवान करता है क्योंकि वह उसे क्रांति का प्रतीक मानता है। बादल बरसने से आम जनता को राहत मिलती है तथा बिजली गिरने से विशिष्ट वर्ग खत्म होता है।

(ख) ‘यह तेरी रण-तरी भरी आकांक्षाओं से‘  का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः (ख) इस पंक्ति का आशय यह है कि जिस प्रकार युद्ध के लिए प्रयोग की जाने वाली नाव विभिन्न हथियारों से सज्जित होती है उसी प्रकार बादलों की युद्धरूपी नाव में जन-साधारण की इच्छाएँ या मनोवांछित वस्तुएँ भरी हैं जो बादलों के बरसने से पूरी होंगी।

(ग) ‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया-पंक्ति का अर्थ बताइए।
उत्तरः (ग) इस पंक्ति का अर्थ यह है कि जिस प्रकार वायु अस्थिर है, बादल स्थायी है, उसी प्रकार मानव-जीवन में सुख अस्थिर होते हैं तथा दुख स्थायी होते हैं।

(घ) पृथ्वी में सोए हुए अंकुरों पर किसका क्या प्रभाव पड़ता हैं?
उत्तरः (घ) पृथ्वी में सोए हुए अंकुरों पर बादलों की गर्जना का प्रभाव पड़ता है। गर्जना सुनकर वे नया जीवन पाने की आशा से सिर ऊँचा करके प्रसन्न होने लगते हैं।

2.
फिर-फिर
बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षतं हत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पद्र्धा धीर।
हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार-
शस्य अपार,
हिल-हिल ,
खिल-खिल,
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते,
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।
शब्दार्थः वर्षण-बारिश। मूसलधार-जोरों की बारिश। हृदय थामना- भयभीत होना। घोर- भयंकर। वज्र- हुंकार-वज्रपात के समान भयंकर आवाज। अशनि-पात- बिजली गिरना। शापित- शाप से ग्रस्त। उन्नत- बड़ा। शत-शत-सैकड़ो। विक्षप्त- घायल। हत- मरे हुए। अचल- पर्वत। गगन- स्पर्शी- आकाश को छूने वाला। स्पद्र्धा दृधीर-आगे बढ़ने की होड़ करने हेतु बेचैनी। लघुभार- हलके। शस्य- हरियाली। अपार- बहुत। रव- शोर।

सन्दर्भः प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2′ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।
प्रसंगः इसमें कवि ने बादल को विप्लव व क्रांति का प्रतीक मानकर उसका आहवान किया है।
व्याख्याः कवि कहता है कि हे क्रांतिकारी बादल! तुम बार-बार गर्जन करते हो तथा मूसलाधार बारिश करते हो। तुम्हारी वज्र के समान भयंकर आवाज को सुनकर संसार अपना हृदय थाम लेता है अर्थात भयभीत हो जाता है। बिजली गिरने से आकाश की ऊँचाइयों को छूने की इच्छा रखने वाले ऊँचे पर्वत भी उसी प्रकार घायल हो जाते हैं जैसे रणक्षेत्र में वज के प्रहार से बड़े-बड़े वीर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, बड़े लोग या पूँजीपति ही क्रांति से प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत, छोटे पौधे हँसते हैं। वे उस विनाश से जीवन प्राप्त करते हैं। वे अपार हरियाली से प्रसन्न होकर हाथ हिलाकर तुझे बुलाते हैं। विनाश के शोर से सदा छोटे प्राणियों को ही लाभ मिलता है। दूसरे शब्दों में, क्रांति से निम्न व दलित वर्ग को अपने अधिकार मिलते हैं।
विशेषः
(1) कवि ने बादल को क्रांति और विद्रोह का प्रतीक माना है।
(2) कवि का प्रगतिवादी दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।
(3) प्रतीकात्मकता का समावेश है।
(4) प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
(5) बार-बार, सुन-सुन, हिल-हिल, शत-शत, खिल-खिल में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार तथा ‘हाथ हिलाने’ में अनुप्रास अलंकार है।
(6) ‘हृदय थामना’, ‘हाथ हिलाना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
(7) तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।
(8) वीर रस है।
(9) मुक्तक छंद है।

प्रश्न
(क) संसार के भयभीत होने का क्या कारण हैं?
उत्तरः (क) बादल भयंकर मूसलाधार बारिश करते हैं तथा वज्र के समान कठोर गर्जना करते हैं। इस भीषण गर्जना को सुनकर प्रलय की आशंका से संसार भयभीत हो जाता है।

(ख) क्रांति की गर्जना पर कौन है?

उत्तरः (ख) क्रांति की गर्जना से निम्न वर्ग के लोग हँसते हैं क्योंकि इस क्रांति से उन्हें कोई नुकसान नहीं होता, अपितु उनका शोषण समाप्त हो जाता है। उन्हें उनका खोया अधिकार मिल जाता है।

(ग) गगन-स्पर्शी स्पद्र्धा -धीर- कौन है?
उत्तरः (ग) गगन-स्पर्शी स्पद्र्धा धीर वे पूँजीपति लोग हैं जो अत्यधिक धन कमाना चाहते हैं। वे संसार के अमीरों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए होड़ लगाए रहते हैं।

(घ) लघुभार, शस्य अपार किनके प्रतीक हैं। वे बादलों का स्वागत किस प्रकार करते हैं?
उत्तरः (घ) लघुभार वाले छोटे-छोटे पौधे किसान-मजदूर वर्ग के प्रतीक हैं। वे झूम-झूमकर खुश होते हैं तथा हाथ हिला-हिलाकर बादलों का स्वागत करते हैं।

3.
अट्टालिका नहीं है रे
आंतकदृभवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।
रुद्ध कोष हैं, क्षुब्ध तोष
अंगना- अंग से लिपटे भी
आतंक अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्र-गर्जन से बादल!
त्रस्त-नयन मुख ढाँप रहे हैं।  
शब्दार्थः अट्टालिका-अटारी, महल। आतंक-भवन- भय का निवास। यक- कीचड़। प्लावन- बाढ़। क्षुद्र- तुच्छ। प्रफुल- खिला हुआ, प्रसन्न। जलज- कमल। नीर- पानी। शोक- दुःख। शैशव- बचपन। सुकुमार- कोमल। रुदध- रुका हुआ। कोष- खजाना। क्षुब्ध- कुद्ध। तोष- शांति। अंगना- पत्नी। अंग-शरीर। अक- गोद। वज्र-गर्जन- वज्र के समान गर्जन। त्रस्त- भयभीत।
सन्दर्भः प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।
प्रसंगः इसमें कवि ने बादल को विप्लव व क्रांति का प्रतीक मानकर उसका आहवान किया है।
व्याख्याः कवि कहता है कि पूँजीपतियों के ऊँचे-ऊँचे भवन मात्र भवन नहीं हैं अपितु ये गरीबों को आतंकित करने वाले भवन हैं। ये सदैव गरीबों का शोषण करते हैं। वर्षा से जो बाढ़ आती है, वह सदा कीचड़ से भरी धरती को ही डुबोती है। भयंकर जल-प्लावन सदैव कीचड़ पर ही होता है। यही जल जब कमल की पंखुडि़यों पर पड़ता है तो वह अधिक प्रसन्न हो उठता है। प्रलय से पूँजीपति वर्ग ही प्रभावित होता है। निम्न वर्ग में बच्चे कोमल शरीर के होते हैं तथा रोग व कष्ट की दशा में भी सदैव मुस्कराते रहते हैं। वे क्रांति होने में भी प्रसन्न रहते हैं। पूँजीपतियों ने आर्थिक साधनों पर कब्जा कर रखा है। उनकी धन इकट्ठा करने की इच्छा अभी भी नहीं भरी है। इतना धन होने पर भी उन्हें शांति नहीं है। वे अपनी प्रियाओं से लिपटे हुए हैं फिर भी बादलों की गर्जना सुनकर काँप रहे हैं। वे क्रांति की गर्जन सुनकर भय से अपनी आँखें बँद किए हुए हैं तथा मुँह को छिपाए हुए हैं।
विशेषः
(1) कवि ने पूँजीपतियों के विलासी जीवन पर कटाक्ष किया है।
(2) प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग है।
(3) तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।
(4) पंक पर, अंगना-अंग, आतंक अंक में अनुप्रास अलंकार है।
(5) मुक्तक छंद है।
प्रश्न
(क) ‘पक’ और ‘अट्टालिका’ किसके प्रतीक हैं?
उत्तरः (क) ‘पंक’ आम आदमी का प्रतीक है तथा ‘अट्टालिका’ शोषक पूँजीपतियों का प्रतीक है।

(ख) शैशव का सुकुमार शरीर किसमें हँसता रहता हैं?
उत्तरः (ख) शैशव का सुकुमार शरीर रोग व शोक में भी हँसता रहता है। दूसरे शब्दों में, निम्न वर्ग कष्ट में भी प्रसन्न रहता है।

(ग) धनिक वर्ण के लोग किससे भयभीत हैं? वे भयभीत होने पर क्या कर रहे हैं?
उत्तरः (ग) फूलोगक्रांतसे भावी हैं। वे अपान पिलयों कागदमें लोहुएहैं तथा भायसेअन ऑों व मुँ को ढँक रहे हैं।

(घ) कवि ने भय को कैसे वर्णित किया है?
उत्तरः (घ) कवि ने बादलों की गर्जना से धनिकों की सुखी जिंदगी में खलल दिखाया है। वे सुख के क्षणों में भी भय से काँप रहे हैं। इस प्रकार भय का चित्रण सटीक व सजीव है।

4.
जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया हैं उसका सार,
हाड़-मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार!
शब्दार्थः जीर्ण-पुरानी, शिथिल। बहु-भुजा। शीर्ण-कमजोर। कृषक- किसान। अधीर- व्याकुल। विप्लव- विनाश। सार- प्राण। हाड़-मात्र- केवल हड्डयों का ढाँचा। पारावार- समुद्र।
सन्दर्भः प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।
प्रसंगः इसमें कवि ने बादल को विप्लव व क्रांति का प्रतीक मानकर उसका आहवान किया है।
व्याख्याः कवि कहता है कि हे विप्लव के वीर! शोषण के कारण किसान की बाँहें शक्तिहीन हो गई हैं, उसका शरीर कमजोर हो गया है। वह शोषण को खत्म करने के लिए अधीर होकर तुझे बुला रहा है। शोषकों ने उसकी जीवन-शक्ति छीन ली है, उसका सार तत्व चूस लिया है। अब वह हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया है। हे जीवन-दाता! तुम बरस कर किसान की गरीबी दूर करो। क्रांति करके शोषण को समाप्त करो।
विशेषः
(1) कवि ने किसान की दयनीय दशा का सजीव चित्रण किया है।
(2) विद्रोह की भावना का वर्णन किया है।
(3) ‘शीर्ण शरीर’ में अनुप्रास अलंकार है तथा काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है।
(4) तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।
(5) मुक्तक छंद है।
(6) संबोधन शैली का भी प्रयोग है।
(7) चित्रात्मक शैली है।
प्रश्न
(क) ‘विप्लव के वीर!’ किसे कहा गया हैं? उसका आहवान क्यों किया जा रहा हैं?
उत्तरः (क) विप्लव के वीर! बादल को कहा गया है। बादल क्रांति का प्रतीक है। क्रांति द्वारा विषमता दूर करने तथा किसानमजदूर वर्ग का जीवन खुशहाल बनाने के लिए उसको बुलाया जा रहा है। किसान और मजदूर वर्ग की दुर्दशा का कारण पूँजीपतियों द्वारा उनका शोषण किया जाना है।

(ख) कवि ने किसकी दुर्दशा का वर्णन किया है?
उत्तरः (ख) कवि ने भारतीय किसान की दुर्दशा का वर्णन किया है।

(ग) भारतीय कृषक की दुर्दशा के बारे में बताइए।
(ग) भारतीय कृषक पूरी तरह शोषित है। वह गरीब व बेसहारा है। शोषकों ने उससे जीवन की सारी सुविधाएँ छीन ली हैं। उसका शरीर हड्डयों का ढाँचा मात्र रह गया है।

(घ) ‘जीवन के पारावार’ किसे कहा गया हैं तथा क्यों?
उत्तरः (घ) ‘जीवन के पारावार’ बादल को कहा गया है। बादल वर्षा करके जीवन को बनाए रखते हैं। फसल उत्पन्न होती है तथा पानी की कमी दूर होती है। इसके अलावा क्रांति से शोषण समाप्त होता है और जीवन खुशहाल बनता है।
काव्य-सौंदर्य बोध संबंधी प्रश्न

1. निम्नलिखित काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष
अंगना-अग से लिपट भी
आतंक अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्र-गर्जन से बादल
त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे हैं।
जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,

तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया हैं उसका सार,
धनी, वज-गजन से बादल।
त्रस्त-नयन मुख ढाँप रहे हैं।
ऐ जीवन के पारावार !
प्रश्न
(क) धनिकों और कृषकों के लिए प्रयुक्त विशेषणों का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ख) ‘विल्पव के वीर’ शब्द के सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए।
(ग) इस कव्यांस की भाषिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-

(क) कवि ने धनिकों के लिए रुद्ध, आतंक, त्रस्त आदि विशेषणों का प्रयोग किया है। ये उनकी घबराहट की दशा को बताते हैं। कृषकों के लिए जीर्ण, शीर्ण, अधीर आदि प्रयुक्त विशेषणों से किसानों की दीन-हीन दशा का चित्रण होता है।
(ख) ‘विप्लव के वीर’ शब्द का प्रयोग बादल के लिए किया गया है। बादल को क्रांति का अग्रणी माना गया है। बादल हर तरफ विनाश कर सकता है। इस विनाश के उपरांत भी बादल का अस्तित्व ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
(ग) इस काव्यांश में कवि ने विशेषणों का सुंदर प्रयोग किया है। आतंक, वज्र, जीर्ण-शीर्ण आदि विशेषण मनरू स्थिति को सटीक रूप से व्यक्त करते हैं। तत्सम शब्दावली का सुंदर प्रयोग है। खड़ी बोली में सहज अभिव्यक्ति है। संबोधन शैली भी है। अनुप्रास अलंकार की छटा है।

2. अशानि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पद्र्धा धीर,
हँसते हैं छोटे पैधे लघुभार-
शस्य अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल,
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते,
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।        
प्रश्न
(क) आशय स्पष्ट कीजिए-‘  विप्लव रव से छोटे ही हैं शोभा पाते‘।
(ख) पवत के लिए प्रयुक्त विशेषणों का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ग) वज्रपात करने वाले भीषण बादलों का छोटे पौधे कैसे आहवान करते हैं और क्यों?
उत्तर-
(क) इसका आशय यह है कि क्रांति से शोषक वर्ग हिल जाता है। उसे इससे अपना विनाश दिखाई देता है। किसान-मजदूर वर्ग अर्थात शोषित वर्ग क्रांति से प्रसन्न होता है। क्योंकि उन्हें इससे शोषण से मुक्ति तथा खोया अधिकार मिलता है।
(ख) पर्वत के लिए निम्नलिखित विशेषणों का प्रयोग किया गया है-
● अशनि-पात से शापित- यह विशेषण उन पर्वतों के लिए है जो बिजली गिरने से भयभीत हैं। क्रांति से बड़े लोग ही भयभीत होते हैं। इस विशेषण का प्रयोग संपूर्ण शोषक वर्ग के लिए किया गया है।
● क्षत-विक्षत हत अचल शरीर- यह विशेषण क्रांति से घायल, भयभीत व सुन्न होकर बिखरे हुए शोषकों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
(ग) वज्रपात करने वाले भीषण बादलों का आहवान छोटे पौधे हिल-हिलकर, खिल-खिलकर तथा हाथ हिलाकर करते हैं क्योंकि क्रांति से ही उन्हें न्याय मिलने की आशा होती है। उन्हें ही सर्वाधिक लाभ पहुँचता है।

3. अट्टालिका नहीं है रे
आंतक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
क्षुद्र प्रफुल्ल जलजे सँ
सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।  
प्रश्न
(क) काव्यांश की दो भाषिक विशेषताओं का उल्लख कीजिए।
(ख) काव्यांश की अलंकार-योजना पर प्रकाश डालिए।
(ग) काव्यांश की भाव-सौंदर्य लिखिए ।
उत्तर-
(क) काव्य की दो भाषिक विशेषताएँ
(प) तत्सम शब्दावली की बहुलतायुक्त खड़ी बोली।
(पप) भाषा में प्रतीकात्मकता है।
(ख) शोक में भी हँसता है-विरोधाभास अलंकार।
 (ग) कवि के अनुसार धनियों के आवास शोषण के केंद्र हैं। यहाँ सदा शोषण के नए-नए तरीके ढूँढ़े जाते हैं। लेकिन शोषण की चरम-सीमा के बाद होने वाली क्रांति शोषण का अंत कर देती है। साथ ही शोषित वर्ग के बच्चे भी संघर्षशील तथा जुझारू होते हैं। वे रोग तथा शोक में भी प्रसन्नचित्त रहते हैं।

5. तिरती हैं समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निदय विप्लव की प्लावित माया-
यह तेरी रण-तरी
भरी आकाक्षाआों से,
घन, भरी-गजन से सजग सुप्त अकुर।
प्रश्न
(क) काव्याशा का भाव-सौंदर्य लिखिए।
(ख) प्रयुक्त अलकार का नाम लिखिए और उसका सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ग) काव्यांश की भाषा पर टिपण्णी कीजिए ।
उत्तर-
(क) इस काव्यांश में कवि ने बादल को क्रांति का प्रतीक माना है। वह कहता है कि जीवन के सुखों पर दुखों की अदृश्य क्षति ही है। बालक शो सुलेह पृथ के पापं में बिजअंकुल हक आक्शक ओ निहारते हैं।
(ख) ‘समीर सागर’, ‘विप्लव के बादल’, ‘दुख की छाया में’ रूपक अलंकारय ‘फिर-फिर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार तथा ‘सजग सुप्त’ में अनुप्रास अलंकार हैं। इन अलंकारों के प्रयोग से भाषिक सौंदर्य बढ़ गया है।
(ग) काव्यांश में प्रयुक्त भाषा संस्कृत शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है जिसमें दृश्य बिंब साकार हो उठा है। ‘मेरी गर्जन’ में बादलों की गर्जना से श्रव्य बिंब उपस्थित है।

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पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न
कविता के साथ
1. ‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया’ पंक्ति में ‘दुख की छाया’ किसे कहा गया हैं और क्यों?
उत्तर- कवि ने ‘दुख की छाया’ मानव-जीवन में आने वाले दुखों, कष्टों को कहा है। कवि का मानना है कि संसार में सुख कभी स्थायी नहीं होता। उसके साथ-साथ दुख का प्रभाव रहता है। धनी शोषण करके अकूत संपत्ति जमा करता है परंतु उसे सदैव क्रांति की आशंका रहती है। वह सब कुछ छिनने के डर से भयभीत रहता है।
2. ‘अशानि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर ‘ पंक्ति में किसकी ओर संकेत किया है?
उत्तर- इस पंक्ति में कवि ने पूँजीपति या शोषक या धनिक वर्ग की ओर संकेत किया है। ‘बिजली गिरना’ का तात्पर्य क्रांति से है। क्रांति से जो विशेषाधिकार-प्राप्त वर्ग है, उसकी प्रभुसत्ता समाप्त हो जाती है और वह उन्नति के शिखर से गिर जाता हैं। उसका गर्व चूर-चूर हो जाता है।
3. ‘ विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते‘ पंक्ति में ‘विप्लव-रव‘ से क्या तात्पर्य है? ‘छोटे ही है हैं शोभा पाते ‘एसा क्यों कहा गया है?
उत्तर- विप्लव-रव से तात्पर्य है-क्रांति-गर्जन। जब-जब क्रांति होती है तब-तब शोषक वर्ग या सत्ताधारी वर्ग के सिंहासन डोल जाते हैं। उनकी संपत्ति, प्रभुसत्ता आदि समाप्त हो जाती हैं। कवि ने कहा है कि क्रांति से छोटे ही शोभा पाते हैं। यहाँ ‘छोटे’ से तात्पर्य है-आम आदमी। आम आदमी ही शोषण का शिकार होता है। उसका छिनता कुछ नहीं है अपितु उसे कुछ अधिकार मिलते हैं। उसका शोषण समाप्त हो जाता है।

4. बादलों के आगमन से प्रकृति में होने वाले किन-किन परिवर्तनों को कविता रेखांकित करती हैं?’
उत्तर- बादलों के आगमन से प्रकृति में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं
(1) बादल गर्जन करते हुए मूसलाधार वर्षा करते हैं।
(2) पृथ्वी से पौधों का अंकुरण होने लगता है।
(3) मूसलाधार वर्षा होती है।
(4) बिजली चमकती है तथा उसके गिरने से पर्वत-शिखर टूटते हैं।
(5) हवा चलने से छोटे-छोटे पौधे हाथ हिलाते से प्रतीत होते हैं।
(6) गरमी के कारण दुखी प्राणी बादलों को देखकर प्रसन्न हो जाते हैं।
5.व्याख्या कीजिए-
(क) तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-

(ख) अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
उत्तर-
इनकी व्याख्या के लिए क्रमशरू व्याख्या-1 व 3 देखिए।
कला की बात
1. पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। आपको प्रकृति का कौन-सा मानवीय रूप पसंद आया और क्यों ?
उत्तर-
कवि ने पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण किया है। मुझे प्रकृति का निम्नलिखित मानवीय रूप पसंद आया-
हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार-
शस्य अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल,
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते,

इस काव्यांश में छोटे-छोटे पौधों को शोषित वर्ग के रूप में बताया गया है। इनकी संख्या सर्वाधिक होती है। ये क्रांति की संभावना से प्रसन्न होते हैं। ये हाथ हिला-हिलाकर क्रांति का आहवान करते हुए प्रतीत होते हैं। यह कल्पना अत्यंत सुंदर है।
2. कविता में रूपक अलंकार का प्रयोग कहाँ-कहाँ हुआ है ? संबंधित वाक्यांश को छाँटकर लिखिए ।
उत्तर-
रूपक अलंकार के प्रयोग की पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं-
● तिरती है समीर-सागर पर
● अस्थिर सुख पर दुख की छाया
● यह तेरी रण-तरी

● भेरीदृगर्जन से सजग सुप्त अंकुर
● ऐ विप्लव के बादल
● ऐ जीवन के पारावार
3. इस कविता में बादल के लिए ‘ऐ विप्लव के वीर! ‘तथा‘  के ‘ ऐ जीवन के पारावार!’ जैसे संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है। ‘ बादल राग ‘कविता के शेष पाँच खंडों में भी कई संबोधानें का इस्तेमाल किया गया है। जैसे- ‘ओर वर्ष के हर्ष !’ मेरे पागाल बादल !, ऐ निर्बंध !, ऐ स्वच्छंद! , ऐ उद्दाम! ,
ऐ सम्राट! ,ऐ विप्लव के प्लावन! , ऐ अनंत के  चंचल शिशु सुकुमार! उपर्युक्त संबोधनों की व्याख्या करें तथा बताएँ कि बादल के लिए इन संबोधनों का क्या औचित्य हैं?
उत्तर-
इन संबोधनों का प्रयोग करके कवि ने न केवल कविता की सार्थकता को बढ़ाया है, बल्कि प्रकृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपादान का सुंदर चित्रण भी किया है। बादल के लिए किए संबोधनों की व्याख्या इस प्रकार है-
4. कवि बादलों को किस रूप में देखता हैं? कालिदास ने ‘मेघदूत’ काव्य में मेघों को दूत के रूप में देखाध्अप अपना कोई काल्पनिक बिंब दीजिए।
उत्तर-
कवि बादलों को क्रांति के प्रतीक के रूप में देखता है। बादलों के द्वारा वह समाज में व्याप्त शोषण को खत्म करना चाहता है ताकि शोषित वर्ग को अपने अधिकार मिल सकें। काल्पनिक बिंब- हे आशा के रूपक हमें जल्दी ही सिक्त कर दो अपनी उजली और छोटी-छोटी बूंदों से जिनमें जीवन का राग छिपा है। हे आशा के संचारित बादल!

5. कविता को प्रभावी बनाने के लिए कवि विशेषणों का सायास प्रयोग करता हैं जैसे-अस्थिर सुख। सुख के साथ अस्थिर विशेषण के प्रयोग ने सुख के अर्थ में विशेष प्रभाव पैदा कर दिया हैं। ऐसे अन्य विशेषणों को कविता से छाँटकर लिखें तथा बताएँ कि ऐसे शब्द-पदों के प्रयोग से कविता के अर्थ में क्या विशेष प्रभाव पैदा हुआ हैं?
उत्तर-
कविता में कवि ने अनेक विशेषणों का प्रयोग किया है जो निम्नलिखित हैं
(प) निर्दय विप्लव- विनाश को अधिक निर्मम व विनाशक बताने हेतु ‘निर्दय’ विशेषण।
(पप) दग्ध हृदय- दुख की अधिकता व संतप्तता हेतु’दग्ध’विशेषण।
(पपप) सजग- सुप्त अंकुर- धरती के भीतर सोए, किंतु सजग अंकुर-हेतु ‘सजग-सुप्त’ विशेषण।
(पअ) वज्रहुंकार- हुंकार की भीषणता हेतु ‘वज्र’ विशेषण।
(अ) गगन-स्पर्शी- बादलों की अत्यधिक ऊँचाई बताने हेतु ‘गगन’।
(अप) आतंक-भवन- भयावह महल के समान आतंकित कर देने हेतु।
(अपप) त्रस्त नयन- आँखों की व्याकुलता।
(अपपप) जीर्ण बाहु- भुजाओं की दुर्बलता।
(पÛ) प्रफुल्ल जलज- कमल की खिलावट।
(Û) रुदध कोष- भरे हुए खजानों हेतु।
अन्य हल प्रश्न
लघूत्तरात्मक प्रश्न
1. ‘बादल राग ‘ कविता के आधार पर भाव स्पष्ट कीजिए-
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।
अथवा
‘बादल राग’ कविता में कवि ने बादलों के बहाने क्रांत का आहवान किया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-‘विप्लव-रव’ से तात्पर्य है-क्रांति का स्वर। क्रांति का सर्वाधिक लाभ शोषित वर्ग को ही मिलता है क्योंकि उसी के अधिकार छीने गए होते हैं। क्रांति शोषक वर्ग के विशेषाधिकार खत्म होते हैं। आम व्यक्ति को जीने के अधिकार मिलते हैं। उनकी दरिद्रता दूर होती है। अतरू क्रांति की गर्जना से शोषित वर्ग प्रसन्न होता है।

2. क्रांति की गर्जना का शोषक वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ता है? उनका मुख ढँकना किस मानसिकता का द्योतक है? ‘बादल राग‘ कविता के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर-
शोषक वर्ग ने आर्थिक साधनों पर एकाधिकार जमा लिया है, परंतु क्रांति की गर्जना सुनकर वह अपनी सत्ता को खत्म होते देखता है। वह बुरी तरह भयभीत हो जाता है। उसकी शांति समाप्त हो जाती है। शोषक वर्ग का मुख ढाँकना उसकी कमजोर स्थिति को दर्शाता है। क्रांति के परिणामों से शोषक वर्ग भयभीत है।

3.”‘बादल राग ‘ जीवन-निर्माण के नए राग का सूचक है। ” स्पष्ट कीजिए।  
उत्तर-‘ बादल राग’ कविता में कवि ने लघु-मानव की खुशहाली का राग गाया है। वह आम व्यक्ति के लिए बादल का आहवान क्रांति के रूप में करता है। किसानों तथा मजदूरों की आकांक्षाएँ बादल को नवनिर्माण के राग के रूप में पुकार रही हैं। क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है। बादलों के अंग-अंग में बिजलियाँ सोई हैं, वज्रपात से शरीर आहत होने पर भी वे हिम्मत नहीं हारते। गरमी से हर तरफ सब कुछ रूखा-सूखा और मुरझाया-सा है। धरती के भीतर सोए अंकुर नवजीवन की आशा में सिर ऊँचा करके बादल की ओर देख रहे हैं। क्रांति जो हरियाली लाएगी, उससे सबसे अधिक उत्फुल्ल नए पौधे, छोटे बच्चे ही होंगे।
4. ‘बादल राग ‘कविता में ‘ऐ विप्लव के वीर’ किसे कहा गया हैं और क्यों?
उत्तर-‘बादल राग’ कविता में ‘ऐ विप्लव के वीर!’ बादल को कहा गया है। बादल घनघोर वर्षा करता है तथा बिजलियाँ गिराता है। इससे सारा जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। बादल क्रांति का प्रतीक है। क्रांति आने से बुराई रूपी कीचड़ समाप्त हो जाता है तथा आम व्यक्ति को जीने योग्य स्थिति मिलती है।
5. ‘बादल राग’ शीर्षिक की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर-‘बादल राग’ क्रांति की आवाज का परिचायक है। यह कविता जनक्रांति की प्रेरणा देती है। कविता में बादलों के आने से नए पौधे हर्षित होते हैं, उसी प्रकार क्रांति होने से आम आदमी को विकास के नए अवसर मिलते हैं। कवि बादलों का बारिश करने या क्रांति करने के लिए करता है। यह शीर्षक उद्देश्य के अनुरूप है। अतरू यह शीर्षक सर्वथा उचित है।
6. विप्लवी बादल कीयुद्ध-नौका कीकौन-कौन-सी विशेषताएँ बताई गाए है?
उत्तर- कवि ने विप्लवी बादल की युद्ध-नौका की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई हैं
(प) यह समीर-सागर में तैरती है।
(पप) यह भेरी-गर्जन से सजग है।
(पपप) इसमें ऊँची आकांक्षाएँ भरी हुई हैं।
7. प्रस्तुत पद्यश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
अट्टालिका नहीं है रे
आतक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लवन
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।

(क) कवि अट्टालिकाओं को आतंक-भवन क्यों मानता है?
(ख) ‘पंक’ और ‘जलज’ का प्रतीकार्थ बताइए।
(ग) आशय स्पष्ट कीजिए-
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन।
(घ) शिशु का उल्लेख यहाँ क्यों किया गया है?
उत्तर-
(क) धनिकों के आवासों को ‘आतंक-भवन’ की संज्ञा दी गई है क्योंकि इन भवनों में शोषण के नए-नए तरीके खोजे जाते हैं। ये आवास शोषण से लूटी गई संपत्ति के केंद्र भी होते हैं।
(ख) ‘पंक’ का प्रतीकार्थ है-साधारण शोषित एवं उपेक्षित लोगों का तथा ‘अट्टालिका’ शोषक पूँजीपतियों का प्रतीक है।
(ग) ‘सदा पंक पर ही होताध्जल-विप्लव प्लावन’ का आशय है-वर्षा से जो बाढ़ आती है वह सदा कीचड़-भरी धरती को ही डुबोती है। अर्थात शोषण की मार सबसे अधिक दबे-कुचले और गरीबों को ही झेलनी पड़ती है।
8. ‘बादल राग ‘ कविता में कवि निराला की किस क्रांतिकारी विचारधारा का पता चलता हैं?
उत्तर- ‘बादल राग’ कविता में कवि की क्रांतिकारी विचारधारा का ज्ञान होता है। वह समाज में व्याप्त पूँजीवाद का घोर विरोध करता हुआ दलित-शोषित वर्ग के कल्याण की कामना करता हुआ, उन्हें समाज में उचित स्थान दिलाना चाहता है। कवि ने बादलों की गर्जना, बिजली की कड़क को जनक्रांति का रूप बताया है। इस जनक्रांति में धनी वर्ग का पतन होता है और छोटे वर्ग-मजदूर, गरीब, शोषित आदि-उन्नति करते हैं।
9. ‘बादल राग’ कविता में अट्टालिकाओं को आतंक-भवन क्यों कहा गया है?
उत्तर-‘बादल राग’ कविता में अट्टालिकाओं को आतंक-भवन इसलिए कहा गया है क्योंकि इन भवनों में शोषण के नए-नए तरीके खोजे जाते हैं। ये ऊँचे-ऊँचे भवन शोषण से लूटी गई संपत्ति के केंद्र होते हैं।

Rubaiya Gazal Class 12th Poem Summary

Rubaiya Gazal Class 12th Poem Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों

आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग- 2 का पाठ 9 पढ़ेंगे

रुबाइयां’ व ‘गज़ल

Rubaiya & Gazal Class 12th Chapter 9 Hindi Aroh Part 2

कविताओं के रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं।

कविता के सार और व्याख्या समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

कवि परिचय: फ़िराक गोरखपुरी

Firaq Gorakhpuri

जीवन परिचय: फ़िराक गोरखपुरी उर्दू-फ़ारसी के जाने-माने शायर थे। इनका जन्म 28 अगस्त, सन 1896 को गोरखपुर में हुआ था। इनका मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ था। इन्होंने रामकृष्ण की कहानियों से अपनी शिक्षा की शुरुआत की। बाद में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण की। 1917 ई० में ये डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुए, परंतु स्वतंत्रता आंदोलन के कारण इन्होंने 1918 ई० में इस पद को त्याग दिया। आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण सन 1920 में इन्हें डेढ़ वर्ष की जेल हुई। ये इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विषय के अध्यापक भी रहे। इन्हें ‘गुले-नग्मा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड मिला। सन 1983 में इनका निधन हुआ।

इनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं: गुले-नग्मा, बज्में जिंदगी: रंगे-शायरी, उर्दू गजलगोई।

काव्यगत विशेषताएँ: उर्दू शायरी साहित्य का बड़ा हिस्सा रुमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभरकर सामने आए हैं। नजीर अकबराबादी, इल्ताफ हुसैन हाली जैसे कुछ शायरों ने इस परंपरा को तोड़ा है, फिराक गोरखपुरी भी उनमें से एक हैं। फ़िराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है। इंसान के हाथों इंसान पर जो गुजरती है, उसकी तल्ख सच्चाई और आने वाले कल के प्रति एक उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर उन्होंने अपनी शायरी का अनूठा महल खडा किया।

भाषा-शैली: उर्दू शायरी अपने लाक्षणिक प्रयोगों और चुस्त मुहावरेदारी के लिए प्रसिद्ध है। शेर लिखे नहीं, कहे जाते हैं। यह एक तरह का संवाद होता है। मीर, गालिब की तरह फिराक ने भी इस शैली को साधकर आम-आदमी या साधारण-जन से अपनी बात कही है।

प्रतिपादय एवं सार: रुबाइयां

(क) रुबाइयाँ

प्रतिपादय: फ़िराक की रुबाइयाँ उनकी रचना ‘गुले-नग्मा’ से उद्धृत हैं। रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन शैली है। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक मिलाया जाता है और तीसरी पंक्ति स्वतंत्र होती है। इन रुबाइयों में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है। इन्हें पढ़ने से सूरदास के वात्सल्य वर्णन की याद आती है।

सार: इस रचना में कवि ने वात्सल्य वर्णन किया है। माँ अपने बच्चे को आँगन में खड़ी होकर अपने हाथों में प्यार से झुला रही है। वह उसे बार-बार हवा में उछाल देती है जिसके कारण बच्चा खिलखिलाकर हँस उठता है। वह उसे साफ़ पानी से नहलाती है तथा उसके उलझे हुए बालों में कंघी करती है। बच्चा भी उसे प्यार से देखता है जब वह उसे कपड़े पहनाती है। दीवाली के अवसर पर शाम होते ही पुते व सजे हुए घर सुंदर लगते हैं। चीनी-मिट्टी के खिलौने बच्चों को खुश कर देते हैं। वह बच्चों के छोटे घर में दीपक जलाती है जिससे बच्चों के सुंदर चेहरों पर दमक आ जाती है। आसमान में चाँद देखकर बच्चा उसे लेने की जिद पकड़ लेता है। माँ उसे दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाती है और उसे कहती है कि दर्पण में चाँद उतर आया है। रक्षाबंधन एक मीठा बंधन है। रक्षाबंधन के कच्चे धागों पर बिजली के लच्छे हैं। सावन में रक्षाबंधन आता है। सावन का जो संबंध झीनी घटा से है, घटा का जो संबंध बिजली से है वहीं संबंध भाई का बहन से है।

व्याख्या: 

आंगन में लिये चांद के टुकड़े को खड़ी

हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी

रह-रह के हवा में जो लोका देती है

गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हंसी

संदर्भ: प्रस्तुत रुबाई आरोह पाठ्यपुस्तक से अवतरित की गयी है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं।

प्रसंग: शायर ने यहां पर लोक-जीवन से जुड़े हुए कुछ पारंपरिक और धरेलु दृश्यों को अपनी शायरी में पेश किया है।

व्याख्या: यहां पर एक माता और उसके नन्हे बच्चे के प्रेम और खेल के आनंद का चित्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमें कि एक पुत्रवती महिला अपने घर के आंगन में अपने प्यारे और नन्हे से बच्चे को अपने दोनों हाथों में झूला झुला रही है। बीच-बीच में वह बच्चे को हवा में उछाल भी देती है। तब बच्चा खिलखिलाकर हंसता है। उसकी किलकारियों से आंगन गूंजने लगता है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस है।

2 दृश्य-बिंबों से शायरी भरी पड़ी है, जैसे – ‘हाथों पे झुलाती है’, ‘हवा में जो लोका देती है’, -खिलखिलाते बच्चे की हंसी’,

3 ‘आंगन में लिये चांद के टुकड़े को खड़ी’ – रूपक अलंकार।

4 ‘चांद के टुकडे़’ में मुहावरा प्रयोग।

5 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

6 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

नहला के छलके-छलके निर्मल जल से

उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके

किस प्यार से देखता है बच्चा मुंह को

जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े

व्याख्या: शायर ने दूसरा चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें मां ने अपने बच्चे को साफ पानी से नहला दिया है। फिर उसके उलझे हुए बालों को कंघी से सुलझा दिया है। जब मां उसे अपने दोनों घुटनों के बीच में फंसा कर कपड़े पहनाती है, तब बच्चा अपनी माता को बेहद प्यार भरी आंखों से निहारता है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस है।

2 दृश्य बिंब – ‘उलझे हुए गेसुओं में’, ‘घुटनियों में लेके है पिन्हाती कपड़े’,

3 ‘नहला के छलके-छलके निर्मल जल से’- अनुप्रास अलंकार।

4 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

5 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

दीवाली की शाम घर पुते और सजे

चीनी के खिलौने जगमगाते लावे

वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक

बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए

व्याख्या: तीसरी रुबाई में दीपावली का बिंब है। दीपावली के त्योहार की शाम का समय है। सभी घर पुते और सजे हुए हैं। शक्कर के खिलौने बच्चों के लिये लाये गये हैं। दियों में लाई भरी हुई है। ऐसे में एक सुंदर माता, जिसका मुख कोमलता और स्नेह से चमक रहा है, अपने नन्हे बच्चे के बनाये हुए घरौंदे में भी दीपक जलाकर रख रही है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस है।

2 दृष्य बिंब – ‘घरौंदे में जलाती है दिए’।

3 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

4 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

आंगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है

बालक तो हई चांद पै ललचाया है

दर्पण उसे दे के कह रही है मां

देख आईने में चांद उतर आया है

व्याख्या: यहां पर एक रूठे हुए बच्चे का बिंब है। एक हठी बच्चा घर के आंगन में रो रहा है। उसका रोना साधारण रोना नहीं है। ठुनकना है। जिसमें आग्रह है, प्रेम है, और अपनी इच्छा पूरी कराने का दबाव भी है। असल में वह आसमान में जगमगाने वाले चांद को पाने के लिये हठ ठाने हुए है। इसके उपाय में मां ने यह किया कि उसे आईना दिखाकर कहा कि लो चांद तुम्हारे आईने में उतर आया है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस।

2 दृश्य बिंब – ‘आंगन में ठुनक रहा है’, ‘आईने में चांद उतर आया है’।

3 ‘देख आईने में चांद उतर आया है’- मानवीकरण अलंकार।

4 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

5 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली

छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी

बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे

भाई के है बांधती चमकती राखी

व्याख्या: इस रुबाई में रक्षाबंधन के त्यौहार का चित्रण है। भाद्र माह में आने वाले रक्षाबंधन के त्यौहार पर सबेरे से ही आनंद और मिठास का वातावरण बन गया है। जल की फुहारें बरस रही हैं। आकाश में हल्की घटाएं छायी हैं। राखी के धागे भी बिजली की तरह चमक रहे हैं। ऐसी चमकदार राखियां, बहनें अपने भाईयों की कलाई पर बांध रही हैं।

पद विशेष:

1 शांत रस है।

2 दृश्य बिंब – ‘छायी है घटा’, ‘भाई के है बांधती चमकती राखी’

3 ‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे’ – उपमा अलंकार।

4 लोकभाषा का प्रयोग हुआ है।

5 उर्दू-हिंदी से मिलकर बनी हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग हुआ है।

6 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

प्रतिपाद्य और सार: गज़ल

(ख) गजल

प्रतिपादय: रुबाइयों की तरह फ़िराक की गजलों में भी हिंदी समाज और उर्दू शायरी की परंपरा भरपूर है। इस गजल में दर्द और पीड़ा के साथ-साथ शायर की ठसक भी अंतर्निहित है।

सार- इस गजल के माध्यम से शायर कहता है कि लोगों ने हमेशा उस पर कटाक्ष किए हैं और साथ ही उसकी किस्मत ने भी कभी उसका साथ नहीं दिया। गम उसके साथ हमेशा रहा। उसे लगता है जैसे रात का सन्नाटा उसे बुला रहा है। शायर कहता है कि इश्क वही कर सकता है जो अपना सब कुछ खो देता है। जब शराबी शराब पिलाते हैं तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आ जाती है। अंतिम शेर में वह यह स्वीकार करता है कि उसकी गजलों पर मीर की गजलों का प्रभाव है।

नौरस गुंचे पंखडियों की नाजुक गिरहैं खोले हैं

या उड़ जाने को रंगो-बू गुलशन में पर तोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में बसंत ऋतु का वर्णन किया गया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि बसंत ऋतु में नए रस से भरी कलियों की कोमल पंखुड़ियों की गाँठे खुल रही हैं। वे धीरे-धीरे फूल बनने की ओर अग्रसर हैं। ऐसा लगता है मानो रंग और सुगंध-दोनों आकाश में उड़ जाने के लिए पंख फड़फड़ा रहे हों। दूसरे शब्दों में, बाग में कलियाँ खिलते ही सुगंध फैल जाती है।

विशेष:

  1. प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर वर्णन है।
  2. उर्दू-फारसी भाषा का प्रयोग है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. बिंब योजना है।
  5. संदेह अलंकार है।
  6. रंग व खुशबू पर मानवीय क्रियाओं के आरोपण से मानवीकरण अलंकार है।

तारे आँखें झपकावें हैं जर्रा–जर्रा सोये हैं

तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में उद्धृत ‘गज़ल’ से संकलित है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने रात के तारों का सौंदर्य वर्णन किया है।

व्याख्या: शायर कहता है कि रात ढल रही है। अब तारे भी आँखें झपका रहे हैं। इस समय सृष्टि का कण-कण सो रहा है, शांत है। वह कहता है कि हे मित्रो! रात में पसरा यह सन्नाटा भी कुछ कह रहा है। यह भी अपनी वेदना व्यक्त कर रहा है।

विशेष:

  1. प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण है।
  2. ‘जर्रा-जर्रा’  में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  3. ‘सन्नाटे का बोलना’ में मानवीकरण तथा विरोधाभास अलंकार है।
  4. तारों का मानवीकरण किया गया है।
  5. उर्दू शब्दावली है।
Watch Video: Gazal

हम हों या किस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला

किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से लिया गया है। इसके रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने मनुष्य के दोषारोपण करने की प्रवृत्ति के विषय में बताया है।

व्याख्या: शायर कहता है कि संसार में मेरी किस्मत और मैं खुद दोनों ही एक जैसे हैं। हम दोनों एक ही काम करते हैं। अभाव के लिए मैं अपनी किस्मत को दोषी मानता हूँ तथा इसलिए किस्मत पर रोता हूँ। किस्मत मेरी दशा को देखकर रोती है। वह शायद मेरी हीन कर्मनिष्ठा को देखकर झल्लाती है।

विशेष:

  1. निराशा व अकर्मण्यता पर व्यंग्य है।
  2. उर्दू-फारसी शब्दों का प्रयोग है।
  3. ‘किस्मत’ को मानवीय क्रियाएँ करते हुए दिखाया गया है। अत: मानवीकरण अलंकार है।
  4. गजल छंद है।
  5. ‘हम’ कहना उर्दू की पहचान है।

जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें

मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से लिया गया है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने निंदकों पर प्रहार किया है।

व्याख्या: शायर कहता है कि संसार में कुछ लोग उसे बदनाम करना चाहते हैं। ऐसे निंदकों के लिए कवि कामना करता है कि वे केवल यह बात समझ सकें कि वे मेरी जो बुराइयाँ संसार के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, उससे खुद उनकी कमियाँ उजागर हो रही हैं। वे मेरा परदा खोलने की बजाय अपना परदा खोल रहे हैं।

विशेष:

  1. शायर ने दूसरों को बदनाम करने वालों पर व्यंग्य किया है।
  2. उर्दू भाषा का प्रयोग है।
  3. गजल छंद है।
  4. भाषा में प्रवाह है।

ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास

तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने प्रेम की कीमत अदा करने के बारे में बताया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि हम पूरे विवेक के साथ तुम्हारे प्रेम के लिए पूरी कीमत अदा कर रहे हैं। हम तुम्हारे प्रेम का सौदा करने वाले हैं, इसके लिए हम दीवाना बनने को भी तैयार हैं। कवि कहता है कि जो प्रेमी है, वह समाज की नजरों में पागल होता है।

विशेष:

  1. कवि ने प्रेम के संपूर्ण समर्पण का वर्णन किया है।
  2. उर्दू शब्दावली का प्रभावी प्रयोग है।
  3. ‘कीमत अदा करना’ मुहावरे का प्रयोग है।
  4. गजल छंद है।

तेरे गम का पासे-अदब हैं कुछ दुनिया का खयाल भी हैं

सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने प्रेम की पीड़ा को व्यक्त किया है।

व्याख्या: कवि अपनी प्रेमिका से कहता है कि मुझे तुम्हारे गम का पूरा ख्याल है। मैं तुम्हारी पीड़ा का सम्मान करता हूँ, परंतु मुझे संसार का भी ध्यान है। यदि मैं हर जगह तुम्हारे दिए दुख को सबके सामने गाता फिरूं तो दुनिया हमारे प्रेम को बदनाम करेगी। इसलिए मैं इस पीड़ा को अपने हृदय में छिपा लेता हूँ और चुपचाप अकेले में रो लेता हूँ। आशय यह है कि प्रेमी अपने दुख को संसार के सामने प्रकट नहीं करते।

विशेष:

  1. कवि ने विरह-भावना का प्रभावी चित्रण किया है।
  2. उर्दू मिश्रित हिंदी भाषा है।
  3. ‘चुपके-चुपके’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. गजल छंद है।
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

फितरत का कायम हैं तवाजुन आलमे हुस्नो-इश्क में भी

उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रेम की प्राप्ति का उपाय बताया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि प्रेम और सौंदर्य के संसार में संतुलन कायम है। इसमें हम उतना ही प्रेम पा सकते हैं जितना हम स्वयं को खोते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रेम में पहले स्वयं को मिटाना पड़ता है। जो व्यक्ति जितना अधिक समर्पण करता है, वह उतना ही प्रेम पाता है।

विशेष:

  1. कवि ने प्रेम के स्वभाव को स्पष्ट किया गया है।
  2. कबीर के साथ भाव-साम्य है जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि। मैं बपुरा खोजन चला, रहा किनारे बैठि।
  3. ‘खोकर पाने में’  विरोधाभास अलंकार है।
  4. उर्दू-मिश्रित हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. गजल छंद है।

आबो-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो

ये जगमग बैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने अपने काव्य-सृजन का आधार अपनी व्यथा बताया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि तुम्हें मेरी शायरी में जो चमक-दमक दिखाई देती है, उस पर फ़िदा मत होओ। तुम्हें अपनी आँखें खुली रखनी चाहिए अर्थात ध्यान से देखना चाहिए। मेरे शेरों में जो चमक है, वह मेरे आँसुओं की देन है। दूसरे शब्दों में, कवि की पीड़ा से उसके काव्य में दर्द उभरकर आया है।

विशेष:

  1. कवि ने विरह को काव्य के सृजन का आधार बताया है।
  2. बच्चन ने भी कहा है-
    मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
    मैं फूट पड़ा, तुम कहते छंद बनाना।
  3. ‘मोती रोले’विरह को व्यक्त करता है।
  4. ‘आँखें रखना’ मुहावरे का सुंदर प्रयोग है।
  5. उर्दू की कठिन शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
  6. ‘आबो-ताब’ में अनुप्रास अलंकार है।
  7. वियोग श्रृंगार रस है।

ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को

रात गए गर्दूं पै फ़रिश्ते बाबे-गुनह जग खोले है|

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल” से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रियजन की यादों का बखान किया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि हे प्रिय! तुम वियोग के समय में इस तरीके से याद आते हो जैसे शराब की महफ़िल में शराबियों को शराब की याद आती है तथा जैसे आधी रात के समय देवदूत आकाश में संसार के पापों का अध्याय खोलते हैं।

विशेष:

  1. विरहावस्था का सुंदर चित्रण है।
  2. ‘अंजुमने-मय, रिंदों, गर्दू, फरिश्ते, बाबे-गुनह’ आदि फ़ारसी शब्दों का सुंदर प्रयोग है।
  3. गजल छंद है।
  4. माधुर्य गुण है।
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

सदके फिराक एजाज-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज

इन गजलों के परदों में तो ‘मीर’ की गजलें बोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में शायर अपनी शायरी पर ही मुग्ध है।

व्याख्या: फिराक कहते हैं कि उसकी गजलों पर लोग मुग्ध होकर कहते हैं कि फिराक, तुमने इतनी अच्छी शायरी कहाँ से सीख ली? इन गजलों के शब्दों से हमें ‘मीर’ कवि की गजलों की-सी समानता दिखाई पड़ती है। भाव यह है कि कवि की शायरी प्रसिद्ध कवि ‘मीर’ के समान उत्कृष्ट है।

विशेष:

  1. कवि अपनी प्रशंसा स्वयं करता है।
  2. उर्दू शब्दावली की बहुलता है।
  3. गजल छंद है।
  4. ‘उड़ा लेना’ मुहावरे का अर्थ है-चुराना।
  5. गेयता है।

बच्चों! टेक्स्ट और वीडियो के माध्यम से पढ़ाया गया पाठ ‘रुबाइयां’ व ‘गज़ल आपको कैसा लगा? हमें कमेंट करके अवश्य बताएं।

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Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Summary

Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Summary, Explanation & Question Answers

हैलो बच्चो!
आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक
आरोह भाग-2 का पाठ पढ़ेंगे

  1. श्रम विभाजन और जाति प्रथा
  2. मेरी कल्पना का आदर्श समाज

This Post Includes

Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Chapter 18 Summary
बच्चों, पाठ के सार को पढ़ने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।
लेखक परिचय : बाबा साहब भीमराव
जीवन परिचय: मानव-मुक्ति के पुरोधा बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 ई० को मध्य प्रदेश के महू नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीराम जी तथा माता का नाम भीमाबाई था। 1907 ई० में हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद इनका विवाह रमाबाई के साथ हुआ। प्राथमिक शिक्षा के बाद बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन पर उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयार्क और फिर वहाँ से लंदन गए। इन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। 1923 ई० में इन्होंने मुंबई के उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। 1924 ई० में इन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की। ये संविधान की प्रारूप समिति के सदस्य थे। दिसंबर, 1956 ई० में दिल्ली में इनका निधन हो गया।

Dr. Bhim Rao Ambedkar

रचनाएँ: बाबा साहब आंबेडकर बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न व्यक्ति थे। हिंदी में इनका संपूर्ण साहित्य भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय ने ‘बाबा साहब आंबेडकर-संपूर्ण वाङ्मय’ के नाम से 21 खंडों में प्रकाशित किया है। इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं –
पुस्तकें व भाषण: दे कास्ट्स इन इंडिया, देयर मेकेनिज़्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (1917), द अनटचेबल्स, हू आर दे? (1948), हू आर द शूद्राज (1946), बुद्धा एंड हिज धम्मा (1957), थॉट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्ट्रेटेस (1955), द प्रॉब्लम ऑफ़ द रूपी (1923), द एबोल्यूशन ऑफ़ प्रोविंशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया (1916), द राइज एंड फ़ॉल ऑफ़ द हिंदू वीमैन (1965), एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936), लेबर एंड पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी (1943), बुद्धज्म एंड कम्युनिज़्म (1956)।

पत्रिकासंपादन: मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता।

साहित्यिक विशेषताएँ: बाबा साहब आधुनिक भारतीय चिंतकों में से एक थे। इन्होंने संस्कृत के धार्मिक, पौराणिक और वैदिक साहित्य का अध्ययन किया तथा ऐतिहासिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत कीं। ये इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बनकर उभरे। स्वदेश में कुछ समय इन्होंने वकालत भी की। इन्होंने अछूतों, स्त्रियों व मजदूरों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया। डॉ० भीमराव आंबेडकर भारत संविधान के निर्माताओं में से एक हैं। उन्होंने जीवनभर दलितों की मुक्ति व सामाजिक समता के लिए संघर्ष किया। उनका पूरा लेखन इसी संघर्ष व सरोकार से जुड़ा हुआ है। स्वयं डॉ० आंबेडकर को बचपन से ही जाति आधारित उत्पीड़न, शोषण व अपमान से गुजरना पड़ा था। व्यापक अध्ययन एवं चिंतन-मनन के बल पर इन्होंने हिंदुस्तान के स्वाधीनता संग्राम में एक नई अंतर्वस्तु प्रस्तुत करने का काम किया। इनका मानना था कि दासता का सबसे व्यापक व गहन रूप सामाजिक दासता है और उसके उन्मूलन के बिना कोई भी स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार रहेगी, इसलिए अधूरी होगी।

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1: श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा

पाठ का प्रतिपादय एवं सारांश
प्रतिपादय- यह पाठ बाबा साहब के विख्यात भाषण ‘एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट'(1936) पर आधारित है। इसका अनुवाद ललई सिंह यादव ने ‘जाति-भेद का उच्छेद’ शीर्षक के अंतर्गत किया। यह भाषण ‘जाति-पाँति तोड़क मंडल’ (लाहौर) के वार्षिक सम्मेलन (1936) के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था, परंतु इसकी क्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्ण सहमति न बन सकने के कारण सम्मेलन स्थगित हो गया।
सारांश-लेखक कहता है कि आज के युग में भी जातिवाद के पोषकों की कमी नहीं है। समर्थक कहते हैं कि आधुनिक सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम-विभाजन को आवश्यक मानता है। इसमें आपत्ति यह है कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए है।

श्रम-विभाजन सभ्य समाज की आवश्यकता हो सकती है, परंतु यह श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति-प्रथा श्रमिकों के अस्वाभाविक विभाजन के साथ-साथ विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है। जाति-प्रथा को यदि श्रम-विभाजन मान लिया जाए तो यह भी मानव की रुचि पर आधारित नहीं है। सक्षम समाज को चाहिए कि वह लोगों को अपनी रुचि का पेशा करने के लिए सक्षम बनाए। जाति-प्रथा में यह दोष है कि इसमें मनुष्य का पेशा उसके प्रशिक्षण या उसकी निजी क्षमता के आधार पर न करके उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर से किया जाता है। यह मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध देती है। ऐसी दशा में उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में परिवर्तन से भूखों मरने की नौबत आ जाती है। हिंदू धर्म में पेशा बदलने की अनुमति न होने के कारण कई बार बेरोजगारी की समस्या उभर आती है।
जाति-प्रथा का श्रम-विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। इसमें व्यक्तिगत रुचि व भावना का कोई स्थान नहीं होता। पूर्व लेख ही इसका आधार है। ऐसी स्थिति में लोग काम में अरुचि दिखाते हैं।
अत: आर्थिक पहलू से भी जाति-प्रथा हानिकारक है क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा, रुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें स्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।

2: मेरी कल्पना का आदर्श समाज

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प्रतिपादय: इस पाठ में लेखक ने बताया है कि आदर्श समाज में तीन तत्व अनिवार्यत: होने चाहिए-समानता, स्वतंत्रता व बंधुता। इनसे लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के अर्थ तक पहुँच सकता है।

सारांश: लेखक का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता व भ्रातृत्त पर आधारित होगा। समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए कि कोई भी परिवर्तन समाज में तुरंत प्रसारित हो जाए। ऐसे समाज में सबका सब कार्यों में भाग होना चाहिए तथा सबको सबकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सबको संपर्क के साधन व अवसर मिलने चाहिए। यही लोकतंत्र है। लोकतंत्र मूलत: सामाजिक जीवनचर्या की एक रीति व समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। आवागमन, जीवन व शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता, संपत्ति, जीविकोपार्जन के लिए जरूरी औजार व सामग्री रखने के अधिकार की स्वतंत्रता पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती, परंतु मनुष्य के सक्षम व प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए लोग तैयार नहीं हैं। इसके लिए व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता देनी होती है। इस स्वतंत्रता के अभाव में व्यक्ति ‘दासता’ में जकड़ा रहेगा।

‘दासता’ केवल कानूनी नहीं होती। यह वहाँ भी है जहाँ कुछ लोगों को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार व कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। फ्रांसीसी क्रांति के नारे में ‘समता’ शब्द सदैव विवादित रहा है। समता के आलोचक कहते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। यह सत्य होते हुए भी महत्व नहीं रखता क्योंकि समता असंभव होते हुए भी नियामक सिद्धांत है।
मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर है –

  1. शारीरिक वंश परंपरा,
  2. सामाजिक उत्तराधिकार,
  3. मनुष्य के अपने प्रयत्न।

इन तीनों दृष्टियों से मनुष्य समान नहीं होते, परंतु क्या इन तीनों कारणों से व्यक्ति से असमान व्यवहार करना चाहिए। असमान प्रयत्न के कारण असमान व्यवहार अनुचित नहीं है, परंतु हर व्यक्ति को विकास करने के अवसर मिलने चाहिए। लेखक का मानना है कि उच्च वर्ग के लोग उत्तम व्यवहार के मुकाबले में निश्चय ही जीतेंगे क्योंकि उत्तम व्यवहार का निर्णय भी संपन्नों को ही करना होगा। प्रयास मनुष्य के वश में है, परंतु वंश व सामाजिक प्रतिष्ठा उसके वश में नहीं है। अत: वंश और सामाजिकता के नाम पर असमानता अनुचित है। एक राजनेता को अनेक लोगों से मिलना होता है। उसके पास हर व्यक्ति के लिए अलग व्यवहार करने का समय नहीं होता। ऐसे में वह व्यवहार्य सिद्धांत का पालन करता है कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए। वह सबसे व्यवहार इसलिए करता है क्योंकि वर्गीकरण व श्रेणीकरण संभव नहीं है। समता एक काल्पनिक वस्तु है, फिर भी राजनीतिज्ञों के लिए यही एकमात्र उपाय व मार्ग है।

Important Question and Answers

पाठ से जुड़े प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
उत्तर: जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के निम्नलिखित तर्क हैं –

  1. जाति-प्रथा, श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन भी करती है।
  2. सभ्य समाज में श्रम-विभाजन आवश्यक है, परंतु श्रमिकों के विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन किसी अन्य देश में नहीं है।
  3. भारत की जाति-प्रथा में श्रम-विभाजन मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं होता। वह मनुष्य की क्षमता या प्रशिक्षण को दरकिनार करके जन्म पर आधारित पेशा निर्धारित करती है।
  4. जु:शुल्यक विपितपिस्थितयों मेंपेश बालक अनुपितनाह देता फल भूखे मरने की नौबत आ जाती है।

प्रश्न 2. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
उत्तर: जातिप्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण बनती रही है क्योंकि यहाँ जाति प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। उसे पेशा बदलने की अनुमति नहीं होती। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है क्योंकि उद्योग धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को पेशा न बदलने की स्वतंत्रता न हो तो भुखमरी व बेरोजगारी बढ़ती है। हिंदू धर्म की जातिप्रथा किसी भी व्यक्ति को पैतृक पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती। आज यह स्थिति नहीं है। सरकारी कानून, समाज सुधार व शिक्षा के कारण जाति प्रथा के बंधन कमजोर हुए हैं। पेशे संबंधी बंधन समाप्त प्राय है। यदि व्यक्ति अपना पेशा बदलना चाहे तो जाति बाधक नहीं है।

प्रश्न 3. लेखक के मत से दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है?
उत्तर: लेखक के मत से ‘दासता’ से अभिप्राय केवल कानूनी पराधीनता नहीं है। दासता की व्यापक परिभाषा है-किसी व्यक्ति को अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता न देना। इसका सीधा अर्थ है-उसे दासता में जकड़कर रखना। इसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार व कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है।

प्रश्न 4. शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
उत्तर: शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर समता को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने के लिए समान अवसर मिलने चाहिए। वे शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर असमान व्यवहार को अनुचित मानते हैं। उनका मानना है कि समाज को यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है। तो उसे समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर व समान व्यवहार उपलब्ध करवाने चाहिए। राजनीतिज्ञों को भी सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिए। समान व्यवहार और स्वतंत्रता को सिद्धांत ही समता का प्रतिरूप है। सामाजिक उत्थान के लिए समता का होना अनिवार्य हैं।

प्रश्न 5. सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
उत्तर: हम लेखक की बात से सहमत हैं। उन्होंने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। भावनात्मक समत्व तभी आ सकता है जब समान भौतिक स्थितियाँ व जीवन-सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। समाज में जाति-प्रथा का उन्मूलन समता का भाव होने से ही हो सकता है। मनुष्य की महानता उसके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप होनी चाहिए। मनुष्य के प्रयासों का मूल्यांकन भी तभी हो सकता है जब सभी को समान अवसर मिले। शहर में कान्वेंट स्कूल व सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों के बीच स्पर्धा में कान्वेंट स्कूल का विद्यार्थी ही जीतेगा क्योंकि उसे अच्छी सुविधाएँ मिली हैं। अत: जातिवाद का उन्मूलन करने के बाद हर व्यक्ति को समान भौतिक सुविधाएँ मिलें तो उनका विकास हो सकता है, अन्यथा नहीं।

प्रश्न 6. डॉ० आंबेडकर के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए – गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। क्या आज भी यह स्थिति विद्यमान है।
उत्तर: डॉ० आंबेडकर ने भारत की जाति प्रथा पर सटीक विश्लेषण किया है। यहाँ जातिप्रथा की जड़ें बहुत गहरी हैं। जाति व धर्म के ठेकेदारों ने लोगों के पेशे को जन्म से ही निर्धारित कर दिया भले ही वह उसमें पारंगत हो या नहीं हो। उसकी रुचि न होने पर भी उसे वही कार्य करना पड़ता था। इस व्यवस्था को श्रम विभाजन के नाम पर लागू किया गया था। आज यह – स्थिति नहीं है। शिक्षा, समाज सुधार, तकनीकी विकास, सरकारी कानून आदि के कारण जाति के बंधन ढीले हो गए हैं। व्यवसाय के क्षेत्र में जाति का महत्त्व नगण्य हो गया है।

प्रश्न 7. डॉ० भीमराव की कल्पना के आदर्श समाज की आधारभूत बातें संक्षेप में समझाइए। आदर्श सामाज की स्थापना में डॉ० आंबेडकर के विचारों की सार्थकता पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर: डॉ० भीमराव आंबेडकर की कल्पना के आदर्श समाज की आधारभूत बातें निम्नलिखित हैं –

  1. उनका यह आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता व भ्रातृता पर आधारित होगा।
  2. उस समाज में गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके।
  3. ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होगा तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए।
  4. सामाजिक जीवन में अवाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। डॉ० आंबेडकर के विचार निश्चित रूप से क्रांतिकारी हैं, परंतु व्यवहार में यह बेहद कठिन हैं। व्यक्तिगत गुणों के कारण जो वर्ग समाज पर कब्ज़ा किए हुए हैं, वे अपने विशेषाधिकारों को आसानी से नहीं छोड़ सकते। यह समाज कुछ सीमा तक ही स्थापित हो सकता है।

प्रश्न 3. जाति और श्रम विभाजन में बुनियादी अंतर क्या है? ‘श्रम विभाजन और जातिप्रथा’ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर: जाति और श्रम विभाजन में बुनियादी अंतर यह है कि जाति के नियामक विशिष्ट वर्ग के लोग हैं। जाति वाले व्यक्तियों की इसमें कोई भूमिका नहीं है। ब्राह्मणवादी व्यवस्थापक अपने हितों के अनुरूप जाति व उसका कार्य निर्धारित करते हैं। वे उस पेशे को विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं बदलने देते, भले ही लोग भूखे मर गए। श्रम विभाजन में कोई व्यवस्थापक नहीं होता। यह वस्तु की माँग, तकनीकी विकास या सरकारी फैसलों पर आधारित होता है। इसमें व्यक्ति अपना पेशा बदल सकता है।

प्रश्न 4. लोकतंत्र से लेखक को क्या अभिप्राय है?
उत्तर: लेखक कहता है कि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है। यह मूलतः सामूहिक दिनचर्या की एक रीति और समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। उनका मानना है कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का नाम ही लोकतंत्र है। इसमें सभी का सहयोग होना चाहिए।

प्रश्न 5. लेखक ने मनुष्य की क्षमता के बारे में क्या बताया है।
उत्तर: लेखक बताता है कि मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती हैं –

  1. शारीरिक वंश परंपरा
  2. सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात् सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि सभी उपलब्धियाँ जिसके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्ट शिक्षा प्राप्त करता है।
  3. मनुष्य के अपने प्रयत्न

लेखक का मानना है कि असमान प्रयत्न के कारण असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता। वे प्रथम दो बातों पर असमानता को अनुचित मानते हैं।


Chapter 18: Meri Kalpana Ka Adarsh Samaj

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हैलो बच्चो!

आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक

आरोह भाग-2 की ​कविता पढ़ेंगे

उषा’

Usha Poem Class 12 Hindi Aroh Part 2

बच्चों, कविता के भवार्थ को पढ़ने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

उषा कविता का प्रतिपादय एवं सार कक्षा 12

कवि परिचय-शमशेर बहादुर सिंह

जीवन परिचय: नई कविता के समर्थकों में शमशेर बहादुर सिंह की एक अलग छवि है। इनका जन्म 13 जनवरी, सन 1911 को देहरादून में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में ही हुई। इन्होंने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। चित्रकला में इनकी रुचि प्रारंभ से ही थी। इन्होंने सुमित्रानंदन पंत के पत्र ‘रूपाभ’ में कार्य किया। 1977 ई. में ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ काव्य-संग्रह पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। इन्हें कबीर सम्मान सहित अनेक पुरस्कार मिले। सन 1993 में अहमदाबाद में इनका देहांत हो गया।

रचनाएँ:

शमशेर बहादुर सिंह ने  कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मै, इतने पास अपने, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी, ‘ऊर्दू- हिंदी कोश’ का संपादन।

काव्यगत विशेषताएँ:

वैचारिक रूप से प्रगतिशील एवं शिल्पगत रूप से प्रयोगधर्मी कवि शमशेर को एक बिंबधर्मी कवि के रूप में जाना जाता है। इन्होंने अपनी कविताओं में समाज की यथार्थ स्थिति का भी चित्रण किया है। ये समाज में व्याप्त गरीबी का चित्रण करते हैं। कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर वर्णन किया है। प्रकृति के नजदीक रहने के कारण इनके प्राकृतिक चित्र अत्यंत जीवंत लगते हैं। ‘उषा’ कविता में प्रात:कालीन वातावरण का सजीव चित्रण है।

भाषा-शैली:

शमशेर बहादुर सिंह ने साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया है। कथा और शिल्प-दोनों ही स्तरों पर इनकी कविता का मिजाज अलग है। उर्दू शायरी के प्रभाव से संज्ञा और विशेषण से अधिक बल सर्वनामों, क्रियाओं, अव्ययों और मुहावरों को दिया है।

कविता का प्रतिपादय एवं सार

प्रतिपाद्य: प्रस्तुत कविता ‘उषा’  में कवि शमशेर बहादुर सिंह ने सूर्योदय से ठीक पहले के पल-पल परिवर्तित होने वाली प्रकृति का शब्द-चित्र उकेरा है। कवि ने प्रकृति की गति को शब्दों में बाँधने का अद्भुत प्रयास किया है। कवि भोर की आसमानी गति की धरती के हलचल भरे जीवन से तुलना कर रहा है। इसलिए वह सूर्योदय के साथ एक जीवंत परिवेश की कल्पना करता है जो गाँव की सुबह से जुड़ता है- वहाँ सिल है, राख से लीपा हुआ चौका है और स्लेट की कालिमा पर चाक से रंग मलते अदृश्य बच्चों के नन्हे हाथ हैं। कवि ने नए बिंब, नए उपमान, नए प्रतीकों का प्रयोग किया है।

सार: कवि कहता है कि सूर्योदय से पहले आकाश का रंग गहरे नीले रंग का होता है तथा वह सफेद शंख-सा दिखाई देता है। आकाश का रंग ऐसा लगता है मानो किसी गृहिणी ने राख से चौका लीप दिया हो। सूर्य के ऊपर उठने पर लाली फैलती है तो ऐसा लगता है जैसे काली सिल को किसी ने धो दिया हो या उस पर लाल खड़िया मिट्टी मल दिया हो। नीले आकाश में सूर्य ऐसा लगता है मानो नीले जल में गोरी युवती का शरीर झिलमिला रहा है। सूर्योदय होते ही उषा का यह जादुई प्रभाव समाप्त हो जाता है।

‘उषा’  कविता

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे

भोर का नभ 

राख से लीपा हुआ चौका

(अभी गीला पड़ा है)

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘उषा’ कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध प्रयोगवादी कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं। कविता में कवि ने सूर्योदय से पहले के वातावरण का सुंदर चित्र उकेरा है। इस अंश में सूर्योदय का मनोहारी वर्णन किया गया है।

व्याख्या: कवि बताता है कि सुबह का आकाश ऐसा लगता है मानो नीला शंख हो। दूसरे शब्दों में, इस समय आसमान शंख के समान गहरा नीला लगता है। वह पवित्र दिखाई देता है। वातावरण में नमी प्रतीत होती है। सुबह-सुबह आकाश ऐसा लगता है मानो राख से लीपा हुआ कोई चौका है। यह चौका नमी के कारण गीला लगता है।

विशेष:

(i) कवि ने प्रकृति का मनोहारी चित्रण किया है।

(ii) ‘शंख जैसे’  में उपमा अलंकार है।

(iii) सहज व सरल शब्दों का प्रयोग किया है।

(iv) ग्रामीण परिवेश सजीव हो उठता है।

(v) नए उपमानों का प्रयोग है।

2.

बहुत काली सिल जरा से लाल केसर से

कि जैसे धुल गई हो

स्लेट पर या लाल खड़िया चाक

मल दी हो किसी ने  

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘उषा’ कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध प्रयोगवादी कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं। इस कविता में कवि ने सूर्योदय से पहले के वातावरण का सुंदर चित्र उकेरा है। कविता के इस अंश में सूर्योदय का मनोहारी चित्रण किया गया है।

व्याख्या: कवि प्रात:कालीन आकाश का वर्णन करते हुए कहता है कि सूर्य क्षितिज से ऊपर उठता है तो हलकी लालिमा की रोशनी फैल जाती है। ऐसा लगता है कि काली रंग की सिल को लाल केसर से धो दिया गया है। अँधेरा काली सिल तथा सूरज की लाली केसर के समान लगती है। इस समय आकाश ऐसा लगता है मानो काली स्लेट पर किसी ने लाल खड़िया मिट्टी मल दिया हो। अँधेरा काली स्लेट के समान व सुबह की लालिमा लाल खड़िया चाक के समान लगती है।

विशेष:

(i) कवि ने प्रकृति का मनोहारी वर्णन किया है।

(ii) पूरे काव्यांश में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(iii) मुक्तक छंद का प्रयोग है।

(iv) नए बिंबों व उपमानों का प्रयोग है।

(v) सरल, सहज खड़ी बोली में सुंदर अभिव्यक्ति है।

3.

नील जल में या किसी की

गौर झिलमिल देह

जैसे हिल रही हो।

और …….

जादू टूटता हैं इस उषा का अब 

सूर्योदय हो रहा हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2‘ में संकलित ‘उषा’ कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध प्रयोगवादी कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं। कवि ने सूर्योदय से पहले के वातावरण का सुंदर चित्र उकेरा है। इसमें सूर्योदय का मनोहारी चित्रण किया गया है।

व्याख्या: कवि ने भोर के पल-पल। बदलते दृश्य का सुंदर वर्णन किया है। वह कहता है कि सूर्योदय के समय आकाश में गहरा नीला रंग छा जाता है। सूर्य की सफेद आभा दिखाई देने लगती है। ऐसा लगता है मानो नीले जल में किसी गोरी सुंदरी की देह हिल रही हो। धीमी हवा व नमी के कारण सूर्य का प्रतिबिंब हिलता-सा प्रतीत होता है।

कुछ समय बाद जब सूर्योदय हो जाता है तो उषा का पल-पल। बदलता सौंदर्य एकदम समाप्त हो जाता है। ऐसा लगता है कि उषा का जादुई प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

विशेष:

(i) कवि ने उषा का सुंदर दृश्य बिंब प्रस्तुत किया है।

(ii) माधुर्य गुण है।

(iii) ‘नील जल ’ हिल रही हो।‘ -में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(iv) सरल भाषा का प्रयोग है।

(v) मुक्तक छंद है।

Class 12th Usha chapter mcqs

IMPORTANT MCQs (बहुविकल्पी प्रश्न उत्तर)

1. ‘उषा’ कविता किस की रचना है ?

(क) निराला

(ख) पंत

(ग) शमशेर बहादुर सिंह

(घ) रघुवीर सहाय।

उत्तर – (ग) शमशेर बहादुर सिंह।

2. ‘उपा’ दिन का कौन-सा समय होता है ?

(क) प्रभात

(ख) मध्याहन

(ग) संध्या

(घ) रात्रि।

उत्तर- (क) प्रभात।

3. प्रात:कालीन नीला आकाश किसके जैसा बताया गया है?

(क) केसर

(ख) सिंदूर

(ग) झील

(घ) शंख।

उत्तर – (घ) शंख।

4. कवि ने राख से लीपा हुआ गीला चौका किसे कहा है ?

(क) भोर के तारे को

(ख) भोर के नभ को

(ग) भोर की वायु को

(घ) भोर की किरण को!

उत्तर – (क) भोर के तारे को।

5. लाल केसर से धुली हुई काली सिल क्या है ?

(क) सूर्य

(ख) आकाश

(ग) चंद्रमा

(घ) तारे।

उत्तर – (ख) आकाश

6. उषा का जादू किसके उदय होने पर अथवा किससे टूटता है ?

(क) चंद्रमा के

(ख) कवि के

(ग) सूर्य के

(घ) भोर के तारे।

उत्तर – (ग) सूर्य के।

7. राख से लीपा हुआ चौका’ किस भाव को व्यक्त करता है?

(क) परंपरा

(ख) पुरातनता

(ग) पवित्रता

(घ) आस्था ।

उत्तर – (ग) पवित्रता।

8. ‘बहुत नीला, राख जैसे’ में अलंकार है ?

(क) अनुप्रास

(ख) यमक

(ग) श्लेष

(घ) उपमा।

उत्तर – (घ) उपमा।

9. ‘लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने स्लेट पर’ में ‘स्लेट’ क्या है ?

(क) सूर्य

(ख) तारे

(ग) आकाश

(घ) धरती।

उत्तर – (घ) धरती।

10. ‘नील जल में किसी की गौर, झिलमिल देह जैसे हिल रही हो में कौन-सा भाव है?

(क) सुगंध का

(ख) निर्मलता का

(ग) उज्ज्वलता का

(घ) तरलता का।

उत्तर – (ग) उज्ज्वलता का

11. ‘बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से कि जैसे धुन गई हों में भाव है ?

(क) निर्मलता का

(ख) उज्ज्वलता का

(ग) सहजता का

(घ) सरलता का।

उत्तर- (ग) सहजता का।

12. बहुत काली सिल किस लाल से धुली हुई लगती है ?

(क) गुलाब

(ख) कमल

(ग) केसर

(घ) सिंदूर।

उत्तर – (ग) केसर।

13. नीले आकाश में उदय होता हुआ सूर्य किस जैसा प्रतीत हो रहा है ?

(क) सिंदूर के समान

(ख) शंख जैसा

(ग) गौरवर्णीय सुंदरी जैसा

(घ) झील के समान।

उत्तर – (ग) गौरवर्णीय सुंदरी जैसा।

14. ‘उषा’ कविता में कवि ने ‘उषा’ का कौन-सा चित्र उपस्थित किया है?

(क) छाया चित्र

(ख) तैल चित्र

(ग) शब्द चित्र

(घ) रेखाचित्र।

उत्तर – (ग) शब्द चित्र।

15. प्रातः आकाश का रंग कैसा था ?

(क) नीला

(ख) काला

(ग) सुनहरा

(घ) लाल।

उत्तर – (क) नीला।

Saharsh Swikara Hai

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हैलो बच्चो!
आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक
आरोह भाग-2 की ​कविता पढ़ेंगे
‘सहर्ष स्वीकारा है’
saharash swikara hai poem summary
बच्चों, कविता के भवार्थ को पढ़ने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि परिचय- गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’

जीवन परिचय: प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के श्योपुर नामक स्थान पर 1917 ई० में हुआ था। इनके पिता पुलिस विभाग में थे। अत: निरंतर होने वाले स्थानांतरण के कारण इनकी पढ़ाई नियमित व व्यवस्थित रूप से नहीं हो पाई। 1954 ई. में इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० (हिंदी) करने के बाद राजनाद गाँव के डिग्री कॉलेज में अध्यापन कार्य आरंभ किया। इन्होंने अध्यापन, लेखन एवं पत्रकारिता सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता, प्रतिभा एवं कार्यक्षमता का परिचय दिया। मुक्तिबोध को जीवनपर्यत संघर्ष करना पड़ा और संघर्षशीलता ने इन्हें चिंतनशील एवं जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने को प्रेरित किया। 1964 ई० में यह महान चिंतक, दार्शनिक, पत्रकार एवं सजग लेखक तथा कवि इस संसार से चल बसा।

रचनाएँ:
गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ की रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
(i) कविता-संग्रह- चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक-धूल।
(ii) कथा-साहित्य- काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी।
(iii) आलोचना- कामायनी-एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ एक साहित्यिक की डायरी।
(iv) भारत-इतिहास और संस्कृति।

काव्यगत विशेषताएँ: मुक्तिबोध प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रमुख सूत्रधारों में थे। इनकी प्रतिभा का परिचय अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ से मिलता है।ये पत्रकार भी थे। इन्होंने राजनीतिक विषयों, अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य तथा देश की आर्थिक समस्याओं पर लगातार लिखा है। कवि शमशेर बहादुर सिंह ने इनकी कविता के बारे में लिखा है-
“…….. अद्भुत संकेतों से भरी, जिज्ञासाओं से अस्थिर, कभी दूर से शोर मचाती, कभी कानों में चुपचाप राज की बातें कहती चलती है, हमारी बातें हमको सुनाती है। हम अपने को एकदम चकित होकर देखते हैं और पहले से अधिक पहचानने लगते हैं।”

भाषा-शैली: इनकी भाषा उत्कृष्ट है। भावों के अनुरूप शब्द गढ़ना और उसका परिष्कार करके उसे भाषा में प्रयुक्त करना भाषा-सौंदर्य की अद्भुत विशेषता है। इन्होंने तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, अरबी और फ़ारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है।

कविता का प्रतिपादय एवं सार

प्रतिपादय: मुक्तिबोध की कविताएँ आमतौर पर लंबी होती हैं। इन्होंने जो भी छोटी कविताएँ लिखी हैं उनमें एक है ‘सहर्ष स्वीकारा है‘ जो ‘भूरी-भूरी खाक-धूल‘ काव्य-संग्रह से ली गई है। एक होता है-‘स्वीकारना’ और दूसरा होता है-‘सहर्ष स्वीकारना’ यानी खुशी-खुशी स्वीकार करना। यह कविता जीवन के सब सुख-दुख, संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक को सम्यक भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा देती है।

सार:
कवि कहता है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी है, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है। मुझे जो कुछ भी मिला है, वह तुम्हारा दिया हुआ है तथा तुम्हें प्यारा है। मेरी गरबीली गरीबी, विचार-वैभव, गंभीर अनुभव, दृढ़ता, भावनाएँ आदि सब पर तुम्हारा प्रभाव है। तुम्हारे साथ मेरा न जाने कौन-सा नाता है कि मैं जितनी भी भावनाएँ बाहर निकालने का प्रयास करता हूँ, वे भावनाएँ उतनी ही अधिक उमड़ती रहती हैं। तुम्हारा चेहरा मेरी ऊपरी धरती पर चाँद के समान अपनी कांति बिखेरता रहता है।
कवि कहता है कि “मैं तुम्हारे प्रभाव से दूर जाना चाहता हूँ क्योंकि मैं भीतर से दुर्बल पड़ने लगा हूँ। तुम्हीं मुझे दंड दो ताकि मैं दक्षिण ध्रुव की अंधकारमयी अमावस्या की रात्रि के अँधेरों में लुप्त हो जाऊँ। मैं तुम्हारे उजालेपन को अधिक सहन नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हारी ममता की कोमलता भीतर से चुभने-सी लगी है। मेरी आत्मा कमजोर पड़ने लगी है।” वह स्वयं को पाताली अँधेरों की गुफाओं में लापता होने की बात कहता है, किंतु वहाँ भी उसे प्रियतम का सहारा है।

1.
जिंदगी में जो कुछ हैं, जो भी है
सहर्ष स्वीकारा है;
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैं
वह तुम्हें प्यारा हैं।
गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब
यह विचार-वैभव सब
दूढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल-पल में
जो कुछ भी जाग्रत हैं अपलक हैं-
संवेदन तुम्हारा हैं!!

शब्दार्थ: सहर्ष- खुशी के साथ। स्वीकारा- मन से माना। गरबीली– स्वाभिमानिनी। गंभीर – गहरा। अनुभव– व्यावहारिक ज्ञान। विचार-वैभव– भरे-पूरे विचार। दूढ़ता– मजबूती। सरिता– नदी। भीतर की सरिता – भावनाओं की नदी। अभिनव– नया। मौलिक– वास्तविक। जाग्रत– जागा हुआ। अपलक- निरंतर। संवेदन– अनुभूति।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से उद्धृत है। इसके रचयिता गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ हैं। इस कविता में कवि ने जीवन में दुख-सुख, संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक को सम्यक भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या: कवि कहता है कि मेरी जिंदगी में जो कुछ है, जैसा भी है, उसे मैं खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिए मेरा जो कुछ भी है, वह उसको (माँ या प्रिया) अच्छा लगता है। मेरी स्वाभिमानयुक्त गरीबी, जीवन के गंभीर अनुभव, विचारों का वैभव, व्यक्तित्व की दृढ़ता, मन में बहती भावनाओं की नदी-ये सब मौलिक हैं तथा नए हैं। इनकी मौलिकता का कारण यह है कि मेरे जीवन में हर क्षण जो कुछ घटता है, जो कुछ जाग्रत है, उपलब्धि है, वह सब कुछ तुम्हारी प्रेरणा से हुआ है।

विशेष:
(i) कवि अपनी हर उपलब्धि का श्रेय उसको (माँ या प्रिया) देता है।
(ii) संबोधन शैली है।
(iii) ‘मौलिक है’ की आवृत्ति प्रभावी बन पड़ी है।
(iv) ‘विचार-वैभव’ और ‘भीतर की सरिता’ में रूपक अलंकार तथा ‘पल-पल’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
(v) ‘सहर्ष स्वीकारा’, ‘गरबीली गरीबी’, ‘विचार-वैभव’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।
(vi) खड़ी बोली है।

2.
जाने क्या रिश्ता हैं, जाने क्या नाता हैं
जितना भी ऊँड़ेलता हूँ भर-भर फिर आता हैं
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता हैं
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा हैं!

शब्दार्थ: रिश्ता– रक्त संबंध। नाता– संबंध। ऊँड़ेलना- बाहर निकालना। सोता–झरना।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से उद्धृत है। इसके रचयिता गजानन माधव ‘मुक्तिबध’ हैं। इस कविता में कवि ने जीवन में दुख-सुख संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक सम्यक भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या: कवि कहता है कि तुम्हारे साथ न जाने कौन-सा संबंध है या न जाने कैसा नाता है कि मैं अपने भीतर समाये हुए तुम्हारे स्नेह रूपी जल को जितना बाहर निकालता हूँ, वह फिर-फिर चारों ओर से सिमटकर चला आता है और मेरे हृदय में भर जाता है। ऐसा लगता है मानो दिल में कोई झरना बह रहा है। वह स्नेह मीठे पानी के स्रोत के समान है जो मेरे अंतर्मन को तृप्त करता रहता है। इधर मन में प्रेम है और उधर तुम्हारा चाँद जैसा मुस्कराता हुआ चेहरा अपने अद्भुत सौंदर्य के प्रकाश से मुझे नहलाता रहता है। कवि का आंतरिक व बाहय जगत-दोनों उसी स्नेह से युक्त स्वरूप से संचालित होते हैं।

विशेष:
(i) कवि अपने प्रिय के स्नेह से पूर्णत: आच्छादित है।
(ii) ‘दिल में क्या झरना है’ में प्रश्न अलंकार है।
(III)) मुक्तक छंद है।
(Iv) खड़ी बोली युक्त भाषा में लाक्षणिकता है।

3.
सचमुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं
तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता हैं।
नहीं सहा जाता है।
ममता के बदल की मंडराती कोमलता-
भीतर पिराती है
कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है
बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है !

शब्दार्थ: दंड– सजा। दक्षिण ध्रुवी अंधकार- दक्षिण ध्रुव पर छाने वाला गहरा अँधेरा । अमावस्या- चंद्रमाविहीन काली रात। अंतर- हृदय, अंत:करण। परिवेष्टित- चारों ओर से घिरा हुआ। आच्छादित- छाया हुआ, ढका हुआ। रमणीय- मनोरम। उजेला- प्रकाश। ममता- अपनापन, स्नेह। मंडराती- छाई हुई। पिराती- दर्द करना। अक्षम- अशक्त। भवितव्यता- भविष्य की आशंका। बहलाती- मन को प्रसन्न करती। सहलाती- दर्द को कम करती हुई। आत्मीयता- अपनापन।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से उद्धृत है। इसके रचयिता गजानन माधव ‘मुक्तिबध’ हैं। इस कविता में कवि ने जीवन में दुख-सुख संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक सम्यक भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या: कवि अपने प्रिय स्वरूपा को भूलना चाहता है। वह चाहता है कि प्रिय उसे भूलने का दंड दे। वह इस दंड को भी सहर्ष स्वीकार करने के लिए तैयार है। प्रिय को भूलने का अंधकार कवि के लिए दक्षिणी ध्रुव पर होने वाली छह मास की रात्रि के समान होगा। वह उस अंधकार में लीन हो जाना चाहता है। वह उस अंधकार को अपने शरीर, हृदय पर झेलना चाहता है। इसका कारण यह है कि प्रिय के स्नेह के उजाले ने उसे घेर लिया है। यह उजाला अब उसके लिए असहनीय हो गया है। प्रिय की ममता या स्नेह रूपी बादल की कोमलता सदैव उसके भीतर मैंडराती रहती है। यही कोमल ममता उसके हृदय को पीड़ा पहुँचाती है। इसके कारण उसकी आत्मा बहुत कमजोर और असमर्थ हो गई है। उसे भविष्य में होने वाली अनहोनी से डर लगने लगा है। उसे भीतर-ही-भीतर यह डर लगने लगा है कि कभी उसे अपनी प्रियतमा (माँ या प्रिया) प्रभाव से अलग होना पड़ा तो वह अपना अस्तित्व कैसे बचाए रख सकेगा। अब उसे उसका बहलाना, सहलाना और रह-रहकर अपनापन जताना सहन नहीं होता। वह आत्मनिर्भर बनना चाहता है।

विशेष:
(i) कवि अत्यधिक मोह से अलग होना चाहता है।
(ii) संबोधन शैली है।
(iii) खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है।
(iv) अंधकार-अमावस्या निराशा के प्रतीक हैं।
(v) ‘ममता के बादल’, ‘दक्षिण ध्रुव अंधकार-अमावस्या’ में रूपक अलंकार,’छटपटाती छाती’ में अनुप्रास अलंकार, तथा ‘बहलाती-सहलाती’ में स्वर मैत्री अलंकार है।
(vi) कोमलता व आत्मीयता का मानवीकरण किया गया है।

4.
सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ
पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में
धुएँ के बादलों में
बिलकुल मैं लापता
लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है !!
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
या मेरा जो होता-सा लगता हैं, होता-सा संभव हैं
सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव है
अब तक तो जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है
सहर्ष स्वीकार है
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा हैं।

शब्दार्थ: पाताली अँधेरे- धरती की गहराई में पाई जाने वाली धुंध। गुहा- गुफा। विवर- बिल। लापता- गायब। कारण- मूल प्रेरणा। घेरा- फैलाव। वैभव-समृद्ध।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2‘ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से उद्धृत है। इसके रचयिता गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ हैं।
इस कविता में कवि ने जीवन में दुख-सुख, संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक सम्यक भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या: कवि कहता है कि मैं अपनी प्रियतमा (सबसे प्यारी स्त्री) के स्नेह से दूर होना चाहता हूँ। वह उसी से दंड की याचना करता है। वह ऐसा दंड चाहता है कि प्रियतमा के न होने से वह पाताल की अँधेरी गुफाओं व सुरंगों में खो जाए। ऐसी जगहों पर स्वयं का अस्तित्व भी अनुभव नहीं होता या फिर वह धुएँ के बादलों के समान गहन अंधकार में लापता हो जाए जो उसके न होने से बना हो। ऐसी जगहों पर भी उसे अपने सर्वाधिक प्रिय स्त्री का ही सहारा है। उसके जीवन में जो कुछ भी है या जो कुछ उसे अपना-सा लगता है, वह सब उसके कारण है। उसकी सत्ता, स्थितियाँ भविष्य की उन्नति या अवनति की सभी संभावनाएँ प्रियतमा के कारण हैं। कवि का हर्ष-विषाद, उन्नति-अवनति सदा उससे ही संबंधित हैं। कवि ने हर सुख-दुख, सफलता-असफलता को प्रसन्नतापूर्वक इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि प्रियतमा ने उन सबको अपना माना है। वे कवि के जीवन से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं।

विशेष:
(i) कवि ने अपने व्यक्तित्व के निर्माण में प्रियतमा के योगदान को स्वीकार किया है।
(ii) ‘पाताली औधेरे’ व ‘धुएँ के बादल’ आदि उपमान विस्मृति के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
(iii) ‘दंड दो’ में अनुप्रास अलंकार है।
(iv) ‘लापता कि . सहारा है!’ में विरोधाभास अलंकार है।
(v) काव्यांश में खड़ी बोली का प्रयोग है।
(vi) मुक्तक छंद है।

saharsh swikara hai mcqs class 12th

IMPORTANT MCQs (बहुविकल्पी प्रश्न उत्तर)

  1. सहर्ष स्वीकार है कविता के कवि हैं-

(क) गजाकर माधव मुक्तिबोध

(ख) गजानन माधव मुक्तिबोध

(ग) गिरधर माधव मुक्तिबोध

(घ) गजमुख माधव मुक्तिबोध ।

उत्तर- (ख) गजानन माधव मुक्तिबोध।

  1. जिंदगी में जो कुछ है, जो भी है उसे कैसे स्वीकारा है ?

(क) सहर्ष

(ख) समवेत

(ग) सहज

(घ) सरोष।

उत्तर-(क) सहर्ष।

  1. कवि के अनुसार जो कुछ भी मेरा है वह तुम्हें क्या है ?

(क) तुम्हारा है

(ख) पराया है

(ग) प्यारा है

(घ) न्यारा है।

उत्तर-(ग) प्यारा है।

  1. गरीबी को कैसा बताया है?

(क) शर्मीली

(ख) दुःख भरी

(ग) सुखदायक

(घ) गरबीली।

उत्तर- (घ) गरबोली।

  1. कवि के भीतर क्या है ?

(क) स्मृतियों

(ख) आत्मचिंतन

(ग) मीठे पानी का झरना

(घ) सांसारिक उलझनें।

उत्तर- (ग) मीठे पानी का झरना।

  1. कवि ने ‘ऊपर तुम’ की तुलना किससे की है ?

(क) सूर्य से

(ख) चाँद से

(ग) आकाश से

(घ) नक्षत्रों से।

उत्तर-(ख) चाँद से।

7.कवि किस अपराध के लिए दंड माँगता है?

(क) प्रभु को भूल जाने के

(ख) कोई कार्य न करने के

(ग) गलत कार्य करने के

(घ) सबसे लड़ने के।

उत्तर- (क) प्रभु को भूल जाने के।

  1. कवि की आत्मा कैसी हो गई है ?

(क) सशक्त

(ख) भावशून्य

(ग) कमजोर, अक्षम

(घ) पीड़ा से भरी हुई।

उत्तर- (ग) कमजोर, अक्षम।

  1. कवि किस से भयभीत है ?

(क) वर्तमान से

(ख) अतीत से

(ग) भविष्य से

(घ) शासन से।

उत्तर-(ग) भविष्य से।

  1. कवि को कैसी आत्मीयता सहन नहीं होती

(क) समझाने वाली

(ख) संवेदनारहित

(ग) संवेदना देने वाली

(घ) विचारात्मक।

उत्तर- (ग) संवेदना देने वाली।

  1. कवि कहाँ लापता होना चाहता है ?

(क) आकाश में

(ख) अंधेरी गुफाओं में

(ग) बादलों में

(घ) वायु में।

उत्तर- (ख) अंधेरी गुफाओं में।

  1. कवि प्रभु के प्रति क्या समर्पित करता है ?

(क) धन

(ख) संपति

(ग) प्राण

(घ) सर्वस्व।

उत्तर- (घ) सर्वस्व।

  1. ‘भीतर की सरिता’ से कवि का तात्पर्य है?

(क) हृदय की सरिता

(ख) नगर के बीच से बहने वाली सरिता

(ग) नगर के बाहर बहने वाली सरिता

(घ) शरीर की सरिता।

उत्तर- (क) हृदय की सरिता ।

  1. बहलाती, सहलाती आत्मीयता कैसी आत्मीयता है?

(क) संदेशपूर्ण

(ख) सांत्वना देने वाली

(ग) दुःखद

(घ) विचार प्रदान करने वाली।

उत्तर- (ख) सांत्वना देने वाली ।

  1. ममता के बादल’ कैसे बादल होते हैं?

(क) वर्षा के

(ख) ऑधी के

(ग) प्रेम के

(घ) गर्जना के

उत्तर- (ग) प्रेम के

  1. गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म किस सन में हुआ था ?

(क) 1916

(ख) 1917

(ग) 1918

(9) 1919

उत्तर- (ख) 19171

  1. मुक्तिबोध का जन्म कहाँ हुआ था ?

(क) श्यामपुर

(ख) शेखपुर

(ग) श्योपुर

(घ) श्योहर।

उत्तर- (ग) श्योपुर।

  1. मुक्तिबोध का निधन किस वर्ष हुआ था ?

(6) 1961.

(ख) 1962.

(ग) 1963.

(घ) 1964.

उत्तर- (घ) 1964.

  1. मुक्तिबोध का निधन कहाँ हुआ था ?

(क) नई दिल्ली

(ख) इलाहाबाद

(ग) ग्वालियर

(घ) भोपाल।

उत्तर- (क) नई दिल्ली।

  1. ‘सहर्ष स्वीकारा है कविता कवि के किस काव्य संग्रह से ली गई है?

(क) चाँद का मुँह टेढा

(ख) भूरी-भूरी खाक धूल

(ग) विपात्र

(घ) काठ का सपना।

उत्तर- (ख) भूरी-भूरी खाक धूल।

camere me band apahij

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हैलो बच्चो आज हम कद्वाा 12वीं की पाठ्यपुस्तक

आरोह भाग-2 का कविता पढ़ेंगे

‘कैमरे में बंद अपाहिज’

बच्चों, सबसे पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

जीवन परिचय- रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील कवि हैं। इनका जन्म लखनऊ (उ०प्र०) में सन् 1929 में हुआ था। इनकी संपूर्ण शिक्षा लखनऊ में ही हुई। वहीं से इन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम०ए० किया। प्रारंभ में ये पेशे से पत्रकार थे। इन्होंने प्रतीक अखबार में सहायक संपादक के रूप में काम किया। फिर ये आकाशवाणी के समाचार विभाग में रहे। कुछ समय तक हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका कल्पना और उसके बाद दैनिक नवभारत टाइम्स तथा दिनमान से संबद्ध रहे। साहित्य-सेवा के कारण इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनका देहावसान सन 1990 में दिल्ली में हुआ।

रचनाएँ-

रघुवीर सहाय नई कविता के कवि हैं। इनकी कुछ आरंभिक कविताएँ अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक (1935) में प्रकाशित हुई।

इनके महत्वपूर्ण काव्य-संकलन हैं:-

सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो-हँसो जल्दी हँसी, लोग भूल गए हैं आदि।

काव्यगत विशेषताएँ:

रघुवीर सहाय ने अपने काव्य में आम आदमी की पीड़ा व्यक्त की है। ये साठोत्तरी काव्य-लेखन के सशक्त, प्रगतिशील व चेतना-संपन्न रचनाकार हैं। इन्होंने सड़क, चौराहा, दफ़्तर, अखबार, संसद, बस, रेल और बाजार की बेलौस भाषा में कविता लिखी।

घर-मोहल्ले के चरित्रों पर कविता लिखकर उन्हें हमारी चेतना का स्थायी नागरिक बनाया। इन्होंने कविता को एक कहानीपन और नाटकीय वैभव दिया।

रघुवीर सहाय ने बतौर पत्रकार और कवि घटनाओं में निहित विडंबना और त्रासदी को देखा। इन्होंने छोटे की महत्ता को स्वीकारा और उन लोगों व उनके अनुभवों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया जिन्हें समाज में हाशिए पर रखा जाता है। इन्होंने भारतीय समाज में ताकतवरों की बढ़ती हैसियत व सत्ता के खिलाफ़ भी साहित्य और पत्रकारिता के पाठकों का ध्यान खींचा।

भाषा-शैली- रघुवीर सहाय ने अधिकतर बातचीत की शैली में लिखा। ये अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बचते रहे हैं।

कविता का प्रतिपादय एवं सार

प्रतिपादय:

‘कैमरे में बंद अपाहिज’  कविता को  ‘लोग भूल गए हैं’ काव्य-संग्रह से लिया गया है। इस कविता में कवि ने शारीरिक चुनौती को झेल रहे व्यक्ति की पीड़ा के साथ-साथ दूर-संचार माध्यमों के चरित्र को भी रेखांकित किया है। किसी की पीड़ा को दर्शक वर्ग तक पहुँचाने वाले व्यक्ति को उस पीड़ा के प्रति स्वयं संवेदनशील होने और दूसरों को संवेदनशील बनाने का दावेदार होना चाहिए। आज विडंबना यह है कि जब पीड़ा को परदे पर उभारने का प्रयास किया जाता है तो कारोबारी दबाव के तहत प्रस्तुतकर्ता का रवैया संवेदनहीन हो जाता है। यह कविता टेलीविजन स्टूडियो के भीतर की दुनिया को समाज के सामने प्रकट करती है। साथ ही उन सभी व्यक्तियों की तरफ इशारा करती है जो दुख-दर्द, यातना-वेदना आदि को बेचना चाहते हैं।

सार:

इस कविता में दूरदर्शन के संचालक स्वयं को शक्तिशाली बताते हैं तथा दूसरे को कमजोर मानते हैं। वे विकलांग से पूछते हैं कि क्या आप अपाहिज हैं? आप अपाहिज क्यों हैं? आपको इससे क्या दुख होता है? ऊपर से वह दुख भी जल्दी बताइए क्योंकि समय नहीं है। प्रश्नकर्ता इन सभी प्रश्नों के उत्तर अपने हिसाब से चाहता है। इतने प्रश्नों से विकलांग घबरा जाता है। प्रश्नकर्ता अपने कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए उसे रुलाने की कोशिश करता है ताकि दर्शकों में करुणा का भाव जाग सके। इसी से उसका उद्देश्य पूरा होगा। वह इसे सामाजिक उद्देश्य कहता है, परंतु ‘परदे पर वक्त की कीमत है’ वाक्य से उसके व्यापार की प्रोल खुल जाती है।

व्याख्या

1.

हम दूरदर्शन पर बोलेंगे

हम् समर्थ शक्तिवान

हम एक दुर्बल को लाएँगे

एक बंद कमरे में  

उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?

तो आप क्यों अपाहिज हैं?

आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा

देता है?

(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा-बड़ा)

हाँ तो बताइए आपका दुख क्या हैं

जल्दी बताइए वह दुख बताइए

बता नहीं पाएगा।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। कवि का मानना है कि मीडिया वाले दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।

व्याख्या: कवि मीडिया के लोगों की मानसिकता का वर्णन करता है। मीडिया के लोग स्वयं को समर्थ व शक्तिशाली मानते हैं। वे ही दूरदर्शन पर बोलते हैं। अब वे एक बंद कमरे अर्थात स्टूडियो में एक कमजोर व्यक्ति को बुलाएँगे तथा उससे प्रश्न पूछेगे। क्या आप अपाहिज हैं? यदि हैं तो आप क्यों अपाहिज हैं? क्या आपका अपाहिजपन आपको दुख देता है? ये प्रश्न इतने बेतुके हैं कि अपाहिज इनका उत्तर नहीं दे पाएगा, जिसकी वजह से वह चुप रहेगा। इस बीच प्रश्नकर्ता कैमरे वाले को निर्देश देता है कि इसको (अपाहिज को) स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा दिखाओ। फिर उससे प्रश्न पूछा जाएगा कि आपको कष्ट क्या है? अपने दुख को जल्दी बताइए। अपाहिज इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा क्योंकि ये प्रश्न उसका मजाक उड़ाते हैं।

विशेष:

1. मीडिया की मानसिकता पर करारा व्यंग्य है।

2. काव्यांश में नाटकीयता है।

3. भाषा सहज व सरल है।

4. व्यंजना शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है।

सोचिए

बताइए

थोड़ी कोशिश करिए

(यह अवसर खो देंगे?)

आप जानते हैं कि कायक्रम रोचक बनाने के वास्ते

हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे

इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का

करते हैं

(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। कवि का कहना है कि मीडिया के लोग किसी-न-किसी तरह से दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।

व्याख्या: इस काव्यांश में कवि कहता है कि मीडिया के लोग अपाहिज से बेतुके सवाल करते हैं। वे अपाहिज से पूछते हैं कि-अपाहिज होकर आपको कैसा लगता है? यह बात सोचकर बताइए। यदि वह नहीं बता पाता तो वे स्वयं ही उत्तर देने की कोशिश करते हैं। वे इशारे करके बताते हैं कि क्या उन्हें ऐसा महसूस होता है।

थोड़ा सोचकर और कोशिश करके बताइए। यदि आप इस समय नहीं बता पाएँगे तो सुनहरा अवसर खो देंगे। अपाहिज के पास इससे बढ़िया मौका नहीं हो सकता कि वह अपनी पीड़ा समाज के सामने रख सके। मीडिया वाले कहते हैं कि हमारा लक्ष्य अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना है और इसके लिए हम ऐसे प्रश्न पूछेगे कि वह रोने लगेगा। वे समाज पर भी कटाक्ष करते हैं कि वे भी उसके रोने का इंतजार करते हैं। वह यह प्रश्न दर्शकों से नहीं पूछेगा।

विशेष:

1. कवि ने क्षीण होती मानवीय संवेदना का चित्रण किया है।

2. दूरदर्शन के कार्यक्रम निर्माताओं पर करारा व्यंग्य है।

3. काव्य-रचना में नाटकीयता तथा व्यंग्य है।

4. सरल एवं भावानुकूल खड़ी बोली में सहज अभिव्यक्ति है।

5. अनुप्रास व प्रश्न अलंकार हैं।

6. मुक्तक छंद है।

फिर हम परदे पर दिखलाएंगे

फुल हुई आँख काँ एक बडी तसवीर

बहुत बड़ी तसवीर

और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी

(आशा हैं आप उसे उसकी अय-गता की पीड़ा मानेंगे) 

एक और कोशिश

दर्शक

धीरज रखिए

देखिए

हमें दोनों को एक सा रुलाने हैं

आप और वह दोनों

(कैमरा बस् करो नहीं हुआ रहने दो परदे पर वक्त की कीमत है)

अब मुसकुराएँगे हम

आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम

(बस थोड़ी ही कसर रह गई)

धन्यवाद।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। उसने यह बताने का प्रयत्न किया है कि मीडिया के लोग किस प्रकार से दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।”

व्याख्या: कवि कहता है कि दूरदर्शन वाले अपाहिज का मानसिक शोषण करते हैं। वे उसकी फूली हुई आँखों की तसवीर को बड़ा करके परदे पर दिखाएँगे। वे उसके होंठों पर होने वाली बेचैनी और कुछ न बोल पाने की तड़प को भी दिखाएँगे। ऐसा करके वे दर्शकों को उसकी पीड़ा बताने की कोशिश करेंगे। वे कोशिश करते हैं कि वह रोने लगे। साक्षात्कार लेने वाले दर्शकों को धैर्य धारण करने के लिए कहते हैं।

वे दर्शकों व अपाहिज दोनों को एक साथ रुलाने की कोशिश करते हैं। तभी वे निर्देश देते हैं कि अब कैमरा बंद कर दो। यदि अपाहिज अपना दर्द पूर्णत: व्यक्त न कर पाया तो कोई बात नहीं। परदे का समय बहुत महँगा है। इस कार्यक्रम के बंद होते ही दूरदर्शन में कार्यरत सभी लोग मुस्कराते हैं और यह घोषणा करते हैं कि आप सभी दर्शक सामाजिक उद्देश्य से भरपूर कार्यक्रम देख रहे थे। इसमें थोड़ी-सी कमी यह रह गई कि हम आप दोनों को एक साथ रुला नहीं पाए। फिर भी यह कार्यक्रम देखने के लिए आप सबका धन्यवाद!

विशेष:

1. अपाहिज की बेचैनी तथा मीडिया व दर्शकों की संवेदनहीनता को दर्शाया गया है।

2. मुक्त छंद है।

3. उर्दू शब्दावली का सहज प्रयोग है।

4. ‘परदे पर’ में अनुप्रास अलंकार है।

5. व्यंग्यपूर्ण नाटकीयता है।

IMPORTANT QUESTIONS (MCQs)

1-  रघुवीर सहाय का जन्म कब हुआ ?

A- 1980

B- 1970

C- 1933

D- 1929 

Ans- D

2-  रघुवीर सहाय का निधन कब हुआ  ?

A- 1980

B- 1988

C- 1971

D- 1990 

Ans- D

3- कैमरे में बंद कविता में कवि ने किसका चित्रण किया है ?

A- अपाहिज का

B- रोगी का

C- भगत जी का

D- इनमे से कोई नहीं

Ans- A

4- रघुवीर सहाय का निधन कहाँ हुआ ?

A- कानपुर

B- बनारस

C- बिजनौर

D- दिल्ली 

Ans- D

5- कैमरों में बंद अपाहिज कविता कवि के किस काव्य संग्रह से ली गई है ?

A- लोग भूल गए हैं

B- सीढ़ियों पर धूप

C- A तथा B दोनों

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- A

6- कैमरे  में बंद अपाहिज कविता में हम दूरदर्शन पर क्या बोलेंगे ?

A- हम बलवान हैं

B- हम समर्थ और शक्तिवान हैं

C- हम कमज़ोर हैं

D- हम दुर्बल हैं

Ans- B

7- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में हम किस पर बोलेंगे ?

A- दूरदर्शन पर

B- मंच पर

C- घर पर

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- A

8- कैमरे में बंद अपाहिज किसकी रचना है ?

A- रघुवीर सहाय

B- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

C- महादेवी वर्मा

D- इनमे से कोई 

Ans- A

9- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में हम क्या है ?

A- दुर्बल

B- सशक्त

C- समर्थ

D- असमर्थ 

Ans- C

10- किसे कैमरे में बंद अपाहिज कविता में हम लाएंगे ?

A- बलवान को

B- दुर्बल को

C- नेता को

D- खिलाडी को 

Ans- B

11- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में दुर्बल को हम कहाँ ले जाएंगे ?

A- अस्पताल

B- स्टूडियो

C- बंद कमरे में

D- मैदान में 

Ans- C

12- रघुवीर सहाय का जन्म कहाँ हुआ ?

A- दिल्ली

B- कानपुर

C- महाराष्ट्र

D- लखनऊ

Ans- D

13- अपाहिज से दूरदर्शन कार्यक्रम संचालक किस प्रकार के प्रश्न पूछता हैं ?

A- कठिन

B- अर्थहीन

C- ज्ञान वर्धक

D- उपरोक्त सभी 

Ans- B

14- अपाहिज क्या नहीं बता पाएगा ?

A- अपनी कहानी

B- अपना दुःख

C- अपना सुख

D- अपनी जानकारी 

Ans- B

15- कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए अपाहिज को क्या करते हैं ?

A- नचा देते है

B- हंसा देते है

C- भगा देते हैं

D- रुला देते हैं 

Ans- D

16- पर्दे पर किस की कीमत है ?

A- मजाक की

B- कहानी की

C- अपाहिज की

D- वक़्त की 

Ans- D

17- कैमरे वाले परदे पर अपाहिज की क्या दिखाना चाहते हैं ?

A- मुस्कान

B- दुःख

C- जीभ

D- रोने से फूली आँखें 

Ans- D

18- प्रस्तुतकर्ता दर्शकों को क्या रखने के लिए अनुरोध करता है ?

A- धैर्य

B- प्यार

C- होंसला

D- शांति 

Ans- A

19- दूरदर्शन वाले किसकी संवेदना से खिलवाड़ कर रहे हैं ?

A- कैमरा वाले की

B- अपाहिज की

C- खुद की

D- दर्शकों की  

Ans- B

20- दूरदर्शन पर किस उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम दिखाया जा रहा था ?

A- प्रेम

B- सामाजिक

C- वैज्ञानिक

D- आर्थिक 

Ans- B

21- प्रस्तुतकर्ता ‘बस करो नहीं हुआ रहने दो’ क्यों कहता है ?

A- अपाहिज न रोए

B- अपाहिज और दर्शक न रोए

C- कैमरा खराब हो गया

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

22- कैमरे में बंद अपाहिज कविता किस पर व्यंग्य है ?

A- समाज पर

B- दूरदर्शन वालों पर

C- अमीरों पर

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

23- कैमरे वाले एक और कोशिश क्यों करना चाहते हैं ?

A- तस्वीर साफ़ दिखने के लिए

B- अपाहिज की अपंगता को उभारने के लिए

C- पैसे कमाने के लिए

D- इनमे से कोई नहीं  

Ans- B

24- कार्यक्रम को समाप्त करते हुए प्रस्तुतकर्ता क्या करेगा ?

A- रोते हुए धन्यवाद

B- मुस्कुराकर धन्यवाद

C- हंस कर धन्यवाद

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

25- अब मुस्कुराएँगे हम – इस पंक्ति में हम कौन है ?

A- दर्शक

B- समाज

C- अपाहिज

D- दूरदर्शन वाले 

Ans- D

26- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में समर्थ शक्तिवान किसे कहा जाता है ?

A- अपाहिज को

B- कैमरा वाले को

C- दर्शकों को

D- दूरदर्शन वालों को

Ans- D

27- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में फूली हुई आँख का क्या अर्थ है ?

A- आँख सूजना

B- आँख में चोट लगना

C- रोना

D- आंसुओं से भरी आँख 

Ans- D

28- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में दूरदर्शन कर्मियों की किस मनोवृति को दर्शाया गया है ?

A- चंचल

B- अनुभवी

C- संवेदनहीनता

D- सहायक 

Ans- C

29- कैमरा वाला किन्हें साथ साथ रुलाना चाहता है ?

A- भाई बहन

B- दर्शक और अपाहिज

C- कर्मचारियों को

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

30- दूरदर्शन के लिए क्या आवश्यक है ?

A- आलोचना

B- हंसी

C- संवेदना

D- रोचक कार्यक्रम

Ans- D

Baat seedhi thi par

Baat seedhi thi par

बात सीधी थी पर

प्रतिपादय: यह कविता ‘कोई दूसरा नहीं’ कविता-संग्रह से संकलित है। इसमें कथ्य के द्वंद्व उकेरते हुए भाषा की सहजता की बात की गई है। हर बात के लिए कुछ खास शब्द नियत होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हर पेंच के लिए एक निश्चित खाँचा होता है। अब तक जिन शब्दों को हम एक-दूसरे के पर्याय के रूप में जानते रहे हैं, उन सबके भी अपने अर्थ होते हैं। अच्छी बात या अच्छी कविता का बनना सही बात का सही शब्द से जुड़ना होता है और जब ऐसा होता है तो किसी दबाव या अतिरिक्त मेहनत की जरूरत नहीं होती, वह सहूलियत के साथ हो जाता है। सही बात को सही शब्दों के माध्यम से कहने से ही रचना प्रभावशाली बनती है।

सार: कवि का मानना है कि बात और भाषा स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं। किंतु कभी-कभी भाषा के मोह में सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है। मनुष्य अपनी भाषा को टेढ़ी तब बना देता है जब वह आडंबरपूर्ण तथा चमत्कारपूर्ण शब्दों के माध्यम से कथ्य को प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। अंतत: शब्दों के चक्कर में पड़कर वे कथ्य अपना अर्थ खो बैठते हैं। अत: अपनी बात सहज एवं व्यावहारिक भाषा में कहना चाहिए ताकि आम लोग कथ्य को भलीभाँति समझ सकें।

बात सीधी थी पर…

1.
बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
जरा टेढ़ी फैंस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा की उलट-पालट
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए-
लेकिन इससे भाषा के साथ-साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई।

शब्दार्थ: सीधी-सरल, सहज। चक्कर-प्रभाव। टेढ़ा फैसना-बुरा फँसना। येचीदा-कठिन, मुश्किल।
प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर ’’ से ली गई है। इसके रचयिता कुंवर नारायण हैं। इस कविता में भाषा की सहजता की बात कही गई है और बताया गया है कि अकसर चमत्कार के चक्कर में भाषा दुरूह हो जाती है।

व्याख्या: कवि कहता है कि वह अपने मन के भावों को सहज रूप से अभिव्यक्त करना चाहता था, परंतु समाज की प्रकृति को देखते हुए उसे प्रभावी भाषा के रूप में प्रस्तुत करना चाहा। पर भाषा के चक्कर में भावों की सहजता नष्ट हो गई। कवि कहता है कि मैंने मूल बात को कहने के लिए शब्दों, वाक्यांशों, वाक्यों आदि को बदला। फिर उसके रूप को बदला तथा शब्दों को उलट-पुलट कर प्रयोग किया। कवि ने कोशिश की कि या तो इस प्रयोग से उसका काम बच जाए या फिर वह भाषा के उलट-फेर के जंजाल से मुक्त हो सके, परंतु कवि को कोई भी सफलता नहीं मिली। उसकी भाषा के साथ-साथ कथ्य भी जटिल होता गया।

विशेष:

  1. कवि ने भाषा की जटिलता पर कटाक्ष किया है।
  2. भाषा सरल, सहज साहित्यिक खड़ी बोली है।
  3. काव्यांश रचना मुक्त छंद में है।
  4. ‘टेढ़ी फैंसना’, ‘पेचीदा होना’ मुहावरों का सुंदर प्रयोग है।
  5. ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
में फेंच को खोलने की बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्योंकि इस करतब पर मुझे
साफ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह।

शब्दार्थ: मुश्किल-कठिन। धैर्य-धीरज। पेंच-ऐसी कील जिसके आधे भाग पर चूड़ियाँ बनी होती हैं, उलझन। बेतरह-बुरी तरह। करतब-चमत्कार। तमाशवन-दर्शक, तमाशा देखने वाले। शाबाशी-प्रशंसा, प्रोत्साहन।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब उसकी बात पेचीदा हो गई तो उसने सारी समस्या को ध्यान से नहीं समझा। हल ढूँढ़ने की बजाय वह और अधिक शब्दजाल में फैस गया। बात का पेंच खुलने के स्थान पर टेढ़ा होता गया और कवि उसे अनुचित रूप से कसता चला गया। इससे भाषा और कठिन हो गई। शब्दों के प्रयोग पर दर्शक उसे प्रोत्साहन दे रहे थे, उसकी प्रशंसा कर रहे थे।

विशेष:

  1. कवि धैर्यपूर्वक सरलता से काम करने की सलाह दे रहा है।
  2. ‘वाह-वाह’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  3. ‘पेंच कसने’ के बिंब से कवि का कथ्य प्रभावी बना है।
  4. ‘बेतरह’ विशेषण सटीक है।
  5. ‘करतब’ शब्द में व्यंग्यात्मकता का भाव निहित है।
  6. लोकप्रिय उर्दू शब्दों-बेतरह, करतब, तमाशबीन, साफ़ आदि का सुंदर प्रयोग है।
  7. मुक्तक छंद है।

आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था
जोर जबरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी!
हारकर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया।
ऊपर से ठीकठाक
परअंदर से
न तो उसमें कसाव था
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देखकर पूछा-
‘क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?’

शब्दार्थ: जोर-बल । चूड़ी मरना-पेंच कसने के लिए बनी चूड़ी का नष्ट होना, कथ्य का मुख्य भाव समाप्त होना। कसाव-खिचाव, गहराई। सहूलियत-सहजता, सुविधा। बरतना-व्यवहार में लाना।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर ’ से ली गई है। इसके रचयिता कुंवर नारायण हैं। इस कविता में भाषा की सहजता की बात कही गई है और बताया गया है कि चमत्कार के चक्कर में भाषा कैसे दुरूह और अप्रभावी हो जाती है।

व्याख्या: कवि अपनी बात कहने के लिए बनावटी भाषा का प्रयोग करने लगा। परिणाम वही हुआ जिसका कवि को डर था। जैसे पेंच के साथ जबरदस्ती करने से उसकी चूड़ियाँ समाप्त हो जाती हैं, उसी प्रकार शब्दों के जाल में उलझकर कवि की बात का प्रभाव नष्ट हो गया और वह बनावटीपन में ही खो गई। उसकी अभिव्यंजना समाप्त हो गई।
अंत में, कवि जब अपनी बात को स्पष्ट नहीं कर सका तो उसने अपनी बात को वहीं पर छोड़ दिया जैसे पेंच की चूड़ी समाप्त होने पर उसे कील की तरह ठोंक दिया जाता है।
ऐसी स्थिति में कवि की अभिव्यक्ति बाहरी तौर पर कविता जैसी लगती थी, परंतु उसमें भावों की गहराई नहीं थी, शब्दों में ताकत नहीं थी। कविता प्रभावहीन हो गई। जब वह अपनी बात स्पष्ट न कर सका तो बात ने शरारती बच्चे के समान पसीना पोंछते कवि से पूछा कि क्या तुमने कभी भाषा को सरलता, सहजता और सुविधा से प्रयोग करना नहीं सीखा।

विशेष:

  1. कवि ने कविताओं की आडंबरपूर्ण भाषा पर व्यंग्य किया है।
  2. बात का मानवीकरण किया है।
  3. ‘कील की तरह’, ‘शरारती बच्चे की तरह’ में उपमा अलंकार है।
  4. ‘जोर-जबरदस्ती’, ‘पसीना पोंछते’ में अनुप्रास तथा ‘बात की चूड़ी’ में रूपक अलंकार है।
  5. ‘ कील की तरह ठोंकना’ भाषा को जबरदस्ती जटिल बनाने का परिचायक है।
  6. मुक्तक छंद है।
  7. काव्यांश में खड़ी बोली का प्रयोग है।

IMPORTANT QUESTIONS
1: आप ‘चिड़िया की उड़ान’ और ‘कविता की उड़ान’ में क्या अंतर देखते हैं?’कविता के बहाने’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजि।2: फूलों के खिलने और कविता पढ़ने दोनों से ही मन प्रसन्न हो उठता है। कविता के आधार पर दोनों की साम्यता स्पष्ट कीजिए।
3: कवि जो कुछ कहना चाहता था, वह कहाँ उलझकर रह गया? क्या उसे अपने प्रयास में सफलता मिली ?
4: कवि ने बात की तुलना किससे की है और क्यों? -‘बात सीधी थी पर ’’ कविता के आधार पर उत्तर दीजिए।
5: निम्नलिखित काव्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(अ) कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बचा ही जाने।
(क) उपर्युक्त काव्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ख) काव्यांश की भाषागत हो विशेषताएँ लिखिए।
(ग) ‘सब घर एक कर देने’ का आशय क्या हैं?

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Kavita ke Bahane

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जीवन परिचय- कुंवर नारायण

कुंवर नारायण आधुनिक हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। इनका जन्म 19 सितंबर, सन 1927 को फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से पूरी की। इन्होंने अनेक देशों की यात्रा की है। कुंवर नारायण ने सन 1950 के आस-पास काव्य-लेखन की शुरुआत की। इन्होंने चिंतनपरक लेख, कहानियाँ सिनेमा और अन्य कलाओं पर समीक्षाएँ भी लिखी हैं। इन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया है; जैसे-कबीर सम्मान, व्यास सम्मान, लोहिया सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा केरल का कुमारन आशान पुरस्कार आदि।

रचनाएँ- ये ‘तीसरे सप्तक’ के प्रमुख कवि हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. काव्य-संग्रह-चक्रव्यूह (1956), परिवेश : हम तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों।
  2. प्रबंध-काव्य-आत्मजयी।
  3. कहानी-संग्रह-आकारों के आस-पास।
  4. समीक्षा-आज और आज से पहले।
  5. सामान्य-मेरे साक्षात्कार।

काव्यगत विशेषताएँ: कवि ने कविता को अपने सृजन कर्म में हमेशा प्राथमिकता दी। आलोचकों का मानना है कि “उनकी कविता में व्यर्थ का उलझाव, अखबारी सतहीपन और वैचारिक धुंध की बजाय संयम, परिष्कार और साफ-सुथरापन है।” कुंवर जी नारायण नगरीय संवेदना के कवि हैं।

भाषा-शैली: भाषा और विषय की विविधता इनकी कविताओं के विशेष गुण माने जाते हैं। इनमें यथार्थ का खुरदरापन भी मिलता है और उसका सहज सौंदर्य भी। सीधी घोषणाएँ और फैसले इनकी कविताओं में नहीं मिलते क्योंकि जीवन को मुकम्मल तौर पर समझने वाला एक खुलापन इनके कवि-स्वभाव की मूल विशेषता है।

(क) कविता के बहाने
प्रतिपादय : ‘कविता के बहाने’ कविता कवि के कविता-संग्रह ‘इन दिनों’ से ली गई है। आज के समय में कविता के अस्तित्व के बारे में संशय हो रहा है। यह आशंका जताई जा रही है कि यांत्रिकता के दबाव से कविता का अस्तित्व नहीं रहेगा। ऐसे में यह कविता-कविता की अपार संभावनाओं को टटोलने का एक अवसर देती है।

सार: यह कविता एक यात्रा है जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है। एक ओर प्रकृति है दूसरी ओर भविष्य की ओर कदम बढ़ाता बच्चा। कवि कहता है कि चिड़िया की उड़ान की सीमा है, फूल के खिलने के साथ उसकी परिणति निश्चित है, लेकिन बच्चे के सपने असीम हैं। बच्चों के खेल में किसी प्रकार की सीमा का कोई स्थान नहीं होता। कविता भी शब्दों का खेल है और शब्दों के इस खेल में जड़, चेतन, अतीत, वर्तमान और भविष्य-सभी उपकरण मात्र हैं। इसीलिए जहाँ कहीं रचनात्मक ऊर्जा होगी, वहाँ सीमाओं के बंधन खुद-ब-खुद टूट जाते हैं। वह सीमा चाहे घर की हो, भाषा की हो या समय की ही क्यों न हो।

कविता के बहाने
कविता एक उड़ान हैं चिड़िया के बहाने
कविता की उडान भला चिडिया क्या जाने?
बाहर भीतर
इस धर, उस घर
कविता के पंख लया उड़ने के माने
चिडिया क्या जाने?

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने’ से उद्धृत है। इसके रचयिता कुंवर नारायण हैं।
कवि कविता की यात्रा के बारे में बताता है, जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है। कवि का मानना है कि रचनात्मक ऊर्जा पर सीमा के बंधन लागू नहीं होते।

व्याख्या: कवि कहता है कि कविता कल्पना की उड़ान है। इसे सिद्ध करने के लिए वह चिड़िया का उदाहरण देता है। साथ ही चिड़िया की उड़ान के बारे में यह भी कहता है कि चिड़िया की उड़ान सीमित होती है किंतु कविता की कल्पना का दायरा असीमित होता है। चिड़िया घर के अंदर-बाहर या एक घर से दूसरे घर तक ही उड़ती है, परंतु कविता की उड़ान व्यापक होती है। कवि के भावों की कोई सीमा नहीं है। कविता घर-घर की कहानी कहती है। वह पंख लगाकर हर जगह उड़ सकती है। उसकी उड़ान चिड़िया की उड़ान से कहीं आगे है।

विशेष:

  1. कविता की अपार संभावनाओं को बताया गया है।
  2. सरल एवं सहज खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है।
  3. ‘चिड़िया क्या जाने?’ में प्रश्न अलंकार है।
  4. कविता का मानवीकरण किया गया है।
  5. लाक्षणिकता है।
  6. ‘कविता की उड़ान भला’ में अनुप्रास अलंकार है।

कविता एक खिलना हैं फूलों के बहाने
कविता का खिलना भला कूल क्या जाने
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने?

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने’ से उद्धृत है। इसके रचयिता कुंवर नारायण हैं।
कवि कविता की यात्रा के बारे में बताता है, जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है। कवि का मानना है कि रचनात्मक ऊर्जा पर सीमा के बंधन लागू नहीं होते।

व्याख्या: कवि कहता है कि कविता की रचना फूलों के बहाने हो सकती है। फूलों को देखकर कवि का मन प्रफुल्लित रहता है। उसके मन में कविता फूल की भाँति विकसित होती है। फूल से कविता में रंग, भाव आदि आते हैं, परंतु कविता के खिलने के बारे में फूल कुछ नहीं जानते।
फूल कुछ समय के लिए खिलते हैं, खुशबू फैलाते हैं, फिर मुरझा जाते हैं। उनकी परिणति निश्चित होती है। वे घर के अंदर-बाहर, एक घर से दूसरे घर में अपनी सुगंध फैलाते हैं, परंतु शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। कविता बिना मुरझाए लंबे समय तक लोगों के मन में व्याप्त रहती है। इस बात को फूल नहीं समझ पाता।

विशेष:

  1. कविता व फूल की तुलना मनोरम है।
  2. सरल एवं सहज खड़ी बोली भावानुकूल है।
  3. ‘मुरझाए महकने’ में अनुप्रास अलंकार तथा ‘फूल क्या जाने?” में प्रश्न अलंकार है।
  4. शांत रस है।
  5. मुक्त छंद है।

कविता एक खेल हैं बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह धर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
कच्च ही जाने।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने’ से उद्धृत है। इसके रचयिता कुंवर नारायण हैं। कवि कविता की यात्रा के बारे में बताता है जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है।

व्याख्या: कवि कविता को बच्चों के खेल के समान मानता है। जिस प्रकार बच्चे कहीं भी किसी भी तरीके से खेलने लगते हैं, उसी प्रकार कवि के लिए कविता शब्दों की क्रीड़ा है। वह बच्चों के खेल की तरह कहीं भी, कभी भी तथा किसी भी स्थान पर प्रकट हो सकती है। वह किसी भी समय अपने भावों को व्यक्त कर सकती है।
बच्चों के लिए सभी घर एक समान होते हैं। वे खेलने के समय अपने-पराये में भेद नहीं करते। इसी तरह कवि अपने शब्दों से आंतरिक व बाहरी संसार के मनोभावों को रूप प्रदान करता है। वह बच्चों की तरह बेपरवाह है। कविता पर कोई बंधन लागू नहीं होता।

विशेष:

  1. कविता की रचनात्मक व्यापकता को प्रकट किया गया है।
  2. बच्चों व कवियों में समानता दर्शाई गई है।
  3. ‘बच्चा ही जाने’ पंक्ति से बालमन की सरलता की अभिव्यक्ति होती है।
  4. मुक्त छंद है।
  5. ‘बच्चों के बहाने’ में अनुप्रास अलंकार है।
  6. साहित्यिक खड़ी बोली है।

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Patang

Patang

कवि परिचय – आलोक धन्वा
जीवन परिचय

आलोक धन्वा सातवें-आठवें दशक के बहुचर्चित कवि हैं। इनका जन्म सन 1948 में बिहार के मुंगेर जिले में हुआ था। इनकी साहित्य-सेवा के कारण इन्हें राहुल सम्मान मिला। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने इन्हें साहित्य सम्मान से सम्मानित किया। इन्हें बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान व पहल सम्मान से नवाजा गया। ये पिछले दो दशकों से देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने जमशेदपुर में अध्ययन मंडलियों का संचालन किया और रंगकर्म तथा साहित्य पर कई राष्ट्रीय संस्थानों व विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता के रूप में भागीदारी की है।

रचनाएँ:
इनकी पहली कविता ‘जनता का आदमी’ सन 1972 में प्रकाशित हुई। उसके बाद भागी हुई लड़कियाँ, ब्रूनो की बेटियाँ कविताओं से इन्हें प्रसिद्ध मिली। इनकी कविताओं का एकमात्र संग्रह सन 1998 में ‘दुनिया रोज बनती है’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में व्यक्तिगत भावनाओं के साथ सामाजिक भावनाएँ भी मिलती हैं, यथा
जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या हैं
मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना हैं उधर।

काव्यगत विशेषताएँ:
कवि की 1972-73 में प्रकाशित कविताएँ हिंदी के अनेक गंभीर काव्य-प्रेमियों को जबानी याद रही हैं। आलोचकों का मानना है कि इनकी कविताओं के प्रभाव का अभी तक ठीक से मूल्यांकन नहीं किया गया है। इसी कारण शायद कवि ने अधिक लेखन नहीं किया। इनके काव्य में भारतीय संस्कृति का चित्रण है। ये बाल मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते हैं। ‘पतंग’ कविता बालसुलभ इच्छाओं व उमंगों का सुंदर चित्रण है।

भाषा-शैली:
कवि ने शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया है। ये बिंबों का सुंदर प्रयोग करते हैं। इनकी भाषा सहज व सरल है। इन्होंने अलंकारों का सुंदर व कुशलता से प्रयोग किया है।

कविता का प्रतिपादय एवं सार
प्रतिपादय- ‘पतंग’ कविता कवि के ‘दुनिया रोज बनती है’ व्यंग्य संग्रह से ली गई है। इस कविता में कवि ने बालसुलभ इच्छाओं और उमंगों का सुंदर चित्रण किया है। बाल क्रियाकलापों एवं प्रकृति में आए परिवर्तन को अभिव्यक्त करने के लिए इन्होंने सुंदर बिंबों का उपयोग किया है। पतंग बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना है जिसके जरिये वे आसमान की ऊँचाइयों को छूना चाहते हैं तथा उसके पार जाना चाहते हैं।
यह कविता बच्चों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ शरद ऋतु का चमकीला इशारा है, जहाँ तितलियों की रंगीन दुनिया है, दिशाओं के मृदंग बजते हैं, जहाँ छतों के खतरनाक कोने से गिरने का भय है तो दूसरी ओर भय पर विजय पाते बच्चे हैं जो गिरगिरकर सँभलते हैं तथा पृथ्वी का हर कोना खुद-ब-खुद उनके पास आ जाता है। वे हर बार नई-नई पतंगों को सबसे ऊँचा उड़ाने का हौसला लिए औधेरे के बाद उजाले की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

सार:
कवि कहता है कि भादों के बरसते मौसम के बाद शरद ऋतु आ गई। इस मौसम में चमकीली धूप थी तथा उमंग का माहौल था। बच्चे पतंग उड़ाने के लिए इकट्ठे हो गए। मौसम साफ़ हो गया तथा आकाश मुलायम हो गया। बच्चे पतंगें उड़ाने लगे तथा सीटियाँ व किलकारियाँ मारने लगे। बच्चे भागते हुए ऐसे लगते हैं मानो उनके शरीर में कपास लगे हों। उनके कोमल नरम शरीर पर चोट व खरोंच अधिक असर नहीं डालती। उनके पैरों में बेचैनी होती है जिसके कारण वे सारी धरती को नापना चाहते हैं।
वे मकान की छतों पर बेसुध होकर दौड़ते हैं मानी छतें नरम हों। खेलते हुए उनका शरीर रोमांचित हो जाता है। इस रोमांच मैं वे गिरने से बच जाते हैं। बच्चे पतंग के साथ उड़ते-से लगते हैं। कभी-कभी वे छतों के खतरनाक किनारों से गिरकर भी बच जाते हैं। इसके बाद इनमें साहस तथा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।

1.
सबसे तेज़ बौछारें गयीं। भादो गया
सवेरा हुआ
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज चलाते हुए
घंटी बजाते हुए जोर-जोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके-
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज उड़ सके-
दुनिया का सबसे पतला कागज उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया।

शब्दार्थ:
भादो-भादों मास, अँधेरा। शरद-शरद ऋतु, उजाला। झुंड-समूह। इशारों से-संकेतों से। मुलायम-कोमल। रंगीन-रंगबिरंगी। बाँस-एक प्रकार की लकड़ी। नाजुक-कोमल। किलकारी-खुशी में चिल्लाना।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘पतंग’ से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता आलोक धन्वा हैं। प्रस्तुत कविता में कवि ने मौसम के साथ प्रकृति में आने वाले परिवर्तनों व बालमन की सुलभ चेष्टाओं का सजीव चित्रण किया है।
व्याख्या: कवि कहता है कि बरसात के मौसम में जो तेज बौछारें पड़ती थीं, वे समाप्त हो गई। तेज बौछारों और भादों माह की विदाई के साथ-साथ ही शरद ऋतु का आगमन हुआ। अब शरद का प्रकाश फैल गया है। इस समय सवेरे उगने वाले सूरज में खरगोश की आँखों जैसी लालिमा होती है। कवि शरद का मानवीकरण करते हुए कहता है कि वह अपनी नयी चमकीली साइकिल को तेज गति से चलाते हुए और जोर-जोर से घंटी बजाते हुए पुलों को पार करते हुए आ रहा है। वह अपने चमकीले इशारों से पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को बुला रहा है।
दूसरे शब्दों में, कवि कहना चाहता है कि शरद ऋतु के आगमन से उत्साह, उमंग का माहौल बन जाता है। कवि कहता है कि शरद ने आकाश को मुलायम कर दिया है ताकि पतंग ऊपर उड़ सके। वह ऐसा माहौल बनाता है कि दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज उड़ सके। यानी बच्चे दुनिया के सबसे पतले कागज व बाँस की सबसे पतली कमानी से बनी पतंग उड़ा सकें। इन पतंगों को उड़ता देखकर बच्चे सीटियाँ किलकारियाँ मारने लगते हैं। इस ऋतु में रंग-बिरंगी तितलियाँ भी दिखाई देने लगती हैं। बच्चे भी तितलियों की भाँति कोमल व नाजुक होते हैं।

विशेष:

  1. कवि ने बिंबात्मक शैली में शरद ऋतु का सुंदर चित्रण किया है।
  2. बाल-सुलभ चेष्टाओं का अनूठा वर्णन है।
  3. शरद ऋतु का मानवीकरण किया गया है।
  4. उपमा, अनुप्रास, श्लेष, पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों का सुंदर प्रयोग है।
  5. खड़ी बोली में सहज अभिव्यक्ति है।
  6. लक्षणा शब्द-शक्ति का प्रयोग है।
  7. मिश्रित शब्दावली है।

    जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
    पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचन पैरों के पास
    जब वे दौड़ते हैं बेसुध
    छतों को भी नरम बनाते हुए
    दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
    जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
    डाल की तरह लचीले वेग सो अकसर
    छतों के खतरनाक किनारों तक-
    उस समय गिरने से बचाता हैं उन्हें
    सिर्फ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
    पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे।

शब्दार्थ:
कपास-इस शब्द का प्रयोग कोमल व नरम अनुभूति के लिए हुआ है। बेसुध-मस्त। मृदंग-ढोल जैसा वाद्य यंत्र। येगा भरना-झूला झूलना। डाल-शाखा। लचीला वेग-लचीली गति। अकसर-प्राय:। रोमांचित-पुलकित। महज-केवल, सिर्फ़।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘पतंग’ से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता आलोक धन्वा हैं। प्रस्तुत कविता में कवि ने प्रकृति में आने वाले परिवर्तनों व बालमन की सुलभ चेष्टाओं का सजीव चित्रण किया है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि बच्चों का शरीर कोमल होता है। वे ऐसे लगते हैं मानो वे कपास की नरमी, लोच आदि लेकर ही पैदा हुए हों। उनकी कोमलता को स्पर्श करने के लिए धरती भी लालायित रहती है। वह उनके बेचैन पैरों के पास आती है-जब वे मस्त होकर दौड़ते हैं। दौड़ते समय उन्हें मकान की छतें भी कठोर नहीं लगतीं। उनके पैरों से छतें भी नरम हो जाती हैं। उनकी पदचापों से सारी दिशाओं में मृदंग जैसा मीठा स्वर उत्पन्न होता है। वे पतंग उड़ाते हुए इधर से उधर झूले की पेंग की तरह आगे-पीछे आते-पतंग उड़ाते समय वे छतों के खतरनाक किनारों तक आ जाते हैं। यहाँ उन्हें कोई बचाने नहीं आता, अपितु उनके शरीर का रोमांच ही उन्हें बचाता है। वे खेल के रोमांच के सहारे खतरनाक जगहों पर भी पहुँच जाते हैं। इस समय उनका सारा ध्यान पतंग की डोर के सहारे, उसकी उड़ान व ऊँचाई पर ही केंद्रित रहता है। ऐसा लगता है मानो पतंग की ऊँचाइयों ने ही उन्हें केवल डोर के सहारे थाम लिया हो।

विशेष:

  1. कवि ने बच्चों की चेष्टाओं का मनोहारी वर्णन किया है।
  2. मानवीकरण, अनुप्रास, उपमा आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग है।
  3. खड़ी बोली में भावानुकूल सहज अभिव्यक्ति है।
  4. मिश्रित शब्दावली है।
  5. पतंग को कल्पना के रूप में चित्रित किया गया है।

3.
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
प्रुथ्वी और भी तेज घूमती हुई जाती है
उनके बचन पैरों के पास।
शब्दार्थ-रंध्रों-सुराखों। सुनहले सूरज-सुनहरा सूर्य।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘पतंग’ से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता आलोक धन्वा हैं। इस कविता में कवि ने प्रकृति में आने वाले परिवर्तनों व बालमन की सुलभ चेष्टाओं का सजीव चित्रण किया है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि आकाश में अपनी पतंगों को उड़ते देखकर बच्चों के मन भी आकाश में उड़ रहे हैं। उनके शरीर के रोएँ भी संगीत उत्पन्न कर रहे हैं तथा वे भी आकाश में उड़ रहे हैं।
कभी-कभार वे छतों के किनारों से गिर जाते हैं, परंतु अपने लचीलेपन के कारण वे बच जाते हैं। उस समय उनके मन का भय समाप्त हो जाता है। वे अधिक उत्साह के साथ सुनहरे सूरज के सामने फिर आते हैं। दूसरे शब्दों में, वे अगली सुबह फिर पतंग उड़ाते हैं। उनकी गति और अधिक तेज हो जाती है। पृथ्वी और तेज गति से उनके बेचैन पैरों के पास आती है।

विशेष:

  1. बच्चे खतरों का सामना करके और भी साहसी बनते हैं, इस भाव की अभिव्यक्ति है।
  2. मुक्त छंद का प्रयोग है।
  3. मानवीकरण, अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. खड़ी बोली में सहज अभिव्यक्ति है।
  5. दृश्य बिंब है।
  6. भाषा में लाक्षणिकता है।

IMPORTANT QUESTIONS

  1. उन परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए जो भादों बीतने के बाद प्रकृति में दृष्टिगोचर होते हैं।
  2. शरद ऋतु के आगमन के प्रति कवि की कल्पना अनूठी है, स्पष्ट कीजिए।
  3. शरद ऋतु का आकाश पर क्या प्रभाव पड़ता है, और कैसे?
  4. पृथ्वी का प्रत्येक कोना बच्चों के पास अपने-आप कैसे आ जाता है?
  5. भागते बच्चों के पदचाप दिशाओं को किस तरह सजीव बना देते हैं ?
  6. हल्की, रंगीन पतंगों और बालमन की समानताएँ स्पष्ट कीजिए।
  7. निम्नलिखित काव्यांशों के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(a) छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर।

(क) मृदग जैसी ध्वनि कहाँ से उत्पन्न हो रही हैं? उसका क्या प्रभाव पड़ रहा हैं?
(ख) काव्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य लिखिए।

(b) अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।

(क) काव्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ख) काव्य-पक्तियों का अलकार-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ग) काव्यांश की भाषा की दी विशेषताएँ लिखिए।

Ek Geet

Ek Geet

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एक गीत
निशा-निमंत्रण से उद्धृत इस गीत में कवि प्रकृति की दैनिक परिवर्तनशीलता के संदर्भ में प्राणी-वर्ग के धड़कते हृदय को सुनने की काव्यात्मक कोशिश व्यक्त करता है। किसी प्रिय आलंबन या विषय से भावी साक्षात्कार का आश्वासन ही हमारे प्रयास के पगों की गति में चंचल तेजी भर सकता है-अन्यथा हम शिथिलता और फिर जड़ता को प्राप्त होने के अभिशिप्त हो जाते हैं। यह गीत इस बड़े सत्य के साथ समय के गुजरते जाने के एहसास में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा भी लिए हुए है।

सार- कवि कहता है कि साँझ घिरते ही पथिक लक्ष्य की ओर तेजी से कदम बढ़ाने लगता है। उसे रास्ते में रात होने का भय होता है। जीवन-पथ पर चलते हुए व्यक्ति जब अपने लक्ष्य के निकट होता है तो उसकी उत्सुकता और बढ़ जाती है। पक्षी भी बच्चों की चिंता करके तेजी से पंख फड़फड़ाने लगते हैं। अपनी संतान से मिलने की चाह में हर प्राणी आतुर हो जाता है। आशा व्यक्ति के जीवन में नई चेतना भर देती है। जिनके जीवन में कोई आशा नहीं होती, वे शिथिल हो जाते हैं। उनका जीवन नीरस हो जाता है। उनके भीतर उत्साह समाप्त हो जाता है। अतरू रात जीवन में निराशा नहीं, अपितु आशा का संचार भी करती है।

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
1.
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं-
यह सोच थक7 दिन का पथी भी जल्दी-जल्दी चलता हैं!
दिन जल्दी-जल्दी ढोलता हैं!

शब्दार्थ- ढलता-समाप्त होता। यथ-रास्ता। मजिल-लक्ष्य। यथ-यात्री।

प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ से उद्धृत है। 8ईसा के रविता हरवंशराय बच्न हैं। इसगत में कवने एक जवना की कुंता तथा प्रेमा की व्याकुलता क वर्णना किया है।8

व्याख्या- कवि जीवन की व्याख्या करता है। वह कहता है कि शाम होते देखकर यात्री तेजी से चलता है कि कहीं रास्ते में रात न हो जाए। उसकी मंजिल समीप ही होती है इस कारण वह थकान होने के बावजूद भी जल्दी-जल्दी चलता है। लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उसे दिन जल्दी ढलता प्रतीत होता है। रात होने पर पथिक को अपनी यात्रा बीच में ही समाप्त करनी पड़ेगी, इसलिए थकित शरीर में भी उसका उल्लसित, तरंगित और आशान्वित मन उसके पैरों की गति कम नहीं होने देता।

विशेष-

  1. कवि ने जीवन की क्षणभंगुरता व प्रेम की व्यग्रता को व्यक्त किया है।
  2. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  3. भाषा सरल, सहज और भावानुकूल है, जिसमें खड़ी बोली का प्रयोग है।
  4. जीवन को बिंब के रूप में व्यक्त किया है।
  5. वियोग श्रृंगार रस की अनुभूति है।
  6. बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
    नीड़ों से झाँक रहे होंगे-
    यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
    दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

शब्दार्थ- प्रत्याशा-आशा। नीड़-घोंसला। पर-पंख। चचलता-अस्थिरता।

प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ से उद्धृत है। इस गीत के रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने एकाकी जीवन की कुंठा तथा प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है।
व्याख्या-कवि प्रकृति के माध्यम से उदाहरण देता है कि चिड़ियाँ भी दिन ढलने पर चंचल हो उठती हैं। वे शीघ्रातिशीघ्र अपने घोंसलों में पहुँचना चाहती हैं। उन्हें ध्यान आता है कि उनके बच्चे भोजन आदि की आशा में घोंसलों से बाहर झाँक रहे होंगे। यह ध्यान आते ही उनके पंखों में तेजी आ जाती है और वे जल्दी-जल्दी अपने घोंसलों में पहुँच जाना चाहती हैं।

विशेष-

  1. उक्त काव्यांश में कवि कह रहा है कि वात्सल्य भाव की व्यग्रता सभी प्राणियों में पाई जाती है।
  2. पक्षियों के बच्चों द्वारा घोंसलों से झाँका जाना गति एवं दृश्य बिंब उपस्थित करता है।
  3. तत्सम शब्दावली की प्रमुखता है।
  4. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. सरल, सहज और भावानुकूल खड़ी बोली में सार्थक अभिव्यक्ति है।

3.
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचला?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विहवलता हैं!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

शब्दार्थ- विकल-व्याकुल। हित-लिए, वास्ते। चंचल-क्रियाशील। शिथिल-ढीला। यद-पैर। उर-हृदय। विह्वलता-बेचौनी, भाव आतुरता।

प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ से उद्धृत है। इस गीत के रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने एकाकी जीवन की कुंठा तथा प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि इस संसार में वह अकेला है। इस कारण उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल नहीं होता, उसकी उत्कंठा से प्रतीक्षा नहीं करता, वह भला किसके लिए भागकर घर जाए। कवि के मन में प्रेम-तरंग जगने का कोई कारण नहीं है। कवि के मन में यह प्रश्न आने पर उसके पैर शिथिल हो जाते हैं। उसके हृदय में यह व्याकुलता भर जाती है कि दिन ढलते ही रात हो जाएगी। रात में एकाकीपन और उसकी प्रिया की वियोग-वेदना उसे अशांत कर देगी। इससे उसका हृदय पीड़ा से बेचौन हो उठता है।

विशेष-

  1. एकाकी जीवन बिताने वाले व्यक्ति की मनोदशा का वास्तविक चित्रण किया गया है।
  2. सरल, सहज और भावानुकूल खड़ी बोली का प्रयोग है।
  3. ‘मुझसे मिलने’ में अनुप्रास अलंकार तथा ‘मैं होऊँ किसके हित चंचल?’ में प्रश्नालंकार है।
  4. तत्सम-प्रधान शब्दावली है जिसमें अभिव्यक्ति की सरलता है।