Category: Class 9th

Smriti Class 9 Explanation with Question Answer

Smriti Class 9 Explanation with Question Answer

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे

“स्मृति”

पाठ के लेखक श्रीराम शर्मा हैं।

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लेखक परिचय

लेखक: श्रीराम शर्मा

जन्म: 1896

मृत्यु: 1990

स्मृति पाठ प्रवेश

इस पाठ में लेखक अपने बचपन की उस घटना का वर्णन करता है जब वह केवल ग्यारह साल का था और उसके बड़े भाई ने उससे कुछ महत्वपूर्ण चिठियों को डाकघर में डालने के लिए भेजा था और उसने गलती से वो चिठियाँ एक पुराने कुऍं में गिरा दी थी। उन चिठियों को उस कुऍं से निकालने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ हुई उन सभी का जिक्र लेखक ने यहाँ किया है। लेखक यहाँ यह भी समझाना चाहता है कि बचपन के वो दिन कितने ख़ास थे और वो उन दिनों को बहुत याद करता है।

Smriti Chapter 2 Summary

स्मृति पाठ सार

लेखक 1908 ई. में घटित एक घटना का वर्णन कर रहा है। उस समय कड़ी सर्दी पड़ रही थी। शाम के साढ़े तीन या चार बजे होंगे जब लेखक अपने कई साथियों के साथ झरबेरी के बेर तोड़-तोड़ कर खा रहा था कि तभी गाँव के पास से एक आदमी ने लेखक को जोर से आवाज लगा कर पुकारा और कहा कि लेखक के भाई लेखक को बुला रहे हैं इसलिए उसे जल्दी से ही घर लौट जाना चाहिए। लेखक उस आदमी की बात सुन कर घर की ओर चलने लगा। लेखक के साथ लेखक का छोटा भाई भी था। लेखक के मन में उसके बड़े भाई साहब से मार पड़ने का डर था इसलिए वह उदास सा घर की ओर चल रहा था। जब लेखक ने आँगन में भाई साहब को कोई पत्र लिखते पाया तब उसके मन से पिटने का डर दूर हो गया। जब लेखक और उसके छोटे भाई को लेखक के भाई साहब ने देखा तो भाई साहब ने उन दोनों से कहा कि उनके द्वारा लिखे गए पत्रों को ले जाकर मक्खनपुर में स्थित डाकखाने में डाल आओ। तेज़ी से जाना जिससे शाम की डाक में उनकी चिठियाँ निकल जाएँ ताकि ये चिठियाँ जल्दी ही वहाँ पहुँच जाए जहाँ उन्हें भेजा जाना है क्योंकि वे बहुत जरुरी थी। वे दिन जाड़े के दिन तो थे ही साथ ही साथ ठंडी हवा के कारण उन दोनों को कॅंप-कँपी भी लग रही थी।

लेखक और लेखक के भाई ने कानों को धोती से बाँधा। लेखक की माँ ने रास्ते में दोनों के खाने के लिए थोड़े से भुने हुए चने एक धोती में बाँध दिए थे। दोनों भाई अपना-अपना डंडा लेकर घर से निकल पड़े। उस समय उस बबूल के डंडे से उन लोगों को इतना प्यार था, जितना लेखक आज की उम्र में रायफल से भी नहीं करता। लेखक कहता है कि उसने न जाने कितने साँपों को उस डंडे से मारा था। चिठियों को लेखक ने अपनी टोपी में रख लिया था, क्योंकि लेखक के कुर्ते में जेबें नहीं थी। उछलते-कूदते, बहुत ही जल्दी गाँव से 220 गज दूर उस कुएँ के पास आ गए जिसमें एक बहुत ही भयंकर काला साँप गिरा हुआ था। मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली लेखक की टोली पूरी तरह बन्दर की टोली कही जाती थी। अपनी टोली की शरारतों के किस्सों में से एक किस्सा सुनाते हुए लेखक कहता है कि एक दिन लेखक और लेखक की टोली स्कूल से लौट रहे थे कि उनको कुएँ में पंजे के बल उचककर झाँकने की सूझी।

लेखक ने कुएँ में झाँककर एक पत्थर फेंका क्योंकि उनको जानना था की उसकी आवाज कैसी होती है। उसकी आवाज को सुनने के बाद उन्होंने अपनी आवाज की गूँज को कुँए में सुनने की सोची, परन्तु कुएँ में जैसे ही पत्थर गिरा, वैसे ही एक फुसकार सुनाई पड़ी। गाँव से मक्खनपुर जाते और मक्खनपुर से लौटते समय लेखक और लेखक के साथी हर दिन अब कुएँ में पत्थर डाला करते थे। लेखक कुएँ पत्थर डालने के लिए कुँए की ओर बढ़ा। छोटा भाई भी लेखक के पीछे इस तरह चल पड़ा जैसे बड़े हिरन के बच्चे के पीछे छोटा हिरन का बच्चा चल पड़ता है।

लेखक ने कुएँ के किनारे से एक पत्थर उठाया और उछलकर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर पत्थर गिरा दिया, परन्तु लेखक पर तो बिजली-सी गिर पड़ी क्योंकि उस समय जो घटना घटी उस घटना के कारण लेखक को यह भी याद नहीं कि साँप ने फुसकार मारी या नहीं, पत्थर साँप को लगा या नहीं। यह घटना थी टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिठियाँ चक्कर काटती हुई कुएँ में गिर जाने की। लेखक की आँखों में निराशा, पिटने के भय और घबराहट से रोने का उफान आता था। लेखक की पलकें उसके भीतरी भावों को रोकने का प्रयास कर रही थी, परन्तु उसके गालों पर आँसू ढुलक ही जाते थे। उस समय लेखक को माँ की गोद की याद आ रही थी। उसका जी चाह रहा था कि उसकी माँ आए उसे छाती से लगाए और लाड़-प्यार करके यह कह दे कि कोई बात नहीं, चिठियाँ तो फिर से लिख ली जाएँगी, रोने की कोई बात नहीं। लेखक का मन कर रहा था कि कुएँ में बहुत-सी मिट्टी डाल दें और घर जाकर यह झूठ कह दें कि वे दोनों चिठ्ठी डाल आए हैं, पर उस समय लेखक झूठ बोलना जानता ही नहीं था।

लेखक कहता है की यदि मन में किसी काम को करने का पक्का विचार कर लिया जाए तो परेशानियाँ अपने आप कम हो जाती हैं। लेखक की परेशानी भी दूर हो गई। क्योंकि लेखक ने कुएँ में घुसकर चिठियों को निकालने का निश्चय कर लिया था। यह बहुत ही भयानक निर्णय था क्योंकि निचे कुऍं में भयंकर कला साँप था। परन्तु लेखक कहता है कि जो मरने को तैयार हो, उसे किसी भी भयानक चीज़ से क्या? लेखक कहता है कि उसका छोटा भाई रो रहा था क्योंकि उसे लग रहा था कि लेखक की मौत उसे नीचे बुला रही है कहने का तात्पर्य यह है कि उसे लग रहा था कि अगर लेखक निचे कुँए में गया तो वह जरूर साँप के काटे जाने से मर जाएगा। लेखक को कुँए में जाने के लिए रस्सी की आवश्यकता थी और उनके पास अपने कपड़ों को ही रस्सी बनाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। एक धोती लेखक की, एक छोटे भाई की, एक वह जिसमे लेखक की माँ ने चने बाँधे थे, दो वह जो ठण्ड से बचने के लिए कानों से बँधी हुई थी, सब धोतियाँ मिला कर-पाँच धोतियाँ थी उन सब को और कुछ कुँए के पास पड़ी रस्सी मिलाकर कुएँ की गहराई के लिए काफी हुईं। लेखक कुएँ में धोती के सहारे जाने लगा तो उसका छोटा भाई रोने लगा। लेखक ने उसे भरोसा दिलाया कि लेखक कुएँ के नीचे पहुँचते ही साँप को मार देगा और लेखक को भी यही विश्वास था कि वह नीचे पहुँचते ही साँप को मार देगा। इस विश्वास का कारण यह था कि इससे पहले भी लेखक ने अनेक साँप मारे थे।

लेखक कहता है कि जब वह कुँए में उतर रहा था और जब कुएँ के धरातल से वह चार-पाँच गज ऊपर होगा, तब लेखक ने ध्यान से नीचे को देखा। लेखक ने जो देखा उसे देखकर लेखक हैरान हो गया। कुँए के धरातल पर साँप अपना फन फैलाए धरातल से एक हाथ ऊपर उठा हुआ लहरा रहा था। लेखक हमारी जानकारी के लिए कहता है कि कच्चे कुएँ का व्यास बहुत कम होता है। नीचे तो वह मुश्किल से डेढ़ गज से अधिक ही होगा। ऐसी दशा में कुएँ में लेखक साँप से अधिक-से-अधिक चार फुट की दूरी पर रह सकता था, वह भी ऐसी स्थिति में जब साँप लेखक से दूर रहने का प्रयत्न करता, पर उतरना तो लेखक को कुएँ के बीच में ही था, क्योंकि लेखक का साधन यानि उनके द्वारा बनाई गई वह धोती की रस्सी बीचोंबीच लटक रही थी।लेखक कहता है कि ऊपर से लटककर तो साँप को मारा नहीं जा सकता था। साँप को मारने के लिए कुँए में उतरना ही था। लेखक को एक उपाय सुझा। लेखक ने दोनों हाथों से धोती पकड़े हुए ही अपने पैर कुएँ की बगल में लगा दिए। दीवार से पैर लगाते ही कुछ मिट्टी नीचे गिरी और साँप ने फू करके उस मिट्टी पर मुँह मार कर हमला किया। लेखक के पैर भी दीवार से हट गए, और लेखक की टाँगें कमर से लटकती हुई समकोण बनाती रहीं, इससे लेखक को यह फायदा हुआ कि लेखक को साँप से दूरी और कुएँ की परिधि पर उतरने का ढंग मालूम हो गया। लेखक ने झूलकर अपने पैर कुएँ की बगल से सटाए, और कुछ धक्वे देने के साथ ही वह अपने शत्रु के सामने कुँए की दूसरी ओर डेढ़ गज पर-कुएँ के धरातल पर खड़ा हो गया। लेखक और साँप दोनों की आँखें एक दूसरे से मिली। लेखक कहता है कि साँप को आँखों द्वारा सुनने वाला कहा जाता है क्योंकि साँप के कान नहीं होते।

लेखक कहता है कि उस स्थिति ने वह स्वयं भी आँखों से सुनने वाला हो रहा था। क्योंकि उसकी बाकि की इन्द्रियां काम नहीं कर रही थी। लेखक कहता है कि लाठी या डंडा चलाने के लिए काफी जगह चाहिए होती है जिसमें वे घुमाए जा सकें। एक तरीका और था कि साँप को डंडे से दबाया जा सकता था, पर ऐसा करना मानो तोप के मुहाने पर खड़ा होना था। यदि फन या उसके समीप का भाग न दबा, तो फिर वह साँप पलटकर जरूर काटता, और अगर हिम्मत करके लेखक फन के पास दबा भी देता तो फिर उसके पास पड़ी हुई दो चिठियों को वह कैसे उठाता? दो चिठियाँ साँप के पास उससे सटी हुई पड़ी थीं और एक लेखक की ओर थी। लेखक तो चिठियाँ लेने ही कुँए में उतरा था। अब तक साँप ने कोई वार नहीं किया था, इसलिए लेखक ने भी उसे डंडे से दबाने का खयाल छोड़ दिया। लेखक के पास मारना या बिलकुल छेड़खानी न करना-ये दो रास्ते थे। इसलिए लेखक कहता है कि पहला तो लेखक की शक्ति के बाहर था। मजबूर होकर लेखक को दूसरे रास्ते का सहारा लेना पड़ा।

लेखक कहता है कि जैसे ही उसने साँप की दाईं ओर पड़ी चिठ्ठी की ओर डंडे को बढ़ाया वैसे ही साँप का फन पीछे की ओर हुआ। धीरे-धीरे डंडा चिठ्ठी की ओर बढ़ा और जैसे ही चिठ्ठी के पास पहुँचा साँप की फुँकार के साथ काली बिजली तड़पी और डंडे पर गिरी। वह पीव और कुछ नहीं बल्कि विष था। लेखक के भाई को लगा कि लेखक की साँप के काटने से मौत हो गई है। लेखक को साँप के काटने से होने वाले दर्द और लेखक से बिछुड़ जाने के खयाल से ही लेखक के छोटे भाई के कोमल हृदय को धक्का लगा। भाई के प्यार के ताने-बाने को चोट लगी। उसकी चीख निकल गई। अर्थात वह बहुत अधिक डर गया। लेखक ने दुबारा फिर से उसी प्रकार लिफ़ाफ़े को उठाने की कोशिश की। इस बार साँप ने फिर से वार किया और और इस बार वह डंडे से चिपट ही गया। जब लेखक ने डंडे के अपनी ओर खिंचा तो लेखक और साँप की स्थिति बदल गई। लेखक ने तुरंत ही लिफ़ाफ़े और पोस्टकार्ड चुन लिए। चिठियों को धोती के किनारे में बाँध दिया, और छोटे भाई ने उन्हें ऊपर खींच लिया। लेखक को डंडे को साँप के पास से उठाने में भी बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा।

लेखक कहता है कि चिठियाँ हासिल करने के बाद अब ऊपर चढ़ना कोई कठिन काम नहीं था। केवल हाथों के सहारे, पैरों को बिना कहीं लगाए हुए 36 फुट ऊपर चढ़ना लेखक से अब नहीं हो सकता। अब लेखक 15-20 फुट बिना पैरों के सहारे, केवल हाथों के बल, चढ़ने की हिम्मत रखता है। परन्तु उस समय ग्यारह वर्ष की अवस्था में लेखक केवल हाथों के सहारे, पैरों को बिना 36 फुट चढ़ा। शरीर को अच्छी तरह साफ करके धोती-कुर्ता पहन लिया। किशनपुर के एक लड़के ने लेखक को कुँए से बाहर आते देख लिया था, उस लड़के से लेखक ने बहुत आग्रह किया कि वह कुएँ वाली घटना किसी से न कहे, यह सब करने के बाद वे लोग आगे बढ़े। सन् 1915 में लेखक ने मैट्रीक्युलेशन पास करने के बाद यह सारी घटना अपनी माँ को सुनाई। नम आँखों से माँ ने लेखक को अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया जैसे चिड़िया अपने बच्चों को अपने पंख के नीचे छिपा लेती है। लेखक अपने बचपन के उन दिनों के याद करता हुआ कहता है कि वे कितने अच्छे दिन थे। उस समय रायफल नहीं होती थी, डंडा होता था और डंडे का शिकार-कम-से-कम उस साँप का शिकार-रायफल के शिकार से कम आश्चर्यजनक और भयानक नहीं होते थे।।

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Smriti Chapter 2 Question Answers

स्मृति पाठ प्रश्न अभ्यास

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1: भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?

उत्तर: भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में भाई के हाथ से पिटाई होने का डर था। लेखक को लग रहा था कि बड़े भाई को बेर तोड़ने वाली बात पता चल गई होगी या उसकी किसी और शरारत का पता चल गया होगा और इसलिए वे उसे पीटने के लिए बुला रहे होंगे। पिटाई के खयाल से ही लेखक का दिल दहल उठा था।

प्रश्न 2: मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढ़ेला क्यों फेंकती थी?

उत्तर: मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढ़ेला जरूर फेंकती थी। वे बच्चे ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें ढ़ेला फेंके जाने पर आने वाली आवाज को सुनकर बड़ा मजा आता था। उस कुएँ के अंदर एक साँप गिर गया था। ढ़ेला फेंकने पर उस साँप की फुफकार सुनाई देती थी, जिसे सुनकर सभी बच्चों को बहुत आनन्द आता था।

प्रश्न 3: ‘साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढ़ेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’ – यह कथन लेखक कि किस मनोदशा को स्पष्ट करता है?

उत्तर: जब लेखक ने ढ़ेला फेंकने के पहले अपनी टोपी उतारी तो चिट्ठियाँ कुएँ में जा गिरीं। उसके बाद तो लेखक का सारा ध्यान उन चिट्ठियों पर चला गया। उस समय वे चिट्ठियाँ उसे ढ़ेले, या कुएँ या साँप से अधिक महत्वपूर्ण थीं। लेखक का डर के मारे बुरा हाल था क्योंकि लेखक के भाई ने उन्हें उन्हीं चिठियों को जल्दी से जल्दी डाकखाने में डालने को कहा था।

प्रश्न 4: किन कारणों से लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया?

उत्तर: लेखक को उसके बड़े भाई ने चिट्ठी डाकखाने में डालने का काम सौंपा था। लेखक चाहता तो चिट्ठियों को वहीं छोड़ देता और घर जाकर झूठ बोल देता। लेकिन लेखक ने तब तक झूठ बोलना नहीं सिखा था और उसकी उम्र के किसी भी निश्छल बालक की तरह था। वह हर कीमत पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहता था। इसलिए लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया।

प्रश्न 5: साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या-क्या युक्तियाँ अपनाई?

उत्तर: साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने कई युक्तियाँ अपनाई। पहले उसने थोड़ी मिट्टी लेकर साँप की ओर फेंक दी। उसके बाद उसने डंडे से साँप का ध्यान बँटाया। इससे लेखक को कुछ सफलता जरूर मिली।

प्रश्न 6: कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालने संबंधी साहसिक वर्णन को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: जब लेखक ने यह निश्चय कर लिया कि वह कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालेगा फिर उसने आगे का कार्य शुरु कर दिया। उसने अपनी और अपने भाई की धोतियों को आपस में बाँध कर एक लंबी रस्सी जैसी बनाई। फिर उसने धोती के एक सिरे को कुएँ की डेंग से बाँध दिया। दूसरे सिरे पर उसने लाठी बाँध दी ताकि अंदर जाकर साँप को मार सके। लेखक ने उसके पहले भी कितने ही साँपों को अपने डंडे से मौत के घाट उतारा था इसलिए वह अपनी सफलता को लेकर थोड़ा आश्वस्त था। लेखक धोती के सहारे धीरे-धीरे कुएँ में उतर गया। साँप से एक सुरक्षित ऊँचाई बनाते हुए उसने साँप का मुआयना किया। साँप अपनी पूँछ के बल पर लगभग सीधा खड़ा था और ऊपर ही देख रहा था। डंडे के हिलने डुलने के कारण साँप को लेखक के आगमन का पता चल चुका था। साँप को देखकर लेखक की हिम्मत जवाब दे रही थी। लेखक ने अपने पैरों को कुएँ की दीवार से टिकाया तो थोड़ी मिट्टी झरकर साँप के ऊपर गिरी। फिर वह तेजी से कुएँ की सामने की दीवार की ओर झूलता हुए कुएँ के सूखे धरातल पर कूद गया। अब वह साँप से कोई डेढ़ गज की दूरी पर खड़ा था। दोनों एक दूसरे से आँखें चार कर रहे थे जैसे एक दूसरे को सम्मोहित करने की कोशिश कर रहे हों। कुएँ के अंदर इतनी जगह नहीं थी डंडे से साँप पर वार किया जा सके। ऐसे में साँप द्वारा जवाबी हमले की आशंका भी थी। इसलिए लेखक ने साँप को मारने का विचार त्याग दिया। दो चिट्ठियाँ साँप के पास थीं और एक चिट्ठी लेखक के पास। लेखक ने डंडे से साँप का ध्यान भटकाना चाहा तो साँप ने जवाब में डंडे पर तेजी से प्रहार किया और जहर की ताजा बूँदें डंडे पर चकमने लगीं। इस दौरान डंडा लेखक की हाथ से छूट गया। कुछ डर के मारे और कुछ जान बचाने के खयाल से लेखक हवा में ऊपर तक उछला और फिर धम्म से जमीन पर आ गया। उसे ऐसा करते देख उसके छोटे भाई की चीख निकल गई। छोटे भाई ने समझा कि बड़े भाई को साँप ने डस लिया था। साँप ने अपनी मारक शक्ति का नमूना डंडे पर छोड़ दिया था। लेखक ने फिर से डंडा उठाकर प्रयास किया। इस बार साँप ने फिर से डंडे पर वार किया लेकिन इस बार डंडा लेखक के हाथ से नहीं छूटा। मौका मिलते ही लेखक ने दोनों चिट्ठियाँ अपने हाथ में ले ली। इस कोशिश में लेखक के हाथ साँप के पिछले भाग से छू गये। साँप के शरीर की ठंडक ने तो लेखक के खून ही जमा दिये। लेखक ने धोती में चिट्ठियों को बाँधा और छोटे भाई को उसे खींचने का इशारा किया। उसके बाद वह अपने हाथों के बल कुएँ की दीवार चढ़ता चला गया।

प्रश्न 7: इस पाठ को पढ़ने के बाद किन-किन बाल सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है?

उत्तर: इस पाठ से कई बाल सुलभ शरारतों का पता चलता है। बच्चे अक्सर पेड़ों से बेर, आम और अमरूद तोड़ कर खाया करते हैं। वे बिना मतलब जहाँ तहाँ ढ़ेले फेंकते हैं। वे साँप को देखकर उसे मारने निकल पड़ते हैं। लेकिन आजकल के शहरी बच्चे ऐसी शरारतें नहीं कर पाते हैं।

प्रश्न 8: ‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’–  का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कहते हैं कि कभी कभी बड़ी से बड़ी योजना भी धरी रह जाती है। मनुष्य अपने अनुमान के आधार पर कुछ योजनाएँ बनाता है। लेकिन उसका अनुमान गलत होने की दशा में वह कुछ नहीं कर पाता। ऐसा ही लेखक के साथ हुआ। वह तो साँप को मारने के खयाल से कुएँ में उतरा था। लेकिन कुएँ में इतनी जगह नहीं थी कि लाठी को ठीक से चलाया जा सके। वह डंडे से साँप के फन को कुचलने की कोशिश भी नहीं कर सकता था क्योंकि निशाना चूक जाने की स्थिति में साँप के जवाबी हमले का खतरा था। लेखक के पास भागने के लिए भी कोई जगह नहीं थी। वह बड़ी ही मुश्किल स्थिति में फँसा हुआ था।

प्रश्न 9: ‘फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है’– पाठ के संदर्भ में इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लेखक का लक्ष्य था किसी भी तरह से चिट्ठियों को निकाल कर जिंदा वापस लौटना। इस काम में कई अड़चनें थीं। कुएँ के अंदर जगह तंग थी। साँप एक विषधर था जिसके काटने पर जिंदा बचना नामुमकिन था। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता था कि कुएँ के अंदर असल में क्या घटने वाला था। उस होने वाली घटना पर लेखक का कोई नियंत्रण नहीं था। जो भी होना था सब भगवान भरोसे था।

बच्चों!

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Vaigyanik Chetna Ke Vahak Class 9th Summary

Vaigyanik Chetna Ke Vahak Chandrashekhar Venkat Raman class 9 question and answers

हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे
वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन
पाठ के लेखक धीरंजन मालवे हैं
बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचय : धीरंजन मालवे
जन्म : 1952
धीरंजन मालवे का जन्म बिहार के नालंदा जिले में 9 मार्च 1952 को हुआ। ये एम. एस. सी., एम. बी . ए. और एल. एल. बी. है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़ें मालवे अभी भी वैज्ञानिक जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के काम में जुटे हुए है।
मालवे की भाषा सीधी, सरल और वैज्ञानिक शब्दावली लिए हुए है। यथावश्यक अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग भी वे करते है।

पाठ प्रवेश: वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन

प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। वेंकट रामन् कुल ग्यारह साल की उम्र में मैट्रिक, विशेष योग्यता के साथ इंटरमीडिएट, भौतिकी और अंग्रेशी में स्वर्ण पदक के साथ बी.ए. और प्रथम श्रेणी में एम.ए. करके मात्र अठारह साल की उम्र में कोलकाता में भारत सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट में सहायक जनरल एकाउंटेंट नियुक्त कर लिए गए थे। इनकी प्रतिभा से इनके अध्यापक तक अभिभूत थे।
चंद्रशेखर वेंकट रामन् भारत में विज्ञान की उन्नति के चिर आकांक्षी थे तथा भारत की स्वतंत्राता के पक्षधर थे। वे महात्मा गांधी को अपना अभिन्न मित्रा मानते थे। नोबेल पुरस्कार समारोह के बाद एक भोज के दौरान उन्होंने कहा था: मुझे एक बधाई का तार अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र (महात्मा गांधी) से मिला है, जो इस समय जेल में हैं। एक मेधावी छात्र से महान वैज्ञानिक तक की रामन् की संघर्षमय जीवन यात्रा और उनकी उपलब्धियों की जानकारी यह पाठ बखूबी कराता है।

पाठ सार: वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन
प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन्’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। लेखक कहता है कि सन् 1921 की बात है, जब रामन् एक बार समुद्री यात्रा कर रहे थे। रामन् को जहाज के डेक पर खड़े होकर नीले समुद्र को देखना, प्रकृति को प्यार करना अच्छा लगता था। उनके अंदर एक वैज्ञानिक की जानने की इच्छा भी उतनी ही मज़बूत थी। लेखक कहता है कि यही जानने की इच्छा के कारण उनके मन में सवाल उठा कि ‘आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है? कुछ और क्यों नहीं?’ रामन् सवाल का जवाब ढूँढ़ने में लग गए। जवाब ढूँढ़ते ही वे संसार में प्रसिद्ध हो गए।
रामन् का जन्म 7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। रामन् के पिता रामन् को बचपन से ही गणित और फ़िज़िक्स पढ़ाते थे। लेखक कहता है कि रामन् मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने कॉलेज के समय से ही उन्होंने अनुसंधान के कार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था। उनकी दिली इच्छा तो यही थी कि वे अपना सारा जीवन अनुसंधान के कामों को ही समर्पित कर दें, मगर उन दिनों अनुसंधान के कार्य को पूरे समय के कैरियर के रूप तेज़ बुद्धि वाले में अपनाने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। रामन् अपने समय के अन्य तेज़ बुद्धि वाले छात्रों की ही तरह भारत सरकार के आय-व्यय से संबंधित विभाग में अफसर बन गए। लेखक कहता है कि रामन ने कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी अपने स्वाभाव के अनुसार अनुसंधान के कार्य के प्रति अपने झुकाव को बनाए रखा। दफ़तर से समय मिलते ही वे लौटते हुए बहू बाजार आते थे, वहाँ ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’ की प्रयोगशाला थी।
लेखक कहता है कि यह प्रयोगशाला अपने आपमें एक अनूठी संस्था थी, जिसे कलकत्ता के एक डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार ने वर्षों की कठिन मेहनत और लगन के बाद खड़ा किया था। लेखक कहता है कि इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना था। अपने महान् उद्देश्यों के बावजूद इस संस्था के पास औजारों की बहुत अधिक कमी थी। लेखक कहता है कि उन्हीं दिनों रामन वाद्ययंत्रों की ओर भी आकर्षित हुए। पश्चिमी देशों को भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया लगते थे और रामन ने वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर पश्चिमी देशों के इस संदेह को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया हैं।
लेखक कहता है कि उन्हीं दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद निकले हुए थे। मुखर्जी महोदय ने रामन् के सामने प्रस्ताव रखा कि वे सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद स्वीकार कर लें। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था क्योंकि लेखक कहता है कि उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित सरकारी पद पर थे, जिसके साथ मोटी तनख्वाह और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। उन्हें नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत चुके थे। ऐसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओं वाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फैसला करना रामन के लिए बहुत हिम्मत का काम था।लेखक कहता है कि रामन् सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी में आ गए थे। सन् 1921 में जब रामन समुद्र-यात्रा कर रहे थे तो उस समय जब रामन् के मस्तिष्क में समुद्र के नीले रंग की वजह का सवाल बार-बार उठने लगा, तो उन्होंने इस दिशा में कई प्रयोग किए, जिसका परिणाम रामन् प्रभाव की खोज के रूप में सभी के सामने आया। लेखक कहता है कि रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। एकवर्णीय प्रकाश की किरणों में सबसे अधिक ऊर्जा बैंजनी रंग के प्रकाश में होती है। बैंजनी के बाद क्रम के अनुसार नीले, आसमानी, हरे, पीले, नारंगी और लाल रंग का नंबर आता है। इस प्रकार लाल-रंग की प्रकाश की ऊर्जा सबसे कम होती है। आइंस्टाइन से पहले के वैज्ञानिक प्रकाश को तरंग के रूप में मानते थे, मगर आइंस्टाइन ने ही सबसे पहले यह बताया था कि प्रकाश बहुत ही छोटे छोटे कणों की तेज़ धारा के समान है। इन बहुत ही छोटे छोटे कणों की तुलना आइंस्टाइन ने बुलेट से की और इन्हें ‘प्रोटोन’ नाम दिया।
लेखक कहता है कि रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया, क्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफतौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण बहुत ही तेज़ गति के सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है। लेखक कहता है कि रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज आसान हो गया। पहले इस काम के लिए अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान का सहारा लिया जाता था। लेखक कहता है कि यह मुश्किल तकनीक है और गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थों के अणुओं की और परमाणुओं की बनावट के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक सही-सही जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का प्रयोगशाला में मिलान करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थों का बनावटी रूप से निर्माण करना संभव हो गया है।लेखक कहता है कि रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। रामन के जीवन में अब तो पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। सन् 1954 में रामन् को देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। लेखक कहता है कि रामन् नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे।
लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा ही गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अखंडित रखा अर्थात उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को नष्ट नहीं होने दिया। लेखक कहता है कि रामन विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए करेंट साइंस नामक एक पत्रिका का भी संपादन करते थे। रामन् प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं था; उन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को प्रकाशित और प्रभावित किया। उनकी मृत्यु 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुई। लेखक कहता है कि रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणों की चमक के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी ही चीज़े बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं। लेखक कहता है कि हमें केवल ज़रूरत है रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने की।

वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन प्रश्न अभ्यास

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 25-30 शब्दों में लिखिए –
प्रश्न 1 : कॉलेज कि दिनों में रामन की दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर : कॉलेज के दिनों में रामन की दिली इच्छा थी कि अपना पूरा जीवन शोधकार्य को समर्पित कर दें। लेकिन उस जमाने में शोधकार्य को एक पूर्णकालिक कैरियर के रूप में अपनाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। परन्तु रामन ने अपनी दिली इच्छा को पूरा किया।

प्रश्न 2 : वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन ने कौन सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर : लोगों का मानना था कि भारतीय वाद्ययंत्र पश्चिमी वाद्ययंत्र की तुलना में अच्छे नहीं होते हैं। रामन ने अपनी खोजों से इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की।

प्रश्न 3 : रामन के लिए नौकरी संबंधी कौन सा निर्णय कठिन था?
उत्तर : उस जमाने के हिसाब से रामन सरकारी विभाग में एक प्रतिष्ठित अफसर के पद पर तैनात थे। उन्हें मोटी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। उस नौकरी को छोड़कर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी करने का फैसला बहुत कठिन था।

प्रश्न 4 : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन को समय समय पर किन किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उत्तर : रामन को 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित किया गया। 1929 में उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी गई। 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें कई अन्य पुरस्कार भी मिले; जैसे रोम का मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी का ह्यूज पदक, फिलाडेल्फिया इंस्टीच्यूट का फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार, आदि। उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 5 : रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर : रामन को अधिकतर पुरस्कार तब मिले जब भारत अंग्रेजों के अधीन था। वैसे समय में यहाँ पर वैज्ञानिक चेतना का सख्त अभाव था। रामन को मिलने वाले पुरस्कारों से भारत की न सिर्फ वैज्ञानिक चेतना जाग्रत हुई बल्कि भारत का आत्मविश्वास भी बढ़ा।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में लिखिए –
प्रश्न 1 : रामन के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?
उत्तर : हठयोग में योगी अपने शरीर को असह्य पीड़ा से गुजारता है। रामन भी कुछ ऐसा ही कर रहे थे। वे पूरे दिन सरकारी नौकरी में कठिन परिश्रम करते थे और उसके बाद बहु बाजार स्थित प्रयोगशाला में वैज्ञानिक शोध करते थे। उस प्रयोगशाला में बस कामचलाउ उपकरण ही थे। इसलिए रामन के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग कहा गया है।

प्रश्न 2 : रामन की खोज ‘रामन प्रभाव’ क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। ऐसा इसलिए होता है कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण के फोटॉन किसी तरल या ठोस रवे से गुजरते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो टक्कर के बाद या तो वे कुछ ऊर्जा खो देते हैं या कुछ ऊर्जा पा जाते हैं। ऊर्जा में परिवर्तन के कारण प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव आता है। ऊर्जा के परिमाण में परिवर्तन के हिसाब से प्रकाश का रंग किसी खास रंग का हो जाता है। इसे ही रामन प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 3 : ‘रामन प्रभाव’ की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन कौन से कार्य संभव हो सके?
उत्तर : रामन प्रभाव की खोज से अणुओं और परमाणुओं के अध्ययन का कार्य सहज हो गया। यह काम पहले इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा किया जाता था और अब रामन स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा किया जाने लगा। इस खोज से कई पदार्थों का कृत्रिम संश्लेषण संभव हो पाया।

प्रश्न 4 : देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के महत्वपूर्ण योगदान प्र प्रकाश डालिए।
उत्तर : देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने के लिए रामन के कई काम किए। रामन ने बंगलोर में एक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की, जिसे अब रामन रिसर्च इंस्टीच्यूट के नाम से जाना जाता है। भौतिक शास्त्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल ऑफ फिजिक्स नामक शोध पत्रिका प्रारंभ की। उन्होंने अपने जीवन काल में सैंकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया। विज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए वे करेंट साइंस नामक पत्रिका का संपादन भी करते थे।

प्रश्न 5 : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन ने हमेशा ये संदेश दिया कि हम विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करें। न्यूटन ने ऐसा ही किया था और तब जाकर दुनिया को गुरुत्वाकर्षण के बारे में पता चला था। रामन ने ऐसा ही किया था और तब जाकर दुनिया को पता चला कि समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है, कोई और क्यों नहीं। जब हम अपने आस पास घटने वाली घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषन करेंगे तो हम प्रकृति के बारे में और बेहतर ढ़ंग से जान पाएँगे।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए –
प्रश्न 1 : उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
उत्तर : रामन एक ऐसी नौकरी में थे जहाँ मोटी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। लेकिन रामन ने उस नौकरी को छोड़कर ऐसी जगह नौकरी करने का निर्णय लिया जहाँ वे सारी सुविधाएँ नहीं थीं। लेकिन नई नौकरी में रहकर रामन अपने वैज्ञानिक शोध का कार्य बेहतर ढ़ंग से कर सकते थे। यह दिखाता है कि उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

प्रश्न 2 : हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।
उत्तर : हमारे पास अनेक ऐसी चीजें हैं या घटनाएँ घटती रहती हैं जिन्हें हम जीवन का एक सामान्य हिस्सा मानकर चलते हैं। लेकिन उन्ही चीजों में कोई जिज्ञासु व्यक्ति महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहस्य खोज लेता है। फिर हम जैसे नींद से जागते हैं और उस नई खोज से विस्मित हो जाते हैं। किसी की जिज्ञासा उस सही पात्र की तरह है जिसमें किसी वैज्ञानिक खोज को मूर्त रूप मिलता है।

प्रश्न 3 : यह अपने आप में एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था।
उत्तर : इस पंक्ति में लेखक रामन के अथक परिश्रम के बारे में बता रहा है। रामन उस समय एक सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। अपने दफ्तर में पूरे दिन काम करने बाद जब वे शाम में निकलते थे तो घर जाने की बजाय सीधा बहु बाजार स्थित प्रयोगशाला में जाते थे। वे प्रयोगशाला में घंटों अपने शोध पर मेहनत करते थे। पूरे दिन दफ्तर में काम करने के बाद फिर प्रयोगशाला में काम करना बहुत मुश्किल होता है। यह शारीरिक और मानसिक तौर पर थका देता है। इसलिए लेखक ने ऐसे काम को हठयोग की संज्ञा दी है।

Hamid Khan Class 9 Summary and Question Answer

Hamid Khan Class 9 Summary and Question Answer

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वी की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

हामिद खाँ’

पाठ के लेखक एस. के. पोट्टेकाट हैं।

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लेखकः एस. के. पोट्टेकाट

जन्मः 1913

S K Pottekatt

हामिद खाँ पाठ प्रवेश

इस पाठ में लेखक को जब (पाकिस्तान) तक्षशिला में किन्हीं शरारती तत्वों के द्वारा आग लगाए जाने का समाचार मिलता है तो लेखक वहाँ के अपने एक मित्र और उसकी दूकान की चिंता होने लगती है क्योंकि उस मित्र की दूकान तक्षशिला के काफी नजदीक थी। इस पाठ में लेखक अपने उस अनुभव को हम सभी के साथ साँझा कर रहा है जब वह (पाकिस्तान) तक्षशिला के खण्डरों को देखने गया था और भूख और कड़कड़ाती धुप से बचने के लिए कोई होटल खोज रहा था। होटल को खोजते हुए लेखक जब हामिद खाँ नाम के व्यक्ति की दूकान में कुछ खाने के लिए रुकता है तो जो भी वहाँ घटा लेखक ने उसे एक लेख के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत किया है।

Hamid Khan Class 9 Chapter 5 Summary

हामिद खाँ पाठ सार

लेखक यहाँ अपने एक अनुभव को बताता हुआ कहता है कि जब लेखक ने तक्षशिला जो की पाकिस्तान में है वहाँ पर शरारती लोगों द्वारा आग लगाने के बारे में समाचार पत्र में खबर पढ़ी तो खबर पढ़ते ही लेखक को हामिद खाँ याद आया। लेखक ने भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान! उसके हामिद खाँ की दुकान को इस शरारती लोगों द्वारा लगाई गई आग से बचा लेना। अब लेखक अपने और हामिद खाँ के रिश्ते के बारे में बताता हुआ कहता है कि एक ओर कड़कड़ाती धूप थी और दूसरी ओर भूख और प्यास के मारे लेखक का बुरा हाल हो रहा था। परेशान हो कर लेखक रेलवे स्टेशन से करीब पौन मील की दूरी पर बसे एक गाँव की ओर निकल पड़ा। जब वह उस गाँव में होटल ढूंढ रहा था तब अचानक एक दुकान लेखक को नजर आई जहाँ चपातियाँ पकाई जा रही थीं। चपातियों की सोंधी महक से लेखक के पाँव अपने आप उस दुकान की ओर मुड़ गए। दूकान में लेखक ने देखा कि एक ढलती उम्र का पठान अँगीठी के पास सिर झुकाए चपातियाँ बना रहा था।

लेखक ने जैसे ही दुकान में प्रवेश किया, वह अपनी हथेली पर रखे आटे को बेलना छोड़कर लेखक की ओर घूर-घूरकर देखने लगा। उसे घूरता हुआ देख कर भी लेखक उसकी तरफ देखकर मुसकरा दिया। लेखक बताता है कि लेखक के उसकी ओर मुस्कुराने के बाद भी उसके चेहरे के हाव-भाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। लेखक ने बहुत ही धीमी आवाज में उस चपाती बनाने वाले पठान से पूछा कि खाने को कुछ मिलेगा? उस पठान ने लेखक से कहा कि चपाती और गोश्त या सब्जी का मसालेदार शोरबा है, ये कह के उस पठान ने लेखक को एक बेंच की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वहाँ बैठ जाइए। उस दूकान के एक कोने में एक खाट पड़ी हुई थी जिस पर एक दाढ़ी वाला बुड्ढा गंदे तकिए पर कोहनी टेके हुए हुक्का पी रहा था। जब वह दूकान में बैठा हुआ अपने खाने का इंतजार कर रहा था तब चपाती को अंगारों पर रखते हुए उस अधेड़ उम्र के पठान ने लेखक से पूछा कि लेखक कहाँ का रहने वाला है?

लेखक ने उसे जवाब दिया कि लेखक मालाबार का रहने वाला है। उस पठान ने मालाबार नाम नहीं सुना था। आटे को हाथ में लेकर गोलाकार बनाते हुए पठान ने फिर लेखक से मालाबार के बारे में पूछा कि क्या यह हिंदुस्तान में ही है ? लेखक ने हाँ में उत्तर देते हुए कहा कि यह भारत के दक्षिणी छोर-मद्रास के आगे है। पठान ने फिर लेखक से पूछा कि क्या लेखक हिंदू हैं? लेखक ने फिर हाँ में उत्तर दिया और कहा कि उसका जन्म एक हिंदू घर में हुआ है। लेखक से यह सुनने पर कि वह एक हिन्दू है उस पठान ने एक फीकी मुसकराहट के साथ फिर पूछा कि क्या लेखक एक हिन्दू होते हुए मुसलमानी होटल में खाना खाएगा? इस पर लेखक ने कहा कि क्यों नहीं?

लेखक वहाँ खाना जरूर खाएगा और लेखक ने उस पठान से कहा कि जहाँ लेखक रहता है वहाँ तो अगर किसी को बढि़या चाय पीनी हो, या बढि़या पुलाव खाना हो तो वे लोग बिना किसी हिचकिचाहट के मुसलमानी होटल में जाया करते हैं। पठान लेखक की इस बात पर विश्वास नहीं कर पाया था। लेखक कहता है कि लेखक ने उसे बड़े गर्व के साथ बताया था कि लेखक के शहर में हिंदू-मुसलमान में कोई फर्क नहीं है। सब मिल-जुलकर रहते हैं। लेखक ने पठान को यह भी बताया था कि भारत में मुसलमानों ने जिस पहली मस्जिद का निर्माण किया था, वह लेखक के ही राज्य के एक स्थान ‘कोडुंगल्लूर’ में है।

लेखक ने पठान से बात करते हुए उसका शुभ नाम पूछा। उस पठान ने अपना नाम हामिद खाँ बताया और यह भी बताया कि वो जो चारपाई पर बैठे हैं, वो उसके पिता हैं। पठान ने लेखक को दस मिनट तक इंतजार करने के लिए कहा क्योंकि गोश्त या सब्जी का मसालेदार शोरमा अभी पक रहा था। लेखक भी इंतजार करने लगा।

लेखक कहता है कि हामिद खाँ ने जोर से किसी अब्दुल को आवाज लगाई। उसके आवाज लगते ही एक छोकरा दौड़ता हुआ आया जो आँगन में चटाई बिछाकर लाल मिर्च सुखा रहा था। हामिद ने उनकी किसी प्राचीन भाषा में उसे कुछ आदेश दिया। वह दुकान के पिछवाड़े की तरफ भागा। उसने एक थाली में चावल लाकर लेखक के सामने रख दिया, हामिद खाँ ने तीन-चार चपातियाँ उसमें रख दीं, फिर लोहे की प्लेट में गोश्त या सब्जी का शोरमा परोसा। छोकरा साफ पानी से भरा एक कटोरा मेज पर रखकर चला गया।

लेखक ने बड़े शौक से भरपेट खाना खाया। खाना खाने के बाद जेब में हाथ डालते हुए लेखक ने हामिद खाँ से पूछा कि भोजन के कितने पैसे हुए?

हामिद खाँ ने मुसकराते हुए लेखक का हाथ पकड़ लिया और बोला कि लेखक उसे माफ कर दें क्योंकि वह भोजन के पैसा नहीं लेगा क्योंकि लेखक हामिद खाँ का मेहमान हैं। हामिद खाँ की इस बात को सुन कर लेखक ने बड़े प्यार से हामिद खाँ से कहा कि मेहमाननवाजी की बात अलग है। एक दुकानदार के नाते हामिद खाँ को खाने के पैसे लेने पड़ेंगे।

लेखक ने हामिद खाँ को लेखक की मुहब्बत की कसम भी दी। लेखक ने एक रुपये के नोट को हामिद खाँ की ओर बढ़ाया। वह उन पैसों को लेने में हिचकिचा रहा था। उसने वह रूपया लेखक से लेकर फिर से लेखक के ही हाथ में रख दिया। रूपए को लेखक के हाथों में रखते हुए हामिद खाँ ने लेखक से कहा कि उस ने लेखक से खाने के पैसे ले लिए हैं, मगर वह चाहता है कि यह एक रूपया लेखक के ही हाथों में रहे और जब लेखक अपने देश वापिस पहुँचें तो किसी मुसलमानी होटल में जाकर इस पैसे से पुलाव खाएँ और तक्षशिला के भाई हामिद खाँ को याद करें।

लेखक कहता है कि हामिद की दूकान से लौटकर लेखक तक्षशिला के खंडहरों की तरफ चला आया। उसके बाद लेखक ने फिर कभी हामिद खाँ को नहीं देखा। पर हामिद खाँ की वह आवाज, उसके साथ बिताए क्षणों की यादें आज भी लेखक के मन में बिलकुल ताजा हैं। उसकी वह मुसकान आज भी लेखक के दिल में बसी है। आज वर्तमान में जब लेखक ने तक्षशिला के सांप्रदायिक दंगों की चिंगारियों की आग के बारे में सुना तो लेखक भगवान् से यही प्रार्थना कर रहा है कि हामिद और उसकी वह दुकान जिसने लेखक को उस कड़कड़ाती दोपहर में छाया और खाना देकर लेखक की भूख को संतोष प्रदान किया था, बाह सही-सलामत बची रहे।

Hamid Khan Chapter 5 Question and Answers

हामिद खाँ प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1. लेखक का परिचय हामिद खाँ से किन परिस्थितियों में हुआ?

उत्तरः हामिद पाकिस्तानी मुसलमान था। वह तक्षशिला के पास एक गाँव में होटल चलाता था। लेखक तक्षशिला के खंडहर देखने के लिए पाकिस्तान आया तो हामिद के होटल पर खाना खाने पहुँचा। पहले तो हामिद खाँ लेखक को बहुत घूर-घूर कर देख रहा था परन्तु जब उन्होंने आपस में बात की तो हामिद खाँ लेखक से बहुत प्रभावित हुआ। वहीं पर उनका आपस में परिचय भी हुआ।

प्रश्न 2. काश मैं आपके मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता।’-हामिद ने ऐसा क्यों कहा?

उत्तरः लेखक और हामिद ने जब आपस में बातचीत की तो उस बातचीत केन दौरान हामिद को पता चला कि भारत में हिंदू-मुसलमान सौहार्द से मिल-जुलकर रहते हैं। लेकिन पाकिस्तान में हिंदू-मुसलमानों को आतताइयों की औलाद समझते हैं। वहाँ सांप्रदायिक सौहार्द की कमी के कारण आए दिन हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे होते रहे हैं। लेखक की बात हामिद को सपने जैसी लग रही थी क्योंकि वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि हिन्दू-मुस्लिम भी आपस में कहीं प्यार से रहते होंगे। इसीलिए लेखक की बात सुनकर हामिद ने कहा कि काश वह भी लेखक के मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता।

प्रश्न 3. हामिद को लेखक की किन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था?

उत्तरः हामिद को लेखक की भेदभाव रहित बातों पर विश्वास नहीं हुआ। लेखक ने हामिद को बताया कि उनके प्रदेश में हिंदू-मुसलमान बड़े प्रेम से रहते हैं। वहाँ के हिंदू बढि़या चाय या पुलावों का स्वाद लेने के लिए मुसलमानी होटल में बिना किसी हिचकिचाहट के जाते हैं। पाकिस्तान में ऐसा होना संभव नहीं था। वहाँ के हिंदू मुसलमानों को अत्याचारी मानकर उनसे नफरत करते थे। और वहाँ हर दिन दंगे होते ही रहते थे। हामिद को लेखक के हिन्दू होने की बात पर भी विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकी उसने कभी किसी हिन्दू को किसी मुस्लिम से इतने प्यार से बात करते नहीं देखा था।

प्रश्न 4. हामिद खाँ ने खाने का पैसा लेने से इंकार क्यों किया?

उत्तरः हामिद खाँ ने अनेक कारणों के कारण खाने का पैसा लेने से इसलिए इंकार कर दिया, ये कारण निम्नलिखित हैं –

  • (1) वह भारत से पाकिस्तान गए लेखक को अपना मेहमान मान रहा था।
  • (2) हिंदू होकर भी लेखक मुसलमान के ढाबे पर खाना खाने गया था।
  • (3) लेखक मुसलमानों को आतताइयों की औलाद नहीं मानता था।
  • (4) लेखक की सौहार्द भरी बातों से हामिद खाँ बहुत प्रभावित था।
  • (5) लेखक की मेहमाननवाजी करके हामिद ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा का निर्वाह करना चाहता था।

प्रश्न 5. मालाबार में हिंदू-मुसलमानों के परस्पर संबंधों को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः मालाबार में हिंदू-मुसलमानों के आपसी संबंध बहुत घनिष्ठ हैं। जब कभी भी किसी हिंदू को अच्छी चाय या पुलाव खाने का मन होता है तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के मुसलमानों के होटलों में चला जाता हैं। वे आपस में मिल जुलकर रहते हैं। भारत में मुसलमानों द्वारा बनाई गई पहली मसजिद लेखक के ही राज्य में है। वहाँ सांप्रदायिक दंगे भी बहुत कम होते हैं।

प्रश्न 6. तक्षशिला में आगजनी की खबर पढ़कर लेखक के मन में कौन-सा विचार कौंधा? इससे लेखक के स्वभाव की किस विशेषता का परिचय मिलता है?

उत्तरः तक्षशिला में आगजनी की खबर सुनकर लेखक के मन में हामिद खाँ और उसकी दुकान के आगजनी से प्रभावित होने का विचार कौंधा। वह सोच रहा था कि कहीं हामिद की दुकान इस आगजनी का शिकार न हो गई हो। वह हामिद की सलामती की प्रार्थना करने लगा। इससे लेखक के कृतज्ञ होने, हिंदू-मुसलमानों को समान समझने की मानवीय भावना रखने वाले स्वभाव का पता चलता है।

बच्चों!

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Diye Jal Uthe Class 9 Summary and Question Answer

Diye Jal Uthe Class 9 Summary, Explanation and Question Answer

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 11वीं की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

“दिये जल उठे”

पाठ के लेखक मधुकर उपाध्याय हैं।

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Madhukar Upadhyay

लेखकः मधुकर उपाध्याय

जन्मः 1956

पाठ प्रवेशः दिये जल उठे

‘दिए जल उठे’ नामक इस पाठ में लेखक गाँधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ने की यात्रा के पूर्व की गई तैयारी का वर्णन कर रहा है। इस पाठ में लेखक हमें बताना चाहता है कि गाँधी जी के अलावा भी कई नेता थे जिन्होंने दांडी कूच में योगदान दिया था। दांडी कूच में सभी सत्यग्रहियों को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? कैसे सभी ने मिलकर सभी कठिनाइयों का सूझ-बुझ के साथ निवारण किया? लेखक इस पाठ में इन्ही सभी बातों पर प्रकाश डाला है।

Diye Jal Uthe Class 9 Chapter 6 Summary

दिये जल उठे पाठ का सार

इस पाठ में लेखक गाँधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ने की यात्रा की तैयारी का वर्णन कर रहा है। लेखक कहता है कि रास के पास ही एक बूढ़े बरगद का पेड़ था जिसने दांडी कूच की तैयारी का पूरा दृश्य देखा था। दांडी कूच के बारे में बताता हुआ लेखक कहता है कि दांडी कूच की तैयारी के सिलसिले में वल्लभभाई पटेल सात मार्च को रास पहुँचे थे। वल्लभभाई पटेल ने लोगों से पूछा कि क्या वे सभी सत्याग्रह के लिए तैयार हैं? जब वल्ल्भभाई पटेल लोगों को भाषण दे रहे थे उसी बीच फौजदारी अदालत के अफसर ने मनाही का आदेश लागू कर दिया और पटेल को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी यह गिरफ्तारी स्थानीय कलेक्टर शिलिडी के आदेश पर हुई थी, जिसे पटेल ने पिछले आंदोलन के समय अहमदाबाद से भगा दिया था।

लेखक कहता है कि वल्लभभाई को पुलिस पहरे में बोरसद की अदालत में लाया गया था, जहाँ पर वल्लभभाई ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। जब वल्लभभाई ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था तब जज को समझ में नहीं आ रहा था कि वह उन्हें कौन सी धारा के तहत, कितनी सजा दे। साबरमती आश्रम में गांधी को पटेल की गिरफ्तारी, उनकी सजा और उन्हें साबरमती जेल लाए जाने की सूचना दी गई। समय का अनुमान लगाकर गांधी जी खुद आश्रम से बाहर निकल आए। उनके पीछे-पीछे सब आश्रमवासी बाहर आ गए और बाहर आकर सड़क के किनारे खड़े हो गए ताकि वे पटेल को जेल जाने से पहले एक बार देख सकें। पटेल को जेल ले जाने वाली मोटर आश्रम के बाहर रुकी।

गांधी और पटेल सड़क पर ही मिले। उन दोनों की एक छोटी सी मुलाकात हुई। पटेल ने कार में बैठते हुए आश्रमवासियों और गांधी से कहा था कि वह तो अब जा रहें हैं अब बाकि काम को पूरा करने की जिम्मेबारी उन सभी की है।

सरदार वल्लभभाई पटेल की गिरफ्तारी के बाद सत्याग्रहियों ने अपनी ओर से हर मुश्किल को पार करने की तैयारी पूरी तरह से कर ली थी। अब्बास तैयबजी भी रास पहुँच चुके थे ताकि यदि किसी कारण से गांधी की गिरफ्तारी होती है तो उस स्थिति में वे कूच का नेतृत्व कर सकें। जब गाँधी जी रास पहुँचे तो वहाँ पर गांधी जी का बहुत ही शानदार स्वागत हुआ। गाँधी जी के स्वागत में दरबार समुदाय के लोग इसमें सबसे आगे थे। दरबार गोपालदास और रविशंकर महाराज भी गांधी जी के स्वागत के लिए वहाँ मौजूद थे। लेखक कहता है कि जब गाँधी जी ने भाषण दिया तो गांधी ने अपने भाषण में दरबारों का खासतौर पर उल्लेख किया। दरबार लोगों की साहब की तरह जिंदगी जीते थे, ऐशो-आराम की जिंदगी जीते थे, एक तरह से वे लोग राजा की तरह जीते थे। दरबार सब कुछ छोड़कर रास में आकर बस गए थे। गांधी जी ने अपने भाषण में कहा कि दरबार लोगों से सभी को त्याग और हिम्मत सीखनी चाहिए।

लेखक कहता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक 21 मार्च को साबरमती के तट पर होने वाली थी। जवाहरलाल नेहरू इस बैठक के होने से पहले गांधी से मिलना चाहते थे। जब जवाहरलाल नेहरू ने उनसे मिलने के लिए सन्देश भिजवाया तो गाँधी जी ने उन्हें वापिस सन्देश भिजवाया कि यदि जवाहरलाल नेहरू गाँधी जी से मिलना चाहते हैं तो उनको पूरी एक रात जागना पड़ेगा। और अगर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक से पहले वापस लौटना चाहते है तो इससे बचा भी नहीं जा सकता अर्थात उन्हें अगर समय पर वापिस लौटना है तो उन्हें पूरी रात जागना पड़ेगा तभी वे गाँधी जी से मिल कर वापिस समय पर लौट सकेंगे।

गांधी ने दांडी कूच शुरू होने से पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि वे उनकी यात्रा ऐसे भूभाग से ही करेंगे जो अंग्रेजों के अधिकार में होगा। वे किसी राजघराने के इलाके में नहीं जाएँगे लेकिन इस यात्रा में उन्हें थोड़ी देर के लिए बड़ौदा रियासत से गुजरना पड़ा। क्योंकि अगर वे वहाँ से नहीं जाते तो उनकी यात्रा करीब बीस किलोमीटर लंबी हो जाती और इसका असर उनकी यात्रा के कार्यक्रम पर पड़ता। लेखक बताता है कभी सत्याग्रही गाजे-बाजे के साथ रास में दाखिल हुए। वहाँ गांधी जी को एक धर्मशाला में ठहराया गया जबकि बाकी सत्याग्रही तंबुओं में ही रुके।

लेखक कहता है कि रास की जनसंख्या तीन हजार के लगभग थी लेकिन गाँधी जी की जनसभा में बीस हजार से भी ज्यादा लोग आये हुए थे। गांधी जी ने रास में भी राजद्रोह की बात पर जोर दिया और कहा कि उनकी गिरफ्तारी ‘अच्छी बात’ होगी। गाँधी जी ने सरकार को खुली चुनौती देते हुए यह भी कहा अब फिर बादल घिर आए हैं। या ये भी कहा जा सकता है कि अब सही मौका सामने आया है। अगर सरकार उन्हें गिरफ्तार करती है तो यह एक अच्छी बात है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें तीन माह की सजा देते हुए सरकार को भी शर्म आएगी। इसलिए गाँधी जी ने कहा कि राजद्रोही को तो कालापानी, देश निकाला या फांसी की सजा हो सकती है। और उनके जैसे लोग अगर राजद्रोही होना अपना धर्म मानें तो उन्हें क्या सजा मिलनी चाहिए? यहाँ गाँधी जी लोगों को बताना चाह रहे थे कि हो सकता है उन्हें तीन माह की सजा न हो कर कालापानी, देश निकाला या फांसी की सजा हो, तो उन सभी को आगे की कूच करने की पहले से ही तैयारियाँ करके रखनी चाहिए। लेखक यहाँ गाँधी जी के दूरदर्शी सोच को उजागर कर रहा है।

लेखक कहता है कि सत्याग्रही रास से शाम छह बजे चले और आठ बजे कनकापुरा पहुँचे। जब सभी लोग कनकापुरा पहुँचे तो उस समय लोग उस यात्रा से कुछ थके हुए थे और कुछ थकान इस शक से भी थी कि वे सभी लोग मही नदी को कब और कैसे पार करेंगे। यात्रा के दौरान रास्ते में रेतीली सड़कों के कारण यह प्रस्ताव किया गया कि गांधी जी थोड़ी यात्रा कार से कर लें। परन्तु गांधीजी ने इस प्रस्ताव से साफ इंकार कर दिया। गाँधी जी का कहना था कि यह उनके जीवन की आखिरी यात्रा है और ऐसी यात्रा में निकलने वाला वाहन का प्रयोग नहीं करता। यह पुरानी रीति है। धर्मयात्रा में हवाई जहाज, मोटर या बैलगाड़ी में बैठकर जाने वाले को कोई लाभ नहीं मिलता। गाँधी जी के अनुसार जिस यात्रा में कष्ट सहें जाएँ, लोगों के सुख-दुख समझें जाएँ वही सच्ची यात्रा होती है।

लेखक कहता है कि अंग्रेजी शासकों में एक वर्ग ऐसा भी था जिसे ऐसा लग रहा था कि गांधी और उनके सत्याग्रही मही नदी के किनारे ही अचानक नमक बनाकर कानून तोड़ देंगे। क्योंकि समुद्री पानी नदी के तट पर काफी नमक छोड़ जाता था जिसकी रखवाली के लिए अंग्रेजी सरकार ने सरकारी नमक चैकीदार रखे हुए थे। गांधी को समझने वाले बड़े अधिकारी इस बात को मानने वाले नहीं थे कि गांधी जी भी कोई काम ‘अचानक और चुपके से’ कर सकते हैं। यह विश्वास होने के बावजूद भी कि गाँधी जी कोई काम अचानक और चुपके से नहीं करेंगें अंग्रेजी अधिकारियों ने नदी के तट से सारे नमक भंडार हटा दिए और उन्हें नष्ट करा दिया ताकि इसका खतरा ही न रहे कि गांधी जी नदी किनारे ही नमक बना कर कानून को तोड़ दें। मही नदी के तट पर उस भयानक अँधेरी रात में भी मेला-जैसा लगा हुआ था। वहाँ पर उपस्थित लोगों ने कई भजन मंडलियाँ बना दी थीं।

गांधी को नदी पार कराने की जिम्मेदारी रघुनाथ काका को सौंपी गई थी। उन्होंने गांधी जी को नदी पार कराने के लिए एक नयी नाव खरीदी और उसे लेकर कनकापुरा पहुँच गए थे। बदलपुर के रघुनाथ काका को सत्याग्रहियों ने निषादराज कहना शुरू कर दिया था क्योंकि जिस प्रकार राम जी को नदी पार करने की जिम्मेवारी निषाद राज की थी उसी प्रकार बदलपुर के रघुनाथ काका को भी गाँधी जी को नदी पार करवाने की जिम्मेवारी मिली थी। रात के समय जब समुद्र का पानी चढ़ना शुरू हुआ तब तक अँधेरा इतना घना हो गया था कि छोटे-मोटे दिये उसे भेद नहीं पा रहे थे। थोड़ी ही देर में कई हजार लोग नदी तट पर पहुँच गए। उन सबके हाथों में दिये थे। इसी तरह का दृश्य नदी के दूसरी ओर भी था। नदी के दूसरी ओर भी पूरा गाँव और आस-पास से आए लोग दिये की रोशनी लिए गांधी जी और उनके सत्याग्रहियों का इंतजार कर रहे थे। रात के लगभग बारह बजे महिसागर नदी का किनारा पानी से भर गया। गांधी जी झोपड़ी से बाहर निकले और घुटनों तक पानी में चलकर नाव तक पहुँचे।

लेखक बताता है कि गांधी जी के वहाँ से चलते ही ‘महात्मा गांधी की जय’, ‘सरदार पटेल की जय’ और ‘जवाहरलाल नेहरू की जय’ के नारे सुनाई देने लगे और उन्हीं नारों के बीच नाव रवाना हुई जिसे रघुनाथ काका चला रहे थे। कुछ ही देर में नारों की आवाज नदी के दूसरे तट से भी आने लगी। महिसागर नदी के दूसरे तट पर भी स्थिति कोई अलग नहीं थी। वहाँ पर भी उसी तरह का कीचड़ और दलदली जमीन थी जैसी नदी के एक ओर के तट पर थी। लेखक कहता है कि मुमकिन है कि यह पूरी यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा था। डेढ़ किलोमीटर तक पानी और कीचड़ में चलकर गांधी जी रात एक बजे के लगभग नदी के उस पार पहुँचे और वहाँ पहुँचते ही सीधे आराम करने चले गए।

गांधी जी के पार उतरने के बाद भी तट पर दिये लेकर लोग खड़े रहे। अभी सत्याग्रहियों को भी उस पार जाना था। शायद उन्हें पता था कि रात में कुछ और लोग आएँगे जिन्हें नदी पार करानी होगी। उन लोगों को पता था कि उनके सत्यग्रह में अभी और भी लोग जुड़ने वाले हैं, उन लोगों को भी नदी पार करवाना जरुरी था ताकि उन्हें भी सही रास्ते का पता चले और उनके सत्यग्रह में लोगों की संख्या बड़े ताकि अंग्रेज सरकार उनके कूच को न दबा सके और वे नमक बना कर कानून को तोड़ सकें।

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Diye Jal Uthe Class 9 Question and Answers

दिये जल उठे प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1. किस कारण से प्रेरित हो स्थानीय कलेक्टर ने पटेल को गिरफ्तार करने का आदेश दिया?

उत्तरः सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने पिछले आंदोलन में स्थानीय कलेक्टर शिलिडी को अहमदाबाद से भगा दिया था। जहाँ कलेक्टर शिलिडी सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा किए जा रहे आंदोलन को दबाने के लिए आया था। वहाँ से भगाये जाने को वह अपमान के रूप में देख रहा था और इसी अपमान का बदला लेने के लिए कलेक्टर शिलिडी ने सरदार वल्लभभाई पटेल को मनाही के आदेश को भंग करने के आरोप में गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया।

प्रश्न 2. जज को पटेल की सजा के लिए आठ लाइन के फैसले को लिखने में डेढ़ घंटा क्यों लगा?

उत्तरः सरदार वल्लभभाई पटेल ने रास में भाषण की शुरुआत करके कोई अपराध नहीं किया था यह जज भी अच्छी तरह जानते थे। सरदार वल्लभभाई पटेल को कलेक्टर ने ईर्ष्या व रंजिश के कारण और अपने अपमान का बदला लेने के लिए गिरफ्तार करवाया था। सरदार वल्लभभाई पटेल के पीछे देशवासियों का पूरा समर्थन था। बिना अपराध के कारण सरदार वल्लभभाई पटेल को किस धारा के अंतर्गत कितनी सजा दें, यही सोच-विचार करने के कारण जज को डेढ़ घंटे का समय लगा।

प्रश्न 3. “मैं चलता हूँ! अब आपकी बारी है।”- यहाँ पटेल के कथन का आशय उधृत पाठ के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः सरदार वल्लभभाई पटेल को मनाही के आदेश का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। यद्यपि मनाही के आदेश को उसी समय लागू किया गया था और सरदार वल्लभभाई पटेल अपने भाषण की शुरुआत पहले ही कर चुके थे। अतः उनकी गिरफ्तारी गैरकानूनी थी। अंग्रेज सरकार को कोई-न-कोई बहाना बनाकर कांग्रेस के नेताओं को पकड़ना था। इसी सत्य को बतलाने के इरादे से सरदार वल्लभभाई पटेल ने गाँधी जी को कहा कि अब वे तो अंग्रेजी सरकार के षडयन्त्र के कारण जेल जा रहे है उन्हें भी सावधानी से काम करना होगा। नहीं तो अंग्रेजी सरकार कोई न कोई बहाना बना कर उन्हें भी गिरफ्तार कर सकती है। अतः उन्हें आगे के सफर की और अच्छे से तैयारियाँ करनी चाहिए।

प्रश्न 4. ‘‘इनसे आप लोग त्याग और हिम्मत सीखें” -गांधी जी ने यह किसके लिए और किस संदर्भ में कहा?

उत्तरः सरदार वल्लभभाई पटेल की गिरफ्तारी के बाद जब गांधी जी रास पहुँचे तो दरबार समुदाय के लोगों के द्वारा उनका बहुत भी सुंदर स्वागत किया गया। ये दरबार लोरा रियासतदार होते थे, जो अपना ऐशो-आराम छोड़कर रास में बस गए थे। केवल गांधी जी को उनके कूच में सहायता प्रदान करने के लिए, जबकि उन्हें भी पता था कि गांधी जी का साथ देने के कारण उन्हें जेल भी जाना पद सकता है। गांधी जी ने ‘‘इनसे आप लोग त्याग और हिम्मत सीखें” ये शब्द इन्हीं दरबार लोगों के त्याग और ऐसे फैसले लेने के साहस के कारण कहे थे।

प्रश्न 5. पाठ द्वारा यह कैसे सिद्ध होता है कि-‘कैसी भी कठिन परिस्थिति हो उसका सामना तात्कालिक सूझबूझ और आपसी मेलजोल से किया जा सकता है।’ अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः इस पाठ से सिद्ध होता है कि हर कठिन परिस्थिति को आपसी सूझबूझ और सहयोग से निपटा जा सकता है। सरदार वल्लभभाई पटेल की गिरफ्तारी से एक चुनौती सामने आई। गुजरात का सत्याग्रह आंदोलन असफल होता जान पड़ा। किंतु स्वयं गाँधी जी ने आंदोलन की कमान सँभाल ली। यदि वे भी गिरफ्तार कर लिए जाते तो उसके लिए भी उपाय सोचा गया। अब्बास तैयबजी नेतृत्व करने के लिए तैयार थे। गाँधी जी को रास से कनकापुर की सभा में जाना था। वहाँ से नदी पार करनी थी। इसके लिए गाँववासियों ने पूरी योजना बनाई। रात ही रात में नदी पार की गई। इसके लिए झोंपड़ी, तंबू, नाव, दियों आदि का प्रबंध किया गया। सारा कठिन काम चुटकियों में संपन्न हो गया। इस पाठ में सभी के आपसी सहयोग के कारण ही सभी कार्य आराम से बिना किसी कठिनाई के संपन्न होते चले गए।

प्रश्न 6. महिसागर नदी के दोनों किनारों पर कैसा दृश्य उपस्थित था? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तरः गांधी जी और सत्याग्रही सायं छह बजे चलकर आठ बजे कनकापुरा पहुँचे। वहीं आधी रात में महिसागर नदी पर करने निर्णय लिया गया। फैसला लिया गया कि नदी को आधी रात के समय जब नदी में समुद्र का पानी चढ़ जाता है उस समय नदी को पार किया जाएगा ताकि लोगों को कीचड़ और दलदल में कम-से-कम चलना पड़े। रात के समय जब समुद्र का पानी चढ़ना शुरू हुआ तब तक अँधेरा इतना घना हो गया था कि छोटे-मोटे दिये उसे भेद नहीं पा रहे थे। थोड़ी ही देर में कई हजार लोग नदी तट पर पहुँच गए। उन सबके हाथों में दिये थे। इसी तरह का दृश्य नदी के दूसरी ओर भी था। नदी के दूसरी ओर भी पूरा गाँव और आस-पास से आए लोग दिये की रोशनी लिए गांधी जी और उनके सत्याग्रहियों का इंतजार कर रहे थे। रात के लगभग बारह बजे महिसागर नदी का किनारा पानी से भर गया। समुद्र का पानी चढ़ आया था। पानी चढ़ने की खबर सुन कर गांधी जी झोपड़ी से बाहर निकले और घुटनों तक पानी में चलकर नाव तक पहुँचे। गांधी जी के वहाँ से चलते ही ‘महात्मा गांधी की जय’, ‘सरदार पटेल की जय’ और ‘जवाहरलाल नेहरू की जय’ के नारे सुनाई देने लगे और उन्हीं नारों के बीच नाव रवाना हुई जिसे रघुनाथ काका चला रहे थे। कुछ ही देर में नारों की आवाज नदी के दूसरे तट से भी आने लगी। उन आवाजों को सुन कर ऐसा लग रहा था जैसे वह नदी का किनारा नहीं बल्कि पहाड़ की घाटी हो, जहाँ जब कोई शब्द जोर से पुकारा जाता है तो उस शब्द के उपरान्त उसी से उत्पान्न शब्द सुनाई देता है। क्योंकि नदी के दूसरी ओर जमा हुए लोग भी उसी तरह से ‘महात्मा गांधी की जय’, ‘सरदार पटेल की जय’ और ‘जवाहरलाल नेहरू की जय’ के नारे लगा रहे थे। नदी के दोनों तटों पर मेले जैसा दृश्य हो रहा था।

प्रश्न 7. ‘‘यह धर्मयात्रा है। चलकर पूरी करूंगा” -गांधीजी के इस कथन द्वारा उनके किस चारित्रिक गुण का परिचय प्राप्त होता है?

उत्तरः इस कथन द्वारा गांधी जी की दृढ़ आस्था, सच्ची निष्ठा और वास्तविक कर्तव्य भावना के दर्शन होते हैं। वे किसी भी आंदोलन को धर्म के समान पूज्य मानते थे और उसमें पूरे समर्पण के साथ लगते थे। वे औरों को कष्ट और बलिदान के लिए प्रेरित करके स्वयं सुख-सुविधा भोगने वाले ढोंगी नेता नहीं थे। वे हर जगह त्याग और बलिदान का उदाहरण स्वयं अपने जीवन से देते थे।

प्रश्न 8. गांधी को समझने वाले वरिष्ठ अधिकारी इस बात से सहमत नहीं थे कि गांधी कोई काम अचानक और चुपके से करेंगे। फिर भी उन्होंने किस डर से और क्या एहतियाती कदम उठाए?

उत्तरः अंग्रेज अधिकारी भी गांधी जी की स्वाभाविक विशेषताओं से परिचित थे। वे जानते थे कि गांधी जी छल और असत्य से कोई काम नहीं करेंगे। फिर भी उन्होंने इस डर से एहतियाती कदम उठाए कि गांधी जी ने कहा था कि मही नदी के तट पर भी नमक बनाया जा सकता है, इसलिए नदी के तट से सारे नमक के भंडार नष्ट करवा दिए गए ताकि गांधी जी नदी के तट पर ही नमक बना कर कानून न तोड़ सकें।

प्रश्न 9. गांधी जी के पार उतरने पर भी लोग नदी तट पर क्यों खड़े रहे?

उत्तरः जब गांधी जी महिसागर नदी के पार उतर गए। फिर भी लोग नदी तट पर इसलिए खड़े रहे ताकि गाँधी जी के पीछे आ रहे सत्याग्रही भी तट तक पहुँच जाएँ और उन्हें दियों का प्रकाश मिल सके। शायद उन्हें पता था कि रात में कुछ और लोग आएँगे जिन्हें नदी पार करानी होगी। उन लोगों को पता था कि उनके सत्यग्रह में अभी और भी लोग जुड़ने वाले हैं, उन लोगों को भी नदी पार करवाना जरुरी था ताकि उन्हें भी सही रास्ते का पता चले और उनके सत्यग्रह में लोगों की संख्या बड़े ताकि अंग्रेज सरकार उनके कूच को न दबा सके और वे नमक बना कर कानून को तोड़ सकें।

बच्चों!

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Gillu Class 9 Summary and Question Answers

Gillu Class 9 Summary and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

‘गिल्लू’

पाठ की लेखिका महादेवी वर्मा हैं।

This Post Includes

लेखिकाः महादेवी वर्मा

जन्मः 1907

मृत्युः 1987

पाठ प्रवेशः गिल्लू

इस पाठ में लेखिका ने अपने जीवन के एक अनुभव को हमारे साथ सांझा किया है। यहाँ लेखिका ने अपने जीवन के उस पड़ाव का वर्णन किया है जहाँ उन्होंने एक गिलहरी के बच्चे को कवों से बचाया था और उसे अपने घर में रखा था। लेखिका ने उस गिलहरी के बच्चे का नाम गिल्लू रखा था। यह पाठ उसी के इर्द-गिर्द घूम रहा है इसीलिए इस पाठ का नाम भी ‘गिल्लू’ ही रखा गया है। लेखिका ने जो भी समय गिल्लू के साथ बिताया उस का वर्णन लेखिका ने इस पाठ में किया है।

Summary Of Sanchyan Part 1 Chapter 1 Gillu

गिल्लू पाठ सार

इस पाठ में लेखिका ने अपने जीवन के उस पड़ाव का वर्णन किया है जहाँ उन्होंने एक गिलहरी के बच्चे को कौवे से बचाया था और उसे अपने घर में रखा था। लेखिका ने उस गिलहरी के बच्चे का नाम गिल्लू रखा था। लेखिका कहती है कि आज जूही के पौधे में कली निकल आई है जो पिले रंग की है। उस कली को देखकर लेखिका को उस छोटे से जीव की याद आ गई जो उस जूही के पौधे की हरियाली में छिपकर बैठा रहता था। परन्तु लेखिका कहती है कि अब तो वह छोटा जीव इस जूही के पौधे की जड़ में मिट्टी बन कर मिल गया होगा। क्योंकि अब वह मर चुका है और लेखिका ने उसे जूही के पौधे की जड़ में दबा दिया था।

लेखिका कहती है कि अचानक एक दिन जब वह सवेरे कमरे से बरामदे में आई तो उसने देखा कि दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से चुपके से छूकर छुप जाना और फिर छूना जैसा कोई खेल खेल रहे हैं। लेखिका कहती है कि यह कौवा भी बहुत अनोखा पक्षी है-एक साथ ही दो तरह का व्यवहार सहता है, कभी तो इसे बहुत आदर मिलता है और कभी बहुत ज्यादा अपमान सहन करना पड़ता है। लेखिका कहती है कि जब वह कौवो के बारे में सोच रही थी तभी अचानक से उसकी उस सोच में कुछ रुकावट आ गई क्योंकि उसकी नजर गमले और दीवार को जोड़ने वाले भाग में छिपे एक छोटे-से जीव पर पड़ी।

जब लेखिका ने निकट जाकर देखा तो पाया कि वह छोटा सा जीव एक गिलहरी का छोटा-सा बच्चा है। उस छोटे से जीव के लिए उन दो कौवों की चोंचों के दो घाव ही बहुत थे, इसलिए वह बिना किसी हरकत के गमले से लिपटा पड़ा था। लेखिका ने उसे धीरे से उठाया और अपने कमरे में ले गई, फिर रुई से उसका खून साफ किया और उसके जख्मों पर पेंसिलिन नामक दवा का मरहम लगाया। कई घंटे तक इलाज करने के बाद उसके मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और निश्चिन्त हो गया कि वह लेखिका की उँगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर और अपनी नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इधर-उधर देखने लगा। सब उसे अब गिल्लू कह कर पुकारते थे। लेखिका कहती है कि जब वह लिखने बैठती थी तब अपनी ओर लेखिका का ध्यान आकर्षित करने की गिल्लू की इतनी तेज इच्छा होती थी कि उसने एक बहुत ही अच्छा उपाय खोज निकाला था। वह लेखिका के पैर तक आता था और तेजी से परदे पर चढ़ जाता था और फिर उसी तेजी से उतर जाता था। उसका यह इस तरह परदे पर चढ़ना और उतरने का क्रम तब तक चलता रहता था जब तक लेखिका उसे पकड़ने के लिए नहीं उठती थी।

लेखिका गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लिफाफे में इस तरह से रख देती थी। जब गिल्लू को उस लिफाफे में बंद पड़े-पड़े भूख लगने लगती तो वह चिक-चिक की आवाज करके मानो लेखिका को सूचना दे रहा होता कि उसे भूख लग गई है और लेखिका के द्वारा उसे काजू या बिस्कुट मिल जाने पर वह उसी स्थिति में लिफाफे से बाहर वाले पंजों से काजू या बिस्कुट पकड़कर उसे कुतरता।

लेखिका कहती है कि बाहर की गिलहरियाँ उसके घर की खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक करके न जाने क्या कहने लगीं? जिसके कारण गिल्लू खिड़की से बाहर झाँकने लगा। गिल्लू को खिड़की से बाहर देखते हुए देखकर उसने खिड़की पर लगी जाली की कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस रास्ते से गिल्लू जब बाहर गया तो उसे देखकर ऐसा लगा जैसे बाहर जाने पर सचमुच ही उसने आजादी की साँस ली हो। लेखिका को जरुरी कागजो-पत्रों के कारण बाहर जाना पड़ता था और उसके बाहर जाने पर कमरा बंद ही रहता था।

लेखिका कहती है कि उसने काॅलेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला और अंदर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू अपने उस जाली के दरवाजे से अंदर आया और लेखिका के पैर से सिर और सिर से पैर तक दौड़ लगाने लगा। उस दिन से यह हमेशा का काम हो गया था। काजू गिल्लू का सबसे मनपसंद भोजन था और यदि कई दिन तक उसे काजू नहीं दिया जाता था तो वह अन्य खाने की चीजें या तो लेना बंद कर देता था या झूले से नीचे फेंक देता था। लेखिका कहती है कि उसी बीच उसे मोटर दुर्घटना में घायल होकर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। उन दिनों जब कोई लेखिका के कमरे का दरवाजा खोलता तो गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता, उसे लगता कि लेखिका आई है और फिर जब वह लेखिका की जगह किसी दूसरे को देखता तो वह उसी तेजी के साथ अपने घोंसले में जा बैठता।

तो भी लेखिका के घर जाता वे सभी गिल्लू को काजू दे आते, परंतु अस्पताल से लौटकर जब लेखिका ने उसके झूले की सफाई की तो उसमें काजू भरे मिले, जिनसे लेखिका को पता चला कि वह उन दिनों अपना मनपसंद भोजन भी कितना कम खाता रहा। लेखिका की अस्वस्थता में वह तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हे-नन्हे पंजों से लेखिका के सिर और बालों को इतने धीरे-धीरे सहलाता रहता कि जब वह लेखिका के सिरहाने से हटता तो लेखिका को ऐसा लगता जैसे उसकी कोई सेविका उससे दूर चली गई हो।

लेखिका कहती है कि गिलहरियों के जीवन का समय दो वर्ष से अधिक नहीं होता, इसी कारण गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत भी नजदीक आ ही गया। दिन भर उसने न कुछ खाया न बाहर गया। रात में अपने जीवन के अंतिम क्षण में भी वह अपने झूले से उतरकर लेखिका के बिस्तर पर आया और अपने ठंडे पंजों से लेखिका की वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन में पकड़ा था जब वह मृत्यु के समीप पहुँच गया था। सुबह की पहली किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया। अर्थात उसकी मृत्यु हो गई। लेखिका ने गिल्लू की मृत्यु के बाद उसका झूला उतारकर रख दिया और खिड़की की जाली को बंद कर दिया, परंतु गिलहरियों की नयी पीढ़ी जाली के दूसरी ओर अर्थात बाहर चिक-चिक करती ही रहती है और जूही के पौधे में भी बसंत आता ही रहता है। सोनजुही की लता के नीचे ही लेखिका ने गिल्लू की समाधि बनाई थी अर्थात लेखिका ने गिल्लू को उस जूही के पौधे के निचे दफनाया था क्योंकि गिल्लू को वह लता सबसे अधिक प्रिय थी। लेखिका ने ऐसा इसलिए भी किया था क्योकि लेखिका को उस छोटे से जीव का, किसी बसंत में जुही के पीले रंग के छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, लेखिका को एक अलग तरह की खुषी देता था।

Gillu Class 9 Chapter 1 Sanchayan Question and Answers

गिल्लू प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1. सोनजूही में लगी पीली कली को देख लेखिका के मन में कौन से विचार उमड़ने लगे?

उत्तरः सोनजूही में लगी पीली कली को देख लेखिका को गिल्लू की याद आ गई। गिल्लू एक गिलहरी थी जिसकी जान लेखिका ने बचाई थी। उसके बाद से गिल्लू का पूरा जीवन लेखिका के साथ ही बीता था। लेखिका ने गिल्लू की मौत के बाद गिल्लू के शरीर को उसी सोनजूही के पौधे के नीचे दफनाया था इसीलिए जब भी लेखिका सोनजूही में लगी पीली कली को देखती थी उसे लगता था जैसे गिल्लू उन कलियों के रूप में उसे चैंकाने ऊपर आ गया है।

प्रश्न 2. पाठ के आधार पर कौए को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी क्यों कहा गया है?

उत्तरः हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि पितरपक्ष के समय हमारे पूर्वज कौवे के भेष में आते हैं। एक अन्य मान्यता है कि जब कौवा काँव-काँव करता है तो इसका मतलब होता है कि घर में कोई मेहमान आने वाला है। इन कारणों से कौवे को सम्मान दिया जाता है। लेकिन दूसरी ओर, कौवे के काँव काँव करने को अशुभ भी माना जाता है। इसलिए कौवे को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी कहा गया है।

प्रश्न 3. गिलहरी के घायल बच्चे का उपचार किस प्रकार किया गया?

उत्तरः गिलहरी के घायल बच्चे के घाव पर लगे खून को पहले रुई से साफ किया गया। उसके बाद उसके घाव पर पेंसिलिन का मलहम लगाया गया। उसके बाद रुई को दूध में डुबो कर उसे दूध पिलाने की कोशिश की गई जो असफल रही क्योंकि अधिक घायल होने के कारण कमजोर हो गया था और दूध की बूँदें उसके मुँह से बाहर गिर रही थी। लगभग ढ़ाई घंटे के उपचार के बाद गिलहरी के बच्चे के मुँह में पानी की कुछ बूँदें जा सकीं।

प्रश्न 4. लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए गिल्लू क्या करता था?

उत्तरः लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए गिल्लू उनके पैरों के पास आता और फिर सर्र से परदे पर चढ़ जाता था। उसके बाद वह परदे से उतरकर लेखिका के पास आ जाता था। यह सिलसिला तब तक चलता रहता था जब तक लेखिका गिल्लू को पकड़ने के लिए दौड़ न लगा देती थी।

प्रश्न 5. गिल्लू को मुक्त करने की आवश्यकता क्यों समझी गई और उसके लिए लेखिका ने क्या उपाय किया?

उत्तरः लेखिका के घर में रहते हुए गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया। नीम-चमेली की खुशबू लेखिका के कमरे में धीरे-धीरे फैलने लगी। लेखिका कहती है कि बाहर की गिलहरियाँ उसके घर की खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक करके न जाने क्या कहने लगीं? जिसके कारण गिल्लू खिड़की से बाहर झाँकने लगा। गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से इस तरह बाहर झाँकते देखकर लेखिका को लगा कि इसे आजाद करना अब जरुरी है। लेखिका ने खिड़की पर लगी जाली की कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और गिल्लू के बाहर जाने का रास्ता बना दिया।

प्रश्न 6. गिल्लू किन अर्थों में परिचारिका की भूमिका निभा रहा था?

उत्तरः जब लेखिका अस्पताल से घर आई तो गिल्लू उनके सिर के पास बैठा रहता था। वह अपने नन्हे पंजों से लेखिका के सिर और बाल को सहलाता रहता था। इस तरह से वह किसी परिचारिका की भूमिका निभा रहा था।

प्रश्न 7. गिल्लू कि किन चेष्टाओं से यह आभास मिलने लगा था कि अब उसका अंत समय समीप है?

उत्तरः गिल्लू ने दिन भर कुछ नहीं खाया था। वह कहीं बाहर भी नहीं गया था। रात में वह बहुत तकलीफ में लग रहा था। उसके बावजूद वह अपने झूले से उतरकर लेखिका के पास आ गया। गिल्लू ने अपने ठंडे पंजों से लेखिका कि अंगुली पकड़ ली और उनके हाथ से चिपक गया। इससे लेखिका को लगने लगा कि गिल्लू का अंत समय समीप ही था।

प्रश्न 8. ‘प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया’ – का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः ‘प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया’ – इस पंक्ति में लेखिका ने पुनर्जन्म की मान्यता को स्वीकार किया है। लेखिका को लगता है कि गिल्लू अपने अगले जन्म में किसी अन्य प्राणी के रूप में जन्म लेगा।

प्रश्न 9. सोनजूही की लता के नीचे बनी गिल्लू की समाधि से लेखिका के मन में किस विश्वास का जन्म होता है?

उत्तरः लेखिका ने गिल्लू को उस जूही के पौधे के निचे दफनाया था क्योंकि गिल्लू को वह लता सबसे अधिक प्रिय थी। लेखिका ने ऐसा इसलिए भी किया था क्योंकि लेखिका को उस छोटे से जीव का, किसी बसंत में जुही के पीले रंग के छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, लेखिका को एक अलग तरह का संतोष देता था।

बच्चों!

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Naye Ilake Mein Khushboo Rachte Haath Class 9

Naye Ilake Mein Khushboo Rachte Haath Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 1 की कविता पढ़ेंगे

‘नए इलाके में, खुशबू रचते हाथ’

कविता के रचयिता अरुण कमल हैं।

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बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

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कवि परिचयःअरुण कमल

जन्म: 1954

Arun Kamal

अरुण कमल का जन्म बिहार के रोहतास जिले के नासीरगंज में 15 फरवरी 1954 को हुआ। ये इन दिनों पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है। इन्हें अपनी कविताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया गया। अरुण कमल की कविताओं में नई बिम्ब, बोलचाल की भाषा, खड़ी बोली के अनेक लय-छंदों का समावेश है।

अरुण कमल की प्रमुख कृतियां है: अपनी केवल धार, सबूत, नए इलाके मे, पुतली में संसार (चारों कविता संग्रह) तथा कविता और समय (आलोचनात्मक कृति)।

पाठ प्रवेश: नए इलाके में, खुशबू रचते हैं हाथ

प्रस्तुत पाठ की पहली कविता ‘नए इलाके में’ में कवि ने एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करने के आमंत्राण का उल्लेख किया है, जो एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है। इस कविता के आधार पर कवि इस बात का ज्ञान देना चाहता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं होता अर्थात कोई भी वस्तु या जीव हमेशा के लिए नहीं रहते। इस पल-पल बनती और बिगड़ती दुनिया में किसी की भी यादों के भरोसे नहीं जिया जा सकता।

इस पाठ की दूसरी कविता ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ में कवि ने सामाजिक विषमताओं को बेनकाब किया है। इस कविता में कवि ने गरीबों के जीवन पर प्रकाश डाला है। कवि कहता है कि यह किसकी और कैसी कारस्तानी है कि जो वर्ग समाज को सुंदर बनाने में लगा हुआ है और उसे खुशहाल बना रहा है, वही वर्ग अभाव में, गंदगी में जीवन बिता कर रहा है? लोगों के जीवन में सुगंध बिखेरने वाले हाथ बहुत ही भयानक स्थितियों में अपना जीवन बिताने पर मजबूर हैं! क्या विडंबना है कि खुशबू रचने वाले ये हाथ दूरदराज के सबसे गंदे और बदबूदार इलाकों में जीवन बिता रहे हैं। स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान करने वाले ये लोग इतने उपेक्षित हैं! कवि यहाँ प्रश्न कर रहा है कि आखिर कब तक ऐसा चलने वाला है?

Naye Ilaake Mein Explanation

व्याख्याःनए इलाके में

इन नए बसते इलाकों में

जहाँ रोज बन रहे हैं नए-नए मकान

मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ

शब्दार्थ: इलाका – क्षेत्र, अकसर- प्रायः अथवा हमेशा

व्याख्या: कवि कहता है कि शहर में नये मुहल्ले रोज ही बसते हैं। ऐसी जगहों पर रोज नये-नये मकान बनते हैं। रोज-रोज नये बनते मकानों के कारण कोई भी व्यक्ति ऐसे इलाके में रास्ता भूल सकता है। कवि को भी यही परेशानी होती है। वह भी इन मकानों के बीच अपना रास्ता हमेशा भूल जाता है।

धोखा दे जाते हैं पुराने निशान

खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़

खोजता हूँ ढ़हा हुआ घर

और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ

मुड़ना था मुझे

फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का

घर था इकमंजिला

शब्दार्थ: ताकता- देखता, ढहा- गिरा हुआ, ध्वस्त फाटक- दरवाजा।

व्याख्या: कवि कहता है कि जो पुराने निशान हैं वे धोखा दे जाते हैं क्योंकि कुछ पुराने निशान तो सदा के लिए मिट जाते हैं। कवि के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह अपना रास्ता ढूँढ़ने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है परन्तु हर जगह मकानों के बनने के कारण उस पीपल के पेड़ को काट दिया गया है।

फिर कवि पुराने गिरे हुए मकान को ढूँढ़ता है परन्तु वह भी उसे अब कही नहीं दिखता। कवि कहता है कि पहले तो उसे घर का रास्ता ढूँढ़ने के लिए जमीन के खाली टुकड़े के पास से बाएँ मुड़ना पड़ता था और उसके बाद दो मकान के बाद बिना रंगवाले लोहे के दरवाजे वाले इकमंजिले मकान में जाना होता था। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि को अब बहुत से मकानों के बन जाने से घर का रास्ता ढूँढ़ने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

और मैं हर बार एक घर पीछे

चल देता हूँ

या दो घर आगे ठकमकाता

यहाँ रोज कुछ बन रहा है

रोज कुछ घट रहा है

यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं

शब्दार्थ: ठकमकाता- धीरे-धीरे, डगमगाते हुए स्मृति- याद।

व्याख्या: कवि कहता है कि अपने घर जाते हुए वह हर बार या तो अपने घर से एक घर पीछे ठहर जाता है या डगमगाते हुए अपने घर से दो घर आगे ही बढ़ जाता है। कवि कहता है जहाँ पर रोज ही कुछ नया बन रहा हो और कुछ मिटाया जा रहा हो, वहाँ पर अपने घर का रास्ता ढ़ूँढ़ने के लिए आप अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं कर सकते।

एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ

जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ

अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ

और पूछो दृ क्या यही है वो घर?

समय बहुत कम है तुम्हारे पास

आ चला पानी ढ़हा आ रहा अकास

शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर।

शब्दार्थ: वसंत- छह ऋतुओं में से एक, पतझड़- एक ऋतु जब पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं, वैसाख (वैशाख)- चैत (चैत्र) के बाद आने वाला महीना, भादों- सावन के बाद आने वाला महीना, अकास (आकाश)- गगन।

व्याख्या: कवि कहता है कि एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। ऐसा लगता है जैसे महीनों बाद लौटा हूँ। ऐसा लगता है जैसे घर से बसंत ऋतु में बाहर गया था और पतझड़ ऋतु में लौट कर आया हूँ।

जैसे बैसाख ऋतु में गया और भादों में लौटा हो। कवि कहता है कि अब सही घर ढ़ूँढ़ने का एक ही उपाय है कि हर दरवाजे को खटखटा कर पूछो कि क्या वह सही घर है। कवि कहता है कि उसके पास अपना घर ढूँढ़ने लिए बहुत कम समय है क्योंकि अब तो आसमान से बारिश भी आने वाली है और कवि को उम्मीद है कि कोई परिचित उसे देख लेगा और आवाज लगाकर उसे उसके घर ले जाएगा।

Khusboo Rachte Haath Explanation

व्याख्या: (खुशबू रचते हैं हाथ)

कई गलियों के बीच

कई नालों के पार

कूड़े करकट

के ढ़ेरों के बाद

बदबू से फटते जाते इस

टोले के अंदर

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ!

शब्दार्थ: नालों- घरों और सड़कों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाया गया रास्ता, कूड़ा-करकट- रद्दी, कचरा, टोले- छोटी बस्त।

व्याख्या: कवि कहता है कि अगरबत्ती का इस्तेमाल लगभग हर व्यक्ति करता है। अगरबत्ती हालाँकि पूजा पाठ में इस्तेमाल होती है लेकिन इसकी खुशबू ही शायद वह वजह होती है कि लोग इसे प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं।

इस कविता में कवि ने उन खुशबूदार अगरबत्ती बनाने वालों के बारे में बताया है जो खुशबू से कोसों दूर है। ऐसा कवि ने इसलिए कहा है क्योंकि अगरबत्ती का कारखाना अकसर किसी तंग गली में, घरों और सड़कों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाए गए रास्ता के पार और बदबूदार कूड़े के ढेर के समीप होता है। ऐसे स्थानों पर कई कारीगर अपने हाथों से अगरबत्ती को बनाते हैं।

उभरी नसोंवाले हाथ

घिसे नाखूनोंवाले हाथ

पीपल के पत्ते से नए नए हाथ

जूही की डाल से खुशबूदार हाथ

गंदे कटे पिटे हाथ

जख्म से फटे हुए हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ!

शब्दार्थ: शख्म- घाव, चोट

व्याख्या: कवि कहता है कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ तरह-तरह के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं। कवि कहता है कि दूसरों के लिए खुशबू बनाने वाले खुद न जाने कितनी और कैसी तकलीफों का सामना करते हैं।

यहीं इस गली में बनती हैं

मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ

इन्हीं गंदे मुहल्लों के गंदे लोग

बनाते हैं केवड़ा गुलाब खस और रातरानी अगरबत्तियाँ

दुनिया की सारी गंदगी के बीच

दुनिया की सारी खुशबू

रचते रहते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ।

शब्दार्थ: मुल्क- देश, केवड़ा- एक छोटा वृक्ष जिसके फूल अपनी सुगंध के लिए प्रसिद्ध हैं, खस- पोस्ता, रातरानी- एक सुगंधित फूल, मशहूर- प्रसिद्ध।

व्याख्या: कवि कहता है कि इसी तंग गली में पूरे देश की प्रसिद्ध अगरबत्तियाँ बनती हैं। उस गंदे मुहल्ले के गंदे लोग (गरीब लोग) ही केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी की खुशबू वाली अगरबत्तियाँ बनाते हैं। यह एक विडंबना ही है कि दुनिया की सारी खुशबू उन गलियों में बनती है जहाँ दुनिया भर की गंदगी समाई होती है।

Naye Ilaake Mein, Khushboo Rachte Haath Question and Answers

नए इलाके में, खुशबू रचते हैं हाथ प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1. नए बसते इलाके में कवि रास्ता क्यों भूल जाता है?

उत्तर: नये बसते इलाके में रोज रोज नये-नये मकान बनते हैं। कवि के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह अपना रास्ता ढूँढ़ने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है परन्तु हर जगह मकानों के बनने के कारण उस पीपल के पेड़ को काट दिया गया है। इससे आसपास का नजारा बदल जाता है और पुराने निशान गायब हो जाते हैं। इसलिए कवि रास्ता भूल जाता है।

प्रश्न 2. कविता में कौन-कौन से पुराने निशानों का उल्लेख किया गया है?

उत्तर: पीपल का पेड़, ढ़हा हुआ मकान, लोहे का बिना रंगवाला गेट

प्रश्न 3. कवि एक घर पीछे या दो घर आगे क्यों चल देता है?

उत्तर: कवि हर दिन नए-नए घर बन जाने से अपने घर को नहीं ढ़ूँढ़ पाता है और इसलिए एक घर पीछे या दो घर आगे चल देता है।

प्रश्न 4. ‘वसंत का गया पतझड़’ और ‘बैसाख का गया भादों को लौटा’ से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: ‘वसंत का गया पतझड़’ और ‘बैसाख का गया भादों को लौटा’ से अभिप्राय महीनों बाद लौटने से है।

प्रश्न 5. कवि ने इस कविता में ‘समय की कमी’ की ओर क्यों इशारा किया है?

उत्तर: जल्दी से सही पता न मिलने पर हो सकता है कि कवि की परेशानियाँ बढ़ जाएँ। हो सकता है उसे बिना वजह किसी होटल में किराये पर कमरा लेना पड़े, या प्लेटफॉर्म पर रात बितानी पड़े। हो सकता है कि कवी के घर में कोई महत्वपूर्ण काम चल रहा हो। इसलिए कवि ने इस कविता में ‘समय की कमी’ की ओर इशारा किया है।

प्रश्न 6. इस कविता में कवि ने शहरों की किस विडंबना की ओर संकेत किया है?

उत्तर: इस कविता में कवि ने शहरों के लगातार बदलते स्वरूप की ओर संकेत किया है। शहर में कुछ भी स्थाई नहीं होता। सब कुछ इतनी तेजी से बदलता है कि लोग हक्के बक्के रह जाते हैं और अपने घर का रास्ता भी भूल जाते हैं।

व्याख्या कीजिए-

प्रश्न 1. यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं, एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

उत्तर: एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। ऐसे में कोई पता ढ़ूँढ़ने के लिए याददाश्त पर भरोसा करने से कोई लाभ नहीं होता।

प्रश्न 2. समय बहुत कम है तुम्हारे पास, आ चला पानी ढ़हा आ रहा अकास, शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर

उत्तर: जल्दी से सही पता न मिलने पर हो सकता है कि कवि की परेशानियाँ बढ़ जाएँ। हो सकता है उसे बिलावजह किसी होटल में किराये पर कमरा लेना पड़े, या प्लेटफॉर्म पर रात बितानी पड़े। हो सकता है कि कवी के घर में कोई महत्वपूर्ण काम चल रहा हो। ऐसे में यदि कोई परिचित देख ले और आवाज लगा दे तो कवि का काम आसान हो जाएगा।

प्रश्न अभ्यास (खुशबू रचते हैं हाथ)-

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1. ‘खुशबू रचनेवाले हाथ’ कैसी परिस्थितियों में तथा कहाँ कहाँ रहते हैं?

उत्तर: ‘खुशबू रचनेवाले हाथ’ अर्थात अगरबत्ती बनाने वाले गरीब तबके के लोग होते हैं। ऐसे लोग तंग गलियों में, बदबूदार नाले के किनारे और कूड़े के ढ़ेर के बीच रहते हैं। बड़े शहरों की किसी भी झोपड़पट्टी में आपको ऐसा ही नजारा आसानी से देखने को मिलेगा।

प्रश्न 2. कविता में कितने तरह के हाथों की चर्चा हुई है?

उत्तर: अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ तरह-तरह के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं।

प्रश्न 3. कवि ने यह क्यों कहा है कि ‘खुशबू रचते हैं हाथ’?

उत्तर: अगरबत्ती का काम है खुशबू फैलाना। ये अगरबत्तियाँ हाथों से बनाई जाती हैं। इसलिए कवि ने कहा है कि ‘खुशबू रचते हैं हाथ’।

प्रश्न 4. जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल कैसा होता है?

उत्तर: जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल अगरबत्ती की मोहक खुशबू के ठीक विपरीत होता है। अगरबत्ती निर्माण एक कुटीर उद्योग है। ज्यादातर कारीगर किसी झोपड़पट्टी में रहते हैंय जहाँ बहुत ज्यादा गंदगी और बदबू होती है।

प्रश्न 5. इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इस कविता के माध्यम से कवि ने कामगारों और मजदूरों की भयावह जिंदगी को उजागर किया है। कवि ने यह दिखाने की कोशिश की है कि ऐसे मजदूर जो दूसरों के लिए खुशबू या खुशहाली का निर्माण करते हैं खुद कितनी बदहाली में रहते हैं और कितनी विषम परिस्थिति में काम करते हैं।

व्याख्या कीजिए-

प्रश्न 1. पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ, जूही की डाल से खुशबूदार हाथ

उत्तर: अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ तरह-तरह के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं।

प्रश्न 2. दुनिया की सारी गंदगी के बीच, दुनिया की सारी खुशबू रचते रहते हैं हाथ

उत्तर: जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल अगरबत्ती की मोहक खुशबू के ठीक विपरीत होती है। यह एक विडंबना ही है कि दुनिया की सारी खुशबू उन गलियों में बनती है जहाँ दुनिया भर की गंदगी समाई होती है।

प्रश्न 3. कवि ने इस कविता में ‘बहुवचन’ का प्रयोग अधिक किया है? इसका क्या कारण है?

उत्तर: अगरबत्ती हम जब भी खरीदते हैं तो हम कभी एक अगरबत्ती नहीं बल्कि एक पूरा अगरबत्ती का पैकेट खरीदते हैं। उसी तरह, अगरबत्ती बनाने वाले झुंड में काम करते हैं। उनकी समस्याएँ भी अनेक होती हैं। इसलिए कवि ने इस कविता में बहुवचन का प्रयोग अधिक किया है।

प्रश्न 4. कवि ने हाथों के लिए कौन-कौन से विशेषणों का प्रयोग किया है?

उत्तर: अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ किस्म किस्म के होते हैं और उनका वर्णन करने के लिए कवि ने तरह तरह के विशेषणों का उपयोग किया है। कवि ने किसी हाथ की उभरी हुई नसें दिखाई है, तो किसी के घिसे नाखून। किसी हाथ की कोमलता दिखाई है तो किसी की कठोरता।

बच्चों!

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Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary

Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 1 का पाठ 2 पढ़ेंगे

“मेरे संग की औरतें”

पाठ की लेखिका मृदुला गर्ग हैं।

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mere sang ki auratein

लेखिका परिचय: मृदुला गर्ग

मेरे संग की औरतें” मृदुला गर्ग जी का एक संस्मरण हैं।

इस संस्मरण में लेखिका ने अपनी चार पीढ़ी की महिलाओं (परदादी, नानी, माँ और खुद लेखिका) के व्यक्तित्व, उनकी आदतों व उनके विचारों के बारे में विस्तार से बात की है।

Mere Sang Ki Auratein Class 9th Chapter 2 Hindi Kritika

मेरे संग की औरतें पाठ का सारांश

लेखिका की स्मृतियों में उसकी नानी

Mridula Garg

अपने लेख की शुरुआत लेखिका कुछ इस तरह से करती हैं कि उनकी एक नानी थी जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा क्योंकि नानी की मृत्यु मां की शादी से पहले हो गई थी। लेखिका कहती हैं कि इसीलिए उन्होंने कभी अपनी “नानी से कहानियां” तो नहीं सुनी मगर “नानी की कहानियां” पढ़ी जरूर और उन कहानियों का अर्थ उनकी समझ में तब आया, जब वो बड़ी हुई।

लेखिका अपनी नानी के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उनकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और पर्दा करने वाली महिला थी।और उनके पति यानि नानाजी शादी के तुरंत बाद उन्हें (नानीजी) छोड़कर बैरिस्ट्री की पढाई करने कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए थे और जब वो अपनी पढ़ाई पूरी कर घर वापस आए तो, उनका रहन-सहन, खानपान, बोलचाल बिल्कुल विलायती हो गया था।

हालांकि नानी अब भी सीधे-साधे तौर तरीके से ही रहती थी। उन पर नानाजी के विलायती रंग-ढंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और ना ही उन्होंने कभी अपनी इच्छा या पसंद-नापसंद अपने पति को बतायी।

लेखिका आगे कहती हैं कि बेहद कम उम्र में जब नानी को लगा की उनकी मृत्यु निकट हैं तो उन्हें अपनी पन्द्रह वर्षीय इकलौती बेटी यानी लेखिका की मां की शादी की चिंता सताने लगी। इसीलिए उन्होंने पर्दे का लिहाज छोड़ कर नानाजी से उनके दोस्त व स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से मिलने की ख्वाहिश जताई। यह बात सुनकर घर में सब हैरान रह गए कि आखिर पर्दा करने वाली एक महिला, भला उनसे क्या बात करना चाहती हैं।

खैर नानाजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए अपने दोस्त को फौरन बुलवा लिया। नानी ने प्यारे लाल जी से वचन ले लिया कि वो उनकी लड़की (लेखिका की माँ) के लिए वर के रूप में किसी आजादी के सिपाही (स्वतंत्रता सेनानी) को ढूंढ कर उससे उसकी शादी करवा देंगें। उस दिन सब घर वालों को पहली बार पता चला कि नानीजी के मन में भी देश की आजादी का सपना पलता हैं।

बाद में लेखिका को समझ में आया कि असल में नानीजी अपनी जिंदगी में भी खूब आजाद ख्याल रही होंगी। हालाँकि उन्होंने कभी नानाजी की जिंदगी में कोई दखल तो नहीं दिया पर अपनी जिंदगी को भी वो अपने ढंग से, पूरी आजादी के साथ जीती थी। लेखिका कहती हैं कि यही तो असली आजादी हैं।

लेखिका की माँ

लेखिका की मां की शादी एक ऐसे पढ़े-लिखे लड़के से हुई जिसे आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने के अपराध में आईसीएस की परीक्षा में बैठने से रोक दिया और जिसके पास कोई पुश्तैनी जमीन जायजाद भी नहीं थी। और लेखिका की मां, अपनी मां और गांधी जी के सिद्धांतों के चक्कर में सादा जीवन उच्च विचार रखने को मजबूर हो गई।

लेखिका आगे कहती हैं कि उनके नाना पक्के साहब माने जाते थे। वो सिर्फ नाम के हिंदुस्तानी थे। बाकी चेहरे मोहरे, रंग-ढंग, पढ़ाई-लिखाई, रहन-सहन से वो पक्के अंग्रेज ही थे। लेखिका कहती हैं कि मजे की बात तो यह थी कि हमारे देश में आजादी की जंग लड़ने वाले ही अंग्रजों के सबसे बड़े प्रशंसक थे। फिर वो चाहे मेरे पिताजी के घरवाले हो या गांधी नेहरू।

लेखिका की मां खादी की साड़ी पहनती थी जो उन्हें ढंग से पहननी नहीं आती थी।लेखिका कहती हैं कि उन्होंने अपनी मां को आम भारतीय मांओं के जैसा कभी नहीं देखा क्योंकि वह घर परिवार और बच्चों पर कोई खास ध्यान नहीं देती थी। घर में पिताजी, मां की जगह काम कर लिया करते थे।

लेखिका की मां को पुस्तकें पढ़ने और संगीत सुनने का शौक था जो वो बिस्तर में लेटे-लेटे करती थी। हां उनमें दो गुण अवश्य थे। पहला वह कभी झूठ नहीं बोलती थी और दूसरा वह लोगों की गोपनीय बातों को अपने तक ही सीमित रखती थी। इसी कारण उन्हें घर और बाहर दोनों जगह आदर व सम्मान मिलता था।

लेखिका आगे कहती हैं कि उन्हें सब कुछ करने की आजादी थी।उसी आजादी का फायदा उठाकर छह भाई-बहनों में से तीन बहनों और इकलौते भाई ने लेखन कार्य शुरू कर दिया।

लेखिका की परदादी 

लेखिका कहती हैं कि उनकी परदादी को भी लीक से हटकर चलने का बहुत शौक था। जब लेखिका की मां पहली बार गर्भवती हुई तो परदादी ने मंदिर जाकर पहला बच्चा लड़की होने की मन्नत मांगी थी जिसे सुनकर परिवार के सभी लोग हक्के-बक्के रह गए थे। दादी का यह मन्नत मांगने का मुख्य कारण परिवार में सभी बहूओं के पहला बच्चा बेटा ही होता आ रहा था। ईश्वर ने परदादी की मुराद पूरी की और घर में एक के बाद एक पाँच कन्याएं भेज दी।

इसके बाद लेखिका अपनी दादी से संबंधित एक किस्सा सुनाती हैं। लेखिका कहती हैं कि एक बार घर के सभी पुरुष सदस्य एक बारात में गए हुए थे और घर में सभी महिलाएं सजधज कर रतजगा कर रही थी। घर में काफी शोर-शराबा होने के कारण दादी दूसरे कमरे में जाकर सो गई।

तभी एक बदकिस्मत चोर दादी के कमरे में घुस गया।उसके चलने की आहट से दादी की नींद खुल गई। दादी ने चोर को कुँए से एक लोटा पानी लाने को कहा। चोर कुएं से पानी लेकर आया और दादी को दे दिया। दादी ने आधा लोटा पानी खुद पानी पिया और आधा लोटा पानी चोर को पिला दिया और फिर उससे बोली कि आज से हम मां-बेटे हो गए हैं। अब तुम चाहो तो चोरी करो या खेती करो।  दादी की बात का चोर पर ऐसा असर हुआ कि चोर ने चोरी करना छोड़ कर , खेती करनी शुरू कर दी।

15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा था। तब लेखिका बीमारी थी। लेखिका उस समय सिर्फ 9 साल की बच्ची थी। बहुत रोने धोने के बाद भी उसे जश्न में शामिल होने नहीं ले जाया गया। लेखिका और उसके पिताजी के अलावा घर के सभी लोग बाहर जा चुके थे।

बाद में पिताजी ने उसे “ब्रदर्स कारामजोव” नामक उपन्यास लाकर दी । उसके बाद लेखिका उस उपन्यास को पढ़ने में व्यस्त हो गयी थी और उनके पिताजी अपने कमरे में जाकर पढ़ने लगे।

लेखिका कहती हैं कि यह उसकी परदादी की मन्नत का प्रभाव ही रहा होगा, तभी लड़कियों होने के बाबजूद भी उनके व उनकी बहनें के मन में कभी कोई हीन भावना नहीं आई।

लेखिका की बहनें

दादी ने जिस पहली लड़की के लिए मन्नत मांगी थी। वह लेखिका की बड़ी बहन मंजुला भगत थी जिसे घर में “रानी” नाम से बुलाते थे। दूसरे नंबर में खुद लेखिका यानि मृदुला गर्ग थी जिनका घर का नाम उमा था। और तीसरे नंबर की बहन का नाम चित्रा था, जो लेखिका नहीं हैं ।

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लेखिका का परिवार

चौथे नंबर की बहन का नाम रेनू और पांचवें नंबर की बहन का नाम अचला था। पांच बहनों के बाद एक भाई हुआ जिसका नाम राजीव हैं। लेखिका कहती हैं कि उनके भाई राजीव हिंदी में लिखते हैं जबकि समय की मांग के हिसाब से अचला अंग्रेजी में लिखने लगी।

लेखिका आगे कहती हैं कि सभी बहनों ने अपनी शादी अच्छे से निभाई। लेखिका शादी के बाद अपने पति के साथ बिहार के एक छोटे से कस्बे डालमिया नगर में रहने गई। लेखिका ने वहाँ एक अजीब सी बात देखी। परुष और महिलाएं, चाहे वो पति-पत्नी क्यों न हो, अगर वो पिक्चर देखने भी जाते थे तो पिक्चर हाल में अलग-अलग जगह में बैठकर पिक्चर देखते थे।

लेखिका दिल्ली से कॉलेज की नौकरी छोड़कर वहां पहुंची थी और नाटकों में काम करने की शौकीन थी। लेखिका कहती हैं कि उन्होंने वहां के चलन से हार नहीं मानी और साल भर के अंदर ही कुछ शादीशुदा महिलाओं को गैर मर्दों के साथ अपने नाटक में काम करने के लिए मना लिया। अगले 4 साल तक हम महिलाओं ने मिलकर कई सारे नाटकों में काम किया और अकाल राहत कोष के लिए भी काफी पैसा इकट्ठा किया।

इसके बाद लेखिका कर्नाटक चली गई। उस समय तक उनके दो बच्चे हो चुके थे जो स्कूल जाने लायक की उम्र में पहुंच चुके थे। लेखिका कहती है कि वहां कोई बढ़िया स्कूल नहीं था जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सके। इसीलिए लेखिका ने स्वयं एक प्राइमरी स्कूल खोला।

वो कहती हैं कि मेरे बच्चे, दूसरे ऑफिसर और अधिकारियों के बच्चे उस स्कूल में पढ़ने लगे। जिन्हें बाद में दूसरे अच्छे स्कूलों में प्रवेश मिल गया।लेखिका ने स्कूल खोल कर व उसे सफलता पूर्वक चला कर यह साबित कर दिया कि वह किसी से कम नहीं है।

लेखिका के जीवन में ऐसे अनेक अवसर आए जब लेखिका ने अपने आप को साबित किया। उन्होंने अनेक कार्य किये लेकिन उन्हें प्रसिद्धि तो अपने लेखन कला से ही हासिल हुई।

Mere Sang Ki Auratein Chapter 2 Question Answers

मेरे संग की औरतें पाठ के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा भी नहीं फिर भी उनके व्यक्तित्व से वे क्यों प्रभावित थीं?

उत्तर: लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा नहीं था, किंतु उनके बारे में सुना अवश्य था। उसने सुना था कि उसकी नानी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्यारेलाल शर्मा से भेंट की थी। उस भेट में उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि वे अपनी बेटी की शादी किसी क्रांतिकारी से करवाना चाहती हैं, अंग्रेजों के किसी भक्त से नहीं। उनकी इस इच्छा में देश की स्वतंत्रता की पवित्र भावना थी। यह भावना बहुत सच्ची थी। इसमें साहस था। जीवन भर परदे में रहकर भी उन्होंने किसी पर पुरुष से मिलने की हिम्मत की। इससे उनके साहसी व्यक्तित्व और मन में सुलगती स्वतंत्रता की भावना का पता चला। लेखिका इन्हीं गुणों के कारण उनका सम्मान करती है।

प्रश्न 2. लेखिका की नानी की आज़ादी के आंदोलन में किस प्रकार की भागीदारी रही?

उत्तर: लेखिका की नानी ने आज़ादी के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था, पर आज़ादी के आंदोलन में उनका अप्रत्यक्ष योगदान अवश्य था। वे अनपढ़ परंपरागत परदानशीं औरत थीं। उनके मन में आज़ादी के प्रति जुनून था। यद्यपि उनके पति अंग्रेजों के भक्त थे और साहबों के समान रहते थे पर अपनी मृत्यु को निकट देखकर उन्होंने अपने पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा को बुलवाया और स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनकी बेटी का वर वे ही अपने समान ही। किसी स्वतंत्रता के दीवाने लड़के को खोज कर दें। इससे उनकी बेटी का विवाह आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने वाले उस लड़के से हो सका जिसे आई.सी.एस. (I.C.S.) परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। इस तरह उसकी नानी ने आज़ादी के आंदोलन में भागीदारी निभाई।

प्रश्न 3. लेखिका की माँ परंपरा का निर्वाह न करते हुए भी सबके दिलों पर राज करती थी। इस कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की विशेषताएँ लिखिए।

(ख) लेखिका की दादी के घर के माहौल का शब्द-चित्र अंकित कीजिए।

उत्तर: कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की स्थितियाँ और व्यक्तित्व-दोनों असाधारण थे। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम करती थीं। उनकी सोच मौलिक थी। लेखिका के शब्दों में वह खुद अपने तरीके से आज़ादी के जुनून को निभाती थीं। इस विशेषता के कारण घर-भर के लोग उसका आदर करते थे। कोई उनसे घर गृहस्थी के काम नहीं करवाता था। उनका व्यक्तित्व ऐसा प्रभावी था कि ठोस कामों के बारे में उनसे केवल राय ली जाती थी और उस राय को पत्थर की लकीर मानकर निभाया जाता था।

लेखिका की माँ का सारा समय किताबें पढ़ने, साहित्य चर्चा करने और संगीत सुनने में बीतता था। वे कभी बच्चों के साथ लाड़-प्यार भी नहीं करती थीं। उनके मान-सम्मान के दो कारण प्रमुख थे। वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं। वे एक की गोपनीय बात दूसरे से नहीं कहती थीं।

(ख) लेखिका की दादी के घर में विचित्र विरोधों का संगम था। परदादी लीक से परे हटकर थीं। वे चाहती थीं कि उनकी पतोहू को होने वाली पहली संतान कन्या हो। उसने यह मन्नत मानकर जगजाहिर भी कर दी। इससे घर के अन्य सभी लोग हैरान थे। परंतु लेखिका की दादी ने इस इच्छा को स्वीकार करके होने वाली पोती को खिलाने-दुलारने की कल्पनाएँ भी कर डालीं। लेखिका की माँ तो बिलकुल ही विचित्र थीं। वे घर का कोई काम नहीं करती थीं। वे आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहती थीं। उन्हें पुस्तकें पढ़ने, संगीत सुनने और साहित्य चर्चा करने से ही फुर्सत नहीं थी। उनके पति भी क्रांतिकारी थे। वे आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं थे। विचित्र बात यह थी कि लेखिका के दादा अंग्रेजों के बड़े प्रशंसक थे। घर में चलती उन्हीं की थी। किंतु घर की नारियाँ अपने-अपने तरीके से जीने के लिए स्वतंत्र थीं। कोई किसी के विकास में बाधा नहीं बनता था।

प्रश्न 4. आप अपनी कल्पना से लिखिए कि परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत क्यों माँगी?

उत्तर: परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत इसलिए माँगी ताकि वे परंपरा से अलग चलने की जो बात करती थीं, उसे अपने कार्य-व्यवहार द्वारा सबको दर्शा सकें। इसके अलावा उनके मन में लड़का और लड़की में अंतर समझने जैसी कोई बात न रही होगी।

प्रश्न 5. डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की जगह सहजता से किसी को भी सही राह पर लाया जा सकता है-पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: इस पाठ से स्पष्ट है कि मनुष्य के पास सबसे प्रभावी अस्त्र है-अपना दृढ़ विश्वास और सहज व्यवहार। यदि कोई सगा संबंधी गलत राह पर हो तो उसे डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव देने की बजाय सहजता से व्यवहार करना चाहिए। लेखिका की नानी ने भी यही किया। उन्होंने अपने पति की अंग्रेज़ भक्ति का न तो मुखर विरोध किया, न समर्थन किया। वे जीवन भर अपने आदर्शों पर टिकी रहीं। परिणामस्वरूप अवसर आने पर वह मनवांछित कार्य कर सकीं।

लेखिका की माता ने चोर के साथ जो व्यवहार किया, वह तो सहजता का अनोखा उदाहरण है। उसने न तो चोर को पकड़ा, न पिटवाया, बल्कि उससे सेवा ली और अपना पुत्र बना लिया। उसके पकड़े जाने पर उसने उसे उपदेश भी नहीं दिया, न ही चोरी छोड़ने के लिए दबाव डाला। उसने इतना ही कहा-अब तुम्हारी मर्जी चाहे चोरी करो या खेती। उसकी इस सहज भावना से चोर का हृदय परिवर्तित हो गया। उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और खेती को अपना लिया।

प्रश्न 6. ‘शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है’ -इस दिशा में लेखिका के प्रयासों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस दिशा में लेखिका ने अथक प्रयास किए। उसने कर्नाटक के बागलकोट जैसे छोटे से कस्बे में रहते हुए इस दिशा में सोचना शुरू किया। उसने कैथोलिक विशप से प्रार्थना की कि उनका मिशन वहाँ के सीमेंट कारखाने से मदद लेकर वहाँ स्कूल खोल दे, पर वे इसके लिए तैयार न हुए। तब लेखिका ने अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ तीन भाषाएँ सिखाने वाला स्कूल खोला और उसे कर्नाटक सरकार से मान्यता दिलवाई। इस स्कूल के बच्चे बाद में अच्छे स्कूलों में प्रवेश पा गए।

प्रश्न 7. पाठ के आधार पर लिखिए कि जीवन में कैसे इंसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है?

उत्तर: इस पाठ के आधार पर स्पष्ट है कि ऊँची भावना वाले दृढ़ संकल्पी लोगों को श्रद्धा से देखा जाता है। जो लोग सद्भावना से व्यवहार करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर गलत रूढ़ियों को तोड़ डालने की हिम्मत रखते हैं, समाज में उनका खूब आदर-सम्मान होता है।

लेखिका की नानी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने परिवार और समाज से विरोध लेकर भी अपनी पुत्री को किसी क्रांतिकारी से ब्याहने की बात कही। इस कारण वह सबकी पूज्या बन गईं। लेखिका की परदादी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने दो धोतियों से अधिक संचय न करने का संकल्प किया था। उसने परंपरा के विरुद्ध लड़के की बजाय लड़की होने की मन्नत मानी।

लेखिका की माता इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने देश की आज़ादी के लिए कार्य किया। कभी किसी से झूठ नहीं बोला। कभी किसी की गोपनीय बात को दूसरे को नहीं बताया। ये सभी व्यक्तित्व सच्चे थे, लीक से परे थे तथा दृढ़ निश्चयी थे। इस कारण इनका सम्मान हुआ। इन पर श्रद्धा प्रकट की गई।

प्रश्न 8. ‘सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है’ -इस कथन के आधार पर लेखिका की बहन एवं लेखिका के व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर: “सच, अकेलेपन का मजा ही कुछ और है।” इस कथन के आधार पर ज्ञात होता है कि लेखिका और उसकी बहन दोनों ही अपने दृढ़ निश्चय और जिद्दीपन के कारण उक्त कथन को चरितार्थ ही नहीं करती हैं बल्कि उसका आनंद भी उठाती हैं। लेखिका की बहन रेणु तो लेखिका से भी दो कदम आगे थी। वह गरमी में भी उस गाड़ी में नहीं आती थी जिसे उसके पिता ने स्कूल से उसे लाने के लिए लगवा रखा था। एक बहन गाड़ी में आती थी जबकि रेणु पैदल। इसी तरह शहर में एक बार नौ इंच बारिश होने पर शहर में पानी भरने के कारण घरवालों के मना करते रहने पर भी वह लब-लब करते पानी में स्कूल गई और स्कूल बंद देखकर लौट आई।

लेखिका ने बिहार के डालमिया शहर में रूढ़िवादी स्त्री-पुरुषों के बीच जहाँ जागृति पैदा की और उनके साथ नाटक करते हुए सूखा राहत कोष के लिए धन एकत्र किया वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के छोटे से कस्बे में बच्चों के लिए स्कूल खोला और मान्यता दिलवाई, यह काम लेखिका ने अकेले ही शुरू किया था।

पाठ से जुड़े अन्य प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1. लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का क्या कारण मानती है?

उत्तर: लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का कारण यह मानती हैं कि वे अपनी नानी से कहानी नहीं सुन पाईं क्योंकि उनकी माँ की शादी होने से पूर्ण ही नानी की मृत्यु हो चुकी थी। शायद नानी से कहानी न सुन पाने के कारण लेखिका और उसकी बहनों को खुद कहानियाँ कहनी पड़ीं। इससे वे लेखिका बन गईं।

प्रश्न 2. लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे क्या जान पाई थी?

उत्तर: लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे में बस इतना ही जान पाई थी कि उसकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और परदा करने वाली महिला थी। उनके पति उन्हें छोड़कर वकालत की पढ़ाई करने इंग्लैंड चले गए थे। वकालत की डिग्री लेकर लौटने के बाद वे साहबों जैसी जिंदगी व्यतीत करने लगे पर नानी पर इसका कोई अंतर नहीं पड़ा। वे अपनी मरजी से जीती रहीं और अपनी किसी पसंद-नापसंद का इज़हार अपने पति के सामने कभी नहीं किया।

प्रश्न 3. लेखिका की नानी ने स्वतंत्रता सेनानी प्यारे लाल शर्मा से कौन-सी इच्छा प्रकट की? यह इच्छा उन्होंने अपने पति से क्यों नहीं बताई?

उत्तर: लेखिका की नानी ने जब कम उम्र में ही स्वयं को मृत्यु के निकट पाया तो उन्होंने अपने पति के मित्र प्यारे लाल शर्मा को बुलवाया और कहा कि आप मेरी बेटी की शादी अपने जैसे ही किसी आज़ादी के सिपाही से करवा दीजिएगा। उन्होंने यह इच्छा अपने पति को इसलिए नहीं बताई क्योंकि वे जानती थी कि अंग्रेज़ों के भक्त उनके पति उनकी इस इच्छा को पूरा नहीं करेंगे। वे बेटी की शादी आज़ादी के सिपाही से होने को पसंद न करते।।

प्रश्न 4. लेखिका ने लिखा है कि उसकी नानी एकदम मुँहज़ोर हो उठीं। वे कब और क्यों मुँहज़ोर हो उठीं?

उत्तर: लेखिका की नानी उस समय मुँहज़ोर हो उठी थी जब वे कम उम्र में यह महसूस करने लगी कि उनकी मृत्यु निकट है। और उनकी इकलौती पंद्रह वर्षीया बेटी अभी अविवाहित है। उनके मुँहजोर होने का कारण अपने पति का आचार-विचार था। उनके उच्च शिक्षित पति अंग्रेजों के भक्त थे जबकि लेखिका की नानी स्वतंत्रताप्रिय नारी थीं। वे अपनी बेटी का विवाह किसी साहब से नहीं बल्कि आज़ादी के सिपाही से करने की पक्षधर थीं।

प्रश्न 5. लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई क्यों कहा है? ससुराल में उनकी क्या स्थिति थी?

उत्तर: लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई इसलिए कहा है क्योंकि उनमें खूबसूरती, नज़ाकत गैर दुनियादारी, ईमानदारी और निष्पक्षता जैसे गुणों का संगम था। इन गुणों के कारण ससुराल में उनकी स्थिति यह थी कि उनसे कोई ठोस काम करने के लिए कोई नहीं कहता था। हर काम के लिए उनकी ज़बानी राय जरूर माँगी जाती थी और उनकी राय को अकाट्य समझते हुए उस पर अमल भी किया जाता था।

बच्चों!

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Savle Sapno Ki Yaad Class 9th Summary

Savle Sapno Ki Yaad Class 9th Summary, Explanation & Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे

“सांवले सपनों की याद”

पाठ के लेखक जाबिर हुसैन हैं।

बच्चों! पाठ के सार को समझने से पहले लेखक का जीवन परिचय जानते हैं।

This Post Includes

लेखक परिचय: जाबिर हुसैन

लेखक परिचय: जाबिर हुसैन का जन्म सन् 1945 में गॉंव नौनहीं राजगीर, जिला नालंदा, बिहार में हुआ| वे अंग्रेजी भाषा व साहित्य के प्राध्यापक रहें। सक्रिय राजनीति में भाग लेते हुए सन् 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और मंत्री बने सन् 1995 से बिहार विधानसभा परिषद् के सभापति हैं।

पाठ का सारांश

यह एक संस्मरण हैं जो लेखक जाबिर हुसैन ने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली की याद में लिखा हैं। लेखक को सालिम अली की मृत्यु से बहुत गहरा आघात पहुंचा। इसीलिए यह संस्मरण लेखक ने सालिम अली की मृत्यु के तुरंत बाद लिखा।

दरअसल “सांवले सपनों की याद” में सपनों के साथ “सांवला” शब्द दुख की अभिव्यक्ति के लिए लगाया गया है। क्योंकि ये वो तमाम सपने थे जो सालिम अली हर रोज पक्षियों को लेकर बुनते थे। और आज उनकी मौत के साथ वो सारे सपने भी दफन होने जा रहे हैं।

लेखक कहते हैं कि उनकी शव यात्रा में यूं तो हजारों लोग जा रहे थे। लेकिन उस भीड़ में सालिम अली सबसे आगे चल रहे थे । ऐसा लग रहा था मानो वो किसी सैलानी (धूमने फिरने वाले लोग) की तरह एक अंतहीन यात्रा की ओर चल पड़े हों। यह उनका आखिरी सफर था। और उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई पक्षी अपने जीवन का आखिरी गीत गाकर अंतिम सफर पर निकल पड़ा हैं।

अब कोई भी व्यक्ति अपने दिल की धड़कन दे कर भी, उस पक्षी को कभी वापस नहीं ला सकता हैं। क्योंकि मृत व्यक्ति कभी वापस नहीं आ सकता। भले आप कितनी कोशिश कर लें । लेकिन उनकी यादें हमेशा लोगों को कभी हंसाती हैं तो कभी रुलाती हैं और कभी-कभी दुख भी पहुंचाती है। यही दुख पहुंचाने वाली यादों को यहां पर “सांवले सपने” कहा गया है।

सालिम अली हमेशा कहा करते थे कि प्रकृति और पक्षियों को मनुष्य की नजर से देखना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। आगे लेखक कहते हैं कि पक्षियों का नाम सुनते ही सालिम अली का नाम अपने आप जुबान पर या दिमाग में आ जाता हैं। यह ठीक ऐसे ही है जैसे वृन्दावन का नाम सुनकर कृष्ण की याद खुद-ब-खुद हो आती है।

वृंदावन में कब कृष्ण ने गोपियों की मटकी तोड़ कर माखन खाया होगा या कब गोपियों के संग रास रचाया होगा या अपनी मधुर मुरली की धुन से ग्वाल बालों को मोहित किया होगा। यह किसी ने नहीं देखा मगर आज भी वृंदावन का नाम आते ही कृष्ण का ध्यान खुद-ब-खुद हो आता है।

और आज भी यमुना के उस काले पानी को देखकर ऐसा लगता है मानो अभी–अभी भगवान श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हुए कही से आयेंगे और सारे वातावरण में बांसुरी की मधुर तान बिखेर देंगे। सच में वृंदावन और कृष्ण एक दूसरे के पूरक बन गये हैं।

उसके बाद लेखक सालीम अली के जीवन के बारे में बताते हुए कहते हैं कि सलीम अली दुबले पतले मरियल से व्यक्ति थे। सालिम अली ने बहुत अधिक यात्रायें की जिससे उनका शरीर थक चुका था। यात्राओं के कारण उनका शरीर दुर्बल भी हो गया था।

लेकिन पक्षियों को खोजने व उनके बारे में जानने के लिए दूरबीन हमेशा उनकी आँखों पर या गरदन में पड़ी ही रहती थी और उनकी आँखें हमेशा दूर–दूर तक फैले आकाश में पक्षियों को ही ढूँढ़ती रहती थी। उन्हें प्रकृति में एक हँसता–खेलता हुआ अद्भुत संसार दिखाई देता था।

उन्हें कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो गई थी और यही रोग उनकी मृत्यु का कारण बना। 100 वर्ष की आयु पूरा करने से कुछ ही समय पहले उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी तहमीना उनका बहुत ध्यान रखती थी। तहमीना उनकी सहपाठी भी रह चुकी थी।

सालिम अली को “बर्ड वाचर” के नाम से जाना जाता है। सलीम अली के “बर्ड वाचर” बनने के पीछे एक कहानी छुपी हुई है। दरअसल बचपन में उनके मामा ने उन्हें उपहार स्वरूप एक ईयर पिस्टल ला कर दी। एक दिन हंसी खेल में उन्होंने अपने घर की छत में बैठी एक गौरैया को उस एयर गन से निशाना बनाया जिससे गौरैया घायल होकर नीचे गिर पड़ी

घायल गौरैया को देखकर सालिम अली को बहुत दुख हुआ। उसके बाद उन्होंने गौरैया की खूब देखभाल की।  नीले पंखों वाली उस गौरैया ने उनके जीवन को ही बदल दिया और वो बर्ड वाचर बन गये। इस घटना का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा “फॉल आँफ ए स्पैरो” में भी किया है।

लेखक को सालिम अली को देखकर अंग्रेजी उपन्यासकार लॉरेंस की याद आ जाती है। क्योंकि लॉरेंस भी प्रकृति प्रेमी थे। जब लॉरेंस की मृत्यु हुई, तब लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा से पत्रकारों ने पूछा कि लॉरेंस के बारे में कुछ बताइए।

तब फ्रीडा ने उत्तर दिया कि “मुझसे ज्यादा लॉरेंस के बारे में हमारे घर पर बैठी गौरैया जानती है। वो प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें छत पर बैठी गौरेया व प्रकृति से ही अपना साहित्य लिखने की प्रेरणा मिलती थी।

लॉरेंस हमेशा कहते थे कि मनुष्य उखड़े हुए पेड़ की तरह है जिसकी शाखाएं हवा में लटक रही हैं। यहां पर लॉरेंस यह कहना चाहते थे कि हमें प्रकृति से जुड़े रहना चाहिए और प्रकृति व पशु-पक्षियों को बचाने के प्रयास करते रहना चाहिए।

लेखक आगे कहते हैं कि सलीम अली पक्षी जगत में एक सागर की तरह थे, न कि टापू की तरह क्योंकि टापू की अपनी सीमाएं होती हैं और सागर असीमित होता है।

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सालिम अली “केरल की साइलेंट वैली” को रेगिस्तानी तूफ़ान से बचाना चाहते थे। और वो इस सिलसिले में उस समय के प्रधानमंत्राी चौधरी चरण सिंह से मिले भी थे। उन्होंने चौधरी चरण सिंह जी से कहा कि साइलेंट वैली को रेगिस्तानी तूफ़ान से बचाना बहुत जरूरी है। वरना साइलेंट वैली उजड़ जाएगी । हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगी।

तूफ़ान के बाद पक्षी उस तरफ रुख नहीं करेंगे और जानवर भी वहां से पलायन कर जाएंगे।और वहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी खत्म हो जायेगा। इसीलिए साइलेंट वैली को बचाना जरूरी है। चूंकि चौधरी चरण सिंह गाँव में जन्मे हुए थे और गाँव की मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे। इसीलिए यह बात सुनकर चौधरी चरण सिंह की आंखों में आंसू आ गए।

लेखक कहते हैं कि आज पक्षी प्रेमी सालिम अली जिन्दा नहीं हैं, तो अब इन पक्षियों की चिंता कौन करेगा। सभी पक्षी प्रेमियों और अन्य लोगों को भी यकीन नहीं हो रहा है कि अब सालिम अली हमारे बीच नहीं रहे।

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया?

उत्तर: एक बार बचपन में सालिम अली की एयरगन से एक गौरैया घायल होकर गिर पड़ी। इस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया। वे गौरैया की देखभाल, सुरक्षा और खोजबीन में जुट गए। उसके बाद उनकी रुचि पूरे पक्षी-संसार की ओर मुड़ गई। वे पक्षी-प्रेमी बन गए।

प्रश्न 2. सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने पर्यावरण से संबंधित किन संभावित खतरों का चित्र खींचा होगा कि जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं?

उत्तर: सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के सामने रेगिस्तानी हवा के गरम झोकों और उसके दुष्प्रभावों का उल्लेख किया। यदि इस हवा से केरल की साइलेंट वैली को न बचाया गया तो उसके नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। प्रकृति के प्रति ऐसा प्रेम और चिंता देख उनकी आँखें नम हो गईं।

प्रश्न 3. लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा ने ऐसा क्यों कहा होगा कि ‘‘मेरी छत पर बैठने वाली गौरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है?”

उत्तर: लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा जानती थी कि लॉरेंस को गौरैया से बहुत प्रेम था। वे अपना काफी समय गौरैया के साथ बिताते थे। गौरैया भी उनके साथ अंतरंग साथी जैसा व्यवहार करती थी। उनके इसी पक्षी-प्रेम को उद्घाटित करने के लिए उन्होंने यह वाक्य कहा।

प्रश्न 4. आशय स्पष्ट कीजिए-

() वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गए थे।

() कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!

() सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे।

उत्तर:

() लॉरेंस बनावट से दूर रहकर प्राकृतिक जीवन जीते थे। वे प्रकृति से प्रेम करते हुए उसकी रक्षा के लिए चिंतित रहते थे। इसी तरह सालिम अली ने भी प्रकृति की सुरक्षा, देखभाल के लिए प्रयास करते हुए सीधा एवं सरल जीवन जीते थे।

() मृत्यु ऐसा सत्य है जिसके प्रभाव स्वरूप मनुष्य सांसारिकता से दूर होकर चिर निद्रा और विश्राम प्राप्त कर लेता है। उसका हँसना-गाना, चलना-फिरना सब बंद हो जाता है। मौत की गोद में विश्राम कर रहे सालिम अली की भी यही स्थिति थी। अब उन्हें किसी तरह से पहले जैसी अवस्था में नहीं लाया जा सकता था।

() टापू समुद्र में उभरा हुआ छोटा भू-भाग होता है जबकि सागर अत्यंत विशाल और विस्तृत होता है। सालिम अली भी प्रकृति और पक्षियों के बारे में थोड़ी-सी जानकारी से संतुष्ट होने वाले नहीं थे। वे इनके बारे में असीमित ज्ञान प्राप्त करके अथाह सागर-सा बन जाना चाहते थे।

प्रश्न 5. इस पाठ के आधार पर लेखक की भाषा-शैली की चार विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: ‘साँवले सपनों की याद’ नामक पाठ की भाषा-शैली संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मिश्रित शब्दावली का प्रयोग

इस पाठ में उर्दू, तद्भव और संस्कृत शब्दों का सम्मिश्रण है। लेखक ने उर्दू शब्दों का अधिक प्रयोग किया है। उदाहरणतया

जिंदगी, परिंदा, खूबसूरत, हुजूम, ख़ामोश, सैलानी, सफ़र, तमाम, आखिरी, माहौल, खुद। संस्कृत शब्दों का प्रयोग भी प्रचुरता से हुआ है। जैसे संभव, अंतहीन, पक्षी, वर्ष, इतिहास, वाटिका, विश्राम, संगीतमय, प्रतिरूप।

जाबिर हुसैन की शब्दावली गंगा-जमुनी है। उन्होंने संस्कृत-उर्दू का इस तरह प्रयोग किया है कि वे सगी बहने लगती हैं। जैसे- अंतहीन सफर, प्रकृति की नज़र, दुनिया संगीतमय, जिंदगी को प्रतिरूप। इन प्रयोगों में एक शब्द संस्कृत का, तो दूसरा उर्दू का है।

2. जटिल वाक्यों का प्रयोग

जाबिर हुसैन की वाक्य-रचना बंकिम और जटिल है। वे सरल-सीधे वाक्यों का प्रयोग नहीं करते। कलात्मकता उनके हर वाक्य में है। उदाहरणतया
‘सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ अग्रसर है।’

पता नहीं, इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और शोख गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाया था।

3. अलंकारों का प्रयोग

जाबिर हुसैन अलंकारों की भाषा में लिखते हैं। उपमा, रूपक, उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरणतया

  • अब तो वो उस वन-पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं। (उपमा)
  • सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाय अथाह सागर बनकर उभरे थे।
  • रोमांच का सोता फूटता महसूस कर सकता है? (रूपक) ।

4. भावानुरूप भाषा

ज़ाबिर हुसैन भाव के अनुरूप शब्दों और वाक्यों की प्रकृति बदल देते हैं। उदाहरणतया, कभी वे छोटे-छोटे वाक्य प्रयोग करते हैं

  • आज सालिम अली नहीं हैं।
  • चौधरी साहब भी नहीं हैं। कभी वे उत्तेजना लाने के लिए प्रश्न शैली का प्रयोग करते हैं और जटिल वाक्य बनाते चले जाते है जैसे: –
  • कौन बचा है, जो अब सोंधी माटी पर उगी फसलों के बीच एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा?
  • कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बर्फीली जमीनों पर जीने वाले पक्षियों की वकालत करेगा?

प्रश्न 5. इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व का जो चित्र खींचा है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: लेखक ने सालिम अली का जो चित्र खींचा है, वह इस प्रकार है-

सालिम अली प्रसिद्ध पक्षी-विज्ञानी होने के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमी थे। एक बार बचपन में उनकी एअरगन से घायल होकर नीले कंठवाली गौरैया गिरी थी। उसकी हिफाजत और उससे संबंधित जानकारी पाने के लिए उन्होंने जो प्रयास किया, उससे पक्षियों के बारे में उठी जिज्ञासा ने उन्हें पक्षी-प्रेमी बना दिया। वे दूर-दराज घूम-घूमकर पक्षियों के बारे में जानकारी एकत्र रहे हैं और उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहे। वे केरल की साइलेंट वैली को रेगिस्तानी हवा के झोकों से बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से भी मिले। वे प्रकृति की दुनिया के अथाह सागर बन गए थे।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न. प्रस्तुत पाठ सालिम अली की पर्यावरण के प्रति चिंता को भी व्यक्त करता है। पर्यावरण को बचाने के लिए आप कैसे योगदान दे सकते हैं?

उत्तर: ‘साँवले सपनों की याद’ सालिम अली ने पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता प्रकट की है। उन्होंने केरल की साइलेंट वादी को रेगिस्तानी हवा के झोंको से बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री से मुलाकात की और उसे बचाने का अनुरोध किया। इस तरह अपने पर्यावरण को बचाने के लिए हम भी विभिन्न रूपों में अपना योगदान दे सकते हैं; जैसे-

  • अपने आस-पास पड़ी खाली भूमि पर अधिकाधिक पेड़-पौधे लगाएँ।
  • पेड़-पौधों को कटने से बचाने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करें।
  • लोगों को पेड़-पौधों की महत्ता बताएँ।
  • हम जल स्रोतों को न दूषित करें और न लोगों को दूषित करने दें।
  • फैक्ट्रियों से निकले अपशिष्ट पदार्थों एवं विषैले जल को जलस्रोतों में न मिलने दें।
  • प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का प्रयोग कम से कम करें।
  • इधर-उधर कूड़ा-करकट न फेंकें तथा ऐसा करने से दूसरों को भी मना करें।
  • विभिन्न रूपों में बार-बार प्रयोग की जा सकने वाली वस्तुओं का प्रयोग करें।
  • सूखी पत्तियों और कूड़े को जलाने से बचें तथा दूसरों को भी इस बारे में जागरूक करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. साँवले सपनों का हुजूम कहाँ जा रहा है? उसे रोकना संभव क्यों नहीं है?

उत्तर: साँवले सपनों का हुजूम मौत की खामोश वादी की ओर जा रहा है। इसे रोकना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि इस वादी में जाने वाले वे होते हैं जो मौत की गोद में चिर विश्राम कर रहे होते हैं। ये अपना जीवन जी चुके होते हैं।

प्रश्न 2. ‘मौत की खामोश वादी’ किसे कहा गया है? इसे घाटी की ओर किसे ले जाया जा रहा है?

उत्तर: ‘मौत की खामोश वादी’ कब्रिस्तान को कहा गया है। इस घाटी की ओर प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली को ले जाया जा रहा है जो लगभग सौ वर्ष की उम्र में कैंसर नामक बीमारी का शिकार हो गए और मृत्यु की गोद में सो गए हैं।

प्रश्न 3. सालिम अली के इस सफ़र को अंतहीन क्यों कहा गया है?

उत्तर: सालिम अली के इस सफ़र को इसलिए अंतहीन कहा गया है क्योंकि इससे पहले वाले सफ़रों में सालिम अली जब पक्षियों की खोज में निकलते थे तो वे पक्षियों को देखते ही उनसे जुड़ी दुर्लभ जानकारियाँ लेकर लौट आते थे परंतु इस सफ़र का कोई अंत न होने से सालिम अली लौट न सकेंगे।

प्रश्न 4. मृत्यु की गोद में सोए सालिम अली की तुलना किससे की गई है और क्यों?

उत्तर: मृत्यु की गोद में सोए सालिम अली की तुलना उस वन-पक्षी से की गई है जो जिंदगी का आखिरी गीत गाने के बाद मौत की गोद में जा बसा हो। ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि सालिम अली भी अपनी जिंदगी के सौ वर्ष जीकर मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं। अब वे पक्षियों के बारे में जानकारी एकत्र करने नहीं जा सकेंगे।

प्रश्न 5. सालिम अली की दृष्टि में मनुष्य क्या भूल करते हैं? उन्होंने इसे भूल क्यों कहा?

उत्तर: सालिम अली की दृष्टि में मनुष्य यह भूल करते हैं कि लोग पक्षियों जंगलों-पहाड़ों, झरने-आवशारों आदि को आदमी की निगाह से देखते हैं। उन्होंने इसे भूल इसलिए कहा क्योंकि मनुष्य पक्षियों, नदी-झरनों आदि को इस दृष्टि से देखता है कि इससे उसका कितना स्वार्थ पूरा हो सकता है।

प्रश्न 6. वृंदावन में यमुना का साँवला पानी किन-किन घटनाओं की याद दिलाता है?

उत्तर: वृंदावन में यमुना का साँवला पानी कृष्ण से जुड़ी विभिन्न घटनाओं की याद दिलाता है, जैसे-

  • कृष्ण द्वारा वृंदावन में रासलीला रचाना। चंचल गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाना।
  • माखन भरे बर्तन फोड़ना और दूध-छाली खाना।
  • वाटिका में घने पेड़ों की छाँव में बंशी बजाना और ब्रज की गलियों को संगीतमय कर देना जिसे सुनते ही लोगों के कदम ठहर जाना।

प्रश्न 7. वृंदावन में सुबह-शाम सैलानियों को होने वाली अनुभूति अन्य स्थानों की अनुभूति से किस तरह भिन्न है?

उत्तर: वृंदावन में सुबह-शाम सैलानियों को सुखद अनुभूति होती है। वहाँ सूर्योदय पूर्व जब उत्साहित भीड़ यमुना की सँकरी गलियों से गुजरती है तो लगता है कि अचानक कृष्ण बंशी बजाते हुए कहीं से आ जाएँगे। कुछ ऐसी ही अनुभूति शाम को भी होती है। ऐसी अनुभूति अन्य स्थानों पर नहीं होती है।

प्रश्न 8. पक्षियों के प्रति सालिम अली की दृष्टि अन्य लोगों की दृष्टि में क्या अंतर है? ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर: सालिम अली दूर-दूर तक पक्षियों की खोज में यात्रा करते थे। वे अत्यंत उत्साह से दुर्गम स्थानों पर भी पक्षियों की खोज करते, उनकी सुरक्षा के बारे में सोचते और उनसे जुड़ी दुर्लभ जानकारी हासिल करते थे परंतु अन्य लोग पक्षियों को अपने स्वार्थ और मनोरंजन की दृष्टि से देखते हैं।

प्रश्न 9. ‘बर्ड-वाचर’ किसे कहा गया है और क्यों?

उत्तर: ‘बर्ड-वाचर’ प्रसिद्ध पक्षी-प्रेमी सालिम अली को कहा गया है क्योंकि सालिम अली जीवनभर पक्षियों की खोज करते रहे। और उनकी सुरक्षा के लिए पूरी तरह समर्पित रहे। वे अपने सुख-दुख की चिंता किए बिना आँखों पर दूरबीन लगाए पक्षियों से जुड़ी जानकारी एकत्र करते रहे।

प्रश्न 10. सालिम अली पक्षी-प्रेमी होने के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी भी थे। साँवले सपनों की याद पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सालिम अली पक्षियों से जितना लगाव रखते हुए उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहते थे उतना ही वे प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी चिंतित रहते थे। वे केरल की साइलेंट वैली को बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिले और वैली को बचाने का अनुरोध किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. ‘अब हिमालय और लद्दाख की बरफ़ीली जमीनों पर रहने वाले पक्षियों की वकालत कौन करेगा’? ऐसा लेखक ने क्यों कहा होगा? ‘सावले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सालिम अली की मृत्यु पर लेखक के मस्तिष्क में उनसे जुड़ी हर यादें चलचित्र की भाँति घूम गईं। लेखक ने महसूस किया कि सालिम अली आजीवन पक्षियों की तलाश में पहाड़ जैसे दुर्गम स्थानों पर घूमते रहे। वे आँखों पर दूरबीन लगाए नदी के किनारों पर जंगलों में और पहाड़ जैसे दुर्गम स्थानों पर भी पक्षियों की खोज करते रहे और उनकी सुरक्षा के प्रति प्रयत्नशील रहे। वे पक्षियों को बचाने का उपाय करते रहे। इसके विपरीत आज मनुष्य पक्षियों की उपस्थिति में अपना स्वार्थ देखता है। सालिम अली के पक्षी-प्रेम को याद कर लेखक ने ऐसा कहा होगा।

प्रश्न 2. फ्रीडा कौन थी? उसने लॉरेंस के बारे में क्या-क्या बताया?

उत्तर: फ्रीडा डी.एच.लॉरेंस की पत्नी थीं। लॉरेंस के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया था कि मेरे लिए लॉरेंस के बारे में कुछ कह पाना असंभव-सा है। मुझे लगता है कि मेरे छत पर बैठने वाली गौरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है। वह मुझसे भी ज्यादा जानती है। वह सचमुच ही इतना खुला-खुला और सादा दिल आदमी थे। संभव है कि लॉरेंस मेरी रगों में, मेरी हड्डियों में समाया हो।

प्रश्न 3. ‘साँवले-सपनों की याद’ पाठ के आधार पर बताइए कि सालिम अली को नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप क्यों कहा गया है?

उत्तर: सालिम अली महान पक्षी-प्रेमी थे। इसके अलावा वे प्रकृति से असीम लगाव रखते थे। वे प्रकृति के इतना निकट आ गए थे कि ऐसा लगता था कि उनका जीवन प्रकृतिमय हो गया था। सालिम अली प्रकृति के प्रभाव में आने के कायल नहीं थे। वे प्रकृति को अपने प्रभाव में लाना चाहते थे। पक्षी-प्रेम के कारण वे पक्षियों की खोज करते हुए प्रकृति के और निकट आ गए। नदी-पहाड़, झरने विशाल मैदान और अन्य दुर्गम स्थानों से उनका गहरा नाता जुड़ गया था। जिंदगी में अद्भुत सफलता पाने के बाद भी वे प्रकृति से जुड़े रहे। इस तरह उनका जीवन नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गया था।

प्रश्न 4. ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर सालिम अली के व्यक्तित्व की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: सालिम अली दुबली-पतली काया वाले व्यक्ति थे, जिनकी आयु लगभग एक सौ वर्ष होने को थी। पक्षियों की खोज में की गई लंबी-लंबी यात्राओं की थकान से उनका शरीर कमजोर हो गया था। वे अपनी आँखों पर प्रायः दूरबीन चढ़ाए रखते थे। पक्षियों की खोज के लिए वे दूर-दूर तक तथा दुर्गम स्थानों की यात्राएँ करते थे। उनकी एअर गन से घायल होकर गिरी नीले कंठवाली गौरैया ने उनके जीवन की दिशा बदले दी। वे पक्षी प्रेमी होने के अलावा प्रकृति प्रेमी भी थे। वे प्रकृतिमय जीवन जीते थे और उसकी सुरक्षा के लिए प्रयासरत रहते थे। वे नदी पहाड़-झरनों आदि को प्रकृति की दृष्टि से देखते थे।

प्रश्न 5. ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर बताइए कि सामान्य लोग पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान किस तरह दे सकते हैं?

उत्तर: ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ से ज्ञात होता है कि सालिम अली प्रकृति और उससे जुड़े विभिन्न अंगों-नदी, पहाड़, झरने, आबशारों आदि को प्रकृति की निगाह से देखते थे और उन्हें बचाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। उन्होंने केरल साइलेंट वैली को बचाने का अनुरोध किया। इसी तरह सामान्य लोग भी अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए विभिन्न रूपों में अपना योगदान दे सकते हैं; जैसे-

  • अधिकाधिक पेड़ लगाकर धरती की हरियाली बढ़ाकर।
  • पेड़ों को कटने से बचाकर।
  • प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का प्रयोग न करके।
  • अपने आसपास साफ़-सफ़ाई करके।
  • जल-स्रोतों को दूषित होने से बचाकर।
  • वन्य जीवों तथा पक्षियों की रक्षा करके मनुष्य पर्यावरण की सुरक्षा कर सकता है।

Tum Kab Jaoge Atithi Class 9th Summary

Tum Kab Jaoge Atithi Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे

तुम कब जाओगे, अतिथि’

पाठ के लेखक शरद जोशी है।

बच्चों! पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचय: शरद जोशी

जीवन परिचय: शरद जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में 21 मई 1931 को हुआ। कुछ समय तक के सरकारी नौकरी में रहे, फिर इन्होंने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इन्होंने आरंभ में कुछ कहानियां लिखी, फिर पूरी तरह से व्यंग्य-लेख, व्यंग्य-उपन्यास, व्यंग्य-कॉलम के अतिरिक्त हास्य व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथा और संवाद भी लिखे। हिंदी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने वाले प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक है।

शरद जोशी की मुख्य रचनाएं: परिक्रमा, किसी बहाने, जीप पर सवार इल्लियां, रहा किनारे बैठ, दूसरी सतह, प्रतिदिन।

दो व्यंग्य नाटक है: अंधों का हाथी और एक था गधा।

एक उपन्यास: मैं, मैं, केवल मैं, उर्फ़ कमलमुख B. A.

भाषा: जोशी की भाषा अत्यंत सरल और सहज है। मुहावरों और हास-परिहास का हल्का स्पर्श देकर इन्होंने अपनी रचनाओं को अधिक रोचक बनाया है।

पाठ प्रवेश:

इस पाठ में लेखक कहना चाहता है कि अतिथि हमेशा भगवान् नहीं होते क्योंकि लेखक के घर पर आया हुआ अतिथि चार दिन होने पर भी जाने का नाम नहीं ले रहा है। पाँचवे दिन लेखक अपने मन में अतिथि से कहता है कि यदि पाँचवे दिन भी अतिथि नहीं गया तो शायद लेखक अपनी मर्यादा भूल जाएगा। इस पाठ में लेखक ने अपनी परेशानी को पाठको से साँझा किया है: – ‘तुम कब जाओगे, अतिथि’

पाठ सार: तुम कब जाओगे, अतिथि

लेखक अपने घर में आए अतिथि को अपने मन में संबोधित करते हुए कहता है कि आज अतिथि को लेखक के घर में आए हुए चार दिन हो गए हैं और लेखक के मन में यह प्रश्न बार-बार आ रहा है कि ‘तुम कब जाओगे, अतिथि? लेखक अपने मन में अतिथि को कहता है कि वह जहाँ बैठे बिना संकोच के सिगरेट का धुआँ उड़ा रहा है, उसके ठीक सामने एक कैलेंडर है। लेखक कहता है कि पिछले दो दिनों से वह अतिथि को कलैंडर दिखाकर तारीखें बदल रहा है। ऐसा लेखक ने इसलिए कहा है क्योंकि लेखक अतिथि की सेवा करके थक गया है। पर चौथे दिन भी अतिथि के जाने की कोई संभावना नहीं लग रही थी।

लेखक अपने मन में अतिथि को कहता है कि अब तुम लौट जाओ, अतिथि! तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अर्थात हाईटाइम है। अर्थात यह बिल्कुल सही वक्त है। क्या उसे उसकी मातृभूमि नहीं पुकारती? अर्थात क्या उसे उसके घर की याद नहीं आती। लेखक अपने मन में ही अतिथि से कहता है कि उस दिन जब वह आया था तो लेखक का हृदय ना जाने किसी अनजान डर के (किसी अन्जान डर से )धड़क उठा था। अंदर-ही-अंदर कहीं लेखक का बटुआ काँप गया। उसके बावजूद एक प्यार से भीगी हुई मुस्कराहट के साथ लेखक ने अतिथि को गले लगाया था और मेरी (लेखक) की पत्नी ने अतिथि को सादर नमस्ते की थी। अतिथि को याद होगा कि दो सब्ज़ियों और रायते के अलावा उन्होंने मीठा भी बनाया था। इस सारे उत्साह और लगन के मूल में लेखक को एक उम्मीद थी। कि वह दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार मेहमाननवाजी की छाप अपने हृदय में लेकर तुम चले जाओगे। पर ऐसा नहीं हुआ!

दूसरे दिन भी अतिथि मुस्कान बनाए लेखक के घर में ही बने रहे। लेखक अपने मन  में  ही अतिथि से कहता है कि उन्होंने अपने दुःख को पी लिया और प्रसन्न बने रहे। लेखक ने फिर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि को अतिथि को सिनेमा दिखाया। लेखक के सत्कार का यह आखिरी छोर था, जिससे आगे लेखक कभी किसी के लिए नहीं बढे़। इसके तुरंत बाद लेखक को अनुमान था कि विदाई का वह प्रेम से ओत-प्रोत भीगा हुआ क्षण आ जाना चाहिए था, जब अतिथि विदा होता और लेखक उसे स्टेशन तक छोड़ने जाता। पर अतिथि ने ऐसा नहीं किया। वह लेखक के घर पर ही रहा।

लेखक अपने मन में ही अतिथि से कहता है कि तीसरे दिन की सुबह अतिथि ने लेखक से कहा कि वह धोबी को कपड़े देना चाहता है। लेखक अतिथि से कहता है कि कपड़ों को किसी लॉण्ड्री में दे देते हैं इससे वे जल्दी धुल जाएंगे, लेखक के मन में एक विश्वास पल रहा था कि शायद अतिथि को अब जल्दी जाना है। लॉण्ड्री पर दिए कपडे़ धुलकर आ गए और अतिथि अब भी लेखक के घर पर ही था। लेखक अपने मन ही अतिथि से कहता है कि उसके भारी  भरकम शरीर से सलवटें पड़ी हुई चादर बदली जा चुकी है परन्तु अभी भी अतिथि यहीं है। अतिथि को देखकर फूट पड़नेवाली मुस्कराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब कही गायब हो गई है। ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाई नहीं पड़ते। परिवार, बच्चे, नौकरी, फिल्म, राजनीति, रिश्तेदारी, तबादले, पुराने दोस्त, परिवार-नियोजन, मँहगाई, साहित्य और यहाँ तक कि आँख मार-मारकर लेखक और अतिथि ने पुरानी प्रेमिकाओं का भी जिक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है। ह्रदय की सरलता अब धीरे-धीरे बोरियत में बदल गई है। पर अतिथि जा नहीं रहा।

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लेखक के मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा है-तुम कब जाओगे, अतिथि? कल लेखक की पत्नी ने धीरे से लेखक से पूछा था,”कब तक टिकेंगे ये?” लेखक ने कंधे उचका कर कहा कि वह क्या कह सकता है? लेखक की पत्नी ने अब गुस्से से कहा कि वह अब खिंचड़ी बनाएगी क्योंकि वह खाने में हल्की रहेगी। लेखक ने भी हाँ कह दिया।लेखक अपने मन ही कहता है कि अतिथि के सत्कार करने की उसकी क्षमता अब समाप्त हो रही थी। डिनर से चले थे, खिचड़ी पर आ गए थे। अब भी अगर अतिथि नहीं जाता तो हमें लेखक और उसकी पत्नी को उपवास तक जाना होगा। लेखक चाहता है कि अतिथि अब चला जाए।

लेखक अपने मन ही कहता है कि लेखक जानता है कि अतिथि को लेखक के घर में अच्छा लग रहा है। दूसरों के यहाँ अच्छा ही लगता है। अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहाँ रहते, पर ऐसा नहीं हो सकता। लेखक अपने मन ही अतिथि से कहता है कि अपने खर्राटों से एक और रात गुँजित करने के बाद कल जो किरण अतिथि के बिस्तर पर आएगी वह अतिथि के लेखक के घर में आगमन के बाद पाँचवें सूर्य की परिचित किरण होगी। लेखक अतिथि से उम्मीद करता है कि सूर्य की किरणें जब चूमेगी और अतिथि घर लौटने का सम्मानपूर्ण निर्णय ले लेगा । लेखक अपने मन ही अतिथि से कहता है कि लेखक जानता है कि अतिथि देवता होता है, पर आखिर लेखक भी मनुष्य ही है। लेखक कोई अतिथि की तरह देवता नहीं है। लेखक कहता है कि एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते। देवता दर्शन देकर लौट जाता है। लेखक अतिथि को लौट जाने के लिए कहता है और कहता है कि इसी में अतिथि का देवत्व सुरक्षित रहेगा। लेखक अंत में दुखी हो कर अतिथि से कहता है उफ, तुम कब जाओगे, अतिथि?

Tum Kab Jaoge Atithi Question & Answers

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. ‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ यह प्रश्न लेखक के मन में कब घुमड़ने लगा?

उत्तर: ‘तुम कब जाओगे, अतिथि’— यह प्रश्न लेखक के मन में तब घुमड़ने लगा जब लेखक ने देखा कि अतिथि को आए आज चौथा दिन है पर उसके मुँह से जाने की बात एक बार भी न निकली।

प्रश्न 2. लेखक अपने अतिथि को दिखाकर दो दिनों से कौन-सा कार्य कर रहा था और क्यों?

उत्तर: लेखक अपने अतिथि को दिखाकर दो दिनों से तारीखें बदल रहा था। ऐसा करके वह अतिथि को यह बताना चाह रहा था कि उसे यहाँ रहते हुए चौथा दिन शुरू हो गया है। तारीखें देखकर शायद उसे अपने घर जाने की याद आ जाए।

प्रश्न 3. लेखक ने एस्ट्रानॉट्स का उल्लेख किस संदर्भ में किया है?

उत्तर: लेखक ने एस्ट्रोनॉट्स का उल्लेख घर आए अतिथि के संदर्भ में किया है। लेखक अतिथि को यह बताना चाहता है कि लाखों मील लंबी यात्रा करने बाद एस्ट्रानॉट्स भी चाँद पर इतने समय नहीं रुके थे जितने समय से अतिथि उसके घर रुका हुआ है।

प्रश्न 4. ‘आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान’ कहकर लेखक ने किस ओर संकेत किया है?

उत्तर: ‘आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान’ कहकर अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति की ओर संकेत किया है। लेखक के घर आया अतिथि चौथे दिन भी घर जाने के लिए संकेत नहीं देता है, जबकि उसके इतने दिन रुकने से लेखक के घर का बजट और उसकी आर्थिक स्थिति खराब होने लगी थी।

प्रश्न 5. अतिथि को आया देख लेखक की क्या दशा हुई और क्यों?

उत्तर: अतिथि को असमय आया देख लेखक ने सोचा कि यह अतिथि अब पता नहीं कितने दिन रुकेगा और इसके रुकने पर उसका आर्थिक बजट भी खराब हो जाएगी। इसका अनुमान लगाते ही लेखक का दृश्य किसी अज्ञात आशंका से धड़क उठा।

प्रश्न 6. लेखक ने घर आए अतिथि के साथ ‘अतिथि देवो भवः’ परंपरा का निर्वाह किस तरह किया?

उत्तर: लेखक ने अतिथि को घर आया देखकर स्नेह भीगी मुसकराहट के साथ उसका स्वागत किया और गले मिला। उसने अतिथि को भोजन के स्थान पर उच्च मध्यम वर्ग का डिनर करवाया, जिसमें दो-दो सब्जियों के अलावा रायता और मिष्ठान भी था। इस तरह उसने अतिथि देवो भव परंपरा का निर्वाह किया।

प्रश्न 7. लेखक ने अतिथि का स्वागत किसे आशा में किया?

उत्तर: लेखक ने अतिथि का स्वागत जिसे उत्साह और लगन के साथ किया उसके मूल में यह आशा थी कि अतिथि भी अपना देवत्व बनाए रखेगा और उसकी परेशानियों को ध्यान में रखकर अगले दिन घर चला जाएगा। जाते समय उसके मन पर शानदार मेहमान नवाजी की छाप होगी।

प्रश्न 8. लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अतिथि मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है?

उत्तर: लेखक ने देखा कि दूसरे दिन वापस जाने के बजाय अतिथि तीसरे दिन धोबी को अपने कपडे धुलने के लिए देने की बात कह रहा है। इसका अर्थ यह है कि वह अभी रुकना चाहता है। इस तरह अतिथि ने अपना देवत्व छोड़कर मानव और राक्षस वाले गुण दिखाना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 9. लेखक और अतिथि के बीच सौहार्द अब बोरियत का रूप किस तरह लेने लगा था?

उत्तर: अतिथि जब लेखक के यहाँ चौथे दिन भी रुका रह गया तो लेखक के मन में जैसा उत्साह और रुचि थी वह सब समाप्त हो गया। उसने विविध विषयों पर बातें कर लिया था। अब और बातों का विषय शेष न रह जाने के कारण दोनों के बीच चुप्पी छाई थी। यह चुप्पी अब सौहार्द की जगह बोरियत का रूप लेती जा रही थी।

प्रश्न 10. यदि अतिथि पाँचवें दिन भी रुक गया तो लेखक की क्या दशा हो सकती थी?

उत्तर: यदि अतिथि पाँचवें दिन भी रुक जाता तो लेखक की बची-खुची सहनशक्ति भी जवाब दे जाती। वह आतिथ्य के बोझ को और न सह पाता। डिनर से उतरकर खिचड़ी से होते हुए उपवास करने की स्थिति आ जाती। वह किसी भी स्थिति में अतिथि का सत्कार न कर पाता।

प्रश्न 11. लेखक के अनुसार अतिथि का देवत्व कब समाप्त हो जाता है?

उत्तर: लेखक का मानना है कि अतिथि देवता होता है, पर यह देवत्व उस समय समाप्त हो जाता है जब अतिथि एक दिन से ज्यादा किसी के यहाँ ठहर कर मेहमान नवाजी का आनंद उठाने लगता है। उसका ऐसा करना मेजबान पर बोझ बनने लगता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखक के व्यवहार में आधुनिक सभ्यता की कमियाँ झलकने लगती हैं। इससे आप कितना सहमत हैं, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लेखक पहले तो घर आए अतिथि का गर्मजोशी से स्वागत करता है परंतु दूसरे ही दिन से उसके व्यवहार में बदलाव आने लगता है। यह बदलाव आधुनिक सभ्यता की कमियों का स्पष्ट लक्षण है। मैं इस बात से पूर्णतया सहमत हूँ। लेखक जिस अतिथि को देवतुल्य समझता है वही अतिथि मनुष्य और कुछ अंशों में राक्षस-सा नजर आने लगता है। उसे अपनी सहनशीलता की समाप्ति दिखाई देने लगती है तथा अपना बजट खराब होने लगता है, जो आधुनिक सभ्यता की कमियों का स्पष्ट प्रमाण है।

प्रश्न 2. दूसरे दिन अतिथि के न जाने पर लेखक और उसकी पत्नी का व्यवहार किस तरह बदलने लगता है?

उत्तर: लेखक के घर जब अतिथि आता है तो लेखक मुसकराकर उसे गले लगाता है और उसका स्वागत करता है। उसकी पत्नी भी उसे सादर नमस्ते करती है। उसे भोजन के बजाय उच्च माध्यम स्तरीय डिनर करवाते हैं। उससे तरह-तरह के विषयों पर बातें करते हुए उससे सौहार्द प्रकट करते हैं परंतु तीसरे दिन ही उसकी पत्नी खिचड़ी बनाने की बात कहती है। लेखक भी बातों के विषय की समाप्ति देखकर बोरियत महसूस करने लगता है। अंत में उन्हें अतिथि देवता कम मनुष्य और राक्षस-सा नज़र आने लगता है।

प्रश्न 3. अतिथि रूपी देवता और लेखक रूपी मनुष्य को साथ-साथ रहने में क्या परेशानियाँ दिख रही थीं?

उत्तर: भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता माना गया है जिसका स्वागत करना हर मनुष्य का कर्तव्य होता है। इस देवता और अतिथि को साथ रहने में यह परेशानी है कि देवता दर्शन देकर चले जाते हैं, परंतु आधुनिक अतिथि रूपी देवता मेहमान नवाजी का आनंद लेने के चक्कर में मनुष्य की परेशानी भूल जाते हैं। जिस मनुष्य की आर्थिक स्थिति अच्छी न हो उसके लिए आधुनिक देवता का स्वागत करना और भी कठिन हो जाता है।

प्रश्न 4. ‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ पाठ की प्रासंगिकता आधुनिक संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: ‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ नामक पाठ में बिना पूर्व सूचना के आने वाले उस अतिथि का वर्णन है जो मेहमान नवाजी का आनंद लेने के चक्कर मेजबान की परेशानियों को नज़रअंदाज कर जाता है। अतिथि देवता को नाराज़ न करने के चक्कर में मेजबान हर परेशानी को झेलने के लिए विवश रहता है। वर्तमान समय और इस महँगाई के युग में जब मनुष्य अपनी ही ज़रूरतें पूरी करने में अपने आपको असमर्थ पा रहा है और उसके पास समय और साधन की कमी है तब ऐसे अतिथि का स्वागत सत्कार करना कठिन होता जा रहा है। अतः यह पाठ आधुनिक संदर्भो में पूरी तरह प्रासंगिक है।

प्रश्न 5. लेखक को ऐसा क्यों लगने लगा कि अतिथि सदैवृ देवता ही नहीं होते?

उत्तर: लेखक ने देखा कि उसके यहाँ आने वाले अतिथि उसकी परेशानी को देखकर भी अनदेखा कर रहा है और उस पर बोझ बनता जा रहा है। चार दिन बीत जाने के बाद भी वह अभी जाना नहीं चाहता है जबकि देवता दर्शन देकर लौट जाते हैं। वे इतना दिन नहीं ठहरते। इसके अलावा वे मनुष्य को दुखी नहीं करते तथा उसकी हर परेशानी का ध्यान रखते हैं। अपने । घर आए अतिथि का ऐसा व्यवहार देखकर लेखक को लगने लगता है कि हर अतिथि देवता नहीं होता है।

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Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya 9th Summary

Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’

पाठ के लेखक शमशेर बहादुर सिंह हैं।

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक जीवन परिचयः शमशेर बहादुर सिंह

सन् (1911 – 1993)

Shamsher Bahadur Singh

लेखक परिचयः स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता के प्रमुख कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ और उनकी शिक्षा देहरादून एवं इलाहबाद विश्वविद्यालय से हुई। अनूठे काव्य-बिम्बों का सृजन करने वाले शमशेर केवल असाधारण कवि ही नहीं, एक अनूठे गद्य-लेखक भी है। ‘दोआब’, ‘प्लाट का मोर्चा’, जैसी गद्य रचनाओं के माध्यम से उनके विशिष्ट गद्यकार के रूप को पहचाना जा सकता है।

प्रमुख कृतियांः कुछ कविताएं, कुछ और कवितएं, चूका भी नहीं हूँ  मैं, इतने पास अपने, काल तुझसे होड़ है मेरी (काव्य संग्रह)य कुछ गद्य रचनाएँ, कुछ और गद्य रचनाएँ (गद्य-संग्रह)।

पाठ का सारः किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

प्रस्तुत लेख ‘किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’  हिंदी के प्रसिद्ध् लेखक शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा गया है। इस लेख में लेखक ने बताया है कि पहले उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लिखना शुरू किया था, किंतु बाद में अंग्रेजी-उर्दू को छोड़कर हिंदी में लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी वर्णन किया कि उन्हें अपने जीवन में क्या-क्या कष्ट झेलने पड़े। इसके साथ ही लेखक ने श्री सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन तथा श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के प्रति अपनी श्रद्धा को भी व्यक्त किया है।

लेखक कहते हैं कि वे जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में बस पकड़कर दिल्ली चले आए। दिल्ली आकर वे पेंटिंग सीखने की इच्छा से उकील आर्ट स्कूल पहुँचे। परीक्षा में पास होने के कारण उन्हें बिना फीस के ही वहाँ भर्ती कर लिया गया। वे करोल बाग में रहकर कनाट प्लेस पेंटिंग सीखने जाने लगे।

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रास्ते में आते-जाते वे कभी कविता लिखते और कभी ड्राइंग बनाते थे और अपनी ड्राइंग के तत्व खोजने के लिए वे प्रत्येक आदमी का चेहरा गौर से देखते थे। पैसे की बड़ी तंगी रहती थी। कभी-कभी उनके बड़े भाई तेज बहादुर उनके लिए कुछ रुपये भेज देते थे। वे कुछ साइनबोर्ड पर लिखकर कमा लेते थे। अतः अपनी टीस को व्यक्त करने के लिए वे कविताएँ और उर्दू में गजल के कुछ शेर भी लिखते थे। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी कविताएँ कभी छपेंगी।

उनकी पत्नी टी0बी0 (T.B.) की मरीज थीं और उनका देहांत हो चुका था। अतः वे बहुत दुःखी रहते थे। इस समय महाराष्ट्र के एक पत्रकार उनके साथ रहने लगे। इसी समय एक बार क्लास खत्म होने तथा उनके चले जाने के बाद बच्चन जी स्टूडियो में आए थे और लेखक के न मिलने पर वे लेखक के लिए एक नोट छोड़ गए थे। इसके बाद लेखक ने एक अंग्रेजी का सॉनेट लिखा, किंतु बच्चन जी के पास भेजा नहीं। कुछ समय बाद लेखक देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सीखने लगे। वे दुखी और उदास रहते थे। ऐसे में वह लिखा हुआ सॉनेट उन्होंने बच्चन जी को भेज दिया।

Harivansh Rai Bachchan

देहरादून आने पर बच्चन जी डिस्पेंसरी में आकर उनसे मिले थे। उस दिन मौसम बहुत खराब था और आँधी आ जाने के कारण वे एक गिरते हुए पेड़ के नीचे आते-आते बच गए थे। वे बताते हैं कि बच्चन जी की पत्नी का देहांत हो चुका था। अतः वे भी बहुत दुखी थे। उनकी पत्नी सुख-दुख की युवा संगिनी थीं। वे बात की धनी, विशाल हृदय और निश्चय की पक्की थीं। लेखक बीमार रहने लगे थे, अतः बच्चन जी ने उन्हें इलाहाबाद आकर पढ़ने की सलाह दी और वे उनकी बात मानकर इलाहाबाद आ गए। बच्चन जी ने उन्हें एम0ए0 (M.A.)  में प्रवेश दिला दिया क्योंकि वे चाहते थे कि लेखक काम का आदमी बन जाए क्योंकि स्वयं बच्चन जी ने अंग्रेजी में एम0ए0 (M.A.) फाइनल करने के बाद 10-12 साल तक नौकरी की थी, परंतु लेखक सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे।

वे बताते हैं कि उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदू बोर्डिंग हाउस के कॉमन रूम में एक सीट नि:शुल्क मिल गई। इसके साथ ही पंत जी की कृपा से उन्हें इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम भी मिल गया। अब उन्हें लगा कि गंभीरता से हिंदी में कविता लिखनी चाहिए, परंतु घर में उर्दू का वातावरण था तथा हिंदी में लिखने का अभ्यास छूट चुका था। अतः बच्चन जी उनके हिंदी के पुनर्संस्कार के कारण बने। इस समय तक उनकी कुछ रचनाएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ में छप चुकी थीं। ‘अभ्युदय’  में छपा लेखक का एक ‘सॉनेट’ बच्चन जी को बहुत पसंद आया था। वे बताते हैं कि पंत जी और निराला जी ने उन्हें हिंदी की ओर खींचा। बच्चन जी हिंदी में लेखन-कार्य शुरू कर चुके थे। अतः लेखक को लगा कि अब उन्हें भी हिंदी-लेखन में उतरने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। बच्चन जी ने उन्हें एक स्टैंजा का प्रकार बताया था। इसके बाद उन्होंने एक कविता लिख डाली। उन्हें बच्चन की ‘निशा-निमंत्राण’ वे आकार ने बहुत आकृष्ट किया। लेखक पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहे थे। इसलिए बच्चन जी को बहुत दुख था। वे बच्चन जी के साथ एक बार गोरखपुर कवि-सम्मेलन में भी गए थे।

अब लेखक की हिंदी में कविता लिखने की कोशिश सार्थक हो रही थी। ‘सरस्वती’  में छपी उनकी कविता ने निराला का ध्यान खींचा। लेखक ‘रूपाभ’ कार्यालय में प्रशिक्षण लेने के बाद बनारस के ‘हंस’  कार्यालय की ‘कहानी’  में चले गए।

वे कहते हैं कि निश्चित रूप से बच्चन जी ही उन्हें हिंदी में ले आए। वैसे बाद में बच्चन जी से दूर ही रहे, क्योंकि उन्हें चिट्ठी-पत्री तथा मिलने-जुलने में उतना विश्वास नहीं था। वैसे बच्चन जी उनके बहुत निकट रहे


Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Question Answers

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. वह ऐसी कौन सी बात रही होगी जिसने लेखक को दिल्ली जाने के लिए बाध्य कर दिया?

उत्तर: लेखक जिन दिनों बेरोजगार थे उन दिनों शायद किसी ने उन्हें कटु बातें की होगी जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाए होंगे और दिल्ली चले आए होंगे।

प्रश्न 2. लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस क्यों रहा होगा ?

उत्तर: लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस इसलिए रहा होगा क्योंकि वह भारत के जनता की भाषा नहीं थी। इसलिए भारत के लोग यानी उनके अपने लोग उस भाषा को समझ नहीं पाते होंगे।

प्रश्न 3. अपनी कल्पना से लिखिए कि बच्चन ने लेखक के लिए नोट में क्या लिखा होगा?

उत्तर: दिल्ली के उकील आर्ट स्कूल में बच्चनजी ने लेखक के लिए एक नोट छोड़कर गए थे। उस नोट में शायद उन्होंने लिखा होगा कि तुम इलाहाबाद आ जाओ। लेखन में ही तुम्हारा भविष्य निहित है। संघर्ष करने वाले व्यक्ति ही जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं अतःपरिश्रम से सफलता अवश्य तुम्हारे कदम चूमेगी।

प्रश्न 4. लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के किनदृकिन रूपों को उभारा है?

उत्तर: लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व को अनेक रूपों में उभारा है-

  1. बच्चन का स्वभाव बहुत ही संघर्षशील, परोपकारी और फौलादी संकल्प वाला था।
  2. बच्चनजी समय के पाबन्द होने के साथदृसाथ कलादृप्रतिभा के पारखी थे। उन्होंने लेखक द्वारा लिखे गए एक ही सॉनेट को पढ़कर उनकी कलादृ प्रतिभा को पहचान लिया था।
  3. बच्चनजी अत्यंत ही कोमल एवं सहृदय के मनुष्य थे।
  4. वे हृदय से ही नहीं, कर्म से भी परम सहयोगी थे। उन्होंने न केवल लेखक को इलाहाबाद बुलाया बल्कि लेखक की पढ़ाई का सारा जिम्मा भी अपने ऊपर उठा लिया।

प्रश्न 5. बच्चन के अतिरिक्त लेखक को अन्य किन लोगों का तथा किस प्रकार का सहयोग मिला?

उत्तर: बच्चन के अतिरिक्त लेखक को निम्नलिखित लोगों का सहयोग प्राप्त हुआ-

  1. तेजबहादुर सिंह लेखक के बड़े भाई थे। ये आर्थिक तंगी के समय में उन्हें कुछ रुपये भेजकर उनका सहयोग किया करते थे।
  2. कवि नरेंद्र शर्मा लेखक के मित्र थे। एक दिन वे लेखक से मिलने के लिए बच्चन जी के स्टूडियो में आये। छुट्टी होने कारण वे लेखक से नहीं मिल सके। तब वे उनके नाम पर एक बहुत अच्छा और प्रेरक नोट छोड़ गए। इस नोट ने लेखक को बहुत सी प्रेरणा दी।
  3. शारदाचरण उकील कला शिक्षक थे। इनसे लेखक ने पेंटिंग की शिक्षा प्राप्त की।
  4. हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने लेखक को इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम दिला दिया। उन्होंने लेखक द्वारा लिखी कविताओं में कुछ संशोधन भी किया।
  5. लेखक को देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सिखाने में उसकी ससुराल वालों ने मदद की।

प्रश्न 6. लेखक के हिंदी लेखन में कदम रखने का क्रमानुसार वर्णन कीजिये।

उत्तर: हरिवंशराय बच्चन जी के बुलावे पर लेखक इलाहाबाद आ गया। यहीं उन्होंने हिंदी कविता लिखने का गंभीरता से मन बनाया। इसी समय उनकी कुछ कविताएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थीं। उन्होंने बच्चन जी की ‘निशा निमंत्रण’ के रूप प्रकार पर भी लिखने का प्रयास किया, पर ऐसा लिखना उन्हें कठिन जान पड़ा। उनकी एक कविता को पंत जी ने संशोधित किया। सरस्वती पत्रिका में छपी एक कविता ने निराला का ध्यान खींचा। इसके बाद लेखक ने हिंदी लेखन में नियमित रूप से कदम बढ़ा दिया।

प्रश्न 7. लेखक ने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों को झेला है, उनके बारे में लिखिए।

उत्तर: लेखक ने अपने जीवन में प्रारम्भ से ही अनेक कठिनाइयों को झेला है। वह किसी के व्यंग्यदृबाण का शिकार होकर केवल पाँच-सात रुपए लेकर ही दिल्ली चले गए। वह बिना किसी फीस के पेंटिंग के उकील स्कूल में भर्ती हो गए। वहाँ उन्हें साइन-बोर्ड पेंट करके गुजारा चलाना पड़ा। लेखक की पत्नी का टी.बी. के कारण देहांत हो गया था और वे युवावस्था में ही विधुर हो गए थे। इसलिए उन्हें पत्नी-वियोग का पीड़ा भी झेलना पड़ा था। बाद में एक घटना-चक्र में लेखक अपनी ससुराल देहरादून आ गया। वहाँ वह एक दूकान पर कम्पाउंडरी सिखने लगे थे। वह बच्चन जी के आग्रह पर इलाहाबाद चले गए। वहाँ बच्चन जी के पिता उनके लोकल गार्जियन बने। बच्चन जी ने ही उनकी एम.ए. की पढ़ाई का खर्चा उठाया। बाद में उन्होंने इंडियन प्रेस में अनुवाद का भी काम किया। उन्हें हिन्दू बोर्डिंग हाउस के कामनदृरूम में एक सीट फ्री मिल गयी थी। तब भी वह आर्थिक संघर्ष से जूझ रहे थे।


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