Category: 9th Hindi Kritika

Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary

Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 1 का पाठ 2 पढ़ेंगे

“मेरे संग की औरतें”

पाठ की लेखिका मृदुला गर्ग हैं।

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mere sang ki auratein

लेखिका परिचय: मृदुला गर्ग

मेरे संग की औरतें” मृदुला गर्ग जी का एक संस्मरण हैं।

इस संस्मरण में लेखिका ने अपनी चार पीढ़ी की महिलाओं (परदादी, नानी, माँ और खुद लेखिका) के व्यक्तित्व, उनकी आदतों व उनके विचारों के बारे में विस्तार से बात की है।

Mere Sang Ki Auratein Class 9th Chapter 2 Hindi Kritika

मेरे संग की औरतें पाठ का सारांश

लेखिका की स्मृतियों में उसकी नानी

Mridula Garg

अपने लेख की शुरुआत लेखिका कुछ इस तरह से करती हैं कि उनकी एक नानी थी जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा क्योंकि नानी की मृत्यु मां की शादी से पहले हो गई थी। लेखिका कहती हैं कि इसीलिए उन्होंने कभी अपनी “नानी से कहानियां” तो नहीं सुनी मगर “नानी की कहानियां” पढ़ी जरूर और उन कहानियों का अर्थ उनकी समझ में तब आया, जब वो बड़ी हुई।

लेखिका अपनी नानी के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उनकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और पर्दा करने वाली महिला थी।और उनके पति यानि नानाजी शादी के तुरंत बाद उन्हें (नानीजी) छोड़कर बैरिस्ट्री की पढाई करने कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए थे और जब वो अपनी पढ़ाई पूरी कर घर वापस आए तो, उनका रहन-सहन, खानपान, बोलचाल बिल्कुल विलायती हो गया था।

हालांकि नानी अब भी सीधे-साधे तौर तरीके से ही रहती थी। उन पर नानाजी के विलायती रंग-ढंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और ना ही उन्होंने कभी अपनी इच्छा या पसंद-नापसंद अपने पति को बतायी।

लेखिका आगे कहती हैं कि बेहद कम उम्र में जब नानी को लगा की उनकी मृत्यु निकट हैं तो उन्हें अपनी पन्द्रह वर्षीय इकलौती बेटी यानी लेखिका की मां की शादी की चिंता सताने लगी। इसीलिए उन्होंने पर्दे का लिहाज छोड़ कर नानाजी से उनके दोस्त व स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से मिलने की ख्वाहिश जताई। यह बात सुनकर घर में सब हैरान रह गए कि आखिर पर्दा करने वाली एक महिला, भला उनसे क्या बात करना चाहती हैं।

खैर नानाजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए अपने दोस्त को फौरन बुलवा लिया। नानी ने प्यारे लाल जी से वचन ले लिया कि वो उनकी लड़की (लेखिका की माँ) के लिए वर के रूप में किसी आजादी के सिपाही (स्वतंत्रता सेनानी) को ढूंढ कर उससे उसकी शादी करवा देंगें। उस दिन सब घर वालों को पहली बार पता चला कि नानीजी के मन में भी देश की आजादी का सपना पलता हैं।

बाद में लेखिका को समझ में आया कि असल में नानीजी अपनी जिंदगी में भी खूब आजाद ख्याल रही होंगी। हालाँकि उन्होंने कभी नानाजी की जिंदगी में कोई दखल तो नहीं दिया पर अपनी जिंदगी को भी वो अपने ढंग से, पूरी आजादी के साथ जीती थी। लेखिका कहती हैं कि यही तो असली आजादी हैं।

लेखिका की माँ

लेखिका की मां की शादी एक ऐसे पढ़े-लिखे लड़के से हुई जिसे आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने के अपराध में आईसीएस की परीक्षा में बैठने से रोक दिया और जिसके पास कोई पुश्तैनी जमीन जायजाद भी नहीं थी। और लेखिका की मां, अपनी मां और गांधी जी के सिद्धांतों के चक्कर में सादा जीवन उच्च विचार रखने को मजबूर हो गई।

लेखिका आगे कहती हैं कि उनके नाना पक्के साहब माने जाते थे। वो सिर्फ नाम के हिंदुस्तानी थे। बाकी चेहरे मोहरे, रंग-ढंग, पढ़ाई-लिखाई, रहन-सहन से वो पक्के अंग्रेज ही थे। लेखिका कहती हैं कि मजे की बात तो यह थी कि हमारे देश में आजादी की जंग लड़ने वाले ही अंग्रजों के सबसे बड़े प्रशंसक थे। फिर वो चाहे मेरे पिताजी के घरवाले हो या गांधी नेहरू।

लेखिका की मां खादी की साड़ी पहनती थी जो उन्हें ढंग से पहननी नहीं आती थी।लेखिका कहती हैं कि उन्होंने अपनी मां को आम भारतीय मांओं के जैसा कभी नहीं देखा क्योंकि वह घर परिवार और बच्चों पर कोई खास ध्यान नहीं देती थी। घर में पिताजी, मां की जगह काम कर लिया करते थे।

लेखिका की मां को पुस्तकें पढ़ने और संगीत सुनने का शौक था जो वो बिस्तर में लेटे-लेटे करती थी। हां उनमें दो गुण अवश्य थे। पहला वह कभी झूठ नहीं बोलती थी और दूसरा वह लोगों की गोपनीय बातों को अपने तक ही सीमित रखती थी। इसी कारण उन्हें घर और बाहर दोनों जगह आदर व सम्मान मिलता था।

लेखिका आगे कहती हैं कि उन्हें सब कुछ करने की आजादी थी।उसी आजादी का फायदा उठाकर छह भाई-बहनों में से तीन बहनों और इकलौते भाई ने लेखन कार्य शुरू कर दिया।

लेखिका की परदादी 

लेखिका कहती हैं कि उनकी परदादी को भी लीक से हटकर चलने का बहुत शौक था। जब लेखिका की मां पहली बार गर्भवती हुई तो परदादी ने मंदिर जाकर पहला बच्चा लड़की होने की मन्नत मांगी थी जिसे सुनकर परिवार के सभी लोग हक्के-बक्के रह गए थे। दादी का यह मन्नत मांगने का मुख्य कारण परिवार में सभी बहूओं के पहला बच्चा बेटा ही होता आ रहा था। ईश्वर ने परदादी की मुराद पूरी की और घर में एक के बाद एक पाँच कन्याएं भेज दी।

इसके बाद लेखिका अपनी दादी से संबंधित एक किस्सा सुनाती हैं। लेखिका कहती हैं कि एक बार घर के सभी पुरुष सदस्य एक बारात में गए हुए थे और घर में सभी महिलाएं सजधज कर रतजगा कर रही थी। घर में काफी शोर-शराबा होने के कारण दादी दूसरे कमरे में जाकर सो गई।

तभी एक बदकिस्मत चोर दादी के कमरे में घुस गया।उसके चलने की आहट से दादी की नींद खुल गई। दादी ने चोर को कुँए से एक लोटा पानी लाने को कहा। चोर कुएं से पानी लेकर आया और दादी को दे दिया। दादी ने आधा लोटा पानी खुद पानी पिया और आधा लोटा पानी चोर को पिला दिया और फिर उससे बोली कि आज से हम मां-बेटे हो गए हैं। अब तुम चाहो तो चोरी करो या खेती करो।  दादी की बात का चोर पर ऐसा असर हुआ कि चोर ने चोरी करना छोड़ कर , खेती करनी शुरू कर दी।

15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा था। तब लेखिका बीमारी थी। लेखिका उस समय सिर्फ 9 साल की बच्ची थी। बहुत रोने धोने के बाद भी उसे जश्न में शामिल होने नहीं ले जाया गया। लेखिका और उसके पिताजी के अलावा घर के सभी लोग बाहर जा चुके थे।

बाद में पिताजी ने उसे “ब्रदर्स कारामजोव” नामक उपन्यास लाकर दी । उसके बाद लेखिका उस उपन्यास को पढ़ने में व्यस्त हो गयी थी और उनके पिताजी अपने कमरे में जाकर पढ़ने लगे।

लेखिका कहती हैं कि यह उसकी परदादी की मन्नत का प्रभाव ही रहा होगा, तभी लड़कियों होने के बाबजूद भी उनके व उनकी बहनें के मन में कभी कोई हीन भावना नहीं आई।

लेखिका की बहनें

दादी ने जिस पहली लड़की के लिए मन्नत मांगी थी। वह लेखिका की बड़ी बहन मंजुला भगत थी जिसे घर में “रानी” नाम से बुलाते थे। दूसरे नंबर में खुद लेखिका यानि मृदुला गर्ग थी जिनका घर का नाम उमा था। और तीसरे नंबर की बहन का नाम चित्रा था, जो लेखिका नहीं हैं ।

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लेखिका का परिवार

चौथे नंबर की बहन का नाम रेनू और पांचवें नंबर की बहन का नाम अचला था। पांच बहनों के बाद एक भाई हुआ जिसका नाम राजीव हैं। लेखिका कहती हैं कि उनके भाई राजीव हिंदी में लिखते हैं जबकि समय की मांग के हिसाब से अचला अंग्रेजी में लिखने लगी।

लेखिका आगे कहती हैं कि सभी बहनों ने अपनी शादी अच्छे से निभाई। लेखिका शादी के बाद अपने पति के साथ बिहार के एक छोटे से कस्बे डालमिया नगर में रहने गई। लेखिका ने वहाँ एक अजीब सी बात देखी। परुष और महिलाएं, चाहे वो पति-पत्नी क्यों न हो, अगर वो पिक्चर देखने भी जाते थे तो पिक्चर हाल में अलग-अलग जगह में बैठकर पिक्चर देखते थे।

लेखिका दिल्ली से कॉलेज की नौकरी छोड़कर वहां पहुंची थी और नाटकों में काम करने की शौकीन थी। लेखिका कहती हैं कि उन्होंने वहां के चलन से हार नहीं मानी और साल भर के अंदर ही कुछ शादीशुदा महिलाओं को गैर मर्दों के साथ अपने नाटक में काम करने के लिए मना लिया। अगले 4 साल तक हम महिलाओं ने मिलकर कई सारे नाटकों में काम किया और अकाल राहत कोष के लिए भी काफी पैसा इकट्ठा किया।

इसके बाद लेखिका कर्नाटक चली गई। उस समय तक उनके दो बच्चे हो चुके थे जो स्कूल जाने लायक की उम्र में पहुंच चुके थे। लेखिका कहती है कि वहां कोई बढ़िया स्कूल नहीं था जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सके। इसीलिए लेखिका ने स्वयं एक प्राइमरी स्कूल खोला।

वो कहती हैं कि मेरे बच्चे, दूसरे ऑफिसर और अधिकारियों के बच्चे उस स्कूल में पढ़ने लगे। जिन्हें बाद में दूसरे अच्छे स्कूलों में प्रवेश मिल गया।लेखिका ने स्कूल खोल कर व उसे सफलता पूर्वक चला कर यह साबित कर दिया कि वह किसी से कम नहीं है।

लेखिका के जीवन में ऐसे अनेक अवसर आए जब लेखिका ने अपने आप को साबित किया। उन्होंने अनेक कार्य किये लेकिन उन्हें प्रसिद्धि तो अपने लेखन कला से ही हासिल हुई।

Mere Sang Ki Auratein Chapter 2 Question Answers

मेरे संग की औरतें पाठ के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा भी नहीं फिर भी उनके व्यक्तित्व से वे क्यों प्रभावित थीं?

उत्तर: लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा नहीं था, किंतु उनके बारे में सुना अवश्य था। उसने सुना था कि उसकी नानी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्यारेलाल शर्मा से भेंट की थी। उस भेट में उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि वे अपनी बेटी की शादी किसी क्रांतिकारी से करवाना चाहती हैं, अंग्रेजों के किसी भक्त से नहीं। उनकी इस इच्छा में देश की स्वतंत्रता की पवित्र भावना थी। यह भावना बहुत सच्ची थी। इसमें साहस था। जीवन भर परदे में रहकर भी उन्होंने किसी पर पुरुष से मिलने की हिम्मत की। इससे उनके साहसी व्यक्तित्व और मन में सुलगती स्वतंत्रता की भावना का पता चला। लेखिका इन्हीं गुणों के कारण उनका सम्मान करती है।

प्रश्न 2. लेखिका की नानी की आज़ादी के आंदोलन में किस प्रकार की भागीदारी रही?

उत्तर: लेखिका की नानी ने आज़ादी के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था, पर आज़ादी के आंदोलन में उनका अप्रत्यक्ष योगदान अवश्य था। वे अनपढ़ परंपरागत परदानशीं औरत थीं। उनके मन में आज़ादी के प्रति जुनून था। यद्यपि उनके पति अंग्रेजों के भक्त थे और साहबों के समान रहते थे पर अपनी मृत्यु को निकट देखकर उन्होंने अपने पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा को बुलवाया और स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनकी बेटी का वर वे ही अपने समान ही। किसी स्वतंत्रता के दीवाने लड़के को खोज कर दें। इससे उनकी बेटी का विवाह आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने वाले उस लड़के से हो सका जिसे आई.सी.एस. (I.C.S.) परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। इस तरह उसकी नानी ने आज़ादी के आंदोलन में भागीदारी निभाई।

प्रश्न 3. लेखिका की माँ परंपरा का निर्वाह न करते हुए भी सबके दिलों पर राज करती थी। इस कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की विशेषताएँ लिखिए।

(ख) लेखिका की दादी के घर के माहौल का शब्द-चित्र अंकित कीजिए।

उत्तर: कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की स्थितियाँ और व्यक्तित्व-दोनों असाधारण थे। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम करती थीं। उनकी सोच मौलिक थी। लेखिका के शब्दों में वह खुद अपने तरीके से आज़ादी के जुनून को निभाती थीं। इस विशेषता के कारण घर-भर के लोग उसका आदर करते थे। कोई उनसे घर गृहस्थी के काम नहीं करवाता था। उनका व्यक्तित्व ऐसा प्रभावी था कि ठोस कामों के बारे में उनसे केवल राय ली जाती थी और उस राय को पत्थर की लकीर मानकर निभाया जाता था।

लेखिका की माँ का सारा समय किताबें पढ़ने, साहित्य चर्चा करने और संगीत सुनने में बीतता था। वे कभी बच्चों के साथ लाड़-प्यार भी नहीं करती थीं। उनके मान-सम्मान के दो कारण प्रमुख थे। वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं। वे एक की गोपनीय बात दूसरे से नहीं कहती थीं।

(ख) लेखिका की दादी के घर में विचित्र विरोधों का संगम था। परदादी लीक से परे हटकर थीं। वे चाहती थीं कि उनकी पतोहू को होने वाली पहली संतान कन्या हो। उसने यह मन्नत मानकर जगजाहिर भी कर दी। इससे घर के अन्य सभी लोग हैरान थे। परंतु लेखिका की दादी ने इस इच्छा को स्वीकार करके होने वाली पोती को खिलाने-दुलारने की कल्पनाएँ भी कर डालीं। लेखिका की माँ तो बिलकुल ही विचित्र थीं। वे घर का कोई काम नहीं करती थीं। वे आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहती थीं। उन्हें पुस्तकें पढ़ने, संगीत सुनने और साहित्य चर्चा करने से ही फुर्सत नहीं थी। उनके पति भी क्रांतिकारी थे। वे आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं थे। विचित्र बात यह थी कि लेखिका के दादा अंग्रेजों के बड़े प्रशंसक थे। घर में चलती उन्हीं की थी। किंतु घर की नारियाँ अपने-अपने तरीके से जीने के लिए स्वतंत्र थीं। कोई किसी के विकास में बाधा नहीं बनता था।

प्रश्न 4. आप अपनी कल्पना से लिखिए कि परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत क्यों माँगी?

उत्तर: परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत इसलिए माँगी ताकि वे परंपरा से अलग चलने की जो बात करती थीं, उसे अपने कार्य-व्यवहार द्वारा सबको दर्शा सकें। इसके अलावा उनके मन में लड़का और लड़की में अंतर समझने जैसी कोई बात न रही होगी।

प्रश्न 5. डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की जगह सहजता से किसी को भी सही राह पर लाया जा सकता है-पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: इस पाठ से स्पष्ट है कि मनुष्य के पास सबसे प्रभावी अस्त्र है-अपना दृढ़ विश्वास और सहज व्यवहार। यदि कोई सगा संबंधी गलत राह पर हो तो उसे डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव देने की बजाय सहजता से व्यवहार करना चाहिए। लेखिका की नानी ने भी यही किया। उन्होंने अपने पति की अंग्रेज़ भक्ति का न तो मुखर विरोध किया, न समर्थन किया। वे जीवन भर अपने आदर्शों पर टिकी रहीं। परिणामस्वरूप अवसर आने पर वह मनवांछित कार्य कर सकीं।

लेखिका की माता ने चोर के साथ जो व्यवहार किया, वह तो सहजता का अनोखा उदाहरण है। उसने न तो चोर को पकड़ा, न पिटवाया, बल्कि उससे सेवा ली और अपना पुत्र बना लिया। उसके पकड़े जाने पर उसने उसे उपदेश भी नहीं दिया, न ही चोरी छोड़ने के लिए दबाव डाला। उसने इतना ही कहा-अब तुम्हारी मर्जी चाहे चोरी करो या खेती। उसकी इस सहज भावना से चोर का हृदय परिवर्तित हो गया। उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और खेती को अपना लिया।

प्रश्न 6. ‘शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है’ -इस दिशा में लेखिका के प्रयासों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस दिशा में लेखिका ने अथक प्रयास किए। उसने कर्नाटक के बागलकोट जैसे छोटे से कस्बे में रहते हुए इस दिशा में सोचना शुरू किया। उसने कैथोलिक विशप से प्रार्थना की कि उनका मिशन वहाँ के सीमेंट कारखाने से मदद लेकर वहाँ स्कूल खोल दे, पर वे इसके लिए तैयार न हुए। तब लेखिका ने अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ तीन भाषाएँ सिखाने वाला स्कूल खोला और उसे कर्नाटक सरकार से मान्यता दिलवाई। इस स्कूल के बच्चे बाद में अच्छे स्कूलों में प्रवेश पा गए।

प्रश्न 7. पाठ के आधार पर लिखिए कि जीवन में कैसे इंसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है?

उत्तर: इस पाठ के आधार पर स्पष्ट है कि ऊँची भावना वाले दृढ़ संकल्पी लोगों को श्रद्धा से देखा जाता है। जो लोग सद्भावना से व्यवहार करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर गलत रूढ़ियों को तोड़ डालने की हिम्मत रखते हैं, समाज में उनका खूब आदर-सम्मान होता है।

लेखिका की नानी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने परिवार और समाज से विरोध लेकर भी अपनी पुत्री को किसी क्रांतिकारी से ब्याहने की बात कही। इस कारण वह सबकी पूज्या बन गईं। लेखिका की परदादी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने दो धोतियों से अधिक संचय न करने का संकल्प किया था। उसने परंपरा के विरुद्ध लड़के की बजाय लड़की होने की मन्नत मानी।

लेखिका की माता इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने देश की आज़ादी के लिए कार्य किया। कभी किसी से झूठ नहीं बोला। कभी किसी की गोपनीय बात को दूसरे को नहीं बताया। ये सभी व्यक्तित्व सच्चे थे, लीक से परे थे तथा दृढ़ निश्चयी थे। इस कारण इनका सम्मान हुआ। इन पर श्रद्धा प्रकट की गई।

प्रश्न 8. ‘सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है’ -इस कथन के आधार पर लेखिका की बहन एवं लेखिका के व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर: “सच, अकेलेपन का मजा ही कुछ और है।” इस कथन के आधार पर ज्ञात होता है कि लेखिका और उसकी बहन दोनों ही अपने दृढ़ निश्चय और जिद्दीपन के कारण उक्त कथन को चरितार्थ ही नहीं करती हैं बल्कि उसका आनंद भी उठाती हैं। लेखिका की बहन रेणु तो लेखिका से भी दो कदम आगे थी। वह गरमी में भी उस गाड़ी में नहीं आती थी जिसे उसके पिता ने स्कूल से उसे लाने के लिए लगवा रखा था। एक बहन गाड़ी में आती थी जबकि रेणु पैदल। इसी तरह शहर में एक बार नौ इंच बारिश होने पर शहर में पानी भरने के कारण घरवालों के मना करते रहने पर भी वह लब-लब करते पानी में स्कूल गई और स्कूल बंद देखकर लौट आई।

लेखिका ने बिहार के डालमिया शहर में रूढ़िवादी स्त्री-पुरुषों के बीच जहाँ जागृति पैदा की और उनके साथ नाटक करते हुए सूखा राहत कोष के लिए धन एकत्र किया वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के छोटे से कस्बे में बच्चों के लिए स्कूल खोला और मान्यता दिलवाई, यह काम लेखिका ने अकेले ही शुरू किया था।

पाठ से जुड़े अन्य प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1. लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का क्या कारण मानती है?

उत्तर: लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का कारण यह मानती हैं कि वे अपनी नानी से कहानी नहीं सुन पाईं क्योंकि उनकी माँ की शादी होने से पूर्ण ही नानी की मृत्यु हो चुकी थी। शायद नानी से कहानी न सुन पाने के कारण लेखिका और उसकी बहनों को खुद कहानियाँ कहनी पड़ीं। इससे वे लेखिका बन गईं।

प्रश्न 2. लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे क्या जान पाई थी?

उत्तर: लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे में बस इतना ही जान पाई थी कि उसकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और परदा करने वाली महिला थी। उनके पति उन्हें छोड़कर वकालत की पढ़ाई करने इंग्लैंड चले गए थे। वकालत की डिग्री लेकर लौटने के बाद वे साहबों जैसी जिंदगी व्यतीत करने लगे पर नानी पर इसका कोई अंतर नहीं पड़ा। वे अपनी मरजी से जीती रहीं और अपनी किसी पसंद-नापसंद का इज़हार अपने पति के सामने कभी नहीं किया।

प्रश्न 3. लेखिका की नानी ने स्वतंत्रता सेनानी प्यारे लाल शर्मा से कौन-सी इच्छा प्रकट की? यह इच्छा उन्होंने अपने पति से क्यों नहीं बताई?

उत्तर: लेखिका की नानी ने जब कम उम्र में ही स्वयं को मृत्यु के निकट पाया तो उन्होंने अपने पति के मित्र प्यारे लाल शर्मा को बुलवाया और कहा कि आप मेरी बेटी की शादी अपने जैसे ही किसी आज़ादी के सिपाही से करवा दीजिएगा। उन्होंने यह इच्छा अपने पति को इसलिए नहीं बताई क्योंकि वे जानती थी कि अंग्रेज़ों के भक्त उनके पति उनकी इस इच्छा को पूरा नहीं करेंगे। वे बेटी की शादी आज़ादी के सिपाही से होने को पसंद न करते।।

प्रश्न 4. लेखिका ने लिखा है कि उसकी नानी एकदम मुँहज़ोर हो उठीं। वे कब और क्यों मुँहज़ोर हो उठीं?

उत्तर: लेखिका की नानी उस समय मुँहज़ोर हो उठी थी जब वे कम उम्र में यह महसूस करने लगी कि उनकी मृत्यु निकट है। और उनकी इकलौती पंद्रह वर्षीया बेटी अभी अविवाहित है। उनके मुँहजोर होने का कारण अपने पति का आचार-विचार था। उनके उच्च शिक्षित पति अंग्रेजों के भक्त थे जबकि लेखिका की नानी स्वतंत्रताप्रिय नारी थीं। वे अपनी बेटी का विवाह किसी साहब से नहीं बल्कि आज़ादी के सिपाही से करने की पक्षधर थीं।

प्रश्न 5. लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई क्यों कहा है? ससुराल में उनकी क्या स्थिति थी?

उत्तर: लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई इसलिए कहा है क्योंकि उनमें खूबसूरती, नज़ाकत गैर दुनियादारी, ईमानदारी और निष्पक्षता जैसे गुणों का संगम था। इन गुणों के कारण ससुराल में उनकी स्थिति यह थी कि उनसे कोई ठोस काम करने के लिए कोई नहीं कहता था। हर काम के लिए उनकी ज़बानी राय जरूर माँगी जाती थी और उनकी राय को अकाट्य समझते हुए उस पर अमल भी किया जाता था।

बच्चों!

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Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya 9th Summary

Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’

पाठ के लेखक शमशेर बहादुर सिंह हैं।

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक जीवन परिचयः शमशेर बहादुर सिंह

सन् (1911 – 1993)

Shamsher Bahadur Singh

लेखक परिचयः स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता के प्रमुख कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ और उनकी शिक्षा देहरादून एवं इलाहबाद विश्वविद्यालय से हुई। अनूठे काव्य-बिम्बों का सृजन करने वाले शमशेर केवल असाधारण कवि ही नहीं, एक अनूठे गद्य-लेखक भी है। ‘दोआब’, ‘प्लाट का मोर्चा’, जैसी गद्य रचनाओं के माध्यम से उनके विशिष्ट गद्यकार के रूप को पहचाना जा सकता है।

प्रमुख कृतियांः कुछ कविताएं, कुछ और कवितएं, चूका भी नहीं हूँ  मैं, इतने पास अपने, काल तुझसे होड़ है मेरी (काव्य संग्रह)य कुछ गद्य रचनाएँ, कुछ और गद्य रचनाएँ (गद्य-संग्रह)।

पाठ का सारः किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

प्रस्तुत लेख ‘किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’  हिंदी के प्रसिद्ध् लेखक शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा गया है। इस लेख में लेखक ने बताया है कि पहले उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लिखना शुरू किया था, किंतु बाद में अंग्रेजी-उर्दू को छोड़कर हिंदी में लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी वर्णन किया कि उन्हें अपने जीवन में क्या-क्या कष्ट झेलने पड़े। इसके साथ ही लेखक ने श्री सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन तथा श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के प्रति अपनी श्रद्धा को भी व्यक्त किया है।

लेखक कहते हैं कि वे जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में बस पकड़कर दिल्ली चले आए। दिल्ली आकर वे पेंटिंग सीखने की इच्छा से उकील आर्ट स्कूल पहुँचे। परीक्षा में पास होने के कारण उन्हें बिना फीस के ही वहाँ भर्ती कर लिया गया। वे करोल बाग में रहकर कनाट प्लेस पेंटिंग सीखने जाने लगे।

Watch Video: Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya

रास्ते में आते-जाते वे कभी कविता लिखते और कभी ड्राइंग बनाते थे और अपनी ड्राइंग के तत्व खोजने के लिए वे प्रत्येक आदमी का चेहरा गौर से देखते थे। पैसे की बड़ी तंगी रहती थी। कभी-कभी उनके बड़े भाई तेज बहादुर उनके लिए कुछ रुपये भेज देते थे। वे कुछ साइनबोर्ड पर लिखकर कमा लेते थे। अतः अपनी टीस को व्यक्त करने के लिए वे कविताएँ और उर्दू में गजल के कुछ शेर भी लिखते थे। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी कविताएँ कभी छपेंगी।

उनकी पत्नी टी0बी0 (T.B.) की मरीज थीं और उनका देहांत हो चुका था। अतः वे बहुत दुःखी रहते थे। इस समय महाराष्ट्र के एक पत्रकार उनके साथ रहने लगे। इसी समय एक बार क्लास खत्म होने तथा उनके चले जाने के बाद बच्चन जी स्टूडियो में आए थे और लेखक के न मिलने पर वे लेखक के लिए एक नोट छोड़ गए थे। इसके बाद लेखक ने एक अंग्रेजी का सॉनेट लिखा, किंतु बच्चन जी के पास भेजा नहीं। कुछ समय बाद लेखक देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सीखने लगे। वे दुखी और उदास रहते थे। ऐसे में वह लिखा हुआ सॉनेट उन्होंने बच्चन जी को भेज दिया।

Harivansh Rai Bachchan

देहरादून आने पर बच्चन जी डिस्पेंसरी में आकर उनसे मिले थे। उस दिन मौसम बहुत खराब था और आँधी आ जाने के कारण वे एक गिरते हुए पेड़ के नीचे आते-आते बच गए थे। वे बताते हैं कि बच्चन जी की पत्नी का देहांत हो चुका था। अतः वे भी बहुत दुखी थे। उनकी पत्नी सुख-दुख की युवा संगिनी थीं। वे बात की धनी, विशाल हृदय और निश्चय की पक्की थीं। लेखक बीमार रहने लगे थे, अतः बच्चन जी ने उन्हें इलाहाबाद आकर पढ़ने की सलाह दी और वे उनकी बात मानकर इलाहाबाद आ गए। बच्चन जी ने उन्हें एम0ए0 (M.A.)  में प्रवेश दिला दिया क्योंकि वे चाहते थे कि लेखक काम का आदमी बन जाए क्योंकि स्वयं बच्चन जी ने अंग्रेजी में एम0ए0 (M.A.) फाइनल करने के बाद 10-12 साल तक नौकरी की थी, परंतु लेखक सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे।

वे बताते हैं कि उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदू बोर्डिंग हाउस के कॉमन रूम में एक सीट नि:शुल्क मिल गई। इसके साथ ही पंत जी की कृपा से उन्हें इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम भी मिल गया। अब उन्हें लगा कि गंभीरता से हिंदी में कविता लिखनी चाहिए, परंतु घर में उर्दू का वातावरण था तथा हिंदी में लिखने का अभ्यास छूट चुका था। अतः बच्चन जी उनके हिंदी के पुनर्संस्कार के कारण बने। इस समय तक उनकी कुछ रचनाएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ में छप चुकी थीं। ‘अभ्युदय’  में छपा लेखक का एक ‘सॉनेट’ बच्चन जी को बहुत पसंद आया था। वे बताते हैं कि पंत जी और निराला जी ने उन्हें हिंदी की ओर खींचा। बच्चन जी हिंदी में लेखन-कार्य शुरू कर चुके थे। अतः लेखक को लगा कि अब उन्हें भी हिंदी-लेखन में उतरने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। बच्चन जी ने उन्हें एक स्टैंजा का प्रकार बताया था। इसके बाद उन्होंने एक कविता लिख डाली। उन्हें बच्चन की ‘निशा-निमंत्राण’ वे आकार ने बहुत आकृष्ट किया। लेखक पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहे थे। इसलिए बच्चन जी को बहुत दुख था। वे बच्चन जी के साथ एक बार गोरखपुर कवि-सम्मेलन में भी गए थे।

अब लेखक की हिंदी में कविता लिखने की कोशिश सार्थक हो रही थी। ‘सरस्वती’  में छपी उनकी कविता ने निराला का ध्यान खींचा। लेखक ‘रूपाभ’ कार्यालय में प्रशिक्षण लेने के बाद बनारस के ‘हंस’  कार्यालय की ‘कहानी’  में चले गए।

वे कहते हैं कि निश्चित रूप से बच्चन जी ही उन्हें हिंदी में ले आए। वैसे बाद में बच्चन जी से दूर ही रहे, क्योंकि उन्हें चिट्ठी-पत्री तथा मिलने-जुलने में उतना विश्वास नहीं था। वैसे बच्चन जी उनके बहुत निकट रहे


Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Question Answers

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. वह ऐसी कौन सी बात रही होगी जिसने लेखक को दिल्ली जाने के लिए बाध्य कर दिया?

उत्तर: लेखक जिन दिनों बेरोजगार थे उन दिनों शायद किसी ने उन्हें कटु बातें की होगी जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाए होंगे और दिल्ली चले आए होंगे।

प्रश्न 2. लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस क्यों रहा होगा ?

उत्तर: लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस इसलिए रहा होगा क्योंकि वह भारत के जनता की भाषा नहीं थी। इसलिए भारत के लोग यानी उनके अपने लोग उस भाषा को समझ नहीं पाते होंगे।

प्रश्न 3. अपनी कल्पना से लिखिए कि बच्चन ने लेखक के लिए नोट में क्या लिखा होगा?

उत्तर: दिल्ली के उकील आर्ट स्कूल में बच्चनजी ने लेखक के लिए एक नोट छोड़कर गए थे। उस नोट में शायद उन्होंने लिखा होगा कि तुम इलाहाबाद आ जाओ। लेखन में ही तुम्हारा भविष्य निहित है। संघर्ष करने वाले व्यक्ति ही जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं अतःपरिश्रम से सफलता अवश्य तुम्हारे कदम चूमेगी।

प्रश्न 4. लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के किनदृकिन रूपों को उभारा है?

उत्तर: लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व को अनेक रूपों में उभारा है-

  1. बच्चन का स्वभाव बहुत ही संघर्षशील, परोपकारी और फौलादी संकल्प वाला था।
  2. बच्चनजी समय के पाबन्द होने के साथदृसाथ कलादृप्रतिभा के पारखी थे। उन्होंने लेखक द्वारा लिखे गए एक ही सॉनेट को पढ़कर उनकी कलादृ प्रतिभा को पहचान लिया था।
  3. बच्चनजी अत्यंत ही कोमल एवं सहृदय के मनुष्य थे।
  4. वे हृदय से ही नहीं, कर्म से भी परम सहयोगी थे। उन्होंने न केवल लेखक को इलाहाबाद बुलाया बल्कि लेखक की पढ़ाई का सारा जिम्मा भी अपने ऊपर उठा लिया।

प्रश्न 5. बच्चन के अतिरिक्त लेखक को अन्य किन लोगों का तथा किस प्रकार का सहयोग मिला?

उत्तर: बच्चन के अतिरिक्त लेखक को निम्नलिखित लोगों का सहयोग प्राप्त हुआ-

  1. तेजबहादुर सिंह लेखक के बड़े भाई थे। ये आर्थिक तंगी के समय में उन्हें कुछ रुपये भेजकर उनका सहयोग किया करते थे।
  2. कवि नरेंद्र शर्मा लेखक के मित्र थे। एक दिन वे लेखक से मिलने के लिए बच्चन जी के स्टूडियो में आये। छुट्टी होने कारण वे लेखक से नहीं मिल सके। तब वे उनके नाम पर एक बहुत अच्छा और प्रेरक नोट छोड़ गए। इस नोट ने लेखक को बहुत सी प्रेरणा दी।
  3. शारदाचरण उकील कला शिक्षक थे। इनसे लेखक ने पेंटिंग की शिक्षा प्राप्त की।
  4. हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने लेखक को इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम दिला दिया। उन्होंने लेखक द्वारा लिखी कविताओं में कुछ संशोधन भी किया।
  5. लेखक को देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सिखाने में उसकी ससुराल वालों ने मदद की।

प्रश्न 6. लेखक के हिंदी लेखन में कदम रखने का क्रमानुसार वर्णन कीजिये।

उत्तर: हरिवंशराय बच्चन जी के बुलावे पर लेखक इलाहाबाद आ गया। यहीं उन्होंने हिंदी कविता लिखने का गंभीरता से मन बनाया। इसी समय उनकी कुछ कविताएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थीं। उन्होंने बच्चन जी की ‘निशा निमंत्रण’ के रूप प्रकार पर भी लिखने का प्रयास किया, पर ऐसा लिखना उन्हें कठिन जान पड़ा। उनकी एक कविता को पंत जी ने संशोधित किया। सरस्वती पत्रिका में छपी एक कविता ने निराला का ध्यान खींचा। इसके बाद लेखक ने हिंदी लेखन में नियमित रूप से कदम बढ़ा दिया।

प्रश्न 7. लेखक ने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों को झेला है, उनके बारे में लिखिए।

उत्तर: लेखक ने अपने जीवन में प्रारम्भ से ही अनेक कठिनाइयों को झेला है। वह किसी के व्यंग्यदृबाण का शिकार होकर केवल पाँच-सात रुपए लेकर ही दिल्ली चले गए। वह बिना किसी फीस के पेंटिंग के उकील स्कूल में भर्ती हो गए। वहाँ उन्हें साइन-बोर्ड पेंट करके गुजारा चलाना पड़ा। लेखक की पत्नी का टी.बी. के कारण देहांत हो गया था और वे युवावस्था में ही विधुर हो गए थे। इसलिए उन्हें पत्नी-वियोग का पीड़ा भी झेलना पड़ा था। बाद में एक घटना-चक्र में लेखक अपनी ससुराल देहरादून आ गया। वहाँ वह एक दूकान पर कम्पाउंडरी सिखने लगे थे। वह बच्चन जी के आग्रह पर इलाहाबाद चले गए। वहाँ बच्चन जी के पिता उनके लोकल गार्जियन बने। बच्चन जी ने ही उनकी एम.ए. की पढ़ाई का खर्चा उठाया। बाद में उन्होंने इंडियन प्रेस में अनुवाद का भी काम किया। उन्हें हिन्दू बोर्डिंग हाउस के कामनदृरूम में एक सीट फ्री मिल गयी थी। तब भी वह आर्थिक संघर्ष से जूझ रहे थे।


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धन्यवाद!

Is Jal Pralay Mein Class 9th Summary

Is Jal Pralay Mein Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 11वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

‘इस जल प्रलय में’

Is Jal Pralay Mein Chapter 1

पाठ के लेखक फणीश्वर नाथ हैं।

…………………………

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक फणीश्वरनाथ रेणु

Fanishwar Nath Renu

जन्मः फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को औराडी हिंगन्ना, जिला पूर्णियां, बिहार में हुआ। आप आजीवन शोषण और दमन के विरूद्ध संधर्षरत रहे। इसी प्रसंग में सोशलिस्ट पार्टी से जा जुड़े व राजनीति में सक्रिय भागीदारी की। 1942 के भारत-छोड़ो आंन्दोलन में सक्रिय भाग लिया।

“इस जल प्रलय में”  एक रिपोर्ताज है जिसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जी हैं। इस रिपोर्ताज में उन्होंने सन 1975 में पटना में आई भयंकर बाढ़ का आंखों देखा हाल बयान किया है।

रिपोर्ताज की शुरुवात लेखक ने कुछ इस तरह से की हैं।

सावन और भादो (जुलाई-अगस्त माह) के महीने में जब पश्चिम दिशा, पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा में बहने वाली कोसी, पनार, महानंदा और गंगा नदी में बाढ़ आती है तो वहाँ के लोग व जानवर लेखक के गांव व उसके आसपास के क्षेत्रों में शरण लेने आते है। क्योंकि लेखक का गांव जिस क्षेत्र में पड़ता है। वहाँ की जमीन विशाल और परती है।

परती क्षेत्र में जन्म लेने के कारण लेखक को तैरना भी नहीं आता था। क्योंकि इस तरह के क्षेत्रों में पानी की मात्रा कम होती हैं। (परती, वह भूमि होती हैं जो एकदम बंजर नहीं होती है। मगर इस तरह की जमीन को एक साल खेती करने के बाद दो-तीन साल के लिए खाली छोड़ दिया जाता है ताकि मिट्टी की उर्वरकता बनी रही।)

लेखक कहते हैं कि वो 10 वर्ष की उम्र से ही बाढ़ पीडि़तों के लिए स्वयंसेवक या रिलीफवर्कर के रूप में कार्य करते आ रहे हैं और लेखक ने दसवीं क्लास में बाढ़ पर एक लेख लिखकर पहला पुरस्कार भी हासिल किया था। इसके अलावा प्रतिष्ठित “धर्मयुग मैगजीन” के “कथा दशक कालम” के अंतर्गत बाढ़ से संबंधित उनकी एक कहानी भी छपी थी।

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उन्होंने बाढ़ पर 1947 में ‘‘जय गंगा”, 1948 में ‘‘डायन कोसी”, 1948 में ‘‘हड्डियों का पुल” रिपोर्ताज लिखे। इसके अलावा उन्होंने अपने कई उपन्यासों में भी बाढ़ की विनाश लीलाओं के बारे में लिखा हैं।

लेखक जब अपने गांव में रहते थे तो उन्होंने बाढ़ के बारे में सुना जरूर था मगर उसे कभी झेला नहीं था। लेकिन सन 1967 में पटना शहर में आयी बाढ़ की विभीषिका को उन्होंने पहली बार खुद अपनी आँखों से देखा और झेला भी। जब 18 घंटे तक लगातार जोरदार बारिश हुई और पुनपुन नदी का पानी राजेंद्रनगर, कंकड़बाग और अन्य निचले हिस्से में घुस आया था।

इसीलिए इस बार जब बाढ़ का पानी शहर में आने लगा और पटना का पश्चमी भाग छाती भर पानी में डूबने लगा तो, लेखक अपने घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कंपोज की गोलियां जमा कर बाढ़ के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

अगली सुबह लेखक को पता चला कि राजभवन और मुख्यमंत्री निवास तक बाढ़ का पानी आ चुका हैं और दोपहर में उन्हें किसी ने बंगला भाषा में बताया कि गोलघर तक बाढ़ आ चुकी हैं।और शाम 5ः00 बजे तक काॅफी हाउस भी बाढ़ के पानी में डूब चुका था जिसकी खबर लेखक को एक रिक्शेवाले ने दी। जब लेखक काॅफी हाउस जाने के लिए अपने एक कवि मित्र के साथ घर से निकले थे। ये कवि मित्र लेखक की उटपटांग बातों से कभी बोर नहीं होते थे।

लोग बाढ़ देखने के लिए रिक्शे, तांगे, टमटम, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि वाहनों से जा रहे थे। रास्ते में बाढ़ देखने जाने और आने वाले लोग सिर्फ बाढ़ से संबंधित बातों ही कर रहे थे। तभी लेखक कॉफी हाउस पहुंच गए, जो बंद कर दिया गया था।

लेखक ने सड़क किनारे आये पानी को देखकर अपने कवि मित्र को बताया कि ‘‘मृत्यु का तरल दूत” यानी बाढ़ का पानी यहां तक आ पहुंचा है। अब हम आगे नहीं जाएंगे। लेखक डर गए और रिक्शे से गांधी मैदान की ओर चल पड़े।

लेखक कहते हैं कि गांधी मैदान में दशहरा के दिन “राम रथ” की प्रतीक्षा में जितने लोग इंतजार में खड़े रहते हैं। उतने ही आज वहां बाढ़ देखने के लिए भी इकट्ठे हुए थे।

शाम को 7:30 बजे पटना के आकाशवाणी केंद्र ने घोषणा की, पानी आकाशवाणी के स्टूडियो की सीढि़यों तक पहुंच गया है। हालाँकि पान की दुकानों पर खड़े होकर निश्चिंत होकर, हंस बोलकर समाचार सुन रहे थे। और कुछ दुकानदार अपना सामान टम्पो, टमटम आदि में लाद रहे थे। परंतु लेखक और उनके मित्र के चेहरे पर डर और उदासी का भाव था।

लेखक अब राजेंद्र नगर चैराहे पहुंचे। जहां एक मैगजीन कॉर्नर पर पहले के जैसे ही पत्र-पत्रिकाएं बिक रही थी। वहां से लेखक ने कुछ पत्रिकाएं खरीदी और अपने कवि मित्र से विदा लेकर अपने घर आ गए।

घर पहुंचने पर उन्हें जनसंपर्क विभाग की गाड़ी के लाउडस्पीकर पर बाढ़ से संबंधित चेतावनी सुनाई दे रही थी जिसमें सबको सावधान रहने के लिए कहा जा रहा था । सारा शहर जाग रहा था। देर रात तक जागने के बाद लेखक सोना चाहते थे परन्तु उन्हें नींद नहीं आ रही थी। तभी उनके दिमाग में कुछ पुरानी यादें / घटनाएँ ताजा हो गई।

सबसे पहले उन्हें सन 1947 में मनिहारी जिले में आयी बाढ़ याद आई। जब वो अपने गुरुजी (स्व. सतीनाथ भादुड़ी जी) के साथ नाव से गंगा नदी में आयी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में पकाही धाव की दवा (पानी में लगातार पैर रहने से पकने को पकाही धाव कहते हैं), केरोसिन तेल, दियासलाई आदि लेकर सहायता करने पहुंचे थे।

इसके बाद सन् 1949 में महानंदा नदी में आयी बाढ़ ने भी कहर बरपाया था। लेखक एक डाक्टर साहब के साथ ‘‘वापसी थाना” के एक गांव से बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप ले जा रहे थे। तभी एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ गया। कुत्ते को देख डाक्टर साहब डर गये। बाद में कुत्ता व नौजवान दोनों नाव से उतर गये।

लेखक आगे कहते हैं कि वो परमान नदी की बाढ़ में फंसे मुसहरों की बस्ती (पत्तों से दौने बनाने वाले लोग) में भी राहत बांटने पहुंचे। जो कई दिनों से मछली और चूहे भून कर खा रहे थे। जब वो अपने साथियों के साथ उस बस्ती पर पहुंचे तो देखा कि वहां एक ऊंचे मचान पर “बलवाही” नाच हो रहा था। और एक काला सा आदमी लाल साड़ी में दुल्हन की एक्टिंग कर लोगों को हंसा रहा था।

लेखक मुसहरों की बस्ती में राहत सामग्री बाँट कर वापस आ रहे थे, तो उन्हें अपने परम मित्र भोला शास्त्री जी की बहुत याद आई।

लेखक को यहां पर दो और घटनाएं भी याद गई।

पहली घटना 1937 की हैं। जब सिमरवनी-शकरपुर में बाढ़ के समय नाव को लेकर लड़ाई हो गई थी। लेखक उस समय स्काउट बॉय थे। गांव में नाव नहीं थी। इसलिए लोग केले के पेड़ से नाव (भेला) बनाकर काम चला रहे थे और जमींदार के लड़के नाव पर हारमोनियम, तबला लेकर जलविहार करने में मस्त थे। इससे नाराज गांव के नौजवानों ने मिलकर जमीदार के बेटों की नाव छीन ली और उनके साथ थोड़ी मारपीट भी की।

और दूसरी घटना लेखक को तब की याद आ रही है जब सन 1967 में पुनपुन नदी का पानी राजेंद्र नगर में घुस आया। और एक नाव पर कुछ नौजवान लड़के-लड़कियां की टोली स्टोव, केतली, बिस्कुट लेकर किसी फिल्मी सीन की तरह, कश्मीर का आनंद लेने के लिए निकल पड़े।

उनके ट्रांजिस्टर में “हवा में उड़ता जाए” गाना बज रहा था। जैसे ही उनकी नाव गोलंबर पर पहुंची तो ब्लॉक की छत पर खड़े लड़कों ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया और वो शर्मिंदा होकर वहां से भाग गए।

इसके बाद लेखक अपनी पुरानी यादों से बाहर वर्तमान समय में आ चुके हैं और इस समय रात के 2:30 बजे रहे हैं। पर बाढ़ का पानी अभी तक शहर में नहीं पहुंचा हैं। लेखक को लगा कि शायद इंजीनियरों ने तटबंध ठीक कर दिया हो।जिस वजह से पानी शहर तक नहीं पहुंचा हैं।

इसके थोड़ी देर बाद लेखक को नींद आ गई। सुबह 5:30 बजे जब लोगों ने उन्हें जगाया तो लेखक ने देखा कि सभी जागे हुए थे और पानी पूरे मोहल्ले में फैल चुका था। चारों ओर चीख-पुकार मची हुई थी।

हर जगह पानी की लहरों नृत्य करते हुई दिखाई दे रही थी। यानि चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। लेखक कहते हैं कि मैं बाढ़ के दृश्य तो बचपन से देखता आ रहा हूं। लेकिन इस बार के जैसे बाढ़ मैंने पहले कभी नहीं देखी।लेखक कहते हैं कि इस वक्त ना मेरे पास मूवी कैमरा है, ना टेप रिकॉर्डर और ना मेरे पास कलम है। अच्छा है कुछ भी नहीं है मेरे पास।


Is Jal Pralay Mein Chapter Question Answer

इस जल प्रलय में पाठ के अभ्यास के प्रश्नः

प्रश्न-1: बाढ़ की खबर सुनकर लोग किस तरह की तैयारी करने लगे?

उत्तर – बाढ़ की खबर से सारे शहर में आतंक मचा हुआ था। लोग अपने सामान को नीचली मंजिल से ऊपरी मंजिल में ले जा रहे थे। सारे दुकानदार अपना सामान रिक्शा, टमटम, ट्रक और टेम्पो पर लादकर उसे सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे थें। खरीद-बिक्री बंद हो चुकी थी। लोग घरों में खाने का सामान, दियासलाई, मोमबत्ती, दवाईयाँ, किरोसीन आदि का प्रबन्ध करने में लगे हुए थे।

प्रश्न-2: बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने के लिए लेखक क्यों उत्सुक था ?

उत्तर- लेखक ने पहले बाढ़ के बारे में सुना जरूर था पर कभी देखा नही था। उसने अपनी कई रचनाओ में बाढ़ की विनाशलीला का उल्लेख किया था। वह स्वयं अपनी आँखों से बाढ़ के पानी को शहर में घुसते और उसकी विनाशलीला के बारे में जानने को उत्सुक था।

प्रश्न-3: “मृत्यु का तरल दूत” किसे कहा गया है और क्यों?

उत्तर- बाढ़ के लगातार बढ़ते जल को श्मृत्यु का तरल दूतश् कहा गया है। बाढ़ के इस आगे बढ़ते हुए जल ने न जाने कितने प्राणियों को उजाड़ दिया था, बहा दिया था और बेघर करके मौत की नींद सुला दिया था। इस तरल जल के कारण लोगों को मरना पड़ा, इसलिए इसे मृत्यु का तरल दूत कहना बिल्कुल सही है।

प्रश्न-4: खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक क्यों बढ़ गई थी?

उत्तर- खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक बढ़ गई थी क्योंकि लोग बाढ़ को देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में  इकट्ठे हो गए थे। वे बाढ़ से भयभीत नहीं थे, बल्कि हंसी-खुशी और कौतुहल से युक्त थे। ऐसे समय में पान उनके लिए समय गुजारने का सबसे अच्छा साधन था।

प्रश्न-5: जब लेखक को यह अहसास हुआ की उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उसने क्या-क्या प्रबंध किए?

उत्तर- जब लेखक को अहसास हुआ की उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उन्होंने आवश्यक ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कम्पोज की गोलियाँ इकट्ठी कर लीं ताकि बाढ़ से घिर जाने पर कुछ दिनों तक गुजारा चल सकें। उन्होंने बाढ़ आने छत पर चले जाने का भी प्रबंध सुनिश्चित कर लिया।

प्रश्न-6: बाढ़ पीडि़त क्षेत्र में कौन-कौन सी बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है?

उत्तर – बाढ़ के बाद हैजा, मलेरिया, टाइफाइड आदि बीमारियों के फैलने की संभावना रहती है क्योंकि बाढ़ के उतरे पानी में मच्छर अत्यधिक मात्रा में पनपते हैं जिसके कारण मलेरिया जैसी बीमारी हो जाती है। पानी की कमी से लोगो को गंदा पानी पीना पड़ता है जो हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों को न्यौता देता है।

तो बच्चों!

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