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Savle Sapno Ki Yaad Class 9th Summary

Savle Sapno Ki Yaad Class 9th Summary, Explanation & Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे

“सांवले सपनों की याद”

पाठ के लेखक जाबिर हुसैन हैं।

बच्चों! पाठ के सार को समझने से पहले लेखक का जीवन परिचय जानते हैं।

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लेखक परिचय: जाबिर हुसैन

लेखक परिचय: जाबिर हुसैन का जन्म सन् 1945 में गॉंव नौनहीं राजगीर, जिला नालंदा, बिहार में हुआ| वे अंग्रेजी भाषा व साहित्य के प्राध्यापक रहें। सक्रिय राजनीति में भाग लेते हुए सन् 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और मंत्री बने सन् 1995 से बिहार विधानसभा परिषद् के सभापति हैं।

पाठ का सारांश

यह एक संस्मरण हैं जो लेखक जाबिर हुसैन ने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली की याद में लिखा हैं। लेखक को सालिम अली की मृत्यु से बहुत गहरा आघात पहुंचा। इसीलिए यह संस्मरण लेखक ने सालिम अली की मृत्यु के तुरंत बाद लिखा।

दरअसल “सांवले सपनों की याद” में सपनों के साथ “सांवला” शब्द दुख की अभिव्यक्ति के लिए लगाया गया है। क्योंकि ये वो तमाम सपने थे जो सालिम अली हर रोज पक्षियों को लेकर बुनते थे। और आज उनकी मौत के साथ वो सारे सपने भी दफन होने जा रहे हैं।

लेखक कहते हैं कि उनकी शव यात्रा में यूं तो हजारों लोग जा रहे थे। लेकिन उस भीड़ में सालिम अली सबसे आगे चल रहे थे । ऐसा लग रहा था मानो वो किसी सैलानी (धूमने फिरने वाले लोग) की तरह एक अंतहीन यात्रा की ओर चल पड़े हों। यह उनका आखिरी सफर था। और उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई पक्षी अपने जीवन का आखिरी गीत गाकर अंतिम सफर पर निकल पड़ा हैं।

अब कोई भी व्यक्ति अपने दिल की धड़कन दे कर भी, उस पक्षी को कभी वापस नहीं ला सकता हैं। क्योंकि मृत व्यक्ति कभी वापस नहीं आ सकता। भले आप कितनी कोशिश कर लें । लेकिन उनकी यादें हमेशा लोगों को कभी हंसाती हैं तो कभी रुलाती हैं और कभी-कभी दुख भी पहुंचाती है। यही दुख पहुंचाने वाली यादों को यहां पर “सांवले सपने” कहा गया है।

सालिम अली हमेशा कहा करते थे कि प्रकृति और पक्षियों को मनुष्य की नजर से देखना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। आगे लेखक कहते हैं कि पक्षियों का नाम सुनते ही सालिम अली का नाम अपने आप जुबान पर या दिमाग में आ जाता हैं। यह ठीक ऐसे ही है जैसे वृन्दावन का नाम सुनकर कृष्ण की याद खुद-ब-खुद हो आती है।

वृंदावन में कब कृष्ण ने गोपियों की मटकी तोड़ कर माखन खाया होगा या कब गोपियों के संग रास रचाया होगा या अपनी मधुर मुरली की धुन से ग्वाल बालों को मोहित किया होगा। यह किसी ने नहीं देखा मगर आज भी वृंदावन का नाम आते ही कृष्ण का ध्यान खुद-ब-खुद हो आता है।

और आज भी यमुना के उस काले पानी को देखकर ऐसा लगता है मानो अभी–अभी भगवान श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हुए कही से आयेंगे और सारे वातावरण में बांसुरी की मधुर तान बिखेर देंगे। सच में वृंदावन और कृष्ण एक दूसरे के पूरक बन गये हैं।

उसके बाद लेखक सालीम अली के जीवन के बारे में बताते हुए कहते हैं कि सलीम अली दुबले पतले मरियल से व्यक्ति थे। सालिम अली ने बहुत अधिक यात्रायें की जिससे उनका शरीर थक चुका था। यात्राओं के कारण उनका शरीर दुर्बल भी हो गया था।

लेकिन पक्षियों को खोजने व उनके बारे में जानने के लिए दूरबीन हमेशा उनकी आँखों पर या गरदन में पड़ी ही रहती थी और उनकी आँखें हमेशा दूर–दूर तक फैले आकाश में पक्षियों को ही ढूँढ़ती रहती थी। उन्हें प्रकृति में एक हँसता–खेलता हुआ अद्भुत संसार दिखाई देता था।

उन्हें कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो गई थी और यही रोग उनकी मृत्यु का कारण बना। 100 वर्ष की आयु पूरा करने से कुछ ही समय पहले उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी तहमीना उनका बहुत ध्यान रखती थी। तहमीना उनकी सहपाठी भी रह चुकी थी।

सालिम अली को “बर्ड वाचर” के नाम से जाना जाता है। सलीम अली के “बर्ड वाचर” बनने के पीछे एक कहानी छुपी हुई है। दरअसल बचपन में उनके मामा ने उन्हें उपहार स्वरूप एक ईयर पिस्टल ला कर दी। एक दिन हंसी खेल में उन्होंने अपने घर की छत में बैठी एक गौरैया को उस एयर गन से निशाना बनाया जिससे गौरैया घायल होकर नीचे गिर पड़ी

घायल गौरैया को देखकर सालिम अली को बहुत दुख हुआ। उसके बाद उन्होंने गौरैया की खूब देखभाल की।  नीले पंखों वाली उस गौरैया ने उनके जीवन को ही बदल दिया और वो बर्ड वाचर बन गये। इस घटना का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा “फॉल आँफ ए स्पैरो” में भी किया है।

लेखक को सालिम अली को देखकर अंग्रेजी उपन्यासकार लॉरेंस की याद आ जाती है। क्योंकि लॉरेंस भी प्रकृति प्रेमी थे। जब लॉरेंस की मृत्यु हुई, तब लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा से पत्रकारों ने पूछा कि लॉरेंस के बारे में कुछ बताइए।

तब फ्रीडा ने उत्तर दिया कि “मुझसे ज्यादा लॉरेंस के बारे में हमारे घर पर बैठी गौरैया जानती है। वो प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें छत पर बैठी गौरेया व प्रकृति से ही अपना साहित्य लिखने की प्रेरणा मिलती थी।

लॉरेंस हमेशा कहते थे कि मनुष्य उखड़े हुए पेड़ की तरह है जिसकी शाखाएं हवा में लटक रही हैं। यहां पर लॉरेंस यह कहना चाहते थे कि हमें प्रकृति से जुड़े रहना चाहिए और प्रकृति व पशु-पक्षियों को बचाने के प्रयास करते रहना चाहिए।

लेखक आगे कहते हैं कि सलीम अली पक्षी जगत में एक सागर की तरह थे, न कि टापू की तरह क्योंकि टापू की अपनी सीमाएं होती हैं और सागर असीमित होता है।

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सालिम अली “केरल की साइलेंट वैली” को रेगिस्तानी तूफ़ान से बचाना चाहते थे। और वो इस सिलसिले में उस समय के प्रधानमंत्राी चौधरी चरण सिंह से मिले भी थे। उन्होंने चौधरी चरण सिंह जी से कहा कि साइलेंट वैली को रेगिस्तानी तूफ़ान से बचाना बहुत जरूरी है। वरना साइलेंट वैली उजड़ जाएगी । हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगी।

तूफ़ान के बाद पक्षी उस तरफ रुख नहीं करेंगे और जानवर भी वहां से पलायन कर जाएंगे।और वहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी खत्म हो जायेगा। इसीलिए साइलेंट वैली को बचाना जरूरी है। चूंकि चौधरी चरण सिंह गाँव में जन्मे हुए थे और गाँव की मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे। इसीलिए यह बात सुनकर चौधरी चरण सिंह की आंखों में आंसू आ गए।

लेखक कहते हैं कि आज पक्षी प्रेमी सालिम अली जिन्दा नहीं हैं, तो अब इन पक्षियों की चिंता कौन करेगा। सभी पक्षी प्रेमियों और अन्य लोगों को भी यकीन नहीं हो रहा है कि अब सालिम अली हमारे बीच नहीं रहे।

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया?

उत्तर: एक बार बचपन में सालिम अली की एयरगन से एक गौरैया घायल होकर गिर पड़ी। इस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया। वे गौरैया की देखभाल, सुरक्षा और खोजबीन में जुट गए। उसके बाद उनकी रुचि पूरे पक्षी-संसार की ओर मुड़ गई। वे पक्षी-प्रेमी बन गए।

प्रश्न 2. सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने पर्यावरण से संबंधित किन संभावित खतरों का चित्र खींचा होगा कि जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं?

उत्तर: सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के सामने रेगिस्तानी हवा के गरम झोकों और उसके दुष्प्रभावों का उल्लेख किया। यदि इस हवा से केरल की साइलेंट वैली को न बचाया गया तो उसके नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। प्रकृति के प्रति ऐसा प्रेम और चिंता देख उनकी आँखें नम हो गईं।

प्रश्न 3. लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा ने ऐसा क्यों कहा होगा कि ‘‘मेरी छत पर बैठने वाली गौरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है?”

उत्तर: लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा जानती थी कि लॉरेंस को गौरैया से बहुत प्रेम था। वे अपना काफी समय गौरैया के साथ बिताते थे। गौरैया भी उनके साथ अंतरंग साथी जैसा व्यवहार करती थी। उनके इसी पक्षी-प्रेम को उद्घाटित करने के लिए उन्होंने यह वाक्य कहा।

प्रश्न 4. आशय स्पष्ट कीजिए-

() वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गए थे।

() कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!

() सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे।

उत्तर:

() लॉरेंस बनावट से दूर रहकर प्राकृतिक जीवन जीते थे। वे प्रकृति से प्रेम करते हुए उसकी रक्षा के लिए चिंतित रहते थे। इसी तरह सालिम अली ने भी प्रकृति की सुरक्षा, देखभाल के लिए प्रयास करते हुए सीधा एवं सरल जीवन जीते थे।

() मृत्यु ऐसा सत्य है जिसके प्रभाव स्वरूप मनुष्य सांसारिकता से दूर होकर चिर निद्रा और विश्राम प्राप्त कर लेता है। उसका हँसना-गाना, चलना-फिरना सब बंद हो जाता है। मौत की गोद में विश्राम कर रहे सालिम अली की भी यही स्थिति थी। अब उन्हें किसी तरह से पहले जैसी अवस्था में नहीं लाया जा सकता था।

() टापू समुद्र में उभरा हुआ छोटा भू-भाग होता है जबकि सागर अत्यंत विशाल और विस्तृत होता है। सालिम अली भी प्रकृति और पक्षियों के बारे में थोड़ी-सी जानकारी से संतुष्ट होने वाले नहीं थे। वे इनके बारे में असीमित ज्ञान प्राप्त करके अथाह सागर-सा बन जाना चाहते थे।

प्रश्न 5. इस पाठ के आधार पर लेखक की भाषा-शैली की चार विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: ‘साँवले सपनों की याद’ नामक पाठ की भाषा-शैली संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मिश्रित शब्दावली का प्रयोग

इस पाठ में उर्दू, तद्भव और संस्कृत शब्दों का सम्मिश्रण है। लेखक ने उर्दू शब्दों का अधिक प्रयोग किया है। उदाहरणतया

जिंदगी, परिंदा, खूबसूरत, हुजूम, ख़ामोश, सैलानी, सफ़र, तमाम, आखिरी, माहौल, खुद। संस्कृत शब्दों का प्रयोग भी प्रचुरता से हुआ है। जैसे संभव, अंतहीन, पक्षी, वर्ष, इतिहास, वाटिका, विश्राम, संगीतमय, प्रतिरूप।

जाबिर हुसैन की शब्दावली गंगा-जमुनी है। उन्होंने संस्कृत-उर्दू का इस तरह प्रयोग किया है कि वे सगी बहने लगती हैं। जैसे- अंतहीन सफर, प्रकृति की नज़र, दुनिया संगीतमय, जिंदगी को प्रतिरूप। इन प्रयोगों में एक शब्द संस्कृत का, तो दूसरा उर्दू का है।

2. जटिल वाक्यों का प्रयोग

जाबिर हुसैन की वाक्य-रचना बंकिम और जटिल है। वे सरल-सीधे वाक्यों का प्रयोग नहीं करते। कलात्मकता उनके हर वाक्य में है। उदाहरणतया
‘सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ अग्रसर है।’

पता नहीं, इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और शोख गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाया था।

3. अलंकारों का प्रयोग

जाबिर हुसैन अलंकारों की भाषा में लिखते हैं। उपमा, रूपक, उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरणतया

  • अब तो वो उस वन-पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं। (उपमा)
  • सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाय अथाह सागर बनकर उभरे थे।
  • रोमांच का सोता फूटता महसूस कर सकता है? (रूपक) ।

4. भावानुरूप भाषा

ज़ाबिर हुसैन भाव के अनुरूप शब्दों और वाक्यों की प्रकृति बदल देते हैं। उदाहरणतया, कभी वे छोटे-छोटे वाक्य प्रयोग करते हैं

  • आज सालिम अली नहीं हैं।
  • चौधरी साहब भी नहीं हैं। कभी वे उत्तेजना लाने के लिए प्रश्न शैली का प्रयोग करते हैं और जटिल वाक्य बनाते चले जाते है जैसे: –
  • कौन बचा है, जो अब सोंधी माटी पर उगी फसलों के बीच एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा?
  • कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बर्फीली जमीनों पर जीने वाले पक्षियों की वकालत करेगा?

प्रश्न 5. इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व का जो चित्र खींचा है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: लेखक ने सालिम अली का जो चित्र खींचा है, वह इस प्रकार है-

सालिम अली प्रसिद्ध पक्षी-विज्ञानी होने के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमी थे। एक बार बचपन में उनकी एअरगन से घायल होकर नीले कंठवाली गौरैया गिरी थी। उसकी हिफाजत और उससे संबंधित जानकारी पाने के लिए उन्होंने जो प्रयास किया, उससे पक्षियों के बारे में उठी जिज्ञासा ने उन्हें पक्षी-प्रेमी बना दिया। वे दूर-दराज घूम-घूमकर पक्षियों के बारे में जानकारी एकत्र रहे हैं और उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहे। वे केरल की साइलेंट वैली को रेगिस्तानी हवा के झोकों से बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से भी मिले। वे प्रकृति की दुनिया के अथाह सागर बन गए थे।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न. प्रस्तुत पाठ सालिम अली की पर्यावरण के प्रति चिंता को भी व्यक्त करता है। पर्यावरण को बचाने के लिए आप कैसे योगदान दे सकते हैं?

उत्तर: ‘साँवले सपनों की याद’ सालिम अली ने पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता प्रकट की है। उन्होंने केरल की साइलेंट वादी को रेगिस्तानी हवा के झोंको से बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री से मुलाकात की और उसे बचाने का अनुरोध किया। इस तरह अपने पर्यावरण को बचाने के लिए हम भी विभिन्न रूपों में अपना योगदान दे सकते हैं; जैसे-

  • अपने आस-पास पड़ी खाली भूमि पर अधिकाधिक पेड़-पौधे लगाएँ।
  • पेड़-पौधों को कटने से बचाने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करें।
  • लोगों को पेड़-पौधों की महत्ता बताएँ।
  • हम जल स्रोतों को न दूषित करें और न लोगों को दूषित करने दें।
  • फैक्ट्रियों से निकले अपशिष्ट पदार्थों एवं विषैले जल को जलस्रोतों में न मिलने दें।
  • प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का प्रयोग कम से कम करें।
  • इधर-उधर कूड़ा-करकट न फेंकें तथा ऐसा करने से दूसरों को भी मना करें।
  • विभिन्न रूपों में बार-बार प्रयोग की जा सकने वाली वस्तुओं का प्रयोग करें।
  • सूखी पत्तियों और कूड़े को जलाने से बचें तथा दूसरों को भी इस बारे में जागरूक करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. साँवले सपनों का हुजूम कहाँ जा रहा है? उसे रोकना संभव क्यों नहीं है?

उत्तर: साँवले सपनों का हुजूम मौत की खामोश वादी की ओर जा रहा है। इसे रोकना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि इस वादी में जाने वाले वे होते हैं जो मौत की गोद में चिर विश्राम कर रहे होते हैं। ये अपना जीवन जी चुके होते हैं।

प्रश्न 2. ‘मौत की खामोश वादी’ किसे कहा गया है? इसे घाटी की ओर किसे ले जाया जा रहा है?

उत्तर: ‘मौत की खामोश वादी’ कब्रिस्तान को कहा गया है। इस घाटी की ओर प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली को ले जाया जा रहा है जो लगभग सौ वर्ष की उम्र में कैंसर नामक बीमारी का शिकार हो गए और मृत्यु की गोद में सो गए हैं।

प्रश्न 3. सालिम अली के इस सफ़र को अंतहीन क्यों कहा गया है?

उत्तर: सालिम अली के इस सफ़र को इसलिए अंतहीन कहा गया है क्योंकि इससे पहले वाले सफ़रों में सालिम अली जब पक्षियों की खोज में निकलते थे तो वे पक्षियों को देखते ही उनसे जुड़ी दुर्लभ जानकारियाँ लेकर लौट आते थे परंतु इस सफ़र का कोई अंत न होने से सालिम अली लौट न सकेंगे।

प्रश्न 4. मृत्यु की गोद में सोए सालिम अली की तुलना किससे की गई है और क्यों?

उत्तर: मृत्यु की गोद में सोए सालिम अली की तुलना उस वन-पक्षी से की गई है जो जिंदगी का आखिरी गीत गाने के बाद मौत की गोद में जा बसा हो। ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि सालिम अली भी अपनी जिंदगी के सौ वर्ष जीकर मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं। अब वे पक्षियों के बारे में जानकारी एकत्र करने नहीं जा सकेंगे।

प्रश्न 5. सालिम अली की दृष्टि में मनुष्य क्या भूल करते हैं? उन्होंने इसे भूल क्यों कहा?

उत्तर: सालिम अली की दृष्टि में मनुष्य यह भूल करते हैं कि लोग पक्षियों जंगलों-पहाड़ों, झरने-आवशारों आदि को आदमी की निगाह से देखते हैं। उन्होंने इसे भूल इसलिए कहा क्योंकि मनुष्य पक्षियों, नदी-झरनों आदि को इस दृष्टि से देखता है कि इससे उसका कितना स्वार्थ पूरा हो सकता है।

प्रश्न 6. वृंदावन में यमुना का साँवला पानी किन-किन घटनाओं की याद दिलाता है?

उत्तर: वृंदावन में यमुना का साँवला पानी कृष्ण से जुड़ी विभिन्न घटनाओं की याद दिलाता है, जैसे-

  • कृष्ण द्वारा वृंदावन में रासलीला रचाना। चंचल गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाना।
  • माखन भरे बर्तन फोड़ना और दूध-छाली खाना।
  • वाटिका में घने पेड़ों की छाँव में बंशी बजाना और ब्रज की गलियों को संगीतमय कर देना जिसे सुनते ही लोगों के कदम ठहर जाना।

प्रश्न 7. वृंदावन में सुबह-शाम सैलानियों को होने वाली अनुभूति अन्य स्थानों की अनुभूति से किस तरह भिन्न है?

उत्तर: वृंदावन में सुबह-शाम सैलानियों को सुखद अनुभूति होती है। वहाँ सूर्योदय पूर्व जब उत्साहित भीड़ यमुना की सँकरी गलियों से गुजरती है तो लगता है कि अचानक कृष्ण बंशी बजाते हुए कहीं से आ जाएँगे। कुछ ऐसी ही अनुभूति शाम को भी होती है। ऐसी अनुभूति अन्य स्थानों पर नहीं होती है।

प्रश्न 8. पक्षियों के प्रति सालिम अली की दृष्टि अन्य लोगों की दृष्टि में क्या अंतर है? ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर: सालिम अली दूर-दूर तक पक्षियों की खोज में यात्रा करते थे। वे अत्यंत उत्साह से दुर्गम स्थानों पर भी पक्षियों की खोज करते, उनकी सुरक्षा के बारे में सोचते और उनसे जुड़ी दुर्लभ जानकारी हासिल करते थे परंतु अन्य लोग पक्षियों को अपने स्वार्थ और मनोरंजन की दृष्टि से देखते हैं।

प्रश्न 9. ‘बर्ड-वाचर’ किसे कहा गया है और क्यों?

उत्तर: ‘बर्ड-वाचर’ प्रसिद्ध पक्षी-प्रेमी सालिम अली को कहा गया है क्योंकि सालिम अली जीवनभर पक्षियों की खोज करते रहे। और उनकी सुरक्षा के लिए पूरी तरह समर्पित रहे। वे अपने सुख-दुख की चिंता किए बिना आँखों पर दूरबीन लगाए पक्षियों से जुड़ी जानकारी एकत्र करते रहे।

प्रश्न 10. सालिम अली पक्षी-प्रेमी होने के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी भी थे। साँवले सपनों की याद पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सालिम अली पक्षियों से जितना लगाव रखते हुए उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहते थे उतना ही वे प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी चिंतित रहते थे। वे केरल की साइलेंट वैली को बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिले और वैली को बचाने का अनुरोध किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. ‘अब हिमालय और लद्दाख की बरफ़ीली जमीनों पर रहने वाले पक्षियों की वकालत कौन करेगा’? ऐसा लेखक ने क्यों कहा होगा? ‘सावले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सालिम अली की मृत्यु पर लेखक के मस्तिष्क में उनसे जुड़ी हर यादें चलचित्र की भाँति घूम गईं। लेखक ने महसूस किया कि सालिम अली आजीवन पक्षियों की तलाश में पहाड़ जैसे दुर्गम स्थानों पर घूमते रहे। वे आँखों पर दूरबीन लगाए नदी के किनारों पर जंगलों में और पहाड़ जैसे दुर्गम स्थानों पर भी पक्षियों की खोज करते रहे और उनकी सुरक्षा के प्रति प्रयत्नशील रहे। वे पक्षियों को बचाने का उपाय करते रहे। इसके विपरीत आज मनुष्य पक्षियों की उपस्थिति में अपना स्वार्थ देखता है। सालिम अली के पक्षी-प्रेम को याद कर लेखक ने ऐसा कहा होगा।

प्रश्न 2. फ्रीडा कौन थी? उसने लॉरेंस के बारे में क्या-क्या बताया?

उत्तर: फ्रीडा डी.एच.लॉरेंस की पत्नी थीं। लॉरेंस के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया था कि मेरे लिए लॉरेंस के बारे में कुछ कह पाना असंभव-सा है। मुझे लगता है कि मेरे छत पर बैठने वाली गौरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है। वह मुझसे भी ज्यादा जानती है। वह सचमुच ही इतना खुला-खुला और सादा दिल आदमी थे। संभव है कि लॉरेंस मेरी रगों में, मेरी हड्डियों में समाया हो।

प्रश्न 3. ‘साँवले-सपनों की याद’ पाठ के आधार पर बताइए कि सालिम अली को नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप क्यों कहा गया है?

उत्तर: सालिम अली महान पक्षी-प्रेमी थे। इसके अलावा वे प्रकृति से असीम लगाव रखते थे। वे प्रकृति के इतना निकट आ गए थे कि ऐसा लगता था कि उनका जीवन प्रकृतिमय हो गया था। सालिम अली प्रकृति के प्रभाव में आने के कायल नहीं थे। वे प्रकृति को अपने प्रभाव में लाना चाहते थे। पक्षी-प्रेम के कारण वे पक्षियों की खोज करते हुए प्रकृति के और निकट आ गए। नदी-पहाड़, झरने विशाल मैदान और अन्य दुर्गम स्थानों से उनका गहरा नाता जुड़ गया था। जिंदगी में अद्भुत सफलता पाने के बाद भी वे प्रकृति से जुड़े रहे। इस तरह उनका जीवन नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गया था।

प्रश्न 4. ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर सालिम अली के व्यक्तित्व की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: सालिम अली दुबली-पतली काया वाले व्यक्ति थे, जिनकी आयु लगभग एक सौ वर्ष होने को थी। पक्षियों की खोज में की गई लंबी-लंबी यात्राओं की थकान से उनका शरीर कमजोर हो गया था। वे अपनी आँखों पर प्रायः दूरबीन चढ़ाए रखते थे। पक्षियों की खोज के लिए वे दूर-दूर तक तथा दुर्गम स्थानों की यात्राएँ करते थे। उनकी एअर गन से घायल होकर गिरी नीले कंठवाली गौरैया ने उनके जीवन की दिशा बदले दी। वे पक्षी प्रेमी होने के अलावा प्रकृति प्रेमी भी थे। वे प्रकृतिमय जीवन जीते थे और उसकी सुरक्षा के लिए प्रयासरत रहते थे। वे नदी पहाड़-झरनों आदि को प्रकृति की दृष्टि से देखते थे।

प्रश्न 5. ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ के आधार पर बताइए कि सामान्य लोग पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान किस तरह दे सकते हैं?

उत्तर: ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ से ज्ञात होता है कि सालिम अली प्रकृति और उससे जुड़े विभिन्न अंगों-नदी, पहाड़, झरने, आबशारों आदि को प्रकृति की निगाह से देखते थे और उन्हें बचाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। उन्होंने केरल साइलेंट वैली को बचाने का अनुरोध किया। इसी तरह सामान्य लोग भी अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए विभिन्न रूपों में अपना योगदान दे सकते हैं; जैसे-

  • अधिकाधिक पेड़ लगाकर धरती की हरियाली बढ़ाकर।
  • पेड़ों को कटने से बचाकर।
  • प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का प्रयोग न करके।
  • अपने आसपास साफ़-सफ़ाई करके।
  • जल-स्रोतों को दूषित होने से बचाकर।
  • वन्य जीवों तथा पक्षियों की रक्षा करके मनुष्य पर्यावरण की सुरक्षा कर सकता है।

Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Summary

Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Poem Summary, Explanation and Question Answers

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हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक
क्षितिज भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे
‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’
Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17
पाठ के लेखक राजेश जोशी हैं।
…………………………
बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि – राजेश जोशी

कवि और लेखक राजेश जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में 1946 में हुआ। जोशी साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार हैं।

उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता शुरू की और कुछ सालों तक अध्यापन किया। राजेश जोशी ने कविताओं के अलावा कहानियां, नाटक, लेख और टिप्पणियां भी लिखीं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं में भी कार्य किया।  जैसे – अंग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए।

उपलब्धियाँ

 उन्हें मुक्तिबोध पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार तथा साथ ही “साहित्य अकादमी पुरस्कार” के प्रतिष्ठित सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

रचनाएं

राकेश जोशी जी की रचनाएं कुछ इस प्रकार से हैं

कविता संग्रह

  • एक दिन बोलेंगे पेड़
  • मिट्टी का चेहरा
  • नेपथ्य में हँसी
  • दो पंक्तियों के बीच
  • कविता – बच्चे काम पर जा रहे है

कविता का सार

राजेश जोशी जी ने हमेशा मानवीय दुखों, खासकर के बच्चो और महिलाओं के दुखो को अपने कविता में स्थान दिया है। प्रस्तुत कविता में भी कवि इस बात से दुखी है की बहुत सारे बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हे अपना पेट भरने के लिए बचपन से ही काम पर लग जाना पड़ता है। न तो उन्हें पढ़ने का मौका मिलता है और न खेलना का मौका मिलता है और इस तरह उनसे उनका बचपन छीन लिया जाता है। और इसीलिए कविता में कवि यह प्रश्न पूछ रहा है की आखिर बच्चें काम पर क्यों जा रहे हैं ? उनके अनुसार यह बहुत ही भयावह है की छोटे-छोटे बच्चे सुबह-सुबह स्कूल जाने के बजाय काम पर जा रहे हैं।

उन्हें ऐसा लग रहा है की सारे खिलौने सारी किताबे, खेलने की जगह सब ख़तम हो गई है और इसलिए बच्चे काम पर पर जा रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि सब कुछ मौजूद है और कवि इसीलिए परेशान है। अपने इस कविता में कवि बाल मजूदरी पर अपना क्रोध वयक्त किया है। उनके अनुसार यह बहुत ही गलत बात है और सरकार तथा समाज  को इस बात जरुरु ध्यान देना चाहिए।

कविता का  भावार्थ 

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं

सुबह सुबह

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि राजेश जोशी जी ने हमारे समाज में चल रहे बाल-मजदूरी की समस्या को दिखाया है और हमारा ध्यान इस समस्या की और आकर्षित करने की कोशिश की है। कवि ने कविता की प्रथम पंक्तियों में ही लिखा है की बहुत ही ठण्ड का मौसम है और सुबह सुबह का वक्त है चारो तरफ कोहरा छाया हुआ है। सड़के भी कोहरे से ढँकी हुई है। परन्तु इतने ठण्ड में भी छोटे छोटे बच्चे कोहरे से ढकी सड़क पर चलते हुए अपने अपने काम पर जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करना है। कोई कारखाने में मजदूरी करता है तो कोई चाय के दुकान में काम करने के लिए मजबूर है। जबकि इन बच्चों की उम्र तो अभी खेलने कूदने की है।

बच्चे काम पर जा रहे हैं

हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना

लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने इस समाज में वयाप्त बाल-मजदूरी जैसी समस्या पर चिंतन करते हुए कहा है की हमारे समय की सबसे भयानक बात यह है की छोटे छोटे बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है। और उससे भी भयानक कवि को यह बात लग रही है हम यह बात कितनी ही सरलता से कह दे रहे हैं। जबकि हमें इसकी और ध्यान देना चाहिए और इसका कारण पता करना चाहिए की पढ़ने और खेलने के उम्र वाले बच्चे को अपना पेट पालने के लिए यूँ काम पर क्यों जाना पड़ रहा है। इसे हमें समाज में एक प्रश्न की तरह पूछना चाहिए की इन छोटे बच्चों को काम पर क्यों जाना पड़ रहा है जबकि इनकी उम्र अभी खेलने कूदने और पढ़ने लिखने की है।

क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें

क्या दीमकों ने खा लिया है

सारी रंग बिरंगी किताबों को

क्या काले पहाड़ के निचे दब गए हैं सारे खिलौने

क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं

सारे मदरसों की इमारतें

भावार्थ :- कवि बाल मजदूरों को सुबह भीषण ठण्ड एवं कोहरे के बिच अपने अपने काम में जाते देखता है जिसे देखकर कवि हताशा एवं निराशा से भर जाता है और और इसी कारण वश कवि के मन में कई तरह के सवाल उठने लगते हैं कवि को यह समझ नहीं आ रहा की क्यों ये बच्चे अपना मन मारकर इतनी सुबह सुबह ठण्ड काम के जाने के लिए विवश है। कवि सोचता है की क्या खेलने के लिए गेंदे सारी खत्म हो चुकी है या आकाश में चली गई है। क्या बच्चो पढ़ने के लिए एक भी किताब नहीं बची है ? क्या सारी किताबो को दीमक ने खा लिया है ? क्या बाकी सारी खिलोने कहीं किसी काले पहाड़ के निचे छुपा दिए गए हैं ? जो अब इन बच्चों के लिए कुछ नहीं बचा। क्या इन बच्चों को पड़ाने वाली मदरसों एवं विधालय टूट चुकीं है जो ये बचे पढ़ाई एवं खेल कूद को छोड़कर काम पर जा रहे हैं।

क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन

ख़त्म हो गए हैं एकाएक

भावार्थ :- क्या बच्चों के खेलने की सारी जगह ख़त्म हो चुकी है क्या सारे मैदान जहाँ बच्चे खेलते थे, सारे बागीचे जहाँ बच्चे टहला करते थे एवं सारे घरो के आँगन ख़तम हो चुके हैं अचानक ही जो इन बच्चों के पास अब कुछ नहीं बसा इसीलिए ये सुबह सुबह काम पर जा रहे हैं।

तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता

भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह

कि हैं सारी चींजे हस्बमामूल

भावार्थ :- कवि के अनुसार छोटे छोटे बच्चे काम पर इसलिए जा रहे हैं क्युकिं दुनिया की सारी खेलने की चीजे जैसे गेंद, खिलौने, बागीचे, मैदान, घर का आँगन इत्यादि खत्म हो चुके हैं। उनके पड़ने के लिए सारी किताबे, विधालय एवं मदरसाये ख़त्म हो चुकी हैं कवि आगे कह रहा है की अगर सच में ऐसा है तो यह कितनी भयानक बात है, और दुनिया के होने का अर्थ ही नहीं। परन्तु कवि को इससे भी ज्यादा भयानक तब लगता है जब उसे जान पड़ता है की बच्चों के खेलने कूदने की सारी चीजें उपलब्ध हैं और उसके बाद भी बच्चे काम पर जाने के लिए विवश है और इसी कारण कवि हताश एवं निराश भी है।

अर्थ यह है की कवि अपने इन पंक्तियों के द्वारा समाज में चल रहे बाल-श्रम की और हमारा धयान खींचने में पूरी तरह से सफल हुए हैं। कवि के अनुसार बच्चपन खेल-कूद, पढ़ाई-लिखाई एवं बच्चों के विकाश का समय होता है। इस वक्त उन पर कोई बोझ या जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए

बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे

काम पर जा रहे हैं।

भावार्थ :- कवि की सोच यह थी की दुनिया में स्थित सारे खेलने-कूदने की जगह एवं चीजे ख़त्म हो गई हैं और इसीलिए बच्चे काम पर जा रहे हैं। लेकिन जब वो देखते हैं की ये सारे चीजें एवं जगहे दुनिया में भरी पड़ी है। तब उनमे चिंता घर कर जाती है क्युकिं उन्हें यह समझ नहीं आता की इन सारी चीजों के मौजूद होने के बाद भी आखिर क्यों छोटे छोटे बच्चे दुनिया की हज़ार हज़ार सड़कों से चल कर अपने अपने काम पर जाने के लिए विवश है। इसीलिए उन्होंने हमारे सामने यह प्रश्न उठाया है की “काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?”


Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17 Question Answers

बच्चे काम पर जा रहे हैं प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभारता है उसे लिखकर व्यक्त कीजिए।
उत्तर- कविता की पहली दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

कोहरे से ढंकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं।
सुबह सुबह

इन्हें पढ़कर मेरे मन-मस्तिष्क में चिंता और करुणा का भाव उमड़ता है। करुणा का भाव इस कारण उमड़ता है कि इन बच्चों की खेलने-कूदने की आयु है किंतु इन्हें भयंकर कोहरे में भी आराम नहीं है। पेट भरने की मजबूरी के कारण ही ये । ठंड में सुबह उठे होंगे और न चाहते हुए भी काम पर चल दिए होंगे। चिंता इसलिए उभरी कि इन बच्चों की यह दुर्दशा कब समाप्त होगी? कब समाज बाल-मजदूरी से मुक्ति पाएगा? परंतु कोई समाधान न होने के कारण चिंता की रेखा गहरी हो गई।

प्रश्न 2. कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
उत्तर- कवि की दृष्टि में बच्चों के काम पर जाने की स्थिति को विवरण या वर्णन की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा वर्णन किसी के मन में भावनात्मक लगाव और संवेदनशीलता नहीं पैदा कर सकता है, कुछ सोचने के लिए विवश नहीं कर सकता है। इसे प्रश्न के रूप में पूछे जाने पर एक जवाब मिलने की आशा उत्पन्न होती है। इसके लिए समस्या से जुड़ाव, जिज्ञासा एवं व्यथा उत्पन्न होती है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 3. सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं?
उत्तर- समाज की व्यवस्था और गरीबी के कारण बच्चे सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से वंचित हैं। भारत में करोड़ों लोग पेट भर रोटी नहीं जुटा पाते। इसलिए उनके बच्चों को भी बचपन से कामकाज करना पड़ता है। यह उनकी जन्मजात विवशता होती है। एक भिखारी, मजदूर या गरीब व्यक्ति का बच्चा गेंद, खिलौने, रंगीन किताबें कहाँ से लाए?

समाज की व्यवस्था भी बाल-श्रमिकों को रोकने में सक्षम नहीं है। यद्यपि सरकार ने इस विषय में कानून बना दिए हैं। किंतु वह बच्चों को निश्चित रूप से ये सुविधाएँ दिला पाने में समर्थ नहीं है। न ही सरकार या समाज के पास इतने साधन हैं, न गरीबी मिटाने के उपाय हैं और न इच्छा-शक्ति। इसलिए बच्चे वंचित हैं।

प्रश्न 4. दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर- जीवन में बच्चों को काम पर जाते हुए देखकर भी लोग उदासीन बने रहते हैं। इस उदासीनता के अनेक कारण हैं; जैसे-

  • लोग इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि वे सोचते हैं कि छोड़ो, यह कौन-सा हमारा बच्चा है।
  • लोगों की स्वार्थ भावना इस उदासीनता को बढ़ाती है। वे अधिक लाभ कमाने और कम मजदूरी देने के लालच में बच्चों से काम करवाते हैं।
  • बाल श्रम कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य का उचित निर्वाह न करना समाज की उदासीनता बढ़ाता है।

प्रश्न 5. आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है?
उत्तर- मैंने अपने शहर में बच्चों को अनेक स्थलों पर काम करते देखा है। चाय की दुकान पर, होटलों पर, विभिन्न दुकानों पर, घरों में, निजी कार्यालयों में। मैंने उन्हें सुबह से देर रात तक, हर मौसम में काम करते देखा है।

प्रश्न 6. बच्चों को काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
उत्तर- बच्चों का काम पर जाना एक बड़े हादसे के समान इसलिए है क्योंकि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने की उम्र में काम करने से बालश्रमिकों का भविष्य नष्ट हो जाता है। इससे एक ओर जहाँ शारीरिक विकास अवरुद्ध होता है, वहीं उनका मानसिक विकास भी यथोचित ढंग से नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे जीवनभर के लिए अकुशल श्रमिक बनकर रह जाते हैं। इससे उनके द्वारा समाज और देश के विकास में उनके द्वारा जो योगदान दिया जाना था वह नहीं मिलता है जिससे प्रगति की दर मंद पड़ती जाती है।


तो बच्चों!

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