Category: Hindi Language

Avyay

अव्यय (Parts of Avyay)

अव्यय के भेद, परिभाषा उदहारण सहित

अव्यय (अविकारी शब्द)

अव्यय की परिभाषा: ऐसे शब्द जिसमें लिंग, वचन, पुरुष, कारक आदि के कारण कोई विकार नहीं आता अव्यय कहलाते हैं। यह सदैव अपरिवर्तित, अविकारी एवं अव्यय रहते हैं। इनका मूल रूप स्थिर रहता है, वह कभी बदलता नहीं है,

जैसे: – जब, तब, अभी, अगर, वह, वहाँ, यहाँ, इधर, उधर, किन्तु, परन्तु, बल्कि, इसलिए, अतएव, अवश्य, तेज, कल, धीरे, लेकिन, चूँकि, क्योंकि आदि।

अव्यय के भेद

अव्यय के चार भेद माने जाते हैं।

क्रियाविशेषण

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परिभाषा: जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं उन्हें क्रियाविशेषण कहते हैं।

जहाँ पर यहाँ, तेज, अब, धीरे-धीरे, प्रतिदिन, सुंदर, वहाँ, तक, जल्दी, अभी, बहुत आते हैं, वहाँ पर क्रियाविशेषण अव्यय होता है।

जैसे: –

  • वह यहाँ से चला गया।
  •  घोड़ा तेज दौड़ता है।
  •  अब पढना बंद करो।
  • बच्चे धीरे-धीरे चल रहे थे।
  • सुधा प्रतिदिन पढती है।

क्रियाविशेषण चार प्रकार के होते हैं :-

  1. कालवाचक क्रियाविशेषण अव्यय :- जिन अव्यय शब्दों से कार्य के  काल (समय) के होने का पता चले उसे कालवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जहाँ पर आजकल, अभी, तुरंत, रातभर, दिनभर, हर बार, कई बार, नित्य, कब, यदा, कदा, जब, तब, हमेशा, तभी, तत्काल, निरंतर, शीघ्र पूर्व, बाद, घड़ी-घड़ी, अब, तत्पश्चात, तदनन्तर, कल, फिर, कभी, प्रतिदिन, आज, परसों, सायं, पहले, सदा, लगातार आदि आते है, वहाँ पर कालवाचक क्रियाविशेषण अव्यय होता है।

जैसे: –

  • वह नित्य टहलता है।
  • वे कब गए।
  • सीता कल जाएगी।
  • वह प्रतिदिन पढ़ता है।
  • दिन भर वर्षा होती है।

“कालवाचक क्रियाविशेषण जानने के लिए क्रिया के साथ कब लगाकर प्रश्न किया जाता है।”

  • स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय: – जो शब्द क्रिया के होने के स्थान संबंधी विशेषता का बोध   होता है, उन्हें स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जहाँ पर यहाँ,वहाँ,भीतर,बाहर,इधर,उधर, दाएँ, बाएँ,कहाँ,किधर,जहाँ,पास,दूर,अन्यत्र,इस ओर, उस ओर,ऊपर,नीचे,सामने,आगे,पीछे,आमने आते है वहाँ पर स्थानवाचक क्रियाविशेषण अव्यय होता है।

जैसे: –

  • मैं कहाँ जाऊं?
  • तारा किधर गई?
  • सुनील नीचे बैठा है।
  • इधर-उधर मत देखो।
  • वह आगे चला गया

“स्थानवाचक क्रियाविशेषण जानने के लिए क्रिया के साथ कहाँ लगाकर प्रश्न किया जाता है।”

  • परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय: – जो शब्द क्रिया की मात्रा (परिमाण) बताते है, वे परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहलाते हैं।

जिन अव्यय शब्दों से नाप-तोल का पता चलता है।

जहाँ पर थोडा,काफी,ठीक-ठाक,बहुत,कम, अत्यंत,अतिशय,बहुधा,थोडा-थोडा,अधिक, अल्प,कुछ,पर्याप्त,प्रभूत,न्यून,बूंद-बूंद,स्वल्प, केवल,प्राय:,अनुमानत:,सर्वथा,उतना,जितना, खूब,तेज,अति,जरा,कितना,बड़ा,भारी,अत्यंत, लगभग,बस,इतना,क्रमश: आदि आते हैं; वहाँ पर परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जैसे: –

  • मैं बहुत घबरा रहा हूँ।
  • वह अतिशय व्यथित होने पर भी मौन है।
  • उतना बोलो जितना जरूरी हो।
  • रमेश खूब पढ़ता है।
  • तेज गाड़ी चल रही है।

“परिमाणवाचक क्रियाविशेषण जानने के लिए क्रिया के साथ कितना / कितनी लगाकर प्रश्न किया जाता है।”

  • रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय: – जो शब्द क्रिया के होने की रीति का बोध कराते है, उन्हें रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जहाँ पर ऐसे,वैसे,अचानक,इसलिए, कदाचित, यथासंभव,सहज,धीरे,सहसा,एकाएक,झटपट, आप ही,ध्यानपूर्वक,धडाधड,यथा,ठीक, सचमुच,अवश्य,वास्तव में,निस्संदेह,बेशक, शायद,संभव है,हाँ,सच,जरुर,जी,अतएव, क्योंकि,नहीं,न,मत,कभी नहीं,कदापि नहीं, फटाफट,शीघ्रता,भली-भांति,ऐसे,तेज,कैसे, ज्यों, त्यों आदि आते हैं वहाँ पर रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।

जैसे: –

  • दादी जी धीरे-धीरे चलती है।
  • हमारे सामने शेर अचानक आ गया।
  • कपिल ने अपना कार्य फटाफट कर दिया।
  • मोहन शीघ्रता से चला गया।
  • हाथी झूमता हुआ चलता है।

“रीतिवाचक क्रियाविशेषण जानने के लिए क्रिया के साथ कैसे लगाकर प्रश्न किया जाता है।”


sambandh bodhak avyay
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 संबंधबोधक

संबंध + बोधक = संबंध बताने वाला।

परिभाषा: जो अव्यय किसी संज्ञा  के बाद आकर उस संज्ञा  का संबंध वाक्य के दूसरे शब्द से दिखाते हैं उन्हें संबंधबोधक कहते हैं।

इनमें लिंग, वचन, कारक आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता। अतः ये अव्यय होते है।

जैसे: –

  • वह दिन भर काम करता रहा।
  • मैं विद्यालय तक गया था।
  • मनुष्य पानी के बिना जीवित नहीं रह सकता।

संबंधबोधक अव्ययों के कुछ और उदाहरण निम्नलिखित है: –

अपेक्षा सामान,बाहर,भीतर,पूर्व,पहले,आगे, पीछे,संग,सहित,बदले,सहारे,आसपास , भरोसे,मात्र,पर्यंत,भर,तक,सामने।

संबंधबोधक के भेद: –

संबंधबोधक के निम्नलिखित दस भेद होते है: –

  1. समतावाचक- की भाँति, के बराबर, के समान, की तरह आदि।
  2. विरोधवाचक- के विपरीत, के विरुद्ध, के खिलाफ आदि।
  3. स्थानवाचक- के पास, से दूर, के नीचे, के भीतर आदि।
  4. दिशावाचक- की ओर, के आस-पास, के सामने आदि।
  5. तुलनावाचक- की तरह, की अपेक्षा आदि।
  6. हेतुवाचक- के कारण, के लिए, की खातिर आदि।
  7. कालवाचक- से पहले, के बाद, के पश्चात् आदि।
  8. पृथकवाचक- से अलग, से दूर, से हटकर आदि।
  9. साधनवाचक- के द्वारा, के माध्यम, के सहारे आदि।
  10. संगवाचक- के साथ, के संग, समेत आदि।

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समुच्चयबोधक

समुच्चय + बोधक = जुड़ने का बोध कराने वाला।

समुच्चय बोधक को ‘योजक’ भी कहते है, क्योकि ये शब्दों, उपवाक्यों तथा वाक्यों को जोड़ने का कार्य करते है; परन्तु ये केवल जोड़ते ही नहीं, अपितु अलग भी करते है।

जैसे: –

  • सूरज निकला और पंछी बोलने लगे।
  • आज रविवार है, इसलिए बाजार बंद है।

परिभाषा: दो शब्दों, उपवाक्यों ओर वाक्यों को जोड़ने या अलग करने वाले शब्दों को समुच्चय बोधक कहते है।

समुच्चयबोधक अव्यय मूलतः दो प्रकार के होते हैं: –

  1. समानाधिकरण।
  2. व्यधिकरण।

1. समानाधिकरण समुच्चयबोधक: – दो अथवा दो से अधिक समान पदों, उपवाक्यों या वाक्यों को आपस में जोड़ने वाले शब्दों को  समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहते है।

जैसे: – या, न, बल्कि, इसलिए, और, तथा आदि।

उदाहरण:

  • तरुण ने अपना गृहकार्य किया और खेलने चला गया।
  • मैने कोशिश तो की, लेकिन काम नहीं बना।

समानाधिकरण समुच्चयबोधक के चार उपभेद हैं: –

  1. संयोजक: – दो शब्दों, वाक्यांशों व वाक्यों को जोड़ते है वे संयोजक होते हैं।

जैसे: – व, तथा, और आदि।

उदहारण: राधा और रेखा देहली जाएँगी।

  • विभाजक: – दो शब्दों,उपवाक्यों या वाक्यांशों में विभाजन या विकल्प प्रकट करते है; वे शब्द विभाजक कहलाते है।

जैसे: – अथवा, या, चाहे, अन्यथा आदि।

उदहारण: चाय पीना या शरबत पीना।

  • विरोधसूचक: – दो विरोधी शब्द,  उपवाक्यों या कथनों को जोड़ने वाले शब्द विरोधसूचक कहलाते है। जैसे: किन्तु,परन्तु।

उदहारण: पुस्तकें खरीदनी थी, परन्तु दुकान बंद है।

  • परिणामसूचक: – दो शब्द, उपवाक्यों या कथनों को जोड़कर परिणाम का कार्य करने वाले शब्द परिणामसूचक कहलाते है।

जैसे: – अतः फलतः अतेव आदि।

उदाहरण: राम ने पढ़ाई नहीं कि इसलिए फेल हो गया।

2. व्यधिकरण समुच्चयबोधक: – एक अथवा एक से अधिक आश्रित उपवाक्यों को आपस में जोड़ने वाले शब्द कहलाते है।

जैसे: – तथापि यद्यपि,क्योंकि, ताकि आदि।

उदहारण: – 

  • माता जी ने कहा कि तुरंत तैयार हो जाओ।
  • पैसे खत्म हो गए इसलिए मैं चला गया।

व्यधिकरण के चार उपभेद हैं-

  • कारणसूचक:  दो उपवाक्यों को जोड़कर कारण को स्पष्ट करने वाले शब्द को कारणसूचक शब्द कहते है।

जैसे :-

  • श्याम को गाड़ी नहीं मिली क्योंकि  वह समय पर नहीं गया।
  • पेन दे दो ताकि मैं गृहकार्य कर सकूँ।
  • संकेतसूचक: जब दो योजक शब्द दो उपवाक्यों को जोड़ते है, तब वे संकेतसूचक शब्द कहलाते है।

जैसे: –

  • यदि पिताजी आ जाते तो घुमाने ले जाते।
  • जो तैयार होते तो चल पड़ते।
  •  उद्देश्य् सूचक: दो उपवाक्यों को जोड़कर उनका उदेश्य स्पष्ट करते है ऐसे शब्दों को उद्देश्य् सूचक कहते है।

जैसे: –

  • पुस्तक ले ली है ताकि पढ़ सकूँ।
  • खाना बना दिया है जिससे कि बच्चे खा सकें।
  • स्वरूपसूचक:  जो शब्द प्रधान उपवाक्यों का अर्थ स्पष्ट करें या उसके स्वरुप को बताए उनको स्वरूपसूचक अव्यय कहते है।

जैसे: –

  • श्रीमती नीलम अर्थात आदर्श अध्यापिका।
  • सत्यवादी बलवीर जी मानों हरिश्चंदर के अवतार।

vismayadi bodhak avyay
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विस्मयादिबोधक

विस्मय + आदि = आश्चर्य तथा अन्य मनोभाव; बोधक = ज्ञान करने वाला|

परिभाषा: जिन अवयवों से हर्ष, शोक, घृणा, आदि भाव प्रकट होते हैं। जिनका संबंध वाक्य के किसी दूसरे पद से नहीं होता उन्हें विस्मयादिबोधक अव्यय कहते हैं।

जैसे: –

  • हाय! वह चल बसा।
  • उफ़! कितनी गर्मी है।

विस्मयादिबोधक अव्यय के निम्न भेद हैं: –

  1. विस्मय बोधक- अरे! क्या! ओह! आदि।

क्या! हो गया?

  • हर्षबोधक- वाह-वाह! अहा! क्या खूब! शाबाश! धन्य! आदि।

क्या खूब! बहुत सूंदर चित्र बना है।

  • घृणाबोधक- छी! छि-छि! धिक्! धत्! आदि।

धिक्! कभी अपना मुँह मत दिखाना।

  • स्वीकृतिबोधक- हाँ! ठीक! जी हाँ! आदि।

जी हाँ! आप बिल्कुल ठीक कह रही है।

  • चेतावनीबोधक- सावधान! होशियार! बचो! हटो! आदि।

बचो! तुम्हारे पीछे बैल आ रहा है।

  • शोकबोधक- हाय! उफ़! आह! हे राम! आदि।

हे राम! यह क्या हो गया?

  • आशीर्वादबोधक- सौभाग्यवती भव! दीर्घायु  हो! सुखी रहो! जीते रहो! आदि।

जीते रहो! भगवान तुम्हे लम्बी उम्र दे।

  • भयबोधक- बाप रे! अरे रे! बाप रे बाप! आदि।

बाप रे बाप! कितना भयानक दृश्य है।

  • संबोधनबोधक- अरे!  सुनो! अरे सुनो! अजी सुनिए! आदि।

अरे सुनो! जरा इधर आना।


Nipat hindi language
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निपात

मूलतः निपात का प्रयोग अवयवों के लिए होता है। इनका कोई लिंग, वचन नहीं होता। निपात का प्रयोग निश्चित शब्द या पूरे वाक्य को श्रव्य भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है।

निपात सहायक शब्द होते हुए भी वाक्य के अंग नहीं होते। निपात का कार्य शब्द समूह को बल प्रदान करना होता है।

परिभाषा: जिन अव्यय शब्दों का प्रयोग किसी शब्द पर विशेष बल देने के लिए किया जाता है, उन्हें निपात कहते है।

जैसे: –

  • राधा ने ही मुझे पुस्तक दी थी।
  • राधा ने मुझे ही पुस्तक दी थी।
  • राधा ने मुझे पुस्तक ही दी थी।

निपात के प्रकार: – निपात कई प्रकार के होते हैं;

जैसे: –

  1. स्वीकृतिबोधक- हां , जी, जी  हां,  अवश्य।
  2. नकारबोधक- जी नहीं , नहीं।
  3. निषेधात्मक- मत।
  4. प्रश्नबोधक- क्या, कैसे।
  5. विस्मयादिबोधक- काश  , हाय।
  6. तुलनाबोधक- सा।
  7. अवधारणाबोधक- ठीक, करीब,लगभग, तकरीबन।

Anuchched Lekhan (Paragraph Writing)

Anuchched Lekhan (Paragraph Writing)

BHASHAGYAN CONTENT

अनुच्छेद-लेखन (Paragraph Writing)

अनुच्छेद-लेखन की परिभाषा

किसी एक भाव या विचार को व्यक्त करने के लिए लिखे गये सम्बद्ध और लघु वाक्य-समूह को अनुच्छेद-लेखन कहते हैं।
दूसरे शब्दों में- किसी घटना, दृश्य अथवा विषय को संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित ढंग से जिस लेखन-शैली में प्रस्तुत किया जाता है, उसे अनुच्छेद-लेखन कहते हैं।

‘अनुच्छेद’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘Paragraph’ शब्द का हिंदी पर्याय है। अनुच्छेद ‘निबंध’ का संक्षिप्त रूप होता है। इसमें किसी विषय के किसी एक पक्ष पर 80 से 100 शब्दों में अपने विचार व्यक्त किए जाते हैं।

अनुच्छेद में हर वाक्य मूल विषय से जुड़ा रहता है। अनावश्यक विस्तार के लिए उसमें कोई स्थान नहीं होता। अनुच्छेद में घटना अथवा विषय से सम्बद्ध वर्णन संतुलित तथा अपने आप में पूर्ण होना चाहिए।
अनुच्छेद लिखते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए :

(1) अनुच्छेद लिखने से पहले रूपरेखा, संकेत-बिंदु आदि बनानी चाहिए।
(2) अनुच्छेद में विषय के किसी एक ही पक्ष का वर्णन करें।
(3) भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली होनी चाहिए।
(4) एक ही बात को बार-बार न दोहराएँ।
(5) अनावश्यक विस्तार से बचें, लेकिन विषय से न हटें।
(6) शब्द-सीमा को ध्यान में रखकर ही अनुच्छेद लिखें।
(7) पूरे अनुच्छेद में एकरूपता होनी चाहिए।
(8) विषय से संबंधित सूक्ति अथवा कविता की पंक्तियों का प्रयोग भी कर सकते हैं।

अनुच्छेद की प्रमुख विशेषताएँ

अनुच्छेद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है-
(1) अनुच्छेद किसी एक भाव या विचार या तथ्य को एक बार, एक ही स्थान पर व्यक्त करता है। इसमें अन्य विचार नहीं रहते।
(2) अनुच्छेद के वाक्य-समूह में उद्देश्य की एकता रहती है। अप्रासंगिक बातों को हटा दिया जाता है।
(3) अनुच्छेद के सभी वाक्य एक-दूसरे से गठित और सम्बद्ध होते है।
(4) अनुच्छेद एक स्वतन्त्र और पूर्ण रचना है, जिसका कोई भी वाक्य अनावश्यक नहीं होता।
(5) उच्च कोटि के अनुच्छेद-लेखन में विचारों को इस क्रम में रखा जाता है कि उनका आरम्भ, मध्य और अन्त आसानी से व्यक्त हो जाय।
(6) अनुच्छेद सामान्यतः छोटा होता है, किन्तु इसकी लघुता या विस्तार विषयवस्तु पर निर्भर करता है।

यहाँ उदहारण के तोर पर एक अनुच्छेद दिया जा रहा हैं-

समय किसी के लिए नहीं रुकता

‘समय’ निरंतर बीतता रहता है, कभी किसी के लिए नहीं ठहरता। जो व्यक्ति समय के मोल को पहचानता है, वह अपने जीवन में उन्नति प्राप्त करता है। समय बीत जाने पर कार्य करने से भी फल की प्राप्ति नहीं होती और पश्चात्ताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं आता। जो विद्यार्थी सुबह समय पर उठता है, अपने दैनिक कार्य समय पर करता है तथा समय पर सोता है, वही आगे चलकर सफलता व उन्नति प्राप्त करता है। जो व्यक्ति आलस में आकर समय गँवा देता है, उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। संतकवि कबीरदास जी ने भी कहा है :

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होइगी, बहुरि करेगा कब।।

समय का एक-एक पल बहुत मूल्यवान है और बीता हुआ पल वापस लौटकर नहीं आता। इसलिए समय का महत्व पहचानकर प्रत्येक विद्यार्थी को नियमित रूप से अध्ययन करना चाहिए और अपने लक्ष्य की प्राप्ति करनी चाहिए। जो समय बीत गया उस पर वर्तमान समय बरबाद न करके आगे की सुध लेना ही बुद्धिमानी है।

Alankar (Figure of speech)

“BHASHAGYAN CONTENT”

अलंकार (Figure of speech) की परिभाषा

अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना  है – अलम + कार। यहाँ पर अलम का अर्थ  है ‘आभूषण’ और कार का अर्थ है सुसज्जित करने वाला

अलंकार का शाब्दिक अर्थ है आभूषण”|

जिस तरह से एक नारी अपनी सुन्दरता को बढ़ाने के लिए आभूषणों को प्रयोग में लाती हैं उसी प्रकार भाषा को सुन्दर बनाने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात जो शब्द काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं उसे अलंकार कहते हैं।

“काव्य की शोभा में वृद्धि करने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं।

अलंकार से काव्य में रोचकता, चमत्कार और सुन्दरता उत्पन्न होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अलंकार को काव्य की आत्मा ठहराया है।

आचार्य दण्डी ने कहा भी है– “काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलङ्कारान् प्रचक्षते।” अर्थात् काव्य के शोभाकार धर्म, अलंकार होते हैं। अलंकारों के बिना कवितारूपी नारी विधवा–सी लगती है।

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अलंकार का महत्त्व

काव्य में अलंकार की महत्ता सिद्ध करने वालों में आचार्य भामह, उद्भट, दंडी और रुद्रट के नाम विशेष प्रख्यात हैं। इन आचार्यों ने काव्य में रस को प्रधानता न दे कर अलंकार की मान्यता दी है। अलंकार की परिपाटी बहुत पुरानी है। काव्य-शास्त्र के प्रारम्भिक काल में अलंकारों पर ही विशेष बल दिया गया था। हिन्दी के आचार्यों ने भी काव्य में अलंकारों को विशेष स्थान दिया है।

अलंकार कवि को सामान्य व्यक्ति से अलग करता है। जो कलाकार होगा वह जाने या अनजाने में अलंकारों का प्रयोग करेगा ही। इनका प्रयोग केवल कविता तक सीमित नहीं वरन् इनका विस्तार गद्य में भी देखा जा सकता है।

अलंकार के भेद

अलंकार के तीन भेद होते है:-

  1. शब्दालंकार – Shabd Alankar
  2. अर्थालंकार – Arthalankar
  3. उभयालंकार – Ubhaya Alankar

इन दोनों भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है;

1) शब्दालंकार:-

शब्दालंकार दो शब्द से मिलकर बना है- शब्द + अलंकार

शब्द के दो रूप है- ध्वनि और अर्थ। “जब कुछ विशेष शब्दों के कारण काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है तो वह ‘शब्दालंकार’ कहलाता है।”

शब्दालंकार के भेद:-

  • (1) अनुप्रास अलंकार

परिभाषा- वर्णों की आवृत्ति को ‘अनुप्रास’ कहते हैं; अर्थात् “जहाँ समान वर्णों की बार–बार आवृत्ति होती है वहाँ ‘अनुप्रास’ अलंकार होता है।” .
उदाहरण–
(क) तरनितनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
(
ख) रघुपति राघव राजा राम।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरणों के अन्तर्गत प्रथम में ‘त’ तथा द्वितीय में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास के भेद–अनुप्रास के पाँच प्रकार हैं–

  1. छेकानुप्रास,
  2. वृत्यनुप्रास,
  3. श्रुत्यनुप्रास,
  4. लाटानुप्रास,
  • (2) यमक अलंकार

परिभाषा: ’यमक’ का अर्थ है– ‘युग्म’ या ‘जोड़ा’। इस प्रकार “जहाँ एक शब्द अथवा शब्द–समूह का एक से अधिक बार प्रयोग हो, किन्तु उसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो, वहाँ ‘यमक’ अलंकार होता है।”

उदाहरण:-
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी,
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में ‘ऊँचे घोर मंदर’ के दो भिन्न–भिन्न अर्थ हैं– ‘महल’ और ‘पर्वत कन्दराएँ’; अतः यहाँ ‘यमक’ अलंकार है।

अन्य उदाहरण:-

काली घटा का घमण्ड घटा।

यहाँ ‘घटा’ शब्द की आवृत्ति भिन्न-भिन्न अर्थ में हुई है। पहले ‘घटा’ शब्द ‘वर्षाकाल’ में उड़ने वाली ‘मेघमाला’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है और दूसरी बार ‘घटा’ का अर्थ है ‘कम हुआ’। अतः यहाँ यमक अलंकार है।


 2) अर्थालंकार–

“जहाँ काव्य में अर्थगत चमत्कार होता है, वहाँ ‘अर्थालंकार’ माना जाता है।”

 दूसरे शब्दों में, जब किसी वाक्य या छंद को अर्थों के आधार पर सजाया जाये तो ऐसे अलंकार को अर्थालंकार कहते हैं।

अर्थालंकारों के भेदों पर विद्वानों के अलग अलग मत रहे हैं किसी विद्वान ने इसके भेद 23 बताये हैं तो किसी ने 125 तक बताये हैं।   इस अलंकार पर आधारित शब्दों के स्थान पर उनका कोई पर्यायवाची रख देने से भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

उदाहरणार्थ–
चरणकमल बन्दौं हरिराई।

यहाँ पर ‘कमल’ के स्थान पर ‘जलज’ रखने पर भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।

  • 1. उपमा अलंकार

परिभाषा– ‘उपमा’ का अर्थ है–सादृश्य, समानता तथा तुल्यता। “जहाँ पर उपमेय की उपमान से किसी समान धर्म के आधार पर समानता या तुलना की जाए, वहाँ ‘उपमा’ अलंकार होता है।”
उपमा अलंकार के अंग–उपमा अलंकार के चार अंग हैं-
(क) उपमेय–जिसकी उपमा दी जाए।
(ख) उपमान–जिससे उपमा दी जाए।
(ग) समान (साधारण) धर्म–उपमेय और उपमान दोनों से समानता रखनेवाले धर्म।
(घ) वाचक शब्द–उपमेय और उपमान की समानता प्रदर्शित करनेवाला सादृश्यवाचक शब्द।

उदाहरण–
मुख मयंक सम मंजु मनोहर।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में ‘मुख’ उपमेय, ‘मयंक’ उपमान, ‘मंजु और मनोहर’ साधारण धर्म तथा ‘सम’ वाचक शब्द है; अत: यहाँ ‘उपमा’ अलंकार का पूर्ण परिपाक हुआ है।

अन्य उदाहरण:-

मुख चन्द्रमा-सा सुन्दर है।  

स्पष्टीकरण:- ऊपर दिए गए उदाहरण में चेहरे की तुलना चाँद से की गयी है। इस वाक्य में ‘मुख’ – उपमेय है, ‘चन्द्रमा’ – उपमान है, ‘सुन्दर’ – साधारण धर्म  है एवं ‘सा’ – वाचक शब्द है।

उपमा अलंकार के भेद

उपमा अलंकार के प्राय: चार भेद किए जाते हैं–
(क) पूर्णोपमा,
(ख) लुप्तोपमा,
(ग) रसनोपमा,
(घ) मालोपमा।

  • (2) रूपक अलंकार

जब गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय को ही उपमान बता दिया जाए यानी उपमेय ओर उपमान में अभिन्नता दर्शायी जाए तब वह रूपक अलंकार कहलाता है।

दूसरे शब्दों में रूपक अलंकार में उपमान और उपमेय में कोई अंतर नहीं दिखायी पड़ता है।

उदाहरण –

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। 

स्पष्टीकरण ऊपर दिए गए उदाहरण में राम रतन को ही धन बता दिया गया है। ‘राम रतन’ – उपमेय पर ‘धन’ – उपमान का आरोप है एवं दोनों में अभिन्नता है।यहां आप देख सकते हैं की उपमान एवं उपमेय में अभिन्नता दर्शायी जा रही है। हम जानते हैं की जब अभिन्नता दर्शायी जाती ही तब वहां रूपक अलंकार होता है।

अतः यह उदाहरण रूपक अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अन्य उदाहरण
            ओ चिंता की पहली रेखा,
            अरे विश्ववन की व्याली।
           ज्वालामुखी स्फोट के भीषण,
          प्रथम कम्पसी मतवाली।

स्पष्टीकरण:–उपर्युक्त उदाहरण में चिन्ता उपमेय में विश्व–वन की व्याली आदि उपमानों का आरोप किया गया है, अत: यहाँ ‘रूपक’ अलंकार है।

रूपक के भेद:–आचार्यों ने रूपक के अनगिनत भेद–उपभेद किए हैं; किन्तु इसके तीन प्रधान भेद इस प्रकार हैं:–
(क) सांगरूपक,
(ख) निरंग रूपक,
(ग) परम्परित रूपक।

  • (3) अतिशयोक्ति अलंकार

परिभाषा:-  जब किसी वस्तु, व्यक्ति आदि का वर्णन बहुत बाधा चढ़ा कर किया जाए तब वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है। इस अलंकार में नामुमकिन तथ्य बोले जाते हैं।

उदाहरण :

हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग,

लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग। 

स्पष्टीकरण ऊपर दिए गए उदाहरण में कहा गया है कि अभी हनुमान की पूंछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जलकर राख हो गयी और सारे राक्षस भाग खड़े हुए।

यह बात बिलकुल असंभव है एवं लोक सीमा से बढ़ाकर वर्णन किया गया है। अतः यह उदाहरण अतिशयोक्ति अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अन्य उदाहरण:-

आगे नदियां पड़ी अपार घोडा कैसे उतरे पार।

राणा ने सोचा इस पार तब तक चेतक था उस पार।।

स्पष्टीकरण:- ऊपर दी गयी पंक्तियों में बताया गया है कि महाराणा प्रताप के सोचने की क्रिया ख़त्म होने से पहले ही चेतक ने नदियाँ पार कर दी।

यह महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की अतिशयोक्ति है एवं इस तथ्य को लोक सीमा से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है।

  • (4) मानवीकरण अलंकार

 परिभाषा:- जब प्राकृतिक वस्तुओं कैसे पेड़,पौधे बादल आदि में मानवीय भावनाओं का वर्णन हो यानी निर्जीव चीज़ों में सजीव होना दर्शाया जाए तब वहां मानवीकरण अलंकार आता है।

उदाहरण

फूल हँसे कलियाँ मुसकाई।

स्पष्टीकरण:- जैसा कि ऊपर दिए गए उदाहरण में दिया गया है की फूल हंस रहे हैं एवं कलियाँ मुस्कुरा रही हैं। जैसा की हम जानते हैं की हंसने एवं  मुस्कुराने की क्रियाएं केवल मनुष्य ही कर सकते हैं प्राकृतिक चीज़ें नहीं। ये असलियत में संभव नहीं है  एवं हम यह भी जानते हैं की जब सजीव भावनाओं का वर्णन चीज़ों में किया जाता है तब यह मानवीकरण अलंकार होता है।

अतः यह उदाहरण मानवीकरण अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अन्य उदाहरण:-

मेघ आये बड़े बन-ठन के संवर के। 

स्पष्टीकरण:- ऊपर के उदाहरण में दिया गया है कि बादल बड़े सज कर आये लेकिन ये सब क्रियाएं तो मनुष्य कि होती हैं न कि बादलों की। अतएव यह उदाहरण मानवीकरण अलंकार के अंतर्गत आएगा। ये असलियत में संभव नहीं है  एवं हम यह भी जानते हैं की जब सजीव भावनाओं का वर्णन चीज़ों में किया जाता है तब यह मानवीकरण अलंकार होता है।

अतः यह उदाहरण मानवीकरण अलंकार के अंतर्गत आएगा।

Practice – अभ्यास

निम्नलिखित पद्यांशों में प्रयुक्त अलंकारों की पहचान कर उनके नाम लिखिए –

(1) को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर

उत्तर- श्लेष अलंकार

(2) एक सुंदर सीप का मुँह था खुला।

उत्तर- अनुप्रास अलंकार

(3 ) कितनी करुणा कितने संदो।

उत्तर -अनुप्रास अलंकार

(4 ) धारा पर पारा पारावार यों हलत है।

उत्तर -यमक अलंकार

(5 ) पाहून ज्यों  आए हों गाँव में नगर में।

उत्तर – श्लेष अलंकार

(6 ) तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।

उत्तर -यमक अलंकार

(7)  तुम तुंग हिमालय भ्रंग  |

उत्तर – अनुप्रास अलंकार

(8) भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं |

उत्तर – अनुप्रास अलंकार

(9) तीन बेर खातीं ते वे तीन बेर खाती हैं |

उत्तर – यमक अलंकार

(10) सुबरन को ढूँढ़त फिरै कवि , कामी अरु चोर |

उत्तर – श्लेष अलंकार