Spiti Mein Barish Summary

स्पीति में बारिश कक्षा 11वीं हिंदी वितान 1

Spiti Mein Barish Chapter Summary Class 11th

लेखक: कृष्णनाथ

जीवन परिचय: कृष्णनाथ का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 1934 ई. में हुआ। इन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. की। इसके बाद इनका झुकाव समाजवादी आंदोलन और बौद्ध दर्शन की ओर हो गया। वे अर्थशास्त्र के विद्वान हैं और काशी विद्यापीठ में इसी विषय के प्रोफेसर भी रहे। इनका अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं पर अधिकार है। वे दोनों भाषाओं की पत्रकारिता से जुड़े रहे। ये हिंदी की साहित्यिक पत्रिका कल्पना के संपादक मंडल में कई वर्ष तक रहे। इन्होंने अंग्रेजी के मैनकाइंड का कुछ वर्षों तक संपादन भी किया।

इन्हें लोहिया पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

रचनाएँ-इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

लद्दाख में राग-विराग, किन्नर धर्मलोक, स्पीति में बारिश, पृथ्वी-परिकमा, हिमालय यात्रा. अरुणाचल यात्रा, बौद्ध निबंधावली।

इसके अलावा, इन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में कई पुस्तकों का संपादन भी किया।

साहित्यिक परिचय: कृष्णनाथ उच्चकोटि के रचनाकार थे। उन्होंने हिमालय की यात्रा शुरू की तथा बौद्ध धर्म व भारतीय मिथकों से जुड़े स्थलों को खोजना व खंगालना शुरू किया। इन्होंने अपनी इस यात्रा को शब्दों में बाँधा। वे वहाँ की विशेष स्मृतियों को भी उघाड़ते हैं। पहाड़ के किसी छोटे-बड़े शिखर पर दुबककर बैठी वह विस्मृत-सी-स्मृति मानो कृष्णनाथ की प्रतीक्षा कर रही हो।

इनके यात्रा-वृत्तांत स्थान-विशेष से जुड़े होकर भी भाषा, इतिहास, पुराण का संसार समेटे हुए हैं। पाठक उनके साथ खुद यात्रा करने लगता है।जो लोग इन स्थानों की यात्रा कर चुके होते हैं, वे कृष्णनाथ के यात्रा-वृत्तांत को पढ़कर अपनी यात्रा को पूरा मानेंगे।

पाठ प्रवेश:

यह पाठ एक यात्रा-वृत्तांत है। स्पीति, हिमालय के मध्य में स्थित है। यह स्थान अपनी भौगोलिक एवं प्राकृतिक विशेषताओं के कारण अन्य पर्वतीय स्थलों से भिन्न है। लेखक ने यहाँ की जनसंख्या, ऋतु, फसल, जलवायु व भूगोल का वर्णन किया है। ये एक-दूसरे से संबंधित हैं। उन्होंने दुर्गम क्षेत्र स्पीति में रहने वाले लोगों के कठिनाई भरे जीवन का भी वर्णन किया है। कुछ युवा पर्यटकों का पहुँचना स्पीति के पर्यावरण को बदल सकता है। ठंडे रेगिस्तान जैसे स्पीति के लिए उनका आना, वहाँ बूंदों भरा एक सुखद संयोग बन सकता है।

पाठ का सारांश:

स्पीति में बारिश पाठ में स्पीति घाटी के मनोरम यात्रा दृश्यों एवं परिस्थितियों का सादी-सरल भाषा में चित्रकर्षक वर्णन किया है | इस पाठ का सारांश इस प्रकार है:-

संचार साधनों का प्रभाव:

लेखक बताता है कि हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति जिले की तहसील स्पीति है। ऊँचे दरों व कठिन रास्तों के कारण इतिहास में इसका नाम कम ही रहा है। आजकल संचार के आधुनिक साधनों में वायरलेस के जरिए ही केलंग व काजा के बीच संबंध रहता है। केलंग के बादशाह को हमेशा अवज्ञा या बगावत का डर रहता है। यह क्षेत्र प्राय: स्वायत्त रहा है चाहे कोई भी राजा रहा हो। इसका कारण यहाँ का भूगोल है। भूगोल ही इसकी रक्षा तथा संहार करता है। पहले राजा का हरकारा आता था तो उसके आने तक अल्प वसंत बीत जाता था। जोरावर सिंह हमले के समय स्पीति के लोग घर छोड़कर भाग गए थे। उसने यहाँ के घरों और विहारों को लूटा।

विरल जनसंख्या और प्रशासन:

स्पीति में जनसंख्या लाहुल से भी कम है। सन् 1971 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसँख्या 7,196 तथा क्षेत्रफल 2,155 वर्गमील है | 1901 में यहाँ 3231 लोग थे, अब यहाँ 34,000 लोग हैं। लाहुल स्पीति का क्षेत्रफल 12210 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ जनसंख्या प्रति वर्गमील बहुत कम है। भारत को यहाँ का प्रशासन ब्रिटिश राज से मिला। अंग्रेजों ने 1846 ई. में कश्मीर के राजा गुलाब सिंह से यहाँ का प्रशासन लिया था ताकि वे पश्चिमी तिब्बत के ऊन वाले क्षेत्र में जा सकें। लद्दाख मंडल के समय यहाँ का शासन स्थानीय राजा (नोनो) द्वारा चलाया जाता था। अंग्रेजी काल में कुल्लू के असिस्टेंट कमिश्नर के समर्थन से ‘नोनो’ काम करता था। स्थानीय लोग इसे अपना राजा मानते थे।

1873 में मिला था विशेष दर्जा:

1873 ई. में स्पीति रेगुलेशन में लाहुल व स्पीति को विशेष दर्जा दिया गया। यहाँ पर अन्य कानून लागू नहीं होते थे। यहाँ के नोनो को मालगुजारी इकट्ठा करने तथा छोटे-छोटे फौजदारी के मुकदमों का फैसला करने का अधिकार दिया गया। उससे ऊपर के मामले वह कमिश्नर के पास भेज देता था। 1960 में इस क्षेत्र को पंजाब राज्य में तथा 1966 में हिमाचल प्रदेश बनने के बाद राज्य के उत्तरी छोर का जिला बनाया गया।

कठोर पर्यावरण:

स्पीति 31.42 और 32.59 अक्षांश उत्तर और 77.26 और 78.42 पूर्व देशांतर के बीच स्थित है। यहाँ चारों तरफ पहाड़ हैं। इसकी मुख्य घाटी स्पीति नदी की घाटी है। स्पीति नदी तिब्बत की तरफ से आती है तथा किन्नौर जिले से बहती हुई सतलुज में मिलती है। लेखक पारा नदी, पिन की घाटी के बारे में भी मान भाई से सुना है। यह क्षेत्र अत्यंत बीहड़ और वीरान है। यहाँ लोग रहते कैसे हैं? स्पीति के बारे में बताने पर यह सवाल लोग लेखक से पूछते हैं। ये क्षेत्र आठ-नौ महीने शेष दुनिया से कटे हुए हैं। वे एक फसल उगाते हैं तथा लकड़ी व रोजगार भी नहीं है, फिर भी वे यहाँ रह रहे हैं, क्योंकि वे यहाँ रहते आए हैं। यह तर्क से परे की चीज है।

स्पीति के पहाड़ लाहुल से अधिक ऊँचे, भव्य व नंगे हैं। इनके सिरों पर स्पीति के नर-नारियों का आर्तनाद जमा हुआ है। यहाँ हिम का आर्तनाद है, ठिठुरन है और व्यथा है। स्पीति मध्य हिमालय की घाटी है। यह हिमालय का तलुआ है। लाहुल समुद्र की तरह से 10535 फीट ऊँचा है तो स्पीति 12986 फीट ऊँचा। स्पीति घाटी को घेरने वाली पर्वत श्रेणियों की ऊँचाई 16221 से 16500 फीट है। दो चोटियाँ 21,000 फीट से भी ऊँची हैं। इन्हें बारालचा श्रेणियाँ कहते हैं। दक्षिण की पर्वत श्रेणियों को माने श्रेणियाँ कहते हैं। शायद बौद्धों के माने मंत्रों के नाम पर इनका नामकरण किया गया हो। बौद्धों का बीज मंत्र ‘ओं मणि पदमे हूँ|

नीख वातावरण:

उत्तर दिशा की ओर से जो पर्वत श्रेणियां स्पीति को घेरे हुए है उनकी ऊंचाई 16,221 फ़ीट से है| इस पर्वत श्रेणी की दो चोटियां तो 21,000 फ़ीट से भी अधिक ऊँची है | इन्हें बारालाचा श्रेणियां कहते है|

लेखक ऊंचाइयों के आँकड़ों से अधिक वहां की नीरवता को लेकर चिंतित है| वह नवयुवकों को इस घाटी में पर्यटन के लिए आमंत्रित करता है कि वे भी आकर यहाँ की ऊंचाइयों को न केवल नापें वर् न अपने जोश-खरोश आमोद-प्रमोद क्रीड़ा-कोतुक से इन घाटियों की स्थिरता ओर नीरवता को भांग करें, कुछ हलचल ला दें| यह घाटी बूढें लामाओं के मंत्रोच्चार के कारन उदास सी दिखती है| यदि युवक- युवतियां यहाँ आकर मनोरंजन ओर मनोविनोद के पल व्यतीत कारण तो शायद यहाँ का आर्तनाद पिछले ओर वातावरण आनंदमय हो|

केवल दो ऋतुएँ:

स्पीति में दो ही ऋतुएँ होती हैं। जून से सितंबर तक अल्पकालिक वसंत ऋतु तथा शेष वर्ष शीत ऋतु होती है। बसंत में जुलाई में औसत तापमान 15० सेंटीग्रेड तथा शीत में, जनवरी में औसत तापमान 8० सेंटीग्रेड होता है। वसंत में दिन गर्म तथा रात ठंडी होती है। शीत ऋतु की ठंड की कल्पना ही की जा सकती है। यहाँ वसंत का समय लाहुल से कम होता है। इस ऋतु में यहाँ फूल, हरियाली आदि नहीं आते। दिसंबर से मई तक बर्फ रहती है। नदी-नाले जम जाते हैं। तेज हवाएँ मुँह, हाथ व अन्य खुले अंगों पर शूल की तरह चुभती हैं।

मानसून का न पहुँचना:

यहाँ मानसून की पहुँच नहीं है। यहाँ बरखा बहार नहीं है। कालिदास को अपने ‘ऋतु संहार’ ग्रंथ में से वर्षा ऋतु का वर्णन हटाना होगा। उसका वर्षा वर्णन लाहुल-स्पीति के लोगों की समझ से परे है। वे नहीं जानते कि बरसात में नदियाँ बहती हैं,बादल बरसते हैं और मस्त हाथी चिंघाड़ते हैं। जंगलों में हरियाली छा जाती है और वियोगिनी स्त्रियाँ तड़पती हैं। यहाँ के लोगों ने कभी पर्याप्त वर्षा नहीं देखी। धरती सूखी, ठंडी व वंध्या रहती है।

वर्ष में एक फसल:

स्पीति में एक ही फसल होती है जिनमें जौ, गेहूँ, मटर व सरसों प्रमुख है। इनमें भी जौ मुख्य है। सिंचाई के साधन पहाड़ों से बहने वाले झरने हैं। स्पीति नदी का पानी काम में नहीं आता। स्पीति की भूमि पर खेती की जा सकती है बशर्त वहाँ पानी पहुँचाया जाए। यहाँ फल, पेड़ आदि नहीं होते। भूगोल के कारण स्पीति नंगी व वीरान है।

स्पीति में बारिश का सुखद अनुभव:- वर्षा यहाँ एक घटना है। लेखक एक घटना का वर्णन करता है। वह काजा के डाक बंगले में सो रहा था। आधी रात के समय उन्हें लगा कि कोई खिड़की खड़का रहा है। उसने खिड़की खोली तो हवा का तेज झोंका मुँह व हाथ को छीलने-सा लगा। उसने पल्ला बंद किया तथा आड़ में देखा कि बारिश हो रही है। बर्फ की बारिश हो रही थी। सुबह उठने पर पता चला कि लोग उनकी यात्रा को शुभ बता रहे थे। यहाँ बहुत दिनों बाद बारिश हुई।

SPITI ME BARISH IMPORTANT QUESTION ANSWERS

प्रश्न. 1. इतिहास में स्पीति का वर्णन नहीं मिलता। क्यों?

उत्तर: स्पीति की भौगोलिक स्थिति विचित्र है। यहाँ आवागमन के साधन नहीं हैं। यह पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ है। साल में आठ-नौ महीने बर्फ रहती है तथा यह क्षेत्र शेष संसार से कटा रहता है। इन दुर्गम रास्तों को लाँघने का साहस किसी राजा या शासक ने नहीं किया। यहाँ की आबादी बेहद कम है तथा जनसंचार के साधन का अभाव है। मानवीय गतिविधियों के कारण यहाँ इतिहास नहीं बना। इसका जिक्र सिर्फ राज्यों के साथ जुड़े रहने पर ही आता है। यह क्षेत्र प्राय: स्वायत्त ही रहा है।

 

प्रश्न. 2: स्पीति के लोग जीवनयापन के लिए किन कठिनाइयों का सामना करते हैं?

उत्तर: स्पीति के लोग जीवनयापन के लिए निम्नलिखित कठिनाइयों का सामना करते हैं –

  •  लंबी शीत ऋतु होने के कारण ये लोग दुनिया से कटे रहते हैं।
  •  यहाँ जलाने के लिए लकड़ी नहीं होती। इसलिए वे ठंड से ठिठुरते हैं।
  •  साल में सिर्फ एक फ़सल होती है। गेहूँ, जौ, मटर व सरसों के अलावा अन्य फ़सल नहीं हो सकती।
  •  किसी प्रकार का फल व सब्जी उत्पन्न नहीं होती।
  •  रोज़गार के साधन नहीं हैं।
  •  ज़मीन उपजाऊ है, परंतु सिंचाई के साधन अविकसित हैं।
  •  अत्यधिक सरदी के कारण लोग घरों में ही रहते हैं?

 

प्रश्न. 3: लेखक माने श्रेणी का नाम बौद्धों के माने मंत्र के नाम पर करने के पक्ष में क्यों है?

उत्तर: बौद्ध धर्म में माने मंत्र की बहुत महिमा है। ‘ओों मणि पद्मे हु’ इनका बीज मंत्र है। इसी मंत्र को संक्षेप में माने कहते हैं। लेखक का मानना है कि इस मंत्र का यहाँ इतना अधिक जाप हुआ है कि पर्वत श्रेणी को यह नाम आसानी से दिया जा सकता है। हो सकता है कि स्पीति के दक्षिण की पर्वत श्रेणी का माने नाम इसी कारण पड़ा हो।

 

प्रश्न. 4: ये माने की चोटियाँ बूढ़े लामाओं के जाप से उदास हो गई हैं-इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने युवा वर्ग से क्या आग्रह किया है?

उत्तर: लेखक की मान्यता है कि माने की चोटियों पर बूढ़े लामाओं ने इतने जाप किए हैं कि उनके बुढ़ापे और जाप से ये पहाड़ियाँ उदास हो गई हैं। अतः कवि युवा वर्ग से आग्रह करता है कि वे यहाँ आकर किलोल करें तो ये पहाड़ियाँ हर्षित हों। अभी तो इन पर स्पीति का आर्तनाद जमा हुआ है, जो युवा अट्टहास की गरमी से कुछ तो पिघलेगा। लेखक की ओर से यह एक युवा निमंत्रण है।

 

प्रश्न. 5: वर्षा यहाँ एक घटना है, एक सुखद संयोग है – लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर: लेखक बताता है कि स्पीति में वर्षा बहुत कम होती है। इस कारण वर्षा ऋतु मन की साध पूरी नहीं करती। वर्षा के बिना यहाँ की धरती सूखी, ठंडी व बंजर होती है। जब कभी यहाँ वर्षा हो जाती है तो लोग इसे अपना सुखद सौभाग्य मानते हैं। वर्षा के दिन को वे सुख का संकेत मानते हैं। लेखक के आने के बाद यहाँ वर्षा हुई। लोगों ने उसे बताया कि वर्षा होने के कारण आपकी यात्रा सुखद होगी।

 

प्रश्न. 6: स्पीति अन्य पर्वतीय स्थलों से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: स्पीति अन्य पर्वतीय स्थलों से बहुत भिन्न है; जैसे –

  • यहाँ के दरें बहुत ऊँचे व दुर्गम हैं।
  •  यहाँ सब्ज़ी व फल उत्पन्न नहीं होते।
  •  यहाँ वर्ष में एक ही फ़सल होती है।
  •  साल में नौ महीने बरफ़ जमी रहने के कारण यह क्षेत्र संसार से कट जाता है।
  •  यहाँ के पहाड़ों की ऊँचाई 13000 से 21000 फीट तक की है। यह अत्यन्त दुर्गम है।

 

 

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