Tag: कन्यादान कक्षा 10

Kanyadan Class 10 Summary

Kanyadan Class 10th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग- 2 की कविता पढ़ेंगे

‘Kanyadan’ Class 10th Chapter 8 Hindi Kshitij Part 2

कविता के रचयिता ऋतुराज हैं।

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बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

जीवन परिचय: कवि ऋतुराज

जीवन परिचय: कवि ऋतुराज का जन्म सन 1940 में भरतपुर में हुआ। उन्होंने जयपुर (राजस्थान विश्वविद्यालय) से अंग्रेजी विषय में एम.ए. (M.A.) किया।

फिर 40 वर्षों तक अंग्रेजी साहित्य में अध्यापन का कार्य किया। फ़िलहाल कविराज जयपुर में रहते हैं। कवि ऋतुराज की कविताओं में दैनिक जीवन के अनुभवों का यथार्थ है। वो अपने आसपास रोजमर्रा घटित होने वाली घटनाओं, सामाजिक शोषण व विडंबनाओं पर ज्यादा लिखते थे।

कविता संग्रह: उनके अब तक आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें एक मरणधर्मा और अन्य, पुल पर पानी, सुरता निरत, लीला मुखारविंद प्रमुख हैं।

पुरस्कार: मीरा पुरस्कार, बिहारी पुरस्कार। 

सम्मान: परिमल सम्मान, पहल सम्मान, सोमदत्त

कविता का सार: कन्यादान

कवि ऋतुराज ने कन्यादान कविता के माध्यम से शादी के बाद स्त्री जीवन में आने वाली विकट परिस्थितियों के बारे में एक संदेश देने की कोशिश की हैं। कविता में विवाह के पश्चात बेटी की विदाई के वक्त एक मां अपने जीवन के सभी अच्छे व बुरे अनुभवों को निचोड़ कर एक सही व तर्कसंगत सीख देने की कोशिश करती है। ताकि उसकी बेटी ससुराल में सुख व सम्मान पूर्वक जी सके।हिंसा, अत्याचार व शोषण के खिलाफ आवाज उठा सके। कविता में माँ परंपरागत मान्यताओं से बिल्कुल भिन्न हैं। जो अपनी बेटी को “परंपरागत आदर्शों” से हट कर सीख दे रही हैं।

कन्यादान करते समय माँ को ऐसा लग रहा है जैसे वह अपने जीवन की सारी जमा पूँजी दान कर रही हो । लेकिन अंदर ही अंदर वह अपनी बेटी के लिए चिंतित भी थी क्योंकि वह जानती थी कि उसकी बेटी अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह अपने नये जीवन व ससुराल में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को समझ कर उनका सामना कर सके।

मां को लगता है कि उसकी बेटी भोली और नादान है। उसने अपने जीवन में अभी तक सिर्फ सुख ही सुख देखा है। उसे दुख व परेशानी को बांटना या उनसे निकलना नहीं आता है। ससुराल में बेटी को किसी तरह की कोई परेशानी ना हो। इसीलिए माँ अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से सीखी हुई अपनी प्रमाणिक सीख को अपनी बेटी को देने की कोशिश करती है। मां अपनी बेटी को चार बड़ी-बड़ी सीख देती हैं।

पहली सीख में मां बेटी से कहती है कि कभी भी अपने रूप सौंदर्य पर अभिमान मत करना क्योंकि यह स्थाई नहीं होता है।

दूसरा सीख में माँ कहती है कि आग का प्रयोग हमेशा खाना बनाने के लिए करना। लेकिन अगर किसी के द्वारा इसका प्रयोग जलाने के लिए किया जाए तो, उसका पुरजोर विरोध करना। क्योंकि आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती हैं जलने या जलाने के लिए नहीं।

यहां पर कवि उन लोगों पर अपने शब्दों से तीक्ष्ण प्रहार कर रहे हैं जो लोग दहेज के लालच में आकर अपनी बहूओं को आग के हवाले करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं।

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तीसरी सीख में माँ कहती है कि महिलाओं का वस्त्र और आभूषण के प्रति विशेष मोह होता है। लेकिन तुम इन सबका मोह कभी मत करना क्योंकि ये ही जीवन के सबसे बड़े बंधन बन जाते हैं या महिलाओं के पैरों की जंजीर बन जाते हैं। 

और अंतिम सीख देते हुए वह कहती हैं कि “लड़की होना पर, लड़की जैसे मत दिखाई देना” अर्थात मर्यादा , लज्जा, शिष्टता, विनम्रता, ये सब स्त्री सुलभ गुण हैं। इनको तुम बरकरार रखना लेकिन इन्हें कभी अपनी कमजोरी मत बनने देना। अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना, उसके खिलाफ अपनी आवाज जरूर उठाना।

कन्यादान कविता का भावार्थ

काव्यांश 1.

कितना प्रामाणिक था उसका दुख

लड़की को दान में देते वक्त

जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने कन्यादान करते वक्त एक माता के दुःख का बड़े ही सुंदर तरीके से वर्णन किया हैं। कवि कहते हैं कि कन्यादान करते वक्त या बेटी की विदाई करते वक्त माँ का दुःख बड़ा ही स्वाभाविक व प्रामाणिक होता हैं।

दरअसल बेटी ही माँ के सबसे निकट व उसके जीवन के सुख-दुःख में उसकी सच्ची सहेली होती हैं । अब जब वही उससे दूर जा रही है। तो माँ को कन्यादान करते वक्त ऐसा लग रहा है मानो वह अपने जीवन की सबसे अनमोल “आख़िरी पूँजी” को दान करने जा रही है।

काव्यांश 2.

लड़की अभी सयानी नहीं थी

अभी इतनी भोली सरल थी

कि उसे सुख का आभास तो होता था

लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था

पाठिका थी वह धुँधले प्रकाश की

कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में कवि ऋतुराज कहते हैं कि लड़की अभी इतनी सयानी या परिपक्व नहीं हुई हैं कि वह दुनियादारी की बातों को समझ सकें । वह अभी भी एकदम भोली भाली व मासूम ही है।उसने अपने मायके में सिर्फ सुखों और खुशियों को ही देखा है। इसीलिए उसे जीवन में आने वाले दुख और परेशानियों के बारे में अभी कुछ पता नही है और ना ही उसे अपने दुःखों व परेशानियों को किसी के साथ बाँटना या हल करना आता हैं। 

कवि ऋतुराज आगे कहते हैं कि जिस प्रकार धुंधले प्रकाश में हमें किताबों में लिखे अक्षर स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। या हम उन अक्षरों को स्पष्ट नहीं पढ़ पाते हैं। सिर्फ अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं।

ठीक उसी प्रकार, उस लड़की के सामने भी अभी काल्पनिक सुखों की एक धुंधली सी तस्वीर है। उसे व्यावहारिकता का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है। ससुराल में आने वाली जिम्मेदारियां , कठिन परिस्थितियों व संघर्षों के बारे में उसको अभी कुछ भी अंदाजा नहीं है। यानि उसके पास जो भी जानकारी हैं वह आधी अधूरी व अस्पष्ट हैं।

काव्यांश 3.

माँ ने कहा पानी में झाँककर

अपने चेहरे पर मत रीझना

आग रोटियाँ सेंकने के लिए है

जलने के लिए नहीं

वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह

बंधन हैं स्त्री जीवन के

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में, माँ अपनी बेटी की विदाई के वक्त जीवन जीने की सबसे बड़ी सीख उपहार स्वरूप दे रही है।जो जीवन भर उसके काम आयेगा। माँ कहती है कि शीशे या पानी में अपनी सुंदरता का प्रतिबिम्ब देखकर ज्यादा खुश मत होना क्योंकि यह सब अस्थाई हैं।

फिर माँ अपनी बेटी को कहती है कि आग का प्रयोग सिर्फ खाना बनाने या रोटियाँ सेंकने के लिए ही करना। लेकिन अगर आग का प्रयोग जलने या जलाने के लिए करते हुए देखो तो तुरंत उसका विरोध करना। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से उन लोगों पर कटाक्ष करना चाहते हैं जो दहेज के लालच में आकर अपनी बहुओं को आग के हवाले करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं।

कवि ऋतुराज आगे कहते हैं कि वस्त्र और आभूषण महिलाओं को बहुत आकर्षित करते हैं। लेकिन माँ , वस्त्र और आभूषणों को सौंदर्य बढ़ाने वाली वस्तु न मानकर , इनको महिलाओं के लिए एक बंधन मानती है। इसीलिए वो अपनी बेटी से कहती है कि वस्त्र और आभूषणों के लालच में कभी मत पड़ना क्योंकि ये सब महिलाओं के लिए किसी बंधन से कम नहीं हैं। 

माँ ने कहा लड़की होना

पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।

भावार्थ: उपरोक्त पंक्तियों में माँ अपनी बेटी को अबला व कमजोर नारी की जगह एक सशक्त व मजबूत इंसान बनने को कहती हैं । ताकि वह अपनी सुरक्षा व अधिकारों के प्रति जागरूक रह कर, हर विपरीत परिस्थिति का पूरी दृढ़ता के साथ सामना कर सके। क्योंकि लोग महिलाओं को कमजोर समझ कर उनका शोषण व अत्याचार करते हैं।

इसीलिए माँ कहती हैं कि अपने स्त्रीत्व के स्वाभाविक गुणों को हमेशा बरकरार रखना। उनको कभी मत छोड़ना लेकिन कभी भी कमजोर व असहाय मत बनना। अपने खिलाफ होने वाले हर अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना, उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना।

Kanyadan Chapter 8 Question Answers

कन्यादान प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. आपके विचार से माँ ने ऐसा क्यों कहा कि लड़की होना पर लड़की जैसा मत दिखाई देना?

उत्तर: मेरे विचार से लड़की की माँ ने ऐसा इसलिए कहा होगा कि लड़की होना पर लड़की जैसी मत दिखाई देना ताकि लड़की अपने नारी सुलभ गुणों सरलता, निश्छलता, विनम्रता आदि गुणों को तो बनाए रखे परंतु वह इतनी कमजोर भी न होने पाए। कि लड़की समझकर ससुराल के लोग उसका शोषण न करने लगे। इसके अलावा वह भावी जीवन की कठिनाइयों का साहसपूर्वक मुकाबला कर सके।

प्रश्न 2. ‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए है।

जलने के लिए नहीं।‘

(क) इन पंक्तियों में समाज में स्त्री की किस स्थिति की ओर संकेत किया गया है?

(ख) माँ ने बेटी को सचेत करना क्यों जरूरी समझा?

उत्तर:

(क) इन पंक्तियों में समाज में स्त्रियों की कमज़ोर स्थिति और ससुराल में परिजनों द्वारा शोषण करने की ओर संकेत किया गया है। कभी-कभी बहुएँ इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को आग के हवाले करके अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेती है।

(ख) माँ ने बेटी को इसलिए सचेत करना उचित समझा क्योंकि उसकी बेटी अभी भोली और नासमझ थी जिसे दुनियादारी और छल-कपट का पता न था। वह लोगों की शोषण प्रवृत्ति से अनजान थी। इसके अलावा वह शादी-विवाह को सुखमय एवं मोहक कल्पना का साधन समझती थी। वह ससुराल के दूसरे पक्ष से अनभिज्ञ थी।

प्रश्न 3. ‘पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की

कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की’

इन पंक्तियों को पढ़कर लड़की की जो छवि आपके सामने उभरकर आ रही है उसे शब्दबद्ध कीजिए।

उत्तर: उपर्युक्त काव्य पंक्तियों को पढ़कर हमारे मन में लड़की की जो छवि उभरती है वह कुछ इस प्रकार है-

  • लड़की अभी सयानी नहीं है।
  • लड़की को दुनिया के उजले पक्ष की जानकारी तो है पर दूसरे पक्ष छल-कपट, शोषण आदि की जानकारी नहीं है।
  • लड़की विवाह की सुखद कल्पना में खोई है।
  • उसे केवल सुखों का अहसास है, दुखों का नहीं।
  • उसे ससुराल की प्रतिकूल परिस्थितियों का ज्ञान नहीं है।

प्रश्न 4. माँ को अपर्च, बेटी ‘अंतिम पूँजी’ क्यों लग रही थी?

उत्तर: माँ को अपनी बेटी अंतिम पूँजी इसलिए लग रही थी क्योंकि कन्यादान के बाद माँ एकदम अकेली रह जाएगी। उसकी बेटी ही उसके दुख-सुख की साथिन थी, जिसके साथ वह अपनी निजी बातें बाँट लिया करती थी। इसके अलावा बेटी माँ के लिए सबसे प्रिय वस्तु (पूँजी) की तरह थी जिसे अब वह दूसरे के हाथ में सौंपने जा रही थी। इसके बाद वह नितांत अकेली रह जाएगी।

प्रश्न 5. माँ ने बेटी को क्या-क्या सीख दी?

उत्तर: माँ ने कन्यादान के बाद अपनी बेटी को विदा करते समय निम्नलिखित सीख दी: –

  • वह ससुराल में दूसरों द्वारा की गई प्रशंसा से अपने रूप-सौंदर्य पर आत्ममुग्ध न हो जाए।
  • आग का उपयोग रोटियाँ पकाने के लिए करना। उसका दुरुपयोग अपने जलने के लिए मत करना।
  • वस्त्र-आभूषणों के मोह में फँसकर इनके बंधन में न बँध जाना।
  • नारी सुलभ गुण बनाए रखना पर कमजोर मत पड़ना।

प्रश्न 6. आपकी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना कहाँ तक उचित है?

उत्तर: मेरी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना उचित नहीं है। दान तो किसी वस्तु का किया जाता है। कन्या कोई वस्तु तो है नहीं। उसका अपना एक अलग व्यक्तित्व, रुचि, पसंद, इच्छा अनिच्छा आदि है। वह किसी वस्तु की भाँति निर्जीव नहीं है। दान देने के बाद दानदाता का वस्तु से कोई संबंध नहीं रह जाता है, परंतु कन्या का संबंध आजीवन माता-पिता से बना रहता है। कन्या एक वस्तु जैसी कभी भी नहीं हो सकती है, इसलिए कन्या को दान देने जैसी बात करना पूर्णतया अनुचित है।

अन्य पाठेतर हल प्रश्न

प्रश्न 1. वैवाहिक संस्कार में कन्यादान खुशी का अवसर माना जाता है, पर यहाँ माँ दुखी क्यों थी?

उत्तर: वैवाहिक संस्कार की रस्मों में कन्यादान पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण रस्म है। यह खुशी का अवसर होता है परंतु ‘कन्यादान’ कविता में माँ इसलिए दुखी थी क्योंकि विवाह के उपरांत वह बिलकुल अकेली पड़े जाएगी। वह अपने सुख दुख की बातें अब किससे करेगी। इसके अलावा वह बेटी को पूँजी समझती थी जो आज उससे दूर हो रही है।

प्रश्न 2. लड़की की माँ की चिंता के क्या कारण थे?

उत्तर: लड़की की माँ की चिंता के निम्नलिखित कारण थे: –

  • लड़की अभी समझदार नहीं थी।
  • लड़की को ससुराल के सुखों की ही समझ थी दुखों की नहीं।
  • लड़की दुनिया की छल-कपट एवं शोषण की मनोवृत्ति से अनभिज्ञ थी।
  • लड़की को ससुराल एवं जीवन पथ पर आनेवाली कठिनाइयों का ज्ञान न था।

प्रश्न 3. कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों के आधार पर कन्या की मनोदशा स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कन्यादान कविता में विवाह योग्य कन्या को विवाह एवं ससुराल के सुखों का ही आभास था। वह जानती थी कि ससुराल में सभी उसके रूप सौंदर्य की प्रशंसा करेंगे, उसे वस्त्राभूषणों से लाद दिया जाएगा जिससे उसका रूप और भी निखर उठेगा। इससे ससुराल के सभी लोग उसे प्यार करेंगे। इसके अलावा विवाह को वह ऐसा कार्यक्रम मानती है जो हँसी-खुशी के गीत गायन से पूरा हो जाता है।

प्रश्न 4. ‘कन्यादान’ कविता में ऐसा क्यों कहा गया है कि लड़की को दुख बाँचना नहीं आता?

उत्तर: कन्यादान कविता में ऐसा इसलिए कहा गया है कि लड़की को दुख बाँचना नहीं आता क्योंकि लड़की अभी सयानी नहीं हुई है। उसे दुनियादारी का अनुभव नहीं है। उसे जीवन के एक ही पक्ष का ज्ञान है। वह दुखों से अनभिज्ञ है क्योंकि माँ के घर पर दुखों से उसका कभी सामना नहीं हुआ था। अब तक वह सुखमय परिस्थितियों में ही जीती आई थी।

प्रश्न 5. ‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए है जलने के लिए नहीं’ कहकर कवयित्री ने समाज पर क्या व्यंग्य किया है?

उत्तर: माँ द्वारा अपनी बेटी को सीख देते हुए यह कहना ‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती है, जलने के लिए नहीं’ के माध्यम से कन्या को सीख तो दिया ही है पर समाज पर कठोर व्यंग्य किया है। समाज में कुछ लोग बहुओं को इतना प्रताड़ित करते हैं कि उस प्रताड़ना से मुक्ति पाने के लिए या तो लड़की स्वयं को आग के हवाले कर देती है या ससुराल के लोग उसे जला देते हैं।

तो बच्चो!

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