Tag: bhashagyan

Vaigyanik Chetna Ke Vahak Class 9th Summary

Vaigyanik Chetna Ke Vahak Chandrashekhar Venkat Raman class 9 question and answers

हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे
वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन
पाठ के लेखक धीरंजन मालवे हैं
बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचय : धीरंजन मालवे
जन्म : 1952
धीरंजन मालवे का जन्म बिहार के नालंदा जिले में 9 मार्च 1952 को हुआ। ये एम. एस. सी., एम. बी . ए. और एल. एल. बी. है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़ें मालवे अभी भी वैज्ञानिक जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के काम में जुटे हुए है।
मालवे की भाषा सीधी, सरल और वैज्ञानिक शब्दावली लिए हुए है। यथावश्यक अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग भी वे करते है।

पाठ प्रवेश: वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन

प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। वेंकट रामन् कुल ग्यारह साल की उम्र में मैट्रिक, विशेष योग्यता के साथ इंटरमीडिएट, भौतिकी और अंग्रेशी में स्वर्ण पदक के साथ बी.ए. और प्रथम श्रेणी में एम.ए. करके मात्र अठारह साल की उम्र में कोलकाता में भारत सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट में सहायक जनरल एकाउंटेंट नियुक्त कर लिए गए थे। इनकी प्रतिभा से इनके अध्यापक तक अभिभूत थे।
चंद्रशेखर वेंकट रामन् भारत में विज्ञान की उन्नति के चिर आकांक्षी थे तथा भारत की स्वतंत्राता के पक्षधर थे। वे महात्मा गांधी को अपना अभिन्न मित्रा मानते थे। नोबेल पुरस्कार समारोह के बाद एक भोज के दौरान उन्होंने कहा था: मुझे एक बधाई का तार अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र (महात्मा गांधी) से मिला है, जो इस समय जेल में हैं। एक मेधावी छात्र से महान वैज्ञानिक तक की रामन् की संघर्षमय जीवन यात्रा और उनकी उपलब्धियों की जानकारी यह पाठ बखूबी कराता है।

पाठ सार: वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन
प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन्’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। लेखक कहता है कि सन् 1921 की बात है, जब रामन् एक बार समुद्री यात्रा कर रहे थे। रामन् को जहाज के डेक पर खड़े होकर नीले समुद्र को देखना, प्रकृति को प्यार करना अच्छा लगता था। उनके अंदर एक वैज्ञानिक की जानने की इच्छा भी उतनी ही मज़बूत थी। लेखक कहता है कि यही जानने की इच्छा के कारण उनके मन में सवाल उठा कि ‘आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है? कुछ और क्यों नहीं?’ रामन् सवाल का जवाब ढूँढ़ने में लग गए। जवाब ढूँढ़ते ही वे संसार में प्रसिद्ध हो गए।
रामन् का जन्म 7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। रामन् के पिता रामन् को बचपन से ही गणित और फ़िज़िक्स पढ़ाते थे। लेखक कहता है कि रामन् मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने कॉलेज के समय से ही उन्होंने अनुसंधान के कार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था। उनकी दिली इच्छा तो यही थी कि वे अपना सारा जीवन अनुसंधान के कामों को ही समर्पित कर दें, मगर उन दिनों अनुसंधान के कार्य को पूरे समय के कैरियर के रूप तेज़ बुद्धि वाले में अपनाने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। रामन् अपने समय के अन्य तेज़ बुद्धि वाले छात्रों की ही तरह भारत सरकार के आय-व्यय से संबंधित विभाग में अफसर बन गए। लेखक कहता है कि रामन ने कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी अपने स्वाभाव के अनुसार अनुसंधान के कार्य के प्रति अपने झुकाव को बनाए रखा। दफ़तर से समय मिलते ही वे लौटते हुए बहू बाजार आते थे, वहाँ ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’ की प्रयोगशाला थी।
लेखक कहता है कि यह प्रयोगशाला अपने आपमें एक अनूठी संस्था थी, जिसे कलकत्ता के एक डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार ने वर्षों की कठिन मेहनत और लगन के बाद खड़ा किया था। लेखक कहता है कि इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना था। अपने महान् उद्देश्यों के बावजूद इस संस्था के पास औजारों की बहुत अधिक कमी थी। लेखक कहता है कि उन्हीं दिनों रामन वाद्ययंत्रों की ओर भी आकर्षित हुए। पश्चिमी देशों को भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया लगते थे और रामन ने वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर पश्चिमी देशों के इस संदेह को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया हैं।
लेखक कहता है कि उन्हीं दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद निकले हुए थे। मुखर्जी महोदय ने रामन् के सामने प्रस्ताव रखा कि वे सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद स्वीकार कर लें। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था क्योंकि लेखक कहता है कि उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित सरकारी पद पर थे, जिसके साथ मोटी तनख्वाह और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। उन्हें नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत चुके थे। ऐसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओं वाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फैसला करना रामन के लिए बहुत हिम्मत का काम था।लेखक कहता है कि रामन् सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी में आ गए थे। सन् 1921 में जब रामन समुद्र-यात्रा कर रहे थे तो उस समय जब रामन् के मस्तिष्क में समुद्र के नीले रंग की वजह का सवाल बार-बार उठने लगा, तो उन्होंने इस दिशा में कई प्रयोग किए, जिसका परिणाम रामन् प्रभाव की खोज के रूप में सभी के सामने आया। लेखक कहता है कि रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। एकवर्णीय प्रकाश की किरणों में सबसे अधिक ऊर्जा बैंजनी रंग के प्रकाश में होती है। बैंजनी के बाद क्रम के अनुसार नीले, आसमानी, हरे, पीले, नारंगी और लाल रंग का नंबर आता है। इस प्रकार लाल-रंग की प्रकाश की ऊर्जा सबसे कम होती है। आइंस्टाइन से पहले के वैज्ञानिक प्रकाश को तरंग के रूप में मानते थे, मगर आइंस्टाइन ने ही सबसे पहले यह बताया था कि प्रकाश बहुत ही छोटे छोटे कणों की तेज़ धारा के समान है। इन बहुत ही छोटे छोटे कणों की तुलना आइंस्टाइन ने बुलेट से की और इन्हें ‘प्रोटोन’ नाम दिया।
लेखक कहता है कि रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया, क्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफतौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण बहुत ही तेज़ गति के सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है। लेखक कहता है कि रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज आसान हो गया। पहले इस काम के लिए अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान का सहारा लिया जाता था। लेखक कहता है कि यह मुश्किल तकनीक है और गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थों के अणुओं की और परमाणुओं की बनावट के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक सही-सही जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का प्रयोगशाला में मिलान करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थों का बनावटी रूप से निर्माण करना संभव हो गया है।लेखक कहता है कि रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। रामन के जीवन में अब तो पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। सन् 1954 में रामन् को देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। लेखक कहता है कि रामन् नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे।
लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा ही गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अखंडित रखा अर्थात उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को नष्ट नहीं होने दिया। लेखक कहता है कि रामन विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए करेंट साइंस नामक एक पत्रिका का भी संपादन करते थे। रामन् प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं था; उन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को प्रकाशित और प्रभावित किया। उनकी मृत्यु 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुई। लेखक कहता है कि रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणों की चमक के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी ही चीज़े बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं। लेखक कहता है कि हमें केवल ज़रूरत है रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने की।

वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन प्रश्न अभ्यास

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 25-30 शब्दों में लिखिए –
प्रश्न 1 : कॉलेज कि दिनों में रामन की दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर : कॉलेज के दिनों में रामन की दिली इच्छा थी कि अपना पूरा जीवन शोधकार्य को समर्पित कर दें। लेकिन उस जमाने में शोधकार्य को एक पूर्णकालिक कैरियर के रूप में अपनाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। परन्तु रामन ने अपनी दिली इच्छा को पूरा किया।

प्रश्न 2 : वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन ने कौन सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर : लोगों का मानना था कि भारतीय वाद्ययंत्र पश्चिमी वाद्ययंत्र की तुलना में अच्छे नहीं होते हैं। रामन ने अपनी खोजों से इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की।

प्रश्न 3 : रामन के लिए नौकरी संबंधी कौन सा निर्णय कठिन था?
उत्तर : उस जमाने के हिसाब से रामन सरकारी विभाग में एक प्रतिष्ठित अफसर के पद पर तैनात थे। उन्हें मोटी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। उस नौकरी को छोड़कर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी करने का फैसला बहुत कठिन था।

प्रश्न 4 : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन को समय समय पर किन किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उत्तर : रामन को 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित किया गया। 1929 में उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी गई। 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें कई अन्य पुरस्कार भी मिले; जैसे रोम का मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी का ह्यूज पदक, फिलाडेल्फिया इंस्टीच्यूट का फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार, आदि। उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 5 : रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर : रामन को अधिकतर पुरस्कार तब मिले जब भारत अंग्रेजों के अधीन था। वैसे समय में यहाँ पर वैज्ञानिक चेतना का सख्त अभाव था। रामन को मिलने वाले पुरस्कारों से भारत की न सिर्फ वैज्ञानिक चेतना जाग्रत हुई बल्कि भारत का आत्मविश्वास भी बढ़ा।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में लिखिए –
प्रश्न 1 : रामन के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?
उत्तर : हठयोग में योगी अपने शरीर को असह्य पीड़ा से गुजारता है। रामन भी कुछ ऐसा ही कर रहे थे। वे पूरे दिन सरकारी नौकरी में कठिन परिश्रम करते थे और उसके बाद बहु बाजार स्थित प्रयोगशाला में वैज्ञानिक शोध करते थे। उस प्रयोगशाला में बस कामचलाउ उपकरण ही थे। इसलिए रामन के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग कहा गया है।

प्रश्न 2 : रामन की खोज ‘रामन प्रभाव’ क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। ऐसा इसलिए होता है कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण के फोटॉन किसी तरल या ठोस रवे से गुजरते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो टक्कर के बाद या तो वे कुछ ऊर्जा खो देते हैं या कुछ ऊर्जा पा जाते हैं। ऊर्जा में परिवर्तन के कारण प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव आता है। ऊर्जा के परिमाण में परिवर्तन के हिसाब से प्रकाश का रंग किसी खास रंग का हो जाता है। इसे ही रामन प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 3 : ‘रामन प्रभाव’ की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन कौन से कार्य संभव हो सके?
उत्तर : रामन प्रभाव की खोज से अणुओं और परमाणुओं के अध्ययन का कार्य सहज हो गया। यह काम पहले इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा किया जाता था और अब रामन स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा किया जाने लगा। इस खोज से कई पदार्थों का कृत्रिम संश्लेषण संभव हो पाया।

प्रश्न 4 : देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के महत्वपूर्ण योगदान प्र प्रकाश डालिए।
उत्तर : देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने के लिए रामन के कई काम किए। रामन ने बंगलोर में एक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की, जिसे अब रामन रिसर्च इंस्टीच्यूट के नाम से जाना जाता है। भौतिक शास्त्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल ऑफ फिजिक्स नामक शोध पत्रिका प्रारंभ की। उन्होंने अपने जीवन काल में सैंकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया। विज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए वे करेंट साइंस नामक पत्रिका का संपादन भी करते थे।

प्रश्न 5 : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन ने हमेशा ये संदेश दिया कि हम विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करें। न्यूटन ने ऐसा ही किया था और तब जाकर दुनिया को गुरुत्वाकर्षण के बारे में पता चला था। रामन ने ऐसा ही किया था और तब जाकर दुनिया को पता चला कि समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है, कोई और क्यों नहीं। जब हम अपने आस पास घटने वाली घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषन करेंगे तो हम प्रकृति के बारे में और बेहतर ढ़ंग से जान पाएँगे।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए –
प्रश्न 1 : उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
उत्तर : रामन एक ऐसी नौकरी में थे जहाँ मोटी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। लेकिन रामन ने उस नौकरी को छोड़कर ऐसी जगह नौकरी करने का निर्णय लिया जहाँ वे सारी सुविधाएँ नहीं थीं। लेकिन नई नौकरी में रहकर रामन अपने वैज्ञानिक शोध का कार्य बेहतर ढ़ंग से कर सकते थे। यह दिखाता है कि उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

प्रश्न 2 : हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।
उत्तर : हमारे पास अनेक ऐसी चीजें हैं या घटनाएँ घटती रहती हैं जिन्हें हम जीवन का एक सामान्य हिस्सा मानकर चलते हैं। लेकिन उन्ही चीजों में कोई जिज्ञासु व्यक्ति महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहस्य खोज लेता है। फिर हम जैसे नींद से जागते हैं और उस नई खोज से विस्मित हो जाते हैं। किसी की जिज्ञासा उस सही पात्र की तरह है जिसमें किसी वैज्ञानिक खोज को मूर्त रूप मिलता है।

प्रश्न 3 : यह अपने आप में एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था।
उत्तर : इस पंक्ति में लेखक रामन के अथक परिश्रम के बारे में बता रहा है। रामन उस समय एक सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। अपने दफ्तर में पूरे दिन काम करने बाद जब वे शाम में निकलते थे तो घर जाने की बजाय सीधा बहु बाजार स्थित प्रयोगशाला में जाते थे। वे प्रयोगशाला में घंटों अपने शोध पर मेहनत करते थे। पूरे दिन दफ्तर में काम करने के बाद फिर प्रयोगशाला में काम करना बहुत मुश्किल होता है। यह शारीरिक और मानसिक तौर पर थका देता है। इसलिए लेखक ने ऐसे काम को हठयोग की संज्ञा दी है।

Diary Ke Panne Class 12 Summary

Diary Ke Panne Classs 12th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों

आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक वितान भाग 2 का पाठ पढ़ेंगे

डायरी के पन्ने’

Diary Ke Panne Class 12 Chapter 4 Hindi Vitan Part 2

पाठ की लेखिका एन फ्रैंक हैं।

This Post Includes

बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखिका के जीवन परिचय को जानते हैं।

Anne Frank

Anne Frank

जीवन परिचय: ऐनी फ्रैंक (1929-1945) नाम की एक युवा यहूदी लड़की थी। जब 1933 में एडॉल्फ हिल्टर और नाजियों द्वारा यहूदियों के लिए जीवन यापन करना मुश्किल हो गया तो वह अपने माता-पिता और बड़ी बहन के साथ जर्मनी से नीदरलैंड चली गई। 1942 में, फ्रैंक और उनका परिवार जर्मन के कब्जे वाले एम्स्टर्डम में अपने पिता के व्यवसाय के पीछे एक गुप्त अपार्टमेंट में छिप गया। 1944 में ऐनी फ्रैंक को पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया तथा यातना शिविरों में भेजा गया। केवल ऐनी फ्रैंक के पिता बच गए। जिन्होने अपने परिवार के छिपकर रहने के समय की ऐनी फ्रैंक की डायरी पहली बार 1947 में प्रकाशित करवाई। इस डायरी का अनुवाद विश्व की लगभग 70 भाषाओं में किया गया है। यह विश्व की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाले डायरी में से एक है।

ऐनी फ्रैंक का जन्म

ऐनी फ्रैंक का जन्म 12 मई 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट हुआ था। उसकी एक बड़ी बहन, मार्गोट थी। उनके पिता फ्रैंक्स उदार यहूदी थे और यहूदी धर्म के सभी रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन नहीं करते थे। वे विभिन्न धर्मों के यहूदी और गैर-यहूदी नागरिकों के एक आत्मसात समुदाय में रहते थे। वह व्यवसाय को व्यवस्थित करने और अपने परिवार के साथ रहने की व्यवस्था करने के लिए एम्स्टर्डम में चले गए। फरवरी 1934 तक, एडिथ और बच्चे एम्स्टर्डम में उसके साथ जुड़ गए थे। फ्रैंक्स उन 300,000 यहूदियों में से थे जो 1933 और 1939 के बीच जर्मनी से भाग गए थे।

जन्मदिन का उपहार: डायरी

12 जून 1942 को अपने तेरहवें जन्मदिन के लिए फ्रैंक को एक डायरी तोहफे के रूप में मिली। हालांकि यह एक ऑटोग्राफ बुक थी, जो लाल और सफेद चेक वाले कपड़े के साथ बंधी हुई थी और सामने की तरफ एक छोटा ताला था, फ्रैंक ने फैसला किया कि वह इसे एक डायरी के रूप में इस्तेमाल करेगी, और उसने लगभग तुरंत ही लिखना शुरू कर दिया। 20 जून 1942 की अपनी प्रविष्टि में, वह डच यहूदी आबादी के जीवन पर नाज़िओं और हिटलर की सेनाओं द्वारा लगाए गए कई प्रतिबंधों को सूचीबद्ध करती है।

सन 1947 में सबसे पहले “डायरी के पन्ने” किताब डच भाषा में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद सन 1952 में यह डायरी “द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल” नामक शीर्षक से दुबारा अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। और हिन्दी के इस पाठ के अनुवादक सूरज प्रकाश हैं।

इस डायरी की खासियत यह है कि इस डायरी की लेखिका ऐन फ्रैंक ने हिटलर के अत्याचारों व द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के परिणामों को खुद देखा व झेला भी। उन्हें बहुत छोटी सी उम्र में इतिहास के सबसे खौफनाक व दर्दनाक अनुभव से गुजरना पड़ा।

ऐन फ्रैंक ने अपनी आप बीती को एक डायरी के माध्यम से पूरी दुनिया के लोगों तक पहुंचाया। धीरे-धीरे यह डायरी दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी जानी वाली किताबों की सूची में शामिल हो गई।

द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-40) के समय नीदरलैंड के यहूदी परिवारों पर हिटलर के अत्याचार बढ़ गये थे। उसने गैस चैंबर व फायरिंग स्क्वायड के माध्यम से लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया। इसीलिए यहूदी परिवार गुप्तस्थानों में छिप कर अपने जीवन की रक्षा करने को बाध्य हुए।

यह कहानी दो परिवारों (फ्रैंक परिवार और वान दान परिवार) की है जिन्होंने लगभग दो वर्ष का समय अज्ञातवास में एकसाथ छुपकर बिताया था। ऐन फ्रैंक ने अज्ञातवास के उन्हीं दो वर्षों की अपनी दिनचर्या व जीवन के अन्य पहलूओं के बारे में इस डायरी में वर्णन किया हैं। मिस्टर वान दान, ऐन फ्रैंक के पिता के बिजनेस पार्टनर व अच्छे दोस्त थे।

यह डायरी 2 जून 1942 से लेकर 1 अगस्त 1944 तक लिखी गई है। 4 अगस्त 1944 को किसी की सूचना पर इन लोगों को नाजी पुलिस ने पकड़ लिया और 1945 में ऐन फ्रैंक की अकाल मृत्यु हो गई । यहाँ पर डायरी के कुछ अंशों को ही दिया गया हैं।

Diary Ke Panne Class 12 Summary

ऐन फ्रैंक ने अपनी “किट्टी” नाम की गुड़िया को संबोधित करते हुए यह पूरी डायरी लिखी है। यह डायरी उसे उसके तेरहवें जन्मदिन पर उपहार स्वरूप मिली थी।

डायरी का पहला पन्ना

बुधवार, 8 जुलाई 1942

अपनी डायरी के पहले पन्ने में किट्टी को संबोधित करते हुए ऐन फ्रैंक कहती हैं कि प्यारी किट्टी, रविवार को दोपहर 3 बजे उनकी सोलह वर्षीय बड़ी बहन मार्गोट को ए.एस.एस. से बुलावा आया था और उन्हें यातना शिविर में बुलाया गया था। और यह तो सभी लोग जानते हैं कि यातना शिविर में यहूदियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता हैं।

बस उस समय से ही हमारे जीवन में उथल पुथल मची हुई थी और अब हमें अपने घर में ही एक -एक पल काटना भारी लग रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे डच सैनिक कभी भी आकर मार्गोट को ले जा सकते हैं।

पहले हमारी योजना 16 जुलाई को अज्ञातवास में जाने की थी। लेकिन अब हम जल्दी से जल्दी अपना घर छोड़कर अज्ञातवास में जाना चाहते थे। मिस्टर वान दान का परिवार भी हमारे साथ गुप्त आवास में आना चाहता था।

इसीलिए हम दोनों परिवारों के सातों लोगों (ऐन, ऐन के माता–पिता, बड़ी बहन मार्गोट, मिस्टर वान दान दंपत्ति, उनका बेटा पीटर) ने अपना–अपना जरूरी सामान समेटकर गुप्त आवास में जाने की तैयारी की। मिस्टर डसेल बाद में हमारे साथ रहने आये।

ऐन फ्रैंक ने अपने थैले में एक डायरी , कर्लर , स्कूली किताबें , रुमाल और कुछ पुरानी चिठ्ठ्यों आदि भर ली क्योंकि लेखिका के लिए स्मृतियां, पोशाकों (कपड़ों) की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण थी। वो अज्ञातवास जाने के ख्याल से ही आतंकित थी। 9 जुलाई 1942 की सुबह वो अज्ञातवास को चल पड़े। 

गुरुवार, 9 जुलाई 1942

गुरुवार, 9 जुलाई 1942 को वो सभी लोग सामान से भरे अपने बड़े-बड़े थैलों को कंधों पर उठाये अज्ञातवास पर अपने नये गुप्त आवास की तरफ चल पड़े। उनके सीने पर चमकता हुआ पीला सितारा लगा हुआ था जो लोगों को उनकी व्यथा के बारे में बता रहा था। दरअसल हिटलर के शाशनकाल में यहूदियों को अपनी पहचान बताने के लिए सीने में पीला सितारा लगाना आवश्यक था।

उनका नया घर उनके पिता के ऑफिस की ही इमारत में था । यह भवन गोदाम व भंडार घर के रूप में प्रयोग किया जाता था। यहां इलाइची, लोंग और काली मिर्च वगैरह पीसी जाती थी। इसके बाद वो अपने नए घर का पूरा खाका अपने पत्र में देती हैं कि कमरे, सीढ़ियां व दरवाजे कहाँ–कहाँ हैं। कहाँ क्या काम होता हैं और उन्हें कौन से कमरे में रहना है।

शुक्रवार, 10 जुलाई 1942

डायरी के इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि नए घर में पहुँचने के बाद उनका पहला व दूसरा दिन यानि सोमवार व मंगलवार का पूरा दिन नए घर में सामान व्यवस्थित करने में ही बीत गया। उनकी मां और बड़ी बहन बुरी तरह से थक गई थी मगर वो अपने पिता के साथ अपने नए घर को व्यवस्थित करने में लगी रही जिस कारण वह भी बुरी तरह से थक गई।

ऐन फ्रैंक कहती हैं कि बुधवार तक तो उन्हें यह सोचने की फुर्सत नहीं थी कि उनकी जिंदगी में कितना बड़ा परिवर्तन आ चुका है।

शनिवार, 28 नवंबर 1942

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि हम अपने नये घर में बिजली व राशन कुछ ज्यादा ही खर्च कर रहे हैं। उन्हें इन दोनों को किफायत से चलाना होगा वरना मुसीबत हो सकती हैं।

शाम 4:30 बजे अंधेरा हो जाता है मगर अज्ञातवास में होने के कारण वो रात में बिजली नही जला सकते हैं क्योंकि बिजली देखकर पड़ोसियों को उनके वहां होने का पता चल जायेगा। इसलिए वो रात को पढ़ भी नहीं सकती हैं। ऐसे में वो अन्य कामों को करने में अपना समय बिताने की कोशिश करती है।

ऐन फ्रैंक कहती हैं कि दिन में वो परदा हटा कर बाहर भी नहीं देख सकती हैं। इसीलिए उन्होंने रात में दूरबीन से पड़ोसियों के घरों में ताक झाँक कर अपना वक्त गुजारने का एक नया तरीका खोजा लिया हैं।

यहाँ पर लेखिका मिस्टर डसेल के बारे में बताती हैं कि वो बच्चों से बहुत प्यार करते हैं लेकिन कभी -कभी वो उनके भाषण सुन–सुन के बोर हो जाती हैं क्योंकि वो हर समय अनुशासन संबंधी बातें ही करते हैं। वो थोड़े चुगलखोर टाइप के भी है जो उनकी सारी बातें उनके मम्मी पापा को बता देते हैं। उन्हें बार–बार उनकी बुराइयों व कमियों के बारे में बताया जाता हैं जो उन्हें बुरा लगता हैं।

ऐन फ्रैंक कहती हैं कि मीन मेख निकालने वाले परिवार में अगर आप केंद में हों और हर तरफ से आपको दुत्कारा या फटकारा जाय तो, इसे झेलना आसान नहीं होता हैं।

लेकिन रात में बिस्तर पर लेटकर मैं अपने पापों, कमियों व कार्यों के बारे में सोचती रहती हूँ। मुझे अपने आप पर हंसना और रोना, दोनों आता है। यहाँ पर लेखिका खुद अपना आंकलन करती हैं जो उन्हें अपनी उम्र से कही अधिक परिवक्व बनता हैं।

शुक्रवार, 19 मार्च 1943

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि टर्की इंग्लैंड के पक्ष में हैं , यह खबर फैल रही हैं। हजार गिल्डर के नोट अवैध मुद्रा घोषित हो गई हैं जो कालाबाजारी करने वालों के लिए बहुत बड़ा झटका हैं। साथ ही भूमिगत लोगों के लिए भी यह चिंता की बात हैं क्योंकि अब उनको भी इसके स्रोत का सबूत देना पड़ेगा।

लेखिका घायल सैनिक व हिटलर के बीच की बातचीत को रेडियो में सुनती है। घायल सैनिक अपने जख्मों को दिखाते हुए गर्व महसूस कर रहे थे।

शुक्रवार, 23 जनवरी 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि पिछले कुछ हफ्तों से उन्हें परिवार के वंश वृक्ष और राजसी परिवारों की वंशावली तालिकाओं में खासी रूची हो गई है। वो बड़ी मेहनत से अपने स्कूल का काम करती हैं और रेडियो पर बी.बी.सी. की होम सर्विस को भी समझती है। वो रविवार को अपने प्रिय फिल्मी कलाकारों की तस्वीरें देखने में गुजारती हैं।

हर सोमवार मिस्टर कुगलर उनके लिए “सिनेमा एंड थियेटर” की एक पत्रिका लाते हैं। हालाँकि परिवार के लोग इसे पैसे की बर्बादी मानते हैं। वो रोज नई-नई केश सज्जा बनाकर आती है तो सभी लोग उनका मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि वो अमुक फिल्म स्टार की नकल कर रही है जिससे उनका मन आहत होता हैं।

बुधवार, 28 जनवरी 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि हर दिन घर के आठ लोग अपनी वही पुरानी कहानी एक – दूसरे को सुनाते हैं जिसे सुनकर अब वो बोर हो चुकी हैं। नया सुनने व बोलने को कुछ नहीं हैं । इस बात से उनके मन की धुटन का पता चलता हैं।

बुधवार, 29 मार्च 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि कैबिनेट मंत्री मिस्टर बोल्के स्टीन ने लंदन से डच प्रसारण में कहा हैं कि युद्ध के बाद युद्ध का वर्णन करने वाली डायरी व पत्रों का संग्रह कर लिया जाएगा । यह खबर आते ही सबने उनकी डायरी को पढ़ना चाहा। लेकिन वो इस प्रसारण के बाद बहुत गंभीरता से अपनी डायरी में हर बात लिखने लगी।

ऐन फ्रैंक अपनी डायरी को एक ऐसे शीर्षक के साथ छपवाने की बात करती है जिससे लोग उनकी कहानी को जासूसी कहानी समझेंगे । वो कहती हैं कि युद्ध के दस साल बाद लोग आश्चर्य चकित रह जायेंगे जब उन्हें पता चलेगा कि यहूदियों ने अज्ञातवास में कैसी जिंदगी बिताई।

बम गिरते समय औरतें कैसे डर जाती थी आदि । वो आगे बताती हैं कि सामान खरीदने के लिए घंटो लाइन में लगना पड़ता है। चोरी – चकारी की धटनाएँ काफी बढ़ गई हैं। 

मंगलवार, 11 अप्रैल 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि शनिवार 2 बजे के आसपास गोलाबारी हुई थी। रविवार दोपहर उन्होंने अपने दोस्त पीटर को बुलाया। पीटर के आने के बाद उन्होंने काफी देर बातें की। दोनों ने मिलकर मिस्टर डसेल को परेशान करने की योजना बनायी।

उसी रात, उनके घर में सेंधमारी की घटना भी हुई जिसे वो गुप्त आवास में रहने की मजबूरी के कारण किसी को नही बता सकते थे। मगर इस धटना ने सभी लोगों को अंदर से हिला कर रख दिया।

मंगलवार, 13 जून 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि आज वो 15 वर्ष की हो गई है और उन्हें उपहार स्वरूप पुस्तकें, जैम की शीशी, बिस्कुट, सोने का ब्रेसलेट, मिठाइयां, लिखने की कॉपियां मिली है और पीटर ने उन्हें एक फूलों का गुलदस्ता भेंट किया।

मौसम खराब है और हमले जारी हैं । वो बताती है कि चर्चिल उन फ्रांसीसी गांवों में गए थे जो अभी अभी ब्रिटिश कब्जे से मुक्त हुए है। चर्चिल को डर नहीं लगता है। वो उन्हें जन्मजात बहादुर कहती हैं। ब्रिटिश सैनिक अपने मकसद में लगे हैं और हालैंड वासी सिर्फ अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे।

वो आगे कहती है कि वान दान व मिस्टर डसेल उन्हें धमंडी, अक्खड़ समझते हैं, मूर्ख समझते हैं। वो भी उन्हें मूर्खाधिराज कहती हैं। उन्होंने यहां पर अपने मन की बात लिखी हैं कि उन्हें कोई भी ढंग से नहीं समझता हैं और वो अपनी भावनाओं को गंभीरता से समझने वाले व्यक्ति की तलाश में हैं।

वो पीटर के बारे में बताती है कि पीटर उसे दोस्त की तरह प्यार करता है मगर वह उसकी दीवानी है। उसके लिए तड़पती है। पीटर अच्छा और भला लड़का है परंतु वो उसके धार्मिक तथा खाने संबंधी बातों से नफरत करती है। वह शांतिप्रिय, सहनशील और बेहद आत्मीय व्यक्ति है। वह ऐन की गलत बातों को भी सहन करता है। वह बहुत अधिक घुन्ना है। वो दोनों भविष्य, वर्तमान और अतीत की बातें किया करते थे ।

ऐन फ्रैंक आगे कहती है कि काफी दिनों से वो बाहर नहीं निकली है। इसलिए वो प्रकृति को देखना चाहती है। एक दिन गर्मी की रात उन्हें चांद देखने की इच्छा हुई मगर चांदनी अधिक होने के कारण वो खिड़की नहीं खोल सकी। आखिरकार बरसात के समय खिड़की खोल कर बादलों की लुकाछिपी देखने का अवसर भी उन्हें डेढ़ साल बाद मिला।

वो कहती है कि प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेने के लिए अस्पताल व जेलों में बंद लोग तरसते हैं। आसमान, बादलों, चांद–तारों को देख कर उसे शांति और आशा मिलती है। प्रकृति शांति पाने की रामबाण दवा है। वह हमें विनम्रता प्रदान करती है।

Watch Video: Diary Ke Panne Class 12th Summary

ऐन फ्रैंक कहती है कि “मौत के खिलाफ मनुष्य” किताब में उन्होंने पढ़ा था कि युद्ध में एक सैनिक को जितनी तकलीफ, पीड़ा और यंत्रणा से गुजरना पड़ता है उससे कहीं अधिक यातना और तकलीफ तो औरत बच्चा पैदा करने वक्त सहन करती है।

बच्चा पैदा करने के बाद औरत का आकर्षण समाप्त हो जाता है मगर फिर भी औरत मानव जाति की निरंतरता को बनाये रखती है । ऐन कहती है कि महिलाओं को भी एक बहादुर सैनिक के जैसे ही दर्जा व सम्मान मिलना चाहिए।

पुरुषों और महिलाओं के अधिकारों के बारे में वो कहती हैं कि उसे लगता है कि पुरुषों की शारीरिक क्षमता अधिक होती हैं जिस वजह से उन्होंने शुरू से ही महिलाओं पर शासन किया है। लेकिन अब समय बदल गया है। शिक्षा और प्रगति ने महिलाओं की आंखें खोल दी हैं। कई देशों ने महिलाओं को बराबरी का हक दिया है। आधुनिक महिलाओं, समाज में अपनी बराबरी चाहती हैं।

इसका ये कतई मतलब नहीं कि औरतों को बच्चे पैदा करना, बंद कर देना चाहिए। यह प्रकृति का कार्य है और उसे यह कार्य करते रहना चाहिए। संसार के जिस हिस्से में हम रहते हैं वहां जन्म अनिवार्य है। यह टाला न जा सकने वाला काम है।

इसीलिए महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही सम्मान मिलना चाहिए। वो उन व्यक्तियों की भर्त्सना करती है जो समाज में महिलाओं के योगदान को मानने के लिए तैयार नहीं है।

अंत में ऐन फ्रैंक विश्वास जताती है कि अगली सदी तक यह मान्यता बदल चुकी होगी कि सिर्फ बच्चे पैदा करना ही औरतों का काम हैं । औरतें ज्यादा सम्मान और सराहना की हकदार बनेगी।

Diary Ke Panne Class 12 Question Answers

डायरी के पन्ने प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: ऐन-फ्रैंक का परिवार सुरक्षित स्थान पर जाने से पहले किस मनोदशा से गुज़र रहा था और क्यों? ऐसी ही परिस्थितियों से आपको दो-चार होना पड़े तो आप क्या करेंगे?

उत्तर: द्रवितीय विश्व-युद्ध के समय हॉलैंड के यहूदी परिवारों को जर्मनी के प्रभाव के कारण बहुत सारी अमानवीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। लोग अपनी जान बचाने के लिए परेशान थे। ऐसे कठिन समय में जब ऐन फ्रैंक के पिता को ए०एस०ए० के मुख्यालय से बुलावा आया तो वहाँ के यातना शिविरों और काल-कोठरियों के दृश्य उन लोगों की आँखों के सामने तैर गए। ऐन फ्रैंक और उसका परिवार घर के किसी सदस्य को नियति के भरोसे छोड़ने के पक्ष में न था। वे सुरक्षित और गुप्त स्थान पर जाकर जर्मनी के शासकों के अत्याचार से बचना चाहते थे। उस समय ऐन के पिता यहूदी अस्पताल में किसी को देखने गए थे। उनके आने की प्रतीक्षा की घड़ियाँ लंबी होती जा रही थीं।

दरवाजे की घंटी बजते ही लगता था कि पता नहीं कौन आया होगा। वे भय एवं आतंक के डर से दरवाजा खोलने से पूर्व तय कर लेना चाहते थे कि कौन आया है? वे घंटी बजते ही दरवाजे से उचककर देखने का प्रयास करते कि पापा आ गए कि नहीं। इस प्रकार ऐन फ्रैंक का परिवार चिंता, भय और आतंक के साये में जी रहा था। यदि ऐसी ही परिस्थितियों से हमें दो-चार होना पड़ता तो मैं अपने परिवार वालों के साथ उस अचानक आई आपदा पर विचार करता और बड़ों की राय मानकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने का प्रयास करता। इस बीच सभी से धैर्य और साहस बनाए रखने का भी अनुरोध करता।

प्रश्न 2: हिटलर ने यहूदियों को जातीय आधार पर निशाना बनाया। उसके इस कृत्य को आप कितना अनुचित मानते हैं? इस तरह का कृत्य मानवता पर क्या असर छोड़ता है? उसे रोकने के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?

उत्तर: हिटलर जर्मनी का क्रूर एवं अत्याचारी शासक था। उसने जर्मनी के यहूदियों को जातीयता के आधार पर निशाना बनाया। किसी जाति-विशेष को जातीय कारणों से ही निशाना बनाना अत्यंत निंदनीय कृत्य है। यह मानवता के प्रति अपराध है। इस घृणित एवं अमानवीय कृत्य को हर दशा में रोका जाना चाहिए, भले ही इसे रोकने के लिए समाज को अपनी कुर्बानी देनी पड़े। हिटलर जैसे अत्याचारी शासक मनुष्यता के लिए घातक हैं। इन लोगों पर यदि समय रहते अंकुश न लगाया गया तो लाखों लोग असमय और अकारण मारे जा सकते हैं। उसका यह कार्य मानवता का विनाश कर सकता है। अत: उसे रोकने के लिए नैतिक-अनैतिक हर प्रकार के हथकंडों का सहारा लिया जाना चाहिए। इस प्रकार के अत्याचार को रोकने के लिए मैं निम्नलिखित सुझाव देना चाहूँगा।

  • पीड़ित लोगों के साथ समस्या पर विचार-विमर्श करना चाहिए।
  • हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हिंसा का जवाब हिंसा से देकर उसे शांत नहीं किया जा सकता, इसलिए इसका शांतिपूर्ण हल खोजने का प्रयास करना चाहिए।
  • अहिंसात्मक तरीके से काम न बनने पर ही हिंसा का मार्ग अपनाने के लिए लोगों से कहूँगा।
  • मैं लोगों से कहूँगा कि मृत्यु के डर से यूँ बैठने से अच्छा है, अत्याचारी लोगों से मुकाबला किया जाए। इसके लिए संगठित होकर मुकाबला करते हुए मुँहतोड़ जवाब देना चाहिए।
  • हिंसा के खिलाफ़ विश्व जनमत तैयार करने का प्रयास करूंगा ताकि विश्व हिटलर जैसे अत्याचारी लोगों के खिलाफ़ हो जाए और उसकी निंदा करते हुए उसके कुशासन का अंत करने में मदद करे।

प्रश्न 3: ऐन फ्रैंक ने यातना भरे अज्ञातवास के दिनों के अनुभव को डायरी में किस प्रकार व्यक्त किया है? आपके विचार से लोग डायरी क्यों लिखते हैं?

उत्तर: द्रवितीय विश्व-युद्ध के समय जर्मनी ने यहूदी परिवारों को अकल्पनीय यातना सहन करनी पड़ी। उन्होंने उन दिनों नारकीय जीवन बिताया। वे अपनी जान बचाने के लिए छिपते फिरते रहे। ऐसे समय में दो यहूदी परिवारों को गुप्त आवास में छिपकर जीवन बिताना पड़ा। इन्हीं में से एक ऐन फ्रैंक का परिवार था। मुसीबत के इस समय में फ्रैंक के ऑफ़िस में काम करने वाले इसाई कर्मचारियों ने भरपूर मदद की थी। ऐन फ्रैंक ने गुप्त आवास में बिताए दो वर्षों के समय के जीवन को अपनी डायरी में लिपिबद्ध किया है। फ्रैंक की इस डायरी में भय, आतंक, भूख, प्यास, मानवीय संवेदनाएँ, घृणा, प्रेम, बढ़ती उम्र की पीड़ा, पकड़े जाने का डर, हवाई हमले का डर, बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहकर जीने की पीड़ा, युद्ध की भयावह पीड़ा और अकेले जीने की व्यथा है।

इसके अलावा इसमें यहूदियों पर ढाए गए जुल्म और अत्याचार का वर्णन किया गया है। मेरे विचार से लोग डायरी इसलिए लिखते हैं क्योंकि जब उनके मन के भाव-विचार इतने प्रबल हो जाते हैं कि उन्हें दबाना कठिन हो जाता है और वे किसी कारण से दूसरे लोगों से मौखिक रूप में उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाते तब वे एकांत में उन्हें लिपिबद्ध करते हैं। वे अपने दुख-सुख, व्यथा, उद्वेग आदि लिखने के लिए प्रेरित होते हैं। उस समय तो वे अपने दुख की अभिव्यक्ति और मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए लिखते हैं पर बाद में ये डायरियाँ महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती हैं।

प्रश्न 4: ‘डायरी के पन्ने’ की युवा लेखिका ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में किस प्रकार दवितीय विश्व-युद्ध में यहूदियों के उत्पीड़न को झेला? उसका जीवन किस प्रकार आपको भी डायरी लिखने की प्रेरणा देता है, लिखिए।

उत्तर: ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में इतिहास के सबसे दर्दनाक और भयप्रद अनुभव का वर्णन किया है। यह अनुभव उसने और उसके परिवार ने तब झेला जब हॉलैंड के यहूदी परिवारों को जर्मनी के प्रभाव के कारण अकल्पनीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। ऐन और उसके परिवार के अलावा एक अन्य यहूदी परिवार ने गुप्त तहखाने में दो वर्ष से अधिक समय का अज्ञातवास बिताते हुए जीवन-रक्षा की। ऐन ने लिखा है कि 8 जुलाई, 1942 को उसकी बहन को ए०एस०एस० से बुलावा आया, जिसके बाद सभी गुप्त रूप से रहने की योजना बनाने लगे।

यह उनके जीवन कर । दिन में घर के परदे हटाकर बाहर नहीं देख सकते थे। रात होने पर ही वे अपने आस-पास के परदे देख सकते थे। वे ऊल-जुलूल हरकतें करके दिन बिताने पर विवश थे। ऐन ने पूरे डेढ़ वर्ष बाद रात में खिड़की खोलकर बादलों से लुका-छिपी करते हुए चाँद को देखा था। 4 अगस्त, 1944 को किसी की सूचना पर ये लोग पकड़े गए। सन 1945 में ऐन की अकाल मृत्यु हो गई। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों के उत्पीड़न को झेला। ऐन फ्रैंक का जीवन हमें साहस बनाए रखते हुए जीने की प्रेरणा देता है और प्रेरित करता है कि अपने जीवन और आस-पास की घटनाओं को हम लिपिबद्ध करें।

प्रश्न 4: डायरी के पन्ने पाठ में मि. डसेल एवं पीटर का नाम कई बार आया है। इन दोनों का विवरणात्मक परिचय दें।

उत्तर:  मि. डसेल-ऐन के पिता के साथ काम करते थे। वे ऐन व परिवार के साथ अज्ञातवास में रहे थे। डसेल उबाऊ लंबे-लंबे भाषण देते थे और अपने जमाने के किस्से सुनाते रहते थे। ऐन को अक्सर डाँटते थे । वे चुगलखोर थे और ऐन की मम्मी से ऐन की सच्ची-झूठी शिकायतें करते थे ।

पीटर- मिस्टर और मिसेज वानदान का बेटा था |वह ऐन का हमउम्र था। ऐन का उसके प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था और वह यह मानने लगी थी कि वह उससे प्रेम करती है। ऐन के जन्मदिन पर पीटर ने उसे फूलों का गुलदस्ता भेंट किया था| किंतु पीटर सबके सामने प्रेम उजागर करने से डरता था| वह साधारणतया शांतिप्रिय, सहज व आत्मीय व्यवहार करने वाला था।

प्रश्न 5: किट्टी कौन थी? ऐन फ्रैंक ने किट्टी को संबोधित कर डायरी क्यों लिखी?

उत्तर: ‘किट्टी’ ऐन फ्रैंक की गुड़िया थी। गुड़िया को मित्र की भाँति संबोधित करने से गोपनीयता भंग होने का डर न था।अन्यथा नाजियों द्वारा अत्याचार बढ़ने का डर व उन्हें अज्ञातवास का पता लग सकता था।| ऐन ने स्वयं (एक तेरह वर्षीय किशोरी) के मन की बेचैनी को भी व्यक्त करने का ज़रिया किट्टी को बनाया |वह हृदय में उठ रही कई भावनाओं को दूसरों के साथ बाँटना चाहती थी किंतु अज्ञातवास में उसके लिए किसी के पास समय नहीं था| मिस्टर डसेल की ड़ाँट-फटकार ओर उबाऊ भाषण, दूसरों के द्वारा उसके बारे में सुनकर मम्मी (मिसेज फ्रैंक) का उसेड़ाँटना ओर उस पर अविश्वास करना, बड़ों का उसे लापरवाह और तुनकमिजाज मानना और उसे छोटी समझकर उसके विचारों को महत्त्व न देना , उसके ह्रदय को कचोटता था |अतः उसने किट्टी को अपना हमराज़ बनाकर डायरी में उसे ही संबोधित किया|

प्रश्न 6: ‘ऐन फ्रैंक की डायरी यहूदियों पर हुए जुल्मों का जीवंत दस्तावेज है’पाठ के आधार पर यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विवरण दें।

उत्तर: हिटलर की नाजी सेना ने यहूदियों को कैद कर यातना शिविरों में डालकर यातनाएँ दी। उन्हें गैस चैंबर में डालकर मौत के घाट उतार दिया जाता था। कई यहूदी भयग्रस्तहोकर अज्ञातवास मेंचले गए जहाँ उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में जीना पड़ा| अज्ञातवास में उन्हें सेन्धमारों से भी निबटना पड़ा।। उनकी यहूदी संस्कृति को भी कुचल डाला गया।

प्रश्न 7: ‘डायरी के पन्ने’ पाठ किस पुस्तक से लिया गया है? वह कब प्रकाशित हुई? किसने प्रकाशित कराई?

उत्तर: यह पाठ ऐनफ्रैंक द्वारा डच भाषा में लिखी गई ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ नामक पुस्तक से लिया गया है। यह 1947 में ऐन फ्रैंक की मृत्यु के बाद उसके पिता मिस्टर ऑटो फ्रैंक ने प्रकाशित कराई।

बच्चों!

टेक्स्ट और वीडियो के माध्यम से पढ़ाया गया पाठ ‘डायरी के पन्ने’ आपको कैसा लगा?

हमें कमेंट करके अवश्य बताएं।

वीडियो को लाइक व शेयर करें, ताकि अन्य विद्यार्थियों तक भी यह वीडियो पहुंच सके।

हमारे YOUTUBE CHANNEL BHASHAGYAN को सब्स्क्राइब करना न भूलें।

———————

camere me band apahij

camere me band apahij

Watch Video

हैलो बच्चो आज हम कद्वाा 12वीं की पाठ्यपुस्तक

आरोह भाग-2 का कविता पढ़ेंगे

‘कैमरे में बंद अपाहिज’

बच्चों, सबसे पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

जीवन परिचय- रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील कवि हैं। इनका जन्म लखनऊ (उ०प्र०) में सन् 1929 में हुआ था। इनकी संपूर्ण शिक्षा लखनऊ में ही हुई। वहीं से इन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम०ए० किया। प्रारंभ में ये पेशे से पत्रकार थे। इन्होंने प्रतीक अखबार में सहायक संपादक के रूप में काम किया। फिर ये आकाशवाणी के समाचार विभाग में रहे। कुछ समय तक हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका कल्पना और उसके बाद दैनिक नवभारत टाइम्स तथा दिनमान से संबद्ध रहे। साहित्य-सेवा के कारण इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनका देहावसान सन 1990 में दिल्ली में हुआ।

रचनाएँ-

रघुवीर सहाय नई कविता के कवि हैं। इनकी कुछ आरंभिक कविताएँ अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक (1935) में प्रकाशित हुई।

इनके महत्वपूर्ण काव्य-संकलन हैं:-

सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो-हँसो जल्दी हँसी, लोग भूल गए हैं आदि।

काव्यगत विशेषताएँ:

रघुवीर सहाय ने अपने काव्य में आम आदमी की पीड़ा व्यक्त की है। ये साठोत्तरी काव्य-लेखन के सशक्त, प्रगतिशील व चेतना-संपन्न रचनाकार हैं। इन्होंने सड़क, चौराहा, दफ़्तर, अखबार, संसद, बस, रेल और बाजार की बेलौस भाषा में कविता लिखी।

घर-मोहल्ले के चरित्रों पर कविता लिखकर उन्हें हमारी चेतना का स्थायी नागरिक बनाया। इन्होंने कविता को एक कहानीपन और नाटकीय वैभव दिया।

रघुवीर सहाय ने बतौर पत्रकार और कवि घटनाओं में निहित विडंबना और त्रासदी को देखा। इन्होंने छोटे की महत्ता को स्वीकारा और उन लोगों व उनके अनुभवों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया जिन्हें समाज में हाशिए पर रखा जाता है। इन्होंने भारतीय समाज में ताकतवरों की बढ़ती हैसियत व सत्ता के खिलाफ़ भी साहित्य और पत्रकारिता के पाठकों का ध्यान खींचा।

भाषा-शैली- रघुवीर सहाय ने अधिकतर बातचीत की शैली में लिखा। ये अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बचते रहे हैं।

कविता का प्रतिपादय एवं सार

प्रतिपादय:

‘कैमरे में बंद अपाहिज’  कविता को  ‘लोग भूल गए हैं’ काव्य-संग्रह से लिया गया है। इस कविता में कवि ने शारीरिक चुनौती को झेल रहे व्यक्ति की पीड़ा के साथ-साथ दूर-संचार माध्यमों के चरित्र को भी रेखांकित किया है। किसी की पीड़ा को दर्शक वर्ग तक पहुँचाने वाले व्यक्ति को उस पीड़ा के प्रति स्वयं संवेदनशील होने और दूसरों को संवेदनशील बनाने का दावेदार होना चाहिए। आज विडंबना यह है कि जब पीड़ा को परदे पर उभारने का प्रयास किया जाता है तो कारोबारी दबाव के तहत प्रस्तुतकर्ता का रवैया संवेदनहीन हो जाता है। यह कविता टेलीविजन स्टूडियो के भीतर की दुनिया को समाज के सामने प्रकट करती है। साथ ही उन सभी व्यक्तियों की तरफ इशारा करती है जो दुख-दर्द, यातना-वेदना आदि को बेचना चाहते हैं।

सार:

इस कविता में दूरदर्शन के संचालक स्वयं को शक्तिशाली बताते हैं तथा दूसरे को कमजोर मानते हैं। वे विकलांग से पूछते हैं कि क्या आप अपाहिज हैं? आप अपाहिज क्यों हैं? आपको इससे क्या दुख होता है? ऊपर से वह दुख भी जल्दी बताइए क्योंकि समय नहीं है। प्रश्नकर्ता इन सभी प्रश्नों के उत्तर अपने हिसाब से चाहता है। इतने प्रश्नों से विकलांग घबरा जाता है। प्रश्नकर्ता अपने कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए उसे रुलाने की कोशिश करता है ताकि दर्शकों में करुणा का भाव जाग सके। इसी से उसका उद्देश्य पूरा होगा। वह इसे सामाजिक उद्देश्य कहता है, परंतु ‘परदे पर वक्त की कीमत है’ वाक्य से उसके व्यापार की प्रोल खुल जाती है।

व्याख्या

1.

हम दूरदर्शन पर बोलेंगे

हम् समर्थ शक्तिवान

हम एक दुर्बल को लाएँगे

एक बंद कमरे में  

उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?

तो आप क्यों अपाहिज हैं?

आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा

देता है?

(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा-बड़ा)

हाँ तो बताइए आपका दुख क्या हैं

जल्दी बताइए वह दुख बताइए

बता नहीं पाएगा।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। कवि का मानना है कि मीडिया वाले दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।

व्याख्या: कवि मीडिया के लोगों की मानसिकता का वर्णन करता है। मीडिया के लोग स्वयं को समर्थ व शक्तिशाली मानते हैं। वे ही दूरदर्शन पर बोलते हैं। अब वे एक बंद कमरे अर्थात स्टूडियो में एक कमजोर व्यक्ति को बुलाएँगे तथा उससे प्रश्न पूछेगे। क्या आप अपाहिज हैं? यदि हैं तो आप क्यों अपाहिज हैं? क्या आपका अपाहिजपन आपको दुख देता है? ये प्रश्न इतने बेतुके हैं कि अपाहिज इनका उत्तर नहीं दे पाएगा, जिसकी वजह से वह चुप रहेगा। इस बीच प्रश्नकर्ता कैमरे वाले को निर्देश देता है कि इसको (अपाहिज को) स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा दिखाओ। फिर उससे प्रश्न पूछा जाएगा कि आपको कष्ट क्या है? अपने दुख को जल्दी बताइए। अपाहिज इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा क्योंकि ये प्रश्न उसका मजाक उड़ाते हैं।

विशेष:

1. मीडिया की मानसिकता पर करारा व्यंग्य है।

2. काव्यांश में नाटकीयता है।

3. भाषा सहज व सरल है।

4. व्यंजना शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है।

सोचिए

बताइए

थोड़ी कोशिश करिए

(यह अवसर खो देंगे?)

आप जानते हैं कि कायक्रम रोचक बनाने के वास्ते

हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे

इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का

करते हैं

(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। कवि का कहना है कि मीडिया के लोग किसी-न-किसी तरह से दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।

व्याख्या: इस काव्यांश में कवि कहता है कि मीडिया के लोग अपाहिज से बेतुके सवाल करते हैं। वे अपाहिज से पूछते हैं कि-अपाहिज होकर आपको कैसा लगता है? यह बात सोचकर बताइए। यदि वह नहीं बता पाता तो वे स्वयं ही उत्तर देने की कोशिश करते हैं। वे इशारे करके बताते हैं कि क्या उन्हें ऐसा महसूस होता है।

थोड़ा सोचकर और कोशिश करके बताइए। यदि आप इस समय नहीं बता पाएँगे तो सुनहरा अवसर खो देंगे। अपाहिज के पास इससे बढ़िया मौका नहीं हो सकता कि वह अपनी पीड़ा समाज के सामने रख सके। मीडिया वाले कहते हैं कि हमारा लक्ष्य अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना है और इसके लिए हम ऐसे प्रश्न पूछेगे कि वह रोने लगेगा। वे समाज पर भी कटाक्ष करते हैं कि वे भी उसके रोने का इंतजार करते हैं। वह यह प्रश्न दर्शकों से नहीं पूछेगा।

विशेष:

1. कवि ने क्षीण होती मानवीय संवेदना का चित्रण किया है।

2. दूरदर्शन के कार्यक्रम निर्माताओं पर करारा व्यंग्य है।

3. काव्य-रचना में नाटकीयता तथा व्यंग्य है।

4. सरल एवं भावानुकूल खड़ी बोली में सहज अभिव्यक्ति है।

5. अनुप्रास व प्रश्न अलंकार हैं।

6. मुक्तक छंद है।

फिर हम परदे पर दिखलाएंगे

फुल हुई आँख काँ एक बडी तसवीर

बहुत बड़ी तसवीर

और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी

(आशा हैं आप उसे उसकी अय-गता की पीड़ा मानेंगे) 

एक और कोशिश

दर्शक

धीरज रखिए

देखिए

हमें दोनों को एक सा रुलाने हैं

आप और वह दोनों

(कैमरा बस् करो नहीं हुआ रहने दो परदे पर वक्त की कीमत है)

अब मुसकुराएँगे हम

आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम

(बस थोड़ी ही कसर रह गई)

धन्यवाद।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। उसने यह बताने का प्रयत्न किया है कि मीडिया के लोग किस प्रकार से दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।”

व्याख्या: कवि कहता है कि दूरदर्शन वाले अपाहिज का मानसिक शोषण करते हैं। वे उसकी फूली हुई आँखों की तसवीर को बड़ा करके परदे पर दिखाएँगे। वे उसके होंठों पर होने वाली बेचैनी और कुछ न बोल पाने की तड़प को भी दिखाएँगे। ऐसा करके वे दर्शकों को उसकी पीड़ा बताने की कोशिश करेंगे। वे कोशिश करते हैं कि वह रोने लगे। साक्षात्कार लेने वाले दर्शकों को धैर्य धारण करने के लिए कहते हैं।

वे दर्शकों व अपाहिज दोनों को एक साथ रुलाने की कोशिश करते हैं। तभी वे निर्देश देते हैं कि अब कैमरा बंद कर दो। यदि अपाहिज अपना दर्द पूर्णत: व्यक्त न कर पाया तो कोई बात नहीं। परदे का समय बहुत महँगा है। इस कार्यक्रम के बंद होते ही दूरदर्शन में कार्यरत सभी लोग मुस्कराते हैं और यह घोषणा करते हैं कि आप सभी दर्शक सामाजिक उद्देश्य से भरपूर कार्यक्रम देख रहे थे। इसमें थोड़ी-सी कमी यह रह गई कि हम आप दोनों को एक साथ रुला नहीं पाए। फिर भी यह कार्यक्रम देखने के लिए आप सबका धन्यवाद!

विशेष:

1. अपाहिज की बेचैनी तथा मीडिया व दर्शकों की संवेदनहीनता को दर्शाया गया है।

2. मुक्त छंद है।

3. उर्दू शब्दावली का सहज प्रयोग है।

4. ‘परदे पर’ में अनुप्रास अलंकार है।

5. व्यंग्यपूर्ण नाटकीयता है।

IMPORTANT QUESTIONS (MCQs)

1-  रघुवीर सहाय का जन्म कब हुआ ?

A- 1980

B- 1970

C- 1933

D- 1929 

Ans- D

2-  रघुवीर सहाय का निधन कब हुआ  ?

A- 1980

B- 1988

C- 1971

D- 1990 

Ans- D

3- कैमरे में बंद कविता में कवि ने किसका चित्रण किया है ?

A- अपाहिज का

B- रोगी का

C- भगत जी का

D- इनमे से कोई नहीं

Ans- A

4- रघुवीर सहाय का निधन कहाँ हुआ ?

A- कानपुर

B- बनारस

C- बिजनौर

D- दिल्ली 

Ans- D

5- कैमरों में बंद अपाहिज कविता कवि के किस काव्य संग्रह से ली गई है ?

A- लोग भूल गए हैं

B- सीढ़ियों पर धूप

C- A तथा B दोनों

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- A

6- कैमरे  में बंद अपाहिज कविता में हम दूरदर्शन पर क्या बोलेंगे ?

A- हम बलवान हैं

B- हम समर्थ और शक्तिवान हैं

C- हम कमज़ोर हैं

D- हम दुर्बल हैं

Ans- B

7- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में हम किस पर बोलेंगे ?

A- दूरदर्शन पर

B- मंच पर

C- घर पर

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- A

8- कैमरे में बंद अपाहिज किसकी रचना है ?

A- रघुवीर सहाय

B- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

C- महादेवी वर्मा

D- इनमे से कोई 

Ans- A

9- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में हम क्या है ?

A- दुर्बल

B- सशक्त

C- समर्थ

D- असमर्थ 

Ans- C

10- किसे कैमरे में बंद अपाहिज कविता में हम लाएंगे ?

A- बलवान को

B- दुर्बल को

C- नेता को

D- खिलाडी को 

Ans- B

11- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में दुर्बल को हम कहाँ ले जाएंगे ?

A- अस्पताल

B- स्टूडियो

C- बंद कमरे में

D- मैदान में 

Ans- C

12- रघुवीर सहाय का जन्म कहाँ हुआ ?

A- दिल्ली

B- कानपुर

C- महाराष्ट्र

D- लखनऊ

Ans- D

13- अपाहिज से दूरदर्शन कार्यक्रम संचालक किस प्रकार के प्रश्न पूछता हैं ?

A- कठिन

B- अर्थहीन

C- ज्ञान वर्धक

D- उपरोक्त सभी 

Ans- B

14- अपाहिज क्या नहीं बता पाएगा ?

A- अपनी कहानी

B- अपना दुःख

C- अपना सुख

D- अपनी जानकारी 

Ans- B

15- कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए अपाहिज को क्या करते हैं ?

A- नचा देते है

B- हंसा देते है

C- भगा देते हैं

D- रुला देते हैं 

Ans- D

16- पर्दे पर किस की कीमत है ?

A- मजाक की

B- कहानी की

C- अपाहिज की

D- वक़्त की 

Ans- D

17- कैमरे वाले परदे पर अपाहिज की क्या दिखाना चाहते हैं ?

A- मुस्कान

B- दुःख

C- जीभ

D- रोने से फूली आँखें 

Ans- D

18- प्रस्तुतकर्ता दर्शकों को क्या रखने के लिए अनुरोध करता है ?

A- धैर्य

B- प्यार

C- होंसला

D- शांति 

Ans- A

19- दूरदर्शन वाले किसकी संवेदना से खिलवाड़ कर रहे हैं ?

A- कैमरा वाले की

B- अपाहिज की

C- खुद की

D- दर्शकों की  

Ans- B

20- दूरदर्शन पर किस उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम दिखाया जा रहा था ?

A- प्रेम

B- सामाजिक

C- वैज्ञानिक

D- आर्थिक 

Ans- B

21- प्रस्तुतकर्ता ‘बस करो नहीं हुआ रहने दो’ क्यों कहता है ?

A- अपाहिज न रोए

B- अपाहिज और दर्शक न रोए

C- कैमरा खराब हो गया

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

22- कैमरे में बंद अपाहिज कविता किस पर व्यंग्य है ?

A- समाज पर

B- दूरदर्शन वालों पर

C- अमीरों पर

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

23- कैमरे वाले एक और कोशिश क्यों करना चाहते हैं ?

A- तस्वीर साफ़ दिखने के लिए

B- अपाहिज की अपंगता को उभारने के लिए

C- पैसे कमाने के लिए

D- इनमे से कोई नहीं  

Ans- B

24- कार्यक्रम को समाप्त करते हुए प्रस्तुतकर्ता क्या करेगा ?

A- रोते हुए धन्यवाद

B- मुस्कुराकर धन्यवाद

C- हंस कर धन्यवाद

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

25- अब मुस्कुराएँगे हम – इस पंक्ति में हम कौन है ?

A- दर्शक

B- समाज

C- अपाहिज

D- दूरदर्शन वाले 

Ans- D

26- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में समर्थ शक्तिवान किसे कहा जाता है ?

A- अपाहिज को

B- कैमरा वाले को

C- दर्शकों को

D- दूरदर्शन वालों को

Ans- D

27- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में फूली हुई आँख का क्या अर्थ है ?

A- आँख सूजना

B- आँख में चोट लगना

C- रोना

D- आंसुओं से भरी आँख 

Ans- D

28- कैमरे में बंद अपाहिज कविता में दूरदर्शन कर्मियों की किस मनोवृति को दर्शाया गया है ?

A- चंचल

B- अनुभवी

C- संवेदनहीनता

D- सहायक 

Ans- C

29- कैमरा वाला किन्हें साथ साथ रुलाना चाहता है ?

A- भाई बहन

B- दर्शक और अपाहिज

C- कर्मचारियों को

D- इनमे से कोई नहीं 

Ans- B

30- दूरदर्शन के लिए क्या आवश्यक है ?

A- आलोचना

B- हंसी

C- संवेदना

D- रोचक कार्यक्रम

Ans- D