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Gillu Class 9 Summary and Question Answers

Gillu Class 9 Summary and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

‘गिल्लू’

पाठ की लेखिका महादेवी वर्मा हैं।

This Post Includes

लेखिकाः महादेवी वर्मा

जन्मः 1907

मृत्युः 1987

पाठ प्रवेशः गिल्लू

इस पाठ में लेखिका ने अपने जीवन के एक अनुभव को हमारे साथ सांझा किया है। यहाँ लेखिका ने अपने जीवन के उस पड़ाव का वर्णन किया है जहाँ उन्होंने एक गिलहरी के बच्चे को कवों से बचाया था और उसे अपने घर में रखा था। लेखिका ने उस गिलहरी के बच्चे का नाम गिल्लू रखा था। यह पाठ उसी के इर्द-गिर्द घूम रहा है इसीलिए इस पाठ का नाम भी ‘गिल्लू’ ही रखा गया है। लेखिका ने जो भी समय गिल्लू के साथ बिताया उस का वर्णन लेखिका ने इस पाठ में किया है।

Summary Of Sanchyan Part 1 Chapter 1 Gillu

गिल्लू पाठ सार

इस पाठ में लेखिका ने अपने जीवन के उस पड़ाव का वर्णन किया है जहाँ उन्होंने एक गिलहरी के बच्चे को कौवे से बचाया था और उसे अपने घर में रखा था। लेखिका ने उस गिलहरी के बच्चे का नाम गिल्लू रखा था। लेखिका कहती है कि आज जूही के पौधे में कली निकल आई है जो पिले रंग की है। उस कली को देखकर लेखिका को उस छोटे से जीव की याद आ गई जो उस जूही के पौधे की हरियाली में छिपकर बैठा रहता था। परन्तु लेखिका कहती है कि अब तो वह छोटा जीव इस जूही के पौधे की जड़ में मिट्टी बन कर मिल गया होगा। क्योंकि अब वह मर चुका है और लेखिका ने उसे जूही के पौधे की जड़ में दबा दिया था।

लेखिका कहती है कि अचानक एक दिन जब वह सवेरे कमरे से बरामदे में आई तो उसने देखा कि दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से चुपके से छूकर छुप जाना और फिर छूना जैसा कोई खेल खेल रहे हैं। लेखिका कहती है कि यह कौवा भी बहुत अनोखा पक्षी है-एक साथ ही दो तरह का व्यवहार सहता है, कभी तो इसे बहुत आदर मिलता है और कभी बहुत ज्यादा अपमान सहन करना पड़ता है। लेखिका कहती है कि जब वह कौवो के बारे में सोच रही थी तभी अचानक से उसकी उस सोच में कुछ रुकावट आ गई क्योंकि उसकी नजर गमले और दीवार को जोड़ने वाले भाग में छिपे एक छोटे-से जीव पर पड़ी।

जब लेखिका ने निकट जाकर देखा तो पाया कि वह छोटा सा जीव एक गिलहरी का छोटा-सा बच्चा है। उस छोटे से जीव के लिए उन दो कौवों की चोंचों के दो घाव ही बहुत थे, इसलिए वह बिना किसी हरकत के गमले से लिपटा पड़ा था। लेखिका ने उसे धीरे से उठाया और अपने कमरे में ले गई, फिर रुई से उसका खून साफ किया और उसके जख्मों पर पेंसिलिन नामक दवा का मरहम लगाया। कई घंटे तक इलाज करने के बाद उसके मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और निश्चिन्त हो गया कि वह लेखिका की उँगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर और अपनी नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इधर-उधर देखने लगा। सब उसे अब गिल्लू कह कर पुकारते थे। लेखिका कहती है कि जब वह लिखने बैठती थी तब अपनी ओर लेखिका का ध्यान आकर्षित करने की गिल्लू की इतनी तेज इच्छा होती थी कि उसने एक बहुत ही अच्छा उपाय खोज निकाला था। वह लेखिका के पैर तक आता था और तेजी से परदे पर चढ़ जाता था और फिर उसी तेजी से उतर जाता था। उसका यह इस तरह परदे पर चढ़ना और उतरने का क्रम तब तक चलता रहता था जब तक लेखिका उसे पकड़ने के लिए नहीं उठती थी।

लेखिका गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लिफाफे में इस तरह से रख देती थी। जब गिल्लू को उस लिफाफे में बंद पड़े-पड़े भूख लगने लगती तो वह चिक-चिक की आवाज करके मानो लेखिका को सूचना दे रहा होता कि उसे भूख लग गई है और लेखिका के द्वारा उसे काजू या बिस्कुट मिल जाने पर वह उसी स्थिति में लिफाफे से बाहर वाले पंजों से काजू या बिस्कुट पकड़कर उसे कुतरता।

लेखिका कहती है कि बाहर की गिलहरियाँ उसके घर की खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक करके न जाने क्या कहने लगीं? जिसके कारण गिल्लू खिड़की से बाहर झाँकने लगा। गिल्लू को खिड़की से बाहर देखते हुए देखकर उसने खिड़की पर लगी जाली की कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस रास्ते से गिल्लू जब बाहर गया तो उसे देखकर ऐसा लगा जैसे बाहर जाने पर सचमुच ही उसने आजादी की साँस ली हो। लेखिका को जरुरी कागजो-पत्रों के कारण बाहर जाना पड़ता था और उसके बाहर जाने पर कमरा बंद ही रहता था।

लेखिका कहती है कि उसने काॅलेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला और अंदर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू अपने उस जाली के दरवाजे से अंदर आया और लेखिका के पैर से सिर और सिर से पैर तक दौड़ लगाने लगा। उस दिन से यह हमेशा का काम हो गया था। काजू गिल्लू का सबसे मनपसंद भोजन था और यदि कई दिन तक उसे काजू नहीं दिया जाता था तो वह अन्य खाने की चीजें या तो लेना बंद कर देता था या झूले से नीचे फेंक देता था। लेखिका कहती है कि उसी बीच उसे मोटर दुर्घटना में घायल होकर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। उन दिनों जब कोई लेखिका के कमरे का दरवाजा खोलता तो गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता, उसे लगता कि लेखिका आई है और फिर जब वह लेखिका की जगह किसी दूसरे को देखता तो वह उसी तेजी के साथ अपने घोंसले में जा बैठता।

तो भी लेखिका के घर जाता वे सभी गिल्लू को काजू दे आते, परंतु अस्पताल से लौटकर जब लेखिका ने उसके झूले की सफाई की तो उसमें काजू भरे मिले, जिनसे लेखिका को पता चला कि वह उन दिनों अपना मनपसंद भोजन भी कितना कम खाता रहा। लेखिका की अस्वस्थता में वह तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हे-नन्हे पंजों से लेखिका के सिर और बालों को इतने धीरे-धीरे सहलाता रहता कि जब वह लेखिका के सिरहाने से हटता तो लेखिका को ऐसा लगता जैसे उसकी कोई सेविका उससे दूर चली गई हो।

लेखिका कहती है कि गिलहरियों के जीवन का समय दो वर्ष से अधिक नहीं होता, इसी कारण गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत भी नजदीक आ ही गया। दिन भर उसने न कुछ खाया न बाहर गया। रात में अपने जीवन के अंतिम क्षण में भी वह अपने झूले से उतरकर लेखिका के बिस्तर पर आया और अपने ठंडे पंजों से लेखिका की वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन में पकड़ा था जब वह मृत्यु के समीप पहुँच गया था। सुबह की पहली किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया। अर्थात उसकी मृत्यु हो गई। लेखिका ने गिल्लू की मृत्यु के बाद उसका झूला उतारकर रख दिया और खिड़की की जाली को बंद कर दिया, परंतु गिलहरियों की नयी पीढ़ी जाली के दूसरी ओर अर्थात बाहर चिक-चिक करती ही रहती है और जूही के पौधे में भी बसंत आता ही रहता है। सोनजुही की लता के नीचे ही लेखिका ने गिल्लू की समाधि बनाई थी अर्थात लेखिका ने गिल्लू को उस जूही के पौधे के निचे दफनाया था क्योंकि गिल्लू को वह लता सबसे अधिक प्रिय थी। लेखिका ने ऐसा इसलिए भी किया था क्योकि लेखिका को उस छोटे से जीव का, किसी बसंत में जुही के पीले रंग के छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, लेखिका को एक अलग तरह की खुषी देता था।

Gillu Class 9 Chapter 1 Sanchayan Question and Answers

गिल्लू प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1. सोनजूही में लगी पीली कली को देख लेखिका के मन में कौन से विचार उमड़ने लगे?

उत्तरः सोनजूही में लगी पीली कली को देख लेखिका को गिल्लू की याद आ गई। गिल्लू एक गिलहरी थी जिसकी जान लेखिका ने बचाई थी। उसके बाद से गिल्लू का पूरा जीवन लेखिका के साथ ही बीता था। लेखिका ने गिल्लू की मौत के बाद गिल्लू के शरीर को उसी सोनजूही के पौधे के नीचे दफनाया था इसीलिए जब भी लेखिका सोनजूही में लगी पीली कली को देखती थी उसे लगता था जैसे गिल्लू उन कलियों के रूप में उसे चैंकाने ऊपर आ गया है।

प्रश्न 2. पाठ के आधार पर कौए को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी क्यों कहा गया है?

उत्तरः हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि पितरपक्ष के समय हमारे पूर्वज कौवे के भेष में आते हैं। एक अन्य मान्यता है कि जब कौवा काँव-काँव करता है तो इसका मतलब होता है कि घर में कोई मेहमान आने वाला है। इन कारणों से कौवे को सम्मान दिया जाता है। लेकिन दूसरी ओर, कौवे के काँव काँव करने को अशुभ भी माना जाता है। इसलिए कौवे को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी कहा गया है।

प्रश्न 3. गिलहरी के घायल बच्चे का उपचार किस प्रकार किया गया?

उत्तरः गिलहरी के घायल बच्चे के घाव पर लगे खून को पहले रुई से साफ किया गया। उसके बाद उसके घाव पर पेंसिलिन का मलहम लगाया गया। उसके बाद रुई को दूध में डुबो कर उसे दूध पिलाने की कोशिश की गई जो असफल रही क्योंकि अधिक घायल होने के कारण कमजोर हो गया था और दूध की बूँदें उसके मुँह से बाहर गिर रही थी। लगभग ढ़ाई घंटे के उपचार के बाद गिलहरी के बच्चे के मुँह में पानी की कुछ बूँदें जा सकीं।

प्रश्न 4. लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए गिल्लू क्या करता था?

उत्तरः लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए गिल्लू उनके पैरों के पास आता और फिर सर्र से परदे पर चढ़ जाता था। उसके बाद वह परदे से उतरकर लेखिका के पास आ जाता था। यह सिलसिला तब तक चलता रहता था जब तक लेखिका गिल्लू को पकड़ने के लिए दौड़ न लगा देती थी।

प्रश्न 5. गिल्लू को मुक्त करने की आवश्यकता क्यों समझी गई और उसके लिए लेखिका ने क्या उपाय किया?

उत्तरः लेखिका के घर में रहते हुए गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया। नीम-चमेली की खुशबू लेखिका के कमरे में धीरे-धीरे फैलने लगी। लेखिका कहती है कि बाहर की गिलहरियाँ उसके घर की खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक करके न जाने क्या कहने लगीं? जिसके कारण गिल्लू खिड़की से बाहर झाँकने लगा। गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से इस तरह बाहर झाँकते देखकर लेखिका को लगा कि इसे आजाद करना अब जरुरी है। लेखिका ने खिड़की पर लगी जाली की कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और गिल्लू के बाहर जाने का रास्ता बना दिया।

प्रश्न 6. गिल्लू किन अर्थों में परिचारिका की भूमिका निभा रहा था?

उत्तरः जब लेखिका अस्पताल से घर आई तो गिल्लू उनके सिर के पास बैठा रहता था। वह अपने नन्हे पंजों से लेखिका के सिर और बाल को सहलाता रहता था। इस तरह से वह किसी परिचारिका की भूमिका निभा रहा था।

प्रश्न 7. गिल्लू कि किन चेष्टाओं से यह आभास मिलने लगा था कि अब उसका अंत समय समीप है?

उत्तरः गिल्लू ने दिन भर कुछ नहीं खाया था। वह कहीं बाहर भी नहीं गया था। रात में वह बहुत तकलीफ में लग रहा था। उसके बावजूद वह अपने झूले से उतरकर लेखिका के पास आ गया। गिल्लू ने अपने ठंडे पंजों से लेखिका कि अंगुली पकड़ ली और उनके हाथ से चिपक गया। इससे लेखिका को लगने लगा कि गिल्लू का अंत समय समीप ही था।

प्रश्न 8. ‘प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया’ – का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः ‘प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया’ – इस पंक्ति में लेखिका ने पुनर्जन्म की मान्यता को स्वीकार किया है। लेखिका को लगता है कि गिल्लू अपने अगले जन्म में किसी अन्य प्राणी के रूप में जन्म लेगा।

प्रश्न 9. सोनजूही की लता के नीचे बनी गिल्लू की समाधि से लेखिका के मन में किस विश्वास का जन्म होता है?

उत्तरः लेखिका ने गिल्लू को उस जूही के पौधे के निचे दफनाया था क्योंकि गिल्लू को वह लता सबसे अधिक प्रिय थी। लेखिका ने ऐसा इसलिए भी किया था क्योंकि लेखिका को उस छोटे से जीव का, किसी बसंत में जुही के पीले रंग के छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, लेखिका को एक अलग तरह का संतोष देता था।

बच्चों!

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Dharm ki Aadh (धर्म की आड़)

गणेश शंकर विद्यार्थी
(1891- 1931)
जीवन परिचय
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में सन् 1891 में हुआ । एंट्रेंस पास करने के बाद वे कानपूर करेंसी दफ्फ्तर में मुलाजिम हो गए। फिर 1921 में श्प्रतापश् साप्ताहिक अखबार निकालना शुरू किया। विद्यार्थी आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी को अपना गुरु मानते थे। कानपुर के 1931 में मचे साम्प्रदायिक दंगो को शांत करवाने के प्रयास में विद्यार्थी को अपने प्राणो की बलि देनी पड़ी। इनकी मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा थाः काश! ऐसी मौत मुझे मिली होती।


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Dharm ki Aadh (धर्म की आड़) class 9th

पाठ-प्रवेश
प्रस्तुत पाठ ‘धर्म की आड़’ में विद्यार्थी जी ने उन लोगों के इरादों और कुटिल चालों को बेनकाब किया है जो धर्म की आड़ लेकर जनसामान्य को आपस में लड़ाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की फिराक में रहते हैं। उन्होंने बताया है की कुछ चालाक व्यक्ति साधारण आदमी को अपने स्वार्थ हेतु धर्म के नाम पर लड़ाते रहते हैं। साधारण आदमी हमेशा ये सोचता है की धर्म के नाम पर जान तक दे देना वाजिब है।


पाश्चत्य देशों में धन के द्वारा लोगों को वश में किया जाता है, मनमुताबिक काम करवाया जाता है। हमारे देश में बुद्धि पर परदा डालकर कुटिल लोग ईश्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए ले लेते हैं और फिर धर्म, ईमान के नाम पर लोगों को आपस में भिड़ाते रहते हैं और अपना व्यापार चलाते रहते हैं। इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए हमें साहस और दृढ़ता के साथ उद्योग होना चाहिए। यदि किसी धर्म के मनाने वाले जबरदस्ती किसी के धर्म में टांग अड़ाते हैं तो यह कार्य स्वाधीनता के विरुद्ध समझा जाए।


देश की स्वाधीनता आंदोलन में जिस दिन खिलाफत, मुल्ला तथा धर्माचार्यों को स्थान दिया गया वह दिन सबसे बुरा था जिसके पाप का फल हमे आज भी भोगना पड़ रहा है। लेखक के अनुसार शंख बजाना, नाक दबाना और नमाज पढ़ना धर्म नही है। शुद्धाचरण और सदाचरण धर्म के चिन्ह हैं। आप ईश्वर को रिश्वत दे देने के बाद दिन भर बेईमानी करने के लिए स्वतंत्र नही हैं। ऐसे धर्म को कभी माफ नही किया जा सकता। इनसे अच्छे वे लोग हैं, जो नास्तिक हैं।

पाठ का सार
लेखक कहता है कि आज देश में ऐसा समय आ गया है कि हर तरफ केवल धर्म की ही धूम है। अनपढ़ और मन्दबुद्धि लोग धर्म और सच्चाई को जानें या न जानें, परंतु उनके नाम पर किसी पर भी गुस्सा कर जाते हैं और जान लेने और जान देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। गलती उन कुछ चलते-पुरजों अर्थात पढ़े-लिखे लोगों की है, जो मूर्ख लोगों की शक्तियों और उत्साह का गलत उपयोग इसलिए कर रहे हैं ताकि उन मूर्खों के बल के आधार पर पढ़े-लिखे लोगों का नेतृत्व और बड़प्पन कायम रह सके।
इसके लिए धर्म और सच्चाई के बजाये बुराइयों से काम लेना उन्हें सबसे आसान लगता है। हमारे देश के साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में यह बात अच्छी तरह बैठी हुई है कि धर्म और सच्चाई की रक्षा के लिए प्राण तक दे देना बिलकुल सही है। पाश्चात्य देशों में, धनी लोग, गरीब मजदूरों की झोंपड़ी का मजाक उड़ाते और उनके ऊँचे-ऊँचे मकान आकाश से बातें करते हैं!
गरीबों की कमाई ही से वे अमीर से अमीर होते जा रहे हैं, और उन गरीब मजदूरों के बल से ही वे हमेशा इस बात का प्रयास करते हैं कि गरीब सदा पीसे जाते रहें। ताकि वे हमेशा अमीर बने रहें। गरीबों का धनवान लोगों के द्वारा शोषण किया जाना इतना बुरा नहीं है, जितना बुरा धनवान लोगो का मजदूरों की बुद्धि पर वार करना है।


धर्म और सच्चाई के नाम पर किए जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए, साहस और दृढ़ता के साथ, उ।ोग होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक भारतवर्ष में हमेशा बढ़ते जाने वाले झगड़े कम नहीं होंगे। चाहे धर्म की कोई भी भावना हो, किसी दशा में भी वह किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने या नष्ट करने का साधन नहीं बननी चाहिए।
आपका मन जिस तरह चाहे उस तरह का धर्म मानें, और दूसरों का मन जिस तरह चाहे, उस प्रकार का धर्म वह माने। लेखक कहता है कि दो भिन्न धर्मों के मानने वालों के टकरा जाने के लिए इस देश में कोई भी स्थान न हो। देश की स्वतंत्रता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन बहुत बुरा था, जिस दिन स्वतंत्रता के क्षेत्र में पैगंबर या बादशाह का प्रतिनिधि, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचारियों को स्थान दिया जाना आवश्यक समझा गया। लेखक कहता है कि एक प्रकार से उस दिन हमने स्वतंत्रता के क्षेत्र में, एक कदम पीछे हटकर रखा था। अपने उसी पाप का फल आज हमें भोगना पड़ रहा है। क्योंकि आज धर्म और ईमान का ही बोल-बाला है।


लेखक कहता है कि महात्मा गांधी धर्म को सर्वत्र स्थान देते हैं। वे एक कदम भी धर्म के बिना चलने के लिए तैयार नहीं। परंतु गाँधी जी की बात पर अम्ल करने के पहले, प्रत्येक आदमी का कर्तव्य यह है कि वह भली-भाँति समझ ले कि महात्माजी के ‘धर्म’ का स्वरूप क्या है? गांधीजी कहते हैं कि अजाँ देने, शंख बजाने, नाक दाबने और नमाज पढ़ने का नाम धर्म नहीं है।
शुद्ध आचरण और अच्छा व्यवहार ही धर्म के स्पष्ट चिन्ह हैं। दो घंटे तक बैठकर पूजा कीजिए और पंच-वक्ता नमाज भी अदा कीजिए, परन्तु ईश्वर को इस प्रकार रिश्वत के दे चुकने के पश्चात, यदि आप अपने को दिन-भर बेईमानी करने और दूसरों को तकलीफ पहुँचाने के लिए आजाद समझते हैं तो, इस धर्म को, आगे आने वाला समय कदापि नहीं टिकने देगा।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि आपका आचरण दूसरों के लिए सही नहीं है तो आप चाहे कितनी भी पूजा अर्चना नमाज आदि पढ़ लें कोई फायदा नहीं होगा। ईश्वर इन नास्तिकों जिनका कोई धर्म नहीं होता ऐसे लोगों को अधिक प्यार करेगा, और वह अपने पवित्र नाम पर अपवित्र काम करने वालों से यही कहना पसंद करेगा। ईश्वर है और हमेशा रहेगा। लेखक सभी से प्रार्थना करता है कि सभी मनुष्य हैं, मनुष्य ही बने रहें पशु न बने।