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Kar Chale Hum Fida Class 10 Summary

Kar Chale Hum Fida Class 10 Summary, Explanation and question answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 2 की कविता पढ़ेंगे

कर चले हम फिदा’

कविता के रचयिता कैफ़ी आज़मी हैं।

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बच्चों कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

Kaifi Azmi

कवि परिचय: कैफ़ी आज़मी

जीवन परिचय: अहतर हुसैन रिज़वी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में 19 जनवरी 1919 हुआ था। कैफ़ी आज़मी के परिवार में उनकी पत्नी शौकत आज़मी, इनकी दो संतान शबाना आज़मी (फ़िल्मजगत की मशहूर अभिनेत्री और जावेद अख़्तर की पत्नी) और बाबा आज़मी है। कैफ़ी की कविताओं में एक ओर सामाजिक और राजनैतिक जागरूकता का समावेश है तो दूसरी और ह्रदय की कोमलता भी है। अपनी युवावस्था में वाह-वाही पाने वाले कैफ़ी आज़मी ने फिल्मो के लिए सैंकड़ों बेहतरीन गीत भी लिखे है।  10 मई 2002 को इस दुनिया से रुखसत हुए।

कविता का सार

जिंदगी सभी प्राणियों को प्रिय होती है। इसे कोई ऐसे ही बेमतलब गवाना नहीं चाहेगा। लेकिन सैनिक का जीवन बिलकुल इसके विपरीत होता है। क्योंकि सैनिक उस समय सीना तान कर खड़ा हो जाता है जब उसके जीवन पर नहीं बल्कि दूसरों के जीवन और आज़ादी पर संकट आता है। जबकि ऐसी स्थिति में उसे पता होता है कि दूसरों की आज़ादी और जिंदगी भले ही बची रह सकती है परन्तु उसकी जान जाने की सम्भावना सबसे अधिक होती है।

प्रस्तुत पाठ जो युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘हकीकत’ के लिए लिखा गया था, ऐसे ही सैनिकों के दिल की बात बयान करता है जिन्हें अपने किये पर नाज है। इसी के साथ उन्हें देशवासियों से कुछ आशाएँ भी हैं। जिनसे उन्हें आशाएँ हैं वो देशवासी हम और आप हैं तो इसलिए इस पाठ के जरिये हम जानेगे की हम किस हद तक उनकी आशयों पर खरे उतरे हैं।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

सन्दर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य-पुस्तक ‘स्पर्श भाग- 2’ के काव्य खंड की कविता कर चले हम फिदा से ली गई हैं। इसके कवि कैफ़ी आज़मी हैं।

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि एक वीर सैनिक का अपने देशवासियों को दिए आखिरी सन्देश का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सैनिक अपने आखिरी सन्देश में कह रहें है कि वो अपने प्राणों को देश हित के लिए न्योछावर कर रहें है, अब यह देश हम जाते-जाते आप देशवासियों को सौंप रहें हैं। सैनिक उस दृश्य का वर्णन कर रहें है जब दुश्मनों ने देश पर हमला किया था। सैनिक कहते है कि जब हमारी साँसे हमारा साथ नहीं दे रही थी और हमारी नाड़ियों में खून जमता जा रहा, फिर भी हमने अपने बढ़ते क़दमों को जारी रखा अर्थात दुश्मनों को पीछे धकेलते गए। सैनिक गर्व से कहते है कि हमें अपने सर भी कटवाने पड़े तो हम ख़ुशी-ख़ुशी कटवा देंगे पर हमारे गौरव के प्रतिक हिमालय को नहीं झुकने देंगे अर्थात हिमालय पर दुश्मनों के कदम नहीं पड़ने देंगे। हम मरते दम तक वीरता के साथ दुश्मनों का मुकाबला करते रहे अब इस देश की रक्षा का भार आप देशवासियों को सौंप रहे हैं।

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जान देने की रुत रोज आती नहीं

हुस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे

वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि सैनिक के बलिदान का भावनात्मक रूप से वर्णन कर रहा।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हमारे पूरे जीवन में हमें जिन्दा रहने के कई अवसर मिलते हैं लेकिन देश के लिए प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी कभी-कभी किसी-किसी को ही मिल पाती है अर्थात सैनिक देश पर मर मिटने का एक भी मौका नई खोना चाहते। सैनिक देश के नौजवानों को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि सुंदरता और प्रेम का त्याग करना सीखो क्योंकि वो सुंदरता और प्रेम ही क्या? जवानी ही क्या? जो देश के लिए अपना खून न बहा सके। सैनिक देश की धरती को दुल्हन की तरह मानते है और कहते है कि जिस तरह दुल्हन को स्वयंवर में हासिल करने के लिए राजा किसी भी मुश्किल को पार कर जाते थे उसी तरह तुम भी अपनी इस दुल्हन को दुश्मनों से बचा कर रखना। क्योंकि अब हम देश की रक्षा का दायित्व आप देशवासियों पर छोड़ कर जा रहे हैं।

राह कुर्बानियों की न वीरान हो

तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले

 फतह का जश्न इस जश्न के बाद है

जिंदगी मौत से मिल रही है गले

बाँध लो अपने सर से कफन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में सैनिक देशवासियों को देश के लिए बलिदान करने के लिए तैयार रहने को कहते हैं।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हम तो देश के लिए बलिदान दे रहे हैं परन्तु हमारे बाद भी ये सिलसिला चलते रहना चाहिए। जब भी जरुरत हो तो इसी तरह देश की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना चाहिए। जीत की ख़ुशी तो देश पर प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी के बाद दोगुनी  हो जाती है। उस स्थिति में ऐसा लगता है मनो जिंदगी मौत से गले मिल रही हो। अब ये देश आप देशवासियों को सौंप रहे हैं अब आप अपने सर पर मौत की चुनरी बांध लो अर्थात अब आप देश की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ।

खींच दो अपने खूँ से जमीं पर लकीर

इस तरफ आने पाए न रावन कोई

तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में सैनिक देशवासियों को प्रेरित कर रहे हैं।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि अपने खून से लक्ष्मण रेखा के समान एक रेखा तुम भी खींच लो और ये तय कर लो कि उस रेखा को पार करके कोई रावण रूपी दुश्मन इस पार ना आ पाय। सैनिक अपने देश की धरती को सीता के आँचल की तरह मानते हैं और कहते हैं कि अगर कोई हाथ आँचल को छूने के लिए आगे बड़े तो उसे तोड़ दो। अपने वतन की रक्षा के लिए तुम ही राम हो और तुम ही लक्ष्मण हो।अब इस देश की रक्षा का दायित्व तुम पर है।

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Kar Chale Hum Fida Class 10 question answer

कर चले हम फिदा पाठ के प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1.

क्या इस गीत की कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है?

उत्तर: हाँ, इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। सन् 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण किया। युद्ध में अनेक सिपाही लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर ‘हकीकत’ फ़िल्म बनी थी। इस फ़िल्म में भारत और चीन युद्ध की वास्तविकता को दर्शाया गया था। यह गीत इसी फ़िल्म के लिए लिखा गया था।

प्रश्न 2.

‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’, इस पंक्ति में हिमालय किस बात का प्रतीक है?

उत्तर: ‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’ इस पंक्ति में हिमालय भारत के मान-सम्मान का प्रतीक है। 1962 में भारत चीन की लड़ाई हिमालय की घाटियों में लड़ी गई थी। हमारे अनेक सैनिक इस युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। हिमालय की बर्फीली चोटियों पर भारतीय जवानों ने बहादुरी एवं बलिदान की अनोखी मिसाल कायम की थी। भारतीय सेना के वीर जाँबाजों ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भारत के सम्मान की रक्षा की थी।

प्रश्न 3.

इस गीत में धरती को दुलहन क्यों कहा गया है?

उत्तर: गीत में धरती को दुल्हन इसलिए कहा गया है, क्योंकि सन् 1962 के युद्ध में भारतीय सैनिकों के बलिदानों से, उनके रक्त से धरती लाल हो गई थी, मानो धरती ने किसी दुलहन की भाँति लाल पोशाक पहन ली हो अर्थात भारतीय सैनिकों के रक्त से पूरी युद्धभूमि लाल हो गई थी।

प्रश्न 4.

गीत में ऐसी क्या खास बात होती है कि वे जीवन भर याद रह जाते हैं?

उत्तर: जीवन भर याद रह जाने वाले गीतों में हृदय का स्पर्श करने वाली भाषा और संगीत का अद्भुत तालमेल होता है। जो व्यक्ति के अंतर्मन में स्वतः ही प्रवेश कर जाता है। इस तरह गीतों के बोल सरल भाषा व प्रभावोत्पादक शैली में होने चाहिए ताकि वह व्यक्ति की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। इन गीतों का विषय जीवन के मर्मस्पर्शी पहलुओं से जुड़ा होना चाहिए। ऐसे गीत हृदय की गहराइयों में समा जाते हैं और इन गीतों के सुर, लहरियाँ संपूर्ण मन मस्तिष्क को सकारात्मकता से ओत-प्रोत कर देती है और गीत जीवनभर याद रह जाते हैं।

प्रश्न 5.

कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग किसके लिए किया है?

उत्तर: कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग देशवासियों के लिए किया है, जो देश की एकता को दर्शा रहा है। देशवासियों का संगठन ही देश को प्रगतिशील, विकासशील तथा समृद्धशाली बनाता है। देशवासियों का परस्पर साथ ही देश की ‘अनेकता में एकता’ जैसी विशिष्टता को मजबूत बनाता है।

प्रश्न 6.

कवि ने इस कविता में किस काफ़िले को आगे बढ़ाते रहने की बात कही है?

उत्तर: ‘काफिले’ शब्द का अर्थ है-यात्रियों का समूह। कवि ने इस कविता में देश के लिए न्योछावर होने वाले अर्थात् देश के मान-सम्मान व रक्षा की खातिर अपने सुखों को त्याग कर, मर मिटने वाले बलिदानियों के काफिले को आगे बढ़ते रहने की बात कही है। कवि का मानना है कि बलिदान का यह क्रम निरंतर चलते रहना चाहिए क्योंकि हमारा देश तभी सुरक्षित रह सकता है, जब बलिदानियों के काफिले शत्रुओं को परास्त कर तथा विजयश्री को हासिल कर आगे बढ़ते रहेंगे।

प्रश्न 7.

इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ किस ओर संकेत करता है?

उत्तर: इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ देश के लिए अपना सर्वस्व अर्थात् संपूर्ण समर्पण की ओर संकेत करता है। सिर पर कफन बाँधकर चलने वाला व्यक्ति अपने प्राणों से मोह नहीं करता, बल्कि अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए सदैव तैयार रहता है इसलिए हर सैनिक सदा मौत को गले लगाने के लिए तत्पर रहता है।

प्रश्न 8.

इस कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत कविता उर्दू के प्रसिद्ध कवि कैफ़ी आज़मी द्वारा रचित है। यह गीत युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म हकीकत के लिए लिखा गया है। इस कविता में कवि ने उन सैनिकों के हृदय की आवाज़ को व्यक्त किया है, जिन्हें अपने देश के प्रति किए गए हर कार्य, हर कदम, हर बलिदान पर गर्व है। इसलिए इन्हें प्रत्येक देशवासी से कुछ अपेक्षाएँ हैं कि उनके इस संसार से विदा होने के पश्चात वे देश की आन, बान व शान पर आँच नहीं आने देंगे, बल्कि समय आने पर अपना बलिदान देकर देश की रक्षा करेंगे।

प्रश्न 9.

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

उत्तर: भाव-इन पंक्तियों का भाव यह है कि हमारे वीर सैनिक देश रक्षा के लिए दिए गए अपने वचन का पालन अपने जीवन के अंतिम क्षण तक करते रहे युद्ध में घायल इन सैनिकों को अपने प्राणों की जरा भी परवाह नहीं की। उनकी साँसें भले ही रुकने लगीं तथा भयंकर सर्दी के कारण उनकी नब्ज़ चाहे जमती चली गई किंतु किसी भी परिस्थिति में उनके इरादे डगमगाए नहीं। भारत माँ की रक्षा के लिए उनके बढ़ते कदम न तो पीछे हटे और न ही रुके। वे अपनी अंतिम साँस तक शत्रुओं का मुकाबला करते रहे।

प्रश्न 10.

खींच दो अपने खू से जमीं पर लकीर

इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई

उत्तर: इन अंशों का भाव है कि सैनिकों ने अंतिम साँस तक देश की रक्षा की। युद्ध में घायल हो जाने पर जब सैनिकों की साँसें रुकने लगती हैं अर्थात् अंतिम समय आने पर तथा नब्ज़ के रुक-रुककर चलने पर, कमज़ोर पड़ जाने पर भी उनके कदम नहीं रुकते, क्योंकि वे भारतमाता की रक्षा हेतु आगे बढ़ते रहते हैं और हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर देते हैं।

प्रश्न 11.

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

उत्तर: भाव-इन पंक्तियों का भाव यह है कि भारत की भूमि सीता माता की तरह पवित्र है। इसके दामन को छूने का दुस्साहस किसी को नहीं होना चाहिए। यह धरती राम और लक्ष्मण जैसे अलौकिक वीरों की धरती है जिनके रहते सीमा पर से कोई शत्रु रूपी रावण देश में प्रवेश कर देश की अस्मिता को लूट नहीं सकता। अतः हम सभी देशवासियों को मिलकर देश की गरिमा को बनाए रखना है अर्थात् देश के मान-सम्मान व उसकी पवित्रता की रक्षा करना है।

बच्चों!

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Naubatkhane Mein Ibadat Class 10 Summary

Naubatkhane Mein Ibadat Class 10th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग-2 की कविता पढ़ेंगे

नौबतखाने में इबादत’

पाठ के लेखक यतीन्द्र मिश्र हैं।

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बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचयः यतीन्द्र मिश्र

Yatindra Mishr

जीवन परिचयः साहित्य और कलाओं के संवर्धन में विशेष सहयोग प्रदान करने वाले यतीन्द्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या शहर में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ से एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। सन 1999 में साहित्य और कलाओं के संवर्ध्दन और अनुशलीन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन भी कर रहे हैं। उनको भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। आजकल स्वतंत्र लेखन के साथदृसाथ ‘सहित’ नामक अर्धवार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं।

प्रमुख रचनाएँः अब तक यतींद्र मिश्र के तीन काव्य दृ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताये, ड्योढ़ी पर अलापद्य 

भाषा शैलीः यतींद्र मिश्र की भाषा सरल, सहज, प्रवाहमय, प्रसंगानुकूल है। उनकी रचनाओं में संवेदना एवं भावुकता का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है।

Naubatkhane Mein Ibadat Chapter 16 Summary

पाठ का सारः नौबतखाने में इबादत

अम्मीरुद्दीन उर्फ बिस्मिल्लाह खाँ का जन्म बिहार में डुमराँव के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ। इनके बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था जो उम्र में उनसे तीन वर्ष बड़े थे। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम पैगम्बरबख़्ष खाँ तथा माँ मिट्ठन थीं। पांच-छह वर्ष होने पर वे डुमराँव छोड़कर अपने ननिहाल काशी आ गए। वहां उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबक्श तथा नाना रहते थे जो की जाने माने शहनाईवादक थे। वे लोग बाला जी के मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाकर अपनी दिनचर्या का आरम्भ करते थे। वे विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने का काम करते थे।

ननिहाल में 14 साल की उम्र से ही बिस्मिल्लाह खाँ ने बाला जी के मंदिर में रियाज करना शुरू कर दिया। उन्होंने वहां जाने का ऐसा रास्ता चुना जहाँ उन्हें रसूलन और बतूलन बाई की गीत सुनाई देती जिससे उन्हें खुशी मिलती। अपने साक्षात्कारों में भी इन्होनें स्वीकार किया की बचपन में इनलोगों ने इनका संगीत के प्रति प्रेम पैदा करने में भूमिका निभायी। भले ही वैदिक इतिहास में शहनाई का जिक्र ना मिलता हो परन्तु मंगल कार्यों में इसका उपयोग प्रतिष्ठित करता है अर्थात यह मंगल ध्वनि का सम्पूरक है। बिस्मिल्लाह खाँ ने अस्सी वर्ष के हो जाने के वाबजूद हमेशा पाँचो वक्त वाली नमाज में शहनाई के सच्चे सुर को पाने की प्रार्थना में बिताया। मुहर्रम के दसों दिन बिस्मिल्लाह खाँ अपने पूरे खानदान के साथ ना तो शहनाई बजाते थे और ना ही किसी कार्यक्रम में भाग लेते। 8वीं तारीख को वे शहनाई बजाते और दालमंडी से फातमान की आठ किलोमीटर की दुरी तक भींगी आँखों से नोहा बजाकर निकलते हुए सबकी आँखों को भिंगो देते।

फुरसत के समय वे उस्ताद और अब्बाजान को काम याद कर अपनी पसंद की सुलोचना गीताबाली जैसी अभिनेत्रियों की देखी फिल्मों को याद करते थे। वे अपनी बचपन की घटनाओं को याद करते की कैसे वे छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनाता तथा बाद में उनकी ‘मीठी शहनाई’ को ढूंढने के लिए एक-एक कर शहनाई को फेंकते और कभी मामा की शहनाई पर पत्थर पटककर दाद देते। बचपन के समय वे फिल्मों के बड़े शौकीन थे, उस समय थर्ड क्लास का टिकट छः पैसे का मिलता था जिसे पूरा करने के लिए वो दो पैसे मामा से, दो पैसे मौसी से और दो पैसे नाना से लेते थे फिर बाद में घंटों लाइन में लगकर टिकट खरीदते थे। बाद में वे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री सुलोचना की फिल्मों को देखने के लिए वे बालाजी मंदिर पर शहनाई बजाकर कमाई करते। वे सुलोचना की कोई फिल्म ना छोड़ते तथा कुलसुम की देसी घी वाली दूकान पर कचैड़ी खाना ना भूलते।

बिस्मिल्लाह खाँ

काशी के संगीत आयोजन में वे अवश्य भाग लेते। यह आयोजन कई वर्षों से संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर हो रहा था जिसमे शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन-वादन की सभा होती है। बिस्मिल्लाह खाँ जब काशी के बाहर भी रहते तब भी वो विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की तरफ मुँह करके बैठते और अपनी शहनाई भी उस तरफ घुमा दिया करते। गंगा, काशी और शहनाई उनका जीवन थे। काशी का स्थान सदा से ही विशिष्ट रहा है, यह संस्कृति की पाठशाला है। बिस्मिल्लाह खाँ के शहनाई के धुनों की दुनिया दीवानी हो जाती थी।

सन 2000 के बाद पक्का महाल से मलाई-बर्फ वालों के जाने से, देसी घी तथा कचैड़ी-जलेबी में पहले जैसा स्वाद ना होने के कारण उन्हें इनकी कमी खलती। वे नए गायकों और वादकों में घटती आस्था और रियाजों का महत्व के प्रति चिंतित थे। बिस्मिल्लाह खाँ हमेशा से दो कौमों की एकता और भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देते रहे। नब्बे वर्ष की उम्र में 21 अगस्त 2006 को उन्हने दुनिया से विदा ली। वे भारतरत्न, अनेकों विश्वविद्यालय की मानद उपाधियाँ व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा पद्मविभूषण जैसे पुरस्कारों से जाने नहीं जाएँगे बल्कि अपने अजेय संगीतयात्रा के नायक के रुप में पहचाने जाएँगे।

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Naubatkhane Mein Ibadat Class 10 Question Answers

नौबतखाने में इबादत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?

उत्तरः मशहूर शहनाई वादक “बिस्मिल्ला खाँ” का जन्म डुमराँव गाँव में ही हुआ था। इसके अलावा शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से पोली होती है, जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। रीड, नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारे पाई जाती है। इसी कारण शहनाई की दुनिया में डुमराँव का महत्त्व है।

प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?

उत्तरः शहनाई ऐसा वाद्य है जिसे मांगलिक अवसरों पर ही बजाया जाता है। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ शहनाई वादन के क्षेत्र में अद्वितीय स्थान रखते हैं। इन्हीं कारणों के वजह से बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है।

प्रश्न 3. सुषिर-वाद्यों से क्या अभिप्राय है? शहनाई को ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि क्यों दी गई होगी?

उत्तरः सुषिर-वाद्यों से अभिप्राय है फूँककर बजाये जाने वाले वाद्य।

शहनाई एक अत्यंत मधुर स्वर उत्पन्न करने वाला वाद्ध है। फूँककर बजाए जाने वाले वाद्यों में कोई भी वाद्य ऐसा नहीं है जिसके स्वर में इतनी मधुरता हो। शहनाई में समस्त राग-रागिनियों को आकर्षक सुरों में बाँधा जा सकता है। इसलिए शहनाई की तुलना में अन्य कोई सुषिर-वाद्य नहीं टिकता और शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों के शाह’ की उपाधि दी गयी होगी।

प्रश्न 4.  आशय स्पष्ट कीजिए –

  • ‘फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।’
  • ‘मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’

उत्तरः () यहाँ बिस्मिल्ला खाँ ने सुर तथा कपड़े (धन-दौलत) से तुलना करते हुए सुर को अधिक मूल्यवान बताया है। क्योंकि कपड़ा यदि एक बार फट जाए तो दुबारा सिल देने से ठीक हो सकता है। परन्तु किसी का फटा हुआ सुर कभी ठीक नहीं हो सकता है। और उनकी पहचान सुरों से ही थी इसलिए वह यह प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें अच्छा कपड़ा अर्थात् धन-दौलत दें या न दें लेकिन अच्छा सुर अवश्य दें।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ पाँचों वक्त नमाज के बाद खुदा से सच्चा सुर पाने की प्रार्थना करते थे। वे खुदा से कहते थे कि उन्हें इतना प्रभावशाली सच्चा सुर दें और उनके सुरों में दिल को छूने वाली ताकत बख्शे उनके शहनाई के स्वर आत्मा तक प्रवेश करें और उसे सुनने वालों की आँखों से सच्चे मोती की तरह आँसू निकल जाए। यही उनके सुर की कामयाबी होगी।

प्रश्न 5. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?

उत्तरः काशी से बहुत सी परंपराएँ लुप्त हो गई है। संगीत, साहित्य और अदब की परंपर में धीरे-धीरे कमी आ गई है। अब काशी से धर्म की प्रतिष्ठा भी लुप्त होती जा रही है। वहाँ हिंदु और मुसलमानों में पहले जैसा भाईचारा नहीं है। पहले काशी खानपान की चीजों के लिए विख्यात हुआ करता था। परन्तु अब उनमें परिवर्तन हुए हैं। काशी की इन सभी लुप्त होती परंपराओं के कारण बिस्मिल्ला खाँ दुःखी थे।

प्रश्न 6. पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि –

(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।

(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इनसान थे।

उत्तरः प्रसंगों के आधार-

(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली जुली संस्कृति के प्रतीक थे। उनका धर्म मुस्लिम था। मुस्लिम धर्म के प्रति उनकी सच्ची आस्था थी परन्तु वे हिंदु धर्म का भी सम्मान करते थे। मुहर्रम के महीने में आठवी तारीख के दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे व दालमंडी मे फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते थे।

इसी तरह इनकी श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है। वे जब भी काशी से बाहर रहते थे। तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे और उसी ओर शहनाई बजाते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि काशी छोड़कर कहाँ जाए, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ। मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ एक सच्चे इंसान थे। वे धर्मों से अधिक मानवता को महत्व देते थे, हिंदु तथा मुस्लिम धर्म दोनों का ही सम्मान करते थे, भारत रत्न से सम्मानित होने पर भी उनमें घमंड नहीं था, दौलत से अधिक सुर उनके लिए जरुरी था।

प्रश्न 7. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया?

उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में कुछ ऐसे व्यक्ति और कुछ ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने उनकी संगीत साधना को प्रेरित किया।

  1. बालाजी मंदिर तक जाने का रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता था। इस रास्ते से कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा की आवाजें आती थी। इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर उनके मन में संगीत की ललक जागी।
  2. बिस्मिल्ला खाँ जब सिर्फ चार साल के थे तब छुपकर अपने नाना को शहनाई बजाते हुए सुनते थे। रियाज के बाद जब उनके नाना उठकर चले जाते थे तब अपनी नाना वाली शहनाई ढूँढते थे और उन्हीं की तरह शहनाई बजाना चाहते थे।
  3. मामूजान अलीबख्श जब शहनाई बजाते-बजाते सम पर आ जाते तो बिस्मिल्ला खाँ धड़ से एक पत्थर जमीन में मारा करते थे। इस प्रकार उन्होंने संगीत में दाद देना सीखा।
  4. बिस्मिल्ला खाँ कुलसुम की कचैड़ी तलने की कला में भी संगीत का आरोह-अवरोह देखा करते थे।
  5. बचपन में वे बालाजी मंदिर पर रोज शहनाई बजाते थे। इससे शहनाई बजाने की उनकी कला दिन-प्रतिदिन निखरने लगी।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 1. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?

उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की निम्नलिखित बातें हमें प्रभावित करती हैं –

  1.  ईश्वर के प्रति उनके मन में अगाध भक्ति थी।
  2. मुस्लिम होने के बाद भी उन्होंने हिंदु धर्म का सम्मान किया तथा हिंदु-मुस्लिम एकता को कायम रखा।
  3. भारत रत्न की उपाधि मिलने के बाद भी उनमें घमंड कभी नहीं आया।
  4. वे एक सीधे-सादे तथा सच्चे इंसान थे।
  5. उनमें संगीत के प्रति सच्ची लगन तथा सच्चा प्रेम था।
  6. वे अपनी मातृभूमि से सच्चा प्रेम करते थे।

प्रश्न 2. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः मुहर्रम पर्व के साथ बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई का सम्बन्ध बहुत गहरा है। मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान शोक मनाते थे। इसलिए पूरे दस दिनों तक उनके खानदान का कोई व्यक्ति न तो मुहर्रम के दिनों में शहनाई बजाता था और न ही संगीत के किसी कार्यक्रम में भाग लेते थे। आठवीं तारीख खाँ साहब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होती थी। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंड़ी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते हुए जाते थे। इन दिनों कोई राग-रागिनी नहीं बजाई जाती थी। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती थीं।

प्रश्न 3. बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ भारत के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक थे। वे अपनी कला के प्रति पूर्णतया समर्पित थे। उन्होंने जीवनभर संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की इच्छा को अपने अंदर जिंदा रखा। वे अपने सुरों को कभी भी पूर्ण नहीं समझते थे इसलिए खुदा के सामने वे गिड़गिड़ाकर कहते द- “मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ ।” खाँ साहब ने कभी भी धन-दौलत को पाने की इच्छा नहीं की बल्कि उन्होंने संगीत को ही सर्वश्रेष्ठ माना। वे कहते थे- “मालिक से यही दुआ है- फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी ।”

इससे यह पता चलता है कि बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे।

बच्चों!

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Main Kyon Likhta Hun Class 10th Summary

Main Kyon Likhta Hun Class 10th Summary, Explanation and Question Answers

हैला बच्चों!

आल हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 2 का पाठ पढ़ेंगे

‘मैं क्यों लिखता हूं?’

पाठ के लेखक अज्ञेय हैं।

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बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखक का जीवन परिचय जानते हैं।

लेखक परिचय: अज्ञेय

जीवन परिचय: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का जन्म सन् 1911 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसिया (कुशीनगर) इलाके में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा जम्मू-कश्मीर में हुई और बी. एस. सी. लाहोर से की। क्रन्तिकारी आंदोलन में भाग लेने के कारण अज्ञेय को जेल भी जाना पड़ा।

साहित्य एवं पत्रकारिता की पूर्णत: समर्पित अज्ञेय ने देश-विदेश की अनेक यात्राएं की| उन्होंने कई नौकरियों कीं और छोड़ी| आज़ादी के बाद भी हिंदी कविता पर अज्ञेय का व्यापक प्रभाव है| कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृतांत, निबंध, आलोचना आदि अनेक विधाओं में भी लेखन-किया है।                    

प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय ने इस निबंध में यह स्पष्ट किया है कि रचनाकार की भीतरी विवशता ही उसे लेखन के लिए मजबूर करती है और लिखकर ही रचनाकार उससे मुक्त हो पाता है। अज्ञेय का यह मानना है कि प्रत्यक्ष अनुभव जब अनुभूति का रूप धारण करता है, तभी रचना पैदा होती है। अनुभव के बिना अनुभूति नहीं होती, परंतु यह आवश्यक नहीं कि हर अनुभव अनुभूति बने। अनुभव जब भाव जगत् और संवेदना का हिस्सा बनता है, तभी वह कलात्मक अनुभूति में रूपांतरित होता है।

पाठ का सार: मैं क्यों लिखता हूं?

1. लिखने का प्रश्न: अत्यंत कठिन

‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ लेखक के अनुसार यह प्रश्न बड़ा सरल प्रतीत होता है, पर यह बड़ा कठिन भी है। इसका सच्चा तथा वास्तविक उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन से संबंध रखता है। उन सबको संक्षेप में कुछ वाक्यों में बाँध देना आसान नहीं है।

2. लिखने का असली कारण

लेखक को ‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ प्रश्न का एक उत्तर तो यह लगता है कि वह स्वयं जानना चाहता है कि वह किसलिए लिखता है। उसे बिना लिखे हुए इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता। लिखकर ही वह उस आंतरिक प्रेरणा को विवशता को पहचानता है, जिसके कारण उसने लिखा। उसे लगता है कि वह उस आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए, तटस्थ (अलग) होकर उसे देखने और पहचान लेने के लिए लिखता है।

3. सभी लेखक कृतिकार नहीं

लेखक को ऐसा लगता है कि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते तथा उनके सभी लेखन कृति भी नहीं होते। यह तथ्य भी सही है कि कुछ लेखक ख्याति मिल जाने के बाद बाहरी विवशता से भी लिखते हैं। बाहरी विवशता संपादकों का आग्रह प्रकाशक का तकाजा, आर्थिक आवश्यकता आदि के रूप में हो सकती है।

4. लेखक का स्वभाव और अनुशासन

लेखन में कृतिकार के स्वभाव और आत्मानुशासन का बहुत महत्त्व है। कुछ लेखक इतने आलसी होते हैं कि बिना बाहरी दबाव के लिख ही नहीं पाते; जैसे प्रातःकाल नींद खुल जाने पर भी कोई बिछौने (बिस्तर) पर तब तक पड़ा रहता है, जब तक घड़ी का अलार्म न बज जाए।

5. लेखक की भीतरी विवशता

लेखक की भीतरी विवशता का वर्णन करना बड़ा कठिन है। लेखक विज्ञान का विद्यार्थी रहा है और उसकी नियमित शिक्षा भी विज्ञान विषय में ही हुई है। अणु का सैद्धांतिक ज्ञान लेखक को पहले से ही था, परंतु जब हिरोशिमा में अणु बम गिरा, तब लेखक ने उससे संबंधित खबरें पढ़ीं, साथ ही उसके परवर्ती प्रभावों का विवरण भी पढ़ा। विज्ञान के इस दुरुपयोग के प्रति बुद्धि का विद्रोह स्वाभाविक था। लेखक ने इसके बारे में लेख आदि में कुछ लिखा भी, पर अनुभूति के स्तर पर जो विवशता होती है, वह बौद्धिक पकड़ से आगे की बात है।

6. हिरोशिमा के प्रभावितों से साक्षात्कार

एक बार लेखक को जापान जाने का अवसर मिला। वहाँ जाकर उसने हिरोशिमा और उस अस्पताल को भी देखा , जहाँ रेडियम पदार्थ से आहत लोग वर्षों से कष्ट पा रहे थे। इस प्रकार उसे प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उसे लगा कि कृतिकार के लिए अनुभव से अनुभूति गहरी चीज़ है। यही कारण है कि हिरोशिमा में सब देखकर भी उसने तत्काल कुछ नहीं लिखा। फिर एक दिन उसने वहीं सड़क पर घूमते हुए देखा कि एक जले हुए पत्थर पर एक लंबी उजली छाया है। उसकी समझ में आया कि विस्फोट के समय कोई व्यक्ति वहाँ खड़ा रहा होगा और विस्फोट से बिखरे हुए रेडियोधर्मी पदार्थ की किरणें उसमें रुद्ध हो गई होंगी और उन किरणों ने उसे भाप बनाकर उड़ा दिया होगा। इसी कारण पत्थर का वह छाया वाला अंश झुलसने से बन गया होगा। यह देखकर उसे लगा कि समूची ट्रेजडी (दुःखद घटना) जैसे पत्थर पर लिखी गई है।

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7. लेखक का आश्चर्य

उस छाया को देखकर लेखक को जैसे एक थप्पड़-सा लगा। उसी क्षण अणु विस्फोट जैसे उसकी अनुभूति में आ गया और वह स्वयं हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया। अचानक एक दिन उसने भारत आकर हिरोशिमा पर एक कविता लिखी। यह कविता अच्छी हैं या बुरी, इससे लेखक को मतलब नहीं है। उसके लिए तो वह अनुभूतिजन्य सत्य है, जिससे वह यह जान गया कि कोई रचनाकार रचना क्यों करता है|

Main Kyun Likhta Hu Chapter 5 Question answers

मैं क्यों लिखता हूं पाठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?

उत्तर: लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव वह होता है, जिसे हम घटित होते हुए देखते हैं। इसके माध्यम से हम अनुभूति, संवेदना और कल्पना को सरलता से आत्मसात् कर लेते हैं। यह वास्तव में रचनाकार के साथ घटित नहीं होता है। वह आँखों के आगे नहीं आया होता। अनुभव की तुलना में अनुभूति (महसूस करने की क्षमता) लेखक के हृदय के सारे भावों को बाहर निकालने में उसकी सहायता करती है। जब तक हृदय में अनुभूति न जागे लेखन का कार्य करना संभव नहीं है। क्योंकि यही हृदय में संवेदना जागृत करती है और लेखन के लिए मजबूर करती है। यही कारण है कि लेखक लेखन के लिए अनुभूति को अधिक महत्व देता है।

प्रश्न 2. लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया?

उत्तर: लेखक ने अपनी जापान यात्रा के दौरान हिरोशिमा का दौरा किया था। वह उस अस्पताल में भी गया जहाँ आज भी उस भयानक विस्फोट से पीड़ित लोगों का ईलाज हो रहा था। इस अनुभव द्वारा लेखक को, उसका भोक्ता बनना स्वीकारा नहीं था ।कुछ दिन पश्चात् जब उसने उसी स्थान पर एक बड़े से जले पत्थर पर एक व्यक्ति की उजली छाया देखी, विस्फोट के समीप कोई व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा रहा होगा। विस्फोट से विसर्जित रेडियोधर्मी पदार्थ ने उस व्यक्ति को भाप बना दिया और पत्थर को झुलसा दिया। इस प्रत्यक्ष अनुभूति ने लेखक के हृदय को झकझोर दिया। उसे प्रतीत हुआ मानो किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो और उसके भीतर उस विस्फोट का भयानक दृश्य प्रज्वलित हो गया। उसे जान पड़ा मानो वह स्वयं हिरोशिमा बम का उपभोक्ता बन गया हो।

प्रश्न 3. मैं क्यों लिखता हूँ? के आधार पर बताइए कि –

(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?

(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?

उत्तर:

(क) लेखक अपनी आंतरिक विवशता के कारण लिखने के लिए प्रेरित होता है। उसकी अनुभूति उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है व स्वयं को जानने के लिए भी वह लिखने के लिए प्रेरित होता है।

(ख) किसी रचनाकार को उसकी आंतरिक विवशता रचना करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु कई बार उसे संपादकों के दवाब व आग्रह के कारण रचना लिखने के लिए उत्साहित होना पड़ता है। कई बार प्रकाशक का तकाज़ा व उसकी आर्थिक विवशता भी उसे रचना, रचने के लिए उत्साहित करती है।

प्रश्न 4. कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं?

उत्तर: कोई आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव, उसे हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। फिर चाहे कुछ भी हो परन्तु इनके साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होते हैं। ये दबाव संपादकों का आग्रह हो सकता है या फिर प्रकाशक का तकाज़ा या उसकी स्वयं की आर्थिक स्थिति जो उसे रचना करने के लिए दबाव डालती है।

प्रश्न 5. क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?

उत्तर: बिल्कुल! ये दवाब किसी भी क्षेत्र के कलाकार हो, सबको समान रुप से प्रभावित करते हैं। कलाकार अपनी अनुभूति या अपनी खुशी के लिए अवश्य अपनी कला का प्रदर्शन करता हो, परन्तु उसके क्षेत्र की विवशता एक रंचनाकार से अलग नहीं है। जैसे एक अभिनेता, मंच कलाकार या नृत्यकार हो सबको उनके निर्माता या निर्देशकों के दबाव पर प्रदर्शन करना पड़ता है। जनता के सम्मुख अपनी कला का श्रेष्ठ प्रदर्शन करें, इसलिए जनता का दबाव भी उन्हें प्रभावित करता है। उनकी आर्थिक स्थिति तो प्रभावित करती ही है क्योंकि यदि आर्थिक दृष्टि से वह सबल नहीं है तो वह अपनी ज़रुरतों का निर्वाह करने में असमर्थ महसूस करेगा। यह सब दबाव हर क्षेत्र के कलाकार को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 6. हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंत: व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?

उत्तर: यद्यपि जब लेखक जापान घूमने गया था तो हिरोशिमा में उस विस्फोट से पीड़ित लोगों को देखकर उसे थोड़ी पीड़ा हुई परन्तु उसका मन लिखने के लिए उसे प्रेरित नहीं कर पा रहा था। पर जले पत्थर पर किसी व्यक्ति की उजली छाया को देखकर उसको हिरोशिमा में विस्फोट से प्रभावित लोगों के दर्द की अनुभूति कराई।

हिरोशिमा के पीड़ितों को देखकर लेखक को पहले ही अनुभव हो चुका था परन्तु इस ज्वलंत उदाहरण ने उसके हृदय में वो अनुभूति जगाई कि लेखक को लिखने के लिए प्रेरित किया। ये अनुभव उसका बाह्य दबाव था और अनुभूति उसका आंतरिक दबाव जो उसके प्रेरणा सूत्र बने और उस प्रेरणा ने एक कविता लिखने के लिए लेखक को प्रेरित किया।

प्रश्न 7. हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और किस तरह से हो रहा है।

उत्तर: हिरोशिमा तो विज्ञान के दुरुपयोग का ज्वलंत उदाहरण है ही पर हम मनुष्यों द्वारा विज्ञान का और भी दुरुपयोग किया जा रहा है। आज हर देश परमाणु अस्त्रों को बनाने में लगा हुआ है जो आने वाले भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस विज्ञान की देन के द्वारा आज हम अंगप्रत्यारोपण कर सकते हैं। एक व्यक्ति के खराब अंग के स्थान पर दूसरे व्यक्ति के द्वारा दान में दिए गए अंगों का प्रत्यारोपण किया जाता है। परन्तु आज इस देन का दुरुपयोग कर हम मानव अंगो का व्यापार करने लगे हैं। विज्ञान ने कंप्यूटर का आविष्कार किया उसके पश्चात् उसने इंटरनेट का आविष्कार किया ये उसने मानव के कार्यों के बोझ को कम करने के लिए किया। हम मनुष्यों ने इन दोनों का दुरुपयोग कर वायरस व साइबर क्राइम को जन्म दिया है। विज्ञान ने यात्रा को सुगम बनाने के लिए हवाई जहाज़, गाड़ियों आदि का निर्माण किया परन्तु हमने इनसे अपने ही वातावरण को प्रदूषित कर दिया है। ऐसे कितने ही अनगिनत उदाहरण हैं जिससे हम विज्ञान का दुरुपयोग कर महाविनाश की ओर बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 8. एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?

उत्तर: हमारी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये कहना कि विज्ञान का दुरुपयोग हो रहा है – सही है! परन्तु हर व्यक्ति इसका दुरुपयोग कर रहा है। यह कहना सर्वथा गलत होगा। क्योंकि कुछ लोग इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कार्य करते रहते हैं।

(1) आज हमारे अथक प्रयासों के द्वारा ही परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। क्योंकि हथियार लगभग सभी देशों के पास है परन्तु परमाणु संधियों द्वारा इनके प्रयोगों में रोक लगा दी गई है। हमें चाहिए हम इनका समर्थन करें।

(2) प्रदूषण के प्रति जनता में जागरुकता लाने के लिए अनेकों कार्यक्रमों व सभा का आयोजन किया जा रहा है। जिससे प्रदूषण के प्रति रोकथाम की जा सके। इन समारोहों में जाकर व लोगों को बताकर हम अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं।

(3) अंग प्रत्यारोपण पर मीडिया के अथक प्रयास से ही अंकुश लगना संभव हो पाया है। हमें चाहिए कि उसके इस प्रयास में उसका साथ दे व जहाँ पर भी ऐसी कोई गतिविधि चल रही हो उससे मीडिया व कानून को जानकारी देकर उनका सहयोग करें।

प्रश्न 9. लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?

उत्तर: लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव वह होता है, जिसे हम घटित होते हुए देखते हैं। इसके माध्यम से हम अनुभूति, संवेदना और कल्पना को सरलता से आत्मसात् कर लेते हैं। यह वास्तव में रचनाकार के साथ घटित नहीं होता है। वह आँखों के आगे नहीं आया होता। अनुभव की तुलना में अनुभूति (महसूस करने की क्षमता) लेखक के हृदय के सारे भावों को बाहर निकालने में उसकी सहायता करती है। जब तक हृदय में अनुभूति न जागे लेखन का कार्य करना संभव नहीं है। क्योंकि यही हृदय में संवेदना जागृत करती है और लेखन के लिए मजबूर करती है। यही कारण है कि लेखक लेखन के लिए अनुभूति को अधिक महत्व देता है।

प्रश्न 10. लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया?

उत्तर: लेखक ने अपनी जापान यात्रा के दौरान हिरोशिमा का दौरा किया था। वह उस अस्पताल में भी गया जहाँ आज भी उस भयानक विस्फोट से पीड़ित लोगों का ईलाज हो रहा था। इस अनुभव द्वारा लेखक को, उसका भोक्ता बनना स्वीकारा नहीं था ।कुछ दिन पश्चात् जब उसने उसी स्थान पर एक बड़े से जले पत्थर पर एक व्यक्ति की उजली छाया देखी, विस्फोट के समीप कोई व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा रहा होगा। विस्फोट से विसर्जित रेडियोधर्मी पदार्थ ने उस व्यक्ति को भाप बना दिया और पत्थर को झुलसा दिया। इस प्रत्यक्ष अनुभूति ने लेखक के हृदय को झकझोर दिया। उसे प्रतीत हुआ मानो किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो और उसके भीतर उस विस्फोट का भयानक दृश्य प्रज्वलित हो गया। उसे जान पड़ा मानो वह स्वयं हिरोशिमा बम का उपभोक्ता बन गया हो।

प्रश्न 11. मैं क्यों लिखता हूँ? के आधार पर बताइए कि –

(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?

(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?

उत्तर:

(क) लेखक अपनी आंतरिक विवशता के कारण लिखने के लिए प्रेरित होता है। उसकी अनुभूति उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है व स्वयं को जानने के लिए भी वह लिखने के लिए प्रेरित होता है।

(ख) किसी रचनाकार को उसकी आंतरिक विवशता रचना करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु कई बार उसे संपादकों के दवाब व आग्रह के कारण रचना लिखने के लिए उत्साहित होना पड़ता है। कई बार प्रकाशक का तकाज़ा व उसकी आर्थिक विवशता भी उसे रचना, रचने के लिए उत्साहित करती है।

प्रश्न 12. कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं?

उत्तर: कोई आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव, उसे हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। फिर चाहे कुछ भी हो परन्तु इनके साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्वपूर्ण होते हैं। ये दबाव संपादकों का आग्रह हो सकता है या फिर प्रकाशक का तकाज़ा या उसकी स्वयं की आर्थिक स्थिति जो उसे रचना करने के लिए दबाव डालती है।

प्रश्न 13. क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?

उत्तर: बिल्कुल! ये दवाब किसी भी क्षेत्र के कलाकार हो, सबको समान रुप से प्रभावित करते हैं। कलाकार अपनी अनुभूति या अपनी खुशी के लिए अवश्य अपनी कला का प्रदर्शन करता हो, परन्तु उसके क्षेत्र की विवशता एक रंचनाकार से अलग नहीं है। जैसे एक अभिनेता, मंच कलाकार या नृत्यकार हो सबको उनके निर्माता या निर्देशकों के दबाव पर प्रदर्शन करना पड़ता है। जनता के सम्मुख अपनी कला का श्रेष्ठ प्रदर्शन करें, इसलिए जनता का दबाव भी उन्हें प्रभावित करता है। उनकी आर्थिक स्थिति तो प्रभावित करती ही है क्योंकि यदि आर्थिक दृष्टि से वह सबल नहीं है तो वह अपनी ज़रुरतों का निर्वाह करने में असमर्थ महसूस करेगा। यह सब दबाव हर क्षेत्र के कलाकार को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 14. हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंत: व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?

उत्तर: यद्यपि जब लेखक जापान घूमने गया था तो हिरोशिमा में उस विस्फोट से पीड़ित लोगों को देखकर उसे थोड़ी पीड़ा हुई परन्तु उसका मन लिखने के लिए उसे प्रेरित नहीं कर पा रहा था। पर जले पत्थर पर किसी व्यक्ति की उजली छाया को देखकर उसको हिरोशिमा में विस्फोट से प्रभावित लोगों के दर्द की अनुभूति कराई।

हिरोशिमा के पीड़ितों को देखकर लेखक को पहले ही अनुभव हो चुका था परन्तु इस ज्वलंत उदाहरण ने उसके हृदय में वो अनुभूति जगाई कि लेखक को लिखने के लिए प्रेरित किया। ये अनुभव उसका बाह्य दबाव था और अनुभूति उसका आंतरिक दबाव जो उसके प्रेरणा सूत्र बने और उस प्रेरणा ने एक कविता लिखने के लिए लेखक को प्रेरित किया।

प्रश्न 15. हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और किस तरह से हो रहा है।

उत्तर: हिरोशिमा तो विज्ञान के दुरुपयोग का ज्वलंत उदाहरण है ही पर हम मनुष्यों द्वारा विज्ञान का और भी दुरुपयोग किया जा रहा है। आज हर देश परमाणु अस्त्रों को बनाने में लगा हुआ है जो आने वाले भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस विज्ञान की देन के द्वारा आज हम अंगप्रत्यारोपण कर सकते हैं। एक व्यक्ति के खराब अंग के स्थान पर दूसरे व्यक्ति के द्वारा दान में दिए गए अंगों का प्रत्यारोपण किया जाता है। परन्तु आज इस देन का दुरुपयोग कर हम मानव अंगो का व्यापार करने लगे हैं। विज्ञान ने कंप्यूटर का आविष्कार किया उसके पश्चात् उसने इंटरनेट का आविष्कार किया ये उसने मानव के कार्यों के बोझ को कम करने के लिए किया। हम मनुष्यों ने इन दोनों का दुरुपयोग कर वायरस व साइबर क्राइम को जन्म दिया है। विज्ञान ने यात्रा को सुगम बनाने के लिए हवाई जहाज़, गाड़ियों आदि का निर्माण किया परन्तु हमने इनसे अपने ही वातावरण को प्रदूषित कर दिया है। ऐसे कितने ही अनगिनत उदाहरण हैं जिससे हम विज्ञान का दुरुपयोग कर महाविनाश की ओर बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 16. एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?

उत्तर: हमारी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये कहना कि विज्ञान का दुरुपयोग हो रहा है – सही है! परन्तु हर व्यक्ति इसका दुरुपयोग कर रहा है। यह कहना सर्वथा गलत होगा। क्योंकि कुछ लोग इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कार्य करते रहते हैं।

(1) आज हमारे अथक प्रयासों के द्वारा ही परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। क्योंकि हथियार लगभग सभी देशों के पास है परन्तु परमाणु संधियों द्वारा इनके प्रयोगों में रोक लगा दी गई है। हमें चाहिए हम इनका समर्थन करें।

(2) प्रदूषण के प्रति जनता में जागरुकता लाने के लिए अनेकों कार्यक्रमों व सभा का आयोजन किया जा रहा है। जिससे प्रदूषण के प्रति रोकथाम की जा सके। इन समारोहों में जाकर व लोगों को बताकर हम अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं।

(3) अंग प्रत्यारोपण पर मीडिया के अथक प्रयास से ही अंकुश लगना संभव हो पाया है। हमें चाहिए कि उसके इस प्रयास में उसका साथ दे व जहाँ पर भी ऐसी कोई गतिविधि चल रही हो उससे मीडिया व कानून को जानकारी देकर उनका सहयोग करें।

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Chhaya Mat Chhuna

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हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक

क्षितिज भाग-2 की कविता पढ़ेंगे

‘‘छाया मत छूना’’

कविता के रचयिता गिरिजा कुमार माथुर हैं।

बच्चो कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

कवि गिरिजाकुमार माथुर

जीवन परिचयः गिरिजा कुमार माथुर का जन्म ग्वालियर जिले के अशोक नगर कस्बे में 22 अगस्त सन् 1918 में हुआ था। वे एक कवि, नाटककार और समालोचक के रूप में जाने जाते हैं। गिरिजाकुमार की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता ने घर में ही उन्हें अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल आदि पढाया। स्थानीय कॉलेज से इण्टरमीडिएट करने के बाद वे 1936 में स्नातक उपाधि के लिए ग्वालियर चले गये। 1938 में उन्होंने बी.ए. किया, 1941 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. किया तथा वकालत की परीक्षा भी पास की। सन 1940 में उनका विवाह दिल्ली में कवयित्री शकुन्त माथुर से हुआ। शुरुआत में उन्होंने वकालत की, परन्तु बाद में उन्होंने आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में नौकरी की।

काव्य रचनाएँ :- गिरिजाकुमार माथुर जी की प्रमुख काव्य- रचनाएँ निम्नलिखित हैं –

नाश और निर्माण,  धूप के धान, शिलापंख चमकीले, भीतरी नदी की यात्रा इत्यादि। 1991 में कविता-संग्रह ‘‘मैं वक्त के सामने’’ के लिए उन्हें हिंदी के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

छाया मत छूना कविता का सारः- प्रस्तुत कविता ‘‘छाया मत छूना’’  में कवि गिरिजाकुमार माथुर जी ने हमें यह संदेश देने की कोशिश की है कि हमें अपने अतीत के सुखों को याद कर अपने वर्तमान के दुःख को और गहरा नहीं करना चाहिए। अर्थात व्यक्ति को अपने अतीत की यादों में डूबे न रहकर, अपनी वर्तमान स्थिति का डट कर सामना करना चाहिए और अपने भविष्य को उज्जवल बनाना चाहिए। कवि हमें यह बताना चाहता है कि इस जीवन में सुख और दुःख दोनों ही हमें सहन करने पड़ेंगे। अगर हम दुःख से व्याकुल होकर अपने अतीत में बिताए हुए सुंदर दिन या सुखों को याद करते रहेंगे, तो हमारा दुःख कम होने की बजाय और बढ़ जाएगा। हमारा भविष्य भी अंधकारमय हो जाएगा। इसलिए हमें अपने वर्तमान में आने वाले दुखों को सहन करके, अपने भविष्य को उज्जवल बनाने का प्रयास करना चाहिए।

छाया मत छूना (कविता)

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी

छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनीय

तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,

कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।

भूली सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण-

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि छाया मत छूना अर्थात अतीत की पुरानी यादों में जीने के लिए मना कर रहा है। कवि के अनुसार, जब हम अपने अतीत के बीते हुए सुनहरे पलों को याद करते हैं, तो वे हमें बहुत प्यारे लगते हैं, परन्तु जैसे ही हम यादों को भूलकर वर्तमान में वापस आते हैं, तो हमें उनके अभाव का ज्ञान होता है। इस तरह हृदय में छुपे हुए घाव फिर से हरे हो जाते हैं और हमारा दुःख बढ़ जाता है।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपने पुराने मीठे पलों को याद कर रहा है। ये सारी यादें उनके सामने रंग-बिरंगी छवियों की तरह प्रकट हो रही हैं, जिनके साथ उनकी सुगंध भी है। कवि को अपने प्रिय के तन की सुगंध भी महसूस होती है। यह चांदनी रात का चंद्रमा कवि को अपने प्रिय के बालों में लगे फूल की याद दिला रहा है। इस प्रकार हर जीवित क्षण जो हम जी रहे हैं, वह पुरानी यादों रूपी छवि में बदलता जाता है। जिसे याद करके हमें केवल दुःख ही प्राप्त हो सकता है, इसलिए कवि कहते हैं छाया मत छूना, होगा दुःख दूना।

यश है या न वैभव है, मान है न सरमायाय

जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।

प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,

हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।

जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन-

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

भावार्थ :- इन पंक्तियों में कवि हमें यह सन्देश देना चाहते हैं कि इस संसार में धन, ख्याति, मान, सम्मान इत्यादि के पीछे भागना व्यर्थ है। यह सब एक भ्रम की तरह हैं।

कवि का मानना यह है कि हम अपने जीवन-काल में धन, यश, ख्याति इन सब के पीछे भागते रहते हैं और खुद को बड़ा और मशहूर समझते हैं। लेकिन जैसे हर चांदनी रात के बाद एक काली रात आती है, उसी तरह सुख के बाद दुःख भी आता है। कवि ने इन सारी भावनाओं को छाया बताया है। हमें यह संदेश दिया है कि इन छायाओं के पीछे भागने में अपना समय व्यर्थ करने से अच्छा है, हम वास्तविक जीवन की कठोर सच्चाइयों का सामना डट कर करें। यदि हम वास्तविक जीवन की कठिनाइयों से रूबरू होकर चलेंगे, तो हमें इन छायाओं के दूर चले जाने से दुःख का सामना नहीं करना पड़ेगा। अगर हम धन, वैभव, सुख-समृद्धि इत्यादि के पीछे भागते रहेंगे, तो इनके चले जाने से हमारा दुःख और बढ़ जाएगा।

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं,

देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।

दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,

क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

भावार्थ :- कवि कहता है कि आज के इस युग में मनुष्य अपने कर्म पथ पर चलते-चलते जब रास्ता भटक जाता है और उसे जब आगे का रास्ता दिखाई नहीं देता, तो वह अपना साहस खो बैठता है। कवि का मानना है कि इंसान को कितनी भी सुख-सुविधाएं मिल जाएं वह कभी खुश नहीं रह सकता, अर्थात वह बाहर से तो सुखी दिखता है, पर उसका मन किसी ना किसी कारण से दुखी हो जाता है। कवि के अनुसार, हमारा शरीर कितना भी सुखी हो, परन्तु हमारी आत्मा के दुखों की कोई सीमा नहीं है। हम तो किसी भी छोटी-सी बात पर खुद को दुखी कर के बैठ जाते हैं। फिर चाहे वो शरद ऋतू के आने पर चाँद का ना खिलना हो या फिर वसंत ऋतू के चले जाने पर फूलों का खिलना हो। हम इन सब चीजों के विलाप में खुद को दुखी कर बैठते हैं।

इसलिए कवि ने हमें यह संदेश दिया है कि जो चीज हमें ना मिले या फिर जो चीज हमारे बस में न हो, उसके लिए खुद को दुखी करके चुपचाप बैठे रहना, कोई समाधान नहीं हैं, बल्कि हमें यथार्थ की कठिन परिस्थितियों का डट कर सामना करना चाहिए एवं एक उज्जवल भविष्य की कल्पना करनी चाहिए।

Chhaya Mat Chhuna Question & Answers

प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?

त्तरः कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात इसलिए कहीं है क्योंकि हर किसी को अपने जीवन में एक कठोर सत्य को सुनना और अपनाना पड़ता है। यहां कवि ये स्वीकार करने को कहते है कि, आज के समय के विषम परिस्थितियों से बचकर कहीं नहीं भागा जा सकता।

प्रश्न 2. भाव स्पष्ट कीजिए-

प्रभुता का शरणदृबिंब केवल मृगतृष्णा है,

हर चंद्रिका में एक रात कृष्णा है।

उत्तरः इस पंक्तियों में कवि गिरिजाकुमार माथुर जी के कहने का मतलब यह है कि मनुष्य अपने सुखदृसमृद्धि मानदृसम्मान और धनदृदौलत आदि के सुख को पूरा करने में लगा है, सुख केवल कुछ समय के लिए है, वैसे ही जैसे एक रेगिस्तान में एक प्यासे को पानी की आस में सूर्य की रेट में पड़ी चमक को पानी मान लेता है लेकिन उसके पास पहुंचने पर उसे धोखा ही होता है। इसलिए कभी कहते हैं वास्तविकता को प्रसन्नता से स्वीकार करो और अपने अतीत के सुख को याद करके भ्रम में मत पढ़ो अन्यथा दुख और अधिक बढ़ जाएगा।

प्रश्न 3. ‘छाया’ शब्द यहां किस संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है? कवि ने उसे छूने के लिए मना क्यों किया है?

उत्तरः यहां छाया सुख से भरे अतीत की यादों के प्रतिक के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

यहां कवि ने छाया को छूने के लिए मना इसलिए किया है क्योंकि बीते समय के सुखदृसमृद्धि क्षणों को याद करने पर वर्तमान के दुःख और भी बढ़ जाते हैं।

प्रश्न 4. कविता में विशेषण के प्रयोग से शब्दों के अर्थ में विशेष प्रभाव पड़ता है, जैसे कठिन यथार्थ। कविता में आए ऐसे अन्य उदाहरण छांट कर लिखिए और यह भी लिखिए कि इससे शब्दों के अर्थ में क्या विशेष्टता पैदा हुई है?

उत्तरः १. एक रात कृष्णादृ यहां एक रात (कृष्णा)- यह शब्द रात की काली प्रतिमा यानी अंधकार को दर्शाता है।

२. सुरंग सुधिया- (सुहावनी) – यहां यादो को रंग बिरंगी और मन को मोह देने वाले रूप में प्रस्तुत किया गया है।

३. शरद-रात – वो राते, जो सर्दी से भरी होती है।

४. दुधिया-हत- (साहस)- साहस टूटता दिखाई देना।

प्रश्न 5. मृगतृष्णा किसे कहते हैं? कविता में इसका प्रयोग किस अर्थ में हुआ है?

उत्तरः जब जेष्ठ के महीने में रेगिस्तान में कड़कती धूप की तिरछी किरणें रेगिस्तान की रेत या कहीं दूर सड़कों पर पड़ती है, तब वहां पानी के होने का एहसास होता है लेकिन पास आने पर पता चलता है कि वहां कुछ नहीं है, इस छल कि स्थिति को मृगतृष्णा कहते हैं। यह शब्द कीर्तिदृप्राप्त, सुखदृसमृद्धि, धनदृदौलत और इज्जतदृसम्मान आदि के अर्थ के लिए हुआ है।

प्रश्न 6. ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधिले’ यह भाव कविता की किस पंक्ति में झलकता है?

उत्तरः ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधिले’ यह भाव कविता के निम्नलिखित पंक्ति मे झलकता हैरूः-

‘क्या हुआ जो खिला फूल रसदृबसंत जाने पर?

जो ना मिला भूल उसे कर तू भविष्य वर्ण’

प्रश्न 7. कविता में व्यक्त दुख के कारणों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः ‘‘छाया मत छूना’’ कविता में कवि ने मनुष्य की हरदम कुछ ना कुछ पाने की इच्छा को ही दुख का मूल कारण माना है। मनुष्य मन में उत्पन्न कामनाओं-लालसाओं की पूर्ति के लिए हरदम कड़ी मेहनत रहता है और जब उसे उनसे तृप्ति नहीं मिलती तो दुख को छोड़ के उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जैसे ठीक समय पर जो कार्य पहले सोच रखा हो उसके वैसे ना होने पर भी दुख होता है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8. ‘‘जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी’’, से कवि का अभिप्राय जीवन की मधुर स्मृतियों से है। आपने अपने जीवन की कौन-कौन सी स्मृतियाँ संजो रखी हैं?

उत्तरः विद्यार्थी स्वयं करें।

उदाहरण के लिएः मेरी जीवन की सबसे सुंदर याद वह है जब मुझे अपनी पहली पुस्तक मिली थी। वह पुस्तक बहुत ही सुंदर और रंग-बिरंगे चित्रों से भरी हुई थी। मैंने उसे अभी भी बहुत ही संभाल के रखा हुआ है क्योंकि वह मेरी पहली गुरु है। जिससे मैंने शब्द पढ़ना सीखा।

प्रश्न 9. ‘क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?’ कवि का मानना है कि समय बीत जाने पर भी उपलब्धि मनुष्य को आनंद देती है। क्या आप ऐसा मानते हैं? तर्क सहित लिखिए।

उत्तरः इस पंक्ति में कवि का मानना है कि समय बीत जाने पर भी उपलब्धि मनुष्य को आनंद देती है। लेकिन हमारे मत के अनुसार समय बीत जाने पर उपलब्धि उतना आनंद नहीं देती जितना की समय पर प्राप्त होकर देती। क्योंकि समय पर प्राप्त हुई उपलब्धि मन को संतुष्ट करती है और संतुष्ट मन में ईर्ष्या, द्वेष और निराशा उत्पन्न नहीं होती। समय पर मिलने वाली सफलता मन को उत्साहित करती है और भविष्य के प्रति आशावादी दृष्टिकोण को भी विकसित करती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी

1. रंस-बसंत जीवन के किन दिनों का प्रतीक है?

(a) बुरे

(b) निराश

(c) सुहाने

(d) इनमें से कोई नहीं

Answer: (c) सुहाने

2. पुरानी मीठी यादों के साथ लगी सुहानी सुगंध कवि के तन-मन को क्या बना देती है?

(a) सुस्त

(b) चंचल

(c) मस्त

(d) रंगीन

Answer: (c) मस्त

3. उचित अवसर पर न मिलकर बाद में मिलने वाली ख़ुशी कैसी प्रतीत होती है?

(a) काल्पनिक

(b) व्यर्थ

(c) संतोषजनक

(d) निराशाजनक

Answer: (b) व्यर्थ

4. हर सुख में क्या छिपा रहता है?

(a) दुःख

(b) प्रेम

(c) दर्द

(d) याद

Answer: (a) दुःख

5. शरद रात किसका प्रतीक है?

(a) ठंड का

(b) खुशियों का

(c) धन का

(d) प्रेम का

Answer: (b) खुशियों का

6. कविता में मृगतृष्णा किसे कहा गया है?

(a) जल

(b) प्रभुता

(c) समृद्धि

(d) इनमें से कोई नहीं

Answer: (b) प्रभुता

7. चाँदनी रात को देखकर कवि को किसकी याद आती है?

(a) प्रेमिका के केशों में गूँथे फूल

(b) सांसारिक सुख

(c) माँ की

(d) इनमें से कोई नहीं

Answer: (a) प्रेमिका के केशों में गूँथे फूल

8. जब मनुष्य का मन दुविधाओं से भर जाता है तो क्या होता है?

(a) तब वह रोने लगता है|

(b) घर से भाग जाता है|

(c) वह लड़ने लगता है|

(d) तब उसे कोई रास्ता नहीं सूझता|

Answer: (d) तब उसे कोई रास्ता नहीं सूझता|

9.वसंत के समय फूल न खिलने का क्या आशय है?

(a) समय पर फूल का न खिलना

(b) सुख प्राप्त न होना

(c) सूखा पड़ना

(d) उचित अवसर का लाभ न मिलना

Answer: (d) उचित अवसर का लाभ न मिलना

10. कवि जीवन में क्या पाने के लिए दौड़ता रहा?

(a) यश

(b) धन

(c) ख़ुशी

(d) इनमें से कोई नहीं

Answer: (a) यश

तो बच्चो!

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धन्यवाद!

Savaiya Aur Kavitt (सवैया और कवित्त)

हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक
क्षितिज भाग-2 के काव्यखण्ड की कविता पढ़ेंगे
‘सवैया’ और ‘कवित्त’ ◄ FOR VIDEO CHAPTER CLICK HERE
savaiya aur kavitt class 10th kshitij part 2

कविता के रचयिता देव हैं।
इनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था।
बच्चो, दोनों कविताओं के भावार्थ को समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

कवि- देव
जीवन परिचय :- कवि देव का जन्म इटावा (उत्तर प्रदेश) में सन् 1673 में हुआ था। उनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था। देव के अनेक आश्रयदाताओं में औरंगजेब के पुत्र आजमशाह भी थे परन्तु देव को सबसे अधिक संतोष और सम्मान उनकी कविता गुणग्राही आश्रयदाता भोगीलाल से प्राप्त हुआ। उन्होंने उनकी कविता पर रीझकर लाखों की संपत्ति दान की। उनके काव्य ग्रंथों की संख्या 52 से 72 तक मानी जाती है। उनमें से रामविलास, भावविलास, काव्यरसायन, भावनिविलास आदि देव के प्रमुख ग्रन्थ माने जाते है।
देव रीतिकाल के प्रमुख कवि है। रीतिकालीन कविता का संबंध दरबारों, आश्रयदाताओं से था इस कारण उसमे दरबारी संस्कृति का चित्रण अधिक हुआ है। देव भी इससे अछूतें नहीं थे किन्तु वे इस प्रभाव से जब जब भी मुक्त हुए उन्होंने प्रेम और सौंदर्य के सहज चित्र खीचें।

कविता – सवैया
पाँयनि नूपुर मंजु बजै, कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
भावार्थ :-
यहाँ पर कवि देव ने श्री कृष्ण के मनमोहक रूप-सौंदर्य का सुंदर वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि कृष्ण के पैरों में पायल और कमर में करधनी बंधी है जिनसे अत्यधिक मधुर ध्वनि निकल रही है। उनके सांवले शरीर पर पीले वस्त्र और गले में सुंदर पुष्पों की माला सुशोभित हो रही है।

माथे किरीट बड़े दृग चंचल, मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई।
जै जग-मंदिर-दीपक सुंदर, श्रीब्रजदूलह ‘‘देव’’ सहाई।।
भावार्थ :-
कवि देव आगे कहते हैं कि श्री कृष्ण के सिर पर मोर मुकुट है और उनकी आंखें बड़ी-बड़ी व चंचल है। उनका मुख चंद्रमा के समान है और उस पर उनकी मंद-मंद मुस्कुराहट ऐसी प्रतीत हो रही हैं जैसे चारों ओर चंद्रमा की किरणें फैली हुई हों। अगली पंक्तियों में कवि देव कहते हैं कि जिस प्रकार एक दीपक पूरे मंदिर को रोशन करता है और अंधेरे को दूर भगाता है। ठीक उसी प्रकार संसार रूपी मंदिर में श्री कृष्ण एक दीपक की भाँति शोभायमान है। जो अपने ज्ञान के प्रकाश से इस पूरे संसार को रोशन कर रहे हैं और सबकी सहायता भी करते हैं। कवि देव कहते हैं कि हे !! ब्रज के दूल्हे कृष्ण, आप अपने भक्त देव की भी सहायता करें।

कविता – कवित्त
1.
डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दै ।
पवन झूलावै, केकी-कीर बतरावै ‘‘देव’’,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी दै।।
भावार्थ :-
उपरोक्त पंक्तियों में कवि देव ने बसंत ऋतु को कामदेव के बच्चे (नवजात शिशु) के रूप में दर्शाया है। जिस प्रकार जब किसी घर में बच्चा जन्म लेता हैं तो उस घर में खुशी का माहौल छा जाता है। घर के सभी लोग उस बच्चे की देखभाल में जुट जाते हैं। और उसे अनेक प्रकार से बहलाने व प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। घर की बुजुर्ग महिलाएं समय समय पर नमक और राई से उसकी नजर उतारती हैं।और सुबह के समय उसे बड़े प्यार से जगाया जाता हैं। ताकि वह रोये नहीं।
ठीक उसी प्रकार जब कामदेव का नन्हा शिशु बसंत आता है तब प्रकृति अपनी खुशी किस-किस तरह से प्रकट करती है। यहाँ पर कवि उसी का वर्णन कर रहे हैं।
बसंत ऋतु के आगमन से पेड़ों में नए-नए पत्ते निकल आते हैं। और डाली-डाली रंग बिरंगे फूलों से लद जाती हैं। मंद मंद पवन (हवा) बहने लगती हैं।

इसी को देखकर कवि देव कहते हैं कि बसंत एक नन्हे शिशु के रूप में आ चुका हैं। पेड़ों की डालियों उस नन्हे शिशु का पालना (झूला) हैं और उन डालियों पर उग आये नए-नए कोमल पत्ते उस पालने में बिछौने के समान है।
रंग बिरंगे फूलों का ढीला ढाला झगुला (वस्त्र) उस नन्हे शिशु के शरीर में अत्यधिक शोभायमान हो रहा है। हवा उसके पालने को झूला रही है और मोर व तोते अपनी-अपनी आवाज में उससे बातें कर रहे है। कोयल भी प्रसन्न होकर तालियां बजाकर-बजाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रही हैं।

पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै।।
भावार्थ :-
उपरोक्त पंक्तियों में कवि देव कहते हैं कि कमल की कली रूपी नायिका जिसने अपने सिर तक लता रूपी साड़ी पहनी है , वह अपने पराग कणों रूपी नमक , राई से बसंत रूपी नन्हे शिशु की नजर उतार रही हैं। (बसंत माह में फूलों के पराग कण हवा से दूर-दूर तक फैल जाते हैं। )
कवि देव कहते हैं कि यह बसंत रूपी नन्हा शिशु कामदेव महाराज का पुत्र है जिसे सुबह होते ही गुलाब की कलियाँ चुटकी बजाकर जगाती हैं। दरअसल गुलाब की कली पूरी खिलने से पहले थोड़ी चटकती हैं।

2.

फटिक सिलानि सौं सुधारयौ सुधा मंदिर ,
उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद।
बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए ‘‘देव’’,
दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद।

भावार्थ :- पूर्णमासी की रात को जब पूरा चन्द्रमा अपनी चाँदनी बिखेरता हैं तो आकाश और धरती बहुत खूबसूरत दिखाई देते हैं। और हर जगह झीनी और पारदर्शी चांदनी नजर आती है। कवि ने यहां पर उसी चाँदनी रात का वर्णन किया हैं।
पूर्णमासी की चांदनी रात में धरती और आकाश के सौंदर्य को निहारते हुए कवि कहते हैं कि चांदनी रात में सारा संसार दूधिया रोशनी में नहाया हुआ ऐसा दिखाई दे रहा है जैसे यह संसार स्फटिक की शिला (पत्थर) से बना हुआ एक सुंदर मंदिर हो।
कवि की नजरें जहां तक जाती हैं वहां तक उन्हें चांदनी ही चाँदनी नजर आती हैं। उसे देखकर कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा हैं जैसे धरती पर दही का समुद्र हिलोरा ले रहा हो। और चांदनी रूपी दही का समंदर उन्हें समस्त आकाश में भी उमड़ता हुआ नजर आ रहा है। चांदनी इतनी झीनी और पारदर्शी हैं कि कवि की नजरों उसे स्पष्ट देख पा रही हैं।
कवि आगे कहते हैं कि धरती पर फैली हुई चांदनी की रंगत किसी फर्श पर फैले दूध के झांग के समान उज्जवल है। और उसकी स्वच्छता और स्पष्टता दूध के बुलबुले के समान झीनी और पारदर्शी हैं।

तारा सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति,
मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद ।
आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै।
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद।।
भावार्थ :-
कवि को इस चाँदनी रात में आकाश के तारे भी सुंदर सुसज्जित खड़ी किशोरियों (युवा लड़कियों) की भाँति लग रहे हैं। और उन सुंदर किशोरियों को देखकर कवि को ऐसा लग रहा है जैसे कि मोतियों को चमक मिल गई या फिर मल्लिका के फूलों (बेले के फूल) को रस मिल गया हो।
कवि कहते हैं कि संपूर्ण वातावरण इतना उज्जवल हो गया है कि पूरा आकाश किसी दर्पण की भाँति दिखाई दे रहा है। जिसमें चारों तरफ रोशनी फैली हुई है। और उस दर्पण में पूर्णमासी का पूरा चांद ऐसा लग रहा है जैसे वह चाँद नही, बल्कि राधारानी का प्रतिबिंब हो।

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