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Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya 9th Summary

Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’

पाठ के लेखक शमशेर बहादुर सिंह हैं।

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक जीवन परिचयः शमशेर बहादुर सिंह

सन् (1911 – 1993)

Shamsher Bahadur Singh

लेखक परिचयः स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता के प्रमुख कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ और उनकी शिक्षा देहरादून एवं इलाहबाद विश्वविद्यालय से हुई। अनूठे काव्य-बिम्बों का सृजन करने वाले शमशेर केवल असाधारण कवि ही नहीं, एक अनूठे गद्य-लेखक भी है। ‘दोआब’, ‘प्लाट का मोर्चा’, जैसी गद्य रचनाओं के माध्यम से उनके विशिष्ट गद्यकार के रूप को पहचाना जा सकता है।

प्रमुख कृतियांः कुछ कविताएं, कुछ और कवितएं, चूका भी नहीं हूँ  मैं, इतने पास अपने, काल तुझसे होड़ है मेरी (काव्य संग्रह)य कुछ गद्य रचनाएँ, कुछ और गद्य रचनाएँ (गद्य-संग्रह)।

पाठ का सारः किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

प्रस्तुत लेख ‘किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’  हिंदी के प्रसिद्ध् लेखक शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा गया है। इस लेख में लेखक ने बताया है कि पहले उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लिखना शुरू किया था, किंतु बाद में अंग्रेजी-उर्दू को छोड़कर हिंदी में लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी वर्णन किया कि उन्हें अपने जीवन में क्या-क्या कष्ट झेलने पड़े। इसके साथ ही लेखक ने श्री सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन तथा श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के प्रति अपनी श्रद्धा को भी व्यक्त किया है।

लेखक कहते हैं कि वे जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में बस पकड़कर दिल्ली चले आए। दिल्ली आकर वे पेंटिंग सीखने की इच्छा से उकील आर्ट स्कूल पहुँचे। परीक्षा में पास होने के कारण उन्हें बिना फीस के ही वहाँ भर्ती कर लिया गया। वे करोल बाग में रहकर कनाट प्लेस पेंटिंग सीखने जाने लगे।

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रास्ते में आते-जाते वे कभी कविता लिखते और कभी ड्राइंग बनाते थे और अपनी ड्राइंग के तत्व खोजने के लिए वे प्रत्येक आदमी का चेहरा गौर से देखते थे। पैसे की बड़ी तंगी रहती थी। कभी-कभी उनके बड़े भाई तेज बहादुर उनके लिए कुछ रुपये भेज देते थे। वे कुछ साइनबोर्ड पर लिखकर कमा लेते थे। अतः अपनी टीस को व्यक्त करने के लिए वे कविताएँ और उर्दू में गजल के कुछ शेर भी लिखते थे। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी कविताएँ कभी छपेंगी।

उनकी पत्नी टी0बी0 (T.B.) की मरीज थीं और उनका देहांत हो चुका था। अतः वे बहुत दुःखी रहते थे। इस समय महाराष्ट्र के एक पत्रकार उनके साथ रहने लगे। इसी समय एक बार क्लास खत्म होने तथा उनके चले जाने के बाद बच्चन जी स्टूडियो में आए थे और लेखक के न मिलने पर वे लेखक के लिए एक नोट छोड़ गए थे। इसके बाद लेखक ने एक अंग्रेजी का सॉनेट लिखा, किंतु बच्चन जी के पास भेजा नहीं। कुछ समय बाद लेखक देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सीखने लगे। वे दुखी और उदास रहते थे। ऐसे में वह लिखा हुआ सॉनेट उन्होंने बच्चन जी को भेज दिया।

Harivansh Rai Bachchan

देहरादून आने पर बच्चन जी डिस्पेंसरी में आकर उनसे मिले थे। उस दिन मौसम बहुत खराब था और आँधी आ जाने के कारण वे एक गिरते हुए पेड़ के नीचे आते-आते बच गए थे। वे बताते हैं कि बच्चन जी की पत्नी का देहांत हो चुका था। अतः वे भी बहुत दुखी थे। उनकी पत्नी सुख-दुख की युवा संगिनी थीं। वे बात की धनी, विशाल हृदय और निश्चय की पक्की थीं। लेखक बीमार रहने लगे थे, अतः बच्चन जी ने उन्हें इलाहाबाद आकर पढ़ने की सलाह दी और वे उनकी बात मानकर इलाहाबाद आ गए। बच्चन जी ने उन्हें एम0ए0 (M.A.)  में प्रवेश दिला दिया क्योंकि वे चाहते थे कि लेखक काम का आदमी बन जाए क्योंकि स्वयं बच्चन जी ने अंग्रेजी में एम0ए0 (M.A.) फाइनल करने के बाद 10-12 साल तक नौकरी की थी, परंतु लेखक सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे।

वे बताते हैं कि उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदू बोर्डिंग हाउस के कॉमन रूम में एक सीट नि:शुल्क मिल गई। इसके साथ ही पंत जी की कृपा से उन्हें इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम भी मिल गया। अब उन्हें लगा कि गंभीरता से हिंदी में कविता लिखनी चाहिए, परंतु घर में उर्दू का वातावरण था तथा हिंदी में लिखने का अभ्यास छूट चुका था। अतः बच्चन जी उनके हिंदी के पुनर्संस्कार के कारण बने। इस समय तक उनकी कुछ रचनाएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ में छप चुकी थीं। ‘अभ्युदय’  में छपा लेखक का एक ‘सॉनेट’ बच्चन जी को बहुत पसंद आया था। वे बताते हैं कि पंत जी और निराला जी ने उन्हें हिंदी की ओर खींचा। बच्चन जी हिंदी में लेखन-कार्य शुरू कर चुके थे। अतः लेखक को लगा कि अब उन्हें भी हिंदी-लेखन में उतरने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। बच्चन जी ने उन्हें एक स्टैंजा का प्रकार बताया था। इसके बाद उन्होंने एक कविता लिख डाली। उन्हें बच्चन की ‘निशा-निमंत्राण’ वे आकार ने बहुत आकृष्ट किया। लेखक पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहे थे। इसलिए बच्चन जी को बहुत दुख था। वे बच्चन जी के साथ एक बार गोरखपुर कवि-सम्मेलन में भी गए थे।

अब लेखक की हिंदी में कविता लिखने की कोशिश सार्थक हो रही थी। ‘सरस्वती’  में छपी उनकी कविता ने निराला का ध्यान खींचा। लेखक ‘रूपाभ’ कार्यालय में प्रशिक्षण लेने के बाद बनारस के ‘हंस’  कार्यालय की ‘कहानी’  में चले गए।

वे कहते हैं कि निश्चित रूप से बच्चन जी ही उन्हें हिंदी में ले आए। वैसे बाद में बच्चन जी से दूर ही रहे, क्योंकि उन्हें चिट्ठी-पत्री तथा मिलने-जुलने में उतना विश्वास नहीं था। वैसे बच्चन जी उनके बहुत निकट रहे


Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Question Answers

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. वह ऐसी कौन सी बात रही होगी जिसने लेखक को दिल्ली जाने के लिए बाध्य कर दिया?

उत्तर: लेखक जिन दिनों बेरोजगार थे उन दिनों शायद किसी ने उन्हें कटु बातें की होगी जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाए होंगे और दिल्ली चले आए होंगे।

प्रश्न 2. लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस क्यों रहा होगा ?

उत्तर: लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस इसलिए रहा होगा क्योंकि वह भारत के जनता की भाषा नहीं थी। इसलिए भारत के लोग यानी उनके अपने लोग उस भाषा को समझ नहीं पाते होंगे।

प्रश्न 3. अपनी कल्पना से लिखिए कि बच्चन ने लेखक के लिए नोट में क्या लिखा होगा?

उत्तर: दिल्ली के उकील आर्ट स्कूल में बच्चनजी ने लेखक के लिए एक नोट छोड़कर गए थे। उस नोट में शायद उन्होंने लिखा होगा कि तुम इलाहाबाद आ जाओ। लेखन में ही तुम्हारा भविष्य निहित है। संघर्ष करने वाले व्यक्ति ही जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं अतःपरिश्रम से सफलता अवश्य तुम्हारे कदम चूमेगी।

प्रश्न 4. लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के किनदृकिन रूपों को उभारा है?

उत्तर: लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व को अनेक रूपों में उभारा है-

  1. बच्चन का स्वभाव बहुत ही संघर्षशील, परोपकारी और फौलादी संकल्प वाला था।
  2. बच्चनजी समय के पाबन्द होने के साथदृसाथ कलादृप्रतिभा के पारखी थे। उन्होंने लेखक द्वारा लिखे गए एक ही सॉनेट को पढ़कर उनकी कलादृ प्रतिभा को पहचान लिया था।
  3. बच्चनजी अत्यंत ही कोमल एवं सहृदय के मनुष्य थे।
  4. वे हृदय से ही नहीं, कर्म से भी परम सहयोगी थे। उन्होंने न केवल लेखक को इलाहाबाद बुलाया बल्कि लेखक की पढ़ाई का सारा जिम्मा भी अपने ऊपर उठा लिया।

प्रश्न 5. बच्चन के अतिरिक्त लेखक को अन्य किन लोगों का तथा किस प्रकार का सहयोग मिला?

उत्तर: बच्चन के अतिरिक्त लेखक को निम्नलिखित लोगों का सहयोग प्राप्त हुआ-

  1. तेजबहादुर सिंह लेखक के बड़े भाई थे। ये आर्थिक तंगी के समय में उन्हें कुछ रुपये भेजकर उनका सहयोग किया करते थे।
  2. कवि नरेंद्र शर्मा लेखक के मित्र थे। एक दिन वे लेखक से मिलने के लिए बच्चन जी के स्टूडियो में आये। छुट्टी होने कारण वे लेखक से नहीं मिल सके। तब वे उनके नाम पर एक बहुत अच्छा और प्रेरक नोट छोड़ गए। इस नोट ने लेखक को बहुत सी प्रेरणा दी।
  3. शारदाचरण उकील कला शिक्षक थे। इनसे लेखक ने पेंटिंग की शिक्षा प्राप्त की।
  4. हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने लेखक को इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम दिला दिया। उन्होंने लेखक द्वारा लिखी कविताओं में कुछ संशोधन भी किया।
  5. लेखक को देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सिखाने में उसकी ससुराल वालों ने मदद की।

प्रश्न 6. लेखक के हिंदी लेखन में कदम रखने का क्रमानुसार वर्णन कीजिये।

उत्तर: हरिवंशराय बच्चन जी के बुलावे पर लेखक इलाहाबाद आ गया। यहीं उन्होंने हिंदी कविता लिखने का गंभीरता से मन बनाया। इसी समय उनकी कुछ कविताएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थीं। उन्होंने बच्चन जी की ‘निशा निमंत्रण’ के रूप प्रकार पर भी लिखने का प्रयास किया, पर ऐसा लिखना उन्हें कठिन जान पड़ा। उनकी एक कविता को पंत जी ने संशोधित किया। सरस्वती पत्रिका में छपी एक कविता ने निराला का ध्यान खींचा। इसके बाद लेखक ने हिंदी लेखन में नियमित रूप से कदम बढ़ा दिया।

प्रश्न 7. लेखक ने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों को झेला है, उनके बारे में लिखिए।

उत्तर: लेखक ने अपने जीवन में प्रारम्भ से ही अनेक कठिनाइयों को झेला है। वह किसी के व्यंग्यदृबाण का शिकार होकर केवल पाँच-सात रुपए लेकर ही दिल्ली चले गए। वह बिना किसी फीस के पेंटिंग के उकील स्कूल में भर्ती हो गए। वहाँ उन्हें साइन-बोर्ड पेंट करके गुजारा चलाना पड़ा। लेखक की पत्नी का टी.बी. के कारण देहांत हो गया था और वे युवावस्था में ही विधुर हो गए थे। इसलिए उन्हें पत्नी-वियोग का पीड़ा भी झेलना पड़ा था। बाद में एक घटना-चक्र में लेखक अपनी ससुराल देहरादून आ गया। वहाँ वह एक दूकान पर कम्पाउंडरी सिखने लगे थे। वह बच्चन जी के आग्रह पर इलाहाबाद चले गए। वहाँ बच्चन जी के पिता उनके लोकल गार्जियन बने। बच्चन जी ने ही उनकी एम.ए. की पढ़ाई का खर्चा उठाया। बाद में उन्होंने इंडियन प्रेस में अनुवाद का भी काम किया। उन्हें हिन्दू बोर्डिंग हाउस के कामनदृरूम में एक सीट फ्री मिल गयी थी। तब भी वह आर्थिक संघर्ष से जूझ रहे थे।


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Is Jal Pralay Mein Class 9th Summary

Is Jal Pralay Mein Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 11वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

‘इस जल प्रलय में’

Is Jal Pralay Mein Chapter 1

पाठ के लेखक फणीश्वर नाथ हैं।

…………………………

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक फणीश्वरनाथ रेणु

Fanishwar Nath Renu

जन्मः फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को औराडी हिंगन्ना, जिला पूर्णियां, बिहार में हुआ। आप आजीवन शोषण और दमन के विरूद्ध संधर्षरत रहे। इसी प्रसंग में सोशलिस्ट पार्टी से जा जुड़े व राजनीति में सक्रिय भागीदारी की। 1942 के भारत-छोड़ो आंन्दोलन में सक्रिय भाग लिया।

“इस जल प्रलय में”  एक रिपोर्ताज है जिसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जी हैं। इस रिपोर्ताज में उन्होंने सन 1975 में पटना में आई भयंकर बाढ़ का आंखों देखा हाल बयान किया है।

रिपोर्ताज की शुरुवात लेखक ने कुछ इस तरह से की हैं।

सावन और भादो (जुलाई-अगस्त माह) के महीने में जब पश्चिम दिशा, पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा में बहने वाली कोसी, पनार, महानंदा और गंगा नदी में बाढ़ आती है तो वहाँ के लोग व जानवर लेखक के गांव व उसके आसपास के क्षेत्रों में शरण लेने आते है। क्योंकि लेखक का गांव जिस क्षेत्र में पड़ता है। वहाँ की जमीन विशाल और परती है।

परती क्षेत्र में जन्म लेने के कारण लेखक को तैरना भी नहीं आता था। क्योंकि इस तरह के क्षेत्रों में पानी की मात्रा कम होती हैं। (परती, वह भूमि होती हैं जो एकदम बंजर नहीं होती है। मगर इस तरह की जमीन को एक साल खेती करने के बाद दो-तीन साल के लिए खाली छोड़ दिया जाता है ताकि मिट्टी की उर्वरकता बनी रही।)

लेखक कहते हैं कि वो 10 वर्ष की उम्र से ही बाढ़ पीडि़तों के लिए स्वयंसेवक या रिलीफवर्कर के रूप में कार्य करते आ रहे हैं और लेखक ने दसवीं क्लास में बाढ़ पर एक लेख लिखकर पहला पुरस्कार भी हासिल किया था। इसके अलावा प्रतिष्ठित “धर्मयुग मैगजीन” के “कथा दशक कालम” के अंतर्गत बाढ़ से संबंधित उनकी एक कहानी भी छपी थी।

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उन्होंने बाढ़ पर 1947 में ‘‘जय गंगा”, 1948 में ‘‘डायन कोसी”, 1948 में ‘‘हड्डियों का पुल” रिपोर्ताज लिखे। इसके अलावा उन्होंने अपने कई उपन्यासों में भी बाढ़ की विनाश लीलाओं के बारे में लिखा हैं।

लेखक जब अपने गांव में रहते थे तो उन्होंने बाढ़ के बारे में सुना जरूर था मगर उसे कभी झेला नहीं था। लेकिन सन 1967 में पटना शहर में आयी बाढ़ की विभीषिका को उन्होंने पहली बार खुद अपनी आँखों से देखा और झेला भी। जब 18 घंटे तक लगातार जोरदार बारिश हुई और पुनपुन नदी का पानी राजेंद्रनगर, कंकड़बाग और अन्य निचले हिस्से में घुस आया था।

इसीलिए इस बार जब बाढ़ का पानी शहर में आने लगा और पटना का पश्चमी भाग छाती भर पानी में डूबने लगा तो, लेखक अपने घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कंपोज की गोलियां जमा कर बाढ़ के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

अगली सुबह लेखक को पता चला कि राजभवन और मुख्यमंत्री निवास तक बाढ़ का पानी आ चुका हैं और दोपहर में उन्हें किसी ने बंगला भाषा में बताया कि गोलघर तक बाढ़ आ चुकी हैं।और शाम 5ः00 बजे तक काॅफी हाउस भी बाढ़ के पानी में डूब चुका था जिसकी खबर लेखक को एक रिक्शेवाले ने दी। जब लेखक काॅफी हाउस जाने के लिए अपने एक कवि मित्र के साथ घर से निकले थे। ये कवि मित्र लेखक की उटपटांग बातों से कभी बोर नहीं होते थे।

लोग बाढ़ देखने के लिए रिक्शे, तांगे, टमटम, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि वाहनों से जा रहे थे। रास्ते में बाढ़ देखने जाने और आने वाले लोग सिर्फ बाढ़ से संबंधित बातों ही कर रहे थे। तभी लेखक कॉफी हाउस पहुंच गए, जो बंद कर दिया गया था।

लेखक ने सड़क किनारे आये पानी को देखकर अपने कवि मित्र को बताया कि ‘‘मृत्यु का तरल दूत” यानी बाढ़ का पानी यहां तक आ पहुंचा है। अब हम आगे नहीं जाएंगे। लेखक डर गए और रिक्शे से गांधी मैदान की ओर चल पड़े।

लेखक कहते हैं कि गांधी मैदान में दशहरा के दिन “राम रथ” की प्रतीक्षा में जितने लोग इंतजार में खड़े रहते हैं। उतने ही आज वहां बाढ़ देखने के लिए भी इकट्ठे हुए थे।

शाम को 7:30 बजे पटना के आकाशवाणी केंद्र ने घोषणा की, पानी आकाशवाणी के स्टूडियो की सीढि़यों तक पहुंच गया है। हालाँकि पान की दुकानों पर खड़े होकर निश्चिंत होकर, हंस बोलकर समाचार सुन रहे थे। और कुछ दुकानदार अपना सामान टम्पो, टमटम आदि में लाद रहे थे। परंतु लेखक और उनके मित्र के चेहरे पर डर और उदासी का भाव था।

लेखक अब राजेंद्र नगर चैराहे पहुंचे। जहां एक मैगजीन कॉर्नर पर पहले के जैसे ही पत्र-पत्रिकाएं बिक रही थी। वहां से लेखक ने कुछ पत्रिकाएं खरीदी और अपने कवि मित्र से विदा लेकर अपने घर आ गए।

घर पहुंचने पर उन्हें जनसंपर्क विभाग की गाड़ी के लाउडस्पीकर पर बाढ़ से संबंधित चेतावनी सुनाई दे रही थी जिसमें सबको सावधान रहने के लिए कहा जा रहा था । सारा शहर जाग रहा था। देर रात तक जागने के बाद लेखक सोना चाहते थे परन्तु उन्हें नींद नहीं आ रही थी। तभी उनके दिमाग में कुछ पुरानी यादें / घटनाएँ ताजा हो गई।

सबसे पहले उन्हें सन 1947 में मनिहारी जिले में आयी बाढ़ याद आई। जब वो अपने गुरुजी (स्व. सतीनाथ भादुड़ी जी) के साथ नाव से गंगा नदी में आयी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में पकाही धाव की दवा (पानी में लगातार पैर रहने से पकने को पकाही धाव कहते हैं), केरोसिन तेल, दियासलाई आदि लेकर सहायता करने पहुंचे थे।

इसके बाद सन् 1949 में महानंदा नदी में आयी बाढ़ ने भी कहर बरपाया था। लेखक एक डाक्टर साहब के साथ ‘‘वापसी थाना” के एक गांव से बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप ले जा रहे थे। तभी एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ गया। कुत्ते को देख डाक्टर साहब डर गये। बाद में कुत्ता व नौजवान दोनों नाव से उतर गये।

लेखक आगे कहते हैं कि वो परमान नदी की बाढ़ में फंसे मुसहरों की बस्ती (पत्तों से दौने बनाने वाले लोग) में भी राहत बांटने पहुंचे। जो कई दिनों से मछली और चूहे भून कर खा रहे थे। जब वो अपने साथियों के साथ उस बस्ती पर पहुंचे तो देखा कि वहां एक ऊंचे मचान पर “बलवाही” नाच हो रहा था। और एक काला सा आदमी लाल साड़ी में दुल्हन की एक्टिंग कर लोगों को हंसा रहा था।

लेखक मुसहरों की बस्ती में राहत सामग्री बाँट कर वापस आ रहे थे, तो उन्हें अपने परम मित्र भोला शास्त्री जी की बहुत याद आई।

लेखक को यहां पर दो और घटनाएं भी याद गई।

पहली घटना 1937 की हैं। जब सिमरवनी-शकरपुर में बाढ़ के समय नाव को लेकर लड़ाई हो गई थी। लेखक उस समय स्काउट बॉय थे। गांव में नाव नहीं थी। इसलिए लोग केले के पेड़ से नाव (भेला) बनाकर काम चला रहे थे और जमींदार के लड़के नाव पर हारमोनियम, तबला लेकर जलविहार करने में मस्त थे। इससे नाराज गांव के नौजवानों ने मिलकर जमीदार के बेटों की नाव छीन ली और उनके साथ थोड़ी मारपीट भी की।

और दूसरी घटना लेखक को तब की याद आ रही है जब सन 1967 में पुनपुन नदी का पानी राजेंद्र नगर में घुस आया। और एक नाव पर कुछ नौजवान लड़के-लड़कियां की टोली स्टोव, केतली, बिस्कुट लेकर किसी फिल्मी सीन की तरह, कश्मीर का आनंद लेने के लिए निकल पड़े।

उनके ट्रांजिस्टर में “हवा में उड़ता जाए” गाना बज रहा था। जैसे ही उनकी नाव गोलंबर पर पहुंची तो ब्लॉक की छत पर खड़े लड़कों ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया और वो शर्मिंदा होकर वहां से भाग गए।

इसके बाद लेखक अपनी पुरानी यादों से बाहर वर्तमान समय में आ चुके हैं और इस समय रात के 2:30 बजे रहे हैं। पर बाढ़ का पानी अभी तक शहर में नहीं पहुंचा हैं। लेखक को लगा कि शायद इंजीनियरों ने तटबंध ठीक कर दिया हो।जिस वजह से पानी शहर तक नहीं पहुंचा हैं।

इसके थोड़ी देर बाद लेखक को नींद आ गई। सुबह 5:30 बजे जब लोगों ने उन्हें जगाया तो लेखक ने देखा कि सभी जागे हुए थे और पानी पूरे मोहल्ले में फैल चुका था। चारों ओर चीख-पुकार मची हुई थी।

हर जगह पानी की लहरों नृत्य करते हुई दिखाई दे रही थी। यानि चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। लेखक कहते हैं कि मैं बाढ़ के दृश्य तो बचपन से देखता आ रहा हूं। लेकिन इस बार के जैसे बाढ़ मैंने पहले कभी नहीं देखी।लेखक कहते हैं कि इस वक्त ना मेरे पास मूवी कैमरा है, ना टेप रिकॉर्डर और ना मेरे पास कलम है। अच्छा है कुछ भी नहीं है मेरे पास।


Is Jal Pralay Mein Chapter Question Answer

इस जल प्रलय में पाठ के अभ्यास के प्रश्नः

प्रश्न-1: बाढ़ की खबर सुनकर लोग किस तरह की तैयारी करने लगे?

उत्तर – बाढ़ की खबर से सारे शहर में आतंक मचा हुआ था। लोग अपने सामान को नीचली मंजिल से ऊपरी मंजिल में ले जा रहे थे। सारे दुकानदार अपना सामान रिक्शा, टमटम, ट्रक और टेम्पो पर लादकर उसे सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे थें। खरीद-बिक्री बंद हो चुकी थी। लोग घरों में खाने का सामान, दियासलाई, मोमबत्ती, दवाईयाँ, किरोसीन आदि का प्रबन्ध करने में लगे हुए थे।

प्रश्न-2: बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने के लिए लेखक क्यों उत्सुक था ?

उत्तर- लेखक ने पहले बाढ़ के बारे में सुना जरूर था पर कभी देखा नही था। उसने अपनी कई रचनाओ में बाढ़ की विनाशलीला का उल्लेख किया था। वह स्वयं अपनी आँखों से बाढ़ के पानी को शहर में घुसते और उसकी विनाशलीला के बारे में जानने को उत्सुक था।

प्रश्न-3: “मृत्यु का तरल दूत” किसे कहा गया है और क्यों?

उत्तर- बाढ़ के लगातार बढ़ते जल को श्मृत्यु का तरल दूतश् कहा गया है। बाढ़ के इस आगे बढ़ते हुए जल ने न जाने कितने प्राणियों को उजाड़ दिया था, बहा दिया था और बेघर करके मौत की नींद सुला दिया था। इस तरल जल के कारण लोगों को मरना पड़ा, इसलिए इसे मृत्यु का तरल दूत कहना बिल्कुल सही है।

प्रश्न-4: खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक क्यों बढ़ गई थी?

उत्तर- खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक बढ़ गई थी क्योंकि लोग बाढ़ को देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में  इकट्ठे हो गए थे। वे बाढ़ से भयभीत नहीं थे, बल्कि हंसी-खुशी और कौतुहल से युक्त थे। ऐसे समय में पान उनके लिए समय गुजारने का सबसे अच्छा साधन था।

प्रश्न-5: जब लेखक को यह अहसास हुआ की उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उसने क्या-क्या प्रबंध किए?

उत्तर- जब लेखक को अहसास हुआ की उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उन्होंने आवश्यक ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कम्पोज की गोलियाँ इकट्ठी कर लीं ताकि बाढ़ से घिर जाने पर कुछ दिनों तक गुजारा चल सकें। उन्होंने बाढ़ आने छत पर चले जाने का भी प्रबंध सुनिश्चित कर लिया।

प्रश्न-6: बाढ़ पीडि़त क्षेत्र में कौन-कौन सी बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है?

उत्तर – बाढ़ के बाद हैजा, मलेरिया, टाइफाइड आदि बीमारियों के फैलने की संभावना रहती है क्योंकि बाढ़ के उतरे पानी में मच्छर अत्यधिक मात्रा में पनपते हैं जिसके कारण मलेरिया जैसी बीमारी हो जाती है। पानी की कमी से लोगो को गंदा पानी पीना पड़ता है जो हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों को न्यौता देता है।

तो बच्चों!

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Reedh Ki Haddi Chapter 3 Summary

Reedh Ki Haddi Chapter 3 Summary, Explanation & Question Answers

Class 9TH Hindi Kritika Part 1

हैलो बच्चों!

अज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

“रीढ़ की हड्डी”

Reedh Ki Haddi

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पाठ के लेखक जगदीष चंद्र माथुर हैं।

आइए बच्चो, पाठ के सार को सरल शब्दों में समझते हैं।

“’रीढ़ की हड्डी“ के लेखक जगदीश चंद्र माथुर जी हैं। यह एक एकांकी (छोटा नाटक) हैं। जो शादी ब्याह तय करने से पहले “लड़की दिखाने की”  सामाजिक समस्या पर आधारित हैं।

लेखक ने इस नाटक के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि हम चाहे कितना भी पढ़-लिख जाय, कितने भी आधुनिक क्यों ना हो जाए, लेकिन महिलाओं के प्रति हमारी सोच नही बदली है। और न ही हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठ पाए हैं। लेखक ने इस पाठ के माध्यम से स्त्री शिक्षा के महत्व को भी समझाया हैं।

हमारे समाज में विवाह जैसी पवित्र परम्परा का भी व्यवसायीकरण हो गया है। लोग शादी विवाह के वक्त लड़की के माता-पिता से दहेज के रूप में धन, वाहन और अन्य घरेलू वस्तुओं को मांगने में जरा भी नहीं हिचकते हैं। पता नहीं उनको ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो अपने लड़के की शादी उस लड़की से कर उसके माता-पिता पर एहसान कर रहे हैं।

लाख बुराइयों के बाद भी लड़के को खरा सोना और सर्वगुण संपन्न व पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी लड़की को कमतर ही आँका जाता है। दहेज समस्या की वजह से ही आज हमारे देश कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं।

इस कहानी में लेखक ने भी बस यही समझाने की कोशिश की है।

“’रीढ़ की हड्डी” कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह से होती हैं। उमा एक पढ़ीलिखी शादी के योग्य लड़की हैं जिसके पिता रामस्वरूप उसकी शादी के लिए चिंतित हैं। और आज उनके घर लड़के वाले (यानि बाबू गोपाल प्रसाद जो पेशे से वकील हैं और उनका लड़का शंकर जो बीएससी करने के बाद मेडिकल की पढाई कर रहा हैं।) उमा को देखने आ रहे हैं।

चूंकि रामस्वरूप की बेटी उमा को देखने के लिए आज लड़के वाले आ रहे हैं। इसीलिए रामस्वरूप अपने नौकर रतन के साथ अपने घर के बैठक वाले कमरे को सजा रहे हैं। उन्होंने बैठक में एक तख्त (चारपाई) रख कर उसमें एक नया चादर बिछाया। फिर उमा के कमरे से हारमोनियम और सितार ला कर उसके ऊपर सजा दिया।

रामस्वरूप जमीन में एक नई दरी और टेबल में नया मेजपोश बिछाकर उसके ऊपर गुलदस्ते सजाकर कमरे को आकर्षक रूप देने की कोशिश करते हैं। तभी रामस्वरूप की पत्नी प्रेमा आकर कहती है कि उमा मुंह फुला कर (नाराज होना) बैठी है। इस पर रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा से कहते हैं कि वह उमा को समझाएं क्योंकि बड़ी मुश्किल से उन्हें एक रिश्ता मिला है। इसलिए वह अच्छे से तैयार होकर लड़के वालों के सामने आए।

Reedh Ki Haddi

दरअसल उमा के पिता किसी भी कीमत पर इस रिश्ते को हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। लेकिन प्रेमा कहती है कि उसने उमा को बहुत समझाया है लेकिन वह मान नहीं रही हैं।

उसके बाद वह रामस्वरूप पर दोषरोपण करते हुए कहती हैं कि यह सब तुम्हारे ज्यादा पढ़ाने लिखाने का नतीजा है। अगर उमा को सिर्फ बारहवीं तक ही पढ़ाया होता तो, आज वह कंट्रोल में रहती। रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा से कहते हैं कि वह उमा की शिक्षा की सच्चाई लड़के वालों को न बताये।

दरअसल उमा बी.ए. पास है। और लड़के वालों को ज्यादा पढ़ी लिखी लड़की नहीं चाहिए। इसीलिए रामस्वरूप ने लड़के वालों से झूठ बोला हैं कि लड़की सिर्फ दसवीं पास है।

प्रेमा की बातें सुनकर रामस्वरूप थोड़ा चिंतित होते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि आजकल शादी ब्याह के वक्त लड़की के साज श्रृंगार का क्या महत्व है। लेकिन वह अपनी पत्नी से कहते हैं कि कोई बात नहीं, वह वैसे ही सुंदर हैं।

लड़के वालों के नाश्ते के लिए मिठाई, नमकीन, फल, चाय, टोस्ट का प्रबंध किया गया है। लेकिन टोस्ट में लगाने के लिए मक्खन खत्म हो चुका है। इसीलिए रामस्वरूप अपने नौकर को मक्खन लेने के लिए बाजार भेजते हैं। बाजार जाते वक्त नौकर को घर की तरफ आते मेहमान दिख जाते हैं जिनकी खबर वह अपने मालिक को देता हैं।

ठीक उसी समय बाबू गोपाल प्रसाद अपने लड़के शंकर के साथ रामस्वरूप के घर में दाखिल होते हैं। लेकिन गोपाल प्रसाद की आंखों में चतुराई साफ झलकती हैं। और आवाज से ही वो, बेहद अनुभवी और फितरती इंसान दिखाई देते हैं। उनके लड़के शंकर की आवाज एकदम पतली और खिसियाहट भरी हैं जबकि उसकी कमर झुकी हुई हैं। रामस्वरूप ने मेहमानों का स्वागत किया और औपचारिक बातें शुरू कर दी। बातों-बातों में दोनों नये जमाने और अपने जमाने (समय) की तुलना करने लगते हैं।

थोड़ी देर बाद रामस्वरूप चाय नाश्ता लेने अंदर जाते हैं। रामस्वरूप के अंदर जाते ही गोपाल बाबू रामस्वरूप की हैसियत आंकने की कोशिश करने लगते हैं। वह अपने बेटे को भी डांटते हैं जो इधर-उधर झाँक रहा था। वह उससे सीधी कमर कर बैठने को कहते हैं।

इतने में रामस्वरूप दोनों के लिए चाय नाश्ता ले कर आते हैं। थोड़ी देर बात करने के बाद बाबू गोपाल प्रसाद असल मुद्दे यानि शादी विवाह के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं।

जन्मपत्रिका मिलाने की बात पर गोपाल प्रसाद कहते हैं कि उन्होंने दोनों जन्मपत्रिकाओं को भगवान के चरणों में रख दिया। बातों-बातों में वो अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए कहते हैं कि लोग उनसे कहते हैं कि उन्होंने लड़कों को उच्च शिक्षा दी हैं। इसीलिए उन्हें बहुएं भी ग्रेजुएट लानी चाहिए।

लेकिन मैं उनको कहता हूँ कि लड़कों का पढ़-लिख कर काबिल होना तो ठीक है लेकिन लड़कियां अगर ज्यादा पढ़ लिख जाए और अंग्रेजी अखबार पढ़कर पाॅलिटिक्स करने लग जाए तो, घर गृहस्थी कैसे चलेगी। वो आगे कहते हैं कि मुझे बहुओं से नौकरी नहीं करानी है।

फिर वो रामस्वरूप से लड़की (उमा) की सुंदरता व अन्य चीजों के बारे में पूछते हैं। रामस्वरूप कहते हैं कि आप खुद ही देख लीजिए।

इसके बाद रामस्वरूप उमा को बुलाते है। उमा एक प्लेट में पान लेकर आती है। उमा की आँख पर लगे चश्मे को देखकर गोपाल प्रसाद और शंकर दोनों एक साथ चश्मे के बारे में पूछते हैं। लेकिन रामस्वरूप झूठा कारण बता कर उन्हें संतुष्ट कर देते हैं।

गोपाल प्रसाद उमा से गाने बजाने के संबंध में पूछते हैं तो उमा मीरा का एक सुंदर गीत गाती है। उसके बाद वो पेंटिग, सिलाई, कढ़ाई आदि के बारे में भी पूछते हैं। उमा को यह सब अच्छा नहीं लगता है। इसलिए वह कोई उत्तर नहीं देती है। यह बात गोपाल प्रसाद को खटकती हैं। वो उमा से प्रश्नों के जवाब देने को कहते हैं। रामस्वरूप भी उमा से जवाब देने के लिए कहते हैं।

तब उमा अपनी धीमी मगर मजबूत आवाज में कहती है कि क्या दुकान में मेज-कुर्सी बेचते वक्त उनकी पसंद-नापसंद पूछी जाती है। दुकानदार ग्राहक को सीधे कुर्सी मेज दिखा देता है और मोल भाव तय करने लग जाता है। ठीक उसी तरह ये महाशय भी, किसी खरीददार के जैसे मुझे एक सामान की तरह देख-परख रहे हैं। रामस्वरूप उसे टोकते हैं और गोपाल प्रसाद नाराज होने लगते हैं।

लेकिन उमा अपनी बात जारी रखते हुए कहती हैं कि पिताजी आप मुझे कहने दीजिए। ये जो सज्जन मुझे खरीदने आये हैं जरा उनसे पूछिए क्या लड़कियां के दिल नहीं होते हैं, क्या उन्हें चोट नहीं लगती है। गोपाल प्रसाद गुस्से में आ जाते हैं और कहते हैं कि क्या उन्हें यहाँ बेइज्जती करने के लिए बुलाया हैं।

उमा जवाब देते हुए कहती हैं कि आप इतनी देर से मेरे बारे में इतनी जांच पड़ताल कर रहे हैं। क्या यह हमारी बेइज्जती नहीं हैं। साथ में ही वह लड़कियों की तुलना बेबस भेड़ बकरियों से करते हुए कहती है कि उन्हें शादी से पहले ऐसे जांचा परखा जाता हैं जैसे कोई कसाई भेड़-बकरियों खरीदने से पहले उन्हें अच्छी तरह से जाँचता परखता हैं।

वह उनके लड़के शंकर के बारे में बताती हैं कि किस तरह पिछली फरवरी में उसे लड़कियों के हॉस्टल से बेइज्जत कर भगाया गया था। तब गोपाल प्रसाद आश्चर्य से पूछते हैं क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो। उमा जवाब देते हुए कहती हैं कि उसने बी.ए पास किया है। ऐसा कर उसने कोई चोरी नहीं की। उसने पढ़ाई करते हुए अपनी मर्यादा का पूरा ध्यान रखा। उनके पुत्र की तरह कोई आवारागर्दी नहीं की।

अब शंकर व उसके पिता दोनों गुस्से में खड़े हो जाते हैं और रामस्वरूप को भला बुरा कहते हुए दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। उमा पीछे से कहती है। जाइए… जाइए, मगर घर जाकर यह पता अवश्य कर लेना कि आपके पुत्र की रीढ़ की हड्डी है भी कि नहीं।

गोपाल प्रसाद और शंकर वहां से चले जाते हैं। उनको जाता देख रामस्वरूप निराश हो जाते हैं। पिता को निराश-हताश देख उमा अपने कमरे में जाकर रोने लग जाती हैं। तभी नौकर मक्खन लेकर आता हैं। और कहानी खत्म हो जाती हैं।

IMPORTANT QUESTION ANSWERS

REEDH KI HADDI CHAPTER 3 HINDI KRITIKA PART 1

प्रश्न 1. रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर “एक हमारा ज़माना था” कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?

उत्तर: यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि वह अपने बीते हुए समय को याद करता है तथा उसे ही सही ठहरा था है परंतु बीते हुए समय की तुलना वर्तमान से करना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि हर एक समय अपनी उस समय की परिस्थितियों के अनुसार सही होता है यूं भी हर जमाने की अपनी स्थितियां होती है जमाना बदलता है तो कुछ कमियों के साथ सुधार भी आते हैं।

प्रश्न 2. रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?

उत्तर: आधुनिक समाज में सभ्य नागरिक होने के बावजूद उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की खातिर लोगों के दबाव में झुकना पड़ रहा था, उपयुक्त बात उनकी इसी विवशता को उजागर करती है।

प्रश्न 3. अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है?

उत्तर: अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप, उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं वह सरासर गलत है एक तो वे अपनी पढ़ी-लिखी लड़की को कम पढ़ा लिखा साबित कर रहे हैं और उसकी सुंदरता को और बढ़ाने के लिए नकली प्रसाधन सामग्री का उपयोग करने के लिए कहते हैं जो अनुचित है साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि उमा वैसा ही आचरण करें जैसा लड़के वाले चाहते हैं परंतु वह यह क्यों भूल रहे हैं कि उन्हें लड़की की पसंद-नापसंद का भी ख्याल रखना चाहिए क्योंकि आज समाज में लड़का तथा लड़की को समान दर्जा प्राप्त है।

प्रश्न 4. गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा झिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।

उत्तर: मेरे विचार से दोनों ही समान रूप से अपराधी है गोपाल प्रसाद विवाह जैसे पवित्र बंधन में भी व्यापार खोज रहे हैं वह इस तरह के आचरण से इस संबंध की मधुरता तथा संबंधों की गरिमा को भी कम कर रहे हैं रामस्वरूप जहां आधुनिक सोच वाले व्यक्ति होने के बावजूद कायरता का परिचय दे रहे हैं वे चाहते तो अपनी बेटी के साथ मजबूती से खड़े होते और एक स्वाभिमानी वर की तलाश करते ना की मजबूरी में आकर परिस्थिति से समझौता करते।

प्रश्न 5. “…आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं…” उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है ?

उत्तर: उपर्युक्त कथन के माध्यम से उमा, शंकर की निम्न कमियों की ओर ध्यान दिलाना चाहती है:

  1. शंकर का चरित्र अच्छा नहीं है लड़कियों के हॉस्टल के चक्कर काटते हुए वह पकड़ा जा चुका है।
  2. उसका अपना निजी कोई व्यक्तित्व नहीं है वह अपने पिता के पीछे चलने वाला बेचारा जीव है जैसा कहा जाता है वैसा ही करता है।
  3. वह शारीरिक रूप से भी असमर्थ है वह शरीर में कमजोर झुक कर तथा उसे चेतन कर भी बैठा नहीं जाता।

प्रश्न 6. शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: समाज में आज उमा जैसे व्यक्तित्व, स्पष्टता वादी तथा उच्च चरित्र वाली लड़की की ही आवश्यकता है ऐसी लड़कियों से ही समाज और देश प्रगति कर पाएगा जो आत्मविश्वास से भरी तथा निडर हो इसके विपरीत शंकर जैसे लड़के समाज को दिशा नहीं प्रदान कर सकते हैं।

प्रश्न 7. ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जिस प्रकार मानव में रीढ़ की हड्डी महत्वपूर्ण मानी जाती है ठीक उसी प्रकार वैवाहिक रिश्तो में लड़का और लड़की रीड की हड्डी के समान होते हैं उनके स्वस्थ रिश्ते पारिवारिक शांति अपनापन और समृद्धि के कारण बनते हैं इस पाठ के जरिए यही बताने का प्रयास किया गया है कि नर और नारी को कमतर समझकर हम एक प्रगतिशील समाज की कल्पना नहीं कर सकते अतः यह उचित शीर्षक है।

प्रश्न 8. कई वस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों ?

उत्तर: इस कहानी में कई पात्र हैं परंतु सबसे सशक्त पात्र बनकर जो उभरता है वह ओ माही है उमा की उपस्थिति भले थोड़े समय के लिए थी परंतु उसके विचारों से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह पाते हैं वह हमें बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है उसकी उपस्थिति नारी समाज को एक नई सोच और दिशा प्रदान करती है।

प्रश्न 9. एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: रामस्वरूप आधुनिक और प्रगतिशील विचारधाराओं से संपन्न है परंतु एक मजबूर पीता है वह एक तरफ तो स्त्री शिक्षा के समर्थक हैं परंतु बेटी के विवाह के समय यह शिक्षा में छिपाने का प्रयास करते हैं जिससे उनकी विवशता तथा कायरता झलकती है रामगोपाल निहायती बड़े वाले लालची और पढ़े लिखे होने के बावजूद स्त्री पुरुष की संपन्नता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के रूप में उभरते हैं इसी कारणवश वह अपने मेडिकल में पढ़ने वाले बेटे का विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को भी बिजनेस मानते हैं इससे उनका लालची स्वभाव पता चलता है।

प्रश्न 10. इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।

उत्तर: रीढ़ की हड्डी एक उद्देश्य पूर्ण एकांकी है इस एकांकी के उद्देश्य निम्नलिखित है:

  1. यह एकांकी स्त्री पुरुष समानता की पक्षधर है।
  2. लड़कियों के विवाह में आने वाली समस्याओं को समाज के सामने लाने वाली है।
  3. बेटियों के विवाह के समय पिता की परेशानियों को बेनकाब करती है।
  4. स्त्री शिक्षा के प्रति दोहरी मानसिकता रखने वाले को बेनकाब करती है।
  5. स्त्री को भी अपने विचार व्यक्त करने की आजादी देने के पक्ष में है।


तो बच्चों!

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