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Smriti Class 9 Explanation with Question Answer

Smriti Class 9 Explanation with Question Answer

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे

“स्मृति”

पाठ के लेखक श्रीराम शर्मा हैं।

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लेखक परिचय

लेखक: श्रीराम शर्मा

जन्म: 1896

मृत्यु: 1990

स्मृति पाठ प्रवेश

इस पाठ में लेखक अपने बचपन की उस घटना का वर्णन करता है जब वह केवल ग्यारह साल का था और उसके बड़े भाई ने उससे कुछ महत्वपूर्ण चिठियों को डाकघर में डालने के लिए भेजा था और उसने गलती से वो चिठियाँ एक पुराने कुऍं में गिरा दी थी। उन चिठियों को उस कुऍं से निकालने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ हुई उन सभी का जिक्र लेखक ने यहाँ किया है। लेखक यहाँ यह भी समझाना चाहता है कि बचपन के वो दिन कितने ख़ास थे और वो उन दिनों को बहुत याद करता है।

Smriti Chapter 2 Summary

स्मृति पाठ सार

लेखक 1908 ई. में घटित एक घटना का वर्णन कर रहा है। उस समय कड़ी सर्दी पड़ रही थी। शाम के साढ़े तीन या चार बजे होंगे जब लेखक अपने कई साथियों के साथ झरबेरी के बेर तोड़-तोड़ कर खा रहा था कि तभी गाँव के पास से एक आदमी ने लेखक को जोर से आवाज लगा कर पुकारा और कहा कि लेखक के भाई लेखक को बुला रहे हैं इसलिए उसे जल्दी से ही घर लौट जाना चाहिए। लेखक उस आदमी की बात सुन कर घर की ओर चलने लगा। लेखक के साथ लेखक का छोटा भाई भी था। लेखक के मन में उसके बड़े भाई साहब से मार पड़ने का डर था इसलिए वह उदास सा घर की ओर चल रहा था। जब लेखक ने आँगन में भाई साहब को कोई पत्र लिखते पाया तब उसके मन से पिटने का डर दूर हो गया। जब लेखक और उसके छोटे भाई को लेखक के भाई साहब ने देखा तो भाई साहब ने उन दोनों से कहा कि उनके द्वारा लिखे गए पत्रों को ले जाकर मक्खनपुर में स्थित डाकखाने में डाल आओ। तेज़ी से जाना जिससे शाम की डाक में उनकी चिठियाँ निकल जाएँ ताकि ये चिठियाँ जल्दी ही वहाँ पहुँच जाए जहाँ उन्हें भेजा जाना है क्योंकि वे बहुत जरुरी थी। वे दिन जाड़े के दिन तो थे ही साथ ही साथ ठंडी हवा के कारण उन दोनों को कॅंप-कँपी भी लग रही थी।

लेखक और लेखक के भाई ने कानों को धोती से बाँधा। लेखक की माँ ने रास्ते में दोनों के खाने के लिए थोड़े से भुने हुए चने एक धोती में बाँध दिए थे। दोनों भाई अपना-अपना डंडा लेकर घर से निकल पड़े। उस समय उस बबूल के डंडे से उन लोगों को इतना प्यार था, जितना लेखक आज की उम्र में रायफल से भी नहीं करता। लेखक कहता है कि उसने न जाने कितने साँपों को उस डंडे से मारा था। चिठियों को लेखक ने अपनी टोपी में रख लिया था, क्योंकि लेखक के कुर्ते में जेबें नहीं थी। उछलते-कूदते, बहुत ही जल्दी गाँव से 220 गज दूर उस कुएँ के पास आ गए जिसमें एक बहुत ही भयंकर काला साँप गिरा हुआ था। मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली लेखक की टोली पूरी तरह बन्दर की टोली कही जाती थी। अपनी टोली की शरारतों के किस्सों में से एक किस्सा सुनाते हुए लेखक कहता है कि एक दिन लेखक और लेखक की टोली स्कूल से लौट रहे थे कि उनको कुएँ में पंजे के बल उचककर झाँकने की सूझी।

लेखक ने कुएँ में झाँककर एक पत्थर फेंका क्योंकि उनको जानना था की उसकी आवाज कैसी होती है। उसकी आवाज को सुनने के बाद उन्होंने अपनी आवाज की गूँज को कुँए में सुनने की सोची, परन्तु कुएँ में जैसे ही पत्थर गिरा, वैसे ही एक फुसकार सुनाई पड़ी। गाँव से मक्खनपुर जाते और मक्खनपुर से लौटते समय लेखक और लेखक के साथी हर दिन अब कुएँ में पत्थर डाला करते थे। लेखक कुएँ पत्थर डालने के लिए कुँए की ओर बढ़ा। छोटा भाई भी लेखक के पीछे इस तरह चल पड़ा जैसे बड़े हिरन के बच्चे के पीछे छोटा हिरन का बच्चा चल पड़ता है।

लेखक ने कुएँ के किनारे से एक पत्थर उठाया और उछलकर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर पत्थर गिरा दिया, परन्तु लेखक पर तो बिजली-सी गिर पड़ी क्योंकि उस समय जो घटना घटी उस घटना के कारण लेखक को यह भी याद नहीं कि साँप ने फुसकार मारी या नहीं, पत्थर साँप को लगा या नहीं। यह घटना थी टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिठियाँ चक्कर काटती हुई कुएँ में गिर जाने की। लेखक की आँखों में निराशा, पिटने के भय और घबराहट से रोने का उफान आता था। लेखक की पलकें उसके भीतरी भावों को रोकने का प्रयास कर रही थी, परन्तु उसके गालों पर आँसू ढुलक ही जाते थे। उस समय लेखक को माँ की गोद की याद आ रही थी। उसका जी चाह रहा था कि उसकी माँ आए उसे छाती से लगाए और लाड़-प्यार करके यह कह दे कि कोई बात नहीं, चिठियाँ तो फिर से लिख ली जाएँगी, रोने की कोई बात नहीं। लेखक का मन कर रहा था कि कुएँ में बहुत-सी मिट्टी डाल दें और घर जाकर यह झूठ कह दें कि वे दोनों चिठ्ठी डाल आए हैं, पर उस समय लेखक झूठ बोलना जानता ही नहीं था।

लेखक कहता है की यदि मन में किसी काम को करने का पक्का विचार कर लिया जाए तो परेशानियाँ अपने आप कम हो जाती हैं। लेखक की परेशानी भी दूर हो गई। क्योंकि लेखक ने कुएँ में घुसकर चिठियों को निकालने का निश्चय कर लिया था। यह बहुत ही भयानक निर्णय था क्योंकि निचे कुऍं में भयंकर कला साँप था। परन्तु लेखक कहता है कि जो मरने को तैयार हो, उसे किसी भी भयानक चीज़ से क्या? लेखक कहता है कि उसका छोटा भाई रो रहा था क्योंकि उसे लग रहा था कि लेखक की मौत उसे नीचे बुला रही है कहने का तात्पर्य यह है कि उसे लग रहा था कि अगर लेखक निचे कुँए में गया तो वह जरूर साँप के काटे जाने से मर जाएगा। लेखक को कुँए में जाने के लिए रस्सी की आवश्यकता थी और उनके पास अपने कपड़ों को ही रस्सी बनाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। एक धोती लेखक की, एक छोटे भाई की, एक वह जिसमे लेखक की माँ ने चने बाँधे थे, दो वह जो ठण्ड से बचने के लिए कानों से बँधी हुई थी, सब धोतियाँ मिला कर-पाँच धोतियाँ थी उन सब को और कुछ कुँए के पास पड़ी रस्सी मिलाकर कुएँ की गहराई के लिए काफी हुईं। लेखक कुएँ में धोती के सहारे जाने लगा तो उसका छोटा भाई रोने लगा। लेखक ने उसे भरोसा दिलाया कि लेखक कुएँ के नीचे पहुँचते ही साँप को मार देगा और लेखक को भी यही विश्वास था कि वह नीचे पहुँचते ही साँप को मार देगा। इस विश्वास का कारण यह था कि इससे पहले भी लेखक ने अनेक साँप मारे थे।

लेखक कहता है कि जब वह कुँए में उतर रहा था और जब कुएँ के धरातल से वह चार-पाँच गज ऊपर होगा, तब लेखक ने ध्यान से नीचे को देखा। लेखक ने जो देखा उसे देखकर लेखक हैरान हो गया। कुँए के धरातल पर साँप अपना फन फैलाए धरातल से एक हाथ ऊपर उठा हुआ लहरा रहा था। लेखक हमारी जानकारी के लिए कहता है कि कच्चे कुएँ का व्यास बहुत कम होता है। नीचे तो वह मुश्किल से डेढ़ गज से अधिक ही होगा। ऐसी दशा में कुएँ में लेखक साँप से अधिक-से-अधिक चार फुट की दूरी पर रह सकता था, वह भी ऐसी स्थिति में जब साँप लेखक से दूर रहने का प्रयत्न करता, पर उतरना तो लेखक को कुएँ के बीच में ही था, क्योंकि लेखक का साधन यानि उनके द्वारा बनाई गई वह धोती की रस्सी बीचोंबीच लटक रही थी।लेखक कहता है कि ऊपर से लटककर तो साँप को मारा नहीं जा सकता था। साँप को मारने के लिए कुँए में उतरना ही था। लेखक को एक उपाय सुझा। लेखक ने दोनों हाथों से धोती पकड़े हुए ही अपने पैर कुएँ की बगल में लगा दिए। दीवार से पैर लगाते ही कुछ मिट्टी नीचे गिरी और साँप ने फू करके उस मिट्टी पर मुँह मार कर हमला किया। लेखक के पैर भी दीवार से हट गए, और लेखक की टाँगें कमर से लटकती हुई समकोण बनाती रहीं, इससे लेखक को यह फायदा हुआ कि लेखक को साँप से दूरी और कुएँ की परिधि पर उतरने का ढंग मालूम हो गया। लेखक ने झूलकर अपने पैर कुएँ की बगल से सटाए, और कुछ धक्वे देने के साथ ही वह अपने शत्रु के सामने कुँए की दूसरी ओर डेढ़ गज पर-कुएँ के धरातल पर खड़ा हो गया। लेखक और साँप दोनों की आँखें एक दूसरे से मिली। लेखक कहता है कि साँप को आँखों द्वारा सुनने वाला कहा जाता है क्योंकि साँप के कान नहीं होते।

लेखक कहता है कि उस स्थिति ने वह स्वयं भी आँखों से सुनने वाला हो रहा था। क्योंकि उसकी बाकि की इन्द्रियां काम नहीं कर रही थी। लेखक कहता है कि लाठी या डंडा चलाने के लिए काफी जगह चाहिए होती है जिसमें वे घुमाए जा सकें। एक तरीका और था कि साँप को डंडे से दबाया जा सकता था, पर ऐसा करना मानो तोप के मुहाने पर खड़ा होना था। यदि फन या उसके समीप का भाग न दबा, तो फिर वह साँप पलटकर जरूर काटता, और अगर हिम्मत करके लेखक फन के पास दबा भी देता तो फिर उसके पास पड़ी हुई दो चिठियों को वह कैसे उठाता? दो चिठियाँ साँप के पास उससे सटी हुई पड़ी थीं और एक लेखक की ओर थी। लेखक तो चिठियाँ लेने ही कुँए में उतरा था। अब तक साँप ने कोई वार नहीं किया था, इसलिए लेखक ने भी उसे डंडे से दबाने का खयाल छोड़ दिया। लेखक के पास मारना या बिलकुल छेड़खानी न करना-ये दो रास्ते थे। इसलिए लेखक कहता है कि पहला तो लेखक की शक्ति के बाहर था। मजबूर होकर लेखक को दूसरे रास्ते का सहारा लेना पड़ा।

लेखक कहता है कि जैसे ही उसने साँप की दाईं ओर पड़ी चिठ्ठी की ओर डंडे को बढ़ाया वैसे ही साँप का फन पीछे की ओर हुआ। धीरे-धीरे डंडा चिठ्ठी की ओर बढ़ा और जैसे ही चिठ्ठी के पास पहुँचा साँप की फुँकार के साथ काली बिजली तड़पी और डंडे पर गिरी। वह पीव और कुछ नहीं बल्कि विष था। लेखक के भाई को लगा कि लेखक की साँप के काटने से मौत हो गई है। लेखक को साँप के काटने से होने वाले दर्द और लेखक से बिछुड़ जाने के खयाल से ही लेखक के छोटे भाई के कोमल हृदय को धक्का लगा। भाई के प्यार के ताने-बाने को चोट लगी। उसकी चीख निकल गई। अर्थात वह बहुत अधिक डर गया। लेखक ने दुबारा फिर से उसी प्रकार लिफ़ाफ़े को उठाने की कोशिश की। इस बार साँप ने फिर से वार किया और और इस बार वह डंडे से चिपट ही गया। जब लेखक ने डंडे के अपनी ओर खिंचा तो लेखक और साँप की स्थिति बदल गई। लेखक ने तुरंत ही लिफ़ाफ़े और पोस्टकार्ड चुन लिए। चिठियों को धोती के किनारे में बाँध दिया, और छोटे भाई ने उन्हें ऊपर खींच लिया। लेखक को डंडे को साँप के पास से उठाने में भी बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा।

लेखक कहता है कि चिठियाँ हासिल करने के बाद अब ऊपर चढ़ना कोई कठिन काम नहीं था। केवल हाथों के सहारे, पैरों को बिना कहीं लगाए हुए 36 फुट ऊपर चढ़ना लेखक से अब नहीं हो सकता। अब लेखक 15-20 फुट बिना पैरों के सहारे, केवल हाथों के बल, चढ़ने की हिम्मत रखता है। परन्तु उस समय ग्यारह वर्ष की अवस्था में लेखक केवल हाथों के सहारे, पैरों को बिना 36 फुट चढ़ा। शरीर को अच्छी तरह साफ करके धोती-कुर्ता पहन लिया। किशनपुर के एक लड़के ने लेखक को कुँए से बाहर आते देख लिया था, उस लड़के से लेखक ने बहुत आग्रह किया कि वह कुएँ वाली घटना किसी से न कहे, यह सब करने के बाद वे लोग आगे बढ़े। सन् 1915 में लेखक ने मैट्रीक्युलेशन पास करने के बाद यह सारी घटना अपनी माँ को सुनाई। नम आँखों से माँ ने लेखक को अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया जैसे चिड़िया अपने बच्चों को अपने पंख के नीचे छिपा लेती है। लेखक अपने बचपन के उन दिनों के याद करता हुआ कहता है कि वे कितने अच्छे दिन थे। उस समय रायफल नहीं होती थी, डंडा होता था और डंडे का शिकार-कम-से-कम उस साँप का शिकार-रायफल के शिकार से कम आश्चर्यजनक और भयानक नहीं होते थे।।

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Smriti Chapter 2 Question Answers

स्मृति पाठ प्रश्न अभ्यास

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1: भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?

उत्तर: भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में भाई के हाथ से पिटाई होने का डर था। लेखक को लग रहा था कि बड़े भाई को बेर तोड़ने वाली बात पता चल गई होगी या उसकी किसी और शरारत का पता चल गया होगा और इसलिए वे उसे पीटने के लिए बुला रहे होंगे। पिटाई के खयाल से ही लेखक का दिल दहल उठा था।

प्रश्न 2: मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढ़ेला क्यों फेंकती थी?

उत्तर: मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढ़ेला जरूर फेंकती थी। वे बच्चे ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें ढ़ेला फेंके जाने पर आने वाली आवाज को सुनकर बड़ा मजा आता था। उस कुएँ के अंदर एक साँप गिर गया था। ढ़ेला फेंकने पर उस साँप की फुफकार सुनाई देती थी, जिसे सुनकर सभी बच्चों को बहुत आनन्द आता था।

प्रश्न 3: ‘साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढ़ेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’ – यह कथन लेखक कि किस मनोदशा को स्पष्ट करता है?

उत्तर: जब लेखक ने ढ़ेला फेंकने के पहले अपनी टोपी उतारी तो चिट्ठियाँ कुएँ में जा गिरीं। उसके बाद तो लेखक का सारा ध्यान उन चिट्ठियों पर चला गया। उस समय वे चिट्ठियाँ उसे ढ़ेले, या कुएँ या साँप से अधिक महत्वपूर्ण थीं। लेखक का डर के मारे बुरा हाल था क्योंकि लेखक के भाई ने उन्हें उन्हीं चिठियों को जल्दी से जल्दी डाकखाने में डालने को कहा था।

प्रश्न 4: किन कारणों से लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया?

उत्तर: लेखक को उसके बड़े भाई ने चिट्ठी डाकखाने में डालने का काम सौंपा था। लेखक चाहता तो चिट्ठियों को वहीं छोड़ देता और घर जाकर झूठ बोल देता। लेकिन लेखक ने तब तक झूठ बोलना नहीं सिखा था और उसकी उम्र के किसी भी निश्छल बालक की तरह था। वह हर कीमत पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहता था। इसलिए लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया।

प्रश्न 5: साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या-क्या युक्तियाँ अपनाई?

उत्तर: साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने कई युक्तियाँ अपनाई। पहले उसने थोड़ी मिट्टी लेकर साँप की ओर फेंक दी। उसके बाद उसने डंडे से साँप का ध्यान बँटाया। इससे लेखक को कुछ सफलता जरूर मिली।

प्रश्न 6: कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालने संबंधी साहसिक वर्णन को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: जब लेखक ने यह निश्चय कर लिया कि वह कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालेगा फिर उसने आगे का कार्य शुरु कर दिया। उसने अपनी और अपने भाई की धोतियों को आपस में बाँध कर एक लंबी रस्सी जैसी बनाई। फिर उसने धोती के एक सिरे को कुएँ की डेंग से बाँध दिया। दूसरे सिरे पर उसने लाठी बाँध दी ताकि अंदर जाकर साँप को मार सके। लेखक ने उसके पहले भी कितने ही साँपों को अपने डंडे से मौत के घाट उतारा था इसलिए वह अपनी सफलता को लेकर थोड़ा आश्वस्त था। लेखक धोती के सहारे धीरे-धीरे कुएँ में उतर गया। साँप से एक सुरक्षित ऊँचाई बनाते हुए उसने साँप का मुआयना किया। साँप अपनी पूँछ के बल पर लगभग सीधा खड़ा था और ऊपर ही देख रहा था। डंडे के हिलने डुलने के कारण साँप को लेखक के आगमन का पता चल चुका था। साँप को देखकर लेखक की हिम्मत जवाब दे रही थी। लेखक ने अपने पैरों को कुएँ की दीवार से टिकाया तो थोड़ी मिट्टी झरकर साँप के ऊपर गिरी। फिर वह तेजी से कुएँ की सामने की दीवार की ओर झूलता हुए कुएँ के सूखे धरातल पर कूद गया। अब वह साँप से कोई डेढ़ गज की दूरी पर खड़ा था। दोनों एक दूसरे से आँखें चार कर रहे थे जैसे एक दूसरे को सम्मोहित करने की कोशिश कर रहे हों। कुएँ के अंदर इतनी जगह नहीं थी डंडे से साँप पर वार किया जा सके। ऐसे में साँप द्वारा जवाबी हमले की आशंका भी थी। इसलिए लेखक ने साँप को मारने का विचार त्याग दिया। दो चिट्ठियाँ साँप के पास थीं और एक चिट्ठी लेखक के पास। लेखक ने डंडे से साँप का ध्यान भटकाना चाहा तो साँप ने जवाब में डंडे पर तेजी से प्रहार किया और जहर की ताजा बूँदें डंडे पर चकमने लगीं। इस दौरान डंडा लेखक की हाथ से छूट गया। कुछ डर के मारे और कुछ जान बचाने के खयाल से लेखक हवा में ऊपर तक उछला और फिर धम्म से जमीन पर आ गया। उसे ऐसा करते देख उसके छोटे भाई की चीख निकल गई। छोटे भाई ने समझा कि बड़े भाई को साँप ने डस लिया था। साँप ने अपनी मारक शक्ति का नमूना डंडे पर छोड़ दिया था। लेखक ने फिर से डंडा उठाकर प्रयास किया। इस बार साँप ने फिर से डंडे पर वार किया लेकिन इस बार डंडा लेखक के हाथ से नहीं छूटा। मौका मिलते ही लेखक ने दोनों चिट्ठियाँ अपने हाथ में ले ली। इस कोशिश में लेखक के हाथ साँप के पिछले भाग से छू गये। साँप के शरीर की ठंडक ने तो लेखक के खून ही जमा दिये। लेखक ने धोती में चिट्ठियों को बाँधा और छोटे भाई को उसे खींचने का इशारा किया। उसके बाद वह अपने हाथों के बल कुएँ की दीवार चढ़ता चला गया।

प्रश्न 7: इस पाठ को पढ़ने के बाद किन-किन बाल सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है?

उत्तर: इस पाठ से कई बाल सुलभ शरारतों का पता चलता है। बच्चे अक्सर पेड़ों से बेर, आम और अमरूद तोड़ कर खाया करते हैं। वे बिना मतलब जहाँ तहाँ ढ़ेले फेंकते हैं। वे साँप को देखकर उसे मारने निकल पड़ते हैं। लेकिन आजकल के शहरी बच्चे ऐसी शरारतें नहीं कर पाते हैं।

प्रश्न 8: ‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’–  का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कहते हैं कि कभी कभी बड़ी से बड़ी योजना भी धरी रह जाती है। मनुष्य अपने अनुमान के आधार पर कुछ योजनाएँ बनाता है। लेकिन उसका अनुमान गलत होने की दशा में वह कुछ नहीं कर पाता। ऐसा ही लेखक के साथ हुआ। वह तो साँप को मारने के खयाल से कुएँ में उतरा था। लेकिन कुएँ में इतनी जगह नहीं थी कि लाठी को ठीक से चलाया जा सके। वह डंडे से साँप के फन को कुचलने की कोशिश भी नहीं कर सकता था क्योंकि निशाना चूक जाने की स्थिति में साँप के जवाबी हमले का खतरा था। लेखक के पास भागने के लिए भी कोई जगह नहीं थी। वह बड़ी ही मुश्किल स्थिति में फँसा हुआ था।

प्रश्न 9: ‘फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है’– पाठ के संदर्भ में इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लेखक का लक्ष्य था किसी भी तरह से चिट्ठियों को निकाल कर जिंदा वापस लौटना। इस काम में कई अड़चनें थीं। कुएँ के अंदर जगह तंग थी। साँप एक विषधर था जिसके काटने पर जिंदा बचना नामुमकिन था। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता था कि कुएँ के अंदर असल में क्या घटने वाला था। उस होने वाली घटना पर लेखक का कोई नियंत्रण नहीं था। जो भी होना था सब भगवान भरोसे था।

बच्चों!

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Hamid Khan Class 9 Summary and Question Answer

Hamid Khan Class 9 Summary and Question Answer

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वी की पाठ्यपुस्तक संचयन भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

हामिद खाँ’

पाठ के लेखक एस. के. पोट्टेकाट हैं।

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लेखकः एस. के. पोट्टेकाट

जन्मः 1913

S K Pottekatt

हामिद खाँ पाठ प्रवेश

इस पाठ में लेखक को जब (पाकिस्तान) तक्षशिला में किन्हीं शरारती तत्वों के द्वारा आग लगाए जाने का समाचार मिलता है तो लेखक वहाँ के अपने एक मित्र और उसकी दूकान की चिंता होने लगती है क्योंकि उस मित्र की दूकान तक्षशिला के काफी नजदीक थी। इस पाठ में लेखक अपने उस अनुभव को हम सभी के साथ साँझा कर रहा है जब वह (पाकिस्तान) तक्षशिला के खण्डरों को देखने गया था और भूख और कड़कड़ाती धुप से बचने के लिए कोई होटल खोज रहा था। होटल को खोजते हुए लेखक जब हामिद खाँ नाम के व्यक्ति की दूकान में कुछ खाने के लिए रुकता है तो जो भी वहाँ घटा लेखक ने उसे एक लेख के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत किया है।

Hamid Khan Class 9 Chapter 5 Summary

हामिद खाँ पाठ सार

लेखक यहाँ अपने एक अनुभव को बताता हुआ कहता है कि जब लेखक ने तक्षशिला जो की पाकिस्तान में है वहाँ पर शरारती लोगों द्वारा आग लगाने के बारे में समाचार पत्र में खबर पढ़ी तो खबर पढ़ते ही लेखक को हामिद खाँ याद आया। लेखक ने भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान! उसके हामिद खाँ की दुकान को इस शरारती लोगों द्वारा लगाई गई आग से बचा लेना। अब लेखक अपने और हामिद खाँ के रिश्ते के बारे में बताता हुआ कहता है कि एक ओर कड़कड़ाती धूप थी और दूसरी ओर भूख और प्यास के मारे लेखक का बुरा हाल हो रहा था। परेशान हो कर लेखक रेलवे स्टेशन से करीब पौन मील की दूरी पर बसे एक गाँव की ओर निकल पड़ा। जब वह उस गाँव में होटल ढूंढ रहा था तब अचानक एक दुकान लेखक को नजर आई जहाँ चपातियाँ पकाई जा रही थीं। चपातियों की सोंधी महक से लेखक के पाँव अपने आप उस दुकान की ओर मुड़ गए। दूकान में लेखक ने देखा कि एक ढलती उम्र का पठान अँगीठी के पास सिर झुकाए चपातियाँ बना रहा था।

लेखक ने जैसे ही दुकान में प्रवेश किया, वह अपनी हथेली पर रखे आटे को बेलना छोड़कर लेखक की ओर घूर-घूरकर देखने लगा। उसे घूरता हुआ देख कर भी लेखक उसकी तरफ देखकर मुसकरा दिया। लेखक बताता है कि लेखक के उसकी ओर मुस्कुराने के बाद भी उसके चेहरे के हाव-भाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। लेखक ने बहुत ही धीमी आवाज में उस चपाती बनाने वाले पठान से पूछा कि खाने को कुछ मिलेगा? उस पठान ने लेखक से कहा कि चपाती और गोश्त या सब्जी का मसालेदार शोरबा है, ये कह के उस पठान ने लेखक को एक बेंच की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वहाँ बैठ जाइए। उस दूकान के एक कोने में एक खाट पड़ी हुई थी जिस पर एक दाढ़ी वाला बुड्ढा गंदे तकिए पर कोहनी टेके हुए हुक्का पी रहा था। जब वह दूकान में बैठा हुआ अपने खाने का इंतजार कर रहा था तब चपाती को अंगारों पर रखते हुए उस अधेड़ उम्र के पठान ने लेखक से पूछा कि लेखक कहाँ का रहने वाला है?

लेखक ने उसे जवाब दिया कि लेखक मालाबार का रहने वाला है। उस पठान ने मालाबार नाम नहीं सुना था। आटे को हाथ में लेकर गोलाकार बनाते हुए पठान ने फिर लेखक से मालाबार के बारे में पूछा कि क्या यह हिंदुस्तान में ही है ? लेखक ने हाँ में उत्तर देते हुए कहा कि यह भारत के दक्षिणी छोर-मद्रास के आगे है। पठान ने फिर लेखक से पूछा कि क्या लेखक हिंदू हैं? लेखक ने फिर हाँ में उत्तर दिया और कहा कि उसका जन्म एक हिंदू घर में हुआ है। लेखक से यह सुनने पर कि वह एक हिन्दू है उस पठान ने एक फीकी मुसकराहट के साथ फिर पूछा कि क्या लेखक एक हिन्दू होते हुए मुसलमानी होटल में खाना खाएगा? इस पर लेखक ने कहा कि क्यों नहीं?

लेखक वहाँ खाना जरूर खाएगा और लेखक ने उस पठान से कहा कि जहाँ लेखक रहता है वहाँ तो अगर किसी को बढि़या चाय पीनी हो, या बढि़या पुलाव खाना हो तो वे लोग बिना किसी हिचकिचाहट के मुसलमानी होटल में जाया करते हैं। पठान लेखक की इस बात पर विश्वास नहीं कर पाया था। लेखक कहता है कि लेखक ने उसे बड़े गर्व के साथ बताया था कि लेखक के शहर में हिंदू-मुसलमान में कोई फर्क नहीं है। सब मिल-जुलकर रहते हैं। लेखक ने पठान को यह भी बताया था कि भारत में मुसलमानों ने जिस पहली मस्जिद का निर्माण किया था, वह लेखक के ही राज्य के एक स्थान ‘कोडुंगल्लूर’ में है।

लेखक ने पठान से बात करते हुए उसका शुभ नाम पूछा। उस पठान ने अपना नाम हामिद खाँ बताया और यह भी बताया कि वो जो चारपाई पर बैठे हैं, वो उसके पिता हैं। पठान ने लेखक को दस मिनट तक इंतजार करने के लिए कहा क्योंकि गोश्त या सब्जी का मसालेदार शोरमा अभी पक रहा था। लेखक भी इंतजार करने लगा।

लेखक कहता है कि हामिद खाँ ने जोर से किसी अब्दुल को आवाज लगाई। उसके आवाज लगते ही एक छोकरा दौड़ता हुआ आया जो आँगन में चटाई बिछाकर लाल मिर्च सुखा रहा था। हामिद ने उनकी किसी प्राचीन भाषा में उसे कुछ आदेश दिया। वह दुकान के पिछवाड़े की तरफ भागा। उसने एक थाली में चावल लाकर लेखक के सामने रख दिया, हामिद खाँ ने तीन-चार चपातियाँ उसमें रख दीं, फिर लोहे की प्लेट में गोश्त या सब्जी का शोरमा परोसा। छोकरा साफ पानी से भरा एक कटोरा मेज पर रखकर चला गया।

लेखक ने बड़े शौक से भरपेट खाना खाया। खाना खाने के बाद जेब में हाथ डालते हुए लेखक ने हामिद खाँ से पूछा कि भोजन के कितने पैसे हुए?

हामिद खाँ ने मुसकराते हुए लेखक का हाथ पकड़ लिया और बोला कि लेखक उसे माफ कर दें क्योंकि वह भोजन के पैसा नहीं लेगा क्योंकि लेखक हामिद खाँ का मेहमान हैं। हामिद खाँ की इस बात को सुन कर लेखक ने बड़े प्यार से हामिद खाँ से कहा कि मेहमाननवाजी की बात अलग है। एक दुकानदार के नाते हामिद खाँ को खाने के पैसे लेने पड़ेंगे।

लेखक ने हामिद खाँ को लेखक की मुहब्बत की कसम भी दी। लेखक ने एक रुपये के नोट को हामिद खाँ की ओर बढ़ाया। वह उन पैसों को लेने में हिचकिचा रहा था। उसने वह रूपया लेखक से लेकर फिर से लेखक के ही हाथ में रख दिया। रूपए को लेखक के हाथों में रखते हुए हामिद खाँ ने लेखक से कहा कि उस ने लेखक से खाने के पैसे ले लिए हैं, मगर वह चाहता है कि यह एक रूपया लेखक के ही हाथों में रहे और जब लेखक अपने देश वापिस पहुँचें तो किसी मुसलमानी होटल में जाकर इस पैसे से पुलाव खाएँ और तक्षशिला के भाई हामिद खाँ को याद करें।

लेखक कहता है कि हामिद की दूकान से लौटकर लेखक तक्षशिला के खंडहरों की तरफ चला आया। उसके बाद लेखक ने फिर कभी हामिद खाँ को नहीं देखा। पर हामिद खाँ की वह आवाज, उसके साथ बिताए क्षणों की यादें आज भी लेखक के मन में बिलकुल ताजा हैं। उसकी वह मुसकान आज भी लेखक के दिल में बसी है। आज वर्तमान में जब लेखक ने तक्षशिला के सांप्रदायिक दंगों की चिंगारियों की आग के बारे में सुना तो लेखक भगवान् से यही प्रार्थना कर रहा है कि हामिद और उसकी वह दुकान जिसने लेखक को उस कड़कड़ाती दोपहर में छाया और खाना देकर लेखक की भूख को संतोष प्रदान किया था, बाह सही-सलामत बची रहे।

Hamid Khan Chapter 5 Question and Answers

हामिद खाँ प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1. लेखक का परिचय हामिद खाँ से किन परिस्थितियों में हुआ?

उत्तरः हामिद पाकिस्तानी मुसलमान था। वह तक्षशिला के पास एक गाँव में होटल चलाता था। लेखक तक्षशिला के खंडहर देखने के लिए पाकिस्तान आया तो हामिद के होटल पर खाना खाने पहुँचा। पहले तो हामिद खाँ लेखक को बहुत घूर-घूर कर देख रहा था परन्तु जब उन्होंने आपस में बात की तो हामिद खाँ लेखक से बहुत प्रभावित हुआ। वहीं पर उनका आपस में परिचय भी हुआ।

प्रश्न 2. काश मैं आपके मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता।’-हामिद ने ऐसा क्यों कहा?

उत्तरः लेखक और हामिद ने जब आपस में बातचीत की तो उस बातचीत केन दौरान हामिद को पता चला कि भारत में हिंदू-मुसलमान सौहार्द से मिल-जुलकर रहते हैं। लेकिन पाकिस्तान में हिंदू-मुसलमानों को आतताइयों की औलाद समझते हैं। वहाँ सांप्रदायिक सौहार्द की कमी के कारण आए दिन हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे होते रहे हैं। लेखक की बात हामिद को सपने जैसी लग रही थी क्योंकि वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि हिन्दू-मुस्लिम भी आपस में कहीं प्यार से रहते होंगे। इसीलिए लेखक की बात सुनकर हामिद ने कहा कि काश वह भी लेखक के मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता।

प्रश्न 3. हामिद को लेखक की किन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था?

उत्तरः हामिद को लेखक की भेदभाव रहित बातों पर विश्वास नहीं हुआ। लेखक ने हामिद को बताया कि उनके प्रदेश में हिंदू-मुसलमान बड़े प्रेम से रहते हैं। वहाँ के हिंदू बढि़या चाय या पुलावों का स्वाद लेने के लिए मुसलमानी होटल में बिना किसी हिचकिचाहट के जाते हैं। पाकिस्तान में ऐसा होना संभव नहीं था। वहाँ के हिंदू मुसलमानों को अत्याचारी मानकर उनसे नफरत करते थे। और वहाँ हर दिन दंगे होते ही रहते थे। हामिद को लेखक के हिन्दू होने की बात पर भी विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकी उसने कभी किसी हिन्दू को किसी मुस्लिम से इतने प्यार से बात करते नहीं देखा था।

प्रश्न 4. हामिद खाँ ने खाने का पैसा लेने से इंकार क्यों किया?

उत्तरः हामिद खाँ ने अनेक कारणों के कारण खाने का पैसा लेने से इसलिए इंकार कर दिया, ये कारण निम्नलिखित हैं –

  • (1) वह भारत से पाकिस्तान गए लेखक को अपना मेहमान मान रहा था।
  • (2) हिंदू होकर भी लेखक मुसलमान के ढाबे पर खाना खाने गया था।
  • (3) लेखक मुसलमानों को आतताइयों की औलाद नहीं मानता था।
  • (4) लेखक की सौहार्द भरी बातों से हामिद खाँ बहुत प्रभावित था।
  • (5) लेखक की मेहमाननवाजी करके हामिद ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा का निर्वाह करना चाहता था।

प्रश्न 5. मालाबार में हिंदू-मुसलमानों के परस्पर संबंधों को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः मालाबार में हिंदू-मुसलमानों के आपसी संबंध बहुत घनिष्ठ हैं। जब कभी भी किसी हिंदू को अच्छी चाय या पुलाव खाने का मन होता है तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के मुसलमानों के होटलों में चला जाता हैं। वे आपस में मिल जुलकर रहते हैं। भारत में मुसलमानों द्वारा बनाई गई पहली मसजिद लेखक के ही राज्य में है। वहाँ सांप्रदायिक दंगे भी बहुत कम होते हैं।

प्रश्न 6. तक्षशिला में आगजनी की खबर पढ़कर लेखक के मन में कौन-सा विचार कौंधा? इससे लेखक के स्वभाव की किस विशेषता का परिचय मिलता है?

उत्तरः तक्षशिला में आगजनी की खबर सुनकर लेखक के मन में हामिद खाँ और उसकी दुकान के आगजनी से प्रभावित होने का विचार कौंधा। वह सोच रहा था कि कहीं हामिद की दुकान इस आगजनी का शिकार न हो गई हो। वह हामिद की सलामती की प्रार्थना करने लगा। इससे लेखक के कृतज्ञ होने, हिंदू-मुसलमानों को समान समझने की मानवीय भावना रखने वाले स्वभाव का पता चलता है।

बच्चों!

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Naye Ilake Mein Khushboo Rachte Haath Class 9

Naye Ilake Mein Khushboo Rachte Haath Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 1 की कविता पढ़ेंगे

‘नए इलाके में, खुशबू रचते हाथ’

कविता के रचयिता अरुण कमल हैं।

This Post Includes

बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

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कवि परिचयःअरुण कमल

जन्म: 1954

Arun Kamal

अरुण कमल का जन्म बिहार के रोहतास जिले के नासीरगंज में 15 फरवरी 1954 को हुआ। ये इन दिनों पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है। इन्हें अपनी कविताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया गया। अरुण कमल की कविताओं में नई बिम्ब, बोलचाल की भाषा, खड़ी बोली के अनेक लय-छंदों का समावेश है।

अरुण कमल की प्रमुख कृतियां है: अपनी केवल धार, सबूत, नए इलाके मे, पुतली में संसार (चारों कविता संग्रह) तथा कविता और समय (आलोचनात्मक कृति)।

पाठ प्रवेश: नए इलाके में, खुशबू रचते हैं हाथ

प्रस्तुत पाठ की पहली कविता ‘नए इलाके में’ में कवि ने एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करने के आमंत्राण का उल्लेख किया है, जो एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है। इस कविता के आधार पर कवि इस बात का ज्ञान देना चाहता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं होता अर्थात कोई भी वस्तु या जीव हमेशा के लिए नहीं रहते। इस पल-पल बनती और बिगड़ती दुनिया में किसी की भी यादों के भरोसे नहीं जिया जा सकता।

इस पाठ की दूसरी कविता ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ में कवि ने सामाजिक विषमताओं को बेनकाब किया है। इस कविता में कवि ने गरीबों के जीवन पर प्रकाश डाला है। कवि कहता है कि यह किसकी और कैसी कारस्तानी है कि जो वर्ग समाज को सुंदर बनाने में लगा हुआ है और उसे खुशहाल बना रहा है, वही वर्ग अभाव में, गंदगी में जीवन बिता कर रहा है? लोगों के जीवन में सुगंध बिखेरने वाले हाथ बहुत ही भयानक स्थितियों में अपना जीवन बिताने पर मजबूर हैं! क्या विडंबना है कि खुशबू रचने वाले ये हाथ दूरदराज के सबसे गंदे और बदबूदार इलाकों में जीवन बिता रहे हैं। स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान करने वाले ये लोग इतने उपेक्षित हैं! कवि यहाँ प्रश्न कर रहा है कि आखिर कब तक ऐसा चलने वाला है?

Naye Ilaake Mein Explanation

व्याख्याःनए इलाके में

इन नए बसते इलाकों में

जहाँ रोज बन रहे हैं नए-नए मकान

मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ

शब्दार्थ: इलाका – क्षेत्र, अकसर- प्रायः अथवा हमेशा

व्याख्या: कवि कहता है कि शहर में नये मुहल्ले रोज ही बसते हैं। ऐसी जगहों पर रोज नये-नये मकान बनते हैं। रोज-रोज नये बनते मकानों के कारण कोई भी व्यक्ति ऐसे इलाके में रास्ता भूल सकता है। कवि को भी यही परेशानी होती है। वह भी इन मकानों के बीच अपना रास्ता हमेशा भूल जाता है।

धोखा दे जाते हैं पुराने निशान

खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़

खोजता हूँ ढ़हा हुआ घर

और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ

मुड़ना था मुझे

फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का

घर था इकमंजिला

शब्दार्थ: ताकता- देखता, ढहा- गिरा हुआ, ध्वस्त फाटक- दरवाजा।

व्याख्या: कवि कहता है कि जो पुराने निशान हैं वे धोखा दे जाते हैं क्योंकि कुछ पुराने निशान तो सदा के लिए मिट जाते हैं। कवि के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह अपना रास्ता ढूँढ़ने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है परन्तु हर जगह मकानों के बनने के कारण उस पीपल के पेड़ को काट दिया गया है।

फिर कवि पुराने गिरे हुए मकान को ढूँढ़ता है परन्तु वह भी उसे अब कही नहीं दिखता। कवि कहता है कि पहले तो उसे घर का रास्ता ढूँढ़ने के लिए जमीन के खाली टुकड़े के पास से बाएँ मुड़ना पड़ता था और उसके बाद दो मकान के बाद बिना रंगवाले लोहे के दरवाजे वाले इकमंजिले मकान में जाना होता था। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि को अब बहुत से मकानों के बन जाने से घर का रास्ता ढूँढ़ने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

और मैं हर बार एक घर पीछे

चल देता हूँ

या दो घर आगे ठकमकाता

यहाँ रोज कुछ बन रहा है

रोज कुछ घट रहा है

यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं

शब्दार्थ: ठकमकाता- धीरे-धीरे, डगमगाते हुए स्मृति- याद।

व्याख्या: कवि कहता है कि अपने घर जाते हुए वह हर बार या तो अपने घर से एक घर पीछे ठहर जाता है या डगमगाते हुए अपने घर से दो घर आगे ही बढ़ जाता है। कवि कहता है जहाँ पर रोज ही कुछ नया बन रहा हो और कुछ मिटाया जा रहा हो, वहाँ पर अपने घर का रास्ता ढ़ूँढ़ने के लिए आप अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं कर सकते।

एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ

जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ

अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ

और पूछो दृ क्या यही है वो घर?

समय बहुत कम है तुम्हारे पास

आ चला पानी ढ़हा आ रहा अकास

शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर।

शब्दार्थ: वसंत- छह ऋतुओं में से एक, पतझड़- एक ऋतु जब पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं, वैसाख (वैशाख)- चैत (चैत्र) के बाद आने वाला महीना, भादों- सावन के बाद आने वाला महीना, अकास (आकाश)- गगन।

व्याख्या: कवि कहता है कि एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। ऐसा लगता है जैसे महीनों बाद लौटा हूँ। ऐसा लगता है जैसे घर से बसंत ऋतु में बाहर गया था और पतझड़ ऋतु में लौट कर आया हूँ।

जैसे बैसाख ऋतु में गया और भादों में लौटा हो। कवि कहता है कि अब सही घर ढ़ूँढ़ने का एक ही उपाय है कि हर दरवाजे को खटखटा कर पूछो कि क्या वह सही घर है। कवि कहता है कि उसके पास अपना घर ढूँढ़ने लिए बहुत कम समय है क्योंकि अब तो आसमान से बारिश भी आने वाली है और कवि को उम्मीद है कि कोई परिचित उसे देख लेगा और आवाज लगाकर उसे उसके घर ले जाएगा।

Khusboo Rachte Haath Explanation

व्याख्या: (खुशबू रचते हैं हाथ)

कई गलियों के बीच

कई नालों के पार

कूड़े करकट

के ढ़ेरों के बाद

बदबू से फटते जाते इस

टोले के अंदर

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ!

शब्दार्थ: नालों- घरों और सड़कों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाया गया रास्ता, कूड़ा-करकट- रद्दी, कचरा, टोले- छोटी बस्त।

व्याख्या: कवि कहता है कि अगरबत्ती का इस्तेमाल लगभग हर व्यक्ति करता है। अगरबत्ती हालाँकि पूजा पाठ में इस्तेमाल होती है लेकिन इसकी खुशबू ही शायद वह वजह होती है कि लोग इसे प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं।

इस कविता में कवि ने उन खुशबूदार अगरबत्ती बनाने वालों के बारे में बताया है जो खुशबू से कोसों दूर है। ऐसा कवि ने इसलिए कहा है क्योंकि अगरबत्ती का कारखाना अकसर किसी तंग गली में, घरों और सड़कों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाए गए रास्ता के पार और बदबूदार कूड़े के ढेर के समीप होता है। ऐसे स्थानों पर कई कारीगर अपने हाथों से अगरबत्ती को बनाते हैं।

उभरी नसोंवाले हाथ

घिसे नाखूनोंवाले हाथ

पीपल के पत्ते से नए नए हाथ

जूही की डाल से खुशबूदार हाथ

गंदे कटे पिटे हाथ

जख्म से फटे हुए हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ!

शब्दार्थ: शख्म- घाव, चोट

व्याख्या: कवि कहता है कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ तरह-तरह के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं। कवि कहता है कि दूसरों के लिए खुशबू बनाने वाले खुद न जाने कितनी और कैसी तकलीफों का सामना करते हैं।

यहीं इस गली में बनती हैं

मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ

इन्हीं गंदे मुहल्लों के गंदे लोग

बनाते हैं केवड़ा गुलाब खस और रातरानी अगरबत्तियाँ

दुनिया की सारी गंदगी के बीच

दुनिया की सारी खुशबू

रचते रहते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ।

शब्दार्थ: मुल्क- देश, केवड़ा- एक छोटा वृक्ष जिसके फूल अपनी सुगंध के लिए प्रसिद्ध हैं, खस- पोस्ता, रातरानी- एक सुगंधित फूल, मशहूर- प्रसिद्ध।

व्याख्या: कवि कहता है कि इसी तंग गली में पूरे देश की प्रसिद्ध अगरबत्तियाँ बनती हैं। उस गंदे मुहल्ले के गंदे लोग (गरीब लोग) ही केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी की खुशबू वाली अगरबत्तियाँ बनाते हैं। यह एक विडंबना ही है कि दुनिया की सारी खुशबू उन गलियों में बनती है जहाँ दुनिया भर की गंदगी समाई होती है।

Naye Ilaake Mein, Khushboo Rachte Haath Question and Answers

नए इलाके में, खुशबू रचते हैं हाथ प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1. नए बसते इलाके में कवि रास्ता क्यों भूल जाता है?

उत्तर: नये बसते इलाके में रोज रोज नये-नये मकान बनते हैं। कवि के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह अपना रास्ता ढूँढ़ने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है परन्तु हर जगह मकानों के बनने के कारण उस पीपल के पेड़ को काट दिया गया है। इससे आसपास का नजारा बदल जाता है और पुराने निशान गायब हो जाते हैं। इसलिए कवि रास्ता भूल जाता है।

प्रश्न 2. कविता में कौन-कौन से पुराने निशानों का उल्लेख किया गया है?

उत्तर: पीपल का पेड़, ढ़हा हुआ मकान, लोहे का बिना रंगवाला गेट

प्रश्न 3. कवि एक घर पीछे या दो घर आगे क्यों चल देता है?

उत्तर: कवि हर दिन नए-नए घर बन जाने से अपने घर को नहीं ढ़ूँढ़ पाता है और इसलिए एक घर पीछे या दो घर आगे चल देता है।

प्रश्न 4. ‘वसंत का गया पतझड़’ और ‘बैसाख का गया भादों को लौटा’ से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: ‘वसंत का गया पतझड़’ और ‘बैसाख का गया भादों को लौटा’ से अभिप्राय महीनों बाद लौटने से है।

प्रश्न 5. कवि ने इस कविता में ‘समय की कमी’ की ओर क्यों इशारा किया है?

उत्तर: जल्दी से सही पता न मिलने पर हो सकता है कि कवि की परेशानियाँ बढ़ जाएँ। हो सकता है उसे बिना वजह किसी होटल में किराये पर कमरा लेना पड़े, या प्लेटफॉर्म पर रात बितानी पड़े। हो सकता है कि कवी के घर में कोई महत्वपूर्ण काम चल रहा हो। इसलिए कवि ने इस कविता में ‘समय की कमी’ की ओर इशारा किया है।

प्रश्न 6. इस कविता में कवि ने शहरों की किस विडंबना की ओर संकेत किया है?

उत्तर: इस कविता में कवि ने शहरों के लगातार बदलते स्वरूप की ओर संकेत किया है। शहर में कुछ भी स्थाई नहीं होता। सब कुछ इतनी तेजी से बदलता है कि लोग हक्के बक्के रह जाते हैं और अपने घर का रास्ता भी भूल जाते हैं।

व्याख्या कीजिए-

प्रश्न 1. यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं, एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

उत्तर: एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। ऐसे में कोई पता ढ़ूँढ़ने के लिए याददाश्त पर भरोसा करने से कोई लाभ नहीं होता।

प्रश्न 2. समय बहुत कम है तुम्हारे पास, आ चला पानी ढ़हा आ रहा अकास, शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर

उत्तर: जल्दी से सही पता न मिलने पर हो सकता है कि कवि की परेशानियाँ बढ़ जाएँ। हो सकता है उसे बिलावजह किसी होटल में किराये पर कमरा लेना पड़े, या प्लेटफॉर्म पर रात बितानी पड़े। हो सकता है कि कवी के घर में कोई महत्वपूर्ण काम चल रहा हो। ऐसे में यदि कोई परिचित देख ले और आवाज लगा दे तो कवि का काम आसान हो जाएगा।

प्रश्न अभ्यास (खुशबू रचते हैं हाथ)-

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1. ‘खुशबू रचनेवाले हाथ’ कैसी परिस्थितियों में तथा कहाँ कहाँ रहते हैं?

उत्तर: ‘खुशबू रचनेवाले हाथ’ अर्थात अगरबत्ती बनाने वाले गरीब तबके के लोग होते हैं। ऐसे लोग तंग गलियों में, बदबूदार नाले के किनारे और कूड़े के ढ़ेर के बीच रहते हैं। बड़े शहरों की किसी भी झोपड़पट्टी में आपको ऐसा ही नजारा आसानी से देखने को मिलेगा।

प्रश्न 2. कविता में कितने तरह के हाथों की चर्चा हुई है?

उत्तर: अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ तरह-तरह के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं।

प्रश्न 3. कवि ने यह क्यों कहा है कि ‘खुशबू रचते हैं हाथ’?

उत्तर: अगरबत्ती का काम है खुशबू फैलाना। ये अगरबत्तियाँ हाथों से बनाई जाती हैं। इसलिए कवि ने कहा है कि ‘खुशबू रचते हैं हाथ’।

प्रश्न 4. जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल कैसा होता है?

उत्तर: जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल अगरबत्ती की मोहक खुशबू के ठीक विपरीत होता है। अगरबत्ती निर्माण एक कुटीर उद्योग है। ज्यादातर कारीगर किसी झोपड़पट्टी में रहते हैंय जहाँ बहुत ज्यादा गंदगी और बदबू होती है।

प्रश्न 5. इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इस कविता के माध्यम से कवि ने कामगारों और मजदूरों की भयावह जिंदगी को उजागर किया है। कवि ने यह दिखाने की कोशिश की है कि ऐसे मजदूर जो दूसरों के लिए खुशबू या खुशहाली का निर्माण करते हैं खुद कितनी बदहाली में रहते हैं और कितनी विषम परिस्थिति में काम करते हैं।

व्याख्या कीजिए-

प्रश्न 1. पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ, जूही की डाल से खुशबूदार हाथ

उत्तर: अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ तरह-तरह के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं।

प्रश्न 2. दुनिया की सारी गंदगी के बीच, दुनिया की सारी खुशबू रचते रहते हैं हाथ

उत्तर: जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल अगरबत्ती की मोहक खुशबू के ठीक विपरीत होती है। यह एक विडंबना ही है कि दुनिया की सारी खुशबू उन गलियों में बनती है जहाँ दुनिया भर की गंदगी समाई होती है।

प्रश्न 3. कवि ने इस कविता में ‘बहुवचन’ का प्रयोग अधिक किया है? इसका क्या कारण है?

उत्तर: अगरबत्ती हम जब भी खरीदते हैं तो हम कभी एक अगरबत्ती नहीं बल्कि एक पूरा अगरबत्ती का पैकेट खरीदते हैं। उसी तरह, अगरबत्ती बनाने वाले झुंड में काम करते हैं। उनकी समस्याएँ भी अनेक होती हैं। इसलिए कवि ने इस कविता में बहुवचन का प्रयोग अधिक किया है।

प्रश्न 4. कवि ने हाथों के लिए कौन-कौन से विशेषणों का प्रयोग किया है?

उत्तर: अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ किस्म किस्म के होते हैं और उनका वर्णन करने के लिए कवि ने तरह तरह के विशेषणों का उपयोग किया है। कवि ने किसी हाथ की उभरी हुई नसें दिखाई है, तो किसी के घिसे नाखून। किसी हाथ की कोमलता दिखाई है तो किसी की कठोरता।

बच्चों!

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Agni Path Class 9 Hindi Chapter 12 Summary, Explanation

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जीवन परिचयः हरिवंशराय बच्चन (1907-2003)

जीवन परिचयः हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव बाबूपट्टी में हुआ था। इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था।

हरिवंश राय बच्चन अनेक वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक रहे। कुछ समय के लिए हरिवंश राय बच्चन आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से जुड़े रहे।

Harivansh Rai Bachchan

उन्होंने साहस और सत्यता के साथ सीधी-सादी भाषा शैली में अपनी कविताएं लिखीं। इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना और जीवन-दर्शन के स्वर मिलते हैं। इनकी मृत्यु 2003 में हुई।

बच्चन की प्रमुख कृतियाँ हैः मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, मिलन-यामिनी, आरती और अंगारे, टूटती चट्टाने, रूप तरंगिणी (सभी कविता-संग्रह) और आत्मकथा के चार खंडरू क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।

पाठ-प्रवेशः

प्रस्तुत कविता में कवि ने संघर्ष से भरे जीवन को ‘अग्नि पथ’ कहते हुए मनुष्य को यह संदेश दिया है कि हमें अपने जीवन के रास्ते में सुख रूपी छाँह की इच्छा न करते हुए अपनी मंशिल की ओर मेहनत के साथ बिना थकान महसूस किए बढ़ते ही जाना चाहिए। कविता में शब्दों की पुनरावृत्ति कैसे मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, यह देखने योग्य है।

अग्निपथ कविता का सारः

हरिवंश राय बच्चन की कविता अग्निपथ में कवि ने हमें यह संदेश दिया है कि जीवन संघर्ष का ही नाम है। और उन्होंने यह कहा है कि इस संघर्ष से घबराकर कभी थमना नहीं चाहिए, बल्कि कर्मठतापूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए। कवि के अनुसार, हमें अपने जीवन में आने वाले संघर्षों का खुद ही सामना करना चाहिए। चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमें किसी से मदद नहीं माँगनी चाहिए। अगर हम किसी से मदद ले लेंगे, तो हम कमजोर पड़ जायेंगे और हम जीवन-रूपी संघर्ष को जीत नहीं पाएंगे। खुद के परिश्रम से सफलता प्राप्त करना ही इस कविता का प्रमुख लक्ष्य है।

पाठ व्याख्या (अग्नि पथ)

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने, हों बड़े,

एक पत्र छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थ :

अग्नि पथ – कठिनाइयों से भरा हुआ मार्ग, आगयुक्त मार्ग

पत्र – पत्ता

छाँह – छाया

व्याख्याः कवि मनुष्यों को सन्देश देता है कि जीवन में जब कभी भी कठिन समय आता है तो यह समझ लेना चाहिए कि यही कठिन समय तुम्हारी  असली परीक्षा का है। ऐसे समय में हो सकता है कि तुम्हारी मदद के लिए कई हाथ आगे आएँ, जो हर तरह से तुम्हारी मदद के लिए सक्षम हो लेकिन हमेशा यह याद रखना चाहिए कि यदि तुम्हे जीवन में सफल होना है तो कभी भी किसी भी कठिन समय में किसी की मदद नहीं लेनी चाहिए। स्वयं ही अपने रास्ते पर कड़ी मेहनत साथ बढ़ते रहना चाहिए।

तू न थकेगा कभी!

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी! कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थः

शपथ – कसम, सौगंध

व्याख्या: कवि मनुष्यों को समझाते हुए कहता है कि जब जीवन सफल होने के लिए कठिन रास्ते पर चलने का फैसला कर लो तो मनुष्य को एक प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि चाहे मंजिल तक पहुँचाने के रास्ते में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आए मनुष्य को कभी भी मेहनत करने से थकेगा नहीं, कभी रुकेगा नहीं और ना ही कभी पीछे मुड़ कर देखेगा।

यह महान दृश्य है

चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थः

अश्रु – आँसू

स्वेद – पसीना

रक्त – खून, शोणित

लथपथ – सना हुआ

व्याख्याः कवि मनुष्यों को सन्देश देते हुए कहता है कि जब कोई मनुष्य किसी कठिन रास्ते से होते हुए अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ता है तो उसका वह संघर्ष  देखने योग्य होता है अर्थात दूसरों के लिए प्रेरणा दायक होता है। कवि कहता है कि अपनी मंजिल पर वही मनुष्य पहुँच पाते हैं जो आँसू, पसीने और खून से सने हुए अर्थात कड़ी मेहनत कर के आगे बढ़ते हैं।

Agni Path Poem Important Question & Answers

प्रश्न 1: घने वृक्ष और एक पत्र-छाँह का क्या अर्थ है? अग्निपथ कविता के अनुसार लिखिए।

उत्तरः ‘घने वृक्ष’ मार्ग में मिलने वाली सुविधा के प्रतीक हैं। इनका आशय है-जीवन की सुख-सुविधाएँ। ‘एक पत्र-छाँह’ का प्रतीकार्थ है-थोड़ी-सी सुविधा।

प्रश्न 2: चल रहा मनुष्य है। अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, पथपथ। पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः कवि देखता है कि जीवन पथ में बहुत-सी कठिनाइयाँ होने के बाद भी मनुष्य उनसे हार माने बिना आगे बढ़ता जा रहा है। कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए वह आँसू, पसीने और खून से लथपथ है। मनुष्य निराश हुए बिना बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 3: अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ से क्या आशय है? अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए।

त्तरः अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ का आशय है-संकटों से पूरी तरह ग्रस्त मनुष्य। मार्ग में आने वाले कष्टों को झेलता हुआ तथा परिश्रम की थकान को दूर करता हुआ मनुष्य अपने-आप में सुन्दर होता जाता है।

प्रश्न 4: कवि मनुष्य से क्या अपेक्षा करता है? अग्नि पथ कविता के आधार पर लिखिए।

उत्तरः कवि मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह अपना लक्ष्य पाने के लिए सतत प्रयास करे और लक्ष्य पाए बिना रुकने का नाम न ले।

प्रश्न 5: अग्निपथ कविता का केन्द्रीय भाव लिखिए।

उत्तरः इस कविता का मूल भाव है निरन्तर संघर्ष करते हुए जियो। कवि जीवन को अग्निपथ अर्थात् आग से भरा पथ मानता है। इसमें पग-पग पर चुनौतियाँ और कष्ट हैं। मनुष्य को इन चुनौतियों से नहीं घबराना चाहिए और इनसे मुँह भी नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि आँसू पीकर, पसीना बहाकर तथा खून से लथपथ होकर भी निरन्तर संघर्ष पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

प्रश्न 6: अग्निपथ में क्या नहीं माँगना चाहिए?

उत्तरः ‘अग्निपथ’ अर्थात् दृ संघर्षमयी जीवन में हमें चाहे अनेक घने वृक्ष मिलें, परंतु हमें एक पत्ते की छाया की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। किसी भी सहारे के सुख की कामना नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न 7: अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए कि क्या घने वृक्ष भी हमारे मार्ग की बाधा बन सकते हैं?

उत्तरः अग्निपथ कविता में संघर्षमय जीवन को अग्निपथ कहा गया है और सुख-सुविधाओं को घने वृक्षों की छाया। कभी-कभी जीवन में मिलने वाली सुख-सुविधाएँ (घने वृक्षों की छाया) व्यक्ति को अकर्मण्य बना देती है और वे सफलता के मार्ग में बाधा बन जाते हैं इसीलिए कवि जीवन को अग्नि पथ कहता है। घने वृक्षों की छाया की आदत हमें आलसी बनाकर सफलता से दूर कर देती है।

प्रश्न 8: कवि हरिवंश राय बच्चन ने मनुष्य से किस बात की शपथ लेने का आग्रह किया है और क्यों?

उत्तरः कवि ने मनुष्य से आग्रह किया है कि यह जीवन-मार्ग कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ है। जीवन की राह पर आगे बढ़ते हुए वह कभी निरुत्साहित नहीं होगा। जीवन की राह सरल नहीं है। यह बहुत कठिन है। वह कभी थकान महसूस नहीं करेगा। न शारीरिक न मानसिक। रास्ते में कभी नहीं रुकेगा। रुकना ही मौत है, जीवन की समाप्ति है। इसलिए कवि मनुष्य से इस बात की शपथ दिलाता है कि वह संघर्ष भरे मार्ग पर निरंतर आगे ही बढ़ता रहेगा। वह न तो कभी रुकेगा, न थकेगा और न ही कभी संघर्ष से मुँह मोड़ेगा।