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Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary

Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 1 का पाठ 2 पढ़ेंगे

“मेरे संग की औरतें”

पाठ की लेखिका मृदुला गर्ग हैं।

This Post Includes

mere sang ki auratein

लेखिका परिचय: मृदुला गर्ग

मेरे संग की औरतें” मृदुला गर्ग जी का एक संस्मरण हैं।

इस संस्मरण में लेखिका ने अपनी चार पीढ़ी की महिलाओं (परदादी, नानी, माँ और खुद लेखिका) के व्यक्तित्व, उनकी आदतों व उनके विचारों के बारे में विस्तार से बात की है।

Mere Sang Ki Auratein Class 9th Chapter 2 Hindi Kritika

मेरे संग की औरतें पाठ का सारांश

लेखिका की स्मृतियों में उसकी नानी

Mridula Garg

अपने लेख की शुरुआत लेखिका कुछ इस तरह से करती हैं कि उनकी एक नानी थी जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा क्योंकि नानी की मृत्यु मां की शादी से पहले हो गई थी। लेखिका कहती हैं कि इसीलिए उन्होंने कभी अपनी “नानी से कहानियां” तो नहीं सुनी मगर “नानी की कहानियां” पढ़ी जरूर और उन कहानियों का अर्थ उनकी समझ में तब आया, जब वो बड़ी हुई।

लेखिका अपनी नानी के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उनकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और पर्दा करने वाली महिला थी।और उनके पति यानि नानाजी शादी के तुरंत बाद उन्हें (नानीजी) छोड़कर बैरिस्ट्री की पढाई करने कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए थे और जब वो अपनी पढ़ाई पूरी कर घर वापस आए तो, उनका रहन-सहन, खानपान, बोलचाल बिल्कुल विलायती हो गया था।

हालांकि नानी अब भी सीधे-साधे तौर तरीके से ही रहती थी। उन पर नानाजी के विलायती रंग-ढंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और ना ही उन्होंने कभी अपनी इच्छा या पसंद-नापसंद अपने पति को बतायी।

लेखिका आगे कहती हैं कि बेहद कम उम्र में जब नानी को लगा की उनकी मृत्यु निकट हैं तो उन्हें अपनी पन्द्रह वर्षीय इकलौती बेटी यानी लेखिका की मां की शादी की चिंता सताने लगी। इसीलिए उन्होंने पर्दे का लिहाज छोड़ कर नानाजी से उनके दोस्त व स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से मिलने की ख्वाहिश जताई। यह बात सुनकर घर में सब हैरान रह गए कि आखिर पर्दा करने वाली एक महिला, भला उनसे क्या बात करना चाहती हैं।

खैर नानाजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए अपने दोस्त को फौरन बुलवा लिया। नानी ने प्यारे लाल जी से वचन ले लिया कि वो उनकी लड़की (लेखिका की माँ) के लिए वर के रूप में किसी आजादी के सिपाही (स्वतंत्रता सेनानी) को ढूंढ कर उससे उसकी शादी करवा देंगें। उस दिन सब घर वालों को पहली बार पता चला कि नानीजी के मन में भी देश की आजादी का सपना पलता हैं।

बाद में लेखिका को समझ में आया कि असल में नानीजी अपनी जिंदगी में भी खूब आजाद ख्याल रही होंगी। हालाँकि उन्होंने कभी नानाजी की जिंदगी में कोई दखल तो नहीं दिया पर अपनी जिंदगी को भी वो अपने ढंग से, पूरी आजादी के साथ जीती थी। लेखिका कहती हैं कि यही तो असली आजादी हैं।

लेखिका की माँ

लेखिका की मां की शादी एक ऐसे पढ़े-लिखे लड़के से हुई जिसे आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने के अपराध में आईसीएस की परीक्षा में बैठने से रोक दिया और जिसके पास कोई पुश्तैनी जमीन जायजाद भी नहीं थी। और लेखिका की मां, अपनी मां और गांधी जी के सिद्धांतों के चक्कर में सादा जीवन उच्च विचार रखने को मजबूर हो गई।

लेखिका आगे कहती हैं कि उनके नाना पक्के साहब माने जाते थे। वो सिर्फ नाम के हिंदुस्तानी थे। बाकी चेहरे मोहरे, रंग-ढंग, पढ़ाई-लिखाई, रहन-सहन से वो पक्के अंग्रेज ही थे। लेखिका कहती हैं कि मजे की बात तो यह थी कि हमारे देश में आजादी की जंग लड़ने वाले ही अंग्रजों के सबसे बड़े प्रशंसक थे। फिर वो चाहे मेरे पिताजी के घरवाले हो या गांधी नेहरू।

लेखिका की मां खादी की साड़ी पहनती थी जो उन्हें ढंग से पहननी नहीं आती थी।लेखिका कहती हैं कि उन्होंने अपनी मां को आम भारतीय मांओं के जैसा कभी नहीं देखा क्योंकि वह घर परिवार और बच्चों पर कोई खास ध्यान नहीं देती थी। घर में पिताजी, मां की जगह काम कर लिया करते थे।

लेखिका की मां को पुस्तकें पढ़ने और संगीत सुनने का शौक था जो वो बिस्तर में लेटे-लेटे करती थी। हां उनमें दो गुण अवश्य थे। पहला वह कभी झूठ नहीं बोलती थी और दूसरा वह लोगों की गोपनीय बातों को अपने तक ही सीमित रखती थी। इसी कारण उन्हें घर और बाहर दोनों जगह आदर व सम्मान मिलता था।

लेखिका आगे कहती हैं कि उन्हें सब कुछ करने की आजादी थी।उसी आजादी का फायदा उठाकर छह भाई-बहनों में से तीन बहनों और इकलौते भाई ने लेखन कार्य शुरू कर दिया।

लेखिका की परदादी 

लेखिका कहती हैं कि उनकी परदादी को भी लीक से हटकर चलने का बहुत शौक था। जब लेखिका की मां पहली बार गर्भवती हुई तो परदादी ने मंदिर जाकर पहला बच्चा लड़की होने की मन्नत मांगी थी जिसे सुनकर परिवार के सभी लोग हक्के-बक्के रह गए थे। दादी का यह मन्नत मांगने का मुख्य कारण परिवार में सभी बहूओं के पहला बच्चा बेटा ही होता आ रहा था। ईश्वर ने परदादी की मुराद पूरी की और घर में एक के बाद एक पाँच कन्याएं भेज दी।

इसके बाद लेखिका अपनी दादी से संबंधित एक किस्सा सुनाती हैं। लेखिका कहती हैं कि एक बार घर के सभी पुरुष सदस्य एक बारात में गए हुए थे और घर में सभी महिलाएं सजधज कर रतजगा कर रही थी। घर में काफी शोर-शराबा होने के कारण दादी दूसरे कमरे में जाकर सो गई।

तभी एक बदकिस्मत चोर दादी के कमरे में घुस गया।उसके चलने की आहट से दादी की नींद खुल गई। दादी ने चोर को कुँए से एक लोटा पानी लाने को कहा। चोर कुएं से पानी लेकर आया और दादी को दे दिया। दादी ने आधा लोटा पानी खुद पानी पिया और आधा लोटा पानी चोर को पिला दिया और फिर उससे बोली कि आज से हम मां-बेटे हो गए हैं। अब तुम चाहो तो चोरी करो या खेती करो।  दादी की बात का चोर पर ऐसा असर हुआ कि चोर ने चोरी करना छोड़ कर , खेती करनी शुरू कर दी।

15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा था। तब लेखिका बीमारी थी। लेखिका उस समय सिर्फ 9 साल की बच्ची थी। बहुत रोने धोने के बाद भी उसे जश्न में शामिल होने नहीं ले जाया गया। लेखिका और उसके पिताजी के अलावा घर के सभी लोग बाहर जा चुके थे।

बाद में पिताजी ने उसे “ब्रदर्स कारामजोव” नामक उपन्यास लाकर दी । उसके बाद लेखिका उस उपन्यास को पढ़ने में व्यस्त हो गयी थी और उनके पिताजी अपने कमरे में जाकर पढ़ने लगे।

लेखिका कहती हैं कि यह उसकी परदादी की मन्नत का प्रभाव ही रहा होगा, तभी लड़कियों होने के बाबजूद भी उनके व उनकी बहनें के मन में कभी कोई हीन भावना नहीं आई।

लेखिका की बहनें

दादी ने जिस पहली लड़की के लिए मन्नत मांगी थी। वह लेखिका की बड़ी बहन मंजुला भगत थी जिसे घर में “रानी” नाम से बुलाते थे। दूसरे नंबर में खुद लेखिका यानि मृदुला गर्ग थी जिनका घर का नाम उमा था। और तीसरे नंबर की बहन का नाम चित्रा था, जो लेखिका नहीं हैं ।

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लेखिका का परिवार

चौथे नंबर की बहन का नाम रेनू और पांचवें नंबर की बहन का नाम अचला था। पांच बहनों के बाद एक भाई हुआ जिसका नाम राजीव हैं। लेखिका कहती हैं कि उनके भाई राजीव हिंदी में लिखते हैं जबकि समय की मांग के हिसाब से अचला अंग्रेजी में लिखने लगी।

लेखिका आगे कहती हैं कि सभी बहनों ने अपनी शादी अच्छे से निभाई। लेखिका शादी के बाद अपने पति के साथ बिहार के एक छोटे से कस्बे डालमिया नगर में रहने गई। लेखिका ने वहाँ एक अजीब सी बात देखी। परुष और महिलाएं, चाहे वो पति-पत्नी क्यों न हो, अगर वो पिक्चर देखने भी जाते थे तो पिक्चर हाल में अलग-अलग जगह में बैठकर पिक्चर देखते थे।

लेखिका दिल्ली से कॉलेज की नौकरी छोड़कर वहां पहुंची थी और नाटकों में काम करने की शौकीन थी। लेखिका कहती हैं कि उन्होंने वहां के चलन से हार नहीं मानी और साल भर के अंदर ही कुछ शादीशुदा महिलाओं को गैर मर्दों के साथ अपने नाटक में काम करने के लिए मना लिया। अगले 4 साल तक हम महिलाओं ने मिलकर कई सारे नाटकों में काम किया और अकाल राहत कोष के लिए भी काफी पैसा इकट्ठा किया।

इसके बाद लेखिका कर्नाटक चली गई। उस समय तक उनके दो बच्चे हो चुके थे जो स्कूल जाने लायक की उम्र में पहुंच चुके थे। लेखिका कहती है कि वहां कोई बढ़िया स्कूल नहीं था जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सके। इसीलिए लेखिका ने स्वयं एक प्राइमरी स्कूल खोला।

वो कहती हैं कि मेरे बच्चे, दूसरे ऑफिसर और अधिकारियों के बच्चे उस स्कूल में पढ़ने लगे। जिन्हें बाद में दूसरे अच्छे स्कूलों में प्रवेश मिल गया।लेखिका ने स्कूल खोल कर व उसे सफलता पूर्वक चला कर यह साबित कर दिया कि वह किसी से कम नहीं है।

लेखिका के जीवन में ऐसे अनेक अवसर आए जब लेखिका ने अपने आप को साबित किया। उन्होंने अनेक कार्य किये लेकिन उन्हें प्रसिद्धि तो अपने लेखन कला से ही हासिल हुई।

Mere Sang Ki Auratein Chapter 2 Question Answers

मेरे संग की औरतें पाठ के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा भी नहीं फिर भी उनके व्यक्तित्व से वे क्यों प्रभावित थीं?

उत्तर: लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा नहीं था, किंतु उनके बारे में सुना अवश्य था। उसने सुना था कि उसकी नानी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्यारेलाल शर्मा से भेंट की थी। उस भेट में उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि वे अपनी बेटी की शादी किसी क्रांतिकारी से करवाना चाहती हैं, अंग्रेजों के किसी भक्त से नहीं। उनकी इस इच्छा में देश की स्वतंत्रता की पवित्र भावना थी। यह भावना बहुत सच्ची थी। इसमें साहस था। जीवन भर परदे में रहकर भी उन्होंने किसी पर पुरुष से मिलने की हिम्मत की। इससे उनके साहसी व्यक्तित्व और मन में सुलगती स्वतंत्रता की भावना का पता चला। लेखिका इन्हीं गुणों के कारण उनका सम्मान करती है।

प्रश्न 2. लेखिका की नानी की आज़ादी के आंदोलन में किस प्रकार की भागीदारी रही?

उत्तर: लेखिका की नानी ने आज़ादी के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था, पर आज़ादी के आंदोलन में उनका अप्रत्यक्ष योगदान अवश्य था। वे अनपढ़ परंपरागत परदानशीं औरत थीं। उनके मन में आज़ादी के प्रति जुनून था। यद्यपि उनके पति अंग्रेजों के भक्त थे और साहबों के समान रहते थे पर अपनी मृत्यु को निकट देखकर उन्होंने अपने पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा को बुलवाया और स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनकी बेटी का वर वे ही अपने समान ही। किसी स्वतंत्रता के दीवाने लड़के को खोज कर दें। इससे उनकी बेटी का विवाह आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने वाले उस लड़के से हो सका जिसे आई.सी.एस. (I.C.S.) परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। इस तरह उसकी नानी ने आज़ादी के आंदोलन में भागीदारी निभाई।

प्रश्न 3. लेखिका की माँ परंपरा का निर्वाह न करते हुए भी सबके दिलों पर राज करती थी। इस कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की विशेषताएँ लिखिए।

(ख) लेखिका की दादी के घर के माहौल का शब्द-चित्र अंकित कीजिए।

उत्तर: कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की स्थितियाँ और व्यक्तित्व-दोनों असाधारण थे। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम करती थीं। उनकी सोच मौलिक थी। लेखिका के शब्दों में वह खुद अपने तरीके से आज़ादी के जुनून को निभाती थीं। इस विशेषता के कारण घर-भर के लोग उसका आदर करते थे। कोई उनसे घर गृहस्थी के काम नहीं करवाता था। उनका व्यक्तित्व ऐसा प्रभावी था कि ठोस कामों के बारे में उनसे केवल राय ली जाती थी और उस राय को पत्थर की लकीर मानकर निभाया जाता था।

लेखिका की माँ का सारा समय किताबें पढ़ने, साहित्य चर्चा करने और संगीत सुनने में बीतता था। वे कभी बच्चों के साथ लाड़-प्यार भी नहीं करती थीं। उनके मान-सम्मान के दो कारण प्रमुख थे। वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं। वे एक की गोपनीय बात दूसरे से नहीं कहती थीं।

(ख) लेखिका की दादी के घर में विचित्र विरोधों का संगम था। परदादी लीक से परे हटकर थीं। वे चाहती थीं कि उनकी पतोहू को होने वाली पहली संतान कन्या हो। उसने यह मन्नत मानकर जगजाहिर भी कर दी। इससे घर के अन्य सभी लोग हैरान थे। परंतु लेखिका की दादी ने इस इच्छा को स्वीकार करके होने वाली पोती को खिलाने-दुलारने की कल्पनाएँ भी कर डालीं। लेखिका की माँ तो बिलकुल ही विचित्र थीं। वे घर का कोई काम नहीं करती थीं। वे आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहती थीं। उन्हें पुस्तकें पढ़ने, संगीत सुनने और साहित्य चर्चा करने से ही फुर्सत नहीं थी। उनके पति भी क्रांतिकारी थे। वे आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं थे। विचित्र बात यह थी कि लेखिका के दादा अंग्रेजों के बड़े प्रशंसक थे। घर में चलती उन्हीं की थी। किंतु घर की नारियाँ अपने-अपने तरीके से जीने के लिए स्वतंत्र थीं। कोई किसी के विकास में बाधा नहीं बनता था।

प्रश्न 4. आप अपनी कल्पना से लिखिए कि परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत क्यों माँगी?

उत्तर: परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत इसलिए माँगी ताकि वे परंपरा से अलग चलने की जो बात करती थीं, उसे अपने कार्य-व्यवहार द्वारा सबको दर्शा सकें। इसके अलावा उनके मन में लड़का और लड़की में अंतर समझने जैसी कोई बात न रही होगी।

प्रश्न 5. डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की जगह सहजता से किसी को भी सही राह पर लाया जा सकता है-पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: इस पाठ से स्पष्ट है कि मनुष्य के पास सबसे प्रभावी अस्त्र है-अपना दृढ़ विश्वास और सहज व्यवहार। यदि कोई सगा संबंधी गलत राह पर हो तो उसे डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव देने की बजाय सहजता से व्यवहार करना चाहिए। लेखिका की नानी ने भी यही किया। उन्होंने अपने पति की अंग्रेज़ भक्ति का न तो मुखर विरोध किया, न समर्थन किया। वे जीवन भर अपने आदर्शों पर टिकी रहीं। परिणामस्वरूप अवसर आने पर वह मनवांछित कार्य कर सकीं।

लेखिका की माता ने चोर के साथ जो व्यवहार किया, वह तो सहजता का अनोखा उदाहरण है। उसने न तो चोर को पकड़ा, न पिटवाया, बल्कि उससे सेवा ली और अपना पुत्र बना लिया। उसके पकड़े जाने पर उसने उसे उपदेश भी नहीं दिया, न ही चोरी छोड़ने के लिए दबाव डाला। उसने इतना ही कहा-अब तुम्हारी मर्जी चाहे चोरी करो या खेती। उसकी इस सहज भावना से चोर का हृदय परिवर्तित हो गया। उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और खेती को अपना लिया।

प्रश्न 6. ‘शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है’ -इस दिशा में लेखिका के प्रयासों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस दिशा में लेखिका ने अथक प्रयास किए। उसने कर्नाटक के बागलकोट जैसे छोटे से कस्बे में रहते हुए इस दिशा में सोचना शुरू किया। उसने कैथोलिक विशप से प्रार्थना की कि उनका मिशन वहाँ के सीमेंट कारखाने से मदद लेकर वहाँ स्कूल खोल दे, पर वे इसके लिए तैयार न हुए। तब लेखिका ने अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ तीन भाषाएँ सिखाने वाला स्कूल खोला और उसे कर्नाटक सरकार से मान्यता दिलवाई। इस स्कूल के बच्चे बाद में अच्छे स्कूलों में प्रवेश पा गए।

प्रश्न 7. पाठ के आधार पर लिखिए कि जीवन में कैसे इंसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है?

उत्तर: इस पाठ के आधार पर स्पष्ट है कि ऊँची भावना वाले दृढ़ संकल्पी लोगों को श्रद्धा से देखा जाता है। जो लोग सद्भावना से व्यवहार करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर गलत रूढ़ियों को तोड़ डालने की हिम्मत रखते हैं, समाज में उनका खूब आदर-सम्मान होता है।

लेखिका की नानी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने परिवार और समाज से विरोध लेकर भी अपनी पुत्री को किसी क्रांतिकारी से ब्याहने की बात कही। इस कारण वह सबकी पूज्या बन गईं। लेखिका की परदादी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने दो धोतियों से अधिक संचय न करने का संकल्प किया था। उसने परंपरा के विरुद्ध लड़के की बजाय लड़की होने की मन्नत मानी।

लेखिका की माता इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने देश की आज़ादी के लिए कार्य किया। कभी किसी से झूठ नहीं बोला। कभी किसी की गोपनीय बात को दूसरे को नहीं बताया। ये सभी व्यक्तित्व सच्चे थे, लीक से परे थे तथा दृढ़ निश्चयी थे। इस कारण इनका सम्मान हुआ। इन पर श्रद्धा प्रकट की गई।

प्रश्न 8. ‘सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है’ -इस कथन के आधार पर लेखिका की बहन एवं लेखिका के व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर: “सच, अकेलेपन का मजा ही कुछ और है।” इस कथन के आधार पर ज्ञात होता है कि लेखिका और उसकी बहन दोनों ही अपने दृढ़ निश्चय और जिद्दीपन के कारण उक्त कथन को चरितार्थ ही नहीं करती हैं बल्कि उसका आनंद भी उठाती हैं। लेखिका की बहन रेणु तो लेखिका से भी दो कदम आगे थी। वह गरमी में भी उस गाड़ी में नहीं आती थी जिसे उसके पिता ने स्कूल से उसे लाने के लिए लगवा रखा था। एक बहन गाड़ी में आती थी जबकि रेणु पैदल। इसी तरह शहर में एक बार नौ इंच बारिश होने पर शहर में पानी भरने के कारण घरवालों के मना करते रहने पर भी वह लब-लब करते पानी में स्कूल गई और स्कूल बंद देखकर लौट आई।

लेखिका ने बिहार के डालमिया शहर में रूढ़िवादी स्त्री-पुरुषों के बीच जहाँ जागृति पैदा की और उनके साथ नाटक करते हुए सूखा राहत कोष के लिए धन एकत्र किया वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के छोटे से कस्बे में बच्चों के लिए स्कूल खोला और मान्यता दिलवाई, यह काम लेखिका ने अकेले ही शुरू किया था।

पाठ से जुड़े अन्य प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1. लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का क्या कारण मानती है?

उत्तर: लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का कारण यह मानती हैं कि वे अपनी नानी से कहानी नहीं सुन पाईं क्योंकि उनकी माँ की शादी होने से पूर्ण ही नानी की मृत्यु हो चुकी थी। शायद नानी से कहानी न सुन पाने के कारण लेखिका और उसकी बहनों को खुद कहानियाँ कहनी पड़ीं। इससे वे लेखिका बन गईं।

प्रश्न 2. लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे क्या जान पाई थी?

उत्तर: लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे में बस इतना ही जान पाई थी कि उसकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और परदा करने वाली महिला थी। उनके पति उन्हें छोड़कर वकालत की पढ़ाई करने इंग्लैंड चले गए थे। वकालत की डिग्री लेकर लौटने के बाद वे साहबों जैसी जिंदगी व्यतीत करने लगे पर नानी पर इसका कोई अंतर नहीं पड़ा। वे अपनी मरजी से जीती रहीं और अपनी किसी पसंद-नापसंद का इज़हार अपने पति के सामने कभी नहीं किया।

प्रश्न 3. लेखिका की नानी ने स्वतंत्रता सेनानी प्यारे लाल शर्मा से कौन-सी इच्छा प्रकट की? यह इच्छा उन्होंने अपने पति से क्यों नहीं बताई?

उत्तर: लेखिका की नानी ने जब कम उम्र में ही स्वयं को मृत्यु के निकट पाया तो उन्होंने अपने पति के मित्र प्यारे लाल शर्मा को बुलवाया और कहा कि आप मेरी बेटी की शादी अपने जैसे ही किसी आज़ादी के सिपाही से करवा दीजिएगा। उन्होंने यह इच्छा अपने पति को इसलिए नहीं बताई क्योंकि वे जानती थी कि अंग्रेज़ों के भक्त उनके पति उनकी इस इच्छा को पूरा नहीं करेंगे। वे बेटी की शादी आज़ादी के सिपाही से होने को पसंद न करते।।

प्रश्न 4. लेखिका ने लिखा है कि उसकी नानी एकदम मुँहज़ोर हो उठीं। वे कब और क्यों मुँहज़ोर हो उठीं?

उत्तर: लेखिका की नानी उस समय मुँहज़ोर हो उठी थी जब वे कम उम्र में यह महसूस करने लगी कि उनकी मृत्यु निकट है। और उनकी इकलौती पंद्रह वर्षीया बेटी अभी अविवाहित है। उनके मुँहजोर होने का कारण अपने पति का आचार-विचार था। उनके उच्च शिक्षित पति अंग्रेजों के भक्त थे जबकि लेखिका की नानी स्वतंत्रताप्रिय नारी थीं। वे अपनी बेटी का विवाह किसी साहब से नहीं बल्कि आज़ादी के सिपाही से करने की पक्षधर थीं।

प्रश्न 5. लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई क्यों कहा है? ससुराल में उनकी क्या स्थिति थी?

उत्तर: लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई इसलिए कहा है क्योंकि उनमें खूबसूरती, नज़ाकत गैर दुनियादारी, ईमानदारी और निष्पक्षता जैसे गुणों का संगम था। इन गुणों के कारण ससुराल में उनकी स्थिति यह थी कि उनसे कोई ठोस काम करने के लिए कोई नहीं कहता था। हर काम के लिए उनकी ज़बानी राय जरूर माँगी जाती थी और उनकी राय को अकाट्य समझते हुए उस पर अमल भी किया जाता था।

बच्चों!

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Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Summary

Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Poem Summary, Explanation and Question Answers

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हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक
क्षितिज भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे
‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’
Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17
पाठ के लेखक राजेश जोशी हैं।
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बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि – राजेश जोशी

कवि और लेखक राजेश जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में 1946 में हुआ। जोशी साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार हैं।

उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता शुरू की और कुछ सालों तक अध्यापन किया। राजेश जोशी ने कविताओं के अलावा कहानियां, नाटक, लेख और टिप्पणियां भी लिखीं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं में भी कार्य किया।  जैसे – अंग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए।

उपलब्धियाँ

 उन्हें मुक्तिबोध पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार तथा साथ ही “साहित्य अकादमी पुरस्कार” के प्रतिष्ठित सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

रचनाएं

राकेश जोशी जी की रचनाएं कुछ इस प्रकार से हैं

कविता संग्रह

  • एक दिन बोलेंगे पेड़
  • मिट्टी का चेहरा
  • नेपथ्य में हँसी
  • दो पंक्तियों के बीच
  • कविता – बच्चे काम पर जा रहे है

कविता का सार

राजेश जोशी जी ने हमेशा मानवीय दुखों, खासकर के बच्चो और महिलाओं के दुखो को अपने कविता में स्थान दिया है। प्रस्तुत कविता में भी कवि इस बात से दुखी है की बहुत सारे बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हे अपना पेट भरने के लिए बचपन से ही काम पर लग जाना पड़ता है। न तो उन्हें पढ़ने का मौका मिलता है और न खेलना का मौका मिलता है और इस तरह उनसे उनका बचपन छीन लिया जाता है। और इसीलिए कविता में कवि यह प्रश्न पूछ रहा है की आखिर बच्चें काम पर क्यों जा रहे हैं ? उनके अनुसार यह बहुत ही भयावह है की छोटे-छोटे बच्चे सुबह-सुबह स्कूल जाने के बजाय काम पर जा रहे हैं।

उन्हें ऐसा लग रहा है की सारे खिलौने सारी किताबे, खेलने की जगह सब ख़तम हो गई है और इसलिए बच्चे काम पर पर जा रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि सब कुछ मौजूद है और कवि इसीलिए परेशान है। अपने इस कविता में कवि बाल मजूदरी पर अपना क्रोध वयक्त किया है। उनके अनुसार यह बहुत ही गलत बात है और सरकार तथा समाज  को इस बात जरुरु ध्यान देना चाहिए।

कविता का  भावार्थ 

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं

सुबह सुबह

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि राजेश जोशी जी ने हमारे समाज में चल रहे बाल-मजदूरी की समस्या को दिखाया है और हमारा ध्यान इस समस्या की और आकर्षित करने की कोशिश की है। कवि ने कविता की प्रथम पंक्तियों में ही लिखा है की बहुत ही ठण्ड का मौसम है और सुबह सुबह का वक्त है चारो तरफ कोहरा छाया हुआ है। सड़के भी कोहरे से ढँकी हुई है। परन्तु इतने ठण्ड में भी छोटे छोटे बच्चे कोहरे से ढकी सड़क पर चलते हुए अपने अपने काम पर जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करना है। कोई कारखाने में मजदूरी करता है तो कोई चाय के दुकान में काम करने के लिए मजबूर है। जबकि इन बच्चों की उम्र तो अभी खेलने कूदने की है।

बच्चे काम पर जा रहे हैं

हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना

लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने इस समाज में वयाप्त बाल-मजदूरी जैसी समस्या पर चिंतन करते हुए कहा है की हमारे समय की सबसे भयानक बात यह है की छोटे छोटे बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है। और उससे भी भयानक कवि को यह बात लग रही है हम यह बात कितनी ही सरलता से कह दे रहे हैं। जबकि हमें इसकी और ध्यान देना चाहिए और इसका कारण पता करना चाहिए की पढ़ने और खेलने के उम्र वाले बच्चे को अपना पेट पालने के लिए यूँ काम पर क्यों जाना पड़ रहा है। इसे हमें समाज में एक प्रश्न की तरह पूछना चाहिए की इन छोटे बच्चों को काम पर क्यों जाना पड़ रहा है जबकि इनकी उम्र अभी खेलने कूदने और पढ़ने लिखने की है।

क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें

क्या दीमकों ने खा लिया है

सारी रंग बिरंगी किताबों को

क्या काले पहाड़ के निचे दब गए हैं सारे खिलौने

क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं

सारे मदरसों की इमारतें

भावार्थ :- कवि बाल मजदूरों को सुबह भीषण ठण्ड एवं कोहरे के बिच अपने अपने काम में जाते देखता है जिसे देखकर कवि हताशा एवं निराशा से भर जाता है और और इसी कारण वश कवि के मन में कई तरह के सवाल उठने लगते हैं कवि को यह समझ नहीं आ रहा की क्यों ये बच्चे अपना मन मारकर इतनी सुबह सुबह ठण्ड काम के जाने के लिए विवश है। कवि सोचता है की क्या खेलने के लिए गेंदे सारी खत्म हो चुकी है या आकाश में चली गई है। क्या बच्चो पढ़ने के लिए एक भी किताब नहीं बची है ? क्या सारी किताबो को दीमक ने खा लिया है ? क्या बाकी सारी खिलोने कहीं किसी काले पहाड़ के निचे छुपा दिए गए हैं ? जो अब इन बच्चों के लिए कुछ नहीं बचा। क्या इन बच्चों को पड़ाने वाली मदरसों एवं विधालय टूट चुकीं है जो ये बचे पढ़ाई एवं खेल कूद को छोड़कर काम पर जा रहे हैं।

क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन

ख़त्म हो गए हैं एकाएक

भावार्थ :- क्या बच्चों के खेलने की सारी जगह ख़त्म हो चुकी है क्या सारे मैदान जहाँ बच्चे खेलते थे, सारे बागीचे जहाँ बच्चे टहला करते थे एवं सारे घरो के आँगन ख़तम हो चुके हैं अचानक ही जो इन बच्चों के पास अब कुछ नहीं बसा इसीलिए ये सुबह सुबह काम पर जा रहे हैं।

तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता

भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह

कि हैं सारी चींजे हस्बमामूल

भावार्थ :- कवि के अनुसार छोटे छोटे बच्चे काम पर इसलिए जा रहे हैं क्युकिं दुनिया की सारी खेलने की चीजे जैसे गेंद, खिलौने, बागीचे, मैदान, घर का आँगन इत्यादि खत्म हो चुके हैं। उनके पड़ने के लिए सारी किताबे, विधालय एवं मदरसाये ख़त्म हो चुकी हैं कवि आगे कह रहा है की अगर सच में ऐसा है तो यह कितनी भयानक बात है, और दुनिया के होने का अर्थ ही नहीं। परन्तु कवि को इससे भी ज्यादा भयानक तब लगता है जब उसे जान पड़ता है की बच्चों के खेलने कूदने की सारी चीजें उपलब्ध हैं और उसके बाद भी बच्चे काम पर जाने के लिए विवश है और इसी कारण कवि हताश एवं निराश भी है।

अर्थ यह है की कवि अपने इन पंक्तियों के द्वारा समाज में चल रहे बाल-श्रम की और हमारा धयान खींचने में पूरी तरह से सफल हुए हैं। कवि के अनुसार बच्चपन खेल-कूद, पढ़ाई-लिखाई एवं बच्चों के विकाश का समय होता है। इस वक्त उन पर कोई बोझ या जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए

बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे

काम पर जा रहे हैं।

भावार्थ :- कवि की सोच यह थी की दुनिया में स्थित सारे खेलने-कूदने की जगह एवं चीजे ख़त्म हो गई हैं और इसीलिए बच्चे काम पर जा रहे हैं। लेकिन जब वो देखते हैं की ये सारे चीजें एवं जगहे दुनिया में भरी पड़ी है। तब उनमे चिंता घर कर जाती है क्युकिं उन्हें यह समझ नहीं आता की इन सारी चीजों के मौजूद होने के बाद भी आखिर क्यों छोटे छोटे बच्चे दुनिया की हज़ार हज़ार सड़कों से चल कर अपने अपने काम पर जाने के लिए विवश है। इसीलिए उन्होंने हमारे सामने यह प्रश्न उठाया है की “काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?”


Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17 Question Answers

बच्चे काम पर जा रहे हैं प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभारता है उसे लिखकर व्यक्त कीजिए।
उत्तर- कविता की पहली दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

कोहरे से ढंकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं।
सुबह सुबह

इन्हें पढ़कर मेरे मन-मस्तिष्क में चिंता और करुणा का भाव उमड़ता है। करुणा का भाव इस कारण उमड़ता है कि इन बच्चों की खेलने-कूदने की आयु है किंतु इन्हें भयंकर कोहरे में भी आराम नहीं है। पेट भरने की मजबूरी के कारण ही ये । ठंड में सुबह उठे होंगे और न चाहते हुए भी काम पर चल दिए होंगे। चिंता इसलिए उभरी कि इन बच्चों की यह दुर्दशा कब समाप्त होगी? कब समाज बाल-मजदूरी से मुक्ति पाएगा? परंतु कोई समाधान न होने के कारण चिंता की रेखा गहरी हो गई।

प्रश्न 2. कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
उत्तर- कवि की दृष्टि में बच्चों के काम पर जाने की स्थिति को विवरण या वर्णन की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा वर्णन किसी के मन में भावनात्मक लगाव और संवेदनशीलता नहीं पैदा कर सकता है, कुछ सोचने के लिए विवश नहीं कर सकता है। इसे प्रश्न के रूप में पूछे जाने पर एक जवाब मिलने की आशा उत्पन्न होती है। इसके लिए समस्या से जुड़ाव, जिज्ञासा एवं व्यथा उत्पन्न होती है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 3. सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं?
उत्तर- समाज की व्यवस्था और गरीबी के कारण बच्चे सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से वंचित हैं। भारत में करोड़ों लोग पेट भर रोटी नहीं जुटा पाते। इसलिए उनके बच्चों को भी बचपन से कामकाज करना पड़ता है। यह उनकी जन्मजात विवशता होती है। एक भिखारी, मजदूर या गरीब व्यक्ति का बच्चा गेंद, खिलौने, रंगीन किताबें कहाँ से लाए?

समाज की व्यवस्था भी बाल-श्रमिकों को रोकने में सक्षम नहीं है। यद्यपि सरकार ने इस विषय में कानून बना दिए हैं। किंतु वह बच्चों को निश्चित रूप से ये सुविधाएँ दिला पाने में समर्थ नहीं है। न ही सरकार या समाज के पास इतने साधन हैं, न गरीबी मिटाने के उपाय हैं और न इच्छा-शक्ति। इसलिए बच्चे वंचित हैं।

प्रश्न 4. दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर- जीवन में बच्चों को काम पर जाते हुए देखकर भी लोग उदासीन बने रहते हैं। इस उदासीनता के अनेक कारण हैं; जैसे-

  • लोग इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि वे सोचते हैं कि छोड़ो, यह कौन-सा हमारा बच्चा है।
  • लोगों की स्वार्थ भावना इस उदासीनता को बढ़ाती है। वे अधिक लाभ कमाने और कम मजदूरी देने के लालच में बच्चों से काम करवाते हैं।
  • बाल श्रम कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य का उचित निर्वाह न करना समाज की उदासीनता बढ़ाता है।

प्रश्न 5. आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है?
उत्तर- मैंने अपने शहर में बच्चों को अनेक स्थलों पर काम करते देखा है। चाय की दुकान पर, होटलों पर, विभिन्न दुकानों पर, घरों में, निजी कार्यालयों में। मैंने उन्हें सुबह से देर रात तक, हर मौसम में काम करते देखा है।

प्रश्न 6. बच्चों को काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
उत्तर- बच्चों का काम पर जाना एक बड़े हादसे के समान इसलिए है क्योंकि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने की उम्र में काम करने से बालश्रमिकों का भविष्य नष्ट हो जाता है। इससे एक ओर जहाँ शारीरिक विकास अवरुद्ध होता है, वहीं उनका मानसिक विकास भी यथोचित ढंग से नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे जीवनभर के लिए अकुशल श्रमिक बनकर रह जाते हैं। इससे उनके द्वारा समाज और देश के विकास में उनके द्वारा जो योगदान दिया जाना था वह नहीं मिलता है जिससे प्रगति की दर मंद पड़ती जाती है।


तो बच्चों!

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धन्यवाद!

Reedh Ki Haddi Chapter 3 Summary

Reedh Ki Haddi Chapter 3 Summary, Explanation & Question Answers

Class 9TH Hindi Kritika Part 1

हैलो बच्चों!

अज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

“रीढ़ की हड्डी”

Reedh Ki Haddi

For Audio Chapter Click Here

पाठ के लेखक जगदीष चंद्र माथुर हैं।

आइए बच्चो, पाठ के सार को सरल शब्दों में समझते हैं।

“’रीढ़ की हड्डी“ के लेखक जगदीश चंद्र माथुर जी हैं। यह एक एकांकी (छोटा नाटक) हैं। जो शादी ब्याह तय करने से पहले “लड़की दिखाने की”  सामाजिक समस्या पर आधारित हैं।

लेखक ने इस नाटक के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि हम चाहे कितना भी पढ़-लिख जाय, कितने भी आधुनिक क्यों ना हो जाए, लेकिन महिलाओं के प्रति हमारी सोच नही बदली है। और न ही हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठ पाए हैं। लेखक ने इस पाठ के माध्यम से स्त्री शिक्षा के महत्व को भी समझाया हैं।

हमारे समाज में विवाह जैसी पवित्र परम्परा का भी व्यवसायीकरण हो गया है। लोग शादी विवाह के वक्त लड़की के माता-पिता से दहेज के रूप में धन, वाहन और अन्य घरेलू वस्तुओं को मांगने में जरा भी नहीं हिचकते हैं। पता नहीं उनको ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो अपने लड़के की शादी उस लड़की से कर उसके माता-पिता पर एहसान कर रहे हैं।

लाख बुराइयों के बाद भी लड़के को खरा सोना और सर्वगुण संपन्न व पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी लड़की को कमतर ही आँका जाता है। दहेज समस्या की वजह से ही आज हमारे देश कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं।

इस कहानी में लेखक ने भी बस यही समझाने की कोशिश की है।

“’रीढ़ की हड्डी” कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह से होती हैं। उमा एक पढ़ीलिखी शादी के योग्य लड़की हैं जिसके पिता रामस्वरूप उसकी शादी के लिए चिंतित हैं। और आज उनके घर लड़के वाले (यानि बाबू गोपाल प्रसाद जो पेशे से वकील हैं और उनका लड़का शंकर जो बीएससी करने के बाद मेडिकल की पढाई कर रहा हैं।) उमा को देखने आ रहे हैं।

चूंकि रामस्वरूप की बेटी उमा को देखने के लिए आज लड़के वाले आ रहे हैं। इसीलिए रामस्वरूप अपने नौकर रतन के साथ अपने घर के बैठक वाले कमरे को सजा रहे हैं। उन्होंने बैठक में एक तख्त (चारपाई) रख कर उसमें एक नया चादर बिछाया। फिर उमा के कमरे से हारमोनियम और सितार ला कर उसके ऊपर सजा दिया।

रामस्वरूप जमीन में एक नई दरी और टेबल में नया मेजपोश बिछाकर उसके ऊपर गुलदस्ते सजाकर कमरे को आकर्षक रूप देने की कोशिश करते हैं। तभी रामस्वरूप की पत्नी प्रेमा आकर कहती है कि उमा मुंह फुला कर (नाराज होना) बैठी है। इस पर रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा से कहते हैं कि वह उमा को समझाएं क्योंकि बड़ी मुश्किल से उन्हें एक रिश्ता मिला है। इसलिए वह अच्छे से तैयार होकर लड़के वालों के सामने आए।

Reedh Ki Haddi

दरअसल उमा के पिता किसी भी कीमत पर इस रिश्ते को हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। लेकिन प्रेमा कहती है कि उसने उमा को बहुत समझाया है लेकिन वह मान नहीं रही हैं।

उसके बाद वह रामस्वरूप पर दोषरोपण करते हुए कहती हैं कि यह सब तुम्हारे ज्यादा पढ़ाने लिखाने का नतीजा है। अगर उमा को सिर्फ बारहवीं तक ही पढ़ाया होता तो, आज वह कंट्रोल में रहती। रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा से कहते हैं कि वह उमा की शिक्षा की सच्चाई लड़के वालों को न बताये।

दरअसल उमा बी.ए. पास है। और लड़के वालों को ज्यादा पढ़ी लिखी लड़की नहीं चाहिए। इसीलिए रामस्वरूप ने लड़के वालों से झूठ बोला हैं कि लड़की सिर्फ दसवीं पास है।

प्रेमा की बातें सुनकर रामस्वरूप थोड़ा चिंतित होते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि आजकल शादी ब्याह के वक्त लड़की के साज श्रृंगार का क्या महत्व है। लेकिन वह अपनी पत्नी से कहते हैं कि कोई बात नहीं, वह वैसे ही सुंदर हैं।

लड़के वालों के नाश्ते के लिए मिठाई, नमकीन, फल, चाय, टोस्ट का प्रबंध किया गया है। लेकिन टोस्ट में लगाने के लिए मक्खन खत्म हो चुका है। इसीलिए रामस्वरूप अपने नौकर को मक्खन लेने के लिए बाजार भेजते हैं। बाजार जाते वक्त नौकर को घर की तरफ आते मेहमान दिख जाते हैं जिनकी खबर वह अपने मालिक को देता हैं।

ठीक उसी समय बाबू गोपाल प्रसाद अपने लड़के शंकर के साथ रामस्वरूप के घर में दाखिल होते हैं। लेकिन गोपाल प्रसाद की आंखों में चतुराई साफ झलकती हैं। और आवाज से ही वो, बेहद अनुभवी और फितरती इंसान दिखाई देते हैं। उनके लड़के शंकर की आवाज एकदम पतली और खिसियाहट भरी हैं जबकि उसकी कमर झुकी हुई हैं। रामस्वरूप ने मेहमानों का स्वागत किया और औपचारिक बातें शुरू कर दी। बातों-बातों में दोनों नये जमाने और अपने जमाने (समय) की तुलना करने लगते हैं।

थोड़ी देर बाद रामस्वरूप चाय नाश्ता लेने अंदर जाते हैं। रामस्वरूप के अंदर जाते ही गोपाल बाबू रामस्वरूप की हैसियत आंकने की कोशिश करने लगते हैं। वह अपने बेटे को भी डांटते हैं जो इधर-उधर झाँक रहा था। वह उससे सीधी कमर कर बैठने को कहते हैं।

इतने में रामस्वरूप दोनों के लिए चाय नाश्ता ले कर आते हैं। थोड़ी देर बात करने के बाद बाबू गोपाल प्रसाद असल मुद्दे यानि शादी विवाह के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं।

जन्मपत्रिका मिलाने की बात पर गोपाल प्रसाद कहते हैं कि उन्होंने दोनों जन्मपत्रिकाओं को भगवान के चरणों में रख दिया। बातों-बातों में वो अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए कहते हैं कि लोग उनसे कहते हैं कि उन्होंने लड़कों को उच्च शिक्षा दी हैं। इसीलिए उन्हें बहुएं भी ग्रेजुएट लानी चाहिए।

लेकिन मैं उनको कहता हूँ कि लड़कों का पढ़-लिख कर काबिल होना तो ठीक है लेकिन लड़कियां अगर ज्यादा पढ़ लिख जाए और अंग्रेजी अखबार पढ़कर पाॅलिटिक्स करने लग जाए तो, घर गृहस्थी कैसे चलेगी। वो आगे कहते हैं कि मुझे बहुओं से नौकरी नहीं करानी है।

फिर वो रामस्वरूप से लड़की (उमा) की सुंदरता व अन्य चीजों के बारे में पूछते हैं। रामस्वरूप कहते हैं कि आप खुद ही देख लीजिए।

इसके बाद रामस्वरूप उमा को बुलाते है। उमा एक प्लेट में पान लेकर आती है। उमा की आँख पर लगे चश्मे को देखकर गोपाल प्रसाद और शंकर दोनों एक साथ चश्मे के बारे में पूछते हैं। लेकिन रामस्वरूप झूठा कारण बता कर उन्हें संतुष्ट कर देते हैं।

गोपाल प्रसाद उमा से गाने बजाने के संबंध में पूछते हैं तो उमा मीरा का एक सुंदर गीत गाती है। उसके बाद वो पेंटिग, सिलाई, कढ़ाई आदि के बारे में भी पूछते हैं। उमा को यह सब अच्छा नहीं लगता है। इसलिए वह कोई उत्तर नहीं देती है। यह बात गोपाल प्रसाद को खटकती हैं। वो उमा से प्रश्नों के जवाब देने को कहते हैं। रामस्वरूप भी उमा से जवाब देने के लिए कहते हैं।

तब उमा अपनी धीमी मगर मजबूत आवाज में कहती है कि क्या दुकान में मेज-कुर्सी बेचते वक्त उनकी पसंद-नापसंद पूछी जाती है। दुकानदार ग्राहक को सीधे कुर्सी मेज दिखा देता है और मोल भाव तय करने लग जाता है। ठीक उसी तरह ये महाशय भी, किसी खरीददार के जैसे मुझे एक सामान की तरह देख-परख रहे हैं। रामस्वरूप उसे टोकते हैं और गोपाल प्रसाद नाराज होने लगते हैं।

लेकिन उमा अपनी बात जारी रखते हुए कहती हैं कि पिताजी आप मुझे कहने दीजिए। ये जो सज्जन मुझे खरीदने आये हैं जरा उनसे पूछिए क्या लड़कियां के दिल नहीं होते हैं, क्या उन्हें चोट नहीं लगती है। गोपाल प्रसाद गुस्से में आ जाते हैं और कहते हैं कि क्या उन्हें यहाँ बेइज्जती करने के लिए बुलाया हैं।

उमा जवाब देते हुए कहती हैं कि आप इतनी देर से मेरे बारे में इतनी जांच पड़ताल कर रहे हैं। क्या यह हमारी बेइज्जती नहीं हैं। साथ में ही वह लड़कियों की तुलना बेबस भेड़ बकरियों से करते हुए कहती है कि उन्हें शादी से पहले ऐसे जांचा परखा जाता हैं जैसे कोई कसाई भेड़-बकरियों खरीदने से पहले उन्हें अच्छी तरह से जाँचता परखता हैं।

वह उनके लड़के शंकर के बारे में बताती हैं कि किस तरह पिछली फरवरी में उसे लड़कियों के हॉस्टल से बेइज्जत कर भगाया गया था। तब गोपाल प्रसाद आश्चर्य से पूछते हैं क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो। उमा जवाब देते हुए कहती हैं कि उसने बी.ए पास किया है। ऐसा कर उसने कोई चोरी नहीं की। उसने पढ़ाई करते हुए अपनी मर्यादा का पूरा ध्यान रखा। उनके पुत्र की तरह कोई आवारागर्दी नहीं की।

अब शंकर व उसके पिता दोनों गुस्से में खड़े हो जाते हैं और रामस्वरूप को भला बुरा कहते हुए दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। उमा पीछे से कहती है। जाइए… जाइए, मगर घर जाकर यह पता अवश्य कर लेना कि आपके पुत्र की रीढ़ की हड्डी है भी कि नहीं।

गोपाल प्रसाद और शंकर वहां से चले जाते हैं। उनको जाता देख रामस्वरूप निराश हो जाते हैं। पिता को निराश-हताश देख उमा अपने कमरे में जाकर रोने लग जाती हैं। तभी नौकर मक्खन लेकर आता हैं। और कहानी खत्म हो जाती हैं।

IMPORTANT QUESTION ANSWERS

REEDH KI HADDI CHAPTER 3 HINDI KRITIKA PART 1

प्रश्न 1. रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर “एक हमारा ज़माना था” कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?

उत्तर: यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि वह अपने बीते हुए समय को याद करता है तथा उसे ही सही ठहरा था है परंतु बीते हुए समय की तुलना वर्तमान से करना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि हर एक समय अपनी उस समय की परिस्थितियों के अनुसार सही होता है यूं भी हर जमाने की अपनी स्थितियां होती है जमाना बदलता है तो कुछ कमियों के साथ सुधार भी आते हैं।

प्रश्न 2. रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?

उत्तर: आधुनिक समाज में सभ्य नागरिक होने के बावजूद उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की खातिर लोगों के दबाव में झुकना पड़ रहा था, उपयुक्त बात उनकी इसी विवशता को उजागर करती है।

प्रश्न 3. अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है?

उत्तर: अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप, उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं वह सरासर गलत है एक तो वे अपनी पढ़ी-लिखी लड़की को कम पढ़ा लिखा साबित कर रहे हैं और उसकी सुंदरता को और बढ़ाने के लिए नकली प्रसाधन सामग्री का उपयोग करने के लिए कहते हैं जो अनुचित है साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि उमा वैसा ही आचरण करें जैसा लड़के वाले चाहते हैं परंतु वह यह क्यों भूल रहे हैं कि उन्हें लड़की की पसंद-नापसंद का भी ख्याल रखना चाहिए क्योंकि आज समाज में लड़का तथा लड़की को समान दर्जा प्राप्त है।

प्रश्न 4. गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा झिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।

उत्तर: मेरे विचार से दोनों ही समान रूप से अपराधी है गोपाल प्रसाद विवाह जैसे पवित्र बंधन में भी व्यापार खोज रहे हैं वह इस तरह के आचरण से इस संबंध की मधुरता तथा संबंधों की गरिमा को भी कम कर रहे हैं रामस्वरूप जहां आधुनिक सोच वाले व्यक्ति होने के बावजूद कायरता का परिचय दे रहे हैं वे चाहते तो अपनी बेटी के साथ मजबूती से खड़े होते और एक स्वाभिमानी वर की तलाश करते ना की मजबूरी में आकर परिस्थिति से समझौता करते।

प्रश्न 5. “…आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं…” उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है ?

उत्तर: उपर्युक्त कथन के माध्यम से उमा, शंकर की निम्न कमियों की ओर ध्यान दिलाना चाहती है:

  1. शंकर का चरित्र अच्छा नहीं है लड़कियों के हॉस्टल के चक्कर काटते हुए वह पकड़ा जा चुका है।
  2. उसका अपना निजी कोई व्यक्तित्व नहीं है वह अपने पिता के पीछे चलने वाला बेचारा जीव है जैसा कहा जाता है वैसा ही करता है।
  3. वह शारीरिक रूप से भी असमर्थ है वह शरीर में कमजोर झुक कर तथा उसे चेतन कर भी बैठा नहीं जाता।

प्रश्न 6. शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: समाज में आज उमा जैसे व्यक्तित्व, स्पष्टता वादी तथा उच्च चरित्र वाली लड़की की ही आवश्यकता है ऐसी लड़कियों से ही समाज और देश प्रगति कर पाएगा जो आत्मविश्वास से भरी तथा निडर हो इसके विपरीत शंकर जैसे लड़के समाज को दिशा नहीं प्रदान कर सकते हैं।

प्रश्न 7. ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जिस प्रकार मानव में रीढ़ की हड्डी महत्वपूर्ण मानी जाती है ठीक उसी प्रकार वैवाहिक रिश्तो में लड़का और लड़की रीड की हड्डी के समान होते हैं उनके स्वस्थ रिश्ते पारिवारिक शांति अपनापन और समृद्धि के कारण बनते हैं इस पाठ के जरिए यही बताने का प्रयास किया गया है कि नर और नारी को कमतर समझकर हम एक प्रगतिशील समाज की कल्पना नहीं कर सकते अतः यह उचित शीर्षक है।

प्रश्न 8. कई वस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों ?

उत्तर: इस कहानी में कई पात्र हैं परंतु सबसे सशक्त पात्र बनकर जो उभरता है वह ओ माही है उमा की उपस्थिति भले थोड़े समय के लिए थी परंतु उसके विचारों से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह पाते हैं वह हमें बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है उसकी उपस्थिति नारी समाज को एक नई सोच और दिशा प्रदान करती है।

प्रश्न 9. एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: रामस्वरूप आधुनिक और प्रगतिशील विचारधाराओं से संपन्न है परंतु एक मजबूर पीता है वह एक तरफ तो स्त्री शिक्षा के समर्थक हैं परंतु बेटी के विवाह के समय यह शिक्षा में छिपाने का प्रयास करते हैं जिससे उनकी विवशता तथा कायरता झलकती है रामगोपाल निहायती बड़े वाले लालची और पढ़े लिखे होने के बावजूद स्त्री पुरुष की संपन्नता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के रूप में उभरते हैं इसी कारणवश वह अपने मेडिकल में पढ़ने वाले बेटे का विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को भी बिजनेस मानते हैं इससे उनका लालची स्वभाव पता चलता है।

प्रश्न 10. इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।

उत्तर: रीढ़ की हड्डी एक उद्देश्य पूर्ण एकांकी है इस एकांकी के उद्देश्य निम्नलिखित है:

  1. यह एकांकी स्त्री पुरुष समानता की पक्षधर है।
  2. लड़कियों के विवाह में आने वाली समस्याओं को समाज के सामने लाने वाली है।
  3. बेटियों के विवाह के समय पिता की परेशानियों को बेनकाब करती है।
  4. स्त्री शिक्षा के प्रति दोहरी मानसिकता रखने वाले को बेनकाब करती है।
  5. स्त्री को भी अपने विचार व्यक्त करने की आजादी देने के पक्ष में है।


तो बच्चों!

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