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Diary Ke Panne Class 12 Summary

Diary Ke Panne Classs 12th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों

आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक वितान भाग 2 का पाठ पढ़ेंगे

डायरी के पन्ने’

Diary Ke Panne Class 12 Chapter 4 Hindi Vitan Part 2

पाठ की लेखिका एन फ्रैंक हैं।

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बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखिका के जीवन परिचय को जानते हैं।

Anne Frank

Anne Frank

जीवन परिचय: ऐनी फ्रैंक (1929-1945) नाम की एक युवा यहूदी लड़की थी। जब 1933 में एडॉल्फ हिल्टर और नाजियों द्वारा यहूदियों के लिए जीवन यापन करना मुश्किल हो गया तो वह अपने माता-पिता और बड़ी बहन के साथ जर्मनी से नीदरलैंड चली गई। 1942 में, फ्रैंक और उनका परिवार जर्मन के कब्जे वाले एम्स्टर्डम में अपने पिता के व्यवसाय के पीछे एक गुप्त अपार्टमेंट में छिप गया। 1944 में ऐनी फ्रैंक को पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया तथा यातना शिविरों में भेजा गया। केवल ऐनी फ्रैंक के पिता बच गए। जिन्होने अपने परिवार के छिपकर रहने के समय की ऐनी फ्रैंक की डायरी पहली बार 1947 में प्रकाशित करवाई। इस डायरी का अनुवाद विश्व की लगभग 70 भाषाओं में किया गया है। यह विश्व की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाले डायरी में से एक है।

ऐनी फ्रैंक का जन्म

ऐनी फ्रैंक का जन्म 12 मई 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट हुआ था। उसकी एक बड़ी बहन, मार्गोट थी। उनके पिता फ्रैंक्स उदार यहूदी थे और यहूदी धर्म के सभी रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन नहीं करते थे। वे विभिन्न धर्मों के यहूदी और गैर-यहूदी नागरिकों के एक आत्मसात समुदाय में रहते थे। वह व्यवसाय को व्यवस्थित करने और अपने परिवार के साथ रहने की व्यवस्था करने के लिए एम्स्टर्डम में चले गए। फरवरी 1934 तक, एडिथ और बच्चे एम्स्टर्डम में उसके साथ जुड़ गए थे। फ्रैंक्स उन 300,000 यहूदियों में से थे जो 1933 और 1939 के बीच जर्मनी से भाग गए थे।

जन्मदिन का उपहार: डायरी

12 जून 1942 को अपने तेरहवें जन्मदिन के लिए फ्रैंक को एक डायरी तोहफे के रूप में मिली। हालांकि यह एक ऑटोग्राफ बुक थी, जो लाल और सफेद चेक वाले कपड़े के साथ बंधी हुई थी और सामने की तरफ एक छोटा ताला था, फ्रैंक ने फैसला किया कि वह इसे एक डायरी के रूप में इस्तेमाल करेगी, और उसने लगभग तुरंत ही लिखना शुरू कर दिया। 20 जून 1942 की अपनी प्रविष्टि में, वह डच यहूदी आबादी के जीवन पर नाज़िओं और हिटलर की सेनाओं द्वारा लगाए गए कई प्रतिबंधों को सूचीबद्ध करती है।

सन 1947 में सबसे पहले “डायरी के पन्ने” किताब डच भाषा में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद सन 1952 में यह डायरी “द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल” नामक शीर्षक से दुबारा अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। और हिन्दी के इस पाठ के अनुवादक सूरज प्रकाश हैं।

इस डायरी की खासियत यह है कि इस डायरी की लेखिका ऐन फ्रैंक ने हिटलर के अत्याचारों व द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के परिणामों को खुद देखा व झेला भी। उन्हें बहुत छोटी सी उम्र में इतिहास के सबसे खौफनाक व दर्दनाक अनुभव से गुजरना पड़ा।

ऐन फ्रैंक ने अपनी आप बीती को एक डायरी के माध्यम से पूरी दुनिया के लोगों तक पहुंचाया। धीरे-धीरे यह डायरी दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी जानी वाली किताबों की सूची में शामिल हो गई।

द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-40) के समय नीदरलैंड के यहूदी परिवारों पर हिटलर के अत्याचार बढ़ गये थे। उसने गैस चैंबर व फायरिंग स्क्वायड के माध्यम से लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया। इसीलिए यहूदी परिवार गुप्तस्थानों में छिप कर अपने जीवन की रक्षा करने को बाध्य हुए।

यह कहानी दो परिवारों (फ्रैंक परिवार और वान दान परिवार) की है जिन्होंने लगभग दो वर्ष का समय अज्ञातवास में एकसाथ छुपकर बिताया था। ऐन फ्रैंक ने अज्ञातवास के उन्हीं दो वर्षों की अपनी दिनचर्या व जीवन के अन्य पहलूओं के बारे में इस डायरी में वर्णन किया हैं। मिस्टर वान दान, ऐन फ्रैंक के पिता के बिजनेस पार्टनर व अच्छे दोस्त थे।

यह डायरी 2 जून 1942 से लेकर 1 अगस्त 1944 तक लिखी गई है। 4 अगस्त 1944 को किसी की सूचना पर इन लोगों को नाजी पुलिस ने पकड़ लिया और 1945 में ऐन फ्रैंक की अकाल मृत्यु हो गई । यहाँ पर डायरी के कुछ अंशों को ही दिया गया हैं।

Diary Ke Panne Class 12 Summary

ऐन फ्रैंक ने अपनी “किट्टी” नाम की गुड़िया को संबोधित करते हुए यह पूरी डायरी लिखी है। यह डायरी उसे उसके तेरहवें जन्मदिन पर उपहार स्वरूप मिली थी।

डायरी का पहला पन्ना

बुधवार, 8 जुलाई 1942

अपनी डायरी के पहले पन्ने में किट्टी को संबोधित करते हुए ऐन फ्रैंक कहती हैं कि प्यारी किट्टी, रविवार को दोपहर 3 बजे उनकी सोलह वर्षीय बड़ी बहन मार्गोट को ए.एस.एस. से बुलावा आया था और उन्हें यातना शिविर में बुलाया गया था। और यह तो सभी लोग जानते हैं कि यातना शिविर में यहूदियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता हैं।

बस उस समय से ही हमारे जीवन में उथल पुथल मची हुई थी और अब हमें अपने घर में ही एक -एक पल काटना भारी लग रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे डच सैनिक कभी भी आकर मार्गोट को ले जा सकते हैं।

पहले हमारी योजना 16 जुलाई को अज्ञातवास में जाने की थी। लेकिन अब हम जल्दी से जल्दी अपना घर छोड़कर अज्ञातवास में जाना चाहते थे। मिस्टर वान दान का परिवार भी हमारे साथ गुप्त आवास में आना चाहता था।

इसीलिए हम दोनों परिवारों के सातों लोगों (ऐन, ऐन के माता–पिता, बड़ी बहन मार्गोट, मिस्टर वान दान दंपत्ति, उनका बेटा पीटर) ने अपना–अपना जरूरी सामान समेटकर गुप्त आवास में जाने की तैयारी की। मिस्टर डसेल बाद में हमारे साथ रहने आये।

ऐन फ्रैंक ने अपने थैले में एक डायरी , कर्लर , स्कूली किताबें , रुमाल और कुछ पुरानी चिठ्ठ्यों आदि भर ली क्योंकि लेखिका के लिए स्मृतियां, पोशाकों (कपड़ों) की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण थी। वो अज्ञातवास जाने के ख्याल से ही आतंकित थी। 9 जुलाई 1942 की सुबह वो अज्ञातवास को चल पड़े। 

गुरुवार, 9 जुलाई 1942

गुरुवार, 9 जुलाई 1942 को वो सभी लोग सामान से भरे अपने बड़े-बड़े थैलों को कंधों पर उठाये अज्ञातवास पर अपने नये गुप्त आवास की तरफ चल पड़े। उनके सीने पर चमकता हुआ पीला सितारा लगा हुआ था जो लोगों को उनकी व्यथा के बारे में बता रहा था। दरअसल हिटलर के शाशनकाल में यहूदियों को अपनी पहचान बताने के लिए सीने में पीला सितारा लगाना आवश्यक था।

उनका नया घर उनके पिता के ऑफिस की ही इमारत में था । यह भवन गोदाम व भंडार घर के रूप में प्रयोग किया जाता था। यहां इलाइची, लोंग और काली मिर्च वगैरह पीसी जाती थी। इसके बाद वो अपने नए घर का पूरा खाका अपने पत्र में देती हैं कि कमरे, सीढ़ियां व दरवाजे कहाँ–कहाँ हैं। कहाँ क्या काम होता हैं और उन्हें कौन से कमरे में रहना है।

शुक्रवार, 10 जुलाई 1942

डायरी के इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि नए घर में पहुँचने के बाद उनका पहला व दूसरा दिन यानि सोमवार व मंगलवार का पूरा दिन नए घर में सामान व्यवस्थित करने में ही बीत गया। उनकी मां और बड़ी बहन बुरी तरह से थक गई थी मगर वो अपने पिता के साथ अपने नए घर को व्यवस्थित करने में लगी रही जिस कारण वह भी बुरी तरह से थक गई।

ऐन फ्रैंक कहती हैं कि बुधवार तक तो उन्हें यह सोचने की फुर्सत नहीं थी कि उनकी जिंदगी में कितना बड़ा परिवर्तन आ चुका है।

शनिवार, 28 नवंबर 1942

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि हम अपने नये घर में बिजली व राशन कुछ ज्यादा ही खर्च कर रहे हैं। उन्हें इन दोनों को किफायत से चलाना होगा वरना मुसीबत हो सकती हैं।

शाम 4:30 बजे अंधेरा हो जाता है मगर अज्ञातवास में होने के कारण वो रात में बिजली नही जला सकते हैं क्योंकि बिजली देखकर पड़ोसियों को उनके वहां होने का पता चल जायेगा। इसलिए वो रात को पढ़ भी नहीं सकती हैं। ऐसे में वो अन्य कामों को करने में अपना समय बिताने की कोशिश करती है।

ऐन फ्रैंक कहती हैं कि दिन में वो परदा हटा कर बाहर भी नहीं देख सकती हैं। इसीलिए उन्होंने रात में दूरबीन से पड़ोसियों के घरों में ताक झाँक कर अपना वक्त गुजारने का एक नया तरीका खोजा लिया हैं।

यहाँ पर लेखिका मिस्टर डसेल के बारे में बताती हैं कि वो बच्चों से बहुत प्यार करते हैं लेकिन कभी -कभी वो उनके भाषण सुन–सुन के बोर हो जाती हैं क्योंकि वो हर समय अनुशासन संबंधी बातें ही करते हैं। वो थोड़े चुगलखोर टाइप के भी है जो उनकी सारी बातें उनके मम्मी पापा को बता देते हैं। उन्हें बार–बार उनकी बुराइयों व कमियों के बारे में बताया जाता हैं जो उन्हें बुरा लगता हैं।

ऐन फ्रैंक कहती हैं कि मीन मेख निकालने वाले परिवार में अगर आप केंद में हों और हर तरफ से आपको दुत्कारा या फटकारा जाय तो, इसे झेलना आसान नहीं होता हैं।

लेकिन रात में बिस्तर पर लेटकर मैं अपने पापों, कमियों व कार्यों के बारे में सोचती रहती हूँ। मुझे अपने आप पर हंसना और रोना, दोनों आता है। यहाँ पर लेखिका खुद अपना आंकलन करती हैं जो उन्हें अपनी उम्र से कही अधिक परिवक्व बनता हैं।

शुक्रवार, 19 मार्च 1943

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि टर्की इंग्लैंड के पक्ष में हैं , यह खबर फैल रही हैं। हजार गिल्डर के नोट अवैध मुद्रा घोषित हो गई हैं जो कालाबाजारी करने वालों के लिए बहुत बड़ा झटका हैं। साथ ही भूमिगत लोगों के लिए भी यह चिंता की बात हैं क्योंकि अब उनको भी इसके स्रोत का सबूत देना पड़ेगा।

लेखिका घायल सैनिक व हिटलर के बीच की बातचीत को रेडियो में सुनती है। घायल सैनिक अपने जख्मों को दिखाते हुए गर्व महसूस कर रहे थे।

शुक्रवार, 23 जनवरी 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि पिछले कुछ हफ्तों से उन्हें परिवार के वंश वृक्ष और राजसी परिवारों की वंशावली तालिकाओं में खासी रूची हो गई है। वो बड़ी मेहनत से अपने स्कूल का काम करती हैं और रेडियो पर बी.बी.सी. की होम सर्विस को भी समझती है। वो रविवार को अपने प्रिय फिल्मी कलाकारों की तस्वीरें देखने में गुजारती हैं।

हर सोमवार मिस्टर कुगलर उनके लिए “सिनेमा एंड थियेटर” की एक पत्रिका लाते हैं। हालाँकि परिवार के लोग इसे पैसे की बर्बादी मानते हैं। वो रोज नई-नई केश सज्जा बनाकर आती है तो सभी लोग उनका मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि वो अमुक फिल्म स्टार की नकल कर रही है जिससे उनका मन आहत होता हैं।

बुधवार, 28 जनवरी 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि हर दिन घर के आठ लोग अपनी वही पुरानी कहानी एक – दूसरे को सुनाते हैं जिसे सुनकर अब वो बोर हो चुकी हैं। नया सुनने व बोलने को कुछ नहीं हैं । इस बात से उनके मन की धुटन का पता चलता हैं।

बुधवार, 29 मार्च 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि कैबिनेट मंत्री मिस्टर बोल्के स्टीन ने लंदन से डच प्रसारण में कहा हैं कि युद्ध के बाद युद्ध का वर्णन करने वाली डायरी व पत्रों का संग्रह कर लिया जाएगा । यह खबर आते ही सबने उनकी डायरी को पढ़ना चाहा। लेकिन वो इस प्रसारण के बाद बहुत गंभीरता से अपनी डायरी में हर बात लिखने लगी।

ऐन फ्रैंक अपनी डायरी को एक ऐसे शीर्षक के साथ छपवाने की बात करती है जिससे लोग उनकी कहानी को जासूसी कहानी समझेंगे । वो कहती हैं कि युद्ध के दस साल बाद लोग आश्चर्य चकित रह जायेंगे जब उन्हें पता चलेगा कि यहूदियों ने अज्ञातवास में कैसी जिंदगी बिताई।

बम गिरते समय औरतें कैसे डर जाती थी आदि । वो आगे बताती हैं कि सामान खरीदने के लिए घंटो लाइन में लगना पड़ता है। चोरी – चकारी की धटनाएँ काफी बढ़ गई हैं। 

मंगलवार, 11 अप्रैल 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि शनिवार 2 बजे के आसपास गोलाबारी हुई थी। रविवार दोपहर उन्होंने अपने दोस्त पीटर को बुलाया। पीटर के आने के बाद उन्होंने काफी देर बातें की। दोनों ने मिलकर मिस्टर डसेल को परेशान करने की योजना बनायी।

उसी रात, उनके घर में सेंधमारी की घटना भी हुई जिसे वो गुप्त आवास में रहने की मजबूरी के कारण किसी को नही बता सकते थे। मगर इस धटना ने सभी लोगों को अंदर से हिला कर रख दिया।

मंगलवार, 13 जून 1944

इस पत्र में ऐन फ्रैंक बताती हैं कि आज वो 15 वर्ष की हो गई है और उन्हें उपहार स्वरूप पुस्तकें, जैम की शीशी, बिस्कुट, सोने का ब्रेसलेट, मिठाइयां, लिखने की कॉपियां मिली है और पीटर ने उन्हें एक फूलों का गुलदस्ता भेंट किया।

मौसम खराब है और हमले जारी हैं । वो बताती है कि चर्चिल उन फ्रांसीसी गांवों में गए थे जो अभी अभी ब्रिटिश कब्जे से मुक्त हुए है। चर्चिल को डर नहीं लगता है। वो उन्हें जन्मजात बहादुर कहती हैं। ब्रिटिश सैनिक अपने मकसद में लगे हैं और हालैंड वासी सिर्फ अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे।

वो आगे कहती है कि वान दान व मिस्टर डसेल उन्हें धमंडी, अक्खड़ समझते हैं, मूर्ख समझते हैं। वो भी उन्हें मूर्खाधिराज कहती हैं। उन्होंने यहां पर अपने मन की बात लिखी हैं कि उन्हें कोई भी ढंग से नहीं समझता हैं और वो अपनी भावनाओं को गंभीरता से समझने वाले व्यक्ति की तलाश में हैं।

वो पीटर के बारे में बताती है कि पीटर उसे दोस्त की तरह प्यार करता है मगर वह उसकी दीवानी है। उसके लिए तड़पती है। पीटर अच्छा और भला लड़का है परंतु वो उसके धार्मिक तथा खाने संबंधी बातों से नफरत करती है। वह शांतिप्रिय, सहनशील और बेहद आत्मीय व्यक्ति है। वह ऐन की गलत बातों को भी सहन करता है। वह बहुत अधिक घुन्ना है। वो दोनों भविष्य, वर्तमान और अतीत की बातें किया करते थे ।

ऐन फ्रैंक आगे कहती है कि काफी दिनों से वो बाहर नहीं निकली है। इसलिए वो प्रकृति को देखना चाहती है। एक दिन गर्मी की रात उन्हें चांद देखने की इच्छा हुई मगर चांदनी अधिक होने के कारण वो खिड़की नहीं खोल सकी। आखिरकार बरसात के समय खिड़की खोल कर बादलों की लुकाछिपी देखने का अवसर भी उन्हें डेढ़ साल बाद मिला।

वो कहती है कि प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेने के लिए अस्पताल व जेलों में बंद लोग तरसते हैं। आसमान, बादलों, चांद–तारों को देख कर उसे शांति और आशा मिलती है। प्रकृति शांति पाने की रामबाण दवा है। वह हमें विनम्रता प्रदान करती है।

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ऐन फ्रैंक कहती है कि “मौत के खिलाफ मनुष्य” किताब में उन्होंने पढ़ा था कि युद्ध में एक सैनिक को जितनी तकलीफ, पीड़ा और यंत्रणा से गुजरना पड़ता है उससे कहीं अधिक यातना और तकलीफ तो औरत बच्चा पैदा करने वक्त सहन करती है।

बच्चा पैदा करने के बाद औरत का आकर्षण समाप्त हो जाता है मगर फिर भी औरत मानव जाति की निरंतरता को बनाये रखती है । ऐन कहती है कि महिलाओं को भी एक बहादुर सैनिक के जैसे ही दर्जा व सम्मान मिलना चाहिए।

पुरुषों और महिलाओं के अधिकारों के बारे में वो कहती हैं कि उसे लगता है कि पुरुषों की शारीरिक क्षमता अधिक होती हैं जिस वजह से उन्होंने शुरू से ही महिलाओं पर शासन किया है। लेकिन अब समय बदल गया है। शिक्षा और प्रगति ने महिलाओं की आंखें खोल दी हैं। कई देशों ने महिलाओं को बराबरी का हक दिया है। आधुनिक महिलाओं, समाज में अपनी बराबरी चाहती हैं।

इसका ये कतई मतलब नहीं कि औरतों को बच्चे पैदा करना, बंद कर देना चाहिए। यह प्रकृति का कार्य है और उसे यह कार्य करते रहना चाहिए। संसार के जिस हिस्से में हम रहते हैं वहां जन्म अनिवार्य है। यह टाला न जा सकने वाला काम है।

इसीलिए महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही सम्मान मिलना चाहिए। वो उन व्यक्तियों की भर्त्सना करती है जो समाज में महिलाओं के योगदान को मानने के लिए तैयार नहीं है।

अंत में ऐन फ्रैंक विश्वास जताती है कि अगली सदी तक यह मान्यता बदल चुकी होगी कि सिर्फ बच्चे पैदा करना ही औरतों का काम हैं । औरतें ज्यादा सम्मान और सराहना की हकदार बनेगी।

Diary Ke Panne Class 12 Question Answers

डायरी के पन्ने प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: ऐन-फ्रैंक का परिवार सुरक्षित स्थान पर जाने से पहले किस मनोदशा से गुज़र रहा था और क्यों? ऐसी ही परिस्थितियों से आपको दो-चार होना पड़े तो आप क्या करेंगे?

उत्तर: द्रवितीय विश्व-युद्ध के समय हॉलैंड के यहूदी परिवारों को जर्मनी के प्रभाव के कारण बहुत सारी अमानवीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। लोग अपनी जान बचाने के लिए परेशान थे। ऐसे कठिन समय में जब ऐन फ्रैंक के पिता को ए०एस०ए० के मुख्यालय से बुलावा आया तो वहाँ के यातना शिविरों और काल-कोठरियों के दृश्य उन लोगों की आँखों के सामने तैर गए। ऐन फ्रैंक और उसका परिवार घर के किसी सदस्य को नियति के भरोसे छोड़ने के पक्ष में न था। वे सुरक्षित और गुप्त स्थान पर जाकर जर्मनी के शासकों के अत्याचार से बचना चाहते थे। उस समय ऐन के पिता यहूदी अस्पताल में किसी को देखने गए थे। उनके आने की प्रतीक्षा की घड़ियाँ लंबी होती जा रही थीं।

दरवाजे की घंटी बजते ही लगता था कि पता नहीं कौन आया होगा। वे भय एवं आतंक के डर से दरवाजा खोलने से पूर्व तय कर लेना चाहते थे कि कौन आया है? वे घंटी बजते ही दरवाजे से उचककर देखने का प्रयास करते कि पापा आ गए कि नहीं। इस प्रकार ऐन फ्रैंक का परिवार चिंता, भय और आतंक के साये में जी रहा था। यदि ऐसी ही परिस्थितियों से हमें दो-चार होना पड़ता तो मैं अपने परिवार वालों के साथ उस अचानक आई आपदा पर विचार करता और बड़ों की राय मानकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने का प्रयास करता। इस बीच सभी से धैर्य और साहस बनाए रखने का भी अनुरोध करता।

प्रश्न 2: हिटलर ने यहूदियों को जातीय आधार पर निशाना बनाया। उसके इस कृत्य को आप कितना अनुचित मानते हैं? इस तरह का कृत्य मानवता पर क्या असर छोड़ता है? उसे रोकने के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?

उत्तर: हिटलर जर्मनी का क्रूर एवं अत्याचारी शासक था। उसने जर्मनी के यहूदियों को जातीयता के आधार पर निशाना बनाया। किसी जाति-विशेष को जातीय कारणों से ही निशाना बनाना अत्यंत निंदनीय कृत्य है। यह मानवता के प्रति अपराध है। इस घृणित एवं अमानवीय कृत्य को हर दशा में रोका जाना चाहिए, भले ही इसे रोकने के लिए समाज को अपनी कुर्बानी देनी पड़े। हिटलर जैसे अत्याचारी शासक मनुष्यता के लिए घातक हैं। इन लोगों पर यदि समय रहते अंकुश न लगाया गया तो लाखों लोग असमय और अकारण मारे जा सकते हैं। उसका यह कार्य मानवता का विनाश कर सकता है। अत: उसे रोकने के लिए नैतिक-अनैतिक हर प्रकार के हथकंडों का सहारा लिया जाना चाहिए। इस प्रकार के अत्याचार को रोकने के लिए मैं निम्नलिखित सुझाव देना चाहूँगा।

  • पीड़ित लोगों के साथ समस्या पर विचार-विमर्श करना चाहिए।
  • हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हिंसा का जवाब हिंसा से देकर उसे शांत नहीं किया जा सकता, इसलिए इसका शांतिपूर्ण हल खोजने का प्रयास करना चाहिए।
  • अहिंसात्मक तरीके से काम न बनने पर ही हिंसा का मार्ग अपनाने के लिए लोगों से कहूँगा।
  • मैं लोगों से कहूँगा कि मृत्यु के डर से यूँ बैठने से अच्छा है, अत्याचारी लोगों से मुकाबला किया जाए। इसके लिए संगठित होकर मुकाबला करते हुए मुँहतोड़ जवाब देना चाहिए।
  • हिंसा के खिलाफ़ विश्व जनमत तैयार करने का प्रयास करूंगा ताकि विश्व हिटलर जैसे अत्याचारी लोगों के खिलाफ़ हो जाए और उसकी निंदा करते हुए उसके कुशासन का अंत करने में मदद करे।

प्रश्न 3: ऐन फ्रैंक ने यातना भरे अज्ञातवास के दिनों के अनुभव को डायरी में किस प्रकार व्यक्त किया है? आपके विचार से लोग डायरी क्यों लिखते हैं?

उत्तर: द्रवितीय विश्व-युद्ध के समय जर्मनी ने यहूदी परिवारों को अकल्पनीय यातना सहन करनी पड़ी। उन्होंने उन दिनों नारकीय जीवन बिताया। वे अपनी जान बचाने के लिए छिपते फिरते रहे। ऐसे समय में दो यहूदी परिवारों को गुप्त आवास में छिपकर जीवन बिताना पड़ा। इन्हीं में से एक ऐन फ्रैंक का परिवार था। मुसीबत के इस समय में फ्रैंक के ऑफ़िस में काम करने वाले इसाई कर्मचारियों ने भरपूर मदद की थी। ऐन फ्रैंक ने गुप्त आवास में बिताए दो वर्षों के समय के जीवन को अपनी डायरी में लिपिबद्ध किया है। फ्रैंक की इस डायरी में भय, आतंक, भूख, प्यास, मानवीय संवेदनाएँ, घृणा, प्रेम, बढ़ती उम्र की पीड़ा, पकड़े जाने का डर, हवाई हमले का डर, बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहकर जीने की पीड़ा, युद्ध की भयावह पीड़ा और अकेले जीने की व्यथा है।

इसके अलावा इसमें यहूदियों पर ढाए गए जुल्म और अत्याचार का वर्णन किया गया है। मेरे विचार से लोग डायरी इसलिए लिखते हैं क्योंकि जब उनके मन के भाव-विचार इतने प्रबल हो जाते हैं कि उन्हें दबाना कठिन हो जाता है और वे किसी कारण से दूसरे लोगों से मौखिक रूप में उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाते तब वे एकांत में उन्हें लिपिबद्ध करते हैं। वे अपने दुख-सुख, व्यथा, उद्वेग आदि लिखने के लिए प्रेरित होते हैं। उस समय तो वे अपने दुख की अभिव्यक्ति और मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए लिखते हैं पर बाद में ये डायरियाँ महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती हैं।

प्रश्न 4: ‘डायरी के पन्ने’ की युवा लेखिका ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में किस प्रकार दवितीय विश्व-युद्ध में यहूदियों के उत्पीड़न को झेला? उसका जीवन किस प्रकार आपको भी डायरी लिखने की प्रेरणा देता है, लिखिए।

उत्तर: ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में इतिहास के सबसे दर्दनाक और भयप्रद अनुभव का वर्णन किया है। यह अनुभव उसने और उसके परिवार ने तब झेला जब हॉलैंड के यहूदी परिवारों को जर्मनी के प्रभाव के कारण अकल्पनीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। ऐन और उसके परिवार के अलावा एक अन्य यहूदी परिवार ने गुप्त तहखाने में दो वर्ष से अधिक समय का अज्ञातवास बिताते हुए जीवन-रक्षा की। ऐन ने लिखा है कि 8 जुलाई, 1942 को उसकी बहन को ए०एस०एस० से बुलावा आया, जिसके बाद सभी गुप्त रूप से रहने की योजना बनाने लगे।

यह उनके जीवन कर । दिन में घर के परदे हटाकर बाहर नहीं देख सकते थे। रात होने पर ही वे अपने आस-पास के परदे देख सकते थे। वे ऊल-जुलूल हरकतें करके दिन बिताने पर विवश थे। ऐन ने पूरे डेढ़ वर्ष बाद रात में खिड़की खोलकर बादलों से लुका-छिपी करते हुए चाँद को देखा था। 4 अगस्त, 1944 को किसी की सूचना पर ये लोग पकड़े गए। सन 1945 में ऐन की अकाल मृत्यु हो गई। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों के उत्पीड़न को झेला। ऐन फ्रैंक का जीवन हमें साहस बनाए रखते हुए जीने की प्रेरणा देता है और प्रेरित करता है कि अपने जीवन और आस-पास की घटनाओं को हम लिपिबद्ध करें।

प्रश्न 4: डायरी के पन्ने पाठ में मि. डसेल एवं पीटर का नाम कई बार आया है। इन दोनों का विवरणात्मक परिचय दें।

उत्तर:  मि. डसेल-ऐन के पिता के साथ काम करते थे। वे ऐन व परिवार के साथ अज्ञातवास में रहे थे। डसेल उबाऊ लंबे-लंबे भाषण देते थे और अपने जमाने के किस्से सुनाते रहते थे। ऐन को अक्सर डाँटते थे । वे चुगलखोर थे और ऐन की मम्मी से ऐन की सच्ची-झूठी शिकायतें करते थे ।

पीटर- मिस्टर और मिसेज वानदान का बेटा था |वह ऐन का हमउम्र था। ऐन का उसके प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था और वह यह मानने लगी थी कि वह उससे प्रेम करती है। ऐन के जन्मदिन पर पीटर ने उसे फूलों का गुलदस्ता भेंट किया था| किंतु पीटर सबके सामने प्रेम उजागर करने से डरता था| वह साधारणतया शांतिप्रिय, सहज व आत्मीय व्यवहार करने वाला था।

प्रश्न 5: किट्टी कौन थी? ऐन फ्रैंक ने किट्टी को संबोधित कर डायरी क्यों लिखी?

उत्तर: ‘किट्टी’ ऐन फ्रैंक की गुड़िया थी। गुड़िया को मित्र की भाँति संबोधित करने से गोपनीयता भंग होने का डर न था।अन्यथा नाजियों द्वारा अत्याचार बढ़ने का डर व उन्हें अज्ञातवास का पता लग सकता था।| ऐन ने स्वयं (एक तेरह वर्षीय किशोरी) के मन की बेचैनी को भी व्यक्त करने का ज़रिया किट्टी को बनाया |वह हृदय में उठ रही कई भावनाओं को दूसरों के साथ बाँटना चाहती थी किंतु अज्ञातवास में उसके लिए किसी के पास समय नहीं था| मिस्टर डसेल की ड़ाँट-फटकार ओर उबाऊ भाषण, दूसरों के द्वारा उसके बारे में सुनकर मम्मी (मिसेज फ्रैंक) का उसेड़ाँटना ओर उस पर अविश्वास करना, बड़ों का उसे लापरवाह और तुनकमिजाज मानना और उसे छोटी समझकर उसके विचारों को महत्त्व न देना , उसके ह्रदय को कचोटता था |अतः उसने किट्टी को अपना हमराज़ बनाकर डायरी में उसे ही संबोधित किया|

प्रश्न 6: ‘ऐन फ्रैंक की डायरी यहूदियों पर हुए जुल्मों का जीवंत दस्तावेज है’पाठ के आधार पर यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विवरण दें।

उत्तर: हिटलर की नाजी सेना ने यहूदियों को कैद कर यातना शिविरों में डालकर यातनाएँ दी। उन्हें गैस चैंबर में डालकर मौत के घाट उतार दिया जाता था। कई यहूदी भयग्रस्तहोकर अज्ञातवास मेंचले गए जहाँ उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में जीना पड़ा| अज्ञातवास में उन्हें सेन्धमारों से भी निबटना पड़ा।। उनकी यहूदी संस्कृति को भी कुचल डाला गया।

प्रश्न 7: ‘डायरी के पन्ने’ पाठ किस पुस्तक से लिया गया है? वह कब प्रकाशित हुई? किसने प्रकाशित कराई?

उत्तर: यह पाठ ऐनफ्रैंक द्वारा डच भाषा में लिखी गई ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ नामक पुस्तक से लिया गया है। यह 1947 में ऐन फ्रैंक की मृत्यु के बाद उसके पिता मिस्टर ऑटो फ्रैंक ने प्रकाशित कराई।

बच्चों!

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