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Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Class 10 Summary

Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Class 10 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग-2 का पाठ 4 पढ़ेंगे

एही ठैयॉं झुलनी होरानी हो रामा!’

Ehi Thaiya Jhulni Herani He Rama Chapter 4 Hindi Kritika Part 2

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पाठ के लेखक शिवप्रसाद ‘रुद्र’ हैं।

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

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लेखक परिचयः शिवप्रसाद मिश्ररुद्र

जीवन परिचयः लेखक का जन्म सन् 1911 में काशी में हुआ। उनकी शिक्षा काशी के हरिश्चंद्र कॉलेज, क्वींस कॉलेज एवं काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में हुई। रुद्र जी ने कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया। बहुभाषविद रूद्र जी एक साथ ही उपन्यासकार, नाटककार, गीतकार, व्यंग्यकार, पत्रकार और चित्रकार थे।

उनकी प्रमुख रचनायं हैः बहती गंगा, सुचिताच (उपन्यास), ताल तलैया, गजलिका, परीक्षा-पचीसी (गीत एवं व्यंग्य गीत संग्रह) उनकी अनेक संपादित रचनाएँ काशी नगरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हुई है। वे सभा के प्रधानमंत्री पद पर भी रहें। सन् 1970 में उनका देहांत हो गया।

रूद्र जी अपनी जन्म भूमि काशी के प्रति आजीवन निष्ठावान रहे और उनकी यही निष्ठा उनके साहित्य में व्यक्त हुई है, विशेषकर उनकी अंतिम कृति बहती गंगा में। बहती गंगा को कुछ विद्वान उपन्यास मानते है तो कुछ उसे कहानी-संग्रह भी मानते है।

Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Summary               

पाठ का सार: एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! 

‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ पाठ के लेखक शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ हैं। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने गाने-बजाने वाले समाज के देश के प्रति असीम प्रेम, विदेशी शासन के प्रति क्षोभ और पराधीनता की जंजीरों को उतार फेंकने की तीव्र लालसा का वर्णन किया है।

एक गाँव में दुलारी नाम की नाच-गाने का पेशा करने वाली स्त्री रहती थी। दुलारी का शरीर पहलवानों की तरह कसरती था। वह मराठी महिलाओं की तरह धोती लपेटकर कसरत करने के बाद प्याज और हरी मिर्च के साथ चने खाती थी। वह दुक्कड़ नामक बाजे पर गीत गाने के लिए प्रसिद्ध थी। उसके कजली गायन का सब लोग सम्मान करते थे। गाने में ही सवाल-जवाब करने में वह बहुत कुशल थी।

एक बार खोजवाँ दल की तरफ से गीतों में सवाल-जवाब करते हुए दुलारी की मुलाकात टुन्नू नाम के एक ब्राह्मण लड़के से हुई। बजरडीहा वालों की तरफ से मधुर कंठ में टुन्नू ने उसके साथ पहली बार सवाल-जवाब किए। मुकाबले में टुन्नू के मुँह से दुलारी की तारीफ सुनकर सुंदर के मालिक फेंकू सरदार ने टुन्नू पर लाठी से वार किया। दुलारी ने टुन्नू को उस मार से बचाया था। दुलारी ने तब अपने प्रति उसके प्रेम को अनुभव किया था।

दुलारी के घर आकर भी टुन्नू चुप रहता। कभी प्रेम को प्रकट नहीं करता था। होली के एक दिन पहले टुन्नू दुलारी के घर आया। उसने खादी आश्रम की बुनी साड़ी दुलारी को दी। दुलारी ने उसे बहुत डाँटा और साड़ी फेंक दी। टुन्नू अपमानित होकर रोने लगा। उसके आँसू दुलारी के द्वारा फेंकी साड़ी पर टपकने लगे। उसने अपना प्रेम पहली बार प्रकट किया और कहा कि उसका मन रूप और उम्र की सीमा में नहीं बँधा है।

टुन्नू के जाने के बाद दुलारी ने साड़ी पर पड़े आँसुओं के धब्बों को चूम लिया। दुलारी छह महीने पहले टुन्नू से मिली थी। उसने अपनी ढलती उम्र में प्रेम को पहली बार इतने करीब से महसूस किया था। टुन्नू की लाई साड़ी को उसने अपने कपड़ों में सबसे नीचे रख लिया। टुन्नू और अपने प्रेम को आत्मा का प्रेम समझते हुए भी दुलारी चिंतित थी।

उसी समय फेंकू सरदार धोतियों का बंडल लेकर दुलारी की कोठरी में आया। फेंकू सरदार ने उसे तीज पर बनारसी साड़ी दिलवाने का वायदा किया। जब दुलारी और फेंकू सरदार बातचीत कर रहे थे, उसी समय उसकी गली में से विदेशी वस्त्रों की होली जलाने वाली टोली निकली। चार लोगों ने एक चादर पकड़ रखी थी जिसमें लोग धोती, कमीज, कुरता, टोपी आदि डाल रहे थे।

दुलारी ने भी फेंकू सरदार का दिया मँचेस्टर तथा लंका-शायर की मिलों की बनी बारीक सूत की मखमली किनारेवाली धोतियों का बंडल फैली चादर में डाल दिया। अधिकतर लोग जलाने के लिए पुराने कपड़े फेंक रहे थे। दुलारी की खिड़की से नया बंडल फेंकने पर सबकी नजर उस तरफ उठ गई। जुलूस के पीछे चल रही खुफिया पुलिस के रिपोर्टर अली सगीर ने भी दुलारी को देख लिया था। दुलारी ने फेंकू सरदार को उसकी किसी बात पर झाड़ू से पीटकर घर से बाहर निकाल दिया। जैसे ही फेंकू दुलारी के घर से निकला, उसे पुलिस रिपोर्टर मिल गया जिसे देखकर वह झेंप गया। दुलारी के आँगन में रहने वाली सभी स्त्रियाँ इकट्ठी हो जाती हैं। सभी मिलकर दुलारी को शांत करती हैं। सब इस बात से हैरान थीं कि फेंकू सरदार ने दुलारी पर अपना सबकुछ न्योछावर कर रखा था, फिर आज उसने उसे क्यों मारा। दुलारी कहती है कि यदि फेंक ने उसे रानी बनाकर रखा था, तो उसने भी अपनी इज्जत, अपना सम्मान उसके नाम कर दिया था। एक नारी के सम्मान की कीमत कुछ नहीं है।

सभी स्त्रियाँ बैठी बातें कर रही थीं कि झींगुर ने आकर बताया कि टुनू महाराज को गोरे सिपाहियों ने मार दिया और वे लोग लाशें उठाकर भी ले गए। टुन्नू के मारे जाने का समाचार सुनकर दुलारी की आँखों से अविरल आँसुओं की धारा बह निकली। उसकी पड़ोसिनें भी दुलारी का हाल देखकर हैरान थीं। उसने टुन्न की दी साधारण खद्दर की धोती पहन ली। वह झींगुर से टुन्नू के शहीदी स्थल का पता पूछकर वहाँ जाने के लिए घर से बाहर निकली। घर से बाहर निकलते ही थाने के मुंशी और फेंकू सरदार ने उसे थाने चलकर अमन सभा के समारोह में गाने के लिए कहा।

प्रधान संवाददाता ने शर्मा जी की लाई हुई रिपोर्ट को मेज पर पटकते हुए डाँटा और अखबार की रिपोर्टरी छोड़कर चाय की दुकान खोलने के लिए कहा। उनके द्वारा लाई रिपोर्ट को उसने अलिफ लैला की कहानी कहते हैं, जिसे प्रकाशित करना वह उचित नहीं समझते। इस पर संपादक ने शर्मा जी रिपोर्ट पढ़ने के लिए कहा।

शर्मा जी ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक ‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा’ रखा था। उनकी रिपोर्ट के अनुसार कल छह अप्रैल को नेताओं की अपील पर नगर में पूर्ण हड़ताल रही। खोमचेवाले भी हड़ताल पर थे। सुबह से ही विदेशी वस्त्रों का संग्रह करके उनकी होली जलाने वालों के जुलूस निकलते रहे। उनके साथ प्रसिद्ध कजली गायक टुन्नू भी था। जुलूस टाउन हाॅल पहुँचकर समाप्त हो गया। सब जाने लगे तो पुलिस के जमादार अली सगीर ने टुन्नू को गालियाँ दी। टुन्नू के प्रतिवाद करने पर उसे जमादार ने बूट से ठोकर मारी। इससे उसकी पसली में चोट लगी। वह गिर पड़ा और उसके मुँह से खून निकल पड़ा। गोरे सैनिकों ने उसे उठाकर गाड़ी में डालकर अस्पताल ले जाने के स्थान पर वरुणा में प्रवाहित कर दिया, जिसे संवाददाता ने भी देखा था। इस टुन्न का दुलारी नाम की गौनहारिन से संबंध था।

कल शाम अमन सभा द्वारा टाउन हॉल में आयोजित समारोह में, जहाँ जनता का एक भी प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था, दुलारी को नचाया-गवाया गया था। टुन्नू की मृत्यु से दुलारी बहुत उदास थी। उसने खद्दर की साधारण धोती पहन रखी थी। वह उस स्थान पर गाना नहीं चाहती थी, जहाँ आठ घंटे पहले उसके प्रेमी की हत्या कर दी गई थी। फिर भी कुख्यात जमादार अली सगीर के कहने पर उसने दर्दभरे स्वर में श्एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा, कासों मैं पूछूश् गाया और जिस स्थान पर टुन्नू गिरा था, उधर ही नजर जमाए हुए गाती रही। गाते-गाते उसकी आँखों से आँसू बह निकले मानो टुन्नू की लाश को वरुणा में फेंकने से पानी की जो बूंदें छिटकी थीं, वे अब दुलारी की आँखों से बह निकली हैं।श् संपादक महोदय को रिपोर्ट तो सत्य लगी, परंतु वे इसे छापने में असमर्थ थे।

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Ehi Thaiya Jhulni Herani Ho Rama Question Answers

पाठ्यपुस्तक से प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. हमारी आजादी की लड़ाई में समाज के उपेक्षित माने जाने वाले वर्ग का योगदान भी कम नहीं रहा है। इस कहानीमें ऐसे लोगों के योगदान को लेखक ने किस प्रकार उभारा है?

उत्तरः हमारे देश की आजादी की लड़ाई में सभी वर्गों व सभी धर्मों का योगदान रहा है, साथ ही समाज में उपेक्षित समझे जाने वाले वर्ग का भी योगदान कम नहीं रहा। इस पाठ के पात्र टुन्नू और दुलारी दोनों ही कजली गायक हैं जो समाज में कजली के दंगल में गाना गाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। दोनों ने आजादी के समय आन्दोलन में अपनी सामर्थ्य के अनुसार भरपूर योगदान दिया है।

टुन्नूः इस पाठ में टुन्नू सोलह-सत्रह वर्ष का संगीत प्रेमी बालक है और वह दुलारी से अपमानित होकर उन दीवानों की टोली में शामिल हो जाता है जो विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के लिए वस्त्रों को एकत्रित कर रहे थे। खुफिया-पुलिस का रिपोर्टर अली सगीर ने टुन्नू को बूट से इस तरह ठोकर मारी कि वह अपनी जान से हाथ धो बैठा। इस तरह उसने अपना बलिदान दे दिया।

दुलारीः दुलारी भी टुन्नू की तरह कजली गायिका थी। विदेशी वस्त्रों का संग्रह करने वाली टोली को कोरी धोतियों का बंडल दे देती है। वह टुन्नू द्वारा दी गई गांधी आश्रम की धोती को गर्व से पहनती है।

लेखक ने इस तरह समाज से उपेक्षित दोनों के योगदान को स्वतन्त्रता के आन्दोलन में महत्वपूर्ण माना है।

प्रश्न 2. कठोर हृदयी समझी जाने वाली दुलारी टुन्नू की मृत्यु पर क्यों विचलित हो उठी?

उत्तरः दुलारी अपने कर्कश स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थी। बात-बात पर तीर कमान की तरह ऐंठने वाली दुलारी के मन में अब टुन्नु के लिए कोमल भाव, करुणा और आत्मीयता उत्पन्न हो चुकी थी जो अव्यक्त थी और वह अनुभव कर रही कि टुन्नू के प्रति जो उसने उपेक्षा दिखाई थी वह कृत्रिम थी और उसके मन के कोने में टुन्नू का आसन स्थापित हो गया था और वह अनुभव कर रही थी कि उसके शरीर के प्रति टुन्नू के मन में कोई लोभ नहीं है। उसका सम्बन्ध शरीर से न होकर आत्मा से था। इसी कारण नए-नए वस्त्रों के प्रति मोह रखने वाली दुलारी विदेशी वस्त्रों का संग्रह करने वाली टोली में टुन्नू को देखकर नए वस्त्रों के बंडल को दे देती है। उसके अन्दर पनप रहा आत्मीय भाव टुन्नू की मृत्यु पर छटपटा उठा और उसकी दी गई खादी की धोती को पहन कर टुन्नू के प्रति आत्मीय सम्बन्ध को प्रकट कर विचलित हो उठी।

प्रश्न 3. कजली दंगल जैसी गतिविधियों का आयोजन क्यों हुआ करता होगा? कुछ और परम्परागत लोक आयोजनों का उल्लेखकीजिए?

उत्तर: कजली दंगल भी दूसरे मनोरंजन आयोजनों की तरह होता है। इसमें दो दल इकट्ठे होकर गाने की प्रतियोगिता करते हैं और दोनों दल अपने अलग-अलग भावों में व्यंग्य शैली अपनाते हुए सवाल करते हैं, इसके जवाब में दूसरा दल भी व्यंग्य-शैली में उत्तर देता है और प्रश्न कर देता है। वाह-वाह करने के लिए दोनों दलों के साथ संगीतकार होते हैं। कभी-कभी इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से विशेष कार्यों के प्रति लोगों में उत्साह भरा जाता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले लोगों में देश-प्रेम की भावना को उत्पन्न करना, लोगों को उत्साहित करना, प्रचार करना इन दंगलों के मुख्य कार्य थे।

कजली दंगल की तरह समाज में कई अन्य प्रकार के दंगल किए जाते हैं। जैसे-

  1. रसिया-दंगल ब्रज-क्षेत्र में अधिक प्रचलित है।
  2. रागिनी-दंगल पश्चिमी उत्तर-प्रदेश और हरियाणा में अधिक प्रचलित है।
  3. संकीर्तन-दंगल जहाँ-तहाँ सम्पूर्ण भारत में इसकी परम्परा है।
  4. पहलवानों का कुश्ती-दंगल दंगल भी सम्पूर्ण भारत में होता है।

बच्चों!

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