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Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Summary

Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Poem Summary, Explanation and Question Answers

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हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक
क्षितिज भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे
‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’
Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17
पाठ के लेखक राजेश जोशी हैं।
…………………………
बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि – राजेश जोशी

कवि और लेखक राजेश जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में 1946 में हुआ। जोशी साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार हैं।

उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता शुरू की और कुछ सालों तक अध्यापन किया। राजेश जोशी ने कविताओं के अलावा कहानियां, नाटक, लेख और टिप्पणियां भी लिखीं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं में भी कार्य किया।  जैसे – अंग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए।

उपलब्धियाँ

 उन्हें मुक्तिबोध पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार तथा साथ ही “साहित्य अकादमी पुरस्कार” के प्रतिष्ठित सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

रचनाएं

राकेश जोशी जी की रचनाएं कुछ इस प्रकार से हैं

कविता संग्रह

  • एक दिन बोलेंगे पेड़
  • मिट्टी का चेहरा
  • नेपथ्य में हँसी
  • दो पंक्तियों के बीच
  • कविता – बच्चे काम पर जा रहे है

कविता का सार

राजेश जोशी जी ने हमेशा मानवीय दुखों, खासकर के बच्चो और महिलाओं के दुखो को अपने कविता में स्थान दिया है। प्रस्तुत कविता में भी कवि इस बात से दुखी है की बहुत सारे बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हे अपना पेट भरने के लिए बचपन से ही काम पर लग जाना पड़ता है। न तो उन्हें पढ़ने का मौका मिलता है और न खेलना का मौका मिलता है और इस तरह उनसे उनका बचपन छीन लिया जाता है। और इसीलिए कविता में कवि यह प्रश्न पूछ रहा है की आखिर बच्चें काम पर क्यों जा रहे हैं ? उनके अनुसार यह बहुत ही भयावह है की छोटे-छोटे बच्चे सुबह-सुबह स्कूल जाने के बजाय काम पर जा रहे हैं।

उन्हें ऐसा लग रहा है की सारे खिलौने सारी किताबे, खेलने की जगह सब ख़तम हो गई है और इसलिए बच्चे काम पर पर जा रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि सब कुछ मौजूद है और कवि इसीलिए परेशान है। अपने इस कविता में कवि बाल मजूदरी पर अपना क्रोध वयक्त किया है। उनके अनुसार यह बहुत ही गलत बात है और सरकार तथा समाज  को इस बात जरुरु ध्यान देना चाहिए।

कविता का  भावार्थ 

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं

सुबह सुबह

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि राजेश जोशी जी ने हमारे समाज में चल रहे बाल-मजदूरी की समस्या को दिखाया है और हमारा ध्यान इस समस्या की और आकर्षित करने की कोशिश की है। कवि ने कविता की प्रथम पंक्तियों में ही लिखा है की बहुत ही ठण्ड का मौसम है और सुबह सुबह का वक्त है चारो तरफ कोहरा छाया हुआ है। सड़के भी कोहरे से ढँकी हुई है। परन्तु इतने ठण्ड में भी छोटे छोटे बच्चे कोहरे से ढकी सड़क पर चलते हुए अपने अपने काम पर जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करना है। कोई कारखाने में मजदूरी करता है तो कोई चाय के दुकान में काम करने के लिए मजबूर है। जबकि इन बच्चों की उम्र तो अभी खेलने कूदने की है।

बच्चे काम पर जा रहे हैं

हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना

लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने इस समाज में वयाप्त बाल-मजदूरी जैसी समस्या पर चिंतन करते हुए कहा है की हमारे समय की सबसे भयानक बात यह है की छोटे छोटे बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है। और उससे भी भयानक कवि को यह बात लग रही है हम यह बात कितनी ही सरलता से कह दे रहे हैं। जबकि हमें इसकी और ध्यान देना चाहिए और इसका कारण पता करना चाहिए की पढ़ने और खेलने के उम्र वाले बच्चे को अपना पेट पालने के लिए यूँ काम पर क्यों जाना पड़ रहा है। इसे हमें समाज में एक प्रश्न की तरह पूछना चाहिए की इन छोटे बच्चों को काम पर क्यों जाना पड़ रहा है जबकि इनकी उम्र अभी खेलने कूदने और पढ़ने लिखने की है।

क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें

क्या दीमकों ने खा लिया है

सारी रंग बिरंगी किताबों को

क्या काले पहाड़ के निचे दब गए हैं सारे खिलौने

क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं

सारे मदरसों की इमारतें

भावार्थ :- कवि बाल मजदूरों को सुबह भीषण ठण्ड एवं कोहरे के बिच अपने अपने काम में जाते देखता है जिसे देखकर कवि हताशा एवं निराशा से भर जाता है और और इसी कारण वश कवि के मन में कई तरह के सवाल उठने लगते हैं कवि को यह समझ नहीं आ रहा की क्यों ये बच्चे अपना मन मारकर इतनी सुबह सुबह ठण्ड काम के जाने के लिए विवश है। कवि सोचता है की क्या खेलने के लिए गेंदे सारी खत्म हो चुकी है या आकाश में चली गई है। क्या बच्चो पढ़ने के लिए एक भी किताब नहीं बची है ? क्या सारी किताबो को दीमक ने खा लिया है ? क्या बाकी सारी खिलोने कहीं किसी काले पहाड़ के निचे छुपा दिए गए हैं ? जो अब इन बच्चों के लिए कुछ नहीं बचा। क्या इन बच्चों को पड़ाने वाली मदरसों एवं विधालय टूट चुकीं है जो ये बचे पढ़ाई एवं खेल कूद को छोड़कर काम पर जा रहे हैं।

क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन

ख़त्म हो गए हैं एकाएक

भावार्थ :- क्या बच्चों के खेलने की सारी जगह ख़त्म हो चुकी है क्या सारे मैदान जहाँ बच्चे खेलते थे, सारे बागीचे जहाँ बच्चे टहला करते थे एवं सारे घरो के आँगन ख़तम हो चुके हैं अचानक ही जो इन बच्चों के पास अब कुछ नहीं बसा इसीलिए ये सुबह सुबह काम पर जा रहे हैं।

तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता

भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह

कि हैं सारी चींजे हस्बमामूल

भावार्थ :- कवि के अनुसार छोटे छोटे बच्चे काम पर इसलिए जा रहे हैं क्युकिं दुनिया की सारी खेलने की चीजे जैसे गेंद, खिलौने, बागीचे, मैदान, घर का आँगन इत्यादि खत्म हो चुके हैं। उनके पड़ने के लिए सारी किताबे, विधालय एवं मदरसाये ख़त्म हो चुकी हैं कवि आगे कह रहा है की अगर सच में ऐसा है तो यह कितनी भयानक बात है, और दुनिया के होने का अर्थ ही नहीं। परन्तु कवि को इससे भी ज्यादा भयानक तब लगता है जब उसे जान पड़ता है की बच्चों के खेलने कूदने की सारी चीजें उपलब्ध हैं और उसके बाद भी बच्चे काम पर जाने के लिए विवश है और इसी कारण कवि हताश एवं निराश भी है।

अर्थ यह है की कवि अपने इन पंक्तियों के द्वारा समाज में चल रहे बाल-श्रम की और हमारा धयान खींचने में पूरी तरह से सफल हुए हैं। कवि के अनुसार बच्चपन खेल-कूद, पढ़ाई-लिखाई एवं बच्चों के विकाश का समय होता है। इस वक्त उन पर कोई बोझ या जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए

बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे

काम पर जा रहे हैं।

भावार्थ :- कवि की सोच यह थी की दुनिया में स्थित सारे खेलने-कूदने की जगह एवं चीजे ख़त्म हो गई हैं और इसीलिए बच्चे काम पर जा रहे हैं। लेकिन जब वो देखते हैं की ये सारे चीजें एवं जगहे दुनिया में भरी पड़ी है। तब उनमे चिंता घर कर जाती है क्युकिं उन्हें यह समझ नहीं आता की इन सारी चीजों के मौजूद होने के बाद भी आखिर क्यों छोटे छोटे बच्चे दुनिया की हज़ार हज़ार सड़कों से चल कर अपने अपने काम पर जाने के लिए विवश है। इसीलिए उन्होंने हमारे सामने यह प्रश्न उठाया है की “काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?”


Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17 Question Answers

बच्चे काम पर जा रहे हैं प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभारता है उसे लिखकर व्यक्त कीजिए।
उत्तर- कविता की पहली दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

कोहरे से ढंकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं।
सुबह सुबह

इन्हें पढ़कर मेरे मन-मस्तिष्क में चिंता और करुणा का भाव उमड़ता है। करुणा का भाव इस कारण उमड़ता है कि इन बच्चों की खेलने-कूदने की आयु है किंतु इन्हें भयंकर कोहरे में भी आराम नहीं है। पेट भरने की मजबूरी के कारण ही ये । ठंड में सुबह उठे होंगे और न चाहते हुए भी काम पर चल दिए होंगे। चिंता इसलिए उभरी कि इन बच्चों की यह दुर्दशा कब समाप्त होगी? कब समाज बाल-मजदूरी से मुक्ति पाएगा? परंतु कोई समाधान न होने के कारण चिंता की रेखा गहरी हो गई।

प्रश्न 2. कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
उत्तर- कवि की दृष्टि में बच्चों के काम पर जाने की स्थिति को विवरण या वर्णन की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा वर्णन किसी के मन में भावनात्मक लगाव और संवेदनशीलता नहीं पैदा कर सकता है, कुछ सोचने के लिए विवश नहीं कर सकता है। इसे प्रश्न के रूप में पूछे जाने पर एक जवाब मिलने की आशा उत्पन्न होती है। इसके लिए समस्या से जुड़ाव, जिज्ञासा एवं व्यथा उत्पन्न होती है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 3. सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं?
उत्तर- समाज की व्यवस्था और गरीबी के कारण बच्चे सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से वंचित हैं। भारत में करोड़ों लोग पेट भर रोटी नहीं जुटा पाते। इसलिए उनके बच्चों को भी बचपन से कामकाज करना पड़ता है। यह उनकी जन्मजात विवशता होती है। एक भिखारी, मजदूर या गरीब व्यक्ति का बच्चा गेंद, खिलौने, रंगीन किताबें कहाँ से लाए?

समाज की व्यवस्था भी बाल-श्रमिकों को रोकने में सक्षम नहीं है। यद्यपि सरकार ने इस विषय में कानून बना दिए हैं। किंतु वह बच्चों को निश्चित रूप से ये सुविधाएँ दिला पाने में समर्थ नहीं है। न ही सरकार या समाज के पास इतने साधन हैं, न गरीबी मिटाने के उपाय हैं और न इच्छा-शक्ति। इसलिए बच्चे वंचित हैं।

प्रश्न 4. दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर- जीवन में बच्चों को काम पर जाते हुए देखकर भी लोग उदासीन बने रहते हैं। इस उदासीनता के अनेक कारण हैं; जैसे-

  • लोग इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि वे सोचते हैं कि छोड़ो, यह कौन-सा हमारा बच्चा है।
  • लोगों की स्वार्थ भावना इस उदासीनता को बढ़ाती है। वे अधिक लाभ कमाने और कम मजदूरी देने के लालच में बच्चों से काम करवाते हैं।
  • बाल श्रम कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य का उचित निर्वाह न करना समाज की उदासीनता बढ़ाता है।

प्रश्न 5. आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है?
उत्तर- मैंने अपने शहर में बच्चों को अनेक स्थलों पर काम करते देखा है। चाय की दुकान पर, होटलों पर, विभिन्न दुकानों पर, घरों में, निजी कार्यालयों में। मैंने उन्हें सुबह से देर रात तक, हर मौसम में काम करते देखा है।

प्रश्न 6. बच्चों को काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
उत्तर- बच्चों का काम पर जाना एक बड़े हादसे के समान इसलिए है क्योंकि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने की उम्र में काम करने से बालश्रमिकों का भविष्य नष्ट हो जाता है। इससे एक ओर जहाँ शारीरिक विकास अवरुद्ध होता है, वहीं उनका मानसिक विकास भी यथोचित ढंग से नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे जीवनभर के लिए अकुशल श्रमिक बनकर रह जाते हैं। इससे उनके द्वारा समाज और देश के विकास में उनके द्वारा जो योगदान दिया जाना था वह नहीं मिलता है जिससे प्रगति की दर मंद पड़ती जाती है।


तो बच्चों!

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धन्यवाद!

Prem Chand Ke Phate Joote

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‘प्रेमचंद के फटे जूते’

Premchand Ke Phate Joote

Class 9th Chapter 6 Hindi Kshitij Part 1

पाठ के लेखक हरिशंकर परसाई हैं।

पाठ का सार समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

हरिशंकर परसाई जीवन परिचय

जीवन परिचय- हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त सन् 1922 ईo में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गांव में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही प्राप्त की। बाद में इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में परास्नातक (एम.ए.) की उपाधि प्राप्त की। कुछ वर्षों तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया, परंतु बार-बार के तबादलों से परेशान होकर 1957 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्र लेखन को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। जबलपुर से इन्होंने “वसुधा” नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली जो काफी वर्षों तक घाटे में चलती रही। आखिरकार उन्हें इस पत्रिका को बंद कर देना पड़ा। 1995 ईo में इस महान व्यंग्यकार का निधन हो गया।

रचनाएं:- हरिशंकर परसाई जी मुख्य रूप से गद्य लेखक है। इन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी व्यंग्य साहित्य को समृद्ध किया है। इनकी प्रमुख रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं:-

कहानी संग्रह:- ‘हंसते हैं रोते हैं’,  ‘जैसे उनके दिन फिरे’।

उपन्यास:- ‘रानी नागफनी की कहानी’,  ‘तट की खोज’।

निबंध-संग्रह:- ‘तब की बात और थी’, ,भूत के पांव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडंडियों का जमाना’,  ‘सदाचार की ताबीज’,  ‘शिकायत मुझे भी है’,  ‘और अंत में’।

व्यंग्य-निबंध संग्रह:- ‘वैष्णव की फिसलन’,  ‘तिरछी रेखाएं’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’।

इनकी सभी रचनाएं हरिशंकर परसाई रचनावली के नाम से छह भागों में प्रकाशित हैं।

पुरस्कार और सम्मान:- समय-समय पर श्री हरिशंकर प्रसाद जी को साहित्य लेखन के लिए विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मान से नवाजा गया। इन्हें मिले कुछ प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान निम्नलिखित हैं:-

1. साहित्य अकादमी पुरस्कार – “विकलांग श्रद्धा का दौर के लिए”|

2. मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग का पुरस्कार।

पाठ का सार

“प्रेमचंद के फटे जूते” पाठ के लेखक हरिशंकर परसाई जी हैं। इस पाठ में “जनता के लेखक”कहे जाने वाले प्रेमचंद जी के सरल व सादगी पूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाया गया है। साथ में ही लेखक ने आज के लोगों की अवसरवादी प्रवृत्ति व दिखावे की संस्कृति पर एक करारा प्रहार भी किया है।

परसाई जी कहानी की शुरुआत प्रेमचंद्र की उनकी धर्मपत्नी के साथ एक फोटो को देखकर करते हैं। जिसमें प्रेमचंद जी ने अपने पैरों में फ़टे जूते पहने हैं। और बांये पैर के जूते में एक बड़ा सा छेद हो गया है जिससे उनकी पैर की अंगुली बाहर निकल रही है। और इसमें ही लेखक की दृष्टि अटक गई हैं। लेखक सोच रहे कि फोटो खिंचवाने की यह पोशाक है तो, रोजमर्रा जीवन में पहनने की क्या पोशाक होगी।

क्योंकि आजकल आपने देखा होगा कि फोटो खींचवाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते हैं। नये-नये व फैशनेबल कपड़ों व जूतों आदि के साथ फोटो खींचवाई जाती हैं।

लेखक आगे कहते हैं कि थोड़ा तैयार हो जाते, थोड़ा कपड़े तो बदल लेते। शायद पत्नी के कहने पर फोटो खिंचवा रहे हो। इसीलिए क्या पहना है क्या नहीं। इसका भी ध्यान नहीं रखा हैं। फोटो खिचवाने वक्त परंपरा के अनुसार लोगों की तरह तुमने भी मुस्कुराने की कोशिश की होगी। मगर चेहरे पर मुस्कान आने में कुछ समय लग गया होगा। और आधी-अधूरी मुस्कान में ही फोटोग्राफर ने फोटो खींच दी होगी।

इसीलिए यह मुस्कान से ज्यादा व्यंग्य दिखाई दे रहा है। और यह उन लोगों पर व्यंग है जो दिखावे के लिए बहुत कुछ करते हैं। मगर इन फटे जूतों में फोटो खिंचवाने पर भी तुम्हारे चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा है।

लेखक के अनुसार प्रेमचंद बहुत सीधे-साधे, सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वो दिखावे से काफी दूर रहते थे। इसीलिए वो जैसे थे, वैसे ही फोटो खींचवाने बैठ गए। लेखक आगे कहते हैं कि “मेरे पूर्वज तुम्हें जरा भी इसका एहसास नहीं है कि तुम फ़टे जूते पहन कर फोटो खिंचवा रहे हो। और ऐसा जूता पहनने में तुम्हें कोई संकोच भी नहीं हो रहा है।

इस तरह फोटो खिंचवाने से तो अच्छा होता कि तुम फोटो खिंचवाते ही नहीं। क्या तुम्हें फोटो का महत्व पता नहीं है? फोटो एक ऐसा छायाचित्र होता हैं जो यादगार के रूप में हमेशा साथ रहता हैं। यहां पर लेखक ने प्रेमचंद को “मेरे पूर्वज” शब्द से संबोधित किया है। क्योंकि प्रेमचंद्र लेखक से पहले के महान साहित्यकार व कथाकार है। उन्हें “कथा-सम्राट” भी कहा जाता हैं। इसीलिए लेखक ने उन्हें अपना पूर्वज बताया है।

लेखक कहते हैं कि लोग तो फोटो खींचवाने के लिए परफ्यूम तक लगा लेते हैं जबकि फोटो में परफ्यूम की खुशबू तो महसूस नहीं हो सकती। यानी आदमी फोटो खींचने के लिए अपनी असलियत तक छुपा देता है।अपनी सभी कमजोरियों को छुपा देता है। और समाज के आगे अपने आप को बेहतरीन प्रस्तुत करता है। यह एक कटाक्ष है।

लोग फोटो खिंचवाने के लिए क्या-क्या नहीं करते। कुछ तो फोटो खींचवाने के लिए दूसरों से सिर्फ जूते, कपड़े ही नहीं, बल्कि उनकी बीवी तक उधार मांग लेते हैं। और तुमने तो एक टोपी तक नहीं पहनी है जो सिर्फ आठ आने में मिल जाती है। टोपी यहां पर इज्जत का प्रतीक हैं और जूते दिखावे के।

लेखक कहते हैं कि तुम एक महान कथाकार, उपन्यासकार, युग प्रवर्तक कहलाते हो। मगर तम्हारे पास पहनने को जूते नहीं है। लेखक आगे कहते हैं कि मेरा जूता भी बहुत अच्छा नहीं है यानि मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। वो कहते हैं कि उनका जूता ऊपर से ठीक है और उससे उनकी पैर की अंगुली बाहर नहीं दिखती है।

लेकिन नीचे से पूरा तला फट गया है। और उनका अंगूठा रगड़ खाकर छील चुका हैं। यानि मेरी आर्थिक स्थिति बाहर से तो अच्छी दिखती है लेकिन अंदर से अच्छी नहीं है।

लेकिन मैं तुम्हारे जैसे फटे जूतों के साथ फोटो नहीं खिंचवाऊंगा। क्योंकि लोगों को मेरी फटे हाल आर्थिक स्थिति का पता चल जाएगा। लेखक प्रेमचंद से कहते हैं कि भले ही तुम्हारा जूता फट गया हो लेकिन इसके बावजूद तुम्हारा वजूद और व्यक्तित्व बिल्कुल सुरक्षित है। तुम पर्दे का महत्व नहीं समझते हो और हम पर्दे पर कुर्बान होते जाते हैं। इसीलिए तुम मुस्कुरा रहे हो।

लेखक प्रेमचंद से पूछते हैं कि मेरी जनता का लेखक यह मुस्कान तुमने माधो, होरी, हल्कू या किससे उधार माँगी हैं। ये सब प्रेमचंद की कहानी के चरित्र हैं। प्रेमचंद जी को आम आदमी का कहानीकार माना जाता है। इसीलिए उनको “मेरी जनता का लेखक”  कहा गया है। उन्होंने गरीब, लाचार और शोषित वर्ग के दर्द को अपनी कहानियों में लिखा है।

लेखक आगे प्रेमचंद से कहते हैं कि तुम यहां-वहां बहुत चक्कर काटते हो। और कभी-कभी बनिया की उधारी से बचने के लिए इधर-उधर भागते फिरते हो। इसीलिए तुम्हारा जूता फट गया होगा। लेकिन चलने से तो जूते का तलवा घिसता है। जूते का ऊपरी भाग फटकर वहां से अंगुली बाहर नहीं आती है। यानि तुमने जूते से किसी सख्त चीज में ठोकर मारी होगी। तभी तो तुम्हारा जूता ऊपर से फट गया हैं।

प्रेमचंद जी ने अपनी लेखनी से रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, कुरीतियां पर करारी चोट की हैं। यहां पर “सख्त चीज”  का अर्थ यही है।

लेखक आगे प्रेमचंद जी से कहते हैं कि तुम इन सब से बच कर निकल भी तो सकते थे लेकिन तुम नहीं निकले। इसलिए तुम्हारा जूता फट गया है। समझौता कर लेते, आसान रास्ता अपना लेते। ठोकर मारने की क्या जरूरत थी। तुम उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। जैसे सभी नदियां पहाड़ तोड़ कर ही तो नहीं बहती हैं। कुछ रास्ता बदलकर भी तो बहती है।

लेकिन तुम समझौता नहीं करते हो, तुम संघर्ष करते हो, स्वाभिमानी हो। लेखक कहते हैं कि जिसे तुम धृणित समझते हो, उसकी तरफ तुम हाथ की अंगुली से नहीं, बल्कि पैर की उंगली से इशारा करते हो। यानि तुम अपनी अंगुली का महत्व कम नहीं करना चाहते हो। लेकिन मैं तुम्हारी इस अंगुली का इशारा और व्यंग्य भरी मुस्कान को भी खूब समझता हूँ।

PREMCHAND KE PHATE JOOTE IMPORTANT QUESTION ANSWERS

प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1 . हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद्र का जो शब्द चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएं उभर कर आती हैं?

उत्तर प्रस्तुत पाठ के अनुसार प्रेमचंद्र के व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएं उभर कर आती हैं।

  1. प्रेमचंद स्वभाव से बहुत ही सीधे-साधे व सरल थे तथा सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे।
  2. प्रेमचंद्र एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे जो अपने वसूलों से कभी भी समझौता नहीं करते थे।
  3. प्रेमचंद्र ने अपनी लेखनी से सामाजिक बुराईयों, कुरीतियों व अंधविश्वासों पर कड़ा प्रहार किया है।
  4. उन्होंने दलित, लाचार और कमजोर वर्ग के दर्द व उनकी लाचारी, बेबसी को अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया है।
  5. उन्होंने हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया है।

प्रश्न 2 . सही कथन चुनिए।

(क) बाएं पांव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा सा छेद हो गया है जिसमें से उंगली बाहर निकल आई है।

(ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचवाते हैं ताकि फोटो में खुशबू आ जाए।

(ग) तुम्हारी यह व्यंग मुस्कान मेरे हौसले बढ़ाती है।

(घ) जिसे तुम धृणित समझते हो, उसकी तरफ अंगूठे से इशारा करते हो।

उत्तर  – (ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचवाते हैं ताकि फोटो में खुशबू आ जाए।

प्रश्न 3 . नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग को स्पष्ट कीजिए।

()- जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचास टोपियों न्यौछावर हो जाती हैं।

उत्तर यहां पर जूते को दिखावे व झूठी शान और टोपी को इज्जत, मान, मर्यादा का प्रतीक बताया गया है। लेखक कहते हैं कि आधुनिक समाज में धन, दौलत और शानो शौकत का प्रदर्शन ही सबसे महत्वपूर्ण होता जा रहा हैं। और इसी को ही अब इज्जत समझा जाता है।

दिन प्रतिदिन ईमानदारी, सच्चाई और अच्छाई का मोल कम होता जा रहा है।आजकल साधारण और इमानदारी से जीवन जीने वालों की कोई इज्जत नहीं है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि पचास टोपियों पर एक जूता भारी पड़ जाता है।

() – तुम पर्दे का महत्व नहीं जानते हो और हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं।

उत्तर यहां पर पर्दे का संबंध इज्जत से है। लेखक कहते हैं कि कुछ लोग अपनी इज्जत के लिए अपना सब कुछ न्यौछवर करने को तैयार हो जाते हैं। यानी झूठी शान शौकत को बनाए रखने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इज्जत यानि दिखावे को कोई महत्व नहीं देते हैं।

()- जिसे तुम घृणित समझते हो उसकी तरफ हाथ की नहीं, पांव की अंगुली से इशारा करते हो।

उत्तर लेखक प्रेमचंद से कहते हैं कि तुम कुछ चीजों जैसे सामाजिक बुराइयों, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास को घृणित समझते हो। और उनकी तरफ हाथ से इशारा कर तुम अपनी अंगुली का महत्व कम नहीं करना चाहते हो। इसीलिए पैर की अंगुली से इशारा कर उनको महत्वहीन बना देते हो।

प्रश्न 4 . पाठ में एक जगह लेखक सोचता है कि “फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी”। लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि “नहीं इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें  नहीं होंगी”। आपके अनुसार इस संदर्भ में प्रेमचंद जी के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वजह हो सकती है।

उत्तर दरअसल हर व्यक्ति अपने रोजमर्रा के जीवन में साधारण कपड़ों का प्रयोग करता है और किसी स्थान विशेष या अवसर विशेष में जाने के लिए अच्छे व महंगे कपड़ों का प्रयोग करता है। लेखक सोचते हैं कि फोटो खिंचवाना भी खास मौका ही होता हैं और इस खास मौके में भी इस तरह के कपड़े पहनकर जब प्रेमचंद्र जी ने फोटो खिंचवाई हैं। तो इस व्यक्ति के पास यही एकमात्र अच्छे कपड़े होंगे।यानि इनके पास इससे बेहतर कपड़े नहीं होंगे।

दूसरे अर्थ में लेखक यह कहना चाहते हैं कि प्रेमचंद्र दिखावे की दुनिया से बिल्कुल दूर रहते थे। मौका चाहे कैसा भी हो, साधारण या खास, वो हर वक्त एक समान रहते थे।

प्रश्न 5. आपने यह व्यंग्य पढ़ा है। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन सी बात आकर्षित करती हैं।

उत्तर लेखक का यह व्यंग्य कई सारी चीजों पर एक साथ कटाक्ष करता हुआ नजर आता है। लेखक, लेखन की दुनिया में एक मजे हुए खिलाड़ी की तरह नजर आते हैं जो अपने लेख में उदाहरणों का प्रयोग कर इसे और धार देते हैं।

कड़वी से कड़वी बात को भी बहुत आसानी से, बड़े ही सरल शब्दों में लेखक ने इस पाठ के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है। इस पाठ में आधुनिक समाज और दिखावे की संस्कृति पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रहार किया गया है।

प्रश्न 6 . पाठ में “टीले” शब्द का प्रयोग किस संदर्भ को इंगित करने के लिए किया गया है।

उत्तर टीला शब्द आम भाषा में किसी रास्ते के बीचो-बीच एक छोटा सा पहाड़ नुमा ऊँचा स्थान होता है। जो उस रास्ते से लोगों के आने जाने में रुकावट पैदा करता है।

लेकिन इस पाठ में टीला शब्द सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता व सामाजिक भेदभाव की ओर इशारा करता है जो इंसान की सामाजिक एकता व विकास में रुकावट पैदा करता है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8. आपकी दृष्टि में वेशभूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवर्तन है?

उत्तर  आज लोग अपने बाहरी रंग-रूप, कपड़ों, जूतों, गहनों के प्रति बहुत अधिक जागरूक हो गए हैं। हर रोज नये फैशन के कपड़े पहनना, महंगे जूते, धड़ी और अन्य चीजों का उपयोग करना, अब लोगों ने अपनी इज्जत व समृद्धि का प्रतीक बना लिया है। सच्चाई व ईमानदारी के साथ सीधे-साधे या सरल तरीके से जीवन जीने वालों को समाज में लोग पिछड़ा या गँवार समझते हैं।


भाषा अध्ययन

प्रश्न पाठ में आये मुहावरों को छाटिँए और उनका वाक्य प्रयोग कीजिए?

उत्तर अंगुली का इशारा – (किसी चीज के बारे में बताने की कोशिश करना) – अंगुली के इशारे से ही बता देते कि तुम कहना क्या चाहते हो।

व्यंग्य मुस्कान – (मजाक उड़ाना) – उसकी व्यंग्य भरी मुस्कान मेरे दिल को चुभ गई।

बाजू से निकलना – (विपरीत परिस्थितियों का सामना न करना)– जीवन में आई कठिन परिस्थितियों का सामना न कर, उनके बाजू से निकल जाना भी ठीक नहीं है।

रास्ते पर खड़ा होना (काम में बाधा डालना) –  जब भी मैं किसी नए काम की शुरुआत करता हूं तो तुम मेरे रास्ते पर आकर खड़े हो जाते हो।

प्रश्न प्रेमचंद के व्यक्तित्व को उभारने के लिए लेखक ने जिन विशेषणों का उपयोग किया है। उनकी सूची बनाइए।

उत्तर लेखक ने प्रेमचंद जी को कई विशेषणों से संबोधित किया है।

  1. महान कथाकार
  2. जनता के लेखक
  3. उपन्यास सम्राट
  4. साहित्यिक पुरखे
  5. युग प्रवर्तक