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Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya 9th Summary

Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’

पाठ के लेखक शमशेर बहादुर सिंह हैं।

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक जीवन परिचयः शमशेर बहादुर सिंह

सन् (1911 – 1993)

Shamsher Bahadur Singh

लेखक परिचयः स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता के प्रमुख कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ और उनकी शिक्षा देहरादून एवं इलाहबाद विश्वविद्यालय से हुई। अनूठे काव्य-बिम्बों का सृजन करने वाले शमशेर केवल असाधारण कवि ही नहीं, एक अनूठे गद्य-लेखक भी है। ‘दोआब’, ‘प्लाट का मोर्चा’, जैसी गद्य रचनाओं के माध्यम से उनके विशिष्ट गद्यकार के रूप को पहचाना जा सकता है।

प्रमुख कृतियांः कुछ कविताएं, कुछ और कवितएं, चूका भी नहीं हूँ  मैं, इतने पास अपने, काल तुझसे होड़ है मेरी (काव्य संग्रह)य कुछ गद्य रचनाएँ, कुछ और गद्य रचनाएँ (गद्य-संग्रह)।

पाठ का सारः किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

प्रस्तुत लेख ‘किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया’  हिंदी के प्रसिद्ध् लेखक शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा गया है। इस लेख में लेखक ने बताया है कि पहले उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लिखना शुरू किया था, किंतु बाद में अंग्रेजी-उर्दू को छोड़कर हिंदी में लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी वर्णन किया कि उन्हें अपने जीवन में क्या-क्या कष्ट झेलने पड़े। इसके साथ ही लेखक ने श्री सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन तथा श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के प्रति अपनी श्रद्धा को भी व्यक्त किया है।

लेखक कहते हैं कि वे जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में बस पकड़कर दिल्ली चले आए। दिल्ली आकर वे पेंटिंग सीखने की इच्छा से उकील आर्ट स्कूल पहुँचे। परीक्षा में पास होने के कारण उन्हें बिना फीस के ही वहाँ भर्ती कर लिया गया। वे करोल बाग में रहकर कनाट प्लेस पेंटिंग सीखने जाने लगे।

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रास्ते में आते-जाते वे कभी कविता लिखते और कभी ड्राइंग बनाते थे और अपनी ड्राइंग के तत्व खोजने के लिए वे प्रत्येक आदमी का चेहरा गौर से देखते थे। पैसे की बड़ी तंगी रहती थी। कभी-कभी उनके बड़े भाई तेज बहादुर उनके लिए कुछ रुपये भेज देते थे। वे कुछ साइनबोर्ड पर लिखकर कमा लेते थे। अतः अपनी टीस को व्यक्त करने के लिए वे कविताएँ और उर्दू में गजल के कुछ शेर भी लिखते थे। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी कविताएँ कभी छपेंगी।

उनकी पत्नी टी0बी0 (T.B.) की मरीज थीं और उनका देहांत हो चुका था। अतः वे बहुत दुःखी रहते थे। इस समय महाराष्ट्र के एक पत्रकार उनके साथ रहने लगे। इसी समय एक बार क्लास खत्म होने तथा उनके चले जाने के बाद बच्चन जी स्टूडियो में आए थे और लेखक के न मिलने पर वे लेखक के लिए एक नोट छोड़ गए थे। इसके बाद लेखक ने एक अंग्रेजी का सॉनेट लिखा, किंतु बच्चन जी के पास भेजा नहीं। कुछ समय बाद लेखक देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सीखने लगे। वे दुखी और उदास रहते थे। ऐसे में वह लिखा हुआ सॉनेट उन्होंने बच्चन जी को भेज दिया।

Harivansh Rai Bachchan

देहरादून आने पर बच्चन जी डिस्पेंसरी में आकर उनसे मिले थे। उस दिन मौसम बहुत खराब था और आँधी आ जाने के कारण वे एक गिरते हुए पेड़ के नीचे आते-आते बच गए थे। वे बताते हैं कि बच्चन जी की पत्नी का देहांत हो चुका था। अतः वे भी बहुत दुखी थे। उनकी पत्नी सुख-दुख की युवा संगिनी थीं। वे बात की धनी, विशाल हृदय और निश्चय की पक्की थीं। लेखक बीमार रहने लगे थे, अतः बच्चन जी ने उन्हें इलाहाबाद आकर पढ़ने की सलाह दी और वे उनकी बात मानकर इलाहाबाद आ गए। बच्चन जी ने उन्हें एम0ए0 (M.A.)  में प्रवेश दिला दिया क्योंकि वे चाहते थे कि लेखक काम का आदमी बन जाए क्योंकि स्वयं बच्चन जी ने अंग्रेजी में एम0ए0 (M.A.) फाइनल करने के बाद 10-12 साल तक नौकरी की थी, परंतु लेखक सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे।

वे बताते हैं कि उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदू बोर्डिंग हाउस के कॉमन रूम में एक सीट नि:शुल्क मिल गई। इसके साथ ही पंत जी की कृपा से उन्हें इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम भी मिल गया। अब उन्हें लगा कि गंभीरता से हिंदी में कविता लिखनी चाहिए, परंतु घर में उर्दू का वातावरण था तथा हिंदी में लिखने का अभ्यास छूट चुका था। अतः बच्चन जी उनके हिंदी के पुनर्संस्कार के कारण बने। इस समय तक उनकी कुछ रचनाएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ में छप चुकी थीं। ‘अभ्युदय’  में छपा लेखक का एक ‘सॉनेट’ बच्चन जी को बहुत पसंद आया था। वे बताते हैं कि पंत जी और निराला जी ने उन्हें हिंदी की ओर खींचा। बच्चन जी हिंदी में लेखन-कार्य शुरू कर चुके थे। अतः लेखक को लगा कि अब उन्हें भी हिंदी-लेखन में उतरने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। बच्चन जी ने उन्हें एक स्टैंजा का प्रकार बताया था। इसके बाद उन्होंने एक कविता लिख डाली। उन्हें बच्चन की ‘निशा-निमंत्राण’ वे आकार ने बहुत आकृष्ट किया। लेखक पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहे थे। इसलिए बच्चन जी को बहुत दुख था। वे बच्चन जी के साथ एक बार गोरखपुर कवि-सम्मेलन में भी गए थे।

अब लेखक की हिंदी में कविता लिखने की कोशिश सार्थक हो रही थी। ‘सरस्वती’  में छपी उनकी कविता ने निराला का ध्यान खींचा। लेखक ‘रूपाभ’ कार्यालय में प्रशिक्षण लेने के बाद बनारस के ‘हंस’  कार्यालय की ‘कहानी’  में चले गए।

वे कहते हैं कि निश्चित रूप से बच्चन जी ही उन्हें हिंदी में ले आए। वैसे बाद में बच्चन जी से दूर ही रहे, क्योंकि उन्हें चिट्ठी-पत्री तथा मिलने-जुलने में उतना विश्वास नहीं था। वैसे बच्चन जी उनके बहुत निकट रहे


Kis Tarah Aakhirkar Main Hindi Mein Aaya Class 9 Question Answers

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. वह ऐसी कौन सी बात रही होगी जिसने लेखक को दिल्ली जाने के लिए बाध्य कर दिया?

उत्तर: लेखक जिन दिनों बेरोजगार थे उन दिनों शायद किसी ने उन्हें कटु बातें की होगी जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाए होंगे और दिल्ली चले आए होंगे।

प्रश्न 2. लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस क्यों रहा होगा ?

उत्तर: लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने का अफसोस इसलिए रहा होगा क्योंकि वह भारत के जनता की भाषा नहीं थी। इसलिए भारत के लोग यानी उनके अपने लोग उस भाषा को समझ नहीं पाते होंगे।

प्रश्न 3. अपनी कल्पना से लिखिए कि बच्चन ने लेखक के लिए नोट में क्या लिखा होगा?

उत्तर: दिल्ली के उकील आर्ट स्कूल में बच्चनजी ने लेखक के लिए एक नोट छोड़कर गए थे। उस नोट में शायद उन्होंने लिखा होगा कि तुम इलाहाबाद आ जाओ। लेखन में ही तुम्हारा भविष्य निहित है। संघर्ष करने वाले व्यक्ति ही जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं अतःपरिश्रम से सफलता अवश्य तुम्हारे कदम चूमेगी।

प्रश्न 4. लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के किनदृकिन रूपों को उभारा है?

उत्तर: लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व को अनेक रूपों में उभारा है-

  1. बच्चन का स्वभाव बहुत ही संघर्षशील, परोपकारी और फौलादी संकल्प वाला था।
  2. बच्चनजी समय के पाबन्द होने के साथदृसाथ कलादृप्रतिभा के पारखी थे। उन्होंने लेखक द्वारा लिखे गए एक ही सॉनेट को पढ़कर उनकी कलादृ प्रतिभा को पहचान लिया था।
  3. बच्चनजी अत्यंत ही कोमल एवं सहृदय के मनुष्य थे।
  4. वे हृदय से ही नहीं, कर्म से भी परम सहयोगी थे। उन्होंने न केवल लेखक को इलाहाबाद बुलाया बल्कि लेखक की पढ़ाई का सारा जिम्मा भी अपने ऊपर उठा लिया।

प्रश्न 5. बच्चन के अतिरिक्त लेखक को अन्य किन लोगों का तथा किस प्रकार का सहयोग मिला?

उत्तर: बच्चन के अतिरिक्त लेखक को निम्नलिखित लोगों का सहयोग प्राप्त हुआ-

  1. तेजबहादुर सिंह लेखक के बड़े भाई थे। ये आर्थिक तंगी के समय में उन्हें कुछ रुपये भेजकर उनका सहयोग किया करते थे।
  2. कवि नरेंद्र शर्मा लेखक के मित्र थे। एक दिन वे लेखक से मिलने के लिए बच्चन जी के स्टूडियो में आये। छुट्टी होने कारण वे लेखक से नहीं मिल सके। तब वे उनके नाम पर एक बहुत अच्छा और प्रेरक नोट छोड़ गए। इस नोट ने लेखक को बहुत सी प्रेरणा दी।
  3. शारदाचरण उकील कला शिक्षक थे। इनसे लेखक ने पेंटिंग की शिक्षा प्राप्त की।
  4. हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने लेखक को इंडियन प्रेस में अनुवाद का काम दिला दिया। उन्होंने लेखक द्वारा लिखी कविताओं में कुछ संशोधन भी किया।
  5. लेखक को देहरादून में केमिस्ट की दुकान पर कंपाउंडरी सिखाने में उसकी ससुराल वालों ने मदद की।

प्रश्न 6. लेखक के हिंदी लेखन में कदम रखने का क्रमानुसार वर्णन कीजिये।

उत्तर: हरिवंशराय बच्चन जी के बुलावे पर लेखक इलाहाबाद आ गया। यहीं उन्होंने हिंदी कविता लिखने का गंभीरता से मन बनाया। इसी समय उनकी कुछ कविताएँ ‘सरस्वती’ और ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थीं। उन्होंने बच्चन जी की ‘निशा निमंत्रण’ के रूप प्रकार पर भी लिखने का प्रयास किया, पर ऐसा लिखना उन्हें कठिन जान पड़ा। उनकी एक कविता को पंत जी ने संशोधित किया। सरस्वती पत्रिका में छपी एक कविता ने निराला का ध्यान खींचा। इसके बाद लेखक ने हिंदी लेखन में नियमित रूप से कदम बढ़ा दिया।

प्रश्न 7. लेखक ने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों को झेला है, उनके बारे में लिखिए।

उत्तर: लेखक ने अपने जीवन में प्रारम्भ से ही अनेक कठिनाइयों को झेला है। वह किसी के व्यंग्यदृबाण का शिकार होकर केवल पाँच-सात रुपए लेकर ही दिल्ली चले गए। वह बिना किसी फीस के पेंटिंग के उकील स्कूल में भर्ती हो गए। वहाँ उन्हें साइन-बोर्ड पेंट करके गुजारा चलाना पड़ा। लेखक की पत्नी का टी.बी. के कारण देहांत हो गया था और वे युवावस्था में ही विधुर हो गए थे। इसलिए उन्हें पत्नी-वियोग का पीड़ा भी झेलना पड़ा था। बाद में एक घटना-चक्र में लेखक अपनी ससुराल देहरादून आ गया। वहाँ वह एक दूकान पर कम्पाउंडरी सिखने लगे थे। वह बच्चन जी के आग्रह पर इलाहाबाद चले गए। वहाँ बच्चन जी के पिता उनके लोकल गार्जियन बने। बच्चन जी ने ही उनकी एम.ए. की पढ़ाई का खर्चा उठाया। बाद में उन्होंने इंडियन प्रेस में अनुवाद का भी काम किया। उन्हें हिन्दू बोर्डिंग हाउस के कामनदृरूम में एक सीट फ्री मिल गयी थी। तब भी वह आर्थिक संघर्ष से जूझ रहे थे।


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धन्यवाद!

Is Jal Pralay Mein Class 9th Summary

Is Jal Pralay Mein Class 9th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 11वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

‘इस जल प्रलय में’

Is Jal Pralay Mein Chapter 1

पाठ के लेखक फणीश्वर नाथ हैं।

…………………………

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक फणीश्वरनाथ रेणु

Fanishwar Nath Renu

जन्मः फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को औराडी हिंगन्ना, जिला पूर्णियां, बिहार में हुआ। आप आजीवन शोषण और दमन के विरूद्ध संधर्षरत रहे। इसी प्रसंग में सोशलिस्ट पार्टी से जा जुड़े व राजनीति में सक्रिय भागीदारी की। 1942 के भारत-छोड़ो आंन्दोलन में सक्रिय भाग लिया।

“इस जल प्रलय में”  एक रिपोर्ताज है जिसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जी हैं। इस रिपोर्ताज में उन्होंने सन 1975 में पटना में आई भयंकर बाढ़ का आंखों देखा हाल बयान किया है।

रिपोर्ताज की शुरुवात लेखक ने कुछ इस तरह से की हैं।

सावन और भादो (जुलाई-अगस्त माह) के महीने में जब पश्चिम दिशा, पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा में बहने वाली कोसी, पनार, महानंदा और गंगा नदी में बाढ़ आती है तो वहाँ के लोग व जानवर लेखक के गांव व उसके आसपास के क्षेत्रों में शरण लेने आते है। क्योंकि लेखक का गांव जिस क्षेत्र में पड़ता है। वहाँ की जमीन विशाल और परती है।

परती क्षेत्र में जन्म लेने के कारण लेखक को तैरना भी नहीं आता था। क्योंकि इस तरह के क्षेत्रों में पानी की मात्रा कम होती हैं। (परती, वह भूमि होती हैं जो एकदम बंजर नहीं होती है। मगर इस तरह की जमीन को एक साल खेती करने के बाद दो-तीन साल के लिए खाली छोड़ दिया जाता है ताकि मिट्टी की उर्वरकता बनी रही।)

लेखक कहते हैं कि वो 10 वर्ष की उम्र से ही बाढ़ पीडि़तों के लिए स्वयंसेवक या रिलीफवर्कर के रूप में कार्य करते आ रहे हैं और लेखक ने दसवीं क्लास में बाढ़ पर एक लेख लिखकर पहला पुरस्कार भी हासिल किया था। इसके अलावा प्रतिष्ठित “धर्मयुग मैगजीन” के “कथा दशक कालम” के अंतर्गत बाढ़ से संबंधित उनकी एक कहानी भी छपी थी।

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उन्होंने बाढ़ पर 1947 में ‘‘जय गंगा”, 1948 में ‘‘डायन कोसी”, 1948 में ‘‘हड्डियों का पुल” रिपोर्ताज लिखे। इसके अलावा उन्होंने अपने कई उपन्यासों में भी बाढ़ की विनाश लीलाओं के बारे में लिखा हैं।

लेखक जब अपने गांव में रहते थे तो उन्होंने बाढ़ के बारे में सुना जरूर था मगर उसे कभी झेला नहीं था। लेकिन सन 1967 में पटना शहर में आयी बाढ़ की विभीषिका को उन्होंने पहली बार खुद अपनी आँखों से देखा और झेला भी। जब 18 घंटे तक लगातार जोरदार बारिश हुई और पुनपुन नदी का पानी राजेंद्रनगर, कंकड़बाग और अन्य निचले हिस्से में घुस आया था।

इसीलिए इस बार जब बाढ़ का पानी शहर में आने लगा और पटना का पश्चमी भाग छाती भर पानी में डूबने लगा तो, लेखक अपने घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कंपोज की गोलियां जमा कर बाढ़ के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

अगली सुबह लेखक को पता चला कि राजभवन और मुख्यमंत्री निवास तक बाढ़ का पानी आ चुका हैं और दोपहर में उन्हें किसी ने बंगला भाषा में बताया कि गोलघर तक बाढ़ आ चुकी हैं।और शाम 5ः00 बजे तक काॅफी हाउस भी बाढ़ के पानी में डूब चुका था जिसकी खबर लेखक को एक रिक्शेवाले ने दी। जब लेखक काॅफी हाउस जाने के लिए अपने एक कवि मित्र के साथ घर से निकले थे। ये कवि मित्र लेखक की उटपटांग बातों से कभी बोर नहीं होते थे।

लोग बाढ़ देखने के लिए रिक्शे, तांगे, टमटम, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि वाहनों से जा रहे थे। रास्ते में बाढ़ देखने जाने और आने वाले लोग सिर्फ बाढ़ से संबंधित बातों ही कर रहे थे। तभी लेखक कॉफी हाउस पहुंच गए, जो बंद कर दिया गया था।

लेखक ने सड़क किनारे आये पानी को देखकर अपने कवि मित्र को बताया कि ‘‘मृत्यु का तरल दूत” यानी बाढ़ का पानी यहां तक आ पहुंचा है। अब हम आगे नहीं जाएंगे। लेखक डर गए और रिक्शे से गांधी मैदान की ओर चल पड़े।

लेखक कहते हैं कि गांधी मैदान में दशहरा के दिन “राम रथ” की प्रतीक्षा में जितने लोग इंतजार में खड़े रहते हैं। उतने ही आज वहां बाढ़ देखने के लिए भी इकट्ठे हुए थे।

शाम को 7:30 बजे पटना के आकाशवाणी केंद्र ने घोषणा की, पानी आकाशवाणी के स्टूडियो की सीढि़यों तक पहुंच गया है। हालाँकि पान की दुकानों पर खड़े होकर निश्चिंत होकर, हंस बोलकर समाचार सुन रहे थे। और कुछ दुकानदार अपना सामान टम्पो, टमटम आदि में लाद रहे थे। परंतु लेखक और उनके मित्र के चेहरे पर डर और उदासी का भाव था।

लेखक अब राजेंद्र नगर चैराहे पहुंचे। जहां एक मैगजीन कॉर्नर पर पहले के जैसे ही पत्र-पत्रिकाएं बिक रही थी। वहां से लेखक ने कुछ पत्रिकाएं खरीदी और अपने कवि मित्र से विदा लेकर अपने घर आ गए।

घर पहुंचने पर उन्हें जनसंपर्क विभाग की गाड़ी के लाउडस्पीकर पर बाढ़ से संबंधित चेतावनी सुनाई दे रही थी जिसमें सबको सावधान रहने के लिए कहा जा रहा था । सारा शहर जाग रहा था। देर रात तक जागने के बाद लेखक सोना चाहते थे परन्तु उन्हें नींद नहीं आ रही थी। तभी उनके दिमाग में कुछ पुरानी यादें / घटनाएँ ताजा हो गई।

सबसे पहले उन्हें सन 1947 में मनिहारी जिले में आयी बाढ़ याद आई। जब वो अपने गुरुजी (स्व. सतीनाथ भादुड़ी जी) के साथ नाव से गंगा नदी में आयी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में पकाही धाव की दवा (पानी में लगातार पैर रहने से पकने को पकाही धाव कहते हैं), केरोसिन तेल, दियासलाई आदि लेकर सहायता करने पहुंचे थे।

इसके बाद सन् 1949 में महानंदा नदी में आयी बाढ़ ने भी कहर बरपाया था। लेखक एक डाक्टर साहब के साथ ‘‘वापसी थाना” के एक गांव से बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप ले जा रहे थे। तभी एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ गया। कुत्ते को देख डाक्टर साहब डर गये। बाद में कुत्ता व नौजवान दोनों नाव से उतर गये।

लेखक आगे कहते हैं कि वो परमान नदी की बाढ़ में फंसे मुसहरों की बस्ती (पत्तों से दौने बनाने वाले लोग) में भी राहत बांटने पहुंचे। जो कई दिनों से मछली और चूहे भून कर खा रहे थे। जब वो अपने साथियों के साथ उस बस्ती पर पहुंचे तो देखा कि वहां एक ऊंचे मचान पर “बलवाही” नाच हो रहा था। और एक काला सा आदमी लाल साड़ी में दुल्हन की एक्टिंग कर लोगों को हंसा रहा था।

लेखक मुसहरों की बस्ती में राहत सामग्री बाँट कर वापस आ रहे थे, तो उन्हें अपने परम मित्र भोला शास्त्री जी की बहुत याद आई।

लेखक को यहां पर दो और घटनाएं भी याद गई।

पहली घटना 1937 की हैं। जब सिमरवनी-शकरपुर में बाढ़ के समय नाव को लेकर लड़ाई हो गई थी। लेखक उस समय स्काउट बॉय थे। गांव में नाव नहीं थी। इसलिए लोग केले के पेड़ से नाव (भेला) बनाकर काम चला रहे थे और जमींदार के लड़के नाव पर हारमोनियम, तबला लेकर जलविहार करने में मस्त थे। इससे नाराज गांव के नौजवानों ने मिलकर जमीदार के बेटों की नाव छीन ली और उनके साथ थोड़ी मारपीट भी की।

और दूसरी घटना लेखक को तब की याद आ रही है जब सन 1967 में पुनपुन नदी का पानी राजेंद्र नगर में घुस आया। और एक नाव पर कुछ नौजवान लड़के-लड़कियां की टोली स्टोव, केतली, बिस्कुट लेकर किसी फिल्मी सीन की तरह, कश्मीर का आनंद लेने के लिए निकल पड़े।

उनके ट्रांजिस्टर में “हवा में उड़ता जाए” गाना बज रहा था। जैसे ही उनकी नाव गोलंबर पर पहुंची तो ब्लॉक की छत पर खड़े लड़कों ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया और वो शर्मिंदा होकर वहां से भाग गए।

इसके बाद लेखक अपनी पुरानी यादों से बाहर वर्तमान समय में आ चुके हैं और इस समय रात के 2:30 बजे रहे हैं। पर बाढ़ का पानी अभी तक शहर में नहीं पहुंचा हैं। लेखक को लगा कि शायद इंजीनियरों ने तटबंध ठीक कर दिया हो।जिस वजह से पानी शहर तक नहीं पहुंचा हैं।

इसके थोड़ी देर बाद लेखक को नींद आ गई। सुबह 5:30 बजे जब लोगों ने उन्हें जगाया तो लेखक ने देखा कि सभी जागे हुए थे और पानी पूरे मोहल्ले में फैल चुका था। चारों ओर चीख-पुकार मची हुई थी।

हर जगह पानी की लहरों नृत्य करते हुई दिखाई दे रही थी। यानि चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। लेखक कहते हैं कि मैं बाढ़ के दृश्य तो बचपन से देखता आ रहा हूं। लेकिन इस बार के जैसे बाढ़ मैंने पहले कभी नहीं देखी।लेखक कहते हैं कि इस वक्त ना मेरे पास मूवी कैमरा है, ना टेप रिकॉर्डर और ना मेरे पास कलम है। अच्छा है कुछ भी नहीं है मेरे पास।


Is Jal Pralay Mein Chapter Question Answer

इस जल प्रलय में पाठ के अभ्यास के प्रश्नः

प्रश्न-1: बाढ़ की खबर सुनकर लोग किस तरह की तैयारी करने लगे?

उत्तर – बाढ़ की खबर से सारे शहर में आतंक मचा हुआ था। लोग अपने सामान को नीचली मंजिल से ऊपरी मंजिल में ले जा रहे थे। सारे दुकानदार अपना सामान रिक्शा, टमटम, ट्रक और टेम्पो पर लादकर उसे सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे थें। खरीद-बिक्री बंद हो चुकी थी। लोग घरों में खाने का सामान, दियासलाई, मोमबत्ती, दवाईयाँ, किरोसीन आदि का प्रबन्ध करने में लगे हुए थे।

प्रश्न-2: बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने के लिए लेखक क्यों उत्सुक था ?

उत्तर- लेखक ने पहले बाढ़ के बारे में सुना जरूर था पर कभी देखा नही था। उसने अपनी कई रचनाओ में बाढ़ की विनाशलीला का उल्लेख किया था। वह स्वयं अपनी आँखों से बाढ़ के पानी को शहर में घुसते और उसकी विनाशलीला के बारे में जानने को उत्सुक था।

प्रश्न-3: “मृत्यु का तरल दूत” किसे कहा गया है और क्यों?

उत्तर- बाढ़ के लगातार बढ़ते जल को श्मृत्यु का तरल दूतश् कहा गया है। बाढ़ के इस आगे बढ़ते हुए जल ने न जाने कितने प्राणियों को उजाड़ दिया था, बहा दिया था और बेघर करके मौत की नींद सुला दिया था। इस तरल जल के कारण लोगों को मरना पड़ा, इसलिए इसे मृत्यु का तरल दूत कहना बिल्कुल सही है।

प्रश्न-4: खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक क्यों बढ़ गई थी?

उत्तर- खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक बढ़ गई थी क्योंकि लोग बाढ़ को देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में  इकट्ठे हो गए थे। वे बाढ़ से भयभीत नहीं थे, बल्कि हंसी-खुशी और कौतुहल से युक्त थे। ऐसे समय में पान उनके लिए समय गुजारने का सबसे अच्छा साधन था।

प्रश्न-5: जब लेखक को यह अहसास हुआ की उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उसने क्या-क्या प्रबंध किए?

उत्तर- जब लेखक को अहसास हुआ की उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उन्होंने आवश्यक ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कम्पोज की गोलियाँ इकट्ठी कर लीं ताकि बाढ़ से घिर जाने पर कुछ दिनों तक गुजारा चल सकें। उन्होंने बाढ़ आने छत पर चले जाने का भी प्रबंध सुनिश्चित कर लिया।

प्रश्न-6: बाढ़ पीडि़त क्षेत्र में कौन-कौन सी बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है?

उत्तर – बाढ़ के बाद हैजा, मलेरिया, टाइफाइड आदि बीमारियों के फैलने की संभावना रहती है क्योंकि बाढ़ के उतरे पानी में मच्छर अत्यधिक मात्रा में पनपते हैं जिसके कारण मलेरिया जैसी बीमारी हो जाती है। पानी की कमी से लोगो को गंदा पानी पीना पड़ता है जो हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों को न्यौता देता है।

तो बच्चों!

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