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Mati Wali Chapter 4 Class 9th Summary

Mati Wali Chapter 4 Class 9th Summary, Explanation & Question Answers

Mati Wali Chapter 4 Summary, Explanation & Question Answers

Class 9th Hindi Kritika Part 1

हैलो बच्चों!

अज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

“माटी वाली”

पाठ के लेखक विद्यासागर नोटियाल हैं।

बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

पाठ के लेखक – विद्यासागर नोटियाल

जीवन परिचय

जन्म: 29 सितम्बर, 1933 उत्तर भारत की एक पहाड़ी रियासत टिहरी-गढ़वाल में भागीरथी के तट पर मालीदेवल गाँव में राजगुरु परिवार में आपका जन्म हुआ।

शिक्षा: प्रताप इंटर कालेज, टिहरी से हाई स्कूल, डी.ए.वी. काॅलेज, देहरादून से इंटर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.।

लेखन-कार्य: 1949 से 1960 तक। ‘60 से 90’ तक लंबे अवकाश के उपरांत पुनः लेखन प्रारंभ।

राजनीति: 13 वर्ष की आयु में सामन्ती सरकार ने भारत की आजादी के बाद 18 अगस्त 1947 को गिरफ्तार कर कॉलेज से भी निकाल दिया। शहीद नागेन्द्र सकलानी के साथ कार्य किया।

पहाड़ों में वनों के निर्मम संहार के विरुद्ध छेड़े गये ‘चिपको’ आंदोलन के प्रबल समर्थक रहे, इनकी मृत्यु 18 फरवरी 2012 को हुआ।

कृतियाँ:

उपन्यास: उलझे रिश्ते, भीम अकेला, सूरज सबका है, उत्तर बयाँ है, झुण्ड से बिछुड़ा, यमुना के बागी बेटे।

कहानी-संग्रह: टिहरी की कहानियाँ, सुच्चि डोर, दस प्रतिनिधि कहानियाँ: (उमर कैद, खच्चर फगणू नहीं होते, फट जा पंचधार, सुच्ची डोर, भैंस का कट्या, माटी खायँ जनावराँ, घास, सोना, मुलजिम अज्ञात, सन्निपात।)।

माटी वाली”

पाठ का सार

टिहरी बाँध बनने के बाद जब पूरा शहर पानी में डूब गया, तब सरकार द्वारा वहां के लोगों को दूसरी जगहों में विस्थापित किया गया था। यह कहानी उन्ही विस्थापितों के दर्द को बयां करती हैं।

यह कहानी एक ऐसी गरीब और बुजुर्ग महिला की है जिसके पास न जमीन हैं और न ही पक्का मकान। यह बुजुर्ग महिला टिहरी शहर (पुराना टिहरी शहर, गढ़वाल, उत्तराखंड) के एक मोहल्ले में घर-घर जाकर लाल मिट्टी देने का काम करती थी। और वही उसकी रोजी रोटी का मुख्य साधन था। लोग उसे ‘‘माटी वाली’’ के नाम से जानते थे।

दरअसल उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में खाना पकाने के बाद लोग हर रोज अपने चूल्हे की लिपाई-पुताई लाल मिट्टी से करते हैं। मिट्टी से बने घरों के आंगनों और दीवारों की पुताई भी लाल मिट्टी में गोबर मिलाकर की जाती हैं। जो आंगन व दीवारों की साफ सफाई के साथ उन्हें मजबूती भी प्रदान करती है। और कीड़े-मकौड़ों को भी घर-आंगन से दूर रखती हैं।

Red Soil

यह माटीवाली भी बरसों से माटाखान (एक ऐसी जगह जहां पर लाल मिट्टी पाई जाती है और उसी जगह से लाल मिट्टी खोदकर घरों तक पहुंचाई जाती है। उसे माटखान कहते हैं) से लाल मिट्टी खोदकर लाती हैं। और मोहल्ले के प्रत्येक घर तक उस मिट्टी को पहुंचाती है। इसीलिए मोहल्ले के सभी लोग उस माटीवाली से बहुत अच्छी तरह से परिचित थे।

लेखक आगे कहते है कि अगर वह माटीवाली एक दिन भी उन घरों में मिट्टी ना पहुंचाए तो, लोगों को अपने रसोईघरों के चूल्हों की लिपाई-पुताई में मुश्किल हो जाती। साल-दो साल में लोग जो अपने घरों की दीवारों की मिट्टी को गोबर के साथ मिलकर लिपाई-पुताई करते हैं उसके लिए भी लाल मिट्टी की ही जरूरत पड़ती हैं।

टिहरी शहर के अंदर कोई भी माटखान नहीं था। दरअसल पुराना टिहरी शहर भागीरथी और भीलांगना नदियों के तट पर बसा था जिस वजह से यहां की मिट्टी रेतीली थी और रेतीली मिट्टी से पुताई नहीं की जा सकती है।

इसीलिए शहर के सभी लोग और शहर में आने वाले किराएदार तक माटीवाली के ग्राहक बन जाते थे। घर-घर माटी बेचने वाली यह महिला नाटे कद की एक हरिजन बुढि़या थी।

शहर के सभी लोग माटीवाली और उसके कंटर (एक तरह का टिन का बर्तन) को अच्छी तरह से पहचानते थे। वह पुराने कपड़ों को मोड़कर एक गोल डिल्ला (कपड़ों का एक मोटा गद्दा) बनाकर पहले उसे अपने सिर पर रखती थी। और फिर उसके ऊपर माटी से भरा कंटर रखती थी। जिसमें कभी भी ढक्क्न नहीं लगा होता था।

दरअसल माटीवाली कंटर में मिट्टी भरने से पहले ही उसका ढक्कन निकाल देती थी ताकि उसे मिट्टी को निकालने व भरने में आसानी हो।

हर रोज की तरह एक दिन माटीवाली लाल मिट्टी लेकर आयी और उसने मोहल्ले के आखिरी घर की खोली (दरवाजे) में पहुंचकर अपने दोनों हाथों की मदद से सिर पर रखा हुआ लाल मिट्टी का कंटर जमीन में उतारा। तभी सामने के घर से नौ-दस साल की एक छोटी सी बच्ची कामिनी दौड़ती हुई उसके पास आई और माटीवाली से बोली कि उसकी मां ने उसे बुलाया है। उसकी बात सुनकर माटीवाली ने उससे कहा कि वह थोड़ी देर में आएगी।

तभी उस घर की मालकिन ने (माटीवाली ने जिस घर के आगे अपना कंटर उतारा था) माटीवाली को कंटर की मिट्टी को आँगन के एक कोने में उड़ल देने को कहा और साथ में ही उसने माटीवाली को भाग्यवान बताया क्योंकि वह ठीक चाय पीने के समय उसके घर पर पहुंची थी। यह कहकर मालकिन ने दो रोटियों माटीवाली को पकड़ा दी और खुद दोबारा रसोईघर में चली गई।

माटीवाली ने मालकिन को जैसे ही अंदर जाते देखा तो उसने फटाफट अपने सिर में रखे कपड़े के डिल्ले को नीचे उतारा और उसके अंदर से एक पुरानी चादर निकाल कर उसके एक कोने में एक रोटी बांध दी। और मालकिन को अपने पास आता देख रोटी खाने का नाटक करने लगी।

घर की मालकिन पीतल के एक गिलास में उसके लिए चाय लेकर आयी और उसे देते हुए बोली सब्जी नहीं हैं। इसीलिए वह चाय के साथ ही रोटी खा ले।

माटीवाली पीतल के गिलास को देखकर मालकिन से कहती हैं कि उसने अभी तक पीतल के गिलास संभाल कर रखे हैं। जबकि आजकल तो पूरे बाजार में या किसी भी घर में पीतल के गिलास दिखाई नहीं देते हैं।

वह व्यापारियों को कोसते हुए कहती हैं कि ये व्यापारी लोग हमारे घरों से बहुत ही सस्ती कीमत में तांबे, कांसे और पीतल के बर्तन खरीद कर ले जाते हैं। जबकि बाजार में इनकी बहुत ऊंची कीमत है। अब सभी लोगों के घरों में स्टील, कांच व चीनी मिट्टी के ही बर्तन दिखाई देते हैं।

तभी मालकिन माटीवाली से कहती है कि अपनी चीज से वाकई में बहुत मोह होता है। वह तो यह सोच कर पागल हो जाती है कि वह इस उम्र में इस शहर को छोड़कर कहां जाएंगे।

माटीवाली मालकिन को जबाब देते हुए कहती हैं कि ठकुराइनजी जो जमीन जायदाद के मालिक हैं। वो तो कहीं ना कहीं चले ही जायेंगे। लेकिन मेरा क्या होगा। मेरी तरफ तो देखने वाला कोई भी नहीं है।

चाय खत्म कर माटीवाली ने अपने एक हाथ में अपना कपड़ा उठाया और दूसरे हाथ से खाली कंटर और खोली से बाहर निकलकर दूसरे घर (कामिनी के घर) में चली गई।

कामिनी की माँ ने भी उसे अगले दिन मिट्टी लाने का आदेश देने के साथ ही दो रोटियां पकड़ा दी। जिससे उसने कपड़े के दूसरे छोर में बांध लिया। वो इन तीनों रोटियों को अपने पति के लिए ले जा रही थी जो घर में भूखा उसके आने का इंतजार कर रहा था।

उसका गांव शहर के इतनी दूरी पर था कि अगर वह तेज कदमों से भी चले तो, उसे घर पहुंचने में एक घंटा लग जाता था। वह रोज सुबह अपने घर से माटाखान मिट्टी खोदने निकल जाती थी। फिर मिट्टी खोदकर लोगों के घरों तक पहुंचाने और वापस घर पहुंचते-पहुंचते उसे रात ही हो जाती थी।

घर लौटते वक्त वह मन ही मन सोचती जा रही थी कि आज वह अपने पति को रोटियों के साथ प्याज की सब्जी बनाकर देगी। इसीलिए वह अपनी आमदनी से एक पाव प्याज खरीद कर घर पहुंची। घर पहुंच कर उसे पता चला कि उसका पति इस दुनिया को छोड़ कर जा चुका हैं।

लेखक आगे कहते है कि टिहरी बांध पुनर्वास के अधिकारी ने उससे उसके घर का पता पूछा और साथ में ही उसे तहसील से अपने घर का प्रमाण-पत्र लाने को कहा। तब माटीवाली ने अधिकारी को बताया कि उसके पास ना तो घर है और ना ही जमीन है। उसकी तो पूरी जिंदगी लोगों के घरों में मिट्टी देते-देते गुजर गई।

वह अधिकारी से पूछ रही थी कि बांध बनने के बाद वह क्या खाएगी, क्या करेगी और कहां रहेगी। अधिकारी उसे जवाब देते हुए कहता हैं कि यह बात तो उसे खुद ही तय करनी पड़ेगी।

अधिकारी उसे बताता है कि टिहरी बांध की दो सुरंगों को बंद कर दिया गया है जिससे शहर में पानी भरने लगा है। इसीलिए पूरे शहर में आपाधापी मची हुई है। लोग अपने घरों को छोड़कर दूसरी सुरक्षित जगहों पर जा रहे हैं। शहर के सारे श्मशान घाट डूब चुके हैं।

माटीवाली अपनी झोपड़ी के बाहर अकेले बैठकर गांव में आने जाने वाले हर व्यक्ति से एक ही बात कहे जा रही थी कि ‘‘गरीब आदमी का शमशान नहीं उजड़ना चाहिए’’। माटीवाली अपनी झोपड़ी, अपने पति व अपने माटाखान को खो चुकी थी। अब उसे यह चिंता खाये जा रही थी कि वह अपना आगे का जीवन कैसे यापन करेगी।

IMPORTANT QUESTION ANSWERS

MATI WALI CHAPTER 4 HINDI KRITIKA PART- 1

प्रश्न 1. शहरवासी सिर्फ माटी वाली को नहीं, उसके कंटर को भी अच्छी तरह पहचानते हैं।’ आपकी समझ से वे कौन से कारण रहे होंगे जिनके रहते ‘माटी वाली’ को सब पहचानते थे?

उत्तर- शहरवासी माटी वाली तथा उसके कनस्तर को इसलिए जानते होंगे क्योंकि पूरे टिहरी शहर में केवल वही अकेली माटी वाली थी। उसका कोई प्रतियोगी नहीं था। वही सबके घरों में लीपने वाली लाल मिट्टी दिया करती थी। लाल मिट्टी की सबको जरूरत थी। इसलिए सभी उसे जानते थे तथा उसके ग्राहक थे। वह पिछले अनेक वर्षों से शहर की सेवा कर रही थी। इस कारण स्वाभाविक रूप से सभी लोग उसे जानते थे। माटी वाली की गरीबी, फटेहाली और बेचारगी भी उसकी पहचान का एक कारण रही होगी।

प्रश्न 2. माटी वाली के पास अपने अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में ज्यादा सोचने का समय क्यों नहीं था?

उत्तर- माटी वाली अत्यंत गरीब बूढ़ी हरिजन महिला थी। टिहरी शहर में घर-घर माटी पहुँचाने के अलावा उसकी आजीविका का कोई दूसरा साधन न था। उसके पास खेती के लिए न कोई ज़मीन थी और न रहने के लिए। वह ठाकुर की जमीन पर झोंपड़ी बनाकर रहती थी जिसके लिए उसे बेगार करना पड़ता था। वह सवेरे माटाखान के लिए निकलती, माटी खोदती भरती और टिहरी के घरों में पहुँचाती। उसे अपनी झोंपड़ी तक लौटते-लौटते शाम हो जाती या रात गहराने लगती। माटी बेचने या घरों से मिली रोटियाँ खाकर सो जाती। ऐसी दिनचर्या में माटी वाली के पास अपने अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में सोचने के लिए वक्त न था।

प्रश्न 3. ‘भूख मीठी कि भोजन मीठा’  से क्या अभिप्राय है?

उत्तर- इस प्रश्न में यह तथ्य छिपा हुआ है कि भोजन मीठा या स्वादिष्ट नहीं हुआ करता, वह भूख के कारण स्वादिष्ट लगता है। इसलिए रोटी चाहे रूखी हो या साग के साथ या चाय के साथ; वह भूख के कारण मीठी प्रतीत होती है। अतः रोटी के स्वाद का वास्तविक कारण भूख होती है।

प्रश्न 4. पुरखों की गाढ़ी कमाई से हासिल की गई चीज़ों को हराम के भाव बेचने को मेरा दिल गवाही नहीं देता।’-मालकिन के इस कथन के आलोक में विरासत के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर- हमारे पुरखों के समय इतने साधन और सुविधाएँ न थीं। उन्हें हर चीज़ पाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। आमदनी कम होने से मूलभूत आवश्यकताएँ पूरा करना भी कठिन हो जाता था। इसके बाद भी उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई में से कुछ पैसे बचाकर अनेक कलात्मक वस्तुएँ एकत्र की और उन्हें अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ गए। इनसे उनकी मेहनत लगन और बचत की कठिनाइयों का पता चलता है।

नई पीढ़ी के लिए ये वस्तुएँ विरासत जैसी होती हैं। इनसे हमें अपनी सभ्यता संस्कृति का ज्ञान मिलता है। ये वस्तुएँ हमारे पूर्वजों की रुचियों एवं आर्थिक सामाजिक स्थिति का परिचय कराती हैं। यह आने वाली पीढ़ियों का दायित्व है कि वे विरासत की इन वस्तुओं का संरक्षण करें तथा भावी पीढ़ी को सौंप जाएँ। पूर्वजों की मेहनत और गाढ़ी कमाई से बनाई इन वस्तुओं का महत्त्व जानकर ही मालकिन का मन इन्हें हराम के भाव में बेचने को नहीं करता है।

प्रश्न 5. माटी वाली को रोटियों का इस तरह हिसाब लगाना उसकी किस मजबूरी को प्रकट करता है?

उत्तर- माटी वाली का रोटियों को इस तरह गिनना बताता है कि वह बहुत गरीब है। उसके पास पेट भरने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। वह रोज कमाती और खाती है। इससे यह भी पता चलता है कि उसे केवल अपना ही नहीं, अपने बूढे पति का भी पेट भरना होता है। इसलिए उसे रोटियों का बराबर हिसाब रखना पड़ता है।

प्रश्न 6. आज माटी वाली बुड्ढे को कोरी रोटियाँ नहीं देगी-इस कथन के आधार पर माटी वाली के हृदय के भावों को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- माटी वाली टिहरी शहर के घरों में माटी देकर अपनी रोटी-रोजी चलाती है। यही उसकी आजीविका का एकमात्र साधन है। ऐसे ही एक घर में माटी देने पर घर की मालकिन ने उसे दो रोटियाँ दीं। उसे एक अन्य घर से भी दो रोटियाँ मिलीं। इनमें से उसने एक खाकर बाकी को घर ले जाने के लिए बचा लिया ताकि वह अपने अशक्त एवं बीमार बुड्ढे को दे सके। आज माटी बेचने से हुई आमदनी से वह एक पाव प्याज खरीदकर कूट तल कर उसकी सब्जी बनाना चाहती है। ताकि बुड्ढे को सूखी रोटियाँ न खानी पड़े। इससे बुड्ढा खुश हो जाएगा। इस कल्पना से माटी वाली खुश है क्योंकि रोटियों के साथ सब्ज़ी देखकर बूढ़ा प्रसन्न हो जाएगा। उसकी प्रसन्नता का अनुमान कर वह बहुत खुश हो रही है।

प्रश्न 7.  ‘गरीब आदमी का शमशान नहीं उजड़ना चाहिए।‘ इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इस कथन का आशय है-गरीब आदमी का रहने का ठिकाना नहीं छिनना चाहिए। गरीब आदमी अपने स्थान से उजड़कर दूसरे स्थान पर बसने में समर्थ नहीं होता। इसलिए अगर वह अपने मूल स्थान से उखड़ गया तो फिर उसकी मिट्टी खराब हो जाती है। वह मारा-मारा फिरता है। इसलिए उसे अपने निवास स्थल पर ही अंतिम साँस लेने का अधिकार होना चाहिए। उसे अंतिम यात्रा अर्थात् श्मशान तक वहीं रहना चाहिए, जहाँ का वह मूल निवासी है।

प्रश्न 8. ‘विस्थापन की समस्या’ पर एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तर- विकास एक आवश्यक प्रक्रिया है जो अपने साथ ढेर सारी खुशियाँ और रंगीन सपने लेकर आता है। विकास के क्रम में जो कार्य किए जाते हैं वे कुछ लोगों के हृदय पर ऐसे घाव दे जाते हैं जिनका दुख वे आजीवन भोगते हैं। विकास के नाम पर नदियों पर बड़े-बड़े और ऊँचे-ऊँचे बाँध बनाए जाते हैं जिससे शहर, गाँव, जंगल, उपजाऊ जमीन आदि जलमग्न हो जाती हैं। बाँध बनाने से पहले वहाँ रहने वालों को अन्यत्र विस्थापित किया जाता है जिससे उनके सामने रोटी-रोजी की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

ऐसे लोगों के बच्चों का भविष्य भी प्रभावित होता है। यद्यपि सरकार इन लोगों के विस्थापन की व्यवस्था करती है परंतु माटी वाली की तरह बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जिनके पास जमीन-जायदाद का प्रमाणपत्र नहीं। होता है। इन लोगों को तब विशेष परेशानी का सामना करना पड़ता है। उनकी स्थिति ‘न घर की न घाट की’ वाली हो जाती है। वास्तव में विस्थापन अपने साथ कई समस्याएँ लेकर आता है जिनको समाधान विस्थापन से पहले ही कर लिया जाना चाहिए।

प्रश्न 9.  ‘माटी वाली’  की तरह ही कुछ महिलाएँ हमारे समाज में आज भी यातना झेल रही हैं। आप इनकी मदद कैसे कर सकते हैं, लिखिए।

उत्तर- आज भी हमारे समाज में बहुत-सी महिलाएँ हैं जो माटी वाली की तरह ही यातना झेलने के लिए विवश हैं। ये महिलाएँ घोर गरीबी में दिन बिताते हुए अपनी मूलभूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हाथ-पैर मार रही हैं। उनकी मदद करने के लिए हमें आगे चाहिए। इन लोगों को वृद्धावस्था पेंशन का लाभ दिलाने हेतु आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए। समाज कल्याण विभाग द्वारा इनके रहने और खाने की व्यवस्था करवाते हुए इनके स्वास्थ्य की नियमित जाँच करवाने हेतु प्रेरित करूंगा। इन्हें मुफ्त दवाइयाँ दिलवाने की व्यवस्था करूंगा। मैं यथासंभव इनके लिए गरम कपड़े और इनके काम आने वाली वस्तुओं को इन्हें देने का प्रयास करूंगा। मैं समाज के अमीर वर्ग को इनकी मदद करने हेतु प्रोत्साहित करूंगा। इसके अलावा विभिन्न माध्यमों से सरकार का ध्यान इनकी ओर आकर्षित करवाने का प्रयास करूंगा।

प्रश्न 10. माटी वाली गरीब जरूर है पर उसके चरित्र में जीवन मूल्यों की कमी नहीं है। उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताइए कि आप उससे कौन-कौन से जीवन मूल्य अपनाना चाहेंगे?

उत्तर-  माटी वाली गरीब महिला है। वह अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्षरत है। उसका चरित्र प्रेरणादायी है। उसके चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • माटी वाली अत्यंत परिश्रमी महिला है। वह सुबह से शाम तक परिश्रम करती रहती है।
  • माटी वाली विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करके उन पर विजय पाने का प्रयास कर रही है।
  • माटी वाली का स्वभाव अत्यंत जुझारू है।
  • माटी वाली में सेवा भावना कूट-कूटकर भरी है। वह अपने बीमार एवं अशक्त पति की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रयास रहती है।
  • वह मृदुभाषिणी है तथा विनम्रता से बातें करती है। माटी वाली के चरित्र से मैं परिश्रमी बनने, काम से जी न चुराने, आलस्य त्यागने, विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने, दूसरों की सेवा करने, अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहने जैसे जीवन मूल्य अपनाना चाहूँगा।

तो बच्चों!

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