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Bharat Mata

Bharat Mata Class 11th Hindi NCERT Sollutions, Summary, MCQs

भारत माता कक्षा 11वीं हिन्दी आरोह भाग-1

पंडित जवाहरलाल नेहरू

लेखक परिचय : भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 1889 ई. में इलाहबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था| उनकी मृत्यु 1964 ई. में नई दिल्ली में हुई थी|

जवाहरलाल नेहरू का जन्म इलाहबाद के एक संपन्न परिवार में हुआ| उनके पिता वहाँ के बड़े वकील थे| नेहरू की प्राथमिक शिक्षा घर पर तथा उच्च शिक्षा इंग्लैंड में हैरो तथा कैंब्रिज में हुई| वही से वकालत भी की| लेकिन नेहरू पर गांधी जी का बहुत प्रभाव पड़ा| उनकी पुकार पर वे वकालत छोड़कर आज़ादी की लड़ाई में जुट गए| आगे चल कर सन् 1929 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष बने और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की| नेहरू का झुकाव समाजवाद की ओर भी था| 

सन् 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो नेहरू जी पहले प्रधानमंत्री बने ओर भारत के निर्माण में अंत तक जुटे रहे| उन्होंने देश के विकास के लिए कई योजनायें बनाई, जिनमें आर्थिक ओर औद्योगिक प्रगति तथा वैज्ञानिक अनुसन्धान से लेकर साहित्य,कला, संस्कृति आदि क्षेत्र शामिल थे| नेहरू जी बच्चों के बीच चाचा नेहरू के रुप में जाने जाते थे| शांति अहिंसा ओर मानवता के हिमायती नेहरू ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वशांति ओर पंचशील के सिद्धांतो का प्रचार किया|   

प्रमुख रचनाएँ:- मेरी कहानी(आत्मकथा), विश्व इतिहास की झलक, हिंदुस्तान की कहानी, पिता के पत्र पुत्री के नाम(हिंदी अनुवाद), हिन्दुस्तान की समस्याएं, स्वाधीनता और उसके बाद, राष्ट्रपिता, भारत की बुनियादी एकता, लड़खड़ाती दुनिया आदि(लेखों और भाषणों का संग्रह)|

पाठ का सारांश

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा रचित निबंधात्मक लेख ‘भारत माता’ में भारत की धरती, संस्कृति और यहाँ के लोगो को ‘भारत माता’ की संज्ञा दी गयी है| इस पाठ में उन्होंने भारत माता के वास्तविक स्वरूप की चर्चा की है|

पाठ का सारांश इस प्रकार है :-

किसानों से वार्तालाप – जवाहरलाल जब भी एक जलसे से दूसरे जलसे में जाते थे तो वे वहां पर अपने श्रोताओं से ‘भारत माता’ के वास्तविक स्वरूप की चर्चा भी करते और उन्हें बताते थे कि किस प्रकार से उतर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सारा भारत देश एक ही है| उसकी समस्या एक-सी है|  वे उन्हें खैबर दरें से लेकर कन्याकुमारी तक का हाल सुनते थे और यह भी बताते थे कि जहां भी वे जाते है, देश के सभी किसान उनसे इसी प्रकार के सवाल किया करते है वह उन्हें बताते है कि सबकी समस्याएं यही है– गरीबी, कर्ज, पूंजीपतियों का शोषण, ज़मींदार, महाजन, कड़े लगान, सूद, पुलिस अत्याचार, और विदेशी शासन की दासता| नेहरू कोशिश करते कि सभी देशवासी पुरे हिन्दुस्तान के बारे में एक साथ सोचें तथा विदेशी शासन से छुटकारा पाएं|

विदेशी शासन की चर्चा-  जवाहरलाल नेहरू जलसों में अपने भाषणों एवं बातचित के दौरान चीन, स्पेन, अबीसीनिया, यूरोप, मिस्त्र और पश्चिमी एशिया में होने वाले संघर्षों का भी वर्णन किया करते थे| वे उन्हें रूस में हो रहे परिवर्तनों एवं अमेरिका की प्रगति के बारे में भी बताते रहते थे| यो तो किसानों को विदेशों के बारे में समझाना आसान नहीं दिखता था, पर नेहरू जी को यह काम कठिन नहीं लगा| कारण यह था कि किसानों ने पुराने महाकाव्यों तथा कथा-पुराणों की कथा-कहानियां पढ़-सुन रखी थी| कुछ लोगों ने तीर्थ-यात्राएं भी की थी| इसी बहाने वे चारों धामों की यात्राएं करके भारत के चारों कोनो से परिचित हो चुके थे| कुछ सिपाहियों ने बड़ी बड़ी लड़ाइयो में भाग लिया था| कुछ लोग और भी अधिक जागरूक थे| उन्हें सन् 1930  ईo के बाद आयी आर्थिक मंदी के कारण दूसरे देशों का हाल मालूम था|   

Pandit Jawahar Lal Nehru

भारत माता की जयके नारे पर नेहरू का प्रश्न– जलसों में कभी-कभी नेहरू जी का स्वागत ‘भारत माता की जय’ के नारों से होता था| तब किसानों से भारत माता के बारे में पूछते थे कि यह कौन है? प्राय: इस बारे में उन्हें कुछ ज्ञान नहीं होता था| एक हट्टे-कट्टे जाट किसान ने उन्हें बताया कि भारत माता का अर्थ है– भारत की धरती| तब नेहरू उनसे पूछते कि कौन-सी धरती- उनके गांव की धरती अथवा जिले, सूबे या पूरे देश की धरती| इस प्रश्न पर फिर सब किसान हैरान रह जाते |

 ‘भारत माता’ की व्याख्या– नेहरू जी उन्हें बताते थे कि ‘भारत माता’ वह सब तो है ही जो वह सोचते है, वह उससे भी अधिक, कुछ और भी है| यहाँ के नदी, पहाड़, जंगल, खेत और करोड़ों भारतीय सब मिलकर ‘भारत माता’ कहलाते है| ‘भारत माता’ की जय का मतलब है कि इन सबकी जय| जब वे लोग स्वं को भी भारत माता का अंग समझते थे तो उनकी आँखों में एक विशेष प्रकार की चमक आ जाती थी|

Bharat Mata Class 11th Question & Answers

Question 1: भारत की चर्चा नेहरू कब और किससे करते थे?

Ans: भारत की चर्चा नेहरू जलसे में आए श्रोताओं से करते थे। नेहरू जी प्रायः जलसों में जाते रहते थे। तब वह जलसे में आए हुए श्रोताओं से भारती की चर्चा किया करते थे।

Question 2: नेहरू जी भारत के सभी किसानों से कौन-सा प्रश्न बार-बार करते थे?

Ans: पं. नेहरू जी भारत के सभी किसानों से ‘भारतमाता की जय’ के विषय में प्रश्न बार-बार किया करते थे। वह उनसे पूछते थे कि किसान जिस भारतमाता की जय करते हैं, वह कौन है? नेहरू जी के इस प्रश्न पर जब लोग जवाब देते की धरती को वे भारतमाता कहते हैं, तो नेहरू जी उनसे फिर प्रश्न करते कि कौन-सी धरती के बारे में बात की जा रही है? इसमें वे अपने गाँव की धरती की बात कर रहे हैं। जिले, सूबे अथवा हिन्दुस्तान की बात कर रहे हैं। इस तरह वह किसानों से प्रश्न बार किया करते थे।

Question 3: दुनिया के बारे में किसानों को बताना नेहरू जी के लिए क्यों आसान था?

Ans: नेहरू जी किसानों को दुनिया के बारे में बताते थे। उन्हें इनके बारे में बताना नेहरू जी के लिए आसान था। किसान पुराणों तथा महाकाव्यों से जुड़ी कथा व कहानियों से अंजान नहीं थे। अतः इन्हीं के माध्यम से नेहरू जी ने देश के विषय में ज्ञान करवा दिया। जलसे में उन्हें इस तरह के लोग भी मिल जाते थे, जिन्होंने कई यात्राएँ तथा तीर्थ किए हुए थे। वे हिन्दुस्तान के कोने-कोने से वाकिफ थे। इनमें से कई सैनिक भी थे, जो युद्ध करने के लिए विदेशों में भी गए थे। अतः जब नेहरू जी दुनिया के बारे में उन्हें बताते, तो उनकी समझ में आ जाता था।

Question 4: किसान सामान्यतः भारत माता का क्या अर्थ लेते थे?

Ans: किसानों के अनुसार उनके देश की धरती ही भारतमाता थी। वह सामान्यतः भारतमाता का यही अर्थ लेते थे।

Question 5: भारतमाता के प्रति नेहरू जी की क्या अवधारण थी?

Ans: भारतमाता के प्रति नेहरू जी की अवधारण किसानों से बिलकुल अलग थी। उनका मानना था कि हमारे देश की धरती, खेत, पहाड़, जंगल, झरने इत्यादि इसके अंग हैं। मगर भारत के सभी लोग जो पूरे देश में हैं, सही मायनों में ये ही भारतमाता हैं।

Question 6: आजादी से पूर्व किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता था?

Ans: आजादी से पूर्व किसानों को इन समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

  • कर्ज से युक्त जीवन
  • भूखमरी
  • जमींदारों द्वारा शोषण
  • महाजनों द्वारा शोषण
  • आय से अधिक लगान

Question 7: आजादी से पहले भारत-निर्माण को लेकर नेहरू के क्या सपने थे? आजादी के बाद वे साकार हुए? चर्चा कीजिए।

Ans: आजादी से पहले भारत-निर्माण को लेकर नेहरू के ये सपने थे।

  • भारत को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाया जाए।
  • भारत का चहुँमुखी विकास हो।
  • भारत से गरीबी का उन्मूलन हो।
  • भारतीय किसानों की विपत्तियों की समाप्ति हो।
  • भारत में औद्योगिकी क्रांति तथा उसका विकास हो।

आजादी से पहले भारत-निर्माण को लेकर नेहरू ने जो सपने देखे थे, उनमें से कई साकार हो गए हैं। आज भारत आर्थिक रूप से मज़बूत बन गया है। भारत का चहुँमुखी विकास हो रहा है। भारत में औद्योगिकी क्रांति भी हुई है और आज उसका विकास चरम पर है। कुछ सपने हैं, जो आज भी सफल नहीं हुए हैं। आज भी किसानों की विपत्तियों का अंत नहीं हुआ है तथा गरीबी उन्मूलन नहीं हुआ है।

Question 8: भारत के विकास को लेकर आप क्या सपने देखते हैं? चर्चा कीजिए।

Ans: भारत के विकास को लेकर मैं बहुत से सपने देखती हूँ। वे इस प्रकार हैं-

  • चारों तरफ शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो। देश में कोई अशिक्षित न रहे।
  • भारत में कोई गरीब और भूखा न हो।
  • सबके पास पक्के मकान और हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ हों।
  • बेरोज़गारी समाप्त हो जाए।
  • भारत की आत्मनिर्भरता हर क्षेत्र में हो।
  • प्रदूषण की समस्या से निजात पा सकें।
  • देश की तेज़ी से बढ़ती आबादी को रोका जा सके।
  • भारत शीघ्र ही विकसित राष्ट्र कहलाए।

Question 9: आपकी दृष्टि में भारतमाता और हिन्दुस्तान की क्या संकल्पना है? बताइए।

Ans: मेरी दृष्टि में भारतमाता और हिन्दुस्तान की संकल्पना नेहरू जी की बतायी अवधारणा से अलग नहीं है। भारतामाता और हिन्दुस्तान मात्र धरती की संकल्पना से नहीं हो सकता। उसमें रहने वाले लोग उसे सुंदर और जीवंत बनाते हैं। उसमें रंग भरते हैं। उनके कारण ही एक धरती स्वरूप पाती है, और नाम पाती है। भारत का स्वरूप तो सबसे निराला है। उसके मस्तक में हिमालय मुकुट के रूप में और सागर उसके चरणों को धोता हुआ प्रतीत होता है। यहाँ सभी धर्मों के लोग प्रेम से साथ रहते हैं।

Question 10: वर्तमान समय में किसानों की स्थिति किस सीमा तक बदली है? चर्चा कर लिखिए।

Ans: वर्तमान समय में किसानों की स्थिति में बहुत बदलाव आया है। अब खेती में अत्याधुनिक मशीनों से काम लिया जाने लगा है। मगर यह अनुपात बहुत कम है। आज भी ऐसे स्थानों पर जो बहुत दूर हैं, वहाँ के किसानों की स्थिति पहले के समान ही है। प्रकृति की मार उनकी मेहनत को नष्ट कर रही है। कर्ज के बोझ तले दबकर वे आत्महत्या करने के लिए विवश हो रहे हैं। आज भी उनके बच्चे भूख से मर रहे हैं। सभी सुख-सुविधाओं से विहीन किसान विपन्नता का जीवन जीने के लिए मजबूर हैं।

Bharat Mata Class 11th MCQs

Q 1. ‘भारत माता’ किसके द्वारा रचित पाठ है?|

A. प्रेमचंद

B. जवाहर लाल नेहरू

C. कृष्ण नाथ

D. कृष्णचंद्र

Ans- B. जवाहर लाल नेहरू

Q 2. ‘भारत’ किस भाषा का शब्द है?

A. हिंदी

B. संस्कृत

C. फ़ारसी

D. अंग्रेज़ी

Ans- B. संस्कृत

Q 3. खैबर दर्रा किस दिशा में है?|

A. उत्तर-पश्चिम

B. उत्तर-पूर्व

C. दक्खिन-पूर्व

D. दक्खिन उत्तर

Ans- A. उत्तर-पश्चिम

Q 4. कन्याकुमारी किस दिशा में है?

A. पूर्व

B. पश्चिम

C. उत्तर

D. दक्षिण

Ans- D. दक्षिण

Q 5. सब से अधिक प्रश्न कौन पूछते थे?

A. मजदूर

B. किसान

C. व्यापारी

D. डॉक्टर

Ans- B. किसान

Q 6. भारत माता दरअसल क्या है?

A. ज़मीन

B. सेना

C. नेता

D. करोड़ों देशवासी

Ans- D. करोड़ों देशवासी

Q 7. किसने यह उत्तर दिया था- “भारतमाता से उनका मतलब धरती से है”?

A. जाट ने

B. अध्यापक ने

C. नेता ने

D. डॉक्टर ने

Ans- A. जाट ने

Q 8. ‘महदूद’ नज़रिया कैसा होता है?

A. विस्तृत

B. सीमित

C. मध्यम

D. निकृष्ट

Ans- A. विस्तृत

Q 9. ‘यक-साँ’ क्या होता है?

A. एक समान

B. अलग-अलग

C. विभाजित

D. मज़बूत

Ans- A. एक समान

Q 10. किस सन् के बाद आर्थिक मंदी पैदा हुई थी?

A. बीस

B. तीस

C. चालीस

D. पचास

Ans- B. तीस

Aatmparichaya

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हरिवंश राय बच्चन
जीवन परिचय-

कविवर हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर सन 1907 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1942-1952 ई० तक यहीं पर प्राध्यापक रहे। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। अंग्रेजी कवि कीट्स पर उनका शोधकार्य बहुत चर्चित रहा। वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबंद्ध रहे और फिर विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे। उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया। 1976 ई० में उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया गया। ‘दो चट्टानें’ नामक रचना पर उन्हें साहित्य अकादमी ने भी पुरस्कृत किया। उनका निधन 2003 ई० में मुंबई में हुआ।
रचनाएँ-हरिवंश राय बच्चन की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. काव्य-संग्रह- मधुशाला (1935), मधुबाला (1938), मधुकलश (1938), निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल-अंतर, मिलनयामिनी, सतरंगिणी, आरती और अंगारे, नए-पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ।
  2. आत्मकथा-क्या भूलें क्या याद करूं, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।
  3. अनुवाद-हैमलेट, जनगीता, मैकबेथ।
  4. डायरी-प्रवासी की डायरी।
    काव्यगत विशेषताएँ- बच्चन हालावाद के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। दोनों महायुद्धों के बीच मध्यवर्ग के विक्षुब्ध विकल मन को बच्चन ने वाणी दी। उन्होंने छायावाद की लाक्षणिक वक्रता की बजाय सीधी-सादी जीवंत भाषा और संवेदना से युक्त गेय शैली में अपनी बात कही। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में घटी घटनाओं की सहजअनुभूति की ईमानदार अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से की है। यही विशेषता हिंदी काव्य-संसार में उनकी प्रसिद्ध का मूलाधार है।
    भाषा-शैली-कवि ने अपनी अनुभूतियाँ सहज स्वाभाविक ढंग से कही हैं। इनकी भाषा आम व्यक्ति के निकट है। बच्चन का कवि-रूप सबसे विख्यात है उन्होंने कहानी, नाटक, डायरी आदि के साथ बेहतरीन आत्मकथा भी लिखी है। इनकी रचनाएँ ईमानदार आत्मस्वीकृति और प्रांजल शैली के कारण आज भी पठनीय हैं।

आत्मपरिचय
कवि का मानना है कि स्वयं को जानना दुनिया को जानने से ज्यादा कठिन है। समाज से व्यक्ति का नाता खट्टा-मीठा तो होता ही है। संसार से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं। दुनिया अपने व्यंग्य-बाण तथा शासन-प्रशासन से चाहे जितना कष्ट दे, पर दुनिया से कटकर मनुष्य रह भी नहीं पाता। क्योंकि उसकी अपनी अस्मिता, अपनी पहचान का उत्स, उसका परिवेश ही उसकी दुनिया है।
कवि अपना परिचय देते हुए लगातार दुनिया से अपने द्रविधात्मक और द्वंद्वात्मक संबंधों का मर्म उद्घाटित करता चलता है। वह पूरी कविता का सार एक पंक्ति में कह देता है।
असंभव आदर्श की तलाश में सारी दुनियादारी ठुकराकर उस भाव से कि जैसे दुनिया से इन्हें कोई वास्ता ही नहीं है। सार-कवि कहता है कि यद्यपि वह सांसारिक कठिनाइयों से जूझ रहा है, फिर भी वह इस जीवन से प्यार करता है। वह अपनी आशाओं और निराशाओं से संतुष्ट है। वह संसार से मिले प्रेम व स्नेह की परवाह नहीं करता क्योंकि संसार उन्हीं लोगों की जयकार करता है जो उसकी इच्छानुसार व्यवहार करते हैं। वह अपनी धुन में रहने वाला व्यक्ति है। वह निरर्थक कल्पनाओं में विश्वास नहीं रखता क्योंकि यह संसार कभी भी किसी की इच्छाओं को पूर्ण नहीं कर पाया है। कवि सुख-दुख, यश-अपयश, हानि-लाभ आदि द्वंद्वात्मक परिस्थितियों में एक जैसा रहता है। यह संसार मिथ्या है, अतरू यहाँ स्थायी वस्तु की कामना करना व्यर्थ है।
कवि संतोषी प्रवृत्ति का है। वह अपनी वाणी के जरिये अपना आक्रोश व्यक्त करता है। उसकी व्यथा शब्दों के माध्यम से प्रकट होती है तो संसार उसे गाना मानता है। संसार उसे कवि कहता है, परंतु वह स्वयं को नया दीवाना मानता है। वह संसार को अपने गीतों, द्वंद्वों के माध्यम से प्रसन्न करने का प्रयास करता है। कवि सभी को सामंजस्य बनाए रखने के लिए कहता है।

(1)
मैं जग द- जीवन का मार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँय
कर दिया किसी ने प्रकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हुँ !
मैं स्नेह-सुरा का पान किया कस्ता हूँ,
में कभी न जग का ध्यान किया करता हुँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ !

शब्दार्थ- जग-जीवन-सांसारिक गतिविधि। द्वकृत-तारों को बजाकर स्वर निकालना। सुरा-शराब। स्नेह-प्रेम। यान-पीना। ध्यान करना-परवाह करना। गाते-प्रशंसा करते।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंशराय बच्चन हैं।। इस कविता में कवि जीवन को जीने की शैली बताता है। साथ ही दुनिया से अपने द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर करता है।

व्याख्या- बच्चन जी कहते हैं कि मैं संसार में जीवन का भार उठाकर घूमता रहता हूँ। इसके बावजूद मेरा जीवन प्यार से भरा-पूरा है। जीवन की समस्याओं के बावजूद कवि के जीवन में प्यार है। उसका जीवन सितार की तरह है जिसे किसी ने छूकर झंकृत कर दिया है। फलस्वरूप उसका जीवन संगीत से भर उठा है। उसका जीवन इन्हीं तार रूपी साँसों के कारण चल रहा है। उसने स्नेह रूपी शराब पी रखी है अर्थात प्रेम किया है तथा बाँटा है। उसने कभी संसार की परवाह नहीं की। संसार के लोगों की प्रवृत्ति है कि वे उनको पूछते हैं जो संसार के अनुसार चलते हैं तथा उनका गुणगान करते हैं। कवि अपने मन की इच्छानुसार चलता है, अर्थात वह वही करता है जो उसका मन कहता है।
विशेष-

  1. कवि ने निजी प्रेम को स्वीकार किया है।
  2. संसार के स्वार्थी स्वभाव पर टिप्पणी की है।
  3. ‘स्नेह-सुरा’ व ‘साँसों के तार’ में रूपक अलंकार है।
  4. ‘जग-जीवन’, ‘स्नेह-सुरा’ में अनुप्रास अलंकार है।
  5. खड़ी बोली का प्रयोग है।
    (2)
    मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ
    मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
    है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
    मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।
    मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ
    सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ,
    जग भव-सागर तरने की नाव बनाए,
    मैं भव-मौजों पर मस्त बहा करता हूँ।

शब्दार्थ- उदगार-दिल के भाव। उपहार-भेंट। भाता-अच्छा लगता। स्वप्नों का संसार-कल्पनाओं की दुनिया। दहा-जला। भव-सागर-संसार रूपी सागर। मौज-लहरों।

व्याख्या- कवि अपने मन की भावनाओं को दुनिया के सामने कहने की कोशिश करता है। उसे खुशी के जो उपहार मिले हैं, उन्हें वह साथ लिए फिरता है। उसे यह संसार अधूरा लगता है। इस कारण यह उसे पसंद नहीं है। वह अपनी कल्पना का संसार लिए फिरता है। उसे प्रेम से भरा संसार अच्छा लगता है। .
वह कहता है कि मैं अपने हृदय में आग जलाकर उसमें जलता हूँ अर्थात मैं प्रेम की जलन को स्वयं ही सहन करता हूँ। प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के जो सुख-दुख आते हैं, उनमें मस्त रहता हूँ। यह संसार आपदाओं का सागर है। लोग इसे पार करने के लिए कर्म रूपी नाव बनाते हैं, परंतु कवि संसार रूपी सागर की लहरों पर मस्त होकर बहता है। उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।

विशेष-

  1. कवि ने प्रेम की मस्ती को प्रमुखता दी है।
  2. व्यक्तिवादी विचारधारा की प्रमुखता है।
  3. ‘स्वप्नों का संसार’ में अनुप्रास तथा ‘भव-सागर’ और ‘भव मौजों’ में रूपक अलंकार है।
  4. खड़ी बोली का स्वाभाविक प्रयोग है।
  5. तत्सम शब्दावली की बहुलता है।
  6. श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति है।

(3.)
मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादाँ’ में अवसाद लिए फिरता हुँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं , हाय, किसी की याद लिए फिरता हुँ !
कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं हैं, हाथ, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हुँ, सीखा ज्ञान भुलाना !

शब्दार्थ- यौवन-जवानी। उन्माद-पागलपन। अवसाद-उदासी, खेद। यत्न-प्रयास। नादान-नासमझ, अनाड़ी। दाना-चतुर, ज्ञानी। मूढ़-मूर्ख। जग-संसार।

व्याख्या- कवि कहता है कि उसके मन पर जवानी का पागलपन सवार है। वह उसकी मस्ती में घूमता रहता है। इस दीवानेपन के कारण उसे अनेक दुख भी मिले हैं। वह इन दुखों को उठाए हुए घूमता है। कवि को जब किसी प्रिय की याद आ जाती है तो उसे बाहर से हँसा जाती है, परंतु उसका मन रो देता है अर्थात याद आने पर कवि-मन व्याकुल हो जाता है।
कवि कहता है कि इस संसार में लोगों ने जीवन-सत्य को जानने की कोशिश की, परंतु कोई भी सत्य नहीं जान पाया। इस कारण हर व्यक्ति नादानी करता दिखाई देता है। ये मूर्ख (नादान) भी वहीं होते हैं जहाँ समझदार एवं चतुर होते हैं। हर व्यक्ति वैभव, समृद्ध, भोग-सामग्री की तरफ भाग रहा है। हर व्यक्ति अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए भाग रहा है। वे इतना सत्य भी नहीं सीख सके। कवि कहता है कि मैं सीखे हुए ज्ञान को भूलकर नई बातें सीख रहा हूँ अर्थात सांसारिक ज्ञान की बातों को भूलकर मैं अपने मन के कहे अनुसार चलना सीख रहा हूँ।

विशेष-

  1. पहली चार पंक्तियों में कवि ने आत्माभिव्यक्ति की है तथा अंतिम चार में सांसारिक जीवन के विषय में बताया है।
  2. ‘उन्मादों में अवसाद’ में विरोधाभास अलंकार है।
  3. ‘लिए फिरता हूँ’ की आवृत्ति से गेयता का गुण उत्पन्न हुआ है।
  4. ‘कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना’ पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है।
  5. ‘नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना’ में सूक्ति जैसा प्रभाव है।
  6. खड़ी बोली है।

(4)
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता,
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

शब्दार्थ- नाता-संबंध। वैभव-समृद्ध। पग-पैर। रोदन-रोना। राग-प्रेम। आग-जोश। भूय-राजा। प्रासाद-महल। निछावर-कुर्बान। खडहर-टूटा हुआ भवन। भाग-हिस्सा।

व्याख्या- कवि कहता है कि मुझमें और संसार-दोनों में कोई संबंध नहीं है। संसार के साथ मेरा टकराव चल रहा है। कवि अपनी कल्पना के अनुसार संसार का निर्माण करता है, फिर उसे मिटा देता है। यह संसार इस धरती पर सुख के साधन एकत्रित करता है, परंतु कवि हर कदम पर धरती को ठुकराया करता है। अर्थात वह जिस संसार में रह रहा है, उसी के प्रतिकूल आचार-विचार रखता है।
कवि कहता है कि वह अपने रोदन में भी प्रेम लिए फिरता है। उसकी शीतल वाणी में भी आग समाई हुई है अर्थात उसमें असंतोष झलकता है। उसका जीवन प्रेम में निराशा के कारण खंडहर-सा है, फिर भी उस पर राजाओं के महल न्योछावर होते हैं। ऐसे खंडहर का वह एक हिस्सा लिए घूमता है जिसे महल पर न्योछावर कर सके।

विशेष-

  1. कवि ने अपनी अनुभूतियों का परिचय दिया है।
  2. ‘कहाँ का नाता’ में प्रश्न अलंकार है।
  3. ‘रोदन में राग’ और ‘शीतल वाणी में आग’ में विरोधाभास अलंकार तथा ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘और’ की आवृत्ति में यमक अलंकार है।
  5. ‘कहाँ का’ और ‘जग जिस पृथ्वी पर’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।
  6. श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति है तथा खड़ी बोली का प्रयोग है।

(5)
मैं रोया, इसको तुम कहाते हो गाना,
मैं फूट पडा, तुम कहते, छंद बनाना,
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक क्या दीवान”
मैं बीवानों का वेश लिए फिरता हूँ
मैं मादकता निद्भाशष लिए फिरता ही
जिसकी सुनकर जय शम, झुकेय लहराए,
मैं मरती का संदेश लिए फिरता हुँ

शब्दार्थ- फूट पड़ा-जोर से रोया। दीवाना-पागल। मादकता-मस्ती। निरूशेष-संपूर्ण।

व्याख्या- कवि कहता है कि प्रेम की पीड़ा के कारण उसका मन रोता है। अर्थात हृदय की व्यथा शब्द रूप में प्रकट हुई। उसके रोने को संसार गाना मान बैठता है। जब वेदना अधिक हो जाती है तो वह दुख को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है। संसार इस प्रक्रिया को छंद बनाना कहती है। कवि प्रश्न करता है कि यह संसार मुझे कवि के रूप में अपनाने के लिए तैयार क्यों है? वह स्वयं को नया दीवाना कहता है जो हर स्थिति में मस्त रहता है।
समाज उसे दीवाना क्यों नहीं स्वीकार करता। वह दीवानों का रूप धारण करके संसार में घूमता रहता है। उसके जीवन में जो मस्ती शेष रह गई है, उसे लिए वह घूमता रहता है। इस मस्ती को सुनकर सारा संसार झूम उठता है। कवि के गीतों की मस्ती सुनकर लोग प्रेम में झुक जाते हैं तथा आनंद से झूमने लगते हैं। मस्ती के संदेश को लेकर कवि संसार में घूमता है जिसे लोग गीत समझने की भूल कर बैठते हैं।

विशेष-

  1. कवि मस्त प्रकृति का व्यक्ति है। यह मस्ती उसके गीतों से फूट पड़ती है।
  2. ‘कवि कहकर’ तथा ‘झूम झुके’ में अनुप्रास अलंकार और ‘क्यों कवि . अपनाए’ में प्रश्न अलंकार है।
  3. खड़ी बोली का स्वाभाविक प्रयोग है।
  4. ‘मैं’ शैली के प्रयोग से कवि ने अपनी बात कही है।
  5. श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति हुई है।
  6. ‘लिए फिरता हूँ’ की आवृत्ति गेयता में वृद्ध करती है।
  7. तत्सम शब्दावली की प्रमुखता है।