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Rubaiya Gazal Class 12th Poem Summary

Rubaiya Gazal Class 12th Poem Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों

आज हम कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग- 2 का पाठ 9 पढ़ेंगे

रुबाइयां’ व ‘गज़ल

Rubaiya & Gazal Class 12th Chapter 9 Hindi Aroh Part 2

कविताओं के रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं।

कविता के सार और व्याख्या समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

कवि परिचय: फ़िराक गोरखपुरी

Firaq Gorakhpuri

जीवन परिचय: फ़िराक गोरखपुरी उर्दू-फ़ारसी के जाने-माने शायर थे। इनका जन्म 28 अगस्त, सन 1896 को गोरखपुर में हुआ था। इनका मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ था। इन्होंने रामकृष्ण की कहानियों से अपनी शिक्षा की शुरुआत की। बाद में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण की। 1917 ई० में ये डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुए, परंतु स्वतंत्रता आंदोलन के कारण इन्होंने 1918 ई० में इस पद को त्याग दिया। आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण सन 1920 में इन्हें डेढ़ वर्ष की जेल हुई। ये इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विषय के अध्यापक भी रहे। इन्हें ‘गुले-नग्मा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड मिला। सन 1983 में इनका निधन हुआ।

इनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं: गुले-नग्मा, बज्में जिंदगी: रंगे-शायरी, उर्दू गजलगोई।

काव्यगत विशेषताएँ: उर्दू शायरी साहित्य का बड़ा हिस्सा रुमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभरकर सामने आए हैं। नजीर अकबराबादी, इल्ताफ हुसैन हाली जैसे कुछ शायरों ने इस परंपरा को तोड़ा है, फिराक गोरखपुरी भी उनमें से एक हैं। फ़िराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है। इंसान के हाथों इंसान पर जो गुजरती है, उसकी तल्ख सच्चाई और आने वाले कल के प्रति एक उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर उन्होंने अपनी शायरी का अनूठा महल खडा किया।

भाषा-शैली: उर्दू शायरी अपने लाक्षणिक प्रयोगों और चुस्त मुहावरेदारी के लिए प्रसिद्ध है। शेर लिखे नहीं, कहे जाते हैं। यह एक तरह का संवाद होता है। मीर, गालिब की तरह फिराक ने भी इस शैली को साधकर आम-आदमी या साधारण-जन से अपनी बात कही है।

प्रतिपादय एवं सार: रुबाइयां

(क) रुबाइयाँ

प्रतिपादय: फ़िराक की रुबाइयाँ उनकी रचना ‘गुले-नग्मा’ से उद्धृत हैं। रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन शैली है। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक मिलाया जाता है और तीसरी पंक्ति स्वतंत्र होती है। इन रुबाइयों में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है। इन्हें पढ़ने से सूरदास के वात्सल्य वर्णन की याद आती है।

सार: इस रचना में कवि ने वात्सल्य वर्णन किया है। माँ अपने बच्चे को आँगन में खड़ी होकर अपने हाथों में प्यार से झुला रही है। वह उसे बार-बार हवा में उछाल देती है जिसके कारण बच्चा खिलखिलाकर हँस उठता है। वह उसे साफ़ पानी से नहलाती है तथा उसके उलझे हुए बालों में कंघी करती है। बच्चा भी उसे प्यार से देखता है जब वह उसे कपड़े पहनाती है। दीवाली के अवसर पर शाम होते ही पुते व सजे हुए घर सुंदर लगते हैं। चीनी-मिट्टी के खिलौने बच्चों को खुश कर देते हैं। वह बच्चों के छोटे घर में दीपक जलाती है जिससे बच्चों के सुंदर चेहरों पर दमक आ जाती है। आसमान में चाँद देखकर बच्चा उसे लेने की जिद पकड़ लेता है। माँ उसे दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाती है और उसे कहती है कि दर्पण में चाँद उतर आया है। रक्षाबंधन एक मीठा बंधन है। रक्षाबंधन के कच्चे धागों पर बिजली के लच्छे हैं। सावन में रक्षाबंधन आता है। सावन का जो संबंध झीनी घटा से है, घटा का जो संबंध बिजली से है वहीं संबंध भाई का बहन से है।

व्याख्या: 

आंगन में लिये चांद के टुकड़े को खड़ी

हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी

रह-रह के हवा में जो लोका देती है

गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हंसी

संदर्भ: प्रस्तुत रुबाई आरोह पाठ्यपुस्तक से अवतरित की गयी है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं।

प्रसंग: शायर ने यहां पर लोक-जीवन से जुड़े हुए कुछ पारंपरिक और धरेलु दृश्यों को अपनी शायरी में पेश किया है।

व्याख्या: यहां पर एक माता और उसके नन्हे बच्चे के प्रेम और खेल के आनंद का चित्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमें कि एक पुत्रवती महिला अपने घर के आंगन में अपने प्यारे और नन्हे से बच्चे को अपने दोनों हाथों में झूला झुला रही है। बीच-बीच में वह बच्चे को हवा में उछाल भी देती है। तब बच्चा खिलखिलाकर हंसता है। उसकी किलकारियों से आंगन गूंजने लगता है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस है।

2 दृश्य-बिंबों से शायरी भरी पड़ी है, जैसे – ‘हाथों पे झुलाती है’, ‘हवा में जो लोका देती है’, -खिलखिलाते बच्चे की हंसी’,

3 ‘आंगन में लिये चांद के टुकड़े को खड़ी’ – रूपक अलंकार।

4 ‘चांद के टुकडे़’ में मुहावरा प्रयोग।

5 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

6 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

नहला के छलके-छलके निर्मल जल से

उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके

किस प्यार से देखता है बच्चा मुंह को

जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े

व्याख्या: शायर ने दूसरा चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें मां ने अपने बच्चे को साफ पानी से नहला दिया है। फिर उसके उलझे हुए बालों को कंघी से सुलझा दिया है। जब मां उसे अपने दोनों घुटनों के बीच में फंसा कर कपड़े पहनाती है, तब बच्चा अपनी माता को बेहद प्यार भरी आंखों से निहारता है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस है।

2 दृश्य बिंब – ‘उलझे हुए गेसुओं में’, ‘घुटनियों में लेके है पिन्हाती कपड़े’,

3 ‘नहला के छलके-छलके निर्मल जल से’- अनुप्रास अलंकार।

4 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

5 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

दीवाली की शाम घर पुते और सजे

चीनी के खिलौने जगमगाते लावे

वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक

बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए

व्याख्या: तीसरी रुबाई में दीपावली का बिंब है। दीपावली के त्योहार की शाम का समय है। सभी घर पुते और सजे हुए हैं। शक्कर के खिलौने बच्चों के लिये लाये गये हैं। दियों में लाई भरी हुई है। ऐसे में एक सुंदर माता, जिसका मुख कोमलता और स्नेह से चमक रहा है, अपने नन्हे बच्चे के बनाये हुए घरौंदे में भी दीपक जलाकर रख रही है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस है।

2 दृष्य बिंब – ‘घरौंदे में जलाती है दिए’।

3 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

4 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

आंगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है

बालक तो हई चांद पै ललचाया है

दर्पण उसे दे के कह रही है मां

देख आईने में चांद उतर आया है

व्याख्या: यहां पर एक रूठे हुए बच्चे का बिंब है। एक हठी बच्चा घर के आंगन में रो रहा है। उसका रोना साधारण रोना नहीं है। ठुनकना है। जिसमें आग्रह है, प्रेम है, और अपनी इच्छा पूरी कराने का दबाव भी है। असल में वह आसमान में जगमगाने वाले चांद को पाने के लिये हठ ठाने हुए है। इसके उपाय में मां ने यह किया कि उसे आईना दिखाकर कहा कि लो चांद तुम्हारे आईने में उतर आया है।

पद विशेष:

1 वात्सल्य रस।

2 दृश्य बिंब – ‘आंगन में ठुनक रहा है’, ‘आईने में चांद उतर आया है’।

3 ‘देख आईने में चांद उतर आया है’- मानवीकरण अलंकार।

4 लोक-भाषा का प्रयोग हुआ है।

5 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली

छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी

बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे

भाई के है बांधती चमकती राखी

व्याख्या: इस रुबाई में रक्षाबंधन के त्यौहार का चित्रण है। भाद्र माह में आने वाले रक्षाबंधन के त्यौहार पर सबेरे से ही आनंद और मिठास का वातावरण बन गया है। जल की फुहारें बरस रही हैं। आकाश में हल्की घटाएं छायी हैं। राखी के धागे भी बिजली की तरह चमक रहे हैं। ऐसी चमकदार राखियां, बहनें अपने भाईयों की कलाई पर बांध रही हैं।

पद विशेष:

1 शांत रस है।

2 दृश्य बिंब – ‘छायी है घटा’, ‘भाई के है बांधती चमकती राखी’

3 ‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे’ – उपमा अलंकार।

4 लोकभाषा का प्रयोग हुआ है।

5 उर्दू-हिंदी से मिलकर बनी हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग हुआ है।

6 रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

प्रतिपाद्य और सार: गज़ल

(ख) गजल

प्रतिपादय: रुबाइयों की तरह फ़िराक की गजलों में भी हिंदी समाज और उर्दू शायरी की परंपरा भरपूर है। इस गजल में दर्द और पीड़ा के साथ-साथ शायर की ठसक भी अंतर्निहित है।

सार- इस गजल के माध्यम से शायर कहता है कि लोगों ने हमेशा उस पर कटाक्ष किए हैं और साथ ही उसकी किस्मत ने भी कभी उसका साथ नहीं दिया। गम उसके साथ हमेशा रहा। उसे लगता है जैसे रात का सन्नाटा उसे बुला रहा है। शायर कहता है कि इश्क वही कर सकता है जो अपना सब कुछ खो देता है। जब शराबी शराब पिलाते हैं तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आ जाती है। अंतिम शेर में वह यह स्वीकार करता है कि उसकी गजलों पर मीर की गजलों का प्रभाव है।

नौरस गुंचे पंखडियों की नाजुक गिरहैं खोले हैं

या उड़ जाने को रंगो-बू गुलशन में पर तोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में बसंत ऋतु का वर्णन किया गया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि बसंत ऋतु में नए रस से भरी कलियों की कोमल पंखुड़ियों की गाँठे खुल रही हैं। वे धीरे-धीरे फूल बनने की ओर अग्रसर हैं। ऐसा लगता है मानो रंग और सुगंध-दोनों आकाश में उड़ जाने के लिए पंख फड़फड़ा रहे हों। दूसरे शब्दों में, बाग में कलियाँ खिलते ही सुगंध फैल जाती है।

विशेष:

  1. प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर वर्णन है।
  2. उर्दू-फारसी भाषा का प्रयोग है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. बिंब योजना है।
  5. संदेह अलंकार है।
  6. रंग व खुशबू पर मानवीय क्रियाओं के आरोपण से मानवीकरण अलंकार है।

तारे आँखें झपकावें हैं जर्रा–जर्रा सोये हैं

तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में उद्धृत ‘गज़ल’ से संकलित है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने रात के तारों का सौंदर्य वर्णन किया है।

व्याख्या: शायर कहता है कि रात ढल रही है। अब तारे भी आँखें झपका रहे हैं। इस समय सृष्टि का कण-कण सो रहा है, शांत है। वह कहता है कि हे मित्रो! रात में पसरा यह सन्नाटा भी कुछ कह रहा है। यह भी अपनी वेदना व्यक्त कर रहा है।

विशेष:

  1. प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण है।
  2. ‘जर्रा-जर्रा’  में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  3. ‘सन्नाटे का बोलना’ में मानवीकरण तथा विरोधाभास अलंकार है।
  4. तारों का मानवीकरण किया गया है।
  5. उर्दू शब्दावली है।
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हम हों या किस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला

किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से लिया गया है। इसके रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने मनुष्य के दोषारोपण करने की प्रवृत्ति के विषय में बताया है।

व्याख्या: शायर कहता है कि संसार में मेरी किस्मत और मैं खुद दोनों ही एक जैसे हैं। हम दोनों एक ही काम करते हैं। अभाव के लिए मैं अपनी किस्मत को दोषी मानता हूँ तथा इसलिए किस्मत पर रोता हूँ। किस्मत मेरी दशा को देखकर रोती है। वह शायद मेरी हीन कर्मनिष्ठा को देखकर झल्लाती है।

विशेष:

  1. निराशा व अकर्मण्यता पर व्यंग्य है।
  2. उर्दू-फारसी शब्दों का प्रयोग है।
  3. ‘किस्मत’ को मानवीय क्रियाएँ करते हुए दिखाया गया है। अत: मानवीकरण अलंकार है।
  4. गजल छंद है।
  5. ‘हम’ कहना उर्दू की पहचान है।

जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें

मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से लिया गया है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने निंदकों पर प्रहार किया है।

व्याख्या: शायर कहता है कि संसार में कुछ लोग उसे बदनाम करना चाहते हैं। ऐसे निंदकों के लिए कवि कामना करता है कि वे केवल यह बात समझ सकें कि वे मेरी जो बुराइयाँ संसार के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, उससे खुद उनकी कमियाँ उजागर हो रही हैं। वे मेरा परदा खोलने की बजाय अपना परदा खोल रहे हैं।

विशेष:

  1. शायर ने दूसरों को बदनाम करने वालों पर व्यंग्य किया है।
  2. उर्दू भाषा का प्रयोग है।
  3. गजल छंद है।
  4. भाषा में प्रवाह है।

ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास

तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने प्रेम की कीमत अदा करने के बारे में बताया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि हम पूरे विवेक के साथ तुम्हारे प्रेम के लिए पूरी कीमत अदा कर रहे हैं। हम तुम्हारे प्रेम का सौदा करने वाले हैं, इसके लिए हम दीवाना बनने को भी तैयार हैं। कवि कहता है कि जो प्रेमी है, वह समाज की नजरों में पागल होता है।

विशेष:

  1. कवि ने प्रेम के संपूर्ण समर्पण का वर्णन किया है।
  2. उर्दू शब्दावली का प्रभावी प्रयोग है।
  3. ‘कीमत अदा करना’ मुहावरे का प्रयोग है।
  4. गजल छंद है।

तेरे गम का पासे-अदब हैं कुछ दुनिया का खयाल भी हैं

सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने प्रेम की पीड़ा को व्यक्त किया है।

व्याख्या: कवि अपनी प्रेमिका से कहता है कि मुझे तुम्हारे गम का पूरा ख्याल है। मैं तुम्हारी पीड़ा का सम्मान करता हूँ, परंतु मुझे संसार का भी ध्यान है। यदि मैं हर जगह तुम्हारे दिए दुख को सबके सामने गाता फिरूं तो दुनिया हमारे प्रेम को बदनाम करेगी। इसलिए मैं इस पीड़ा को अपने हृदय में छिपा लेता हूँ और चुपचाप अकेले में रो लेता हूँ। आशय यह है कि प्रेमी अपने दुख को संसार के सामने प्रकट नहीं करते।

विशेष:

  1. कवि ने विरह-भावना का प्रभावी चित्रण किया है।
  2. उर्दू मिश्रित हिंदी भाषा है।
  3. ‘चुपके-चुपके’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. गजल छंद है।
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

फितरत का कायम हैं तवाजुन आलमे हुस्नो-इश्क में भी

उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रेम की प्राप्ति का उपाय बताया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि प्रेम और सौंदर्य के संसार में संतुलन कायम है। इसमें हम उतना ही प्रेम पा सकते हैं जितना हम स्वयं को खोते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रेम में पहले स्वयं को मिटाना पड़ता है। जो व्यक्ति जितना अधिक समर्पण करता है, वह उतना ही प्रेम पाता है।

विशेष:

  1. कवि ने प्रेम के स्वभाव को स्पष्ट किया गया है।
  2. कबीर के साथ भाव-साम्य है जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि। मैं बपुरा खोजन चला, रहा किनारे बैठि।
  3. ‘खोकर पाने में’  विरोधाभास अलंकार है।
  4. उर्दू-मिश्रित हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. गजल छंद है।

आबो-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो

ये जगमग बैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने अपने काव्य-सृजन का आधार अपनी व्यथा बताया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि तुम्हें मेरी शायरी में जो चमक-दमक दिखाई देती है, उस पर फ़िदा मत होओ। तुम्हें अपनी आँखें खुली रखनी चाहिए अर्थात ध्यान से देखना चाहिए। मेरे शेरों में जो चमक है, वह मेरे आँसुओं की देन है। दूसरे शब्दों में, कवि की पीड़ा से उसके काव्य में दर्द उभरकर आया है।

विशेष:

  1. कवि ने विरह को काव्य के सृजन का आधार बताया है।
  2. बच्चन ने भी कहा है-
    मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
    मैं फूट पड़ा, तुम कहते छंद बनाना।
  3. ‘मोती रोले’विरह को व्यक्त करता है।
  4. ‘आँखें रखना’ मुहावरे का सुंदर प्रयोग है।
  5. उर्दू की कठिन शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
  6. ‘आबो-ताब’ में अनुप्रास अलंकार है।
  7. वियोग श्रृंगार रस है।

ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को

रात गए गर्दूं पै फ़रिश्ते बाबे-गुनह जग खोले है|

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल” से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रियजन की यादों का बखान किया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि हे प्रिय! तुम वियोग के समय में इस तरीके से याद आते हो जैसे शराब की महफ़िल में शराबियों को शराब की याद आती है तथा जैसे आधी रात के समय देवदूत आकाश में संसार के पापों का अध्याय खोलते हैं।

विशेष:

  1. विरहावस्था का सुंदर चित्रण है।
  2. ‘अंजुमने-मय, रिंदों, गर्दू, फरिश्ते, बाबे-गुनह’ आदि फ़ारसी शब्दों का सुंदर प्रयोग है।
  3. गजल छंद है।
  4. माधुर्य गुण है।
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

सदके फिराक एजाज-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज

इन गजलों के परदों में तो ‘मीर’ की गजलें बोले हैं।

प्रसंग: प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में शायर अपनी शायरी पर ही मुग्ध है।

व्याख्या: फिराक कहते हैं कि उसकी गजलों पर लोग मुग्ध होकर कहते हैं कि फिराक, तुमने इतनी अच्छी शायरी कहाँ से सीख ली? इन गजलों के शब्दों से हमें ‘मीर’ कवि की गजलों की-सी समानता दिखाई पड़ती है। भाव यह है कि कवि की शायरी प्रसिद्ध कवि ‘मीर’ के समान उत्कृष्ट है।

विशेष:

  1. कवि अपनी प्रशंसा स्वयं करता है।
  2. उर्दू शब्दावली की बहुलता है।
  3. गजल छंद है।
  4. ‘उड़ा लेना’ मुहावरे का अर्थ है-चुराना।
  5. गेयता है।

बच्चों! टेक्स्ट और वीडियो के माध्यम से पढ़ाया गया पाठ ‘रुबाइयां’ व ‘गज़ल आपको कैसा लगा? हमें कमेंट करके अवश्य बताएं।

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