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Ek Phool Ki Chah Class 9 Summary

Ek Phool Ki Chah Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग की कविता पढ़ेंगे

‘एक फूल की चाह’

कविता सियारामशरण गुप्त द्वारा रचित है।

This Post Includes

बच्चों! कविता का भावार्थ समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि परिचय: सियारामशरण गुप्त

(1895-1963)

जीवन परिचय: सियारामशरण गुप्त का जन्म झाँसी के निकट चिरगांव में सन् 1895 में हुआ था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इनके बड़े भाई थे| गुप्त जी के पिता भी कविताये लिखते थे। सियारामशरण गुप्त की मृत्यु 1963 को हुई थी। 

पाठ-प्रवेश

‘एक फूल की चाह’ गुप्त जी की एक लंबी और प्रसिद्ध कविता है। प्रस्तुत पाठ उसी कविता का एक छोटा सा भाग है। यह पूरी कविता छुआछूत की समस्या पर केंद्रित है। मरने के नज़दीक पहुँची एक ‘अछूत’ कन्या के मन में यह इच्छा जाग उठी कि काश! देवी के चरणों में अर्पित किया हुआ एक फूल लाकर कोई उसे दे देता। उस कन्या के पिता ने बेटी की इस इच्छा को पूरा करने का बीड़ा उठाया। वह देवी के मंदिर में जा पहुँचा। देवी की आराधना भी की, पर उसके बाद वह देवी के भक्तों की नज़र में खटकने लगा। मानव-मात्र को एकसमान मानने की नसीहत देने वाली देवी के सवर्ण भक्तों ने उस विवश, लाचार, आकांक्षी मगर ‘अछूत’ पिता के साथ कैसा सलूक किया, क्या वह अपनी बेटी को फूल लाकर दे सका? यह हम इस कविता के माध्यम से जानेंगे।

एक फूल की चाह

उद्वेलित कर अश्रु राशियाँ,

हृदय-चिताएँ धधकाकर,

महा महामारी प्रचंड हो

फैल रही थी इधर-उधर।

क्षीण कंठ मृतवत्साओं का

करुण रुदन दुर्दांत नितांत,

भरे हुए था निज कृश रव में

हाहाकार अपार अशांत।

शब्दार्थ:

उद्वेलित – भाव-विह्नल

अश्रु-राशियाँ – आँसुओं की झड़ी

महामारी – बडे़ स्तर पर फैलने वाली बीमारी

प्रचंड – तीव्र

क्षीण – दबी आवाज़, कमज़ोर

मृतवत्सा – जिस माँ की संतान मर गई हो

रुदन – रोना

दुर्दांत – जिसे दबाना या वश में करना कठिन हो

नितांत – बिलकुल, अलग, अत्यंत

कृश – पतला, कमज़ोर।

सन्दर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श भाग-1 के काव्य खंड की कविता एक फूल की चाह से ली गयी है| जो कवि सियारामशरण गुप्त जी द्वारा लिखी गयी है|

व्याख्या: कवि कहता है कि एक बडे़ स्तर पर फैलने वाली बीमारी बहुत भयानक रूप से फैली हुई थी, जिसने लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाते हुए आँखों से आँसुओं की नदियाँ बहा दी थी। कहने का तात्पर्य यह है कि उस महामारी ने लोगों के मन में भयानक डर बैठा दिया था। कवि कहता है कि उस महामारी के कारण जिन औरतों ने अपनी संतानों को खो दिया था, उनके कमजोर पड़ते गले से लगातार दिल को दहला देने वाला ऐसा दर्द निकल रहा था जिसे दबाना बहुत कठिन था। उस कमजोर पड़ चुके दर्द भरे रोने में भी अत्यधिक अशांति फैलाने वाला हाहाकार छिपा हुआ था।

बहुत रोकता था सुखिया को,

‘न जा खेलने को बाहर’,

नहीं खेलना रुकता उसका

नहीं ठहरती वह पल-भर।

मेरा हृदय काँप उठता था,

बाहर गई निहार उसे;

यही मनाता था कि बचा लूँ

किसी भाँति इस बार उसे।

शब्दार्थ:

निहार – देखना।

व्याख्या: कवि कहता है कि इस कविता का मुख्य पात्र अपनी बेटी जिसका नाम सुखिया था, उसको बार-बार बाहर जाने से रोकता था। लेकिन सुखिया उसकी एक न मानती थी और खेलने के लिए बाहर चली जाती थी। वह कहता है कि सुखिया का न तो खेलना रुकता था और न ही वह घर के अंदर टिकती थी। जब भी वह अपनी बेटी को बाहर जाते हुए देखता था तो उसका हृदय डर के मारे काँप उठता था। वह यही सोचता रहता था कि किसी तरह उसकी बेटी उस महामारी के प्रकोप से बच जाए। वह किसी तरह इस महामारी की चपेट

में न आए।

भीतर जो डर रहा छिपाए,

हाय! वही बाहर आया।

एक दिवस सुखिया के तनु को

ताप-तप्त मैंने पाया।

ज्वर में विह्वल हो बोली वह,

क्या जानूँ किस डर से डर,

मुझको देवी के प्रसाद का

एक फूल ही दो लाकर।

शब्दार्थ:

तनु – शरीर

ताप-तप्त – ज्वर से पीड़ित।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता को जिस बात का डर था वही हुआ। एक दिन सुखिया के पिता ने पाया कि सुखिया का शरीर बुखार से तप रहा था। कवि कहता है कि उस बच्ची ने बुखार के दर्द में भी अपने पिता से कहा कि उसे किसी का डर नहीं है। उसने अपने पिता से कहा कि वह तो बस देवी माँ के प्रसाद का एक फूल चाहती है ताकि वह ठीक हो जाए।

क्रमश: कंठ क्षीण हो आया,

शिथिल हुए अवयव सारे,

बैठा था नव नव उपाय की

चिंता में मैं मनमारे।

जान सका न प्रभात सजग से

हुई अलस कब दोपहरी,

स्वर्ण घनों में कब रवि डूबा,

कब आई संध्या गहरी।

शब्दार्थ:

शिथिल – कमजोर, ढीला

अवयव – अंग

स्वर्ण घन – सुनहरे बादल।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया का गला इतना कमजोर हो गया था कि उसमें से आवाज़ भी नहीं आ रही थी। उसके शरीर का अंग-अंग कमजोर हो चूका था। उसका पिता किसी चमत्कार की आशा में नए-नए तरीके अपना रहा था परन्तु उसका मन हमेशा चिंता में ही डूबा रहता था। चिंता में डूबे सुखिया के पिता को न तो यह पता चलता था कि कब सुबह हो गई और कब आलस से भरी दोपहर ढल गई। कब सुनहरे बादलों में सूरज डूबा और कब शाम हो गई। कहने का तात्पर्य यह है कि सुखिया का पिता सुखिया की चिंता में इतना डूबा रहता था कि उसे किसी बात का होश ही नहीं रहता था।

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सभी ओर दिखलाई दी बस,

अंधकार की ही छाया,

छोटी-सी बच्ची को ग्रसने

कितना बड़ा तिमिर आया!

ऊपर विस्तृत महाकाश में

जलते से अंगारों से,

झुलसी जाती थी आँखें

जगमग जगते तारों से।

शब्दार्थ:

ग्रसना – निगलना

तिमिर – अंधकार।

व्याख्या: कवि कहता है कि चारों ओर बस अंधकार ही अंधकार दिखाई दे रहा था जिसे देखकर ऐसा लगता था जैसे कि इतना बड़ा अंधकार उस मासूम बच्ची को निगलने चला आ रहा था। कवि कहता है कि बच्ची के पिता को ऊपर विशाल आकाश में चमकते तारे ऐसे लग रहे थे जैसे जलते हुए अंगारे हों। उनकी चमक से उसकी आँखें झुलस जाती थीं। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि बच्ची का पिता उसकी चिंता में सोना भी भूल गया था जिस कारण उसकी आँखे दर्द से झुलस रही थी।

देख रहा था जो सुस्थिर हो

नहीं बैठती थी क्षण-भर,

हाय! वही चुपचाप पड़ी थी

अटल शांति-सी धारण कर।

सुनना वही चाहता था मैं

उसे स्वयं ही उकसाकर-

मुझको देवी के प्रसाद का

एक फूल ही दो लाकर!

शब्दार्थ:

सुस्थिर – जो कभी न रुकता हो

अटल – जिसे हिलाया न जा सके।

व्याख्या: कवि कहता है कि जो बच्ची कभी भी एक जगह शांति से नहीं बैठती थी, वही आज इस तरह न टूटने वाली शांति धारण किए चुपचाप पड़ी हुई थी। कवि कहता है कि उसका पिता उसे झकझोरकर खुद ही पूछना चाहता था कि उसे देवी माँ के प्रसाद का फूल चाहिए और वह उसे उस फूल को ला कर दे।

ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर

मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;

स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे

पाकर समुदित रवि-कर-जाल।

दीप-धूप से आमोदित था

मंदिर का आँगन सारा;

गूँज रही थी भीतर-बाहर

मुखरित उत्सव की धारा।

शब्दार्थ:

विस्तीर्ण – फैला हुआ

सरसिज – कमल

रविकर जाल – सूर्य-किरणों का समूह

आमोदित – आनंदपूर्ण।

व्याख्या: कवि मंदिर का वर्णन करता हुआ कहता है कि पहाड़ की चोटी के ऊपर एक विशाल मंदिर था। उसके विशाल आँगन में कमल के फूल सूर्य की किरणों में इस तरह शोभा दे रहे थे जिस तरह सूर्य की किरणों में सोने के घड़े चमकते हैं। मंदिर का पूरा आँगन धूप और दीपकों की खुशबू से महक रहा था। मंदिर के अंदर और बाहर माहौल ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ कोई उत्सव हो।

भक्त-वृंद मृदु-मधुर कंठ से

गाते थे सभक्ति मुद-मय, –

‘पतित-तारिणी पाप-हारिणी,

माता, तेरी जय-जय-जय!’

‘पतित तारिणी, तेरी जय जय’

मेरे मुख से भी निकला,

बिना बढ़े ही मैं आगे को

जाने किस बल से ढ़िकला!

शब्दार्थ:

सभक्ति – भक्ति के साथ

ढिकला – धकेला गया।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब सुखिया का पिता मंदिर गया तो वहाँ मंदिर में भक्तों के झुंड मधुर आवाज में एक सुर में भक्ति के साथ देवी माँ की आराधना कर रहे थे। वे एक सुर में गा रहे थे ‘पतित तारिणी पाप हारिणी, माता तेरी जय जय जय। ‘सुखिया के पिता के मुँह से भी देवी माँ की स्तुति निकल गई, ‘पतित तारिणी, तेरी जय जय’। फिर उसे ऐसा लगा कि किसी अनजान शक्ति ने उसे मंदिर के अंदर धकेल दिया।

मेरे दीप-फूल लेकर वे

अंबा को अर्पित करके

दिया पुजारी ने प्रसाद जब

आगे को अंजलि भरके,

भूल गया उसका लेना झट,

परम लाभ-सा पाकर मैं।

सोचा, – बेटी को माँ के ये

पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं।

शब्दार्थ:

अंजलि – दोनों हाथों से।

व्याख्या: कवि कहता है कि पुजारी ने सुखिया के पिता के हाथों से दीप और फूल लिए और देवी की प्रतिमा को अर्पित कर दिया। फिर जब पुजारी ने उसे दोनों हाथों से प्रसाद भरकर दिया तो एक पल को वह ठिठक-सा गया। क्योंकि सुखिया का पिता छोटी जाति का था और छोटी जाति के लोगों को मंदिर में आने नहीं दिया जाता था। सुखिया का पिता अपनी कल्पना में ही अपनी बेटी को देवी माँ का प्रसाद दे रहा था।

सिंह पौर तक भी आँगन से

नहीं पहुँचने मैं पाया,

सहसा यह सुन पड़ा कि – “कैसे

यह अछूत भीतर आया?

पकड़ो देखो भाग न जावे,

बना धूर्त यह है कैसा;

साफ-स्वच्छ परिधान किए है,

भले मानुषों के जैसा!

शब्दार्थ:

सिंह पौर – मंदिर का मुख्य द्वार

परिधान – वस्त्र।

व्याख्या: कवि कहता है कि अभी सुखिया का पिता प्रसाद ले कर मंदिर के द्वार तक भी नहीं पहुँच पाया था कि अचानक किसी ने पीछे से आवाज लगाई, “अरे, यह अछूत मंदिर के भीतर कैसे आ गया? इसे पकड़ो कही यह भाग न जाए।” किसी ने कहा कि इस चालाक नीच को तो देखो, कैसे साफ़ कपड़े पहने है, ताकि कोई इसे पहचान न सके। कवि यहाँ यह दर्शाना चाहता है कि निम्न जाति वालों का मंदिर में जाना अच्छा नहीं माना जाता था।

पापी ने मंदिर में घुसकर

किया अनर्थ बड़ा भारी;

कलुषित कर दी है मंदिर की

चिरकालिक शुचिता सारी।”

ऐं, क्या मेरा कलुष बड़ा है

देवी की गरिमा से भी;

किसी बात में हूँ मैं आगे

माता की महिमा के भी?

शब्दार्थ:

कलुषित – अशुद्ध

चिरकालिक – लम्बे समय से

शुचिता – पवित्रता।

व्याख्या: कवि कहता है कि किसी ने कहा कि मंदिर में आए हुए सभी भक्त सुखिया के पिता को पापी कह रहे थे। वे कह रहे थे कि सुखिया के पिता ने मंदिर में घुसकर बड़ा भारी अनर्थ कर दिया है और लम्बे समय से बनी मंदिर की पवित्रता को अशुद्ध कर दिया है। इस पर सुखिया के पिता ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता था कि माता की महिमा के आगे उसकी अशुद्धता अधिक भारी हो। सुखिया के पिता के कहने का तात्पर्य यह था कि जब माता ने ही सभी मनुष्यों को बनाया है तो उसके मंदिर में आने से मंदिर अशुद्ध कैसे हो सकता है।

माँ के भक्त हुए तुम कैसे,

करके यह विचार खोटा?

माँ के सम्मुख ही माँ का तुम

गौरव करते हो छोटा!

कुछ न सुना भक्तों ने, झट से

मुझे घेरकर पकड़ लिया;

मार-मारकर मुक्के-घूँसे

धम्म-से नीचे गिरा दिया!

शब्दार्थ:

खोटा – बुरा, घटिया

सम्मुख – सामने।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता ने भक्तों से कहा कि उसके मंदिर में आने से मंदिर अशुद्ध हो गया है इस तरह का घटिया विचार यदि तुम सब के मन में है तो तुम माता के भक्त कैसे हो सकते हो। यदि वे लोग उसकी अशुद्धता को माता की महिमा से भी ऊँचा मानते हैं तो वे माता के ही सामने माता को नीचा दिखा रहे हैं। लेकिन उसकी बातों का किसी पर कोई असर नहीं हुआ। लोगों ने उसे घेर लिया और उसपर घूँसों और लातों की बरसात करके उसे नीचे गिरा दिया।

मेरे हाथों से प्रसाद भी

बिखर गया हा! सबका सब,

हाय! अभागी बेटी तुझ तक

कैसे पहुँच सके यह अब।

न्यायालय ले गए मुझे वे,

सात दिवस का दंड-विधान

मुझको हुआ; हुआ था मुझसे

देवी का महान अपमान!

शब्दार्थ:

अभागी – जिसका बुरा भाग्य हो

न्यायालय – न्याय करने का स्थान।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब भक्तों ने सुखिया के पिता की पिटाई की तो उसके हाथों से सारे का सारा प्रसाद बिखर गया। वह दुखी हो गया और सोचने लगा कि उसकी बेटी का भाग्य कितना बुरा है क्योंकि अब उसकी बेटी तक प्रसाद नहीं पहुँचने वाला था। लोग उसे न्यायलय ले गये। वहाँ उसे सात दिन जेल की सजा सुनाई गई। अब सुखिया के पिता को लगने लगा कि अवश्य ही उससे देवी का अपमान हो गया है। तभी उसे सजा मिली है।

मैंने स्वीकृत किया दंड वह

शीश झुकाकर चुप ही रह;

उस असीम अभियोग, दोष का

क्या उत्तर देता, क्या कह?

सात रोज ही रहा जेल में

या कि वहाँ सदियाँ बीतीं,

अविश्रांत बरसा के भी

आँखें तनिक नहीं रीतीं।

शब्दार्थ:

स्वीकृत – स्वीकार कर

अविश्रांत – बिना विश्राम के।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता ने सिर झुकाकर चुपचाप उस दंड को स्वीकार कर लिया। उसके पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था। इसलिए वह नहीं जानता था कि क्या कहना चाहिए। जेल के वे सात दिन सुखिया के पिता को ऐसे लगे थे जैसे कई सदियाँ बीत गईं हों। उसकी आँखें बिना रुके  बरसने के बाद भी बिलकुल नहीं सूखी थीं।

दंड भोगकर जब मैं छूटा,

पैर न उठते थे घर को;

पीछे ठेल रहा था कोई

भय जर्जर तनु पंजर को।

पहले की-सी लेने मुझको

नहीं दौड़कर आई वह;

उलझी हुई खेल में ही हा!

अबकी दी न दिखाई वह।

शब्दार्थ:

ठेल – धकेलना

जर्जर – थका।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब सुखिया का पिता जेल से छूटा तो उसके पैर उसके घर की ओर नहीं उठ रहे थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे डर से भरे हुए उसके शरीर को कोई धकेल कर उसके घर की ओर ले जा रहा था। जब वह घर पहुँचा तो हमेशा की तरह उसकी बेटी दौड़कर उससे मिलने नहीं आई। न ही वह उसे कहीं खेल में उलझी हुई दिखाई दी।

उसे देखने मरघट को ही

गया दौड़ता हुआ वहाँ,

मेरे परिचित बंधु प्रथम ही

फूँक चुके थे उसे जहाँ।

बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर

छाती धधक उठी मेरी,

हाय! फूल सी कोमल बच्ची

हुई राख की थी ढ़ेरी।

शब्दार्थ:

मरघट – शमशान

बंधु – रिश्तेदार।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया के पिता को घर पहुँचने पर जब सुखिया कहीं नहीं मिली तब उसे सुखिया की मौत का पता चला। वह अपनी बच्ची को देखने के लिए सीधा दौड़ता हुआ शमशान पहुँचा जहाँ उसके रिश्तेदारों ने पहले ही उसकी बच्ची का अंतिम संस्कार कर दिया था। अपनी बेटी की बुझी हुई चिता देखकर उसका कलेजा जल उठा। उसकी सुंदर फूल सी कोमल बच्ची अब राख के ढ़ेर में बदल चुकी थी।

अंतिम बार गोद में बेटी,

तुझको ले न सका मैं हा!

एक फूल माँ का प्रसाद भी

तुझको दे न सका मैं हा।

व्याख्या: कवि कहता है कि सुखिया का पिता सुखिया के लिए दुःख मनाता हुआ रोने लगा। उसे अफसोस हो रहा था कि वह अपनी बेटी को अंतिम बार गोदी में न ले सका। उसे इस बात का भी बहुत दुःख हो रहा था कि उसकी बेटी ने उससे केवल माता के मंदिर का एक फूल लाने को कहा था वह अपनी बेटी को वह देवी का प्रसाद भी न दे सका।

Ek Phool Ki Chah Class 9th Question and Answers

एक फूल की चाह प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

कविता की उन पंक्तियों को लिखिए, जिनसे निम्नलिखित अर्थ का बोध होता है –

प्रश्न 1. सुखिया के बाहर जाने पर पिता का हृदय काँप उठता था।

उत्तर: मेरा हृदय काँप उठता था,

बाहर गई निहार उसे;

यही मनाता था कि बचा लूँ

किसी भाँति इस बार उसे।

प्रश्न 2. पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर की अनुपम शोभा।

उत्तर: ऊँचे शैल शिखर के ऊपर

मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;

स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे

पाकर समुदित रवि कर जाल।

प्रश्न 3. पुजारी से प्रसाद/पूफल पाने पर सुखिया के पिता की मनःस्थिति।

उत्तर: भूल गया उसका लेना झट,

परम लाभ सा पाकर मैं।

सोचा, बेटी को माँ के ये,

पुण्य पुष्प दूँ जाकर मैं।

प्रश्न 4. पिता की वेदना और उसका पश्चाताप।

उत्तर: अंतिम बार गोद में बेटी,

तुझको ले न सका मैं हा!

एक फूल माँ का प्रसाद भी

तुझको दे न सका मैं हा।

प्रश्न 5. बीमार बच्ची ने क्या इच्छा प्रकट की?

उत्तर: बीमार बच्ची ने अपने पिता के सामने इच्छा प्रकट की कि उसे देवी माँ के प्रसाद का फूल चाहिए।

प्रश्न 6. सुखिया के पिता पर कौन सा आरोप लगाकर उसे दंडित किया गया?

उत्तर: सुखिया के पिता पर मंदिर को अशुद्ध करने का आरोप लगाया गया। वह अछूत जाति का था इसलिए उसे मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था। दंड स्वरूप सुखिया के पिता को सात दिन जेल में रहने की सजा दी गई।

प्रश्न 7. जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता ने बच्ची को किस रूप में पाया?

उत्तर: जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता को उसकी बच्ची कहीं नहीं दिखी तो उसके रिश्तेदारों से उसे पता चला कि उसकी बच्ची मर चुकी है और उसका अंतिम संस्कार किया जा चूका है। परन्तु जब वह शमशान पहुँचा तो उसे उसकी बच्ची राख के ढ़ेर के रूप में मिली।

प्रश्न 8. इस कविता का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: इस कविता में छुआछूत की प्रथा के बारे में बताया गया है। इस कविता का मुख्य पात्र एक अछूत है। उसकी बेटी एक महामारी की चपेट में आ जाती है। बेटी को ठीक करने के लिए वह मंदिर जाता है ताकि देवी माँ के प्रसाद का फूल ले आये। मंदिर में भक्त लोग उसकी जमकर धुनाई करते हैं। क्योंकि वह अछूत हो कर भी मंदिर में आया थस। फिर उसे दंड के रूप में सात दिन की जेल हो जाती है क्योंकि एक अछूत होने के नाते वह मंदिर को अशुद्ध करने का दोषी पाया जाता है। जब वह जेल से छूटता है तो पाता है कि उसकी बेटी स्वर्ग सिधार चुकी है और उसका अंतिम संस्कार भी हो चुका है। एक सामाजिक कुरीति के कारण एक व्यक्ति को इतना भी अधिकार नहीं मिलता है कि वह अपनी बीमार बच्ची की एक छोटी सी इच्छा पूरी कर सके। बदले में उसे जो मिलता है वह है प्रताड़ना और घोर दुख।

निम्नलिखित पंक्तियों का आश्य स्पष्ट करते हुए उनका अर्थ सौंदर्य बताइए

प्रश्न 1. अविश्रांत बरसा करके भी आँखें तनिक नहीं रीतीं

उत्तर: उसकी आँखों से लगातार आँसू बरसने के बावजूद अभी भी आँखे सूखी हो गई थीं। यह पंक्ति शोक की चरम सीमा को दर्शाती है। कहा जाता है कि कोई कभी कभी इतना रो लेता है कि उसकी अश्रुधारा तक सूख जाती है।

प्रश्न 2. बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर छाती धधक उठी मेरी

उत्तर: उधर चिता बुझ चुकी थी, इधर सुखिया के पिता की छाती जल रही थी। यहाँ एक पिता का दुःख दर्शाया गया है जो अंतिम बार भी अपनी बेटी को न देख सका।

प्रश्न 3. हाय! वही चुपचाप पड़ी थी अटल शांति सी धारण कर

उत्तर: जो बच्ची कभी भी एक जगह स्थिर नहीं बैठती थी, आज वही चुपचाप पत्थर की भाँति पड़ी हुई थी। यहाँ बच्चीको महामारी से ग्रस्त दर्शाया गया है।

प्रश्न 4. पापी ने मंदिर में घुसकर किया अनर्थ बड़ा भारी

उत्तर: सुखिया के पिता को मंदिर में देखकर एक भक्त कहता है कि इस पापी ने मंदिर में प्रवेश करके बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया, मंदिर को अपवित्र कर दिया। क्योंकि वह अछूत था और अछूत को मंदिर में आने का कोई अधिकार नहीं दिया गया था।

पाठ से जुड़े दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.

आपके विचार से मंदिर की पवित्रता और देवी की गरिमा को कौन ठेस पहुँचा रहा था और कैसे?

उत्तर:

मेरे विचार से तथाकथित उच्च जाति के भक्तगण मंदिर की पवित्रता और देवी की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे थे, सुखिया का पिता नहीं, क्योंकि वे जातीय आधार पर सुखिया के पिता को अपमानित करते हुए देवी के सामने ही मार-पीट रहे थे। वे जिस देवी की गरिमा नष्ट होने की बात कर रहे थे, वह तो स्वयं पतित पाविनी हैं तो एक पतित के आने से न तो देवी की गरिमा नष्ट हो रही थी और न मंदिर की पवित्रता। ऐसा सोचना उन तथाकथित उच्च जाति के भक्तों की संकीर्ण सोच और अमानवीयता थी।

प्रश्न 2.

‘एक फूल की चाह’ कविता में देवी के भक्तों की दोहरी मानसिकता उजागर होती हैं। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

‘एक फूल की चाह’ कविता में देवी के उच्च जाति के भक्तगण जोर-ज़ोर से गला फाड़कर चिल्ला रहे थे, “पतित-तारिणी पाप-हारिणी माता तेरी जय-जय-जय!” वे माता को भक्तों का उद्धार करने वाली, पापों को नष्ट करने वाली, पापियों का नाश करने वाली मानकर जय-जयकार कर रहे थे। उसी बीच एक अछूत भक्त के मंदिर में आ जाने से वे उस पर मंदिर की पवित्रता और देवी की गरिमा नष्ट होने का आरोप लगा रहे थे। जब देवी पापियों का नाश करने वाली हैं तो एक पापी या अछूत उनकी गरिमा कैसे कम कर रहा था। भक्तों की ऐसी सोच से उनकी दोहरी मानसिकता उजागर होती है।

प्रश्न 3.

महामारी से सुखिया पर क्या प्रभाव पड़ा? इससे उसके पिता की दशा कैसी हो गई?

उत्तर:

महामारी की चपेट में आने से सुखिया को बुखार हो आया। उसका शरीर तेज़ बुखार से तपने लगा। तेज बुखार के कारण वह बहुत बेचैन हो रही थी। इस बेचैनी में उसका उछलना-कूदना न जाने कहाँ खो गया। वह भयभीत हो गई और देवी के प्रसाद का एक फूल पाने में अपना कल्याण समझने लगी। उसके बोलने की शक्ति कम होती जा रही थी। धीरे-धीरे उसके अंग शक्तिहीन हो गए। उसकी यह दशा देखकर सुखिया का पिता चिंतित हो उठा। उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। सुखिया के पास चिंतातुर बैठे हुए उसे यह भी पता नहीं चल सका कि कब सूर्य उगा, कब दोपहर बीतकर शाम हो गई।

प्रश्न 4.

सुखिया को बाहर खेलते जाता देख उसके पिता की क्या दशा होती थी और क्यों?

उत्तर:

सुखिया को बाहर खेलते जाता देखकर सुखिया के पिता का हृदय काँप उठता था। उसके मन को एक अनहोनी-सी आशंका भयभीत कर रही थी, क्योंकि उसकी बस्ती के आसपास महामारी फैल रही थी। उसे बार-बार डर सता रहा था कि कहीं उसकी पुत्री सुखिया भी महामारी की चपेट में न आ जाए। वह इस महामारी से अपनी पुत्री को बचाए रखना चाहता था। उसे महामारी का परिणाम पता था, इसलिए अपनी पुत्री की रक्षा के प्रति चिंतित और आशंकित हो रहा था।

प्रश्न 5.

(क) सुखिया के पिता को मंदिर में देखकर भक्तों ने क्या-क्या कहना शुरू कर दिया?

(ख) सुखिया के पिता के अनुसार, भक्तगण देवी की गरिमा को किस तरह चोट पहुँचा रहे थे?

(ग) “मनुष्य होने की गरिमा’ किस तरह नष्ट की जा रहीं थी?

उत्तर:

(क) अपनी बेटी की इच्छा को पूरी करने के लिए देवी को प्रसाद स्वरूप फूल लेने सुखिया के पिता को मंदिर में देखकर भक्तों ने कहा कि इस अछूत ने मंदिर में घुसकर भारी पाप कर दिया है। उसने मंदिर की चिरकालिक पवित्रता को नष्ट कर दिया है।

(ख) सुखिया के पिता का कहना था कि देवी तो पापियों का उद्धार करने वाली हैं। यह बात भक्त जन भी मानते हैं। फिर एक पापी के मंदिर में आने से देवी की गरिमा और पवित्रता किस तरह खंडित हो सकती है।

(ग) भक्तगण मनुष्य होकर भी एक मनुष्य सुखिया के पिता को जाति के आधार पर पापी मान रहे थे, उसे अछूत मान रहे थे। इस तरह वे मनुष्य होने की गरिमा नष्ट कर रहे थे।

Agni Path Class 9 Hindi Chapter 12 Summary, Explanation

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जीवन परिचयः हरिवंशराय बच्चन (1907-2003)

जीवन परिचयः हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव बाबूपट्टी में हुआ था। इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था।

हरिवंश राय बच्चन अनेक वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक रहे। कुछ समय के लिए हरिवंश राय बच्चन आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से जुड़े रहे।

Harivansh Rai Bachchan

उन्होंने साहस और सत्यता के साथ सीधी-सादी भाषा शैली में अपनी कविताएं लिखीं। इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना और जीवन-दर्शन के स्वर मिलते हैं। इनकी मृत्यु 2003 में हुई।

बच्चन की प्रमुख कृतियाँ हैः मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, मिलन-यामिनी, आरती और अंगारे, टूटती चट्टाने, रूप तरंगिणी (सभी कविता-संग्रह) और आत्मकथा के चार खंडरू क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।

पाठ-प्रवेशः

प्रस्तुत कविता में कवि ने संघर्ष से भरे जीवन को ‘अग्नि पथ’ कहते हुए मनुष्य को यह संदेश दिया है कि हमें अपने जीवन के रास्ते में सुख रूपी छाँह की इच्छा न करते हुए अपनी मंशिल की ओर मेहनत के साथ बिना थकान महसूस किए बढ़ते ही जाना चाहिए। कविता में शब्दों की पुनरावृत्ति कैसे मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, यह देखने योग्य है।

अग्निपथ कविता का सारः

हरिवंश राय बच्चन की कविता अग्निपथ में कवि ने हमें यह संदेश दिया है कि जीवन संघर्ष का ही नाम है। और उन्होंने यह कहा है कि इस संघर्ष से घबराकर कभी थमना नहीं चाहिए, बल्कि कर्मठतापूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए। कवि के अनुसार, हमें अपने जीवन में आने वाले संघर्षों का खुद ही सामना करना चाहिए। चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमें किसी से मदद नहीं माँगनी चाहिए। अगर हम किसी से मदद ले लेंगे, तो हम कमजोर पड़ जायेंगे और हम जीवन-रूपी संघर्ष को जीत नहीं पाएंगे। खुद के परिश्रम से सफलता प्राप्त करना ही इस कविता का प्रमुख लक्ष्य है।

पाठ व्याख्या (अग्नि पथ)

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने, हों बड़े,

एक पत्र छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थ :

अग्नि पथ – कठिनाइयों से भरा हुआ मार्ग, आगयुक्त मार्ग

पत्र – पत्ता

छाँह – छाया

व्याख्याः कवि मनुष्यों को सन्देश देता है कि जीवन में जब कभी भी कठिन समय आता है तो यह समझ लेना चाहिए कि यही कठिन समय तुम्हारी  असली परीक्षा का है। ऐसे समय में हो सकता है कि तुम्हारी मदद के लिए कई हाथ आगे आएँ, जो हर तरह से तुम्हारी मदद के लिए सक्षम हो लेकिन हमेशा यह याद रखना चाहिए कि यदि तुम्हे जीवन में सफल होना है तो कभी भी किसी भी कठिन समय में किसी की मदद नहीं लेनी चाहिए। स्वयं ही अपने रास्ते पर कड़ी मेहनत साथ बढ़ते रहना चाहिए।

तू न थकेगा कभी!

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी! कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थः

शपथ – कसम, सौगंध

व्याख्या: कवि मनुष्यों को समझाते हुए कहता है कि जब जीवन सफल होने के लिए कठिन रास्ते पर चलने का फैसला कर लो तो मनुष्य को एक प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि चाहे मंजिल तक पहुँचाने के रास्ते में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आए मनुष्य को कभी भी मेहनत करने से थकेगा नहीं, कभी रुकेगा नहीं और ना ही कभी पीछे मुड़ कर देखेगा।

यह महान दृश्य है

चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थः

अश्रु – आँसू

स्वेद – पसीना

रक्त – खून, शोणित

लथपथ – सना हुआ

व्याख्याः कवि मनुष्यों को सन्देश देते हुए कहता है कि जब कोई मनुष्य किसी कठिन रास्ते से होते हुए अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ता है तो उसका वह संघर्ष  देखने योग्य होता है अर्थात दूसरों के लिए प्रेरणा दायक होता है। कवि कहता है कि अपनी मंजिल पर वही मनुष्य पहुँच पाते हैं जो आँसू, पसीने और खून से सने हुए अर्थात कड़ी मेहनत कर के आगे बढ़ते हैं।

Agni Path Poem Important Question & Answers

प्रश्न 1: घने वृक्ष और एक पत्र-छाँह का क्या अर्थ है? अग्निपथ कविता के अनुसार लिखिए।

उत्तरः ‘घने वृक्ष’ मार्ग में मिलने वाली सुविधा के प्रतीक हैं। इनका आशय है-जीवन की सुख-सुविधाएँ। ‘एक पत्र-छाँह’ का प्रतीकार्थ है-थोड़ी-सी सुविधा।

प्रश्न 2: चल रहा मनुष्य है। अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, पथपथ। पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः कवि देखता है कि जीवन पथ में बहुत-सी कठिनाइयाँ होने के बाद भी मनुष्य उनसे हार माने बिना आगे बढ़ता जा रहा है। कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए वह आँसू, पसीने और खून से लथपथ है। मनुष्य निराश हुए बिना बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 3: अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ से क्या आशय है? अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए।

त्तरः अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ का आशय है-संकटों से पूरी तरह ग्रस्त मनुष्य। मार्ग में आने वाले कष्टों को झेलता हुआ तथा परिश्रम की थकान को दूर करता हुआ मनुष्य अपने-आप में सुन्दर होता जाता है।

प्रश्न 4: कवि मनुष्य से क्या अपेक्षा करता है? अग्नि पथ कविता के आधार पर लिखिए।

उत्तरः कवि मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह अपना लक्ष्य पाने के लिए सतत प्रयास करे और लक्ष्य पाए बिना रुकने का नाम न ले।

प्रश्न 5: अग्निपथ कविता का केन्द्रीय भाव लिखिए।

उत्तरः इस कविता का मूल भाव है निरन्तर संघर्ष करते हुए जियो। कवि जीवन को अग्निपथ अर्थात् आग से भरा पथ मानता है। इसमें पग-पग पर चुनौतियाँ और कष्ट हैं। मनुष्य को इन चुनौतियों से नहीं घबराना चाहिए और इनसे मुँह भी नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि आँसू पीकर, पसीना बहाकर तथा खून से लथपथ होकर भी निरन्तर संघर्ष पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

प्रश्न 6: अग्निपथ में क्या नहीं माँगना चाहिए?

उत्तरः ‘अग्निपथ’ अर्थात् दृ संघर्षमयी जीवन में हमें चाहे अनेक घने वृक्ष मिलें, परंतु हमें एक पत्ते की छाया की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। किसी भी सहारे के सुख की कामना नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न 7: अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए कि क्या घने वृक्ष भी हमारे मार्ग की बाधा बन सकते हैं?

उत्तरः अग्निपथ कविता में संघर्षमय जीवन को अग्निपथ कहा गया है और सुख-सुविधाओं को घने वृक्षों की छाया। कभी-कभी जीवन में मिलने वाली सुख-सुविधाएँ (घने वृक्षों की छाया) व्यक्ति को अकर्मण्य बना देती है और वे सफलता के मार्ग में बाधा बन जाते हैं इसीलिए कवि जीवन को अग्नि पथ कहता है। घने वृक्षों की छाया की आदत हमें आलसी बनाकर सफलता से दूर कर देती है।

प्रश्न 8: कवि हरिवंश राय बच्चन ने मनुष्य से किस बात की शपथ लेने का आग्रह किया है और क्यों?

उत्तरः कवि ने मनुष्य से आग्रह किया है कि यह जीवन-मार्ग कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ है। जीवन की राह पर आगे बढ़ते हुए वह कभी निरुत्साहित नहीं होगा। जीवन की राह सरल नहीं है। यह बहुत कठिन है। वह कभी थकान महसूस नहीं करेगा। न शारीरिक न मानसिक। रास्ते में कभी नहीं रुकेगा। रुकना ही मौत है, जीवन की समाप्ति है। इसलिए कवि मनुष्य से इस बात की शपथ दिलाता है कि वह संघर्ष भरे मार्ग पर निरंतर आगे ही बढ़ता रहेगा। वह न तो कभी रुकेगा, न थकेगा और न ही कभी संघर्ष से मुँह मोड़ेगा।