Tag: stri shiksha ke virodhi kutarkon ka khandan class 10

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarkon Ka Khandan Summary

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarkon Ka Khandan Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक

क्षितिज भाग-2 का पाठ पढ़ेंगे

‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarkon Ka Khandan Chapter 15

पाठ के लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं।

This Post Includes

  1. लेखक का जीवन परिचय
  2. पाठ प्रवेश
  3. पाठ का सार
  4. प्रश्नोत्तर
  5. परीक्षा उपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचयः महावीर प्रसाद द्विवेदी

जीवन परिचयः हिंदी के योग निर्माता, भाषा के संस्कारकर्ता एवं उत्कृष्ट निबंधकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1864 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर नामक गांव में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण शिक्षाक्रम सुचारु रुप से नहीं चल सका। अपने स्वध्याय से ही उन्होंने संस्कृत, हिंदी, बंगाली, मराठी, फारसी, गुजराती, अंग्रेजी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वे तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएं भेजने लगे।

उन्होंने रेलवे के तार-विभाग में नौकरी की। बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह साहित्य सेवा में जुट गए। सरस्वती पत्रिका के संपादक का कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा से हिंदी साहित्य को नियंत्रित करके निखारा और उसकी अभूतपूर्व श्री वृधि की। सन् 1931 में काशी नगरी प्रचारिणी सभा ने इनको आचार्य की तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन ने ‘वाचस्पति’ की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1938 में हिंदी का यह है यशस्वी आचार्य परलोक वासी हो गया।

पाठ प्रवेशः

प्रस्तुत लेख विचारात्मक लेख है। इस लेख के माध्यम से लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ऐसी सभी पुरानी रुढ़ियों एवं परंपराओं का विरोध किया है जो स्त्रीदृ शिक्षा को व्यर्थ अथवा समाज के विघटन का कारण मानती है। यह लेख पहली बार सितंबर 1914 की सरस्वती में ‘पढ़ेदृलिखो का पांडित्य’ नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। बाद में ‘महिला मोद’ नामक पुस्तक में शामिल करते समय द्विवेदी जी ने इसका शीर्षक बदल कर ‘स्त्रीदृशिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ रख दिया। प्रस्तुत लेख में द्विवेदी जी ने सड़ीदृगली परंपराओं को ज्यों के त्यों न अपनाकर अपने विवेकपूर्ण दृष्टि से फैसला लेकर ग्रहण करने के योग्य बातों को ही अपनाने के लिए कहा है। समाज में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अनेक स्त्रीदृपुरुषों ने लंबा संघर्ष किया। लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से आगे निकल गई है। वर्तमान नवजागरण काल में स्त्रीदृशिक्षा के विकास के साथ-साथ जनतांत्रिक एवं वैज्ञानिक चेतना के संपूर्ण विकास के लिए अलख जगाया।

पाठ का सारः

इस पाठ में लेखक ने स्त्री शिक्षा के महत्व को प्रसारित करते हुए उन विचारों का खंडन किया है। लेखक को इस बात का दुःख है आज भी ऐसे पढ़े-लिखे लोग समाज में हैं जो स्त्रियों का पढ़ना गृह-सुख के नाश का कारण समझते हैं। विद्वानों द्वारा दिए गए तर्क इस तरह के होते हैं, संस्कृत के नाटकों में पढ़ी-लिखी या कुलीन स्त्रियों को गँवारों की भाषा का प्रयोग करते दिखाया गया है। शकुंतला का उदहारण एक गँवार के रूप में दिया गया है जिसने दुष्यंत को कठोर शब्द कहे। जिस भाषा में शकुंतला ने श्लोक वो गँवारों की भाषा थी। इन सब बातों का खंडन करते हुए लेखक कहते हैं की क्या कोई सुशिक्षित नारी प्राकृत भाषा नही बोल सकती। बुद्ध से लेकर महावीर तक ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में ही दिए हैं तो क्या वो गँवार थे। लेखक कहते हैं की हिंदी, बांग्ला भाषाएँ आजकल की प्राकृत हैं। जिस तरह हम इस जमाने में हिंदी, बांग्ला भाषाएँ पढ़कर शिक्षित हो सकते हैं उसी तरह उस जमाने में यह अधिकार प्राकृत को हासिल था। फिर भी प्राकृत बोलना अनपढ़ होने का सबूत है यह बात नही मानी जा सकती।

जिस समय नाट्य-शास्त्रियों ने नाट्य सम्बन्धी नियम बनाए थे उस समय सर्वसाधारण की भाषा संस्कृत नही थी। इसलिए उन्होंने उनकी भाषा संस्कृत और अन्य लोगों और स्त्रियों की भाषा प्राकृत कर दिया। लेखक तर्क देते हुए कहते हैं कि शास्त्रों में बड़े-बड़े विद्वानों की चर्चा मिलती है किन्तु उनके सिखने सम्बन्धी पुस्तक या पांडुलिपि नही मिलतीं उसी प्रकार प्राचीन समय में नारी विद्यालय की जानकारी नही मिलती तो इसका अर्थ यह तो नही लगा सकते की सारी स्त्रियाँ गँवार थीं। लेखक प्राचीन काल की अनेकानेक शिक्षित स्त्रियाँ जैसे शीला, विज्जा के उदारहण देते हुए उनके शिक्षित होने की बात को प्रामणित करते हैं। वे कहते हैं की जब प्राचीन काल में स्त्रियों को नाच-गान, फूल चुनने, हार बनाने की आजादी थी तब यह मत कैसे दिया जा सकता है की उन्हें शिक्षा नही दी जाती थी। लेखक कहते हैं मान लीजिये प्राचीन समय में एक भी स्त्री शिक्षित नही थीं, सब अनपढ़ थीं उन्हें पढ़ाने की आवश्यकता ना समझी गयी होगी परन्तु वर्तमान समय को देखते हुए उन्हें अवश्य शिक्षित करना चाहिए।

लेखक पिछड़े विचारधारावाले विद्वानों से कहते हैं की अब उन्हें अपने पुरानी मान्यताओं में बदलाव लाना चाहिए। जो लोग स्त्रियों को शिक्षित करने के लिए पुराणों के हवाले माँगते हैं उन्हें श्रीमद्भागवत, दशमस्कंध के उत्तरार्ध का तिरेपनवां अध्याय पढ़ना चाहिए जिसमे रुक्मिणी हरण की कथा है। उसमे रुक्मिणी ने एक लम्बा-चैड़ा पत्र लिखकर श्रीकृष्ण को भेजा था जो प्राकृत में नहीं था। वे सीता, शकुंतला आदि के प्रसंगो का उदहारण देते हैं जो उन्होंने अपने पतियों से कहे थे। लेखक कहते हैं अनर्थ कभी नही पढ़ना चाहिए। शिक्षा बहुत व्यापक शब्द है, पढ़ना उसी के अंतर्गत आता है। आज की माँग है की हम इन पिछड़े मानसिकता की बातों से निकलकर सबको शिक्षित करने का प्रयास करें। प्राचीन मान्यताओं को आधार बनाकर स्त्रियों को शिक्षा से वंचित करना अनर्थ है।

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarko Ka Khandan Chapter 15 Q/A

प्रश्नोत्तर

प्रश्न-1. स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री शिक्षा का समर्थन किया?

उत्तरः द्विवेदी जी ने पुराने जमाने के ऐसे कितने उदाहरण दिए हैं जिनमें पढ़ी लिखी स्त्रियों का उल्लेख हुआ है। इन उदाहरणों की मदद से वे इस कुतर्क को झुठलाना चाहते हैं कि पुराने जमाने में स्त्रियों को पढ़ाने की परंपरा नहीं थी। वे ये भी बताते हैं कि शायद पुराने जमाने में स्त्रियों को विधिवत शिक्षा देने की जरूरत नहीं पड़ी होगी। लेकिन जब हम जरूरत के हिसाब से हर पद्धति को बदल सकते हैं तो स्त्री शिक्षा के बारे में भी हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है।

प्रश्न-2. ‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’ – कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः द्विवेदी जी नए बताया है कि पुरुषों ने स्त्रियों की तुलना में कहीं ज्यादा अनर्थ किए हैं। पुरुषों ने युद्ध में मार काट मचाई है, चोरी की है, डाका डाला है और अन्य कई अपराध किए हैं। इसलिए शिक्षा को अनर्थ के लिए दोष देना उचित नहीं है।

प्रश्न-3. द्विवेदी जी ने स्त्री शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है – जैसे ‘यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं।’ आप ऐसे अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिखिए।

उत्तरः ‘सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने का ही नतीजा है।’ – इस व्यंग्य में उन्होंने उस मानसिकता पर प्रहार किया है जो हर गलत घटना के लिए स्त्रियों की शिक्षा को जिम्मेदार ठहराता है। ‘स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट।‘ – इस पंक्ति के द्वारा द्विवेदी जी स्त्री शिक्षा के विरोधियों की दोहरी मानसिकता के बारे में बता रहे हैं।

प्रश्न-4. पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है- पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः पुराने जमाने में कई ग्रंथ प्राकृत में लिखे गये थे। उदाहरण के लिए बुद्ध के उपदेशों को प्राकृत में लिखा गया था। शाक्यमुनि अपने उपदेश प्राकृत में ही देते थे। इससे यह पता चलता है कि प्राकृत भाषा उस समय अत्यधिक लोगों द्वारा बोली जाती थी। इसके अलावा हमें एक खास भाषा पर महारत को शिक्षा के मुद्दे से अलग करके देखना होगा। आधुनिक भारत में अंग्रेजी बोलने में पारंगत लोगों को अधिक संभ्रांत समझा जाता है। इसका ये मतलब नहीं है कि जो व्यक्ति अंग्रेजी बोलना नहीं जानता उसे हम अशिक्षित करार दे दें।

प्रश्न-5. परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री पुरुष समानता को बढ़ाते हों दृ तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तरः परंपराएँ कभी-कभी रूढि़ बन जाती हैं। जब ऐसी स्थिति हो जाए तो किसी खास परंपरा को तोड़ना ही सबके हित में होता है। समय बदलने के साथ पुरानी परंपराएँ टूटती हैं और नई परंपराओं का निर्माण होता है। इसलिए परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार करना चाहिए जो स्त्री पुरुष समानता को बढ़ाते हैं।

प्रश्न-6. तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।

उत्तर: अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत में शिक्षा की कोई नियमबद्ध प्रणाली नहीं थी। वेदों और पुराणों के जमाने में ऋषि मुनि गुरुकुलों में शिक्षा दिया करते थे। ऐसे गुरुकुलों में छात्रों को गृहस्थ जीवन के लिए हर जरूरी क्रियाकलाप में दक्षता हासिल करनी होती थी। इसके अलावा उन्हें एक अच्छे योद्धा बनने का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। आज की शिक्षा प्रणाली अधिक परिष्कृत और नियमबद्ध है। आज नाना प्रकार के विषयों के ज्ञान दिए जाते हैं। पहले स्त्रियों की शिक्षा के लिए कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं थी लेकिन अब ऐसी बात नहीं है।

प्रश्न-7. महावीर प्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?

उत्तरः महावीर प्रसाद द्विवेदी जिस जमाने के हैं उससे यह साफ पता चलता है कि उनकी सोच कितनी आधुनिक थी। उस जमाने में अधिकाँश लोग स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ थे। ऐसे में कोई स्त्री-पुरुष समानता की बात करे तो इसे दुस्साहस ही कहेंगे। महावीर प्रसाद का खुलापन इसी बात में झलता है।

प्रश्न-8. द्विवेदी जी की भाषा शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तरः महावीर? प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने भाषा को और शुद्ध तथा परिष्कृत किया। लेकिन उनकी भाषा पाठकों के लिए दुरूह न हो जाए इसका भी ध्यान दिया। उन्होंने अपनी भाषा में सरलता भी लाने की कोशिश की थी। इसके अलावा व्यंग्य का उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया है। व्यंग्य के इस्तेमाल से दो फायदे होते हैं। लेखक इससे पाठक को बाँधने में कामयाब हो जाता है। व्यंग्य के माध्यम से गंभीर से गंभीर बात भी आसानी से कही जा सकती है।

Hindi Aroh Part 2 Chapter 15 Important Question Answers

परीक्षा उपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तरः

प्रश्न-1. स्त्री शिक्षा के विरोधी लोगों के क्या तर्क हैं? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तरः प्रस्तुत पाठ में स्त्री शिक्षा विरोधी लोगों ने स्त्री शिक्षा के विरोध में निम्नलिखित तर्क दिए हैं-

  1. स्त्री शिक्षा की आवश्यकता प्राचीन काल में नहीं थी, इसलिए प्राचीन काल के पुराणों व इतिहास में स्त्री शिक्षा की किसी भी प्रणाली के प्रमाण नहीं मिलते। इसलिए स्त्री शिक्षा की आज भी आवश्यकता नहीं है।
  2. स्त्री शिक्षा के विरोधियों का यह भी तर्क है कि स्त्री शिक्षा से अनर्थ होते हैं। शकुंतला ने दुष्यंत को जो कुवाक्य कहे वह स्त्री शिक्षा के अनर्थ का परिणाम है।
  3. संस्कृत के नाटकों में स्त्री पात्रों के मुख से प्राकृत भाषा बुलाई गई है। उस समय को प्राकृत को गंवार भाषा समझा जाता था। इससे पता चलता है कि उन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं था। वे गंवार और अनपढ़ थी। उनकी दृष्टि में तो गंवार भाषा के ज्ञान से भी अनर्थ हुआ।

प्रश्न-2. पुरातन पंथी लोगों ने शकुंतला पर जो आरोप लगाए क्या आप उनसे सहमत हैं?

उत्तरः पुरातन पंथी लोगों ने शकुंतला पर आरोप लगाया है कि उसने अशिक्षा के कारण ही राजा दुष्यंत को कुवाक्य कहे। यदि वह शिक्षित होती तो ऐसा अनर्थ ना करती। हम पुरातन पंथियों के इस आरोप से सहमत नहीं हैं। यहां प्रश्न शिक्षा का नहीं है। यह प्रश्न है कि दुष्यंत ने शकुंतला से गंधर्व विवाह किया और जब वह उनसे मिलने आई तो उसने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया। ऐसी स्थिति में तो कोई भी कुवाक्य ही कहेगा। यहां शकुंतला की शिक्षा को दोष देना उचित नहीं है।

प्रश्न-3. संस्कृत और प्राकृत के संबंध पर प्रकाश डालिए?

उत्तरः संस्कृत प्राचीन एवं शुद्ध साहित्यिक भाषा है। इस भाषा को जानने वाले बहुत कम लोग थे। उस समय संस्कृत के साथ-साथ कुछ प्राकृत भाषाएं भी प्रचलित थी। यह सभी भाषाएं संस्कृत से ही निकली हुई जन भाषाएं थी। मागधी, महाराष्ट्री, पाली, शौरसेनी आदि अपने समय की लोक भाषा ही थी। इन्हें प्राकृत भाषायें भी कहा जाता है। बौद्ध और जैन साहित्य इन्हीं भाषाओं में रचित साहित्य है। अतः प्राकृत भाषा गंवार या अनपढ़ों की भाषा नहीं है।

प्रश्न-4. संस्कृत में स्त्री पात्रों द्वारा संस्कृत न बोलना उनकी अनपढ़ता का प्रमाण है। पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तरः संस्कृत के नाटकों में नारी पात्र संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत बोलने का कारण यह है कि उस समय प्राकृत लोक भाषा या जन भाषा थी। किंतु लेखक इन पुरातन पंथियों के स्त्री शिक्षा विरोधी तर्कों को उचित नहीं समझता। उनके अनुसार प्राकृत बोलना अनपढ़ता का सबूत नहीं है। उस समय आम बोलचाल में प्राकृत भाषा का ही प्रयोग किया जाता था। संस्कृत भाषा का प्रचलन तो कुछ ही लोगों तक सीमित था। अतः यही कारण रहा होगा कि नाट्य शास्त्रियों ने नाट्य शास्त्र संबंधी नियम बनाते समय इस बात का ध्यान रखा होगा। क्योंकि संस्कृत को कुछ ही लोग बोल सकते थे इसलिए कुछ पात्रों को छोड़कर अन्य पात्रों से प्राकृत बुलवाने का नियम बनाया जाए। इस प्रकार स्त्री पात्रों द्वारा संस्कृत में बोलने के कारण उन्हें अनपढ़ नहीं समझना चाहिए। फिर प्राकृत में भी तो महान साहित्य रचना का निर्माण हुआ है।

प्रश्न-5. प्राचीन काल में प्राकृत भाषा का चलन था। पाठ के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।

उत्तरः स्त्री शिक्षा विरोधियों ने प्राकृत भाषा को अनपढ़ एवं गवार लोगों की भाषा बताया है। किंतु लेखक ने प्राकृत भाषा को जनसाधारण की भाषा बताया है। उस समय की पढ़ाई लिखाई भी प्राकृत भाषा में होती थी। प्राकृत भाषा के प्रचलन का प्रमाण बौद्ध और जैन ग्रंथों में मिलता है। दोनों धर्मों के हजारों प्राकृत भाषा में रचित हैं। महात्मा बुध के अपने संदेश भी प्राकृत भाषा में दिए गए हैं। बौद्ध धर्म का महान ग्रंथ श्त्रिपिटकश् प्राकृत भाषा में है। ऐसे महान ग्रंथों का प्राकृत मे लिखे जाने का कारण यही था कि उस समय जन भाषा प्राकृत ही थी। अतः प्राकृत अनपढ़ों की भाषा नहीं थी।

प्रश्न-6. लेखक के अनुसार आज के युग में स्त्रियों के शिक्षित होने की आवश्यकता प्राचीन काल की अपेक्षा अधिक क्यों है? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।

उत्तर: यदि स्त्री शिक्षा विरोधियों की बात मान भी ली जाए कि प्राचीन काल में स्त्रियों को प्रशिक्षित करने का प्रचलन नहीं था, तो उस समय स्त्रियों को शिक्षा की अधिक आवश्यकता नहीं होगी। किंतु आज के युग में नारी शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व दोनों ही अधिक है। आज का युग भौतिकवादी और प्रतियोगिता का युग है। इस युग में अनपढ़ता देश और समाज के विकास में बाधा ही नहीं अपितु देश व समाज के लिए कलंक भी है। नारी का शिक्षित होना तो इसलिए अति आवश्यक है कि जिस परिवार में नारी शिक्षित होगी उस परिवार के बच्चों की शिक्षा व्यवस्था अच्छी हो सकेगी। शिक्षित नारी ही बच्चों का अच्छे बुरे की पहचान करने का ज्ञान देकर उन्हें अच्छे नागरिक बना सकेगी। शिक्षित नारी नौकरी करके या अन्य कार्य करके धन कमाकर परिवार के आर्थिक विकास में सहायता कर सकती है। इसलिए लेखक ने प्राचीन काल की अपेक्षा आधुनिक युग में स्त्री शिक्षा की अधिक आवश्यकता बताई है।

प्रश्न-7. प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों के लिए किस-किस शिक्षा का विधान किया गया था?

उत्तरः प्राचीन ग्रंथों में कुछ ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं जिससे पता चलता है कि कुंवारियों के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा का प्रबंध था, जैसे चित्र बनाना, नाचने, गाने, बजाने, फूल चुनने और हार गूंथने आदि । लेखक का मानना है कि उन्हें पढ़ने लिखने की शिक्षा भी निश्चित रूप से दी जाती होगी।

प्रश्न-8. ‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ नामक पाठ का उद्देश्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः इस पाठ का मुख्य उद्देश्य स्त्री शिक्षा के विरोधी लोगों के कुतर्कों का जोरदार शब्दों में खंडन करना है। लेखक ने अनेक प्रमाण प्रस्तुत करके सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है कि प्राचीन काल में भी स्त्री शिक्षा की व्यवस्था थी और अनेक शिक्षित स्त्रियों के नाम उल्लेख भी किए गए हैं। जैसे गार्गी, अत्री-पत्नी, विश्ववरा, मंडन मिश्र की पत्नी आदि अनेक स्त्रियाँ हुई है। आज के युग में स्त्री शिक्षा नितांत आवश्यक है। शिक्षा कभी किसी का अनर्थ नहीं करती। यदि स्त्री शिक्षा में कुछ संशोधनों की आवश्यकता पड़े तो कर लेनी चाहिए। किंतु स्त्री-शिक्षा का विरोध करना कदाचित उचित नहीं है।

बच्चों!

टेक्स्ट और वीडियो के माध्यम से पढ़ाया गया पाठ ‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ आपको कैसा लगा?

हमें कमेंट करके अवश्य बताएं।

हमारे YOUTUBE CHANNEL BHASHA GYAN को सब्स्क्राइब करना न भूलें।