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Kar Chale Hum Fida Class 10 Summary

Kar Chale Hum Fida Class 10 Summary, Explanation and question answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 2 की कविता पढ़ेंगे

कर चले हम फिदा’

कविता के रचयिता कैफ़ी आज़मी हैं।

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बच्चों कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि का जीवन परिचय जानते हैं।

Kaifi Azmi

कवि परिचय: कैफ़ी आज़मी

जीवन परिचय: अहतर हुसैन रिज़वी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में 19 जनवरी 1919 हुआ था। कैफ़ी आज़मी के परिवार में उनकी पत्नी शौकत आज़मी, इनकी दो संतान शबाना आज़मी (फ़िल्मजगत की मशहूर अभिनेत्री और जावेद अख़्तर की पत्नी) और बाबा आज़मी है। कैफ़ी की कविताओं में एक ओर सामाजिक और राजनैतिक जागरूकता का समावेश है तो दूसरी और ह्रदय की कोमलता भी है। अपनी युवावस्था में वाह-वाही पाने वाले कैफ़ी आज़मी ने फिल्मो के लिए सैंकड़ों बेहतरीन गीत भी लिखे है।  10 मई 2002 को इस दुनिया से रुखसत हुए।

कविता का सार

जिंदगी सभी प्राणियों को प्रिय होती है। इसे कोई ऐसे ही बेमतलब गवाना नहीं चाहेगा। लेकिन सैनिक का जीवन बिलकुल इसके विपरीत होता है। क्योंकि सैनिक उस समय सीना तान कर खड़ा हो जाता है जब उसके जीवन पर नहीं बल्कि दूसरों के जीवन और आज़ादी पर संकट आता है। जबकि ऐसी स्थिति में उसे पता होता है कि दूसरों की आज़ादी और जिंदगी भले ही बची रह सकती है परन्तु उसकी जान जाने की सम्भावना सबसे अधिक होती है।

प्रस्तुत पाठ जो युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘हकीकत’ के लिए लिखा गया था, ऐसे ही सैनिकों के दिल की बात बयान करता है जिन्हें अपने किये पर नाज है। इसी के साथ उन्हें देशवासियों से कुछ आशाएँ भी हैं। जिनसे उन्हें आशाएँ हैं वो देशवासी हम और आप हैं तो इसलिए इस पाठ के जरिये हम जानेगे की हम किस हद तक उनकी आशयों पर खरे उतरे हैं।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

सन्दर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य-पुस्तक ‘स्पर्श भाग- 2’ के काव्य खंड की कविता कर चले हम फिदा से ली गई हैं। इसके कवि कैफ़ी आज़मी हैं।

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि एक वीर सैनिक का अपने देशवासियों को दिए आखिरी सन्देश का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सैनिक अपने आखिरी सन्देश में कह रहें है कि वो अपने प्राणों को देश हित के लिए न्योछावर कर रहें है, अब यह देश हम जाते-जाते आप देशवासियों को सौंप रहें हैं। सैनिक उस दृश्य का वर्णन कर रहें है जब दुश्मनों ने देश पर हमला किया था। सैनिक कहते है कि जब हमारी साँसे हमारा साथ नहीं दे रही थी और हमारी नाड़ियों में खून जमता जा रहा, फिर भी हमने अपने बढ़ते क़दमों को जारी रखा अर्थात दुश्मनों को पीछे धकेलते गए। सैनिक गर्व से कहते है कि हमें अपने सर भी कटवाने पड़े तो हम ख़ुशी-ख़ुशी कटवा देंगे पर हमारे गौरव के प्रतिक हिमालय को नहीं झुकने देंगे अर्थात हिमालय पर दुश्मनों के कदम नहीं पड़ने देंगे। हम मरते दम तक वीरता के साथ दुश्मनों का मुकाबला करते रहे अब इस देश की रक्षा का भार आप देशवासियों को सौंप रहे हैं।

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जान देने की रुत रोज आती नहीं

हुस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे

वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में कवि सैनिक के बलिदान का भावनात्मक रूप से वर्णन कर रहा।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हमारे पूरे जीवन में हमें जिन्दा रहने के कई अवसर मिलते हैं लेकिन देश के लिए प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी कभी-कभी किसी-किसी को ही मिल पाती है अर्थात सैनिक देश पर मर मिटने का एक भी मौका नई खोना चाहते। सैनिक देश के नौजवानों को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि सुंदरता और प्रेम का त्याग करना सीखो क्योंकि वो सुंदरता और प्रेम ही क्या? जवानी ही क्या? जो देश के लिए अपना खून न बहा सके। सैनिक देश की धरती को दुल्हन की तरह मानते है और कहते है कि जिस तरह दुल्हन को स्वयंवर में हासिल करने के लिए राजा किसी भी मुश्किल को पार कर जाते थे उसी तरह तुम भी अपनी इस दुल्हन को दुश्मनों से बचा कर रखना। क्योंकि अब हम देश की रक्षा का दायित्व आप देशवासियों पर छोड़ कर जा रहे हैं।

राह कुर्बानियों की न वीरान हो

तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले

 फतह का जश्न इस जश्न के बाद है

जिंदगी मौत से मिल रही है गले

बाँध लो अपने सर से कफन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में सैनिक देशवासियों को देश के लिए बलिदान करने के लिए तैयार रहने को कहते हैं।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हम तो देश के लिए बलिदान दे रहे हैं परन्तु हमारे बाद भी ये सिलसिला चलते रहना चाहिए। जब भी जरुरत हो तो इसी तरह देश की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना चाहिए। जीत की ख़ुशी तो देश पर प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी के बाद दोगुनी  हो जाती है। उस स्थिति में ऐसा लगता है मनो जिंदगी मौत से गले मिल रही हो। अब ये देश आप देशवासियों को सौंप रहे हैं अब आप अपने सर पर मौत की चुनरी बांध लो अर्थात अब आप देश की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ।

खींच दो अपने खूँ से जमीं पर लकीर

इस तरफ आने पाए न रावन कोई

तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

प्रसंग: इन पंक्तियों में सैनिक देशवासियों को प्रेरित कर रहे हैं।

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि अपने खून से लक्ष्मण रेखा के समान एक रेखा तुम भी खींच लो और ये तय कर लो कि उस रेखा को पार करके कोई रावण रूपी दुश्मन इस पार ना आ पाय। सैनिक अपने देश की धरती को सीता के आँचल की तरह मानते हैं और कहते हैं कि अगर कोई हाथ आँचल को छूने के लिए आगे बड़े तो उसे तोड़ दो। अपने वतन की रक्षा के लिए तुम ही राम हो और तुम ही लक्ष्मण हो।अब इस देश की रक्षा का दायित्व तुम पर है।

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Kar Chale Hum Fida Class 10 question answer

कर चले हम फिदा पाठ के प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1.

क्या इस गीत की कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है?

उत्तर: हाँ, इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। सन् 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण किया। युद्ध में अनेक सिपाही लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर ‘हकीकत’ फ़िल्म बनी थी। इस फ़िल्म में भारत और चीन युद्ध की वास्तविकता को दर्शाया गया था। यह गीत इसी फ़िल्म के लिए लिखा गया था।

प्रश्न 2.

‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’, इस पंक्ति में हिमालय किस बात का प्रतीक है?

उत्तर: ‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’ इस पंक्ति में हिमालय भारत के मान-सम्मान का प्रतीक है। 1962 में भारत चीन की लड़ाई हिमालय की घाटियों में लड़ी गई थी। हमारे अनेक सैनिक इस युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। हिमालय की बर्फीली चोटियों पर भारतीय जवानों ने बहादुरी एवं बलिदान की अनोखी मिसाल कायम की थी। भारतीय सेना के वीर जाँबाजों ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भारत के सम्मान की रक्षा की थी।

प्रश्न 3.

इस गीत में धरती को दुलहन क्यों कहा गया है?

उत्तर: गीत में धरती को दुल्हन इसलिए कहा गया है, क्योंकि सन् 1962 के युद्ध में भारतीय सैनिकों के बलिदानों से, उनके रक्त से धरती लाल हो गई थी, मानो धरती ने किसी दुलहन की भाँति लाल पोशाक पहन ली हो अर्थात भारतीय सैनिकों के रक्त से पूरी युद्धभूमि लाल हो गई थी।

प्रश्न 4.

गीत में ऐसी क्या खास बात होती है कि वे जीवन भर याद रह जाते हैं?

उत्तर: जीवन भर याद रह जाने वाले गीतों में हृदय का स्पर्श करने वाली भाषा और संगीत का अद्भुत तालमेल होता है। जो व्यक्ति के अंतर्मन में स्वतः ही प्रवेश कर जाता है। इस तरह गीतों के बोल सरल भाषा व प्रभावोत्पादक शैली में होने चाहिए ताकि वह व्यक्ति की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। इन गीतों का विषय जीवन के मर्मस्पर्शी पहलुओं से जुड़ा होना चाहिए। ऐसे गीत हृदय की गहराइयों में समा जाते हैं और इन गीतों के सुर, लहरियाँ संपूर्ण मन मस्तिष्क को सकारात्मकता से ओत-प्रोत कर देती है और गीत जीवनभर याद रह जाते हैं।

प्रश्न 5.

कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग किसके लिए किया है?

उत्तर: कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग देशवासियों के लिए किया है, जो देश की एकता को दर्शा रहा है। देशवासियों का संगठन ही देश को प्रगतिशील, विकासशील तथा समृद्धशाली बनाता है। देशवासियों का परस्पर साथ ही देश की ‘अनेकता में एकता’ जैसी विशिष्टता को मजबूत बनाता है।

प्रश्न 6.

कवि ने इस कविता में किस काफ़िले को आगे बढ़ाते रहने की बात कही है?

उत्तर: ‘काफिले’ शब्द का अर्थ है-यात्रियों का समूह। कवि ने इस कविता में देश के लिए न्योछावर होने वाले अर्थात् देश के मान-सम्मान व रक्षा की खातिर अपने सुखों को त्याग कर, मर मिटने वाले बलिदानियों के काफिले को आगे बढ़ते रहने की बात कही है। कवि का मानना है कि बलिदान का यह क्रम निरंतर चलते रहना चाहिए क्योंकि हमारा देश तभी सुरक्षित रह सकता है, जब बलिदानियों के काफिले शत्रुओं को परास्त कर तथा विजयश्री को हासिल कर आगे बढ़ते रहेंगे।

प्रश्न 7.

इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ किस ओर संकेत करता है?

उत्तर: इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ देश के लिए अपना सर्वस्व अर्थात् संपूर्ण समर्पण की ओर संकेत करता है। सिर पर कफन बाँधकर चलने वाला व्यक्ति अपने प्राणों से मोह नहीं करता, बल्कि अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए सदैव तैयार रहता है इसलिए हर सैनिक सदा मौत को गले लगाने के लिए तत्पर रहता है।

प्रश्न 8.

इस कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत कविता उर्दू के प्रसिद्ध कवि कैफ़ी आज़मी द्वारा रचित है। यह गीत युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म हकीकत के लिए लिखा गया है। इस कविता में कवि ने उन सैनिकों के हृदय की आवाज़ को व्यक्त किया है, जिन्हें अपने देश के प्रति किए गए हर कार्य, हर कदम, हर बलिदान पर गर्व है। इसलिए इन्हें प्रत्येक देशवासी से कुछ अपेक्षाएँ हैं कि उनके इस संसार से विदा होने के पश्चात वे देश की आन, बान व शान पर आँच नहीं आने देंगे, बल्कि समय आने पर अपना बलिदान देकर देश की रक्षा करेंगे।

प्रश्न 9.

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

उत्तर: भाव-इन पंक्तियों का भाव यह है कि हमारे वीर सैनिक देश रक्षा के लिए दिए गए अपने वचन का पालन अपने जीवन के अंतिम क्षण तक करते रहे युद्ध में घायल इन सैनिकों को अपने प्राणों की जरा भी परवाह नहीं की। उनकी साँसें भले ही रुकने लगीं तथा भयंकर सर्दी के कारण उनकी नब्ज़ चाहे जमती चली गई किंतु किसी भी परिस्थिति में उनके इरादे डगमगाए नहीं। भारत माँ की रक्षा के लिए उनके बढ़ते कदम न तो पीछे हटे और न ही रुके। वे अपनी अंतिम साँस तक शत्रुओं का मुकाबला करते रहे।

प्रश्न 10.

खींच दो अपने खू से जमीं पर लकीर

इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई

उत्तर: इन अंशों का भाव है कि सैनिकों ने अंतिम साँस तक देश की रक्षा की। युद्ध में घायल हो जाने पर जब सैनिकों की साँसें रुकने लगती हैं अर्थात् अंतिम समय आने पर तथा नब्ज़ के रुक-रुककर चलने पर, कमज़ोर पड़ जाने पर भी उनके कदम नहीं रुकते, क्योंकि वे भारतमाता की रक्षा हेतु आगे बढ़ते रहते हैं और हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर देते हैं।

प्रश्न 11.

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

उत्तर: भाव-इन पंक्तियों का भाव यह है कि भारत की भूमि सीता माता की तरह पवित्र है। इसके दामन को छूने का दुस्साहस किसी को नहीं होना चाहिए। यह धरती राम और लक्ष्मण जैसे अलौकिक वीरों की धरती है जिनके रहते सीमा पर से कोई शत्रु रूपी रावण देश में प्रवेश कर देश की अस्मिता को लूट नहीं सकता। अतः हम सभी देशवासियों को मिलकर देश की गरिमा को बनाए रखना है अर्थात् देश के मान-सम्मान व उसकी पवित्रता की रक्षा करना है।

बच्चों!

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Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary

Mere Sang Ki Auratein Class 9 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 1 का पाठ 2 पढ़ेंगे

“मेरे संग की औरतें”

पाठ की लेखिका मृदुला गर्ग हैं।

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mere sang ki auratein

लेखिका परिचय: मृदुला गर्ग

मेरे संग की औरतें” मृदुला गर्ग जी का एक संस्मरण हैं।

इस संस्मरण में लेखिका ने अपनी चार पीढ़ी की महिलाओं (परदादी, नानी, माँ और खुद लेखिका) के व्यक्तित्व, उनकी आदतों व उनके विचारों के बारे में विस्तार से बात की है।

Mere Sang Ki Auratein Class 9th Chapter 2 Hindi Kritika

मेरे संग की औरतें पाठ का सारांश

लेखिका की स्मृतियों में उसकी नानी

Mridula Garg

अपने लेख की शुरुआत लेखिका कुछ इस तरह से करती हैं कि उनकी एक नानी थी जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा क्योंकि नानी की मृत्यु मां की शादी से पहले हो गई थी। लेखिका कहती हैं कि इसीलिए उन्होंने कभी अपनी “नानी से कहानियां” तो नहीं सुनी मगर “नानी की कहानियां” पढ़ी जरूर और उन कहानियों का अर्थ उनकी समझ में तब आया, जब वो बड़ी हुई।

लेखिका अपनी नानी के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उनकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और पर्दा करने वाली महिला थी।और उनके पति यानि नानाजी शादी के तुरंत बाद उन्हें (नानीजी) छोड़कर बैरिस्ट्री की पढाई करने कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए थे और जब वो अपनी पढ़ाई पूरी कर घर वापस आए तो, उनका रहन-सहन, खानपान, बोलचाल बिल्कुल विलायती हो गया था।

हालांकि नानी अब भी सीधे-साधे तौर तरीके से ही रहती थी। उन पर नानाजी के विलायती रंग-ढंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और ना ही उन्होंने कभी अपनी इच्छा या पसंद-नापसंद अपने पति को बतायी।

लेखिका आगे कहती हैं कि बेहद कम उम्र में जब नानी को लगा की उनकी मृत्यु निकट हैं तो उन्हें अपनी पन्द्रह वर्षीय इकलौती बेटी यानी लेखिका की मां की शादी की चिंता सताने लगी। इसीलिए उन्होंने पर्दे का लिहाज छोड़ कर नानाजी से उनके दोस्त व स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से मिलने की ख्वाहिश जताई। यह बात सुनकर घर में सब हैरान रह गए कि आखिर पर्दा करने वाली एक महिला, भला उनसे क्या बात करना चाहती हैं।

खैर नानाजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए अपने दोस्त को फौरन बुलवा लिया। नानी ने प्यारे लाल जी से वचन ले लिया कि वो उनकी लड़की (लेखिका की माँ) के लिए वर के रूप में किसी आजादी के सिपाही (स्वतंत्रता सेनानी) को ढूंढ कर उससे उसकी शादी करवा देंगें। उस दिन सब घर वालों को पहली बार पता चला कि नानीजी के मन में भी देश की आजादी का सपना पलता हैं।

बाद में लेखिका को समझ में आया कि असल में नानीजी अपनी जिंदगी में भी खूब आजाद ख्याल रही होंगी। हालाँकि उन्होंने कभी नानाजी की जिंदगी में कोई दखल तो नहीं दिया पर अपनी जिंदगी को भी वो अपने ढंग से, पूरी आजादी के साथ जीती थी। लेखिका कहती हैं कि यही तो असली आजादी हैं।

लेखिका की माँ

लेखिका की मां की शादी एक ऐसे पढ़े-लिखे लड़के से हुई जिसे आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने के अपराध में आईसीएस की परीक्षा में बैठने से रोक दिया और जिसके पास कोई पुश्तैनी जमीन जायजाद भी नहीं थी। और लेखिका की मां, अपनी मां और गांधी जी के सिद्धांतों के चक्कर में सादा जीवन उच्च विचार रखने को मजबूर हो गई।

लेखिका आगे कहती हैं कि उनके नाना पक्के साहब माने जाते थे। वो सिर्फ नाम के हिंदुस्तानी थे। बाकी चेहरे मोहरे, रंग-ढंग, पढ़ाई-लिखाई, रहन-सहन से वो पक्के अंग्रेज ही थे। लेखिका कहती हैं कि मजे की बात तो यह थी कि हमारे देश में आजादी की जंग लड़ने वाले ही अंग्रजों के सबसे बड़े प्रशंसक थे। फिर वो चाहे मेरे पिताजी के घरवाले हो या गांधी नेहरू।

लेखिका की मां खादी की साड़ी पहनती थी जो उन्हें ढंग से पहननी नहीं आती थी।लेखिका कहती हैं कि उन्होंने अपनी मां को आम भारतीय मांओं के जैसा कभी नहीं देखा क्योंकि वह घर परिवार और बच्चों पर कोई खास ध्यान नहीं देती थी। घर में पिताजी, मां की जगह काम कर लिया करते थे।

लेखिका की मां को पुस्तकें पढ़ने और संगीत सुनने का शौक था जो वो बिस्तर में लेटे-लेटे करती थी। हां उनमें दो गुण अवश्य थे। पहला वह कभी झूठ नहीं बोलती थी और दूसरा वह लोगों की गोपनीय बातों को अपने तक ही सीमित रखती थी। इसी कारण उन्हें घर और बाहर दोनों जगह आदर व सम्मान मिलता था।

लेखिका आगे कहती हैं कि उन्हें सब कुछ करने की आजादी थी।उसी आजादी का फायदा उठाकर छह भाई-बहनों में से तीन बहनों और इकलौते भाई ने लेखन कार्य शुरू कर दिया।

लेखिका की परदादी 

लेखिका कहती हैं कि उनकी परदादी को भी लीक से हटकर चलने का बहुत शौक था। जब लेखिका की मां पहली बार गर्भवती हुई तो परदादी ने मंदिर जाकर पहला बच्चा लड़की होने की मन्नत मांगी थी जिसे सुनकर परिवार के सभी लोग हक्के-बक्के रह गए थे। दादी का यह मन्नत मांगने का मुख्य कारण परिवार में सभी बहूओं के पहला बच्चा बेटा ही होता आ रहा था। ईश्वर ने परदादी की मुराद पूरी की और घर में एक के बाद एक पाँच कन्याएं भेज दी।

इसके बाद लेखिका अपनी दादी से संबंधित एक किस्सा सुनाती हैं। लेखिका कहती हैं कि एक बार घर के सभी पुरुष सदस्य एक बारात में गए हुए थे और घर में सभी महिलाएं सजधज कर रतजगा कर रही थी। घर में काफी शोर-शराबा होने के कारण दादी दूसरे कमरे में जाकर सो गई।

तभी एक बदकिस्मत चोर दादी के कमरे में घुस गया।उसके चलने की आहट से दादी की नींद खुल गई। दादी ने चोर को कुँए से एक लोटा पानी लाने को कहा। चोर कुएं से पानी लेकर आया और दादी को दे दिया। दादी ने आधा लोटा पानी खुद पानी पिया और आधा लोटा पानी चोर को पिला दिया और फिर उससे बोली कि आज से हम मां-बेटे हो गए हैं। अब तुम चाहो तो चोरी करो या खेती करो।  दादी की बात का चोर पर ऐसा असर हुआ कि चोर ने चोरी करना छोड़ कर , खेती करनी शुरू कर दी।

15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा था। तब लेखिका बीमारी थी। लेखिका उस समय सिर्फ 9 साल की बच्ची थी। बहुत रोने धोने के बाद भी उसे जश्न में शामिल होने नहीं ले जाया गया। लेखिका और उसके पिताजी के अलावा घर के सभी लोग बाहर जा चुके थे।

बाद में पिताजी ने उसे “ब्रदर्स कारामजोव” नामक उपन्यास लाकर दी । उसके बाद लेखिका उस उपन्यास को पढ़ने में व्यस्त हो गयी थी और उनके पिताजी अपने कमरे में जाकर पढ़ने लगे।

लेखिका कहती हैं कि यह उसकी परदादी की मन्नत का प्रभाव ही रहा होगा, तभी लड़कियों होने के बाबजूद भी उनके व उनकी बहनें के मन में कभी कोई हीन भावना नहीं आई।

लेखिका की बहनें

दादी ने जिस पहली लड़की के लिए मन्नत मांगी थी। वह लेखिका की बड़ी बहन मंजुला भगत थी जिसे घर में “रानी” नाम से बुलाते थे। दूसरे नंबर में खुद लेखिका यानि मृदुला गर्ग थी जिनका घर का नाम उमा था। और तीसरे नंबर की बहन का नाम चित्रा था, जो लेखिका नहीं हैं ।

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लेखिका का परिवार

चौथे नंबर की बहन का नाम रेनू और पांचवें नंबर की बहन का नाम अचला था। पांच बहनों के बाद एक भाई हुआ जिसका नाम राजीव हैं। लेखिका कहती हैं कि उनके भाई राजीव हिंदी में लिखते हैं जबकि समय की मांग के हिसाब से अचला अंग्रेजी में लिखने लगी।

लेखिका आगे कहती हैं कि सभी बहनों ने अपनी शादी अच्छे से निभाई। लेखिका शादी के बाद अपने पति के साथ बिहार के एक छोटे से कस्बे डालमिया नगर में रहने गई। लेखिका ने वहाँ एक अजीब सी बात देखी। परुष और महिलाएं, चाहे वो पति-पत्नी क्यों न हो, अगर वो पिक्चर देखने भी जाते थे तो पिक्चर हाल में अलग-अलग जगह में बैठकर पिक्चर देखते थे।

लेखिका दिल्ली से कॉलेज की नौकरी छोड़कर वहां पहुंची थी और नाटकों में काम करने की शौकीन थी। लेखिका कहती हैं कि उन्होंने वहां के चलन से हार नहीं मानी और साल भर के अंदर ही कुछ शादीशुदा महिलाओं को गैर मर्दों के साथ अपने नाटक में काम करने के लिए मना लिया। अगले 4 साल तक हम महिलाओं ने मिलकर कई सारे नाटकों में काम किया और अकाल राहत कोष के लिए भी काफी पैसा इकट्ठा किया।

इसके बाद लेखिका कर्नाटक चली गई। उस समय तक उनके दो बच्चे हो चुके थे जो स्कूल जाने लायक की उम्र में पहुंच चुके थे। लेखिका कहती है कि वहां कोई बढ़िया स्कूल नहीं था जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सके। इसीलिए लेखिका ने स्वयं एक प्राइमरी स्कूल खोला।

वो कहती हैं कि मेरे बच्चे, दूसरे ऑफिसर और अधिकारियों के बच्चे उस स्कूल में पढ़ने लगे। जिन्हें बाद में दूसरे अच्छे स्कूलों में प्रवेश मिल गया।लेखिका ने स्कूल खोल कर व उसे सफलता पूर्वक चला कर यह साबित कर दिया कि वह किसी से कम नहीं है।

लेखिका के जीवन में ऐसे अनेक अवसर आए जब लेखिका ने अपने आप को साबित किया। उन्होंने अनेक कार्य किये लेकिन उन्हें प्रसिद्धि तो अपने लेखन कला से ही हासिल हुई।

Mere Sang Ki Auratein Chapter 2 Question Answers

मेरे संग की औरतें पाठ के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा भी नहीं फिर भी उनके व्यक्तित्व से वे क्यों प्रभावित थीं?

उत्तर: लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा नहीं था, किंतु उनके बारे में सुना अवश्य था। उसने सुना था कि उसकी नानी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्यारेलाल शर्मा से भेंट की थी। उस भेट में उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि वे अपनी बेटी की शादी किसी क्रांतिकारी से करवाना चाहती हैं, अंग्रेजों के किसी भक्त से नहीं। उनकी इस इच्छा में देश की स्वतंत्रता की पवित्र भावना थी। यह भावना बहुत सच्ची थी। इसमें साहस था। जीवन भर परदे में रहकर भी उन्होंने किसी पर पुरुष से मिलने की हिम्मत की। इससे उनके साहसी व्यक्तित्व और मन में सुलगती स्वतंत्रता की भावना का पता चला। लेखिका इन्हीं गुणों के कारण उनका सम्मान करती है।

प्रश्न 2. लेखिका की नानी की आज़ादी के आंदोलन में किस प्रकार की भागीदारी रही?

उत्तर: लेखिका की नानी ने आज़ादी के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था, पर आज़ादी के आंदोलन में उनका अप्रत्यक्ष योगदान अवश्य था। वे अनपढ़ परंपरागत परदानशीं औरत थीं। उनके मन में आज़ादी के प्रति जुनून था। यद्यपि उनके पति अंग्रेजों के भक्त थे और साहबों के समान रहते थे पर अपनी मृत्यु को निकट देखकर उन्होंने अपने पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा को बुलवाया और स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनकी बेटी का वर वे ही अपने समान ही। किसी स्वतंत्रता के दीवाने लड़के को खोज कर दें। इससे उनकी बेटी का विवाह आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने वाले उस लड़के से हो सका जिसे आई.सी.एस. (I.C.S.) परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। इस तरह उसकी नानी ने आज़ादी के आंदोलन में भागीदारी निभाई।

प्रश्न 3. लेखिका की माँ परंपरा का निर्वाह न करते हुए भी सबके दिलों पर राज करती थी। इस कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की विशेषताएँ लिखिए।

(ख) लेखिका की दादी के घर के माहौल का शब्द-चित्र अंकित कीजिए।

उत्तर: कथन के आलोक में-

(क) लेखिका की माँ की स्थितियाँ और व्यक्तित्व-दोनों असाधारण थे। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम करती थीं। उनकी सोच मौलिक थी। लेखिका के शब्दों में वह खुद अपने तरीके से आज़ादी के जुनून को निभाती थीं। इस विशेषता के कारण घर-भर के लोग उसका आदर करते थे। कोई उनसे घर गृहस्थी के काम नहीं करवाता था। उनका व्यक्तित्व ऐसा प्रभावी था कि ठोस कामों के बारे में उनसे केवल राय ली जाती थी और उस राय को पत्थर की लकीर मानकर निभाया जाता था।

लेखिका की माँ का सारा समय किताबें पढ़ने, साहित्य चर्चा करने और संगीत सुनने में बीतता था। वे कभी बच्चों के साथ लाड़-प्यार भी नहीं करती थीं। उनके मान-सम्मान के दो कारण प्रमुख थे। वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं। वे एक की गोपनीय बात दूसरे से नहीं कहती थीं।

(ख) लेखिका की दादी के घर में विचित्र विरोधों का संगम था। परदादी लीक से परे हटकर थीं। वे चाहती थीं कि उनकी पतोहू को होने वाली पहली संतान कन्या हो। उसने यह मन्नत मानकर जगजाहिर भी कर दी। इससे घर के अन्य सभी लोग हैरान थे। परंतु लेखिका की दादी ने इस इच्छा को स्वीकार करके होने वाली पोती को खिलाने-दुलारने की कल्पनाएँ भी कर डालीं। लेखिका की माँ तो बिलकुल ही विचित्र थीं। वे घर का कोई काम नहीं करती थीं। वे आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहती थीं। उन्हें पुस्तकें पढ़ने, संगीत सुनने और साहित्य चर्चा करने से ही फुर्सत नहीं थी। उनके पति भी क्रांतिकारी थे। वे आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं थे। विचित्र बात यह थी कि लेखिका के दादा अंग्रेजों के बड़े प्रशंसक थे। घर में चलती उन्हीं की थी। किंतु घर की नारियाँ अपने-अपने तरीके से जीने के लिए स्वतंत्र थीं। कोई किसी के विकास में बाधा नहीं बनता था।

प्रश्न 4. आप अपनी कल्पना से लिखिए कि परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत क्यों माँगी?

उत्तर: परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत इसलिए माँगी ताकि वे परंपरा से अलग चलने की जो बात करती थीं, उसे अपने कार्य-व्यवहार द्वारा सबको दर्शा सकें। इसके अलावा उनके मन में लड़का और लड़की में अंतर समझने जैसी कोई बात न रही होगी।

प्रश्न 5. डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की जगह सहजता से किसी को भी सही राह पर लाया जा सकता है-पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: इस पाठ से स्पष्ट है कि मनुष्य के पास सबसे प्रभावी अस्त्र है-अपना दृढ़ विश्वास और सहज व्यवहार। यदि कोई सगा संबंधी गलत राह पर हो तो उसे डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव देने की बजाय सहजता से व्यवहार करना चाहिए। लेखिका की नानी ने भी यही किया। उन्होंने अपने पति की अंग्रेज़ भक्ति का न तो मुखर विरोध किया, न समर्थन किया। वे जीवन भर अपने आदर्शों पर टिकी रहीं। परिणामस्वरूप अवसर आने पर वह मनवांछित कार्य कर सकीं।

लेखिका की माता ने चोर के साथ जो व्यवहार किया, वह तो सहजता का अनोखा उदाहरण है। उसने न तो चोर को पकड़ा, न पिटवाया, बल्कि उससे सेवा ली और अपना पुत्र बना लिया। उसके पकड़े जाने पर उसने उसे उपदेश भी नहीं दिया, न ही चोरी छोड़ने के लिए दबाव डाला। उसने इतना ही कहा-अब तुम्हारी मर्जी चाहे चोरी करो या खेती। उसकी इस सहज भावना से चोर का हृदय परिवर्तित हो गया। उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और खेती को अपना लिया।

प्रश्न 6. ‘शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है’ -इस दिशा में लेखिका के प्रयासों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस दिशा में लेखिका ने अथक प्रयास किए। उसने कर्नाटक के बागलकोट जैसे छोटे से कस्बे में रहते हुए इस दिशा में सोचना शुरू किया। उसने कैथोलिक विशप से प्रार्थना की कि उनका मिशन वहाँ के सीमेंट कारखाने से मदद लेकर वहाँ स्कूल खोल दे, पर वे इसके लिए तैयार न हुए। तब लेखिका ने अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ तीन भाषाएँ सिखाने वाला स्कूल खोला और उसे कर्नाटक सरकार से मान्यता दिलवाई। इस स्कूल के बच्चे बाद में अच्छे स्कूलों में प्रवेश पा गए।

प्रश्न 7. पाठ के आधार पर लिखिए कि जीवन में कैसे इंसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है?

उत्तर: इस पाठ के आधार पर स्पष्ट है कि ऊँची भावना वाले दृढ़ संकल्पी लोगों को श्रद्धा से देखा जाता है। जो लोग सद्भावना से व्यवहार करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर गलत रूढ़ियों को तोड़ डालने की हिम्मत रखते हैं, समाज में उनका खूब आदर-सम्मान होता है।

लेखिका की नानी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने परिवार और समाज से विरोध लेकर भी अपनी पुत्री को किसी क्रांतिकारी से ब्याहने की बात कही। इस कारण वह सबकी पूज्या बन गईं। लेखिका की परदादी इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने दो धोतियों से अधिक संचय न करने का संकल्प किया था। उसने परंपरा के विरुद्ध लड़के की बजाय लड़की होने की मन्नत मानी।

लेखिका की माता इसलिए श्रद्धेया बनी क्योंकि उसने देश की आज़ादी के लिए कार्य किया। कभी किसी से झूठ नहीं बोला। कभी किसी की गोपनीय बात को दूसरे को नहीं बताया। ये सभी व्यक्तित्व सच्चे थे, लीक से परे थे तथा दृढ़ निश्चयी थे। इस कारण इनका सम्मान हुआ। इन पर श्रद्धा प्रकट की गई।

प्रश्न 8. ‘सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है’ -इस कथन के आधार पर लेखिका की बहन एवं लेखिका के व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर: “सच, अकेलेपन का मजा ही कुछ और है।” इस कथन के आधार पर ज्ञात होता है कि लेखिका और उसकी बहन दोनों ही अपने दृढ़ निश्चय और जिद्दीपन के कारण उक्त कथन को चरितार्थ ही नहीं करती हैं बल्कि उसका आनंद भी उठाती हैं। लेखिका की बहन रेणु तो लेखिका से भी दो कदम आगे थी। वह गरमी में भी उस गाड़ी में नहीं आती थी जिसे उसके पिता ने स्कूल से उसे लाने के लिए लगवा रखा था। एक बहन गाड़ी में आती थी जबकि रेणु पैदल। इसी तरह शहर में एक बार नौ इंच बारिश होने पर शहर में पानी भरने के कारण घरवालों के मना करते रहने पर भी वह लब-लब करते पानी में स्कूल गई और स्कूल बंद देखकर लौट आई।

लेखिका ने बिहार के डालमिया शहर में रूढ़िवादी स्त्री-पुरुषों के बीच जहाँ जागृति पैदा की और उनके साथ नाटक करते हुए सूखा राहत कोष के लिए धन एकत्र किया वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के छोटे से कस्बे में बच्चों के लिए स्कूल खोला और मान्यता दिलवाई, यह काम लेखिका ने अकेले ही शुरू किया था।

पाठ से जुड़े अन्य प्रश्न व उत्तर

प्रश्न 1. लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का क्या कारण मानती है?

उत्तर: लेखिका खुद और अपनी दो बहिनों को लेखन में आने का कारण यह मानती हैं कि वे अपनी नानी से कहानी नहीं सुन पाईं क्योंकि उनकी माँ की शादी होने से पूर्ण ही नानी की मृत्यु हो चुकी थी। शायद नानी से कहानी न सुन पाने के कारण लेखिका और उसकी बहनों को खुद कहानियाँ कहनी पड़ीं। इससे वे लेखिका बन गईं।

प्रश्न 2. लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे क्या जान पाई थी?

उत्तर: लेखिका पहले पहल अपनी नानी के बारे में बस इतना ही जान पाई थी कि उसकी नानी पारंपरिक, अनपढ़ और परदा करने वाली महिला थी। उनके पति उन्हें छोड़कर वकालत की पढ़ाई करने इंग्लैंड चले गए थे। वकालत की डिग्री लेकर लौटने के बाद वे साहबों जैसी जिंदगी व्यतीत करने लगे पर नानी पर इसका कोई अंतर नहीं पड़ा। वे अपनी मरजी से जीती रहीं और अपनी किसी पसंद-नापसंद का इज़हार अपने पति के सामने कभी नहीं किया।

प्रश्न 3. लेखिका की नानी ने स्वतंत्रता सेनानी प्यारे लाल शर्मा से कौन-सी इच्छा प्रकट की? यह इच्छा उन्होंने अपने पति से क्यों नहीं बताई?

उत्तर: लेखिका की नानी ने जब कम उम्र में ही स्वयं को मृत्यु के निकट पाया तो उन्होंने अपने पति के मित्र प्यारे लाल शर्मा को बुलवाया और कहा कि आप मेरी बेटी की शादी अपने जैसे ही किसी आज़ादी के सिपाही से करवा दीजिएगा। उन्होंने यह इच्छा अपने पति को इसलिए नहीं बताई क्योंकि वे जानती थी कि अंग्रेज़ों के भक्त उनके पति उनकी इस इच्छा को पूरा नहीं करेंगे। वे बेटी की शादी आज़ादी के सिपाही से होने को पसंद न करते।।

प्रश्न 4. लेखिका ने लिखा है कि उसकी नानी एकदम मुँहज़ोर हो उठीं। वे कब और क्यों मुँहज़ोर हो उठीं?

उत्तर: लेखिका की नानी उस समय मुँहज़ोर हो उठी थी जब वे कम उम्र में यह महसूस करने लगी कि उनकी मृत्यु निकट है। और उनकी इकलौती पंद्रह वर्षीया बेटी अभी अविवाहित है। उनके मुँहजोर होने का कारण अपने पति का आचार-विचार था। उनके उच्च शिक्षित पति अंग्रेजों के भक्त थे जबकि लेखिका की नानी स्वतंत्रताप्रिय नारी थीं। वे अपनी बेटी का विवाह किसी साहब से नहीं बल्कि आज़ादी के सिपाही से करने की पक्षधर थीं।

प्रश्न 5. लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई क्यों कहा है? ससुराल में उनकी क्या स्थिति थी?

उत्तर: लेखिका ने अपनी माँ को परीजात-सी जादुई इसलिए कहा है क्योंकि उनमें खूबसूरती, नज़ाकत गैर दुनियादारी, ईमानदारी और निष्पक्षता जैसे गुणों का संगम था। इन गुणों के कारण ससुराल में उनकी स्थिति यह थी कि उनसे कोई ठोस काम करने के लिए कोई नहीं कहता था। हर काम के लिए उनकी ज़बानी राय जरूर माँगी जाती थी और उनकी राय को अकाट्य समझते हुए उस पर अमल भी किया जाता था।

बच्चों!

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Rajasthan Ki Rajat Boonde Class 11 Summary

Rajasthan Ki Rajat Boonde Class 11 Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आल हम कक्षा 11वीं की पाठ्यपुस्तक वितान भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे

राजस्थान की रजत बूंदें’

Rajasthan Ki Rajat Boonde Class 11th Chapter 2 Hindi Vitan Part 1

This Post Includes

बच्चों पार के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय करे जानते हैं।

लेखक परिचय: अनुपम मिश्र

अनुपम मिश्र का जन्म जन्म- 1948 में वर्धा में हुआ था। शिक्षा की बात करें तो मिश्र ने स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। अनुपम मिश्र जाने माने गांधीवादी पर्यावरणविद् हैं। पर्यावरण के लिए वह तब से काम कर रहे हैं, जब देश में पर्यावरण का कोई विभाग नहीं खुला था। बगैर बजट के बैठकर मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस बारीकी से खोज-खबर ली है। गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। वे इस प्रतिष्ठान की पत्रिका गाँधी मार्ग के संस्थापक और संपादक भी है। उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्वपूर्ण काम किया है।

Anupam Mishr

वे 2001 में दिल्ली में स्थापित सेंटर फार एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिये सहयोग किया था। उनकी पुस्तक आज भी खारे हैं तालाब ब्रेल सहित 13 भाषाओं में प्रकाशित हुई जिसकी 1 लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं। उन्हें 2001 में उन्होंने टेड (टेक्नोलॉजी एंटरटेनमेंट एंड डिजाइन) द्वारा आयोजित सम्मेलन को संबोधित किया।

पुरस्कार: अनुपम मिश्र को 1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 2007-08 में मध्यप्रदेश सरकार के चंद्रशेखर आज़ाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2011 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

पाठ का सार: राजस्थान की रजत बूंदें

“राजस्थान की रजत बूंदें” के लेखक प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र जी हैं। यह पाठ उनकी ही प्रसिद्ध किताब “राजस्थान की रजत बूंदें” का एक छोटा सा अंश हैं जिसमें उन्होंने राजस्थान की मरूभूमि में अमृत समान मीठे पानी के स्रोत “कुंई” व उनको बनाने वाले “चेलवांजी” के बारे में विस्तार से वर्णन किया है।

राजस्थान में “कुंई” का निर्माण रेत में समाए वर्षा के पानी को इकठ्ठा करने के लिए किया जाता है। “कुंई” की खुदाई और चिनाई करने वाले दक्ष लोगों को “चेलवांजी” या “चेजारो” कहा जाता है। “कुंई” की खुदाई के काम को “चेजा” कहा जाता है।

कुआँ और कुंई में अंतर

कुआँ एक पुलिंग शब्द हैं। कुँए में भूजल (भूमि के अंदर का पानी) इकठ्ठा होता हैं जो राजस्थान में खारा होता हैं। यह पीने योग्य नही होता हैं। कुँए का व्यास व गहराई काफी होती हैं।

जबकि “कुंई” एक स्त्रीलिंग शब्द हैं जिसमें वर्षा का मीठा व पीने योग्य जल इकठ्ठा होता हैं। जब वर्षा नहीं भी होती हैं तब भी उसका जल बड़े विचित्र ढंग से इसमें इकठ्ठा होता हैं। कुंई में जमा पानी न तो भूमि की सतह पर बहने वाला पानी (नदी या तालाब का पानी) हैं और न ही भूजल (कुँए का पानी)। यह तो रेत के अंदर नमी के रूप में इकठ्ठा वर्षा का जल हैं जो धीरे-धीरे बूँद बनकर कुंई में इकठ्ठा होता रहता हैं।

कुंई का व्यास कुएँ से कम होता हैं लेकिन गहराई लगभग कुएँ के बराबर ही होती हैं। लेकिन राजस्थान के अलग -अलग क्षेत्रों में कुंईयों की गहराई अलग–अलग हो सकती हैं।

लेखक कहते हैं कि चेलवांजी पूरी तरह से पसीने से तरबतर होकर एक कुंई की खुदाई कर रहे हैं अभी तक वो तीस-पैतीस हाथ तक की गहरी खुदाई कर चुके हैं। कुंई का व्यास बहुत ही कम होता है जिसके कारण खुदाई का काम कुल्हाड़ी या फावड़े से करने के बजाय बसौली (फावड़े जैसा ही एक छोटा सा औजार जिसका फल लोहे का और हत्था लकड़ी का होता हैं) से किया जाता है।

कुंई की गहराई में लगातार बढ़ती गर्मी को कम करने के लिए ऊपर जमीन में खड़े लोगों द्वारा बीच-बीच में मुट्ठी भर रेत बहुत जोर से नीचे फेंकी जाती हैं जिससे ताजी हवा नीचे जाती है और नीचे की गर्म हवा ऊपर लौट आती है। ऊपर से फेंकी गयी रेत से बचने के लिए चेलवांजी अपने सिर पर धातु का एक बर्तन, टोप (टोपी) की तरह पहन लेते हैं।

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लेखक कहते हैं कि राजस्थान की मरुभूमि में रेत का विस्तार और गहराई अथाह है। अगर यहां अधिक मात्रा में वर्षा होती हैं तो, वो भी तुरंत भूमि में समा जाती है यानि वर्षा का पानी जमीन के ऊपर ज्यादा देर नही रुकता हैं। वो तुरंत रेत में समा जाता हैं।

पर इसी मरुभूमि में कहीं-कहीं रेत की सतह के नीचे खड़िया पत्थर की एक लम्बी-चौड़ी पट्टी चलती है। यह पट्टी रेत की सतह से दस -पंद्रह हाथ नीचे से लेकर पचास – साठ हाथ नीचे तक हो सकती हैं। रेत के नीचे दबे होने के कारण यह खड़िया पट्टी ऊपर से नही दिखाई देती हैं। ऐसे क्षेत्रों में कुँई खोदते समय मिट्टी में हो रहे परिवर्तन से खड़िया पट्टी का पता चलता हैं।

यही खड़िया पट्टी ही वर्षा के जल को गहरे खारे भूजल में मिलने से रोकती है। वर्षा होने पर, उस बड़े क्षेत्र में वर्षा का पानी, भूमि की रेतीली सतह के नीचे और नीचे चल रही खड़िया पत्थर की पट्टी के ऊपर यानि इन दोनों बीच में अटक कर नमी की तरफ फैल जाता है।

रेत के कण बहुत बारीक होते हैं और मरुभूमि में ये समान रूप से बिखरे रहते हैं। पानी गिरने पर ये कण थोड़े भारी जरूर हो जाते हैं मगर न ही ये कण आपस में चिपकते हैं और न ही अपनी जगह छोड़ते हैं जिस कारण मिट्टी में दरार नहीं पड़ती हैं और भीतर समाया वर्षा का जल भीतर ही बना रहता है , गर्मी से भाप बनकर उड़ता नही हैं।

इस क्षेत्र में बरसी पानी की एक -एक बूँद रेत में समा कर नमी में बदल जाती है। कुँई बनने पर रेत में समाई यही नमी, फिर से पानी की बूंदों में बदल कर कुँई में इकठ्ठा होने लगती हैं और यही पानी खारे पानी के सागर में अमृत जैसा मीठा होता है।

यहां पानी को तीन भागों में बांटा गया है।

  1. पालरपानी यानी सीधे वर्षा से मिलने वाला पानी। यह धरातल पर बहता है और इससे नदी या तालाब आदि में रोका जाता है।
  2. पातालपानी यानि भूजल। यह वही भूजल है जो कुओं से निकाला जाता है मगर यह खारा होता है।
  3. रेजाणीपानी यानि धरती की सतह के नीचे लेकिन पाताल में न मिल पाये पानी को रेजाणीपानी कहते है। रेजाणीपानी ही खड़िया पत्थर की पट्टी के कारण पातालपानी में नहीं मिल पाता है। इसी रेजाणीपानी को इकठ्ठा करने के लिए कुँई का निर्माण किया जाता है। राजस्थान में वर्षा की मात्रा को इंच या सेंटीमीटर में नापने के बजाय “रेजा” में नापा जाता हैं।

इस अमृत समान रेजाणीपानी को समेटने वाली कुँई को बनाना भी एक विशिष्ट कला हैं। चार -पांच हाथ व्यास की कुँई की तीस से साठ -पैंसठ हाथ की खुदाई और चिनाई के काम में जरा सी भी चूक चेजोरो (खुदाई और चिनाई करने वाला) की जान ले सकती हैं।

बीस -पच्चीस हाथ की खुदाई होने पर ही कुँई के अंदर की गर्मी बढ़ने लगती है और हवा कम होने लगती है। तब ऊपर से मुठ्ठी भर -भर कर रेत नीचे तेजी से फेंकी जाती हैं जिससे नीचे काम कर रहे चेलवांजी को राहत मिल जाती है।

किसी-किसी जगह कुँई बनाते समय ईट की चिनाई से मिट्टी को रोकना संभव नहीं हो पाता है। तब कुँई को खींप (एक प्रकार की घास जिससे रस्सी बनाई जाती हैं) की रस्सी से बांधा जाता हैं। और कही-कही कुँई की चिनाई अरणी, बण (कैर), आक, बावल या कुंबट के पेड़ों की टहनियों से बने लट्ठों से की जाती हैं।

ये लठ्ठे नीचे से ऊपर की ओर एक दूसरे में फंसा कर सीधे खड़े किए जाते हैं। फिर इन्हें खींप या चग की रस्सी से बांधा जाता है। यह बँधाई भी कुंडली का आकार लेती है। इसीलिए इसे साँपणी भी कहते हैं।

कुँई के भीतर खुदाई और चिनाई का काम कर रहे चेलवांजी को मिट्टी की खूब परख होती है। खड़िया पत्थर की पट्टी आते ही वह अपना काम रोक कर ऊपर आ जाते हैं।

पहले कुँई की सफल खुदाई के बाद उत्सव मनाया जाता था व विशेष भोज का आयोजन किया जाता था। चेलवांजी को विदाई के समय तरह-तरह की भेंट दी जाती थी। आच प्रथा के तहत उन्हें वर्ष भर के तीज त्यौहारों, विवाह जैसे मंगलिक अवसरों पर भेंट दी जाती थी।

फसल कटने पर खेत – खलिहानों में उनके नाम से अनाज का अलग ढेर भी लगाया जाता था।लेकिन अब सिर्फ मजदूरी देकर भी काम करवाने का रिवाज आ गया है।

कुँई का मुंह छोटा रखने के तीन बड़े कारण हैं।

  1. कुँई में पानी बूँद-बूँद कर धीरे-धीरे इकठ्ठा होता हैं। दिन भर में मुश्किल से दो -तीन घड़े पानी ही जमा हो पाता हैं। ऐसे में कुँई का व्यास ज्यादा होगा तो पानी तले में ही फ़ैल जायेगा जिसे निकलना सम्भव नही हैं। कम व्यास में यह पानी दो -चार हाथ ऊपर आ जाता हैं जिसे बाल्टी या चड़स से आसानी से निकाल लिया जाता हैं। 
  2. कुँई का मुंह छोटा होने से पानी भाप बनकर उड़ नही पाता हैं।
  3. कुँई का पानी साफ रखने के लिए उसका मुंह छोटा होना जरूरी हैं । कुँई के मुंह को लकड़ी से बने ढक्क्न या कहीं-कहीं खस की टट्टी की तरह घास -फूस या छोटी-छोटी टहनियों से बने ढक्कनों से ढक दिया जाता हैं। 

गहरी कुँई से पानी खींचने की सुविधा के लिए उसके ऊपर धीरनी या चकरी लगाई जाती है। यह गरेड़ी, चरखी या फरेड़ी भी कहलाती हैं।

यहां खड़िया पत्थर की पट्टी एक बड़े भाग से गुजरती हैं। इसीलिए उस पूरे हिस्से में बहुत सारी कुँईयों एक साथ बनाई जाती हैं। गांव में हरेक की अपनी-अपनी अलग कुँई होती है तथा उसे बनाने या उससे पानी लेने का हक भी उसका अपना होता है लेकिन कुँई का निर्माण समाज गांव की सार्वजनिक जमीन पर किया जाता है। इसीलिए निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में बनी कुँई के ऊपर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है।

राजस्थान में रेत के नीचे सब जगह खड़िया पट्टी ना होने के कारण कुँई हर जगह नहीं मिलेती हैं। चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के कई क्षेत्रों में यह पट्टी चलती है। इसी कारण वहां गांव – गांव में कुँईयों है।

अलग -अलग जगह पर खड़िया पट्टी के नाम भी अलग -अलग हैं जैसे चारोली, धाधड़ों, धड़धड़ों, बिट्टू रो बल्लियों व खड़ी हैं। इसी खड़ियापट्टी के बल पर राजस्थान की कुँईयों खारे पानी के बीच मीठा पानी देती है।

Rajasthan Ki Rajat Boonden Chapter 2 Question Answers

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न. 1. राजस्थान में कुंई किसे कहते हैं? इसकी गहराई और व्यास तथा सामान्य कुओं की गहराई और व्यास में क्या अंतर होता है?

उत्तर: राजस्थान में रेत अथाह है। वर्षा का पानी रेत में समा जाता है, जिससे नीचे की सतह पर नमी फैल जाती है। यह नमी खड़िया मिट्टी की परत के ऊपर तक रहती है। इस नमी को पानी के रूप में बदलने के लिए चार-पाँच हाथ के व्यास की जगह को तीस से साठ हाथ की गहराई तक खोदा जाता है। खुदाई के साथ-साथ चिनाई भी की जाती है। इस चिनाई के बाद खड़िया की पट्टी पर रिस-रिस कर पानी एकत्र हो जाता है। इसी तंग गहरी जगह को कुंई कहा जाता है। यह कुएँ का स्त्रीलिंग रूप है। यह कुएँ से केवल व्यास में छोटी होती है, परंतु गहराई में लगभग समान होती है। आम कुएँ का व्यास पंद्रह से बीस हाथ का होता है, परंतु कुंई का व्यास चार या पाँच हाथ होता है।

प्रश्न. 2. दिनोदिन बढ़ती पानी की समस्या से निपटने में यह पाठ आपकी कैसे मदद कर सकता है तथा देश के अन्य राज्यों में इसके लिए क्या उपाय हो रहे हैं? जानें और लिखें।

उत्तर: मनुष्य ने प्रकृति का जैसा दोहन किया है, उसी का अंजाम आज मनुष्य भुगत रहा है। जंगलों की कटाई भूमि का जल स्तर घट गया है और वर्षा, सरदी, गरमी आदि सभी अनिश्चित हो गए हैं। इसी प्राकृतिक परिवर्तन से मनुष्य में अब कुछ चेतना आई है। अब वह जल संरक्षण के उपाय खोजने लगा है। इस उपाय खोजने की प्रक्रिया में राजस्थान सबसे आगे है, क्योंकि वहाँ जल का पहले से ही अभाव था। इस पाठ से हमें जल की एक-एक बूंद का महत्त्व समझने में मदद मिलती है। पेय जल आपूर्ति के कठिन, पारंपरिक, समझदारीपूर्ण तरीकों का पता चलता है।

अब हमारे देश में वर्षा के पानी को एकत्र करके उसे साफ़ करके प्रयोग में लाने के उपाय और व्यवस्था सभी जगह चल रही है। पेय जल आपूर्ति के लिए नदियों की सफ़ाई के अभियान चलाए जा रहे हैं। पुराने जल संसाधनों को फिर से प्रयोग में लाने पर बल दिया जा रहा है। राजस्थान के तिलोनिया गाँव में पक्के तालाबों में वर्षा का जल एकत्र करके जल आपूर्ति के साथ-साथ बिजली तक पैदा की जा रही है जो एक मार्गदर्शक कदम है। कुंईनुमा तकनीक से पानी सुरक्षित रहता है।

प्रश्न. 3. चेजारो के साथ गाँव समाज के व्यवहार में पहले की तुलना में आज क्या फ़र्क आया है, पाठ के आधार पर बताइए?

उत्तर: ‘चेजारो’  अर्थात् चिनाई करने वाले। कुंई के निर्माण में ये लोग दक्ष होते हैं। राजस्थान में पहले इन लोगों का विशेष सम्मान था। काम के समय उनका विशेष ध्यान रखा जाता था। कुंई खुदने पर चेलवांजी को विदाई के समय तरह-तरह की भेंट दी जाती थी। इसके बाद भी उनका संबंध गाँव से जुड़ा रहता था। प्रथा के अनुसार कुंई खोदने वालों को वर्ष भर सम्मानित किया जाता था। उन्हें तीज-त्योहारों में, विवाह जैसे मंगल अवसरों पर नेग, भेंट दी जाती थी। फसल आने पर उनके लिए अलग से अनाज निकाला जाता था। अब स्थिति बदल गई है, आज उनका सम्मान कम हो गया है। अब सिर्फ मजदूरी देकर काम करवाया जाता है।

प्रश्न. 4. निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुंइयों पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा?

उत्तर: जल और विशेष रूप में पेय जल सभी के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। कुंई का जल और रेगिस्तान की गरमी की तुलना करें तो जल अमृत से बढ़कर है। ऐसे में अपनी-अपनी व्यक्तिगत कुंई बना लेना और मनमाने ढंग से उसका प्रयोग करना समाज के अंकुश से परे हो जाएगा। अतः सार्वजनिक स्थान पर बनी व्यक्तिगत कुंई पर और उसके प्रयोग पर समाज का अंकुश रहता है। यह भी एक तथ्य है कि खड़िया की पट्टी वाले स्थान पर ही कुंई बनाई जाती हैं और इसीलिए एक ही स्थान पर अनेक कुंई बनाई जाती हैं। यदि वहाँ हरेक अपनी कुंई बनाएगा तो क्षेत्र की नमी बँट जाएगी जिससे कुंई की पानी एकत्र करने की क्षमता पर फर्क पड़ेगा।

प्रश्न. 5. कुंई निर्माण से संबंधित निम्न शब्दों के बारे में जानकारी प्राप्त करें पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी।

उत्तर: पालरपानी-यह पानी का वह रूप है जो सीधे बरसात से मिलता है। यह धरातल पर बहता है और इसे नदी, तालाब आदि में रोका जाता है। इस पानी का वाष्पीकरण जल्दी होता है। काफी पानी जमीन के अंदर चला जाता है। पातालपानी-जो पानी भूमि में जाकर भूजल में मिल जाता है, उसे पाताल पानी कहते हैं। इसे कुओं, पंपों, ट्यूबबेलों आदि के द्वारा निकाला जाता है। रेजाणीपानी-यह पानी धरातल से नीचे उतरता है, परंतु पाताल में नहीं मिलता है। यह पालरपानी और पातालपानी के बीच का है। वर्षा की मात्रा नापने में इंच या सेंटीमीटर नहीं, बल्कि ‘रेजा’ शब्द का उपयोग होता है। रेज का माप धरातल में समाई वर्षा को नापता है। रेजाणी पानी खड़िया पट्टी के कारण पाताली पानी से अलग बना रहता है तथा इसे कुंइयों के माध्यम से इकट्ठा किया जाता है।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न. 1. कुंई का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर: कुंई राजस्थान के रेगिस्तान में मीठे पानी से पोषण करनेवाली एक कलात्मक कृति है। इसे बनाने में वहाँ के लोगों का पीढ़ी दर पीढ़ी का अनोखा अनुभव लगा है और एक समूचा शास्त्र विकसित किया गया है। राजस्थान में जल की कमी तो सदा से ही है। इसे पूरा करने के लिए कुएँ, तालाब, बावड़ी आदि का प्रयोग होता है। कुंई मीठे पानी का संग्रह स्थल है। मरुभूमि में रेत का विस्तार और गहराई अथाह है। यहाँ वर्षा अधिक मात्रा में भी हो तो भी शीघ्रता से भूमि में समा जाती है। पर कहीं-कहीं मरुभूमि में रेत की सतह के नीचे प्रायः दस-पंद्रह से पचास-साठ हाथ नीचे खड़िया पत्थर की एक पट्टी चलती है। यह पट्टी जहाँ भी है वहाँ वर्षा का जल भू-तल के जल में नहीं मिल पाता, यह पट्टी उसे रोकती है।

यह रुका हुआ पानी संग्रह कर प्रयोग में लाने की विधि है-कुंई इसे छोटे व्यास में गहरी खुदाई करके बनाया जाता है। इसकी खुदाई एक छोटे उपकरण बसौली से की जाती है। खुदाई के साथ-साथ चिनाई का काम भी चलता रहता है। चिनाई ईंट-पत्थर, खींप की रस्सी और लकड़ी के लट्ठों से की जाती है। यह सब कार्य एक कुशल कारीगर चेलवांजी या चेजारो द्वारा किया जाता है। ये पीढ़ियों के अनुभव से अपने काम में माहिर होते हैं। समाज में इनका मान होता है। कुंई में खड़िया पट्टी पर रेत के नीचे इकट्ठा हुआ जल बूंद-बूंद करके रिस-रिसकर एकत्र होता जाता है। इसे प्रतिदिन दिन में एक बार निकाला जाता है। ऐसा लगता है प्रतिदिन सोने का एक अंडा देनेवाली मुरगी की कहानी कुंई पर भी लागू होती है। कुंई निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में होती हैं। उन पर ग्राम-समाज का अंकुश लगा रहता है।

प्रश्न. 2. राजस्थान में कुंई क्यों बनाई जाती हैं? कुंई से जल लेने की प्रक्रिया बताइए।

उत्तर: राजस्थान में थार का रेगिस्तान है जहाँ जल का अभाव है। नदी-नहर आदि तो स्वप्न की बात है। तालाबों और बावड़ियों के जल से नहाना, धोना और पशुधन की रक्षा करने का काम किया जाता है। कुएँ बनाए भी जाते हैं तो एक तो उनका जल स्तर बहुत नीचे होता है और दूसरा उनसे प्राप्त जल खारा (नमकीन) होता है। अतः पेय जल आपूर्ति और भोजन बनाने के लिए कुंई के पानी का प्रयोग किया जाता है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजस्थान में कुंई बनाई जाती जब कुंई तैयार हो जाती है तो रेत में से रिस-रिसकर जल की बूंदें कुंई में टपकने लगती हैं और कुंई में जल इकट्ठा होने लगता है। इस जल को निकालने के लिए गुलेल की आकृति की लकड़ी लगाई जाती है। उसके बीच में फेरडी या घिरणी लगाकर रस्सी से चमड़े की थैली बाँधकर जल निकाला जाता है। आजकल ट्रक के टॉयर की भी चड़सी बना ली। जाती है। जल निकालने का काम केवल दिन में एक बार सुबह-सुबह किया जाता है। उसके बाद कुंई को ढक दिया जाता।

प्रश्न. 3. कुंई और कुएँ में क्या अंतर है?

उत्तर: कुंई का व्यास संकरा और गहराई कम होती है। इसकी तुलना में कुएँ का व्यास और गहराई कई गुना अधिक होती है। कुआँ भू-जल को पाने के लिए बनाया जाता है पर कुंई वर्षा के जल को बड़े ही विचित्र ढंग से समेटने का साधन है। कुंई बनाने के लिए खड़िया पट्टी का होना अति आवश्यक है जो केवल भू-गर्भ जानकारी वाले लोग ही बताते हैं, जबकि कुएँ के लिए यह जरूरी नहीं है। कुंई मीठे पानी का संग्रह स्थल है, जबकि कुआँ प्रायः खारे पानी का स्रोत होता है।

प्रश्न. 4. कुंई का मुँह छोटा रखने के क्या कारण हैं?

उत्तर:  कुंई का मुँह छोटा रखने के निम्नलिखित तीन बड़े कारण हैं

  1. रेत में जमा पानी कुंई में बहुत धीरे-धीरे रिसता है। अतः मुँह छोटा हो तभी प्रतिदिन जल स्तर पानी भरने लायक बन पाता है।
  2. बड़े व्यास से धूप और गरमी में पानी के भाप बनकर उड़ जाने का खतरा बना रहता है।
  3. कुंई की स्वच्छता और सुरक्षा के लिए उसे ढककर रखना जरूरी है; मुँह छोटा होने से यह कार्य आसानी से किया जा सकता है।

प्रश्न. 5. खड़िया पट्टी का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की मरुभूमि में रजकणों के नीचे खूब गहराई में खड़िया पत्थर की परत पाई जाती है। यह परत काफ़ी कठोर होती है। इसी परत के कारण रजकणों द्वारा सोख लिया गया जल नीचे भूल-तल के जल में नहीं मिलता और उससे ऊपर रह जाता है। रेत के नीचे सब जगह खड़िया की पट्टी नहीं है। इसलिए कुंई भी सारे राजस्थान में नहीं मिलतीं। चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के कई क्षेत्रों में यह पट्टी चलती है और इसी कारण वहाँ गाँव-गाँव में कुंइयाँ हैं। जैसलमेर जिले के एक गाँव खडेरों की ढाणी में तो एक सौ बीस कुइयाँ थीं। लोग इस क्षेत्र को छह-बीसी (छह गुणा बीस) कहते हैं। इस पट्टी को पार भी कहा जाता है। जैसलमेर तथा बाड़मेर के कई गाँव पार के कारण ही आबाद हैं। अलग-अलग जगहों पर खड़िया पट्टी के अलग-अलग नाम हैं। कहीं चह चारोली है तो कहीं धाधड़ों, धड़धड़ो, कहीं पर बिटू से बल्लियों के नाम से भी जानी जाती है। कहीं इस पट्टी को ‘खड़ी’ भी कहते हैं। इसी खड़ी के बल पर खारे पानी के बीच मीठा पानी देता हुई कुंई खड़ी रहती है।

प्रश्न. 6. ‘जो रेत के कण मरुभूमि को सूखा बनाते हैं, वे ही रेजाणीपानी का संग्रह करवाते हैं’  पाठ के आधार पर वर्णन कीजिए।

उत्तर: रेत के कण बहुत ही बारीक होते हैं। वे अन्यत्र मिलनेवाले मिट्टी के कणों की तरह एक-दूसरे से चिपकते नहीं। जहाँ लगाव है, वहाँ अलगाव भी होता है। जिस मिट्टी के कण परस्पर चिपकते हैं, वे अपनी जगह भी छोड़ते हैं और इसीलिए वहाँ कुछ स्थान खाली छूट जाता है। जैसे दोमट या काली मिट्टी के क्षेत्र में गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार आदि में वर्षा बंद होने के बाद धूप निकलने पर मिट्टी के कण चिपकने लगते हैं और धरती, खेत, आँगन में दरारें पड़ जाती हैं। धरती की संचित नमी इन दरारों से होकर उड़ जाती है, पर यहाँ के रेतीले कणों में बिखरे रहने में ही संगठन है।

मरुभूमि में रेत के कण समान रूप से बिखरे रहते हैं। यहाँ लगाव नहीं, इसलिए अलगाव भी नहीं होता। पानी गिरने पर कण थोड़े भारी हो जाते हैं, पर अपनी जगह नहीं छोड़ते। भीतर समाया वर्षा का जल भीतर ही रहता है। एक तरफ थोड़े नीचे चल-रही खड़िया पट्टी इसकी रखवाली करती है तो ऊपर से रेत के असंख्य कण इस जल पर कड़ा पहरा रखते हैं। इस हिस्से में बरसी वर्षा की बूंदें रेत में समाकर नमी में बदल जाती हैं। यहीं अगर कुंई बन जाए तो ये रज कण पानी की बूंदों को एक-एक कर कुंई में पहुँचा देते हैं। इसी कारण इस जल को रेजाणी पानी अर्थात् रजकणों से रिसकर आया पानी कहा जाता है। ये रजत कण बूंदों के रक्षक हैं जो रेजाणी पानी का कारण बनते हैं।

प्रश्न. 7. चेलवांजी तथा उसके द्वारा किए जानेवाले कार्य का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर: चेलवांजी अर्थात् चेजारो वह व्यक्ति है जो रेगिस्तानी इलाकों में कुंई खोदने के कार्य में कुशल होता है। इन क्षेत्रों में कुंई खोदना एक विशेष प्रक्रिया है। इसमें छोटे से व्यास की तीस से साठ हाथ तक खुदाई और उसके साथ-साथ चिनाई करनी पड़ती है। खुदाई के समय ज़मीन की नमी और हवा के अभाव में दमघोंटू वातावरण रहता है। चिनाई के लिए ईंट-पत्थर या खींप की रस्सी गिराई जाती है। सिर को चोट से बचाने के लिए पीतल या तांबे का टोप पहना जाता है। यह प्रक्रिया काफ़ी कठिन है।

प्रश्न. 8. राजस्थान में कुंई केवल जल आपूर्ति ही नहीं करतीं, सामाजिक संबंध भी बनाती हैं, कैसे? ।

उत्तर: कुंई जनसंपर्क स्थापित करने का काम करती हैं। कुंई की खुदाई करनेवाला चेलवांजी (चेजारो) तो जिस परिवार के लिए कुंई बनाता है उसका माननीय सदस्य बन जाता है, क्योंकि रेतीले मरुस्थल में जल सबसे कीमती अमृत माना जाता है। अतः चेजारो जलदाता है। उसका मान अन्नदाता से भी ऊपर है। केवल कुंई बनाने तक ही नहीं, उसे सदा के लिए तीजत्योहार, शादी-ब्याह में बुलाया जाता है और आदर के साथ भेंट दी जाती है। फ़सल के समय खलिहानों में भी उनके नाम का ढेर अलग से लगाया जाता है। चेजारो के अतिरिक्त कुंई सामान्य जनों को भी एक समान धरातल पर लाती है। निजी होने पर भी कुंई एक सार्वजनिक स्थान पर बनाई जाती है।

वहाँ अनेक कुंई होती हैं और पानी लेने का समय एक ही होता है। उसी समय गाँव में मेला-सा लगता है। सभी घिरनियाँ एक साथ घूमती हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते हैं। जल लेने के साथ-साथ सामाजिक जुड़ाव भी होता है। निजी होकर भी सार्वजनिक स्थान पर बनी कुइयाँ समाज को जल के नाम पर ही सही, समानता के धरातल पर ले आती हैं। अतः कुंई को सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, कलात्मक एवं पारंपरिक जल संसाधन कहा जा सकता है। ये सामाजिक संबंधों की सूत्रधारिणी हैं।

प्रश्न. 9. “राजस्थान में जल-संग्रह के लिए बनी कुंई किसी वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है।” तर्क सहित कथन की पुष्टि कीजिए।

उत्तर: ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है।’ – यह कथन राजस्थान की कुंई पर पूरी तरह सत्य सिद्ध होता है। जहाँ जल की जितनी कमी है वहीं इसे खोजने और संग्रह करने के अनेक तरीके खोज निकाले गए हैं। इसी प्रक्रिया में कुंई एक वैज्ञानिक खोज है। मरुभूमि के भीतर खड़िया की पट्टी को खोजना और उसे सतह के पानी को ऊपर लाना बड़ा दुर्गम कार्य है। पट्टी खोजने में भी पीढ़ियों का अनुभव काम आता है। कभी तो गहरे कुएँ खोदते समय इसकी जानकारी मिल जाती है पर कभी वर्षा के बाद पानी का रेत में न बैठना’ भी इसकी जानकारी देता है। कुंई के जल को पाने के लिए मरुभूमि के समाज ने खूब मंथन किया है। अपने अनुभवों को व्यवहार में उतारने का पूरा शास्त्र विकसित किया है।

दूसरा बड़ा वैज्ञानिक प्रक्रियावाला उदाहरण है-कुंई को खोदना इसमें चेजारों के कुंई खोदते समय दमघोंटू गरमी से छुटकारा पाने के लिए ऊपर से रेत फेंकना अनुभव विज्ञान ही तो है। तीसरी बात है-कुंई की चिनाई जो पत्थर, ईंट, खींप की रस्सी अथवा अरणी के लट्ठों से की जाती है। राजस्थान के मूल निवासियों की इस वैज्ञानिक खोज ने अब आधुनिक समाज को चमत्कृत कर दिया है। आज पूरा देश जल की कमी को पूरा करने के लिए राजस्थान को मार्गदर्शक मान रहा है।

प्रश्न. 10. कुंई की खुदाई को विशेष प्रक्रिया क्यों कहा गया है? विस्तार से स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कुंई जितनी उपयोगी है उतनी ही वैज्ञानिक और कलात्मक भी है। इसे खोदना साधारण या सामान्य लोगों के बस की बात नहीं है। सर्वप्रथम तो यह जाँच की जाती है कि मरुभूमि की वह जमीन जहाँ कुंई बनानी है, कुंई बनाने योग्य है या नहीं अर्थात् उसके नीचे खड़िया की पट्टी है तभी रेजाणीपानी मिल सकता है। उसके बाद छोटा व्यास खींचकर विशिष्ट चेजारो खुदाई का काम ‘आरंभ करता है। खुदाई के लिए फावड़ा या कुदाली का प्रयोग नहीं होता वरन् ‘बसौली’ नामक एक छोटी डंडी में लगे नुकीले फालवाले औजार से की जाती है। चेजारो की छाती और पीठ से एक हाथ दूर ही व्यास रहता है। इस संकरी जगह में और कोई यंत्र काम नहीं करता। जैसे-जैसे कुंई की गहराई बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ही भीतर घुटन बढ़ती है।

उसे दूर करने के लिए ऊपर जमीन पर खड़े लोग एक-एक मुट्ठी रेत फेंकते रहते हैं उसके साथ ताजी हवा कुंई में जाती। रहती है। छोटे से डोल (बाल्टीनुमा बरतन) में नीचे से रेत ऊपर भेजी जाती है। चिनाई का काम भी साथ-साथ चलता रहता है। अतः चेजारो सिर पर लोहे या पीतल/तांबे का टोप पहने रखता है। यह खुदाई की प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक खडिया की पट्टी नहीं आ जाती। खड़िया की पट्टी आने पर सजलती का उत्सव मनाया जाता है। जलधार आ जाती है। चेजारो ऊपर आ जाता है। विशेष भोज का आयोजन किया जाता है। चेजारो को तरह-तरह की भेंट दी जाती है। और विदा कर दिया जाता है, पर हर तीज-त्योहार, ब्याह-शादी और फ़सल के समय उन्हें मान के साथ भेंट दी जाती है, क्योंकि कुंई निर्माण की दुरुह प्रक्रिया की कला कुशल, विशिष्ट और अनुभव सिद्ध लोगों में ही होती है।

बच्चों!

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Utsaah & Att Nahi Rahi Class 10 Summary

Utsaah & Att Nahi Rahi Class10th Summary, Explanation and Question Answers

हैलो बच्चों!

आज हम कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 की कविता पढ़ेंगे

‘उत्साह’ और ‘अट नहीं रही’

Utsaah & Att Nahi Rahi Class 10 Chapter 5

कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

This Post Includes

बच्चों, कविता के भावार्थ को समझने से पहले कवि के जीवन परिचय को जानते हैं।

जीवन परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला

जीवन परिचय: दुखों व संघर्षों से भरा जीवन जीने वाले विस्तृत सरोकारों के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन काल सन 1899-1961 तक रहा। उनकी रचनओं में क्रांति, विद्रोह और प्रेम की उपस्थिति देखने को मिलती है। उनका जन्मस्थान कवियों की जन्मभूमि यानि बंगाल में हुआ।

साहित्य के क्षेत्र में उनका नाम अनामिका, परिमल, गीतिका आदि कविताओं और निराला रचनावली के नाम से प्रकाशित उनके संपूर्ण साहित्य से हुआ, जिसके आठ खंड हैं। स्वामी परमहंस एवं विवेकानंद जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेने वाले और उनके बताए पथ पर चलने वाले निराला जी ने भी स्वंत्रता-संघर्ष में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उत्साह कविता का भावार्थ

1.

बादल, गरजो! –

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

ललित ललित, काले घुंघराले,

बाल कल्पना के-से पाले,

विधुत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले!

वज्र छिपा, नूतन कविता

फिर भर दो–

बादल गरजो!

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बारिश होने से पहले आकाश में दिखने वाले काले बादलों के गरज़ने और आकाश में बिजली चमकने का अद्भुत वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि बादल धरती के सभी प्राणियों को नया जीवन प्रदान करते हैं और यह हमारे अंदर के सोये हुए साहस को भी जगाते हैं।

आगे कवि बादल से कह रहे हैं कि “हे काले रंग के सुंदर-घुंघराले बादल! तुम पूरे आकाश में फैलकर उसे घेर लो और खूब गरजो। कवि ने यहाँ बादल का मानवीयकरण करते हुए उसकी तुलना एक बच्चे से की है, जो गोल-मटोल होता है और जिसके सिर पर घुंघराले एवं काले बाल होते हैं, जो कवि को बहुत प्यारे और सुन्दर लगते हैं।

आगे कवि बादल की गर्जन में क्रान्ति का संदेश सुनाते हुए कहते हैं कि हे बादल! तुम अपनी चमकती बिजली के प्रकाश से हमारे अंदर पुरुषार्थ भर दो और इस तरह हमारे भीतर एक नये जीवन का संचार करो! बादल में वर्षा की सहायता से धरती पर नया जीवन उत्पन्न करने की शक्ति होती है, इसलिए, कवि बादल को एक कवि की संज्ञा देते हुए उसे एक नई कविता की रचना करने को कहते हैं।

2.

विकल विकल, उन्मन थे उन्मन

विश्व के निदाघ के सकल जन,

आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!

तप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो–

बादल, गरजो!

भावार्थ: कवि बादलों को क्रांति का प्रतीक मानते हुए यह कल्पना कर रहे हैं कि वह हमारे सोये हुए पुरुषार्थ को फिर से जगाकर, हमें एक नया जीवन प्रदान करेगा, हमें जीने की नई आशा देगा। कवि इन पंक्तियों में कहते हैं कि भीषण गर्मी के कारण दुनिया में सभी लोग तड़प रहे थे और तपती गर्मी से राहत पाने के लिए छाँव व ठंडक की तलाश कर रहे थे। किसी अज्ञात दिशा से घने काले बादल आकर पूरे आकाश को ढक लेते हैं, जिससे तपती धूप धरती तक नहीं पहुँच पाती। फिर बादल घनघोर वर्षा करके गर्मी से तड़पती धरती की प्यास बुझाकर, उसे शीतल एवं शांत कर देते हैं। धरती के शीतल हो जाने पर सारे लोग भीषण गर्मी के प्रकोप से बच जाते हैं और उनका मन उत्साह से भर जाता है।

इन पंक्तियों में कवि ये संदेश देना चाहते हैं कि जिस तरह धरती के सूख जाने के बाद भी बादलों के आने पर नये पौधे उगने लगते हैं। ठीक उसी तरह अगर आप जीवन की कठिनाइयों के आगे हार ना मानें और अपने पुरुषार्थ पर भरोसा रखकर कड़ी मेहनत करते रहें, तो आपके जीवन का बगीचा भी दोबारा फल-फूल उठेगा। इसलिए हमें अपने जीने की इच्छा को कभी मरने नहीं देना चाहिए और पूरे उत्साह से जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए।

कविता का भावार्थ: अट नहीं रही है

1.

अट नहीं रही है

आभा फागुन की तन

सट नहीं रही है।

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने फागुन के महीने की सुंदरता का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। होली के वक्त जो मौसम होता है, उसे फागुन कहते हैं। उस समय प्रकृति अपने चरम सौंदर्य पर होती है और मस्ती से इठलाती है। फागुन के समय पेड़ हरियाली से भर जाते हैं और उन पर रंग-बिरंगे सुगन्धित फूल उग जाते हैं। इसी कारण जब हवा चलती है, तो फूलों की नशीली ख़ुशबू उसमें घुल जाती है। इस हवा में सारे लोगों पर भी मस्ती छा जाती है, वो काबू में नहीं कर पाते और मस्ती में झूमने लगते हैं।

2.

कहीं साँस लेते हो,

घर-घर भर देते हो,

उड़ने को नभ में तुम

पर-पर कर देते हो,

आँख हटाता हूँ तो

हट नहीं रही है।

भावार्थ: इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि घर-घर में उगे हुए पेड़ों पर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। उन फूलों की ख़ुशबू हवा में यूँ बह रही है, मानो फागुन ख़ुद सांस ले रहा हो। इस तरह फागुन का महीना पूरे वातावरण को आनंद से भर देता है। इसी आनंद में झूमते हुए पक्षी आकाश में अपने पंख फैला कर उड़ने लगते हैं। यह मनोरम दृश्य और मस्ती से भरी हवाएं हमारे अंदर भी हलचल पैदा कर देती हैं। यह दृश्य हमें इतना अच्छा लगता है कि हम अपनी आँख इससे हटा ही नहीं पाते। इस तरह फागुन के मस्त महीने में हमें भी मस्ती से गाने एवं पर्व मनाने का मन होने लगता है।

3.

पत्तों से लदी डाल

कहीं हरी, कहीं लाल,

कहीं पड़ी है उर में

मंद गंध पुष्प माल,

पाट-पाट शोभा श्री

पट नहीं रही है।

भावार्थ: कवि के अनुसार फागुन मास में प्रकृति इतनी सुन्दर नजर आती है कि उस पर से नजर हटाने को मन ही नहीं करता। चारों तरफ पेड़ों पर हरे एवं लाल पत्ते दिखाई दे रहे हैं और उनके बीच रंग-बिरंगे फूल ऐसे लग रहे हैं, मानो पेड़ों ने कोई सुंदर, रंगबिरंगी माला पहन रखी हो। इस सुगन्धित पुष्प माला की ख़ुशबू कवि को बहुत ही मादक लग रही है। कवि के अनुसार, फागुन के महीने में यहाँ प्रकृति में होने वाले बदलावों से सभी प्राणी बेहद ख़ुश हो जाते हैं। कविता में कवि स्वयं भी बहुत ही खुश लग रहे हैं।

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UTSAAH & ATT NAHI RAHI QUESTION ANSWERS

‘उत्साह’ और ‘अट नहीं रही’ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर ‘गरजने के लिए कहता है, क्यों?

उत्तर: बच्चे की दंतुरित मुसकान को देखकर कवि का मन प्रसन्न हो उठता है। उसके उदास-गंभीर मन में जान आ जाती है। उसे ऐसे लगता है मानो उसकी झोंपड़ी में कमल के फूल खिल उठे हों। मानो पत्थर जैसे दिल में प्यार की धारा उमड़ पड़ी हो या बबूल के पेड़ से शेफालिका के फूल झरने लगे हों।।

क्यों बच्चे की निश्छलता और पिता की ममता के कारण ही कवि-मन इस तरह प्रभावित होता है। ”

प्रश्न 2. कविता का शीर्षक उत्साह क्यों रखा गया है?

उत्तर: कवि ने कविता का शीर्षक उत्साह इसलिए रखा है, क्योंकि कवि बादलों के माध्यम से क्रांति और बदलाव लाना चाहता है। वह बादलों से गरजने के लिए कहता है। एक ओर बादलों के गर्जन में उत्साह समाया है तो दूसरी ओर लोगों में उत्साह का संचार करके क्रांति के लिए तैयार करना है।

प्रश्न 3. कविता में बादल किन-किन अर्थों की ओर संकेत करता है?

उत्तर: कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को निम्नलिखित बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है

1. बच्चे की मुसकान से मृतक में भी जान आ जाती है।

2. यों लगता है मानो झोंपड़ी में कमल के फूल खिल उठे हों।

3. यों लगता है मानो चट्टानें पिघलकर जलधारा बन गई हों।

4. यों लगता है मानो बबूल से शेफालिका के फूल झरने लगे हों।

प्रश्न 4. शब्दों का ऐसा प्रयोग जिससे कविता के किसी खास भाव या दृश्य में ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा हो, नाद-सौंदर्य कहलाता है। उत्साह कविता में ऐसे कौन-से शब्द हैं जिनमें नाद-सौंदर्य मौजूद हैं, छाँटकर लिखें।

उत्तर: ‘उत्साह’ कविता में नाद सौंदर्य वाले शब्द निम्नलिखित हैं

बादल गरजो!

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

प्रश्न 5. जैसे बादल उमड़-घुमड़कर बारिश करते हैं वैसे ही कवि के अंतर्मन में भी भावों के बादल उमड़-घुमड़कर कविता के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। ऐसे ही किसी प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अपने उमड़ते भावों को कविता में उतारिए।

उत्तर:

ऊपर देखो आसमान में,

किसने रंग बिखेरा काला।

सूरज जाने कहाँ छिप गया,

खो गया उसका कहीं उजाला ॥

देख गगन का काला चेहरा

बिजली कुछ मुसकाई ।

लगा बहाने गगन बनाने,

ज्यों बिजली ने आँख दिखाई ॥

कुछ वसुधा में आन समाया॥

वह लाई एक थाल में पानी,

उसका मुँह धुलवाया।

थोड़ा पानी आसमान में

बाकी सब धरती पर आया ।।

कुछ टपका फूलों पर जाकर

कुछ ने चातक की प्यास बुझाया।

कुछ तालों कुछ फसलों तक

अन्य पाठेतर हल प्रश्न

प्रश्न 1. कवि ने क्रांति लाने के लिए किसका आह्वान किया है और क्यों ?

उत्तर: कवि ने क्रांति लाने के लिए बादलों का आह्वान किया है। कवि का मानना है कि बादल क्रांतिदूत हैं। उनके अंदर घोर गर्जना की शक्ति है जो लोगों को जागरूक करने में सक्षम है। इसके अलावा बादलों के हृदय में बिजली छिपी है।

प्रश्न 2. कवि युवा कवियों से क्या आवान करता है?

उत्तर: कवि युवा कवियों से आह्वान करता है कि वे प्रेम और सौंदर्य की कविताओं की रचना न करके लोगों में जोश और उमंग भरने वाली कविताओं की रचना करें, जो लोगों पर बज्र-सा असर करे और लोग क्रांति के लिए तैयार हो सकें।

प्रश्न 3. कवि ने ‘नवजीवन’ का प्रयोग बादलों के लिए भी किया है। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कवि बादलों को कल्याणकारी मानता है। बादल विविध रूपों में जनकल्याण करते हैं। वे अपनी वर्षा से लोगों की बेचैनी दूर करते हैं और तपती धरती का ताप शीतल करके मुरझाई-सी धरती में नया जीवन फेंक देते हैं। वे धरती को फ़सल उगाने योग्य बनाकर लोगों में नवजीवन का संचार करते हैं।

प्रश्न 4. बादल आने से पूर्व प्राणियों की मनोदशा का चित्रण कीजिए।

उत्तर: जब तक आसमान में बादलों का आगमन नहीं हुआ था, गरमी अपने चरम सीमा पर थी। इससे लोग बेचैन, परेशान और उदास थे। उन्हें कहीं भी चैन नहीं था। गरमी ने उनका जीना दूभर कर दिया था। उनका मन कहीं भी नहीं लग रहा था।

प्रश्न 5. कवि निराला बादलों में क्या-क्या संभावनाएँ देखते हैं?

उत्तर: कवि निराला बादलों में निम्नलिखित संभावनाएँ देखते हैं –

  • बादल लोगों को क्रांति लाने योग्य बनाने में समर्थ हैं।
  • बादल धरती और धरती के प्राणियों दोनों को नवजीवन प्रदान करते हैं।
  • बादल धरती और लोगों का ताप हरकर शीतलता प्रदान करते हैं।

प्रश्न 6. कवि ने बादलों के किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कवि ने बादलों को ‘आज्ञात दिशा के घन’ और ‘नवजीवन वाले’  जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है। कवि उन्हें अज्ञात दिशा के घन इसलिए कहा है क्योंकि बादल किस दिशा से आकर आकाश में छा गए, पता नहीं। इसके अलावा वे धरती और प्राणियों को नवजीवन देते हैं।

प्रश्न 7. ‘कहीं साँस लेते हो’ ऐसा कवि ने किसके लिए कहा है और क्यों?

अथवा

कवि ने फागुन का मानवीकरण कैसे किया है? ।

उत्तर: फागुन महीने में तेज हवाएँ चलती हैं जिनसे पत्तियों की सरसराहट के बीच साँय-साँय की आवाज़ आती है। इसे सुनकर ऐसा लगता है, मानो फागुन साँस ले रहा है। कवि इन हवाओं में फागुन के साँस लेने की कल्पना कर रहा है। इस तरह कवि ने फागुन का मानवीकरण किया है।

प्रश्न 8. ‘उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो’  के आलोक में बताइए कि फागुन लोगों के मन को किस तरह प्रभावित करता है?

उत्तर: ‘उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो’ से ज्ञात होता है कि फागुन में चारों ओर इस तरह सौंदर्य फैल जाता है कि वातावरण मनोरम बन जाता है। रंग-बिरंगे फूलों के खुशबू से हवा में मादकता घुल जाती है। ऐसे में लोगों का मन कल्पनाओं में खोकर उड़ान भरने लगता है।

प्रश्न 9. ‘अट नहीं रही है’ कविता के आधार पर फागुन में उमड़े प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर: फागुन का सौंदर्य अन्य ऋतुओं और महीनों से बढ़कर होता है। इस समय चारों ओर हरियाली छा जाती है। खेतों में कुछ फसलें पकने को तैयार होती हैं। सरसों के पीले फूलों की चादर बिछ जाती है। लताएँ और डालियाँ रंग-बिरंगे फूलों से सज जाती हैं। प्राणियों का मन उल्लासमय हुआ जाता है। ऐसा लगता है कि इस महीने में प्राकृतिक सौंदर्य छलक उठा है।

प्रश्न 10. ‘अट नहीं रही है’ कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: ‘अट नहीं रही है’ कविता में फागुन महीने के सौंदर्य का वर्णन है। इस महीने में प्राकृतिक सौंदर्य कहीं भी नहीं समा रहा है और धरती पर बाहर बिखर गया है। इस महीने सुगंधित हवाएँ वातावरण को महका रही हैं। पेड़ों पर आए लाल-हरे पत्ते और फूलों से यह सौंदर्य और भी बढ़ गया है। इससे मन में उमंगें उड़ान भरने लगी हैं।

तो बच्चो!

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Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Summary

Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Class 9th Poem Summary, Explanation and Question Answers

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हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक
क्षितिज भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे
‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’
Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17
पाठ के लेखक राजेश जोशी हैं।
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बच्चों, पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

कवि – राजेश जोशी

कवि और लेखक राजेश जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में 1946 में हुआ। जोशी साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार हैं।

उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता शुरू की और कुछ सालों तक अध्यापन किया। राजेश जोशी ने कविताओं के अलावा कहानियां, नाटक, लेख और टिप्पणियां भी लिखीं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं में भी कार्य किया।  जैसे – अंग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए।

उपलब्धियाँ

 उन्हें मुक्तिबोध पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार तथा साथ ही “साहित्य अकादमी पुरस्कार” के प्रतिष्ठित सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

रचनाएं

राकेश जोशी जी की रचनाएं कुछ इस प्रकार से हैं

कविता संग्रह

  • एक दिन बोलेंगे पेड़
  • मिट्टी का चेहरा
  • नेपथ्य में हँसी
  • दो पंक्तियों के बीच
  • कविता – बच्चे काम पर जा रहे है

कविता का सार

राजेश जोशी जी ने हमेशा मानवीय दुखों, खासकर के बच्चो और महिलाओं के दुखो को अपने कविता में स्थान दिया है। प्रस्तुत कविता में भी कवि इस बात से दुखी है की बहुत सारे बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हे अपना पेट भरने के लिए बचपन से ही काम पर लग जाना पड़ता है। न तो उन्हें पढ़ने का मौका मिलता है और न खेलना का मौका मिलता है और इस तरह उनसे उनका बचपन छीन लिया जाता है। और इसीलिए कविता में कवि यह प्रश्न पूछ रहा है की आखिर बच्चें काम पर क्यों जा रहे हैं ? उनके अनुसार यह बहुत ही भयावह है की छोटे-छोटे बच्चे सुबह-सुबह स्कूल जाने के बजाय काम पर जा रहे हैं।

उन्हें ऐसा लग रहा है की सारे खिलौने सारी किताबे, खेलने की जगह सब ख़तम हो गई है और इसलिए बच्चे काम पर पर जा रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि सब कुछ मौजूद है और कवि इसीलिए परेशान है। अपने इस कविता में कवि बाल मजूदरी पर अपना क्रोध वयक्त किया है। उनके अनुसार यह बहुत ही गलत बात है और सरकार तथा समाज  को इस बात जरुरु ध्यान देना चाहिए।

कविता का  भावार्थ 

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं

सुबह सुबह

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि राजेश जोशी जी ने हमारे समाज में चल रहे बाल-मजदूरी की समस्या को दिखाया है और हमारा ध्यान इस समस्या की और आकर्षित करने की कोशिश की है। कवि ने कविता की प्रथम पंक्तियों में ही लिखा है की बहुत ही ठण्ड का मौसम है और सुबह सुबह का वक्त है चारो तरफ कोहरा छाया हुआ है। सड़के भी कोहरे से ढँकी हुई है। परन्तु इतने ठण्ड में भी छोटे छोटे बच्चे कोहरे से ढकी सड़क पर चलते हुए अपने अपने काम पर जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करना है। कोई कारखाने में मजदूरी करता है तो कोई चाय के दुकान में काम करने के लिए मजबूर है। जबकि इन बच्चों की उम्र तो अभी खेलने कूदने की है।

बच्चे काम पर जा रहे हैं

हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना

लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने इस समाज में वयाप्त बाल-मजदूरी जैसी समस्या पर चिंतन करते हुए कहा है की हमारे समय की सबसे भयानक बात यह है की छोटे छोटे बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है। और उससे भी भयानक कवि को यह बात लग रही है हम यह बात कितनी ही सरलता से कह दे रहे हैं। जबकि हमें इसकी और ध्यान देना चाहिए और इसका कारण पता करना चाहिए की पढ़ने और खेलने के उम्र वाले बच्चे को अपना पेट पालने के लिए यूँ काम पर क्यों जाना पड़ रहा है। इसे हमें समाज में एक प्रश्न की तरह पूछना चाहिए की इन छोटे बच्चों को काम पर क्यों जाना पड़ रहा है जबकि इनकी उम्र अभी खेलने कूदने और पढ़ने लिखने की है।

क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें

क्या दीमकों ने खा लिया है

सारी रंग बिरंगी किताबों को

क्या काले पहाड़ के निचे दब गए हैं सारे खिलौने

क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं

सारे मदरसों की इमारतें

भावार्थ :- कवि बाल मजदूरों को सुबह भीषण ठण्ड एवं कोहरे के बिच अपने अपने काम में जाते देखता है जिसे देखकर कवि हताशा एवं निराशा से भर जाता है और और इसी कारण वश कवि के मन में कई तरह के सवाल उठने लगते हैं कवि को यह समझ नहीं आ रहा की क्यों ये बच्चे अपना मन मारकर इतनी सुबह सुबह ठण्ड काम के जाने के लिए विवश है। कवि सोचता है की क्या खेलने के लिए गेंदे सारी खत्म हो चुकी है या आकाश में चली गई है। क्या बच्चो पढ़ने के लिए एक भी किताब नहीं बची है ? क्या सारी किताबो को दीमक ने खा लिया है ? क्या बाकी सारी खिलोने कहीं किसी काले पहाड़ के निचे छुपा दिए गए हैं ? जो अब इन बच्चों के लिए कुछ नहीं बचा। क्या इन बच्चों को पड़ाने वाली मदरसों एवं विधालय टूट चुकीं है जो ये बचे पढ़ाई एवं खेल कूद को छोड़कर काम पर जा रहे हैं।

क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन

ख़त्म हो गए हैं एकाएक

भावार्थ :- क्या बच्चों के खेलने की सारी जगह ख़त्म हो चुकी है क्या सारे मैदान जहाँ बच्चे खेलते थे, सारे बागीचे जहाँ बच्चे टहला करते थे एवं सारे घरो के आँगन ख़तम हो चुके हैं अचानक ही जो इन बच्चों के पास अब कुछ नहीं बसा इसीलिए ये सुबह सुबह काम पर जा रहे हैं।

तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता

भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह

कि हैं सारी चींजे हस्बमामूल

भावार्थ :- कवि के अनुसार छोटे छोटे बच्चे काम पर इसलिए जा रहे हैं क्युकिं दुनिया की सारी खेलने की चीजे जैसे गेंद, खिलौने, बागीचे, मैदान, घर का आँगन इत्यादि खत्म हो चुके हैं। उनके पड़ने के लिए सारी किताबे, विधालय एवं मदरसाये ख़त्म हो चुकी हैं कवि आगे कह रहा है की अगर सच में ऐसा है तो यह कितनी भयानक बात है, और दुनिया के होने का अर्थ ही नहीं। परन्तु कवि को इससे भी ज्यादा भयानक तब लगता है जब उसे जान पड़ता है की बच्चों के खेलने कूदने की सारी चीजें उपलब्ध हैं और उसके बाद भी बच्चे काम पर जाने के लिए विवश है और इसी कारण कवि हताश एवं निराश भी है।

अर्थ यह है की कवि अपने इन पंक्तियों के द्वारा समाज में चल रहे बाल-श्रम की और हमारा धयान खींचने में पूरी तरह से सफल हुए हैं। कवि के अनुसार बच्चपन खेल-कूद, पढ़ाई-लिखाई एवं बच्चों के विकाश का समय होता है। इस वक्त उन पर कोई बोझ या जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए

बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे

काम पर जा रहे हैं।

भावार्थ :- कवि की सोच यह थी की दुनिया में स्थित सारे खेलने-कूदने की जगह एवं चीजे ख़त्म हो गई हैं और इसीलिए बच्चे काम पर जा रहे हैं। लेकिन जब वो देखते हैं की ये सारे चीजें एवं जगहे दुनिया में भरी पड़ी है। तब उनमे चिंता घर कर जाती है क्युकिं उन्हें यह समझ नहीं आता की इन सारी चीजों के मौजूद होने के बाद भी आखिर क्यों छोटे छोटे बच्चे दुनिया की हज़ार हज़ार सड़कों से चल कर अपने अपने काम पर जाने के लिए विवश है। इसीलिए उन्होंने हमारे सामने यह प्रश्न उठाया है की “काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?”


Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain Chapter 17 Question Answers

बच्चे काम पर जा रहे हैं प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभारता है उसे लिखकर व्यक्त कीजिए।
उत्तर- कविता की पहली दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

कोहरे से ढंकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं।
सुबह सुबह

इन्हें पढ़कर मेरे मन-मस्तिष्क में चिंता और करुणा का भाव उमड़ता है। करुणा का भाव इस कारण उमड़ता है कि इन बच्चों की खेलने-कूदने की आयु है किंतु इन्हें भयंकर कोहरे में भी आराम नहीं है। पेट भरने की मजबूरी के कारण ही ये । ठंड में सुबह उठे होंगे और न चाहते हुए भी काम पर चल दिए होंगे। चिंता इसलिए उभरी कि इन बच्चों की यह दुर्दशा कब समाप्त होगी? कब समाज बाल-मजदूरी से मुक्ति पाएगा? परंतु कोई समाधान न होने के कारण चिंता की रेखा गहरी हो गई।

प्रश्न 2. कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
उत्तर- कवि की दृष्टि में बच्चों के काम पर जाने की स्थिति को विवरण या वर्णन की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा वर्णन किसी के मन में भावनात्मक लगाव और संवेदनशीलता नहीं पैदा कर सकता है, कुछ सोचने के लिए विवश नहीं कर सकता है। इसे प्रश्न के रूप में पूछे जाने पर एक जवाब मिलने की आशा उत्पन्न होती है। इसके लिए समस्या से जुड़ाव, जिज्ञासा एवं व्यथा उत्पन्न होती है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 3. सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं?
उत्तर- समाज की व्यवस्था और गरीबी के कारण बच्चे सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से वंचित हैं। भारत में करोड़ों लोग पेट भर रोटी नहीं जुटा पाते। इसलिए उनके बच्चों को भी बचपन से कामकाज करना पड़ता है। यह उनकी जन्मजात विवशता होती है। एक भिखारी, मजदूर या गरीब व्यक्ति का बच्चा गेंद, खिलौने, रंगीन किताबें कहाँ से लाए?

समाज की व्यवस्था भी बाल-श्रमिकों को रोकने में सक्षम नहीं है। यद्यपि सरकार ने इस विषय में कानून बना दिए हैं। किंतु वह बच्चों को निश्चित रूप से ये सुविधाएँ दिला पाने में समर्थ नहीं है। न ही सरकार या समाज के पास इतने साधन हैं, न गरीबी मिटाने के उपाय हैं और न इच्छा-शक्ति। इसलिए बच्चे वंचित हैं।

प्रश्न 4. दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर- जीवन में बच्चों को काम पर जाते हुए देखकर भी लोग उदासीन बने रहते हैं। इस उदासीनता के अनेक कारण हैं; जैसे-

  • लोग इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि वे सोचते हैं कि छोड़ो, यह कौन-सा हमारा बच्चा है।
  • लोगों की स्वार्थ भावना इस उदासीनता को बढ़ाती है। वे अधिक लाभ कमाने और कम मजदूरी देने के लालच में बच्चों से काम करवाते हैं।
  • बाल श्रम कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य का उचित निर्वाह न करना समाज की उदासीनता बढ़ाता है।

प्रश्न 5. आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है?
उत्तर- मैंने अपने शहर में बच्चों को अनेक स्थलों पर काम करते देखा है। चाय की दुकान पर, होटलों पर, विभिन्न दुकानों पर, घरों में, निजी कार्यालयों में। मैंने उन्हें सुबह से देर रात तक, हर मौसम में काम करते देखा है।

प्रश्न 6. बच्चों को काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
उत्तर- बच्चों का काम पर जाना एक बड़े हादसे के समान इसलिए है क्योंकि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने की उम्र में काम करने से बालश्रमिकों का भविष्य नष्ट हो जाता है। इससे एक ओर जहाँ शारीरिक विकास अवरुद्ध होता है, वहीं उनका मानसिक विकास भी यथोचित ढंग से नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे जीवनभर के लिए अकुशल श्रमिक बनकर रह जाते हैं। इससे उनके द्वारा समाज और देश के विकास में उनके द्वारा जो योगदान दिया जाना था वह नहीं मिलता है जिससे प्रगति की दर मंद पड़ती जाती है।


तो बच्चों!

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धन्यवाद!

Reedh Ki Haddi Chapter 3 Summary

Reedh Ki Haddi Chapter 3 Summary, Explanation & Question Answers

Class 9TH Hindi Kritika Part 1

हैलो बच्चों!

अज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक

कृतिका भाग-1 का पाठ पढ़ेंगे

“रीढ़ की हड्डी”

Reedh Ki Haddi

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पाठ के लेखक जगदीष चंद्र माथुर हैं।

आइए बच्चो, पाठ के सार को सरल शब्दों में समझते हैं।

“’रीढ़ की हड्डी“ के लेखक जगदीश चंद्र माथुर जी हैं। यह एक एकांकी (छोटा नाटक) हैं। जो शादी ब्याह तय करने से पहले “लड़की दिखाने की”  सामाजिक समस्या पर आधारित हैं।

लेखक ने इस नाटक के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि हम चाहे कितना भी पढ़-लिख जाय, कितने भी आधुनिक क्यों ना हो जाए, लेकिन महिलाओं के प्रति हमारी सोच नही बदली है। और न ही हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठ पाए हैं। लेखक ने इस पाठ के माध्यम से स्त्री शिक्षा के महत्व को भी समझाया हैं।

हमारे समाज में विवाह जैसी पवित्र परम्परा का भी व्यवसायीकरण हो गया है। लोग शादी विवाह के वक्त लड़की के माता-पिता से दहेज के रूप में धन, वाहन और अन्य घरेलू वस्तुओं को मांगने में जरा भी नहीं हिचकते हैं। पता नहीं उनको ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो अपने लड़के की शादी उस लड़की से कर उसके माता-पिता पर एहसान कर रहे हैं।

लाख बुराइयों के बाद भी लड़के को खरा सोना और सर्वगुण संपन्न व पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी लड़की को कमतर ही आँका जाता है। दहेज समस्या की वजह से ही आज हमारे देश कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं।

इस कहानी में लेखक ने भी बस यही समझाने की कोशिश की है।

“’रीढ़ की हड्डी” कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह से होती हैं। उमा एक पढ़ीलिखी शादी के योग्य लड़की हैं जिसके पिता रामस्वरूप उसकी शादी के लिए चिंतित हैं। और आज उनके घर लड़के वाले (यानि बाबू गोपाल प्रसाद जो पेशे से वकील हैं और उनका लड़का शंकर जो बीएससी करने के बाद मेडिकल की पढाई कर रहा हैं।) उमा को देखने आ रहे हैं।

चूंकि रामस्वरूप की बेटी उमा को देखने के लिए आज लड़के वाले आ रहे हैं। इसीलिए रामस्वरूप अपने नौकर रतन के साथ अपने घर के बैठक वाले कमरे को सजा रहे हैं। उन्होंने बैठक में एक तख्त (चारपाई) रख कर उसमें एक नया चादर बिछाया। फिर उमा के कमरे से हारमोनियम और सितार ला कर उसके ऊपर सजा दिया।

रामस्वरूप जमीन में एक नई दरी और टेबल में नया मेजपोश बिछाकर उसके ऊपर गुलदस्ते सजाकर कमरे को आकर्षक रूप देने की कोशिश करते हैं। तभी रामस्वरूप की पत्नी प्रेमा आकर कहती है कि उमा मुंह फुला कर (नाराज होना) बैठी है। इस पर रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा से कहते हैं कि वह उमा को समझाएं क्योंकि बड़ी मुश्किल से उन्हें एक रिश्ता मिला है। इसलिए वह अच्छे से तैयार होकर लड़के वालों के सामने आए।

Reedh Ki Haddi

दरअसल उमा के पिता किसी भी कीमत पर इस रिश्ते को हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। लेकिन प्रेमा कहती है कि उसने उमा को बहुत समझाया है लेकिन वह मान नहीं रही हैं।

उसके बाद वह रामस्वरूप पर दोषरोपण करते हुए कहती हैं कि यह सब तुम्हारे ज्यादा पढ़ाने लिखाने का नतीजा है। अगर उमा को सिर्फ बारहवीं तक ही पढ़ाया होता तो, आज वह कंट्रोल में रहती। रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा से कहते हैं कि वह उमा की शिक्षा की सच्चाई लड़के वालों को न बताये।

दरअसल उमा बी.ए. पास है। और लड़के वालों को ज्यादा पढ़ी लिखी लड़की नहीं चाहिए। इसीलिए रामस्वरूप ने लड़के वालों से झूठ बोला हैं कि लड़की सिर्फ दसवीं पास है।

प्रेमा की बातें सुनकर रामस्वरूप थोड़ा चिंतित होते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि आजकल शादी ब्याह के वक्त लड़की के साज श्रृंगार का क्या महत्व है। लेकिन वह अपनी पत्नी से कहते हैं कि कोई बात नहीं, वह वैसे ही सुंदर हैं।

लड़के वालों के नाश्ते के लिए मिठाई, नमकीन, फल, चाय, टोस्ट का प्रबंध किया गया है। लेकिन टोस्ट में लगाने के लिए मक्खन खत्म हो चुका है। इसीलिए रामस्वरूप अपने नौकर को मक्खन लेने के लिए बाजार भेजते हैं। बाजार जाते वक्त नौकर को घर की तरफ आते मेहमान दिख जाते हैं जिनकी खबर वह अपने मालिक को देता हैं।

ठीक उसी समय बाबू गोपाल प्रसाद अपने लड़के शंकर के साथ रामस्वरूप के घर में दाखिल होते हैं। लेकिन गोपाल प्रसाद की आंखों में चतुराई साफ झलकती हैं। और आवाज से ही वो, बेहद अनुभवी और फितरती इंसान दिखाई देते हैं। उनके लड़के शंकर की आवाज एकदम पतली और खिसियाहट भरी हैं जबकि उसकी कमर झुकी हुई हैं। रामस्वरूप ने मेहमानों का स्वागत किया और औपचारिक बातें शुरू कर दी। बातों-बातों में दोनों नये जमाने और अपने जमाने (समय) की तुलना करने लगते हैं।

थोड़ी देर बाद रामस्वरूप चाय नाश्ता लेने अंदर जाते हैं। रामस्वरूप के अंदर जाते ही गोपाल बाबू रामस्वरूप की हैसियत आंकने की कोशिश करने लगते हैं। वह अपने बेटे को भी डांटते हैं जो इधर-उधर झाँक रहा था। वह उससे सीधी कमर कर बैठने को कहते हैं।

इतने में रामस्वरूप दोनों के लिए चाय नाश्ता ले कर आते हैं। थोड़ी देर बात करने के बाद बाबू गोपाल प्रसाद असल मुद्दे यानि शादी विवाह के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं।

जन्मपत्रिका मिलाने की बात पर गोपाल प्रसाद कहते हैं कि उन्होंने दोनों जन्मपत्रिकाओं को भगवान के चरणों में रख दिया। बातों-बातों में वो अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए कहते हैं कि लोग उनसे कहते हैं कि उन्होंने लड़कों को उच्च शिक्षा दी हैं। इसीलिए उन्हें बहुएं भी ग्रेजुएट लानी चाहिए।

लेकिन मैं उनको कहता हूँ कि लड़कों का पढ़-लिख कर काबिल होना तो ठीक है लेकिन लड़कियां अगर ज्यादा पढ़ लिख जाए और अंग्रेजी अखबार पढ़कर पाॅलिटिक्स करने लग जाए तो, घर गृहस्थी कैसे चलेगी। वो आगे कहते हैं कि मुझे बहुओं से नौकरी नहीं करानी है।

फिर वो रामस्वरूप से लड़की (उमा) की सुंदरता व अन्य चीजों के बारे में पूछते हैं। रामस्वरूप कहते हैं कि आप खुद ही देख लीजिए।

इसके बाद रामस्वरूप उमा को बुलाते है। उमा एक प्लेट में पान लेकर आती है। उमा की आँख पर लगे चश्मे को देखकर गोपाल प्रसाद और शंकर दोनों एक साथ चश्मे के बारे में पूछते हैं। लेकिन रामस्वरूप झूठा कारण बता कर उन्हें संतुष्ट कर देते हैं।

गोपाल प्रसाद उमा से गाने बजाने के संबंध में पूछते हैं तो उमा मीरा का एक सुंदर गीत गाती है। उसके बाद वो पेंटिग, सिलाई, कढ़ाई आदि के बारे में भी पूछते हैं। उमा को यह सब अच्छा नहीं लगता है। इसलिए वह कोई उत्तर नहीं देती है। यह बात गोपाल प्रसाद को खटकती हैं। वो उमा से प्रश्नों के जवाब देने को कहते हैं। रामस्वरूप भी उमा से जवाब देने के लिए कहते हैं।

तब उमा अपनी धीमी मगर मजबूत आवाज में कहती है कि क्या दुकान में मेज-कुर्सी बेचते वक्त उनकी पसंद-नापसंद पूछी जाती है। दुकानदार ग्राहक को सीधे कुर्सी मेज दिखा देता है और मोल भाव तय करने लग जाता है। ठीक उसी तरह ये महाशय भी, किसी खरीददार के जैसे मुझे एक सामान की तरह देख-परख रहे हैं। रामस्वरूप उसे टोकते हैं और गोपाल प्रसाद नाराज होने लगते हैं।

लेकिन उमा अपनी बात जारी रखते हुए कहती हैं कि पिताजी आप मुझे कहने दीजिए। ये जो सज्जन मुझे खरीदने आये हैं जरा उनसे पूछिए क्या लड़कियां के दिल नहीं होते हैं, क्या उन्हें चोट नहीं लगती है। गोपाल प्रसाद गुस्से में आ जाते हैं और कहते हैं कि क्या उन्हें यहाँ बेइज्जती करने के लिए बुलाया हैं।

उमा जवाब देते हुए कहती हैं कि आप इतनी देर से मेरे बारे में इतनी जांच पड़ताल कर रहे हैं। क्या यह हमारी बेइज्जती नहीं हैं। साथ में ही वह लड़कियों की तुलना बेबस भेड़ बकरियों से करते हुए कहती है कि उन्हें शादी से पहले ऐसे जांचा परखा जाता हैं जैसे कोई कसाई भेड़-बकरियों खरीदने से पहले उन्हें अच्छी तरह से जाँचता परखता हैं।

वह उनके लड़के शंकर के बारे में बताती हैं कि किस तरह पिछली फरवरी में उसे लड़कियों के हॉस्टल से बेइज्जत कर भगाया गया था। तब गोपाल प्रसाद आश्चर्य से पूछते हैं क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो। उमा जवाब देते हुए कहती हैं कि उसने बी.ए पास किया है। ऐसा कर उसने कोई चोरी नहीं की। उसने पढ़ाई करते हुए अपनी मर्यादा का पूरा ध्यान रखा। उनके पुत्र की तरह कोई आवारागर्दी नहीं की।

अब शंकर व उसके पिता दोनों गुस्से में खड़े हो जाते हैं और रामस्वरूप को भला बुरा कहते हुए दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। उमा पीछे से कहती है। जाइए… जाइए, मगर घर जाकर यह पता अवश्य कर लेना कि आपके पुत्र की रीढ़ की हड्डी है भी कि नहीं।

गोपाल प्रसाद और शंकर वहां से चले जाते हैं। उनको जाता देख रामस्वरूप निराश हो जाते हैं। पिता को निराश-हताश देख उमा अपने कमरे में जाकर रोने लग जाती हैं। तभी नौकर मक्खन लेकर आता हैं। और कहानी खत्म हो जाती हैं।

IMPORTANT QUESTION ANSWERS

REEDH KI HADDI CHAPTER 3 HINDI KRITIKA PART 1

प्रश्न 1. रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर “एक हमारा ज़माना था” कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?

उत्तर: यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि वह अपने बीते हुए समय को याद करता है तथा उसे ही सही ठहरा था है परंतु बीते हुए समय की तुलना वर्तमान से करना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि हर एक समय अपनी उस समय की परिस्थितियों के अनुसार सही होता है यूं भी हर जमाने की अपनी स्थितियां होती है जमाना बदलता है तो कुछ कमियों के साथ सुधार भी आते हैं।

प्रश्न 2. रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?

उत्तर: आधुनिक समाज में सभ्य नागरिक होने के बावजूद उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की खातिर लोगों के दबाव में झुकना पड़ रहा था, उपयुक्त बात उनकी इसी विवशता को उजागर करती है।

प्रश्न 3. अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है?

उत्तर: अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप, उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं वह सरासर गलत है एक तो वे अपनी पढ़ी-लिखी लड़की को कम पढ़ा लिखा साबित कर रहे हैं और उसकी सुंदरता को और बढ़ाने के लिए नकली प्रसाधन सामग्री का उपयोग करने के लिए कहते हैं जो अनुचित है साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि उमा वैसा ही आचरण करें जैसा लड़के वाले चाहते हैं परंतु वह यह क्यों भूल रहे हैं कि उन्हें लड़की की पसंद-नापसंद का भी ख्याल रखना चाहिए क्योंकि आज समाज में लड़का तथा लड़की को समान दर्जा प्राप्त है।

प्रश्न 4. गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा झिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।

उत्तर: मेरे विचार से दोनों ही समान रूप से अपराधी है गोपाल प्रसाद विवाह जैसे पवित्र बंधन में भी व्यापार खोज रहे हैं वह इस तरह के आचरण से इस संबंध की मधुरता तथा संबंधों की गरिमा को भी कम कर रहे हैं रामस्वरूप जहां आधुनिक सोच वाले व्यक्ति होने के बावजूद कायरता का परिचय दे रहे हैं वे चाहते तो अपनी बेटी के साथ मजबूती से खड़े होते और एक स्वाभिमानी वर की तलाश करते ना की मजबूरी में आकर परिस्थिति से समझौता करते।

प्रश्न 5. “…आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं…” उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है ?

उत्तर: उपर्युक्त कथन के माध्यम से उमा, शंकर की निम्न कमियों की ओर ध्यान दिलाना चाहती है:

  1. शंकर का चरित्र अच्छा नहीं है लड़कियों के हॉस्टल के चक्कर काटते हुए वह पकड़ा जा चुका है।
  2. उसका अपना निजी कोई व्यक्तित्व नहीं है वह अपने पिता के पीछे चलने वाला बेचारा जीव है जैसा कहा जाता है वैसा ही करता है।
  3. वह शारीरिक रूप से भी असमर्थ है वह शरीर में कमजोर झुक कर तथा उसे चेतन कर भी बैठा नहीं जाता।

प्रश्न 6. शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: समाज में आज उमा जैसे व्यक्तित्व, स्पष्टता वादी तथा उच्च चरित्र वाली लड़की की ही आवश्यकता है ऐसी लड़कियों से ही समाज और देश प्रगति कर पाएगा जो आत्मविश्वास से भरी तथा निडर हो इसके विपरीत शंकर जैसे लड़के समाज को दिशा नहीं प्रदान कर सकते हैं।

प्रश्न 7. ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जिस प्रकार मानव में रीढ़ की हड्डी महत्वपूर्ण मानी जाती है ठीक उसी प्रकार वैवाहिक रिश्तो में लड़का और लड़की रीड की हड्डी के समान होते हैं उनके स्वस्थ रिश्ते पारिवारिक शांति अपनापन और समृद्धि के कारण बनते हैं इस पाठ के जरिए यही बताने का प्रयास किया गया है कि नर और नारी को कमतर समझकर हम एक प्रगतिशील समाज की कल्पना नहीं कर सकते अतः यह उचित शीर्षक है।

प्रश्न 8. कई वस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों ?

उत्तर: इस कहानी में कई पात्र हैं परंतु सबसे सशक्त पात्र बनकर जो उभरता है वह ओ माही है उमा की उपस्थिति भले थोड़े समय के लिए थी परंतु उसके विचारों से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह पाते हैं वह हमें बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है उसकी उपस्थिति नारी समाज को एक नई सोच और दिशा प्रदान करती है।

प्रश्न 9. एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: रामस्वरूप आधुनिक और प्रगतिशील विचारधाराओं से संपन्न है परंतु एक मजबूर पीता है वह एक तरफ तो स्त्री शिक्षा के समर्थक हैं परंतु बेटी के विवाह के समय यह शिक्षा में छिपाने का प्रयास करते हैं जिससे उनकी विवशता तथा कायरता झलकती है रामगोपाल निहायती बड़े वाले लालची और पढ़े लिखे होने के बावजूद स्त्री पुरुष की संपन्नता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के रूप में उभरते हैं इसी कारणवश वह अपने मेडिकल में पढ़ने वाले बेटे का विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को भी बिजनेस मानते हैं इससे उनका लालची स्वभाव पता चलता है।

प्रश्न 10. इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।

उत्तर: रीढ़ की हड्डी एक उद्देश्य पूर्ण एकांकी है इस एकांकी के उद्देश्य निम्नलिखित है:

  1. यह एकांकी स्त्री पुरुष समानता की पक्षधर है।
  2. लड़कियों के विवाह में आने वाली समस्याओं को समाज के सामने लाने वाली है।
  3. बेटियों के विवाह के समय पिता की परेशानियों को बेनकाब करती है।
  4. स्त्री शिक्षा के प्रति दोहरी मानसिकता रखने वाले को बेनकाब करती है।
  5. स्त्री को भी अपने विचार व्यक्त करने की आजादी देने के पक्ष में है।


तो बच्चों!

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Prem Chand Ke Phate Joote

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‘प्रेमचंद के फटे जूते’

Premchand Ke Phate Joote

Class 9th Chapter 6 Hindi Kshitij Part 1

पाठ के लेखक हरिशंकर परसाई हैं।

पाठ का सार समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

हरिशंकर परसाई जीवन परिचय

जीवन परिचय- हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त सन् 1922 ईo में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गांव में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही प्राप्त की। बाद में इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में परास्नातक (एम.ए.) की उपाधि प्राप्त की। कुछ वर्षों तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया, परंतु बार-बार के तबादलों से परेशान होकर 1957 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्र लेखन को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। जबलपुर से इन्होंने “वसुधा” नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली जो काफी वर्षों तक घाटे में चलती रही। आखिरकार उन्हें इस पत्रिका को बंद कर देना पड़ा। 1995 ईo में इस महान व्यंग्यकार का निधन हो गया।

रचनाएं:- हरिशंकर परसाई जी मुख्य रूप से गद्य लेखक है। इन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी व्यंग्य साहित्य को समृद्ध किया है। इनकी प्रमुख रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं:-

कहानी संग्रह:- ‘हंसते हैं रोते हैं’,  ‘जैसे उनके दिन फिरे’।

उपन्यास:- ‘रानी नागफनी की कहानी’,  ‘तट की खोज’।

निबंध-संग्रह:- ‘तब की बात और थी’, ,भूत के पांव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडंडियों का जमाना’,  ‘सदाचार की ताबीज’,  ‘शिकायत मुझे भी है’,  ‘और अंत में’।

व्यंग्य-निबंध संग्रह:- ‘वैष्णव की फिसलन’,  ‘तिरछी रेखाएं’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’।

इनकी सभी रचनाएं हरिशंकर परसाई रचनावली के नाम से छह भागों में प्रकाशित हैं।

पुरस्कार और सम्मान:- समय-समय पर श्री हरिशंकर प्रसाद जी को साहित्य लेखन के लिए विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मान से नवाजा गया। इन्हें मिले कुछ प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान निम्नलिखित हैं:-

1. साहित्य अकादमी पुरस्कार – “विकलांग श्रद्धा का दौर के लिए”|

2. मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग का पुरस्कार।

पाठ का सार

“प्रेमचंद के फटे जूते” पाठ के लेखक हरिशंकर परसाई जी हैं। इस पाठ में “जनता के लेखक”कहे जाने वाले प्रेमचंद जी के सरल व सादगी पूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाया गया है। साथ में ही लेखक ने आज के लोगों की अवसरवादी प्रवृत्ति व दिखावे की संस्कृति पर एक करारा प्रहार भी किया है।

परसाई जी कहानी की शुरुआत प्रेमचंद्र की उनकी धर्मपत्नी के साथ एक फोटो को देखकर करते हैं। जिसमें प्रेमचंद जी ने अपने पैरों में फ़टे जूते पहने हैं। और बांये पैर के जूते में एक बड़ा सा छेद हो गया है जिससे उनकी पैर की अंगुली बाहर निकल रही है। और इसमें ही लेखक की दृष्टि अटक गई हैं। लेखक सोच रहे कि फोटो खिंचवाने की यह पोशाक है तो, रोजमर्रा जीवन में पहनने की क्या पोशाक होगी।

क्योंकि आजकल आपने देखा होगा कि फोटो खींचवाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते हैं। नये-नये व फैशनेबल कपड़ों व जूतों आदि के साथ फोटो खींचवाई जाती हैं।

लेखक आगे कहते हैं कि थोड़ा तैयार हो जाते, थोड़ा कपड़े तो बदल लेते। शायद पत्नी के कहने पर फोटो खिंचवा रहे हो। इसीलिए क्या पहना है क्या नहीं। इसका भी ध्यान नहीं रखा हैं। फोटो खिचवाने वक्त परंपरा के अनुसार लोगों की तरह तुमने भी मुस्कुराने की कोशिश की होगी। मगर चेहरे पर मुस्कान आने में कुछ समय लग गया होगा। और आधी-अधूरी मुस्कान में ही फोटोग्राफर ने फोटो खींच दी होगी।

इसीलिए यह मुस्कान से ज्यादा व्यंग्य दिखाई दे रहा है। और यह उन लोगों पर व्यंग है जो दिखावे के लिए बहुत कुछ करते हैं। मगर इन फटे जूतों में फोटो खिंचवाने पर भी तुम्हारे चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा है।

लेखक के अनुसार प्रेमचंद बहुत सीधे-साधे, सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वो दिखावे से काफी दूर रहते थे। इसीलिए वो जैसे थे, वैसे ही फोटो खींचवाने बैठ गए। लेखक आगे कहते हैं कि “मेरे पूर्वज तुम्हें जरा भी इसका एहसास नहीं है कि तुम फ़टे जूते पहन कर फोटो खिंचवा रहे हो। और ऐसा जूता पहनने में तुम्हें कोई संकोच भी नहीं हो रहा है।

इस तरह फोटो खिंचवाने से तो अच्छा होता कि तुम फोटो खिंचवाते ही नहीं। क्या तुम्हें फोटो का महत्व पता नहीं है? फोटो एक ऐसा छायाचित्र होता हैं जो यादगार के रूप में हमेशा साथ रहता हैं। यहां पर लेखक ने प्रेमचंद को “मेरे पूर्वज” शब्द से संबोधित किया है। क्योंकि प्रेमचंद्र लेखक से पहले के महान साहित्यकार व कथाकार है। उन्हें “कथा-सम्राट” भी कहा जाता हैं। इसीलिए लेखक ने उन्हें अपना पूर्वज बताया है।

लेखक कहते हैं कि लोग तो फोटो खींचवाने के लिए परफ्यूम तक लगा लेते हैं जबकि फोटो में परफ्यूम की खुशबू तो महसूस नहीं हो सकती। यानी आदमी फोटो खींचने के लिए अपनी असलियत तक छुपा देता है।अपनी सभी कमजोरियों को छुपा देता है। और समाज के आगे अपने आप को बेहतरीन प्रस्तुत करता है। यह एक कटाक्ष है।

लोग फोटो खिंचवाने के लिए क्या-क्या नहीं करते। कुछ तो फोटो खींचवाने के लिए दूसरों से सिर्फ जूते, कपड़े ही नहीं, बल्कि उनकी बीवी तक उधार मांग लेते हैं। और तुमने तो एक टोपी तक नहीं पहनी है जो सिर्फ आठ आने में मिल जाती है। टोपी यहां पर इज्जत का प्रतीक हैं और जूते दिखावे के।

लेखक कहते हैं कि तुम एक महान कथाकार, उपन्यासकार, युग प्रवर्तक कहलाते हो। मगर तम्हारे पास पहनने को जूते नहीं है। लेखक आगे कहते हैं कि मेरा जूता भी बहुत अच्छा नहीं है यानि मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। वो कहते हैं कि उनका जूता ऊपर से ठीक है और उससे उनकी पैर की अंगुली बाहर नहीं दिखती है।

लेकिन नीचे से पूरा तला फट गया है। और उनका अंगूठा रगड़ खाकर छील चुका हैं। यानि मेरी आर्थिक स्थिति बाहर से तो अच्छी दिखती है लेकिन अंदर से अच्छी नहीं है।

लेकिन मैं तुम्हारे जैसे फटे जूतों के साथ फोटो नहीं खिंचवाऊंगा। क्योंकि लोगों को मेरी फटे हाल आर्थिक स्थिति का पता चल जाएगा। लेखक प्रेमचंद से कहते हैं कि भले ही तुम्हारा जूता फट गया हो लेकिन इसके बावजूद तुम्हारा वजूद और व्यक्तित्व बिल्कुल सुरक्षित है। तुम पर्दे का महत्व नहीं समझते हो और हम पर्दे पर कुर्बान होते जाते हैं। इसीलिए तुम मुस्कुरा रहे हो।

लेखक प्रेमचंद से पूछते हैं कि मेरी जनता का लेखक यह मुस्कान तुमने माधो, होरी, हल्कू या किससे उधार माँगी हैं। ये सब प्रेमचंद की कहानी के चरित्र हैं। प्रेमचंद जी को आम आदमी का कहानीकार माना जाता है। इसीलिए उनको “मेरी जनता का लेखक”  कहा गया है। उन्होंने गरीब, लाचार और शोषित वर्ग के दर्द को अपनी कहानियों में लिखा है।

लेखक आगे प्रेमचंद से कहते हैं कि तुम यहां-वहां बहुत चक्कर काटते हो। और कभी-कभी बनिया की उधारी से बचने के लिए इधर-उधर भागते फिरते हो। इसीलिए तुम्हारा जूता फट गया होगा। लेकिन चलने से तो जूते का तलवा घिसता है। जूते का ऊपरी भाग फटकर वहां से अंगुली बाहर नहीं आती है। यानि तुमने जूते से किसी सख्त चीज में ठोकर मारी होगी। तभी तो तुम्हारा जूता ऊपर से फट गया हैं।

प्रेमचंद जी ने अपनी लेखनी से रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, कुरीतियां पर करारी चोट की हैं। यहां पर “सख्त चीज”  का अर्थ यही है।

लेखक आगे प्रेमचंद जी से कहते हैं कि तुम इन सब से बच कर निकल भी तो सकते थे लेकिन तुम नहीं निकले। इसलिए तुम्हारा जूता फट गया है। समझौता कर लेते, आसान रास्ता अपना लेते। ठोकर मारने की क्या जरूरत थी। तुम उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। जैसे सभी नदियां पहाड़ तोड़ कर ही तो नहीं बहती हैं। कुछ रास्ता बदलकर भी तो बहती है।

लेकिन तुम समझौता नहीं करते हो, तुम संघर्ष करते हो, स्वाभिमानी हो। लेखक कहते हैं कि जिसे तुम धृणित समझते हो, उसकी तरफ तुम हाथ की अंगुली से नहीं, बल्कि पैर की उंगली से इशारा करते हो। यानि तुम अपनी अंगुली का महत्व कम नहीं करना चाहते हो। लेकिन मैं तुम्हारी इस अंगुली का इशारा और व्यंग्य भरी मुस्कान को भी खूब समझता हूँ।

PREMCHAND KE PHATE JOOTE IMPORTANT QUESTION ANSWERS

प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1 . हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद्र का जो शब्द चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएं उभर कर आती हैं?

उत्तर प्रस्तुत पाठ के अनुसार प्रेमचंद्र के व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएं उभर कर आती हैं।

  1. प्रेमचंद स्वभाव से बहुत ही सीधे-साधे व सरल थे तथा सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे।
  2. प्रेमचंद्र एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे जो अपने वसूलों से कभी भी समझौता नहीं करते थे।
  3. प्रेमचंद्र ने अपनी लेखनी से सामाजिक बुराईयों, कुरीतियों व अंधविश्वासों पर कड़ा प्रहार किया है।
  4. उन्होंने दलित, लाचार और कमजोर वर्ग के दर्द व उनकी लाचारी, बेबसी को अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया है।
  5. उन्होंने हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया है।

प्रश्न 2 . सही कथन चुनिए।

(क) बाएं पांव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा सा छेद हो गया है जिसमें से उंगली बाहर निकल आई है।

(ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचवाते हैं ताकि फोटो में खुशबू आ जाए।

(ग) तुम्हारी यह व्यंग मुस्कान मेरे हौसले बढ़ाती है।

(घ) जिसे तुम धृणित समझते हो, उसकी तरफ अंगूठे से इशारा करते हो।

उत्तर  – (ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचवाते हैं ताकि फोटो में खुशबू आ जाए।

प्रश्न 3 . नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग को स्पष्ट कीजिए।

()- जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचास टोपियों न्यौछावर हो जाती हैं।

उत्तर यहां पर जूते को दिखावे व झूठी शान और टोपी को इज्जत, मान, मर्यादा का प्रतीक बताया गया है। लेखक कहते हैं कि आधुनिक समाज में धन, दौलत और शानो शौकत का प्रदर्शन ही सबसे महत्वपूर्ण होता जा रहा हैं। और इसी को ही अब इज्जत समझा जाता है।

दिन प्रतिदिन ईमानदारी, सच्चाई और अच्छाई का मोल कम होता जा रहा है।आजकल साधारण और इमानदारी से जीवन जीने वालों की कोई इज्जत नहीं है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि पचास टोपियों पर एक जूता भारी पड़ जाता है।

() – तुम पर्दे का महत्व नहीं जानते हो और हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं।

उत्तर यहां पर पर्दे का संबंध इज्जत से है। लेखक कहते हैं कि कुछ लोग अपनी इज्जत के लिए अपना सब कुछ न्यौछवर करने को तैयार हो जाते हैं। यानी झूठी शान शौकत को बनाए रखने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इज्जत यानि दिखावे को कोई महत्व नहीं देते हैं।

()- जिसे तुम घृणित समझते हो उसकी तरफ हाथ की नहीं, पांव की अंगुली से इशारा करते हो।

उत्तर लेखक प्रेमचंद से कहते हैं कि तुम कुछ चीजों जैसे सामाजिक बुराइयों, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास को घृणित समझते हो। और उनकी तरफ हाथ से इशारा कर तुम अपनी अंगुली का महत्व कम नहीं करना चाहते हो। इसीलिए पैर की अंगुली से इशारा कर उनको महत्वहीन बना देते हो।

प्रश्न 4 . पाठ में एक जगह लेखक सोचता है कि “फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी”। लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि “नहीं इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें  नहीं होंगी”। आपके अनुसार इस संदर्भ में प्रेमचंद जी के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वजह हो सकती है।

उत्तर दरअसल हर व्यक्ति अपने रोजमर्रा के जीवन में साधारण कपड़ों का प्रयोग करता है और किसी स्थान विशेष या अवसर विशेष में जाने के लिए अच्छे व महंगे कपड़ों का प्रयोग करता है। लेखक सोचते हैं कि फोटो खिंचवाना भी खास मौका ही होता हैं और इस खास मौके में भी इस तरह के कपड़े पहनकर जब प्रेमचंद्र जी ने फोटो खिंचवाई हैं। तो इस व्यक्ति के पास यही एकमात्र अच्छे कपड़े होंगे।यानि इनके पास इससे बेहतर कपड़े नहीं होंगे।

दूसरे अर्थ में लेखक यह कहना चाहते हैं कि प्रेमचंद्र दिखावे की दुनिया से बिल्कुल दूर रहते थे। मौका चाहे कैसा भी हो, साधारण या खास, वो हर वक्त एक समान रहते थे।

प्रश्न 5. आपने यह व्यंग्य पढ़ा है। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन सी बात आकर्षित करती हैं।

उत्तर लेखक का यह व्यंग्य कई सारी चीजों पर एक साथ कटाक्ष करता हुआ नजर आता है। लेखक, लेखन की दुनिया में एक मजे हुए खिलाड़ी की तरह नजर आते हैं जो अपने लेख में उदाहरणों का प्रयोग कर इसे और धार देते हैं।

कड़वी से कड़वी बात को भी बहुत आसानी से, बड़े ही सरल शब्दों में लेखक ने इस पाठ के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है। इस पाठ में आधुनिक समाज और दिखावे की संस्कृति पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रहार किया गया है।

प्रश्न 6 . पाठ में “टीले” शब्द का प्रयोग किस संदर्भ को इंगित करने के लिए किया गया है।

उत्तर टीला शब्द आम भाषा में किसी रास्ते के बीचो-बीच एक छोटा सा पहाड़ नुमा ऊँचा स्थान होता है। जो उस रास्ते से लोगों के आने जाने में रुकावट पैदा करता है।

लेकिन इस पाठ में टीला शब्द सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता व सामाजिक भेदभाव की ओर इशारा करता है जो इंसान की सामाजिक एकता व विकास में रुकावट पैदा करता है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8. आपकी दृष्टि में वेशभूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवर्तन है?

उत्तर  आज लोग अपने बाहरी रंग-रूप, कपड़ों, जूतों, गहनों के प्रति बहुत अधिक जागरूक हो गए हैं। हर रोज नये फैशन के कपड़े पहनना, महंगे जूते, धड़ी और अन्य चीजों का उपयोग करना, अब लोगों ने अपनी इज्जत व समृद्धि का प्रतीक बना लिया है। सच्चाई व ईमानदारी के साथ सीधे-साधे या सरल तरीके से जीवन जीने वालों को समाज में लोग पिछड़ा या गँवार समझते हैं।


भाषा अध्ययन

प्रश्न पाठ में आये मुहावरों को छाटिँए और उनका वाक्य प्रयोग कीजिए?

उत्तर अंगुली का इशारा – (किसी चीज के बारे में बताने की कोशिश करना) – अंगुली के इशारे से ही बता देते कि तुम कहना क्या चाहते हो।

व्यंग्य मुस्कान – (मजाक उड़ाना) – उसकी व्यंग्य भरी मुस्कान मेरे दिल को चुभ गई।

बाजू से निकलना – (विपरीत परिस्थितियों का सामना न करना)– जीवन में आई कठिन परिस्थितियों का सामना न कर, उनके बाजू से निकल जाना भी ठीक नहीं है।

रास्ते पर खड़ा होना (काम में बाधा डालना) –  जब भी मैं किसी नए काम की शुरुआत करता हूं तो तुम मेरे रास्ते पर आकर खड़े हो जाते हो।

प्रश्न प्रेमचंद के व्यक्तित्व को उभारने के लिए लेखक ने जिन विशेषणों का उपयोग किया है। उनकी सूची बनाइए।

उत्तर लेखक ने प्रेमचंद जी को कई विशेषणों से संबोधित किया है।

  1. महान कथाकार
  2. जनता के लेखक
  3. उपन्यास सम्राट
  4. साहित्यिक पुरखे
  5. युग प्रवर्तक