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Vaigyanik Chetna Ke Vahak Class 9th Summary

Vaigyanik Chetna Ke Vahak Chandrashekhar Venkat Raman class 9 question and answers

हैलो बच्चों!
आज हम कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक स्पर्श भाग 1 का पाठ पढ़ेंगे
वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन
पाठ के लेखक धीरंजन मालवे हैं
बच्चों पाठ के सार को समझने से पहले लेखक के जीवन परिचय को जानते हैं।

लेखक परिचय : धीरंजन मालवे
जन्म : 1952
धीरंजन मालवे का जन्म बिहार के नालंदा जिले में 9 मार्च 1952 को हुआ। ये एम. एस. सी., एम. बी . ए. और एल. एल. बी. है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़ें मालवे अभी भी वैज्ञानिक जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के काम में जुटे हुए है।
मालवे की भाषा सीधी, सरल और वैज्ञानिक शब्दावली लिए हुए है। यथावश्यक अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग भी वे करते है।

पाठ प्रवेश: वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन

प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। वेंकट रामन् कुल ग्यारह साल की उम्र में मैट्रिक, विशेष योग्यता के साथ इंटरमीडिएट, भौतिकी और अंग्रेशी में स्वर्ण पदक के साथ बी.ए. और प्रथम श्रेणी में एम.ए. करके मात्र अठारह साल की उम्र में कोलकाता में भारत सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट में सहायक जनरल एकाउंटेंट नियुक्त कर लिए गए थे। इनकी प्रतिभा से इनके अध्यापक तक अभिभूत थे।
चंद्रशेखर वेंकट रामन् भारत में विज्ञान की उन्नति के चिर आकांक्षी थे तथा भारत की स्वतंत्राता के पक्षधर थे। वे महात्मा गांधी को अपना अभिन्न मित्रा मानते थे। नोबेल पुरस्कार समारोह के बाद एक भोज के दौरान उन्होंने कहा था: मुझे एक बधाई का तार अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र (महात्मा गांधी) से मिला है, जो इस समय जेल में हैं। एक मेधावी छात्र से महान वैज्ञानिक तक की रामन् की संघर्षमय जीवन यात्रा और उनकी उपलब्धियों की जानकारी यह पाठ बखूबी कराता है।

पाठ सार: वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन
प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन्’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। लेखक कहता है कि सन् 1921 की बात है, जब रामन् एक बार समुद्री यात्रा कर रहे थे। रामन् को जहाज के डेक पर खड़े होकर नीले समुद्र को देखना, प्रकृति को प्यार करना अच्छा लगता था। उनके अंदर एक वैज्ञानिक की जानने की इच्छा भी उतनी ही मज़बूत थी। लेखक कहता है कि यही जानने की इच्छा के कारण उनके मन में सवाल उठा कि ‘आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है? कुछ और क्यों नहीं?’ रामन् सवाल का जवाब ढूँढ़ने में लग गए। जवाब ढूँढ़ते ही वे संसार में प्रसिद्ध हो गए।
रामन् का जन्म 7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। रामन् के पिता रामन् को बचपन से ही गणित और फ़िज़िक्स पढ़ाते थे। लेखक कहता है कि रामन् मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने कॉलेज के समय से ही उन्होंने अनुसंधान के कार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था। उनकी दिली इच्छा तो यही थी कि वे अपना सारा जीवन अनुसंधान के कामों को ही समर्पित कर दें, मगर उन दिनों अनुसंधान के कार्य को पूरे समय के कैरियर के रूप तेज़ बुद्धि वाले में अपनाने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। रामन् अपने समय के अन्य तेज़ बुद्धि वाले छात्रों की ही तरह भारत सरकार के आय-व्यय से संबंधित विभाग में अफसर बन गए। लेखक कहता है कि रामन ने कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी अपने स्वाभाव के अनुसार अनुसंधान के कार्य के प्रति अपने झुकाव को बनाए रखा। दफ़तर से समय मिलते ही वे लौटते हुए बहू बाजार आते थे, वहाँ ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’ की प्रयोगशाला थी।
लेखक कहता है कि यह प्रयोगशाला अपने आपमें एक अनूठी संस्था थी, जिसे कलकत्ता के एक डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार ने वर्षों की कठिन मेहनत और लगन के बाद खड़ा किया था। लेखक कहता है कि इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना था। अपने महान् उद्देश्यों के बावजूद इस संस्था के पास औजारों की बहुत अधिक कमी थी। लेखक कहता है कि उन्हीं दिनों रामन वाद्ययंत्रों की ओर भी आकर्षित हुए। पश्चिमी देशों को भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया लगते थे और रामन ने वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर पश्चिमी देशों के इस संदेह को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया हैं।
लेखक कहता है कि उन्हीं दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद निकले हुए थे। मुखर्जी महोदय ने रामन् के सामने प्रस्ताव रखा कि वे सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद स्वीकार कर लें। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था क्योंकि लेखक कहता है कि उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित सरकारी पद पर थे, जिसके साथ मोटी तनख्वाह और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। उन्हें नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत चुके थे। ऐसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओं वाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फैसला करना रामन के लिए बहुत हिम्मत का काम था।लेखक कहता है कि रामन् सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी में आ गए थे। सन् 1921 में जब रामन समुद्र-यात्रा कर रहे थे तो उस समय जब रामन् के मस्तिष्क में समुद्र के नीले रंग की वजह का सवाल बार-बार उठने लगा, तो उन्होंने इस दिशा में कई प्रयोग किए, जिसका परिणाम रामन् प्रभाव की खोज के रूप में सभी के सामने आया। लेखक कहता है कि रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। एकवर्णीय प्रकाश की किरणों में सबसे अधिक ऊर्जा बैंजनी रंग के प्रकाश में होती है। बैंजनी के बाद क्रम के अनुसार नीले, आसमानी, हरे, पीले, नारंगी और लाल रंग का नंबर आता है। इस प्रकार लाल-रंग की प्रकाश की ऊर्जा सबसे कम होती है। आइंस्टाइन से पहले के वैज्ञानिक प्रकाश को तरंग के रूप में मानते थे, मगर आइंस्टाइन ने ही सबसे पहले यह बताया था कि प्रकाश बहुत ही छोटे छोटे कणों की तेज़ धारा के समान है। इन बहुत ही छोटे छोटे कणों की तुलना आइंस्टाइन ने बुलेट से की और इन्हें ‘प्रोटोन’ नाम दिया।
लेखक कहता है कि रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया, क्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफतौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण बहुत ही तेज़ गति के सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है। लेखक कहता है कि रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज आसान हो गया। पहले इस काम के लिए अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान का सहारा लिया जाता था। लेखक कहता है कि यह मुश्किल तकनीक है और गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थों के अणुओं की और परमाणुओं की बनावट के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक सही-सही जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का प्रयोगशाला में मिलान करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थों का बनावटी रूप से निर्माण करना संभव हो गया है।लेखक कहता है कि रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। रामन के जीवन में अब तो पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। सन् 1954 में रामन् को देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। लेखक कहता है कि रामन् नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे।
लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा ही गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अखंडित रखा अर्थात उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को नष्ट नहीं होने दिया। लेखक कहता है कि रामन विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए करेंट साइंस नामक एक पत्रिका का भी संपादन करते थे। रामन् प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं था; उन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को प्रकाशित और प्रभावित किया। उनकी मृत्यु 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुई। लेखक कहता है कि रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणों की चमक के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी ही चीज़े बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं। लेखक कहता है कि हमें केवल ज़रूरत है रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने की।

वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन प्रश्न अभ्यास

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 25-30 शब्दों में लिखिए –
प्रश्न 1 : कॉलेज कि दिनों में रामन की दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर : कॉलेज के दिनों में रामन की दिली इच्छा थी कि अपना पूरा जीवन शोधकार्य को समर्पित कर दें। लेकिन उस जमाने में शोधकार्य को एक पूर्णकालिक कैरियर के रूप में अपनाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। परन्तु रामन ने अपनी दिली इच्छा को पूरा किया।

प्रश्न 2 : वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन ने कौन सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर : लोगों का मानना था कि भारतीय वाद्ययंत्र पश्चिमी वाद्ययंत्र की तुलना में अच्छे नहीं होते हैं। रामन ने अपनी खोजों से इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की।

प्रश्न 3 : रामन के लिए नौकरी संबंधी कौन सा निर्णय कठिन था?
उत्तर : उस जमाने के हिसाब से रामन सरकारी विभाग में एक प्रतिष्ठित अफसर के पद पर तैनात थे। उन्हें मोटी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। उस नौकरी को छोड़कर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी करने का फैसला बहुत कठिन था।

प्रश्न 4 : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन को समय समय पर किन किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उत्तर : रामन को 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित किया गया। 1929 में उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी गई। 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें कई अन्य पुरस्कार भी मिले; जैसे रोम का मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी का ह्यूज पदक, फिलाडेल्फिया इंस्टीच्यूट का फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार, आदि। उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 5 : रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर : रामन को अधिकतर पुरस्कार तब मिले जब भारत अंग्रेजों के अधीन था। वैसे समय में यहाँ पर वैज्ञानिक चेतना का सख्त अभाव था। रामन को मिलने वाले पुरस्कारों से भारत की न सिर्फ वैज्ञानिक चेतना जाग्रत हुई बल्कि भारत का आत्मविश्वास भी बढ़ा।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में लिखिए –
प्रश्न 1 : रामन के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?
उत्तर : हठयोग में योगी अपने शरीर को असह्य पीड़ा से गुजारता है। रामन भी कुछ ऐसा ही कर रहे थे। वे पूरे दिन सरकारी नौकरी में कठिन परिश्रम करते थे और उसके बाद बहु बाजार स्थित प्रयोगशाला में वैज्ञानिक शोध करते थे। उस प्रयोगशाला में बस कामचलाउ उपकरण ही थे। इसलिए रामन के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग कहा गया है।

प्रश्न 2 : रामन की खोज ‘रामन प्रभाव’ क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। ऐसा इसलिए होता है कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण के फोटॉन किसी तरल या ठोस रवे से गुजरते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो टक्कर के बाद या तो वे कुछ ऊर्जा खो देते हैं या कुछ ऊर्जा पा जाते हैं। ऊर्जा में परिवर्तन के कारण प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव आता है। ऊर्जा के परिमाण में परिवर्तन के हिसाब से प्रकाश का रंग किसी खास रंग का हो जाता है। इसे ही रामन प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 3 : ‘रामन प्रभाव’ की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन कौन से कार्य संभव हो सके?
उत्तर : रामन प्रभाव की खोज से अणुओं और परमाणुओं के अध्ययन का कार्य सहज हो गया। यह काम पहले इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा किया जाता था और अब रामन स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा किया जाने लगा। इस खोज से कई पदार्थों का कृत्रिम संश्लेषण संभव हो पाया।

प्रश्न 4 : देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के महत्वपूर्ण योगदान प्र प्रकाश डालिए।
उत्तर : देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने के लिए रामन के कई काम किए। रामन ने बंगलोर में एक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की, जिसे अब रामन रिसर्च इंस्टीच्यूट के नाम से जाना जाता है। भौतिक शास्त्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल ऑफ फिजिक्स नामक शोध पत्रिका प्रारंभ की। उन्होंने अपने जीवन काल में सैंकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया। विज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए वे करेंट साइंस नामक पत्रिका का संपादन भी करते थे।

प्रश्न 5 : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर : सर चंद्रशेखर वेंकट रामन ने हमेशा ये संदेश दिया कि हम विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करें। न्यूटन ने ऐसा ही किया था और तब जाकर दुनिया को गुरुत्वाकर्षण के बारे में पता चला था। रामन ने ऐसा ही किया था और तब जाकर दुनिया को पता चला कि समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है, कोई और क्यों नहीं। जब हम अपने आस पास घटने वाली घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषन करेंगे तो हम प्रकृति के बारे में और बेहतर ढ़ंग से जान पाएँगे।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए –
प्रश्न 1 : उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
उत्तर : रामन एक ऐसी नौकरी में थे जहाँ मोटी तनख्वाह और अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। लेकिन रामन ने उस नौकरी को छोड़कर ऐसी जगह नौकरी करने का निर्णय लिया जहाँ वे सारी सुविधाएँ नहीं थीं। लेकिन नई नौकरी में रहकर रामन अपने वैज्ञानिक शोध का कार्य बेहतर ढ़ंग से कर सकते थे। यह दिखाता है कि उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

प्रश्न 2 : हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।
उत्तर : हमारे पास अनेक ऐसी चीजें हैं या घटनाएँ घटती रहती हैं जिन्हें हम जीवन का एक सामान्य हिस्सा मानकर चलते हैं। लेकिन उन्ही चीजों में कोई जिज्ञासु व्यक्ति महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहस्य खोज लेता है। फिर हम जैसे नींद से जागते हैं और उस नई खोज से विस्मित हो जाते हैं। किसी की जिज्ञासा उस सही पात्र की तरह है जिसमें किसी वैज्ञानिक खोज को मूर्त रूप मिलता है।

प्रश्न 3 : यह अपने आप में एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था।
उत्तर : इस पंक्ति में लेखक रामन के अथक परिश्रम के बारे में बता रहा है। रामन उस समय एक सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। अपने दफ्तर में पूरे दिन काम करने बाद जब वे शाम में निकलते थे तो घर जाने की बजाय सीधा बहु बाजार स्थित प्रयोगशाला में जाते थे। वे प्रयोगशाला में घंटों अपने शोध पर मेहनत करते थे। पूरे दिन दफ्तर में काम करने के बाद फिर प्रयोगशाला में काम करना बहुत मुश्किल होता है। यह शारीरिक और मानसिक तौर पर थका देता है। इसलिए लेखक ने ऐसे काम को हठयोग की संज्ञा दी है।